जब एक चारण कवि जोगीदास ने जोधपुर के राजा मानसिंह को चुनौती दी

Gyan Darpan
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जोधपुर के राजा मानसिंह की चारणों पर विशेष कृपा थी | यदि उनसे कोई अपराध भी हो जाता तो मानसिंह उन्हें क्षमा कर देते थे | एक बार जोगीदास नामक अपने कृपा पात्र चारण को राजा मानसिंह ने फलोदी का हाकिम नियुक्त किया | जोगीदास स्वयं बहुत उदार और दानी प्रकृति के थे। राजस्व का सारा धन ब्राह्मणों, साधुओं और गरीबों में बांट देते थे । एक बार मानसिंह ने राजस्व की रकम भिजवाने के लिये कहलाया । राजा मानसिंह के समक्ष सदैव आर्थिक संकट बना रहता था । जोगीदास के पास भी उस समय रकम नहीं थी। क्योंकि जो भी कर संग्रह हुआ वह उसने जरुरत मंदों को दान कर दिया था | 

चित्र : प्रतीकात्मक है 

सो उसने राजा को उत्तर में कहलाया कि मैं अपनी धार्मिकता, उदारता और दानशीलता का तो परिचय दे चुका है, अब अपने शौर्य को भी दिखाना चाहता हूँ । आप सेना भेज दीजिये । मानसिंह इस अहंकारपूर्ण उत्तर से बहुत क्रुद्ध हुये। सेना लेकर वे स्वयं फलोदी गये। कुछ चारण कवि भी उनके साथ थे । जोगीदास भी युद्ध भूमि में आ गया। चारण कवियों को देख कर उसने चिल्लाकर कहा - 'हे चारण कविश्वरों, राजा तो मेरा शत्रु हो गया है। वह मेरी कीर्ति नहीं होने देगा । पर अपने कवि-धर्म का पालन कर मेरी कीर्ति की रक्षा करना । युद्ध हुआ और जोगीदास वीरता के साथ लड़ता हुआ काम आया ।

मानसिंह ने सभी चारण कवियों को आदेश दे दिया कि कोई भी जोगीदास के यशोगान में छन्द नहीं लिखेगा । यदि कोई यह दुस्साहस करेगा तो उसे निष्कासन से दण्डित किया जायेगा । जोधपुर लौटने पर रात्रि में पण्डितों और कवियों की सभा हुई । सभी कवियों ने अपने कवि-धर्म का पालन करते हुये जोगीदास की कीर्ति में कवितायें सुनाई और राजा की आज्ञानुसार सभा से उठ कर जाने लगे । कहते हैं, मानसिंह तब दुर्ग की सूरजपोल के आगे जाकर लेट गये और कहने लगे यदि आप लोग जाना ही चाहते हैं तो मेरे ऊपर से जायें | राजा के इस स्नेह और आदर भाव से प्रभावित होकर चारण कवि वापस लौट आये। मानसिंह ने तब एक दोहा सुनाया- 

जोगो कणहिन जोग (पण), सह जोगो कीनो सकल ।

लाठां चारण लोग, तारण कुल क्षत्रियां तरणां ॥

तब लोगों ने जाकर मानसिंह को उत्तेजित किया और कहा कि आपको आदेश वापस नहीं लेना चाहिये । चारण कवियों का यह अपराध क्षम्य नहीं है । इस पर कहते हैं मानसिंह ने राजपूतों और चारणों के आत्मीय सम्बन्धों को लेकर फिर एक छप्पय सुनाया जो इस प्रकार है-

                                                            गिरण पृथ्वी में गंध, पावन में जे सुपरषण                                                                                                         शीतल रस जल साथ, अगन मांही ज्यू ऊषरण                                                                                                 सून मांही ज्यू शब्द, शब्द में अर्थ हले स्वर                                                                                                        पिंड मांही ज्यू प्राण, प्राण में ज्यू परमेश्वर                                                                                                          रग-रग ही रगत छायो रहे, देह विषय ज्यों दारणा                                                             क्षत्रियां साथ नातो छतो, चोली दामन चारणां ||

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