राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .

जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !

मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.

भूतों का महल : भानगढ़ का सच

राजस्थान के भानगढ़ का उजड़ा किला व नगर भूतों का डरावना किले के नाम से देश विदेश में चर्चित है.

"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था

उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.

क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत

आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.

Oct 21, 2014

गद्दार नहीं धर्मपरायण और देशभक्त राजा थे जयचंद

जयचंद का नाम आते ही हर किसी व्यक्ति के मन में एक गद्दार की छवि उभर आती है| यही नहीं जयचंद नाम को गद्दार के पर्यायवाची के रूप में प्रयोग किया जाने लगा है| जबकि जयचंद जिन पर आरोप है कि उन्होंने पृथ्वीराज से बदला लेने के लिए गौरी को बुलाया और उसकी सहायता की| लेकिन जब इस सम्बन्ध में प्राचीन इतिहास पढ़ते है तो उसमें ऐसे कोई सबूत नहीं मिलते जिनके आधार पर जयचंद को गद्दार ठहराया जा सके| इतिहासकार तो जयचंद के संयोगिता नाम की किसी पुत्री होने का भी खंडन करते है ऐसे में जब संयोगिता नाम की पुत्री ही नहीं थी तो दोनों के बीच कैसा वैमनस्य ?
लेकिन जब भी कहीं इस बारे में चर्चा की जाती है तो कोई भी व्यक्ति जयचंद के पक्ष में इन दलीलों को मानने के लिए राजी नहीं होता क्योंकि जनमानस में जयचंद के प्रति नफरत इतनी ज्यादा घर कर गई कि कोई उनके पक्ष में सुनकर ही राजी नहीं|

हाल में जयपुर के वरिष्ठ पत्रकार व साहित्य लेखक डा.आनंद शर्मा जो कई पुरस्कारों से नवाजे जा चुके है और उनकी कई कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी है का “अमृत-पुत्र” ऐतिहासिक उपन्यास पढने को मिला| उक्त उपन्यास से जयचंद की कहानी का कोई सम्बन्ध नहीं है फिर भी लेखक ने यह उपन्यास देश के पूर्व उपराष्ट्रपति स्व.भैरोंसिंह जी को समर्पित करने के कारणों पर जिक्र करते हुए पुस्तक की भूमिका में जयचंद पर अपने ऐतिहासिक शोध का जिक्र करते हुए जयचंद को धर्मपरायण व देशभक्त राजा की संज्ञा दी है क्योंकि लेखक को इतिहास में ऐसा कुछ नहीं मिला जिनके आधार पर जयचंद को गद्दार माना जाय|

पुस्तक में “अपनी बात” शीर्षक में लेखक डा.आनन्द शर्मा लिखते है – 1 सितम्बर, 2003 को भैरोंसिंह जी ने दिल्ली में मेरे ऐतिहासिक उपन्यास “नरवद सुप्यारदे” का लोकार्पण किया था| राजस्थान के राठौड़ वंश से सबंधित होने के कारण मैं उपन्यास के आरम्भ में “पूर्व कथा” के रूप में राठौड़ों के कर्णाटक, महाराष्ट्र, कन्नौज होते हुए राजस्थान आने का अज्ञात और सांप-सीढी जैसा रोमांचक इतिहास देने का लोभ संवरण नहीं पाया था| लगभग एक हजार वर्ष के इस इतिहास की प्रमाणिकता पर पूरा ध्यान देने पर भी एक जगह चूक हो ही गई| मैं कन्नौज नरेश जयचंद और दिल्ली-अजमेर नरेश पृथ्वीराज चौहान के शत्रुता प्रकरण में बहुचर्चित संयोगिता-हरण की घटना और उसके कारण प्रतिशोधाग्नि से धधकते जयचंद द्वारा गजनी सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण के लिए आमंत्रित करने की बात लिख गया था| विख्यात प्रकरण होने के कारण मैंने इसकी प्रमाणिकता खोजने का प्रयास नहीं किया था| वैसे भी उपन्यास के मुख्य कथानक से संबंधित न होने के कारण यह मेरी शोध का विषय नहीं था| मेरी कलम ने भी जयचंद को देशद्रोही जैसे रूप में प्रस्तुत कर दिया था|

पुस्तक लोकार्पण से पूर्व राजनेता उसे पढ़ते नहीं है| किन्तु भैरोंसिंह जी इसके अपवाद है| लोकार्पण से पूर्व पुस्तक को पूरी न पढ़ पाने पर भी उसे सरसरी तौर पर अवश्य पढ़ते है|

आगे भैरोंसिंह जी द्वारा पुस्तक पढ़कर उस पर टिप्पणी करने के संबंध में आनंद शर्मा लिखते है – उपन्यास की भरपूर सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि उनके विचार में जयचंद और पृथ्वीराज में वैमनस्य का कारण सिर्फ संयोगिता-हरण नहीं हो सकता| इसके अन्य कारण भी होने चाहिए| उन्होंने तो संयोगिता-हरण प्रकरण पर ही संदेह व्यक्त करते हुए मुझसे इस बारे में शोध करके सही तथ्य सामने लाने का सुझाव तक दिया था|

अपनी बात में आनंद शर्मा आगे लिखते है – 3 सितम्बर के पत्र में भी अन्य बातों के साथ इस प्रकरण के उल्लेख ने मुझे सोचने के लिए विवश कर दिया| तीस वर्षों के सम्बन्धों के कारण में उनकी प्रकृति से परिचित था| अकारण और व्यर्थ की बात कहना उनके स्वभाव में नहीं था|

पत्र मिलने के बाद उनकी जबाब-तलबी से बचने के लिए मैंने आधे-अधूरे मन से पृथ्वीराज –जयचंद्र प्रकरण पर शोध आरम्भ किया| मेरी निजी लाइब्रेरी में पर्याप्त संदर्भ ग्रन्थ उपलब्ध होने के कारण मुझे कहीं जाना भी नहीं था| सब कुछ मेरे हाथ के नीचे था| लेकिन किसी भी इतिहास-ग्रन्थ में संयोगिता-पृथ्वीराज का उल्लेख न पाकर मैं हतप्रद रह गया| हैरत की बात यह थी कि जयचंद्र के संयोगिता नाम की कोई पुत्री ही नहीं थी| ऐसे में उसका स्वयंवर आयोजित होने और संयोगिता-हरण के कारण कन्नौज-दिल्ली की सेनाओं में युद्ध होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था| इसी प्रकार जयचंद्र द्वारा राजसूय यज्ञ करने का उल्लेख भी नहीं मिला| जब यज्ञ और स्वयंवर का आयोजन ही नहीं हुआ तो द्वार पर पृथ्वीराज की मूर्ति लगवाने, संयोगिता-हरण के बाद दिल्ली-कन्नौज की सेनाओं में भयंकर युद्ध होने के प्रवाद स्वत; ही समाप्त हो जाते है| इतना ही नहीं, जयचंद्र भी कन्नौज के स्थान पर काशी के तेजस्वी गहरवाल राजा निकले| कन्नौज तो बिहार के गया तक फैले उनके विशाल राज्य का एक भाग था| काशी के यशस्वी गहरवाल शासकों का इतिहास तो सर्वविदित है|

इसके बाद तो मेरे अन्वेषी-मन को चैतन्य होना ही था| खोजने के प्रयास में जयचंद्र का जैसे कायाकल्प ही हो गया था| वे देशद्रोही के स्थान पर धर्मपरायण और देशभक्त राजा सिद्ध हो रहे थे| संयोगिता प्रकरण न होने के कारण उनके द्वारा शहाबुद्दीन को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित करने का कारण भी नहीं रह जाता था| “कन्नौज का इतिहास खंगालने पर भी जयचंद्र – शहाबुद्दीन दुरभिसंधि का एक भी प्रमाण नहीं मिला| बस, जयचंद्र और पृथ्वीराज के बीच मनोमालिन्य की बात ही सामने आई| “भविष्य पुराण” ने वैमनस्य का कारण भी बता दिया| इसके अनुसार दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर की दो पुत्रियाँ थी| इनमें चन्द्रकान्ति बड़ी व किर्तिमालिनी छोटी थी| चन्द्रकान्ति का विवाह कान्यकुब्ज के राजा देवपाल अथवा विजयपाल के साथ हुआ, जिसके गर्भ से जयचंद्र ने जन्म लिया था| किर्तिमालिनी के अजमेर के चौहान राजा सोमेश्वर के साथ हुए विवाह से पृथ्वीराज पैदा हुआ था| पुत्रहीन राजा अनंगपाल ने अपनी छोटी पुत्री के पुत्र पृथ्वीराज को गोद लेकर दिल्ली का राज्य सौंप दिया था| जबकि जयचंद्र न केवल अनंगपाल की ज्येष्ठ पुत्री का पुत्र था, अपितु आयु और अपने 5600 वर्गमील राज्य के कारण भी पृथ्वीराज से बड़ा था| पिता सोमेश्वर से पृथ्वीराज को मिला अजमेर राज्य जयचंद्र के कान्यकुब्ज के मुकाबले काफी छोटा था|

यह सच है कि सन 1191 में शहाबुद्दीन और पृथ्वीराज के बीच हुए तराईन के प्रथम युद्ध में जयचंद्र ने पृथ्वीराज का साथ नहीं दिया था| किन्तु इसका कारण भिन्न था| जयचंद्र के साथ वैमस्य और अपनी शक्ति के प्रति आश्वस्त होने के कारण पृथ्वीराज ने कन्नौज नरेश को निमंत्रण ही नहीं भेजा था| जबकि जयचंद्र से छोटे राजाओं तक को उन्होंने सैन्य-सहायता के लिए आमंत्रित किया था| ऐसे में कन्नौज नरेश आगे बढ़कर सहायता करने क्यों जाते?

सन 1193 के द्वितीय तराईन के युद्ध में भी यही हुआ| निमंत्रण न मिलने के कारण जयचंद्र इस बार भी युद्ध से तटस्थ रहे| इस युद्ध में 26 वर्षीय पृथ्वीराज को बंदी बना कर मार डालने के बाद शहाबुद्दीन गोरी का दिल्ली से अजमेर तक के विशाल क्षेत्र पर अधिकार हो गया| अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का सूबेदार बनाकर वह गजनी लौट गया| अगले वर्ष फिर लौटा| इस बार उसने जयचंद्र को परास्त करके राठौड़ों का राज्य भी समाप्त कर दिया था| पृथ्वीराज पर आक्रमण में जयचंद्र के सहायक होने की स्थिति में गोरी कन्नौज पर आक्रमण कैसे कर सकता था? वह तो कुतुबुद्दीन के स्थान पर जयचंद्र को अपना करद राजा बनाकर दिल्ली-अजमेर का राज्य सौंप कर निश्चिन्त हो सकता था| फिर तराईन के दोनों युद्धों में जयचंद्र द्वारा शहाबुद्दीन को किसी मामूली सहायता प्रदान करने का उल्लेख किसी भी इतिहास में नहीं मिलता| इसके बाद तो इस आधारहीन प्रवाद का उदगम खोजना मेरे लिए आवश्यक हो गया| मैं यह जानकार हतप्रभ रह गया कि यह सारा वितण्डावाद पृथ्वीराज के आश्रित चारण चन्दबरदाई रचित “पृथ्वीराज रासो” ने फैलाया है| इसी काव्य में चन्दरबरदाई ने अपने आश्रयदाता की प्रशंसा में जमीन-आसमान मिला दिए थे| उसने ही काल्पनिक संयोगिता का सृजन करके उसे दोनों नरेशों की शत्रुता का कारण ही नहीं बनाया, तराईन युद्ध में मारे गए पृथ्वीराज के शब्दभेदी बाण के द्वारा गोरी के मारे जाने तक का उल्लेख कर डाला| जबकि गोरी तराईन युद्ध के लगभग 10 वर्ष बाद सन 1205-06 में झेलम जिले (अब पाकिस्तान) के समीप शत्रु कबीले द्वारा सोते समय घात लगाकर किये हमले में मारा गया था| स्मिथ ने भी “अर्ली हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया” में यही लिखा था|

इतिहास के सभी विद्वानों ने “पृथ्वीराज रासो” को अप्रमाणिक माना है| इस पर भी इतिहास धरा रह गया, रासो की कथा जन-जन में प्रचारित हो गई| एक धर्मपरायण राजा देशद्रोही के रूप में सामान्यजन की घृणा का पात्र बन गया|
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Oct 19, 2014

गादड़ी गारंटी और काला धन

लोकसभा चुनाव पूर्व बाबा रामदेव देशभर में काले धन को वापस लाने के लिए अभियान चलाये हुए थे और वे दावा कर रहे थे कि मोदी जी प्रधानमंत्री बने और भाजपा का राज आया तो सौ दिन में काला धन विदेशी बैंकों से वापस लाया जायेगा| देशी भाषा में कहूँ तो बाबा विदेशी बैंकों में जमा भारतियों का काला धन सौ दिनों में वापस लाने की गारंटी दे रहे थे| लेकिन ख़बरें पढने को मिल रही है कि भाजपा की मोदी सरकार ने घोषणा की है कि सरकार काला धन विदेशों में जमा कराने बालों के नाम बताने नहीं जा रही| यानी सरकार काला धन वापस लाना तो दूर काला धन जमा करने वालों के नामों का खुलासा भी नहीं करना चाहती| इससे साफ़ जाहिर है कि बाबा की गारंटी के साथ केंद्र में बनी कथित राष्ट्रवादी सरकार ने भी सरकार बनाते ही सौ दिन में जो काला धन वापस लाने का वचन दिया था उससे पल्टी मार गई और जनता को दिया वचन भंग कर दिया|

इस प्रकरण को देखते हुए एक लोक कहानी याद आ गई जो बचपन से सुनते आ रहे है कि एक गीदड़ ने गीदड़ी को शहर घुमाने की झूंठी गारंटी दी और गारंटी फ़ैल हो गई| इस कहानी के साथ साथ गांवों में जब भी कोई गारंटी देने की बात करता है तो लोग मजाक में कह देते कि भाई ये तेरी गारंटी "गादड़ी गारंटी" तो साबित नहीं होगी| कहानी के अनुसार एक गीदड़ अपनी गीदड़ी के पास अक्सर डींगे हांकता कि वह शहर में जाकर नित्य फिल्म देखता है और अच्छे अच्छे पकवान खाता है, बेचारी गीदड़ी समझाती कि शहर की और मत जाया करो, शहर के कुत्ते कभी मार डालेंगे| तब गीदड़ उसे एक कागज का टुकड़ा दिखाते हुए कहता कि उसके पास गारंटी पत्र है सो कोई कुत्ता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता|

गारंटी देख गीदड़ी आश्वस्त हो गई और एक दिन गीदड़ से जिद करने लगी कि उसे भी शहर घुमाने ले चले| अब गीदड़ फंस गया पर करता क्या? सो बेमन से गीदड़ी को लेकर शहर की और चल पड़ा| दोनों शहर के पास पहुंचे ही थे कि कुत्तों को भनक गई और वे उन्हें पकड़ने को पीछे भागे| कुतों के झुण्ड को अपनी और आते देख गीदड़ जंगल की और बचने भागा तो गीदड़ी ने कहा - इनको गारंटी दिखाओं ना !
गीदड़ बोला - भाग लें ! ये कुत्ते अनपढ़ है सो गारंटी में नहीं समझते |
इस तरह गीदड़ द्वारा गारंटी को लेकर हांकी गई डींग की पोल खुल गई |

बाबा भी काले धन को लेकर जिस तरह देशवासियों को गारंटी देते घूम रहे थे, वो भी ठीक वैसे ही डींग साबित हुई जैसे गीदड़ वाली गारंटी साबित हुई थी| अत: बाबा रामदेव की गारंटी को भी "गादड़ी गारंटी" की संज्ञा दी जाए तो कोई गलत नहीं|

Oct 17, 2014

सरकारी योजनाओं की आड़ में वामपंथी चंदा

आज से डेढ़ दो साल पहले फोन पर पता चला कि गांव में लड़कियों के लिए फॉर्म भरे जा रहे है, जिनके आधार पर लड़की को विवाह के समय पचास हजार रूपये मिलेंगे| ये फॉर्म भरते समय किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि ये फॉर्म किस योजना व किस विभाग में जमा कराया जा रहा है| ना भरवाने वालों ने बताने का कष्ट किया| बस आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के मार्फत दलाल सक्रीय हो गए और तीन सौ रूपये प्रति फॉर्म लेकर सम्बंधित विभाग में जमा करा दिए गए| गांव यात्रा पर जब लोगों से जानकारी ली तो पता ही नहीं चला कि कौनसे विभाग की क्या योजना थी|
हाँ ! उस वक्त गांव प्रवास पर मेरी पुत्री ने यह जरुर बताया कि - "उसने किसी का फॉर्म पढ़ा तो वो श्रमिकों के लिए था, हो सकता है गरीब श्रमिकों की बेटियों की शादी पर आर्थिक सहायता दी जावे|"

अभी इसी हफ्ते गांव यात्रा के दौरान पता चला कि उन फॉर्म की अब डायरियां (पासबूक्स) आई है और एक वर्ष पूरा हो चूका है अत: उनका नवीनीकरण होना है| मैंने एक आवेदक की डायरी देखी तब पता चला कि वे पासबुक्स "श्रम विभाग एवं भवन व अन्य संनिर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड" द्वारा जारी की गई थी| पासबुक पर सीकर कार्यालय का कोई पता नहीं था, हाँ जयपुर मुख्यालय का पता जरुर लिखा था, साथ ही पासबुक में वामपंथी श्रमिक संगठन "सीटू" का लाल स्टीकर लगा था| नवीनीकरण के इच्छुक एक आवेदक को साथ लेकर मैं शहर गया, उससे पहले गांव में कार्यालय का पता पूछा तो सबने कहा- कोर्ट के सामने मिलन रेस्टोरेंट वाली गली है| यानी जिसने भी बताया उसने माकपा कार्यालय के बारे में बताया|

माकपा (CPM)कार्यालय में जाकर पूछा तो किसी ने बताया कि डायरियां बनने का काम बेसमेंट में होता है, मुझे भी आश्चर्य हो रहा था कि सरकारी काम किसी राजनैतिक पार्टी के दफ्तर में कैसे ही रहा है ? बेसमेंट में काफी भीड़ थी, सीटू का बैनर लगा था, दो कार्यकर्त्ता लोगों को फॉर्म भरवाने में सहायता कर रहे थे, तीसरा रसीद बुक लेकर प्रत्येक फॉर्म की 120 रूपये की सीटू की रसीद काट रहा था| मुझे भी बताया गया कि फॉर्म भरकर ये रसीद कटवा लें, फिर एक ऑफिस का पता बताएँगे जहाँ जाकर फॉर्म जमा करवा दें| जिनकी रसीद कट चुकी थी, उन्हें रसीद काट कर रूपये उगाहने वाला बता रहा था कि ये रसीद जेब में रखे और फलां पते पर जाकर दुसरे कार्यालय में फॉर्म जमा करवा दें, वहां भी 60 रूपये की एक और रसीद कटेगी|

इस कार्य में माकपा कार्यकर्त्ता अनपढ़ श्रमिकों को फॉर्म भरवाने की सहायता का एक तरफ सराहनीय कार्य कर रहे थे दूसरी और उसी कार्य के बदले एक गरीब, अनपढ़ श्रमिक जो उन्हें वोट भी देता है, बेचारे से मुफ्त में 120 रूपये वसूल कर उसकी गरीब जेब पर आर्थिक बोझ डालकर एक घ्रणित कार्य भी कर रहे थे| और बेचारा गरीब श्रमिक उनके द्वारा वसूला गए धन को सरकारी योजना में अपने नवीनीकरण की एक साधारण प्रक्रिया समझ रहा था और कोमरेडों का मन से शुक्रिया भी अदा कर रहा था कि उनकी वजह से उसे आर्थिक सहायता मिल जायेगी|

इस तरह सीकर जिले में वामपंथी कार्यकर्त्ता सरकारी योजनाओं की आड़ में अपने श्रमिक संगठन की सदस्यता बढाने व चंदा एकत्र करने के घिनौने कार्य में सलंग्न है| हालाँकि किसी भी पार्टी द्वारा चंदा एकत्र करना या सदस्य बनाना गलत नहीं है लेकिन मैंने जो देखा उससे लगा कि जिसे सदस्य बना उसकी सदस्यता की फीस की रसीद काटी जा रही थी, उसे पता ही नहीं कि ये वामपंथी अपने लिए ले रहे है, यदि उसे पता चल जावे तो वो उनकी और झांके तक नहीं|

और हाँ इस तरह की शानदार सरकारी योजनाओं को जरुरतमंदों तक पहुंचाने में कांग्रेस, भाजपा (BJP)कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता देख मन में बड़ा दुःख हुआ, जबकि इन पार्टियों के कार्यकर्ताओं का भी कर्तव्य बनता है कि इस तरह की योजनाओं का जरुरतमंदों को लाभ दिलावे, उनकी आवेदन फॉर्म भरने में सहायता कर वे अपने पार्टी का जनधार भी बढ़ा सकते है लेकिन अफ़सोस इस मामले में वे वामपंथी कार्यकर्ताओं से बहुत पीछे है और यही कारण है कि वामपंथी विधायकों को भाजपा बिना मोदी लहर के आजतक हरा नहीं पाई|

Oct 10, 2014

लोकतंत्र में रामराज्य दिवा-स्वप्न

आज देश का हर नागरिक चाहता है कि देश में रामराज्य स्थापित हो। देश की सभी राजनैतिक पार्टियाँ भी हर चुनाव में जनता को रामराज्य स्थापित करने का स्वप्न दिखाती है। हर पार्टी रामराज्य स्थापित करने का वादा करती है। महात्मा गांधी ने तो आजादी के आन्दोलन में देश की जनता से रामराज्य स्थापित करने के नाम पर ही समर्थन जुटाया था। महात्मा गांधी की हर सभा व हर काम राम के नाम से शुरू होता था। गांधी का भजन रघुपति राघव राजा राम आज भी जन जन की जुबान पर है। जनता द्वारा रामराज्य की कामना और नेताओं द्वारा रामराज्य स्थापित करने की बात करने से साफ है कि शासन पद्धतियों में रामराज्य सर्वश्रेष्ठ थी और आज भी है। एक ऐसी राजतंत्र शासन पद्धति जिसमें जनता को सभी लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त हो, जनता का राजा से सीधा संवाद हो, जातिगत व्यवस्था होने के बावजूद कोई जातिगत भेदभाव नहीं हो, सभी के मूलभूत अधिकारों व सुरक्षा के लिए राजा व्यक्तिगत रूप से प्रतिबद्ध हो, राज्य के संसाधनों पर सभी नागरिकों का समान अधिकार हो, श्रेष्ठ होगी ही। रामराज्य में ये सब गुण थे, तभी तो आज लोग रामराज्य का स्वप्न देखते है।

लेकिन क्या वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में रामराज्य की स्थापना संभव है? शायद नहीं ! क्योंकि रामराज्य के लिए सबसे पहले देश में एक क्षत्रिय राजा का होना अनिवार्य है, जो वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं है। आज देश में संसदीय शासन प्रणाली है जिसमें प्रधानमंत्री सर्वेसर्वा होता है। प्रधानमंत्री से ऊपर राष्ट्रपति होता है पर असली शासनाधिकार प्रधानमंत्री के पास होते है, राष्ट्रपति के पास नहीं। अतः सीमित अधिकारों वाले राष्ट्राध्यक्ष को राजा की संज्ञा नहीं दी जा सकती। शासन के अधिकार प्रधानमंत्री के पास होते है। जनता पांच वर्ष के लिए शासन करने हेतु प्रधानमंत्री को सत्ता सौंपती है। लेकिन वह भी प्रधान मंत्री ही होता है, राजा नहीं। जब जिस देश में राजा ही नहीं, उसमें रामराज्य कैसे स्थापित हो सकता है? जबकि हमारे वेदों में भी लिखा है कि आदर्श शासन व्यवस्था एक क्षत्रिय राजा ही दे सकता है। योगीराज अरविन्द ने कहा है कि जिस देश में क्षत्रिय राजा नहीं, ब्राह्मणों को उस देश का त्याग कर देना चाहिये, क्योंकि क्षत्रियविहीन राजा के बिना सुशासन स्थापित नहीं हो सकता। विश्व में राजनीति के अबतक सबसे प्रसिद्ध आचार्य चाणक्य ने भी लिखा है कि जिस देश का राजा क्षत्रिय नहीं हो, उस राजा के खिलाफ क्षत्रियों को बगावत कर राजा को बंदी बना लेना चाहिए। इससे साफ जाहिर है कि एक क्षत्रिय राजा ही सुशासन दे सकता है। प्रजा का भला क्षत्रिय राजा के राज में ही संभव है, क्योंकि राम क्षत्रियों के पूर्वज व आदर्श है, सो कोई भी क्षत्रिय राजा कैसा भी हो अपने पूर्वज व आदर्श राम का कुछ तो अनुसरण करेगा ही, और उसके द्वारा थोड़ा सा ही अनुसरण करना सीधा जनहित में होगा।

लेकिन आज देश में उपस्थिति सभी राजनैतिक दल व उनके नेता रामराज्य देने की कल्पना तो करते है, स्वप्न भी दिखाते है, लेकिन राम का अनुसरण करने के बजाय रावण का अनुसरण ज्यादा करते है। हाँ ! राम के नाम पर या राम नाम की खिलाफत कर कई राजनीतिक दल जनता की भावनाओं का दोहन कर वोट प्राप्त करने के लिए राजनीति करते है। देश में ऐसा समय भी आया है, जब राम का नाम लेकर नेता सत्ता की सीढियों पर चढ़ गए, लेकिन राम को भूल गए। मेरा मतलब राममंदिर निर्माण से नहीं, राम का अनुसरण करने से है। महात्मा गांधी ने राम का नाम लेकर लोगों को खुद से जोड़ा। आजादी के बाद लोकतांत्रिक रामराज्य का सपना दिखाया। लेकिन आजादी के बाद उन्हीं की पार्टी ने राम व उनकी शासन व्यवस्था का अनुसरण कर जनता को सुशासन देने की बात करना तो दूर, राम नाम लेने वालों को ही साम्प्रदायिक घोषित कर दिया। अदालत में लिखित हलफनामा देकर राम के अस्तित्व को ही नकार दिया। ऐसे दलों से रामराज्य स्थापना की उम्मीद कैसे की जा सकती है? आज ज्यादातर राजनैतिक दलों में तथाकथित बुद्धिजीवी धर्म के ठेकेदारों का वर्चस्व है, जिन्होंने सदियों से राम के नाम पर अपना जीवनयापन किया, अपनी धर्म की दूकान चलाई। आज वे रावण को महिमामंडित करने में लगे है। जिस उद्दण्ड परसुराम को राम ने सबक सीखा कर उसकी उद्दंडता पर अंकुश लगाया और जनता के मन में बैठे उसके आतंक का अंत किया, जो अपनी माँ की हत्या का अपराधी है, उसे भगवान के रूप में महिमामंडित किया जा रहा है। आचार्य द्रोण जैसे श्रेष्ठ योद्धा को छोड़ अश्व्थामा जैसे अनैतिक व्यक्ति का महिमामंडन किया जा रहा है। आज ऐसे लोगों की जयन्तियां मनाई जा रही है। ऐसे माहौल में रामराज्य की कल्पना भी कैसे की जा सकती है?

बाल्मीकि द्वारा लिखी रामायण के बाद धर्म के ठेकेदारों ने अपने हिसाब से कई तरह से रामायण लिखी। बाल्मीकि का लिखा गायब किया गया और नई कहानियां जोड़ी गई। रावण जो आतंक का पर्याय था, को महिमामंडित करने के लिए उसे उस वक्त का सबसे ज्यादा बुद्धिजीवी व ज्ञानवान पंडित बताया गया। इनकी लेखनी का कमाल देखिये एक तरफ रावण को व्याभिचारी, आतंकी, राक्षक, लम्पट, कपटी, क्रूर, स्वेच्छाचारी, अनैतिक लिखा गया वहीं दूसरी और उसे शास्त्रों का ज्ञाता, ज्ञानवान, धर्म का मर्म समझने वाला लिखकर महिमामंडित करने की कोशिश की गई। आप ही सोचिये कोई व्यक्ति धर्म, शास्त्र आदि का ज्ञानी हो, वो ऐसा क्रूर आतंकी हो सकता है? जिसकी क्रूरता के चलते आज भी उसके पुरे खानदान को राक्षक कुल समझा जाता हो और उसे बुराई का प्रतीक। जबकि उसके कुल में विभीषण जैसा ज्ञानी और धर्मज्ञ उसका भाई था, जाहिर करता है कि रावण का खानदान राक्षक नहीं, मानव ही था, लेकिन उसकी क्रूरता ने उसे राक्षक का दर्जा दिया। ऐसे ऐसे अनैतिक लोगों का आज महिमामंडन हो रहा है, उनकी जयन्तियां मनाई जा रही है, जो भविष्य में आने वाली पीढ़ियों को उनका ही अनुसरण करने की प्रेरणा देगी। जब लम्पट, क्रूर, आतंकी, उद्दण्ड, माँ के हत्यारे आने पीढ़ियों के आदर्श होंगे व उनका अनुसरण होगा, उस हाल में रामराज्य की कल्पना कैसे की जा सकती है?

आज राजनैतिक दल एक तरफ धर्मयुक्त रामराज्य की स्थापना का स्वप्न दिखाते है, दूसरी और धर्म को अफीम का नशा बताकर, या धार्मिक व्यक्ति को साम्प्रदायिक बताकर, या धर्म व जाति के आधार पर जनता को बांटकर उनके वोटों से सत्ता प्राप्त करना चाहते है, तब रामराज्य तो कतई स्थापित नहीं हो सकता। रावण राज्य जरुर स्थापित हो जायेगा। देश की शासन व्यवस्था का वर्तमान माहौल देखने पर रावण राज्य की झलक अवश्य दिखाई पड़ रही है। सरेआम बच्चियों के साथ बलात्कार, आतंकी घटनाएं, चोरियां, डाके, भ्रष्टाचार, व्याभिचार, अनैतिकता, गरीब का शोषण, जातिय उत्पीड़न, धार्मिक दंगे, बेकाबू महंगाई, नेताओं द्वारा देश की संपदा लूट कर विदेशों में ले जाना, चरित्रहीन व भ्रष्ट नेताओं का नेतृत्व रावण राज्य की, क्या झलक नहीं दिखाते?



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