राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .

जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !

मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.

भूतों का महल : भानगढ़ का सच

राजस्थान के भानगढ़ का उजड़ा किला व नगर भूतों का डरावना किले के नाम से देश विदेश में चर्चित है.

"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था

उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.

क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत

आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.

Jan 31, 2015

भोजन में बदलाव से करें मधुमेह का निदान

भारत में मधुमेह रोगियों की संख्या चार करोड़ से अधिक होने के साथ इसका विश्व में पहला स्थान है जो विश्व की कुल पीड़ितों की आबादी का 15 प्रतिशत है। जीवन शैली में आए बदलाव, व्यायाम से दूर भागती पीढी, अंधाधुंध शहरीकरण, कैलोरी की खपत बढ़ना, मोटापा बढ़ना, फास्ट फूड का बढ़ता चलन भारत में मधुमेह की बढ़ती महामारी के मुख्य कारण हैं। दूसरी ओर शारीरिक श्रम वाले कार्यों में आ रही कमी और सेवा क्षेत्र की नौकरियों में बढ़ोतरी, वीडियो गेम्स का बढ़ता चलन, टेलीविजन और कंप्यूटर जिससे लोग घंटों चिपक कर बैठे रहते हैं मधुमेह रोग को बढ़ावा देते हैं।

मधुमेह पर एक करोड़ से ज्यादा पृष्ठों की रपट बनाने व छत्तीसगढ़ के पारम्परिक चिकित्सकों द्वारा मधुमेह के इलाज वाले लाखों फार्मूलों पर शोध कर उन्हें एकत्र करने वाले पंकज अवधिया अपने ब्लॉग पर लिखते है कि भारत में जितने मधुमेह के रोगी है उतने ही मधुमेह को ठीक करने वाले नुस्खे यहाँ मौजूद है. पर अफ़सोस इसके बावजूद मधूमेह रोग भारत में अपने पाँव पसारता जा रहा है. यही नहीं भारत के प्राकृतिक चिकित्सकों का मानना है कि मधूमेह रोग का महज भोजन व दिनचर्या में बदलाव कर शर्तिया निदान किया जा सकता है. लेकिन मधूमेह का रोगी ऐसा कौनसा भोजन ले और कैसी दिनचर्या अपनाई का जाय जिससे मधूमेह के रोगी बिना दवा के इस घातक बीमारी का निदान स्वयं कर सके, बता रहे है फरीदाबाद के प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ महेश चौहान ..

1- सुबह उठने पर दैनिक कार्यों से निवृत होने के बाद एक छोटा सा अदरक का टुकड़ा व तुलसी के दस पत्ते मुंह में डाल कर धीरे धीरे चबायें| पूरा चबाने के बाद नारियल पानी भी ले सकते है|

2- नाश्ते से पहले या सुबह 7-8 बजे के लगभग – 50 ग्राम अंकुरित मूंग दाल, 50 ग्राम नारियल, 20 ग्राम बादाम जो रातभर पानी में भीगें हों, एक बड़ा टमाटर, मध्यम आकार का चकुंदर, एक हरी मिर्च, कुछ धनिया पत्ते व स्वादानुसार नींबू लें. चुकंदर का छिलका उतारें व उसे छोटे छोटे टुकड़ों में काट लें, टमाटर, हरा धनिया, हरी मिर्च आदि भी बारीक़ काट लें और बादाम, अंकुरित मूंग, नारियल के टुकड़े आदि सभी को मिलाकर स्वादानुसार नींबू डाल कर खाएं|

3- इस नाश्ते के दो तीन घंटे बाद यानी 10-11 बजे के घुलनशील कार्बोहाइड्रेट का सेवन करें जो फलों से मिलते है. इसके लिए 300 ग्राम दो तीन प्रकार के खट्टे फलों का चयन करें. और उन्हें धीरे धीरे चबाकर खाएं. 300 ग्राम फल खाने में कम से कम 20 मिनट का समय लगायें|

4- दोपहर के भोजन में कई कटी कच्ची सब्जियों के मिश्रण का सेवन करें जैसे एक बड़ा टमाटर, एक खीरा, 100 ग्राम फ्रेंच बीन्स, 2 बड़ी शिमला मिर्च, 1 हरी मिर्च, 50 ग्राम चने की दाल जो रात में भिगोई हो, धनिया, लहसुन व स्वादानुसार नींबू|

खीरे, टमाटर, हरी व शिमला मिर्च, आदि सभी के छोटे छोटे टुकड़े काटें, भीगी हुई चने की डाल को बीस मिनट धीमी आंच पर भाप में पकाएं और सभी कटी सब्जियां व फल एक बर्तन में मिलाकर स्वादानुसार नींबू डालकर सेवन करें. साथ में टमाटर की चटनी भी खाई जा सकती है|

5- शाम का नाश्ता (5 बजे)- जो फल आपने सुबह नाश्ते में खाए थे, इस समय भी खा सकते है, पर अगर दवा या इंसुलिन लेने का समय है तो दवा या इंसुलिन लेने से पहले ब्लड शुगर का स्तर देखें क्योंकि सुबह और दोपहर के समय उपरोक्त भोजन लेने के बाद ब्लड शुगर के स्तर में अवश्य ही कमी आई होगी|

6- रात का भोजन – रात्री भोजन 8 बजे से पहले कर लेना चाहिए तथा रात्री भोजन में सेवन के लिए दोपहर को जो भोजन सेवन किया वही सेवन करें| उपरोक्त भोजन सेवन करने से पहले मधुमेह की जांच अवश्य करा लें ताकि इसके सेवन के कुछ दिन बाद पुन: जाँच करवाकर मधुमेह के स्तर का पता लगाकर इस भोजन विधि से मिले फायदे का पता चल सके|

ब्लड शुगर को ख़त्म करने के लिए निम्न बातों पर भी ध्यान दें

1. इस तरह के भोजन में ली जाने वाली मात्रा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. डायबिटीज टाइप 1 व 2, दोनों तरह के रोगियों को अपनी आयु, भार तथा लम्बाई के अनुसार निर्धारित मात्रा में भोजन की मात्रा सेवन करनी चाहिए|

2. उक्त भोजन को चबाकर धीरे धीरे खाना चाहिए. आम तौर पर जिस गति से आप खाते है उससे दुगना समय लें और आपको डायबिटीज टाइप 1 है तो भोजन के समय को तिगुना कर दें|

3. भोजन का समय प्रतिदिन एक ही रखें. ज्यादा से ज्यादा पन्द्रह बीस मिनट ही आगा पीछा करें|

4. किसी भी तरह के बाजारू पोषक आहार (फ़ूड सप्लीमेंट), टॉनिक, पाउडर आदि का सेवन बंद कर देना चाहिए|

5. टाइप 1 व 2 के रोगियों को प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा सूर्य के प्रकाश से सीधे संपर्क में रहना चाहिए यानी धूप का सेवन अवश्य करें. नारंगी रंग की बोतल में सूर्यतप्त जल का भी सेवन करें|

6. पनीर, दूध, मख्खन, घी, सहित डेयरी उत्पाद, चीनी, नमक, रिफाइंड तेल, बिस्कुट, सॉस, जैम, ब्रेड आदि डिब्बा बंद फास्ट फ़ूड, मछली व अन्य जल जीवों के साथ मांसाहार का पूर्णतया त्याग करें|

7. कम से कम सुबह आधा घंटा या अधिक ऐसा व्यायाम करें जिसमें गहरी सांसे भरने का अवसर मिले यथा- सुर्यभेदी, कपालभाती, नाड़ी शोधन प्राणायाम, महामुद्रा, हलासन, पश्चिमोतानासन, भजंगासन, चक्रासन, मंडूकासन, आदि योगासन लाभप्रद है. सुबह की सैर भी लाभदायक है|

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Jan 28, 2015

गिलोय : जो मरे ना किसी को मरने दे

लेखक : डा. रघुनाथ सिंह राणावत
आयुर्वेद में गिलोय का अपना महत्वपूर्ण स्थान है, गिलोय के बारे में कहा जाता है कि गिलोय ना खुद करती है ना किसी रोगी को मरने देती है| इस वाक्य के बाद आप गिलोय की चिकित्सा जगत में महत्ता आसानी से समझ सकते है. गिलोय को आप काट कर कहीं भी फैंक दीजिये, इसके डंठल को सुखा दीजिये, सूखा डंठल भी थोड़ी सी नमी पाकर बेल के रूप में परिवर्तित हो जायेगा, नीम पर चढ़ी गिलोय सबसे उत्तम, मानी जाती है. गिलोय अमृता अलग अलग क्षेत्रों में विभिन्न नामो से जानी जाती है. जैसे - गडुची, कुण्डलिनी, चक्कर लक्षणा, चिन्नरुहा, वत्साद्नी, छिन्नीद्भ्वा, हिंदी में गिलोय, बंगाली में गुलंच, गुजराती में गलों,मराठी में गुलवेल, कोकणी में गरुडवेळ, सिंहली में गिलोर, कच्छ में गडू,कन्नड़ में अमरद्वलील, तमिल में तिप्ततिगें, मलयालम में चिट्टामृतम, पैप्यमृतम और लेटिन tinospora cordifolia

गिलोय वर्णन – मांसल लता के रूप, बड़े वृक्षों पर चढने वाली बहुवर्षायु होती है. पत्ते हृदय आकृति एकान्तर होते हैं. इसके काण्ड से अवरोह मूल निकलते है. फुल पीले रंग छोटे छोटे गुच्छो के रूप में निकलते हैं. लाल रंग के फल निकलते हैं. बाहरी त्वचा सफेद रंग की होती हैं, ताजे काण्ड हरे रंग के गुद्देदार और अंदर की त्वचा हरे रंग की मांसल होती हैं. इसकी बाहरी त्वचा भूरे रंग की होती हैं, इसको कटाने पर चक्कर के रूप में दिखाती हैं. बाजार में इसके सूखे काण्ड छोटे बड़े मिलते हैं, जो बेलनाकार 1 इंच व्यास के होते है. स्वाद में ये तीखी होती हैं.परन्तु इन का कोई रंग नही होता हैं.इस की छाल को आसानी से अलग किया जा सकता हैं. इसकी पहचान के इए आसानी का तरीका इसके क्वाथ में आयोडीन का घोल डाला जाता है तो गहरा नीला रंग होता हैं| वैसे इसमें मिलावट कम होती. नीम, आम, पलास, पीपल, बोर, और बबूल आदि पेड़ों पर पाई जाने वाली गिलोय की गुणवत्ता अच्छी मानी जाती है|

गुण विधान – गिलोय त्रिदोष हर वाप-पित्त-कफ को मिटने वाली, कटुपौष्टिक होती हैं, पित्तसारक, पित्त को मिटने वाली पेट के घाव [अल्सर] हो ठीक करने वाली, त्वचा के रोग को मिटने वाली, मूत्रजनन [मूत्र को पैदा करना] और मूत्रविचरनीय [मूत्र को निष्कासन, गति प्रदान करना], मूत्रेन्द्रिय रोगों में विभिन्न अनुपात में दिया जाती हैं, सभी प्रकार के प्रमेह में गिलोय का सत्व या स्वरस दिया जाता हैं, बस्ती शोथ में गिलोय सत्व बहुत ही गुणकारक हैं, नये सुजाक रोगों से गिलोय का स्वरस देने से मूत्र का जलना कम होता हैं, मुत्रेंन्द्रीय के अभिष्यंद प्रधान गिलोय को ग्वारपाठ के साथ देने से लाभदायक स्थति रहती हैं, गिलोय से भूख खुलकर लगती हैं भोजन को हजम करती हैं जिससे खून बढ़ता हैं और ऊर्जावान शरीर बनता हैं. बुखार या अन्य कारणों से दुर्बलता आती इससे ठीक होता हैं| गिलोय से पित्त का बहना सुगमता से होता हैं जिससे यकृत की पित्तवाहिनियो का एवं आमाशय के अंदर श्लेष्म त्वचा का अभिष्यंद कम होता हैं, इससे पाचन नलिका की अधिक अम्लता कम और संतुलित होती हैं| इस कारण से कुपचन पेट दर्द और पीलिया में लाभदायक होता हैं. बार बार आने वाले बुखार अज्ञात कारणों से आने वाले बुखार को ये सफलतापूर्वक उसको दूर करती अर्थात मिटाती हैं. और आधुनिक दवाइयों के अत्धिक सेवन से जो दुर्बलता पेट और शरीर को आती तो इसके सेवन से आराम आता हैं, मलेरिया और टायफायड जैसे बीमारियों के लिए ये आचर्य जनक प्रभाव दिखाती हैं साथ कमजोरी को भी दूर करती हैं, यह पेट की अग्नि दीपन करती जिससें भूख खुलकर लगती और भोजन अच्छी तरह से हजम हो जाता हैं, पीलिया पांडू, कमालिया रोग की एक प्रमाणिक दवा हैं, गिलोय को आयुर्वेद, होम्योपैथी, यूनानी और प्राकृतिक चिकित्सालय में सफलतापूर्वक उपयोग में लिया जाता हैं,यह बल्य प्रदान करने के साथ साथ उत्तम कोटि की रसायन हैं, जो आयु को बढ़ाती हैं|

संग्रह और सरंक्षण - ताजा गिलोय का प्रयोग आधिक गुणकारी और फायदेमंद होता है अत: इसे ताज़ा ही प्रयोग करना चाहिए फिर भी यदि आप संग्रह करना चाहते है तो वर्षा ऋतू के आगमन से पूर्व इस को लाकर छाया में छाल निकाल कर सुखाना चाहिए, संग्रह की हुई गिलोय का प्रयोग चार माह से अधिक ना करें| बाजार में इसका घन सत्व मिलता हैं जिसको गिलोय घनसत्व नाम से जाना जाता हैं|

उपयोग और प्रयोग – अज्ञात कारणों से आने वाले बुखार की अवस्था में गिलोय ही एक ऐसी औषधि है जो उस बुखार से निजात दिलाने में सक्षम है, इसके ताजा काण्ड (डंठल) को सिलबट्टे पर या स्टील के हमाम दस्ते में कुचल कर मिटटी या स्टील के बर्तन में रात भर रख दें और सुबह छान कर सेवन करे, अथवा ताजा गिलोय को सिलबट्टे कुचल कर छान कर सेवन कर सकते हैं, ये विधि मेरी परीक्षित विधि हैं., कुछ वैद्य या आयुर्वेदाचार्य इस को पका कर भी सेवन करने की सलाह देते हैं, गिलोय को काया कल्प योग के रूप में प्रयुक्त किया जाता हैं. शहद के साथ देने से कमजोरी दूर होती हैं. गिलोय के पत्र और काण्ड दोनों काम में लिया जाता हैं| अल्प रक्तचाप में इसका सेवन फायदेमंद साबित होता हैं, गिलोय का सिद्ध तेल चर्म रोग में काम लिया जाता हैं, रक्त विकार, ह्रदय की दुर्बलता और निम्न रक्तचाप में भी उपयोग किया जा सकता हैं, गिलोय को मिश्री के साथ पित्त की वृद्दि में लिया जाता हैं, गिलोय को घी के साथ वात विकार में लिया जाता हैं, गिलोय को शहद से कफ विकार में लिया जाता हैं, यह तीनो दोषों को मिटाती हैं, यह रसायन होने से वीर्य की न्यूनता में प्रयोग करने से वीर्य की वृद्धि होती और शक्राणु हीनता में आशातीत लाभदायक हैं| मेरे से अनुभूत है. कुलमिला कर एक अच्छा रसायन होने से शरीर शोधक और शक्ति वर्धक काया कल्प योग हैं, फिर किसी अनुभवी से परामर्श आवश्यक होता हैं|



Giloy

Jan 26, 2015

तंवर वंश की कुलदेवी : चिलाय माता

लेखक : करण सिंह तंवर


तु संगती तंवरा तणी चावी मात चिलाय!
म्हैर करी अत मात थूं दिल्ली राज दिलाय!!


चिलाय माता की तंवर वंश कुलदेवी के रूप में पूजा आराधना करता है। इतिहास में तंवरों की कुलदेवी के अनेक नाम मिलते हैं जैसे चिलाय माता, जोग माया (योग माया), योगेश्वरी (जोगेश्वरी), सरूण्ड माता, मनसादेवी आदि।

दिल्ली के इतिहास में तंवरो की कुलदेवी का नाम योगमाया मिलता है। तंवरों के पुर्वज पांडवों ने भगवान कृष्ण की बहन को कुलदेवी मानकर इन्द्रप्रस्थ में कुलदेवी का मंदिर बनवाया और उसी स्थान पर दिल्ली के संस्थापक राजा अनंगपाल प्रथम ने पुनः योगमाया के मंदिर का निर्माण करवाया। इसी मंदिर के कारण तंवरों की राजधानी को योगिनीपुर भी कहा गया, जो महरौली के पास स्थित है। यह इतिहास ग्रंथो व भारतीय पुरातत्व विभाग से पुष्ट है। तोमरों की अन्य शाखा और ग्वालियर के इतिहास में तंवरो की कुलदेवी का नाम योगेश्वरी ओर जोगेश्वरी भी मिलता है। ऐसा माना जाता है कि योगमाया (जोग माया) को ही बाद में योगेश्वरी, जोगेश्वरी के नाम से पुकारा जाने लगा।

राजस्थान में तोरावाटी (तंवरावाटी) के नाम से नव स्थापित तंवर राज्य के तंवर कुलदेवी के रूप में सरूण्ड माता को पुजते है। पाटन के इतिहास मे पाटन के राजा राव भोपाजी तंवर द्वारा कोटपुतली के पास कुलदेवी का मंदिर बनवाने का विवरण मिलता है। जहाँ पहले अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने योगमाया का मंदिर बनाया था। यह मंदिर अरावली श्रंखला की पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर परिसर में उपलब्ध शिलालेख के आधार पर 650 फुट ऊँचा मंदिर एक छत्री (चबूतरा) में स्थित है। इस छत्री के चार दरवाजे हैं उसके अन्दर माता की प्रतिमा विराजमान है। छत्री के बाद का मंदिर 7 भवनों वाला है। मंदिर का मुख्य मार्ग दक्षिण में व माता के निज मंदिर का द्वार पश्चिम में है। इस मंदिर में माता की 8 भुजावाला आदमकद स्वरुप प्रतिमा स्थित है। स्तम्भों व दिवारांे पर वाम मार्गियों व तांत्रिकों की मूर्तियाँ की मौजुदगी इनका प्रभाव दर्शाती है। मंदिर में माता को पांडवो द्वारा स्थापित करने के साक्ष्य रूप में छत्री स्थित हैं। मंदिर की परिक्रमा में चामुंडा की मूर्ति है जो आज भी सुरापान करती है। मंदिर की छत्री, जो लाल पत्थर की है का वजन लगभग 5 टन का है। मंदिर पीली मिट्टी से बना हुआ है इसके बावजूद बारिश में इसमें कहीं भी पानी नहीं टपकता। मंदिर तक पहुँचने के लिए 282 सीढियाँ है। इनके मध्य में माता की पवन चरण के निशान हैं! यहाँ 52 भैरव व 64 योग्नियां है ! सरुंड देवी की पहाड़ी से सोता नदी बहती है जिसके पास एशिया प्रसिद्ध बावड़ी है जो बिना सीमेन्ट, चूने आदि के बनी हुई है। इसे द्वापर युग में पाण्डवांे द्वारा 2500 चट्टानों से बनाई गई माना जाता है। योगमाया का मंदिर सरूण्ड गांव में स्थित होने से इसे सरूण्ड माता भी बोलते हैं।

तंवरांे के बडवा के अनुसार तंवरांे की कुलदेवी चिलाय माता है।
जाटू तंवरों ओर बड़वांे की बही के अनुसार तंवरो की कुलदेवी ने चिल पक्षी का रूप धारण कर राव धोतजी के पुत्र जयरथ के पुत्र जाटू सिंह की बाल अवस्था में रक्षा की थी जिसके कारण माँ जोगमाया को चिलाय माता कहा जाने लगा और कालांतर में जोगमाया माता को चिलाय माता पुकारा जाने लगा।
इतिहासकारांे के अनुसार कुलदेवी का वाहन चिल पक्षी के होने कारण यह चिलाय माता कहलाई। राजस्थान के तंवर चिलाय माता को ही कुलदेवी मानते हैं। लेकिन चिलाय माता के नाम से कोई भी पुराना मंदिर नहीं मिलता। जिससे जाहिर होता है कि जोगमाया का नाम चिलाय माता सिर्फ तंवरावाटी में ही प्रचलित हुआ। चिलाय माता के दो मंदिरों का विवरण मिलता है। जाटू तंवर और पाटन के इतिहास के अनुसार 12 वीं शताब्दी में जाटू तंवरो ने खुडाना में चिलाय माता का मंदिर बनाया था और माता द्वारा मनसा (मनोकामना) पूर्ण करने के कारण उसे मनसादेवी के नाम से पुकारा जाने लगा।
एक और चिलाय माता मंदिर का विवरण मिलता है जो पाटन के राजाओं ने गुडगाँव में 14 वीं शताब्दी में बनवाया और ब्राह्मणों को माता की सेवा के लिए नियुक्त किया। लेकिन 17 वीं शताब्दी के बाद पाटन के राजा द्वारा माता के लिए सेवा जानी बन्द हो गयी थी। आज स्थानीय लोग चिलाय माता को शीतला माता समझ कर शीतला माता के रूप में पुजते है।

विभिन्न स्त्रोतों और पांडवो या तंवरो द्वारा बनवाये गये मंदिर से यही प्रतीत होता है कि तोमर (तंवर) की कुलदेवी माँ योगमाया है, जो बाद में योगेश्वरी कहलाई। और योगमाया को ही बाद में विभिन्न कारणों से स्थानीय रूप में योगेश्वरी, जोगमाया, चिलाय माता, सरुंड माता, मनसा माता, शीतला माता आदि के नाम से पुकारा जाने लगा और आराधना की जाने लगी।


Tnawaron ki kuldevi Chilay Mata
Chilay Mata Kuldevi Of Tnawar Rajput's
Chilay mata, Sarund Mata, Goddess of Tomar and Tanwar Rajputs
Chilay Mata Kuldevi of Tomar Rajputs

Jan 25, 2015

ठाकुर देवीसिंह मंडावा, बहुआयामी, अविस्मर्णीय व्यक्तित्व

लेखक : ठा.सौभाग्य सिंह शेखावत

लोक जीवन और लोकमानस में वे ही पात्र गरिमामय स्थान प्राप्त कर सकते है जिनमें सामान्यजन से कुछ विशिष्टताएँ होती है अथवा अतिमानवीय गुण होते है। ऐसे चरित्र समाज में वंदनीय बनकर युग-युगान्तर तक अजर-अमर बने रहते है। वे लोकादर्श, लोक स्मरणीय और जनमानस के प्रेरणा स्त्रोत बन जाते है। ऐसे ही क्षत्रिय इतिहास के मर्मज्ञ, विद्वत विभूति थे ठाकुर देवीसिंह मंडावा।

मुद्राशास्त्र व इतिहास के श्रेष्ठ विद्वानों की सूची में शूमार ठा. देवीसिंह, मंडावा का जन्म शेखावाटी आँचल के मंडावा ठिकाने के यशस्वी ठाकुर जयसिंह की ठकुरानी गुलाबकँवर चांपावत जी की कोख 19 मार्च 1922को हुआ था। आपने अजमेर की प्रसिद्ध मेयो कालेज से आपने आधुनिक शिक्षा ग्रहण की। मसूदा ठिकाने की राजकुमारी सज्जनकुमारी के साथ आप दाम्पत्य जीवन में बंधे। राजनीति में भी आपकी आरम्भ से रूचि रही। आपके क्षेत्र में किसान आन्दोलन की आड़ में जागीरदारों की छवि बिगाड़ने की भरपूर कोशिश के बावजूद भी प्रथम आम चुनाव 1952 ई. में राम राज्यपरिषद के प्रत्याशी के रूप में आपने गुढा (उदयपुर) निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीता। जो जागीरदार के रूप में जनता के बीच आपकी लोकप्रियता का सबूत था। 1964.1970 तक आप राज्यसभा के सदस्य भी रहे। राजपूत सभा जयपुर के लम्बे अर्से तक आप अध्यक्ष रहे। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष के साथ आप राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष भी रहे। मेयो कालेज कौंसिल बोर्ड के आप उपाध्यक्ष के साथ हैरिटेज होटल्स एसोसिएशन, भवानी निकेतन शिक्षण संस्था के संस्थापक सदस्य, शार्दुल एजूकेशन ट्रस्ट झुंझनु के ट्रस्टी रहे है।

राजनीति के साथ आपकी सामाजिक कार्यों व इतिहास शोध व लेखन में भी विशेष रूचि रही और इन कार्यों में आप जीवन पर्यन्त सक्रीय रहे। धरातल पर काम करने के साथ ही राजपूत संस्कृति और समाज सुधार पर आपकी कलम कभी नहीं रुकी। इस विषय के लेख नियमित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते थे। “रणबांकुरा” के नाम से आपने एक मासिक पत्रिका भी पप्रकाशन व संपादन भी किया. आपकी शोध साधना की ज्योति के प्रकाशपुंज से परिपूर्ण ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक पत्रिका रणबंकुरा ने क्षत्रिय समाज को ही नहीं बल्कि राष्ट्र के सम्पूर्ण जन मानस को दैदीप्य किया।

राजनीति, समाज सुधार के साथ आपने अपनी जीवन यात्रा में श्रम, लगन और सतत-साधना से भारतवर्ष के गरिमामय इतिहास पर सम्यक चिंतन कर कई शोध इतिहास शोध ग्रंथ प्रस्तुत किये। भारतीय इतिहास के विभिन्न काल-खण्डों के विलुप्त और विस्मृत हुए तथ्यों को गहराई तक पहुंचकर नवीनतम शोध के साथ उजागर कर विद्वानों तथा शोध छात्रों के लिए प्रस्तुत किया। जो आज भी विभिन्न शोधार्थियों व क्षत्रिय समाज के इतिहास जिज्ञासू युवाओं के लिए अमृत वरदान स्वरूप है। आपने भारतीय व विदेशी इतिहासकारों के विभिन्न ग्रंथों का अध्ययन करके समीक्षात्मक तथ्यों को समाहित कर कई महत्वपूर्ण इतिहास ग्रंथों की रचना की। यथा- क्षत्रिय, क्षत्रिय शाखाओं का इतिहास, भारत और भारतीयता के रक्षक, प्रतिहार और उनका साम्राज्य, मालव नरेश भोज परमार, भरतेश्वर पृथ्वीराज चैहान, राजस्थान के कछवाह, स्वतंत्रता के पुजारी महाराणा प्रतापसिंह, देशभक्त दुर्गादास राठौड़, शार्दुल सिंह शेखावत आदि लिखकर इतिहास जगत को उपकृत किया। आप तीक्षण दृष्टि वाले तलस्पर्शी अध्येता थे।

मानव उत्पति के प्रति विश्व में प्रचलित नाना प्रकार की मान्यताओं और अदभुत आर्य जाति के उदगम जैसे विषय पर आपने गहन अध्ययन किया। डॉ. हाइसन, जोसफ बरेल, कीथर, मैक्समुलर, लाथम, डॉ. पन्निकर, मजुमदार, अबुलफजल, नैणसी, ओझा, टॉड आदि कई इतिहासकारों, साहित्यकारों, ज्योतिषियों, कलाविदों और गणितज्ञों तथा भ्रमणकारी विदेशी यात्रियों व व्यापारियों के यात्रा संस्मरण विवेचनों व मान्यताओं पर शोध-मंथन कर आर्यों के उदगम के प्रति प्रचलित मिथ्या धारणाओं और आर्यों को भारत के मूलवासी न होकर विदेशी मानने वाले तर्कों का निराकरण किया। आपकी कृति “क्षत्रिय” में आपने इस विषय में सविस्तार लिखा है।

आपने जिस लगन से बचपन से लेकर जीवनपर्यन्त अपने अपने आपको इतिहास शोध साधना में रत रखा, उसका मूल्यांकन तथा शब्दांकन करना सहज नहीं है। बिरला ही ऐसा विषय होगा जिसकी जानकारी आपके स्मरण में ना रही हो। आपने मुद्राओं पर भी गहन अध्ययन कर कई लेख प्रकाशित किये। आपका दस हजार से ज्यादा पुराने सिक्कों का मुद्रा संग्रह और भी महत्त्व का था जिस पर आपका अध्ययन जारी था और राठौड़ शासक एवं उनकी मुद्राओं पर आप अपने जीवन के अंतिम दिनों में शोध कर रहे थे। आपके संग्रह में मुद्राओं के साथ देश विदेश के ख्याति प्राप्त इतिहासकारों, साहित्यकारों की रचनाओं, ऐतिहासिक चित्रों का समृद्ध व बेजोड़ संग्रह शामिल है।

ऐतिहासिक चित्रों का संग्रह कर उन्हें प्रकाशित कराना तो आपका विशेष गुण था। आपने अपने अमर लेखन में शिलालेखों, प्राचीन ख्यातों, लोक-कथाओं, लोक मान्यताओं और परम्पराओं के सारगर्भित तथ्यों को समाहित कर शोध छात्रों के लिए प्रेरणा-पथ का निर्माण किया। विदेशी इतिहासकार व उन्हीं के पदचिन्हों के अनुगामी कुछ भारतीय इतिहासकारों द्वारा विकृत किये गए भारतीय इतिहास को परिष्कृत करने में आप द्वारा रचित शोधपूर्ण ग्रंथ शोधकर्ताओं के लिए गवाह का प्रतिरूप है। अपने इतिहास शोध के साथ ही राजपूत इतिहास के अन्य शोधार्थियों की शोध रचनाओं के प्रकाशन में आपका सहयोग स्मरणीय है। 15 जनवरी, 1999 को हमेशा के लिए इहलोक छोड़कर स्वर्ग के लिए विदा लेने के बाद यद्यपि आज हमारे बीच आप नहीं है, इस रिक्तता से हृदय विह्लल हो उठता है और आपके वरदहस्त से हम वंचित भी है। तदापि आपने क्षत्रिय समाज और इतिहास जगत को जो प्रेरणास्पद लेखन दिया है, वह हमारे लिए अजर अमर निधि है। आप जैसी विभूति के पद पंकज का सानिध्य पुनः मिले यही हमारे श्रद्धासुमन है।

नोट: लेखक राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार व इतिहासकार है और ठाकुर देवीसिंह, मंडावा के साथ इतिहास शोध में साथ रहे है|

Thakur Devi Singh, Mandawa

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