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Sep 19, 2016

भारतीय स्थापत्यकला एवं मूर्तिकला का गौरव, प्रतिहारकालीन मंदिर स्थापत्य मूर्तिकला का सुन्दर उदाहरण, प्राचीन भारतीय वास्तुकला की उत्कृष्ट कला का प्रतिनिधित्व करता, दधिमती माता का मंदिर राजस्थान के नागौर जिले के जायल कस्बे के पास गोठ मांगलोद गांव में स्थित है। महामारू शैली का श्वेत पाषाण से निर्मित शिखरबद्ध यह मंदिर पूर्वाभिमुखी है। डा. राघवेन्द्र सिंह मनोहर के अनुसार-“वेदी की सादगी जंघा भाग की रथिकाओं में देवी देवताओं की मूर्तियाँ, मध्य भाग में रामायण दृश्यावली एवं शिखर प्रतिहारकालीन परम्परा के अनुरूप है। चार बड़े चौक वाला यह मंदिर भव्य व विशाल है।

मंदिर का जंघा भाग पंचरथ है। जिसकी मध्यवर्ती प्रधान ताक में पश्चिम की ओर आसनस्थ चार भुजाओं वाली दुर्गा, उतर की ओर तपस्यारत चार भुजाओं वाली पार्वती तथा दक्षिण की ओर आसनस्थ आठ भुजाओं वाली गणपति प्रतिमा विद्यमान है। इसके समीप स्थानक दिकपाल वाहनों सहित अंकित है यथा मेषवाहना अग्नि, महिषवाहना यम, नरवाहना नैऋत्य तथा मकरवाहना वरुण।”
मंदिर में रामायण की घटनाओं का चित्रों के माध्यम से मनोहारी चित्रण किया है। डा. राघवेन्द्र सिंह मनोहर के अनुसार-“चित्रों में राम का चित्रण सामान्य पुरुष रूप में, ब्रह्मचारी वेश में, जटामुकुट धारण किये, हाथ में धनुष, पीठ पर तरकश बांधे प्रत्यालीढ़ मुद्रा में किया गया है, अवतार के दिव्य रूप में नहीं। नाटकीयता को महत्त्व देने के लिए उन महत्त्वपूर्ण घटनाओं को चुना गया है, जो आश्चर्य एवं विस्मय का भाव उत्पन्न करती है। हनुमान का चित्र का वानर के रूप में किया गया है। इन अर्धचित्रों से यह सिद्ध होता है कि राजस्थान के शिल्पियों में बाल्मीकि रामायण लोकप्रिय थी तथा भारत का यह भू-भाग रामायण के कथानक से जुड़ा हुआ था, जिसका उल्लेख रामायण के इस श्लोक में हुआ है-

आदौ रामतापोवनादिगमनं हत्या मृगं कांचनम।
वैदेहि हरणं जटायुमरणं सुग्रीव संभाषणम।।
वाली निर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरी दाहनम।
पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद्धि रामायणम ।।”

देवी के इस मंदिर में रामायण के इन चित्रों में राम, लक्ष्मण, सीता वन गमन से शुरू होकर, मारीच वध, कुंभकर्ण, रावण वध, वानरों द्वारा समुद्र पर सेतु बांधने आदि कई घटनाओं के सुन्दर चित्रों का समायोजन किया गया है जो दर्शनीय है।

मंदिर निर्माण की प्राचीनता के बारे रामकरण आसोपा ने इसे गुप्तकालीन मानते हुए 608 ई. में निर्माण माना है, जबकि डा. राघवेन्द्र सिंह मनोहर आदि इतिहासकार इस मंदिर का निर्माण प्रतिहार नरेश भोजदेव प्रथम (836-892 ई.) के समकालीन मानते है।

राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार ‘‘इस मंदिर के आस-पास का प्रदेश प्राचीनकाल में दधिमती (दाहिमा) क्षेत्र कहलाता था। उस क्षेत्र से निकले हुए विभिन्न जातियों के लोग, यथा ब्राह्मण, राजपूत, जाट आदि दाहिमे ब्राह्मण, दाहिमे राजपूत, दाहिमे जाट कहलाये, जैसे कि श्रीमाल (भीलमाल) नगर के नाम से श्रीमाली ब्राह्मण, श्री महाजन आदि।’’
ब्राह्मण, जाट व अन्य जातियों के अलावा दाहिमा व पुण्डीर राजपूत दधिमती माता को अपनी कुलदेवी मानते हुए इसकी उपासना करते है। चूँकि दाहिमा राजपूत इसी क्षेत्र से निकले होने के कारण दाहिमा कहलाये। हालाँकि इस क्षेत्र में दाहिमा राजपूतों का कभी कोई बड़ा राज्य प्राचीनकाल में भी नहीं रहा। वे पृथ्वीराज चौहान तृतीय के सामंतों में थे और पृथ्वीराज के दरबार में दाहिमा राजपूतों का बड़ा महत्व व प्रभाव था। कुं. देवीसिंह मण्डावा के अनुसार ‘‘कैमास दाहिमा पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर के समय से ही चौहान साम्राज्य का प्रधानमंत्री रहा था। सोमेश्वर ने उसे नागौर का क्षेत्र जागीर में दिया था।’’ सोमेश्वर की मृत्यु के समय पृथ्वीराज बालक थे, अतः उनकी माता कर्पूरी देवी राज्य का प्रशासन देखती थी, जिसने भी कैमास दाहिमा पर भरोसा करते हुए उसे प्रधानमंत्री रखा। कैमास दाहिमा ने गौरी का घग्घर नदी के पास मुकाबला किया था, जिसमें वह घायल हुआ। उसकी मृत्यु के बाद पृथ्वीराज ने उसके पुत्र को प्रधानमंत्री बनाया और हांसी की जागीर दी थी। दाहिमा राजपूतों के अलावा पुण्डीर राजपूत भी दधिमता माता को कुलदेवी मानते है और माता की पूजा-आराधना-उपासना करते है।

अन्य मंदिरों की भांति माता के इस मंदिर से भी चमत्कार की कई दंतकथाएँ जुड़ी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार विकटासुर नाम का दैत्य संसार के समस्त पदार्थों का सारतत्व चुराकर दधिसागर में जा छुपा था। तब देवताओं की प्रार्थना पर स्वयं आदिशक्ति ने अवतरित होकर उस दैत्य का वध किया और सब पदार्थ पुनः सत्वयुक्त हुए। दधिसागर को मथने के कारण देवी का नाम दधिमती पड़ा। अन्य जनश्रुतियों के अनुसार कपालपीठ कहलाने वाला माता का यह मंदिर स्वतः भूगर्भ से प्रकट हुआ है। तो एक अन्य जनश्रुति के अनुसार प्राचीनकाल में राजा मान्धाता द्वारा माघ शुक्ल सप्तमी को किये गए एक यज्ञ के समय यज्ञकुण्ड से पैदा होने की किवदंती प्रचलित है। वर्तमान में मंदिर की सम्पूर्ण व्यवस्था मंदिर प्रन्यास व अखिल भारतीय दाधीच ब्राह्मण महासभा द्वारा की जाती है। दाधीच ब्राह्मण महासभा द्वारा ही मंदिर का नवीनीकरण एवं जीर्णोद्धार किया गया व बरामदों युक्त अनेक कमरों का निर्माण कराया गया है। चैत्र और आश्विन के नवरात्रों में यहाँ मेलों का आयोजन होता है, जिनमें बड़ी संख्या में माता के भक्त, श्रद्धालु दर्शनार्थ यहाँ आते है।

जायल कस्बे के नजदीक इस मंदिर तक पहुंचने के लिए विभिन्न स्थानों से रेल, बस, टैक्सी आदि से आसानी से पहुंचा जा सकता है। जयपुर, जोधपुर, अजमेर, बीकानेर, दिल्ली, नागौर से डेगाना, छोटी खाटु आदि से रेल द्वारा और उसके बाद टैक्सी या बस द्वारा पहुंचा जा सकता है।


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Sep 18, 2016

Karni Mata Deshnok, Bikaner

राजस्थान के बीकानेर शहर से 32 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में बीकानेर नागौर सड़क मार्ग पर देशनोक बसा हुआ है। इसी देशनोक में विश्व में चूहों वाले मंदिर के नाम विख्यात, शक्ति के उपासकों का श्रद्धास्थल, गौसेवा व शक्ति की प्रतीक श्री करणी माता का मंदिर है। श्री करणी मढ देशनोक के नाम प्रसिद्ध इस मंदिर में राजस्थान, गुजरात, हरियाणा सहित देश के विभिन्न भागों से देवी के भक्तगण माता करणी के दर्शनार्थ आते है। आश्विन नवरात्री के अवसर पर आस-पास के जिलों सहित दूर-दराज के हजारों श्रद्धालु पदयात्रा करते हुए करणी माता की पूजा अर्चना, उपासना करने हेतु पहुँचते है। विशाल भव्य मंदिर के उन्नत सिंहद्वार के भीतर प्रशस्त प्रांगण है। आगे मध्य द्वार है। अन्दर संगमरमर का चौक बना है। तीसरा अन्तराल द्वार है और सामने निजमढ़ जिसके द्वार पर स्वर्णजटित कपाट है। निजमढ़ अखण्ड दीपशिखा से आलौकित है, निजमंदिर के ठीक मध्य में माता श्री करणी जी की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर में जिधर नजर दौड़ाई जाय उधर चूहे ही चूहे नजर आते है, इन्हीं चूहों में एक सफेद चूहिया भी किसी को कभी कभार दिख जाती है। ऐसी मान्यता है कि जिस पर माता की खास कृपा हो, सफेद चूहिया उसे ही नजर आती है।
करणी माता के वंशज ही माता के पुजारी है, जो बारी बारी से एक एक मास पूजा करने का दायित्व संभालते है। शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को बारी बदलती है। जिस पुजारी की बारी रहती है उसका मंदिर छोड़कर जाना निषेध है। अतः बारीदार पुजारी अपनी बारी के एक मास तक मंदिर में रहता है, परिवार की महिला उसे भोजन कराकर संध्या समय अपने घर चली जाती है और पुजारी परम्परा का पालन करते हुए मंदिर में ही सोता है।

राजस्थान के पांच पीरों में से एक मेहाजी मांगलिया द्वारा मेहाजी चारण को प्रदत सुवाप गांव में मेहाजी चारण की धर्म पत्नी देवल देवी के गर्भ से आश्विन शुक्ल सप्तमी, शुक्रवार, वि.सं. 1444 (28 सितम्बर 1387) को श्री करणी माता का जन्म हुआ। करणी माता के पिता मेहाजी किनिया शाखा के चारण थे। जिन्हें जोधपुर जिले की फलौदी तहसील में स्थित सुवाप गांव मेहाजी मांगलिया से उदक में मिला था। माता करणी अपनी पांच बहनों से छोटी थी, वे अपनी माता के गर्भ में 21 माह रही यानी प्रसूति में 21 माह का समय लगा। ऐसा प्रचलित है कि करणी जी के जन्म के समय उनकी माता कुछ समय के लिए मूर्छित हो गई थी और उसी अवस्था में उन्हें साक्षात् दुर्गा के दर्शन हुए। होश आने पर देवल देवी ने अपनी कन्या को देखा तो अपने पास में काली-कलूटी चौड़े मुंह की स्थूल देह वाली कन्या को पाया। करणी माता ने अपने जन्म के समय से चमत्कार दिखाने शुरू कर दिये। उस युग में कन्या के जन्म को अशुभ माना जाता था, फिर मेहाजी के घर पहले से पांच कन्याएं थी। ऐसे में उनकी बुआ ने मेहाजी को प्रसव की जानकारी देते हुए हाथ का डूचका देते हुए कहा कि फिर पत्थर आ गया है अर्थात् लड़की हुई है। उनके इतना कहते ही उनके उस हाथ की सभी अंगुलियाँ ज्यों की त्यों जुड़ी रह गई और खुली नहीं। यह एक तरह से करणी जी के जन्म पर उनका उपहास उड़ाने की सजा थी।

करणी माता का नामकरण संस्कार में रिधूबाई नाम रखा गया। उनके नाम के अनुरूप ही उनके पिता की समृधि प्रतिदिन बढ़ने लगी। कुछ समय बाद करणी माता की बुआ अपने पीहर में आई हुई थी। बुआ अन्य बहनों की अपेक्षा रिधूबाई से ज्यादा प्रेम करने लगी। एक दिन वह रिधूबाई को नहला रही थी तभी रिधूबाई ने उनके हाथ के बारे में पूछा। बुआ ने उनके जन्म के समय की पूरी कहानी बता डाली। तभी रिधूबाई ने बुआ का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा यह तो एकदम ठीक है और ऐसा ही हुआ। बुआ का हाथ ठीक हो गया। उसी दिन बुआ ने रिधूबाई का नाम यह कहते हुए कि यह साधारण कन्या नहीं है यह संसार ने अपनी करनी दिखलायेगी। अतः इसका नाम करणी होना चाहिये। तभी से रिधूबाई का नाम करणी पड़ा और करणी अपनी करनी से श्री करणी माता के नाम से विश्व विख्यात हुई।

बुआ का हाथ ठीक करने के बाद छः वर्षीय करणी ने विषैले सर्प द्वारा डसने से अपने मृत पिता को जीवनदान देकर, सुवा ब्राह्मण व अपने पिता को पुत्र प्राप्ति का वरदान देकर, अपने बचपन में ही अपने चमत्कारों से लोगों को प्रभावित कर अपने दैवीय गुण प्रदर्शित कर दिए थे। 27 वर्ष की आयु में करणी जी का साठिका गांव के केलूजी बिठू के पुत्र देपाजी के साथ पाणिग्रहण संस्कार हुआ। चूँकि करणी जी को गायें बहुत प्रिय थी और वो गौसेवा में वह तल्लीन रहती थी, सो विवाह के समय उनके पिता द्वारा भेंट की गई 400 गायों में से 200 गायें वे अपने ससुराल साथ ले गई। चूँकि करणी जी गौसेवा के रत रहती थी, साथ ही देवी का अवतार थी। अतः उन्होंने गृहस्थी चलाने के लिए देपाजी के साथ अपनी छोटी बहिन गुलाब बाई का विवाह करा दिया। इस सम्बन्ध में डा. नरेन्द्रसिंह चारण अपने शोध ग्रन्थ ‘‘श्री करणी माता का इतिहास’’ के पृष्ठ संख्या 55 पर लिखते है- ‘‘देपाजी ने श्रीकरणीजी को पानी का पूछने के लिए जैसे ही रथ का पर्दा उठाया तो देखा कि वहां पर एक सिंह सवार, सूर्य का लावण्य धारण करने वाली रूप और सौन्दर्य की पूंजरूप श्री महाशक्ति स्वयं हाथ में त्रिशूल लिए खड़ी है। यह देखते ही देपाजी दूर जा खड़े हुये तब देवी ने कहा कि आपको मैंने अपना लौकिक और वास्तविक दोनों रूप बता दिए है, आप जिस रूप में चाहें मुझे देख सकते है क्योंकि मेरा भौतिक रूप विरूप, काला रंग, मोटा और चौड़ा चेहरा है। मैं आपकी सहधर्मिणी अवश्य हूँ, परन्तु मेरा यह भौतिक शरीर आपके उपभोग का साधन नहीं है। आप मुझसे गृहस्थ सम्बन्ध नहीं रख सकते। अपनी गृहस्थी के लिए आप मेरी छोटी बहिन गुलाब बाई से विवाह कर लेना और वह आपकी गृहस्थी संभालेगी। मैं तो इस लोक में दीन-दुखियों पर अत्याचार करने वाले, संपत्तियों को लूटने वाले वे लोग, जो अपना कर्तव्य भूल गये है, उनको कर्तव्य का बोध कराने के लिए मुझे इस लोक में आना पड़ा है।’’
करणीजी की ससुराल में पानी की कमी थी। गांव में एक ही कुआ होने के चलते उनकी गायों को पीने के पानी की किल्लत होती थी। गांव के लोग भी उनके ज्यादा पशुधन को पानी की कमी मानते थे। अतः करणीजी ने निर्णय किया कि वे अपना ससुराल छोड़कर अपनी गायों के साथ ऐसे स्थान पर जायेगी जहाँ उनकी गायों को भरपूर चारा और पानी मिल सके। इस निर्णय के बाद करणी जी अपने परिजनों व पशुधन के साथ साठिका गांव का परित्याग कर जांगलू देश के जाल वृक्षों से आच्छादित जोहड़ पहुंची और वहीं अपना स्थाई निवास बनाया। उनका यही स्थान आगे चलकर देशनोक कहलाया। चूँकि करणीजी के चमत्कारों से प्रभावित बहुत से लोग अपने दुखों से छुटकारा पाने व उनसे आशीर्वाद लेने इस स्थान पर आते थे, इस तरह से यह स्थान उस काल उस क्षेत्र का प्रतिष्ठित स्थान मतलब देश की नाक समझा गया और देशनाक से जाना जाने लगा, जो आगे चलकर भाषा के अपभ्रंश के चलते देशनोक हो गया।

उस काल जांगलू देश की स्थिति बहुत खराब थी। उदावत राठौड़, सांखला व भाटी राजपूत, जाट व मुसलमानों के कई छोटे छोटे राज्य थे जो आपस में एक दूसरे के राज्य में लूटपाट किया करते थे। जिससे स्थानीय प्रजा बहुत दुखी थी, जो करणीजी के दैवीय चमत्कारों के बारे सुनकर अपनी समस्या के निदान हेतु उनके पास आती थी। उस काल के कई शासक भी करणीजी के अनन्य भक्त थे। मण्डोर के शासक रणमल व उनके पुत्रों पर भी करणीजी का बहुत प्रभाव था। यही कारण था कि बीकानेर के संस्थापक राव बीका जांगलू क्षेत्र की अराजक स्थिति का लाभ उठाकर वहां अपना राज्य स्थापित करने के उद्देश्य से आये तो वे सबसे पहले करणीजी के पास आशीर्वाद लेने पहुंचे व अपना मंतव्य बताया। तब करणीजी ने वहां की अराजकता से प्रजा को निजात दिलाने हेतु बीका को योग्य पुरुष समझ आशीर्वाद दिया कि ‘‘तेरा प्रताप जोधा से सवाया बढेगा और बहुत से भूपति तेरे चाकर होंगे।’’ यह आशीर्वाद लेकर बीका ने चूंडासर में रहते हुए आप-पास के छोटे छोटे राज्यों को जीतकर जांगलू प्रदेश पर अपना अधिकार कायम किया और करणीजी की सलाह व आशीर्वाद से उस क्षेत्र में गढ़ बनवाकर बीकानेर नगर की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाया। करणीजी ने अपने जीवनकाल में सामाजिक सरोकारों से जुड़े कई कार्य किये, जांगलू प्रदेश में राव बीका जैसे योग्य व्यक्ति की सत्ता स्थापित करवाना, लोगों के आपसी झगड़े निपटाना, स्त्री सशक्तिकरण, गौ सेवा आदि के साथ पर्यावरण के लिए माता ने भरपूर कार्य किया। देशनोक में उन्होंने दस हजार बीघा भूमि पर ओरण बनवाया जो पर्यावरण व पशुधन के लिए वरदान साबित हुआ। यही नहीं करणीजी की प्रेरणा से प्रेरित होकर भविष्य में भी राजपूत राजाओं द्वारा अपने राज्यों में इस तरह के ओरण हेतु भूमि छोड़ने की परम्परा बन गई जो पर्यावरण के लिए वरदान साबित हुई।

150 वर्ष की आयु होने व अपने दैवीय अवतारों के कार्य पूर्ण होने पर करणीजी ने अपनी भौतिक देह त्याग करने का मानस बनाया और अपनी इच्छा परिजनों को बताई कि मैं जैसलमेर होती हुई तेमड़ाराय के दर्शन करके बहिन बूट और बहुचरा से मिलने खारोड़ा (सिंध, पाकिस्थान) जाऊँगी और वापसी के समय रास्ते में अपनी भौतिक देह का त्याग करुँगी। वि.सं. 1594 (1537 ई.) के माघ मास में अपने ज्येष्ठ पुत्र पूण्यराज, सारंगिया विश्नोई (रथवान) और एक सेवक के साथ करणीजी अपनी इस यात्रा के लिए रवाना हुई। वापसी यात्रा के समय वि.सं. 1595 (1538 ई.) चैत्र शुक्ला नवमी गुरुवार को गड़ियाला और गिराछर के बीच धीनेरू गांव की तलाई के पास पहुँचने पर करणीजी ने रथ को रुकवाया और वहीं अपनी देह त्याग हेतु मिट्टी की एक चौकी बनवाकर उस बैठे। रथवान सारंगिया विश्नोई को आदेश दिया कि उनके शरीर पर पानी उढेल दे। डा. नरेंद्रसिंह चारण के अनुसार ‘‘रथवान सारंगिया विश्नोई ने झारी लेकर उसका पानी उन पर उढेल दिया। ज्योंही झारी का पानी उनके भौतिक शरीर पर गिरा त्योंही उनके शरीर से एक ज्वाला निकली और उस ज्वाला में उसी क्षण उनका वह भौतिक शरीर अदृश्य हो गया। वहां कुछ भी नहीं था। ज्योति में ज्योतिर्लीन हो गये। इस प्रकार वि.सं. 1595 (1538 ई.) चैत्र शुक्ला नवमी गुरुवार को श्रीकरणीजी ज्योतिर्लीन हुए।’’

श्री करणी माता के मंदिर में आज भी दूर-दराज से भक्तगण उनके दर्शनार्थ आते है। राव बीका के वंशज बीका राठौड़ श्री करणी माता को अपनी ईष्ट देवी मानते हुए उनकी आराधना, उपासना करते है।


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Sep 17, 2016

Bhoo Swami Aandolan 1956 by Rajput Community In Rajasthan

आजादी के बाद कांग्रेस नेताओं ने राजपूत जाति को शक्तिहीन करने के लिए सत्ता का प्रयोग करते हुए उनकी जागीरें समाप्त करने हेतु जागीरदारी उन्मूलन कानून बनाकर आर्थिक प्रहार किया, ताकि आर्थिक दृष्टि से भी शक्तिहीन हो जाये और राजपूत राजनैतिक तौर पर चुनौती ना दे सके। इस हेतु सन 1954 में जागीरदारी उन्मूलन कानून प्रारूप को तैयार करने के लिए राजस्थान क्षत्रिय महासभा व राजस्थान सरकार के बीच समझौता कराने हेतु गोविन्द बल्लभ पन्त को मध्यस्त बनाया गया। कोशिश करने पर भी इस समझौते में भूस्वामियों के प्रतिनिधियों को भाग नहीं लेने दिया गया।
ऐसी स्थिति में क्षत्रिय युवक संघ ने जाति को जागृत करने हेतु शंख बजाया तो जाति ने फिर अंगडाई ली। एक तरफ इस कानून को सबसे पहले राजस्थान उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई कर्मठ क्षत्रियों ने जिसमें आयुवानसिंह जी हुडील, तनसिंह जी बाड़मेर, ठाकुर मदनसिंह जी दांता, रघुवीरसिंह जी जावली, सवाईसिंह जी धमोरा, केशरीसिंह जी पटौदी, विजयसिंह जी राजपुरा, शिवचरणदास जी निम्बाहेड़ा (मेवाड़), हरिसिंह जी जालौर, कुमेरसिंह जी भादरा आदि ने भूस्वामियों को संगठित किया और जगह जगह घूमकर राजपूत समाज को सरकार से लड़ने को तैयार कर दिया। क्षत्रिय युवक संघ के युवकों ने सरकार के विरूद्ध अहिंसात्मक आन्दोलन चलाने की योजना बनाई। भूस्वामी आन्दोलन को व्यवस्था देने हेतु एक राजपूतों का शिविर (सिरोही) में रखा गया और वहां सरकार से डटकर मुकाबला करने की योजना बनाई गई। भूस्वामी आन्दोलन को नेतृत्व देने वाले कौन कौन और कब-कब होंगे ? निश्चित किया गया और भूस्वामी संघ के अध्यक्ष जब गिरफ्तार हो जायेगें तो दूसरे व्यक्ति उसका नेतृत्व ग्रहण कर लेंगे। ठा. मदनसिंह जी दांता प्रथम अध्यक्ष बनाए गए और इसी पंक्ति में फिर रघुवीरसिंह जी जावली, आयुवानसिंह जी हुडील, तनसिंह जी बाड़मेर, शिवचरणदास जी निम्बाहेड़ा (मेवाड़), हरिसिंह जी सिंहरथ (सिरोही) और केशरीसिंह जी पाटोदी रखे गए। इस सारी योजना का विवरण सौभाग्यसिंह जी भगतपुरा के पास रहा।

राजस्थान के सब जिलों में जिलेवार शिविरों को व्यवस्थाएं की गई। इन शिविर केन्द्रों से जत्थे के जत्थे जयपुर भेजने की व्यवस्था भी की गई और इस प्रकार क्षत्रिय युवक संघ के युवकों ने सरकार के सामने तूफानी संगठन खड़ा कर दिया था। यह भूस्वामी आन्दोलन 1 जून 1955 को आरम्भ हुआ और प्रथम दिन ही पांच हजार भूस्वामियों ने गिरफ्तारी दी। देश की स्वतंत्रता के बाद देश का यह एक बड़ा आन्दोलन था जिसमें प्रथम दिन ही इतने लोगों ने इतनी बड़ी संख्या में गिरफ्तारी दी। इस समय भूस्वामी संघ के अध्यक्ष मदनसिंह जी दांता थे। आन्दोलनकारियों के सिर पर केशरिया साफा होता था तथा एक बैज होता था जिस पर 'वीर सेनानी' अंकित होता था। आयुवानसिंह जी हुडील ने भूमिगत रहकर आन्दोलन का संचालन किया तो बाहर मदनसिंह जी व रघुवीरसिंह जी जावली आदि वीर भूस्वामियों के साथ डटे रहे।

क्षत्रिय युवकों और अन्य साहसी से जेलें भने लगी। आन्दोलन चलता रहा, राजपूत गिरफ्तार होते रहे। आन्दोलन का संचालन आयुवानसिंह जी ने भूमिगत रहकर किया। तनसिंह जी ने आन्दोलन का केंद्र बाड़मेर में खोला व बन्दी हुए। आन्दोलन की तेज गति से घबराकर तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया ने भूस्वामी संघ के अध्यक्ष मदनसिंह जी दांता व रघुवीरसिंह जी जावली को लिखित आश्वासन दिया, जिसके फलस्वरूप आन्दोलन 21 जुलाई 1955 को स्थगित कर दिया गया, परन्तु इसकी क्रियान्विति पर पुन: मतभेद हो गया और 19 दिसंबर 1955 को पुन: आन्दोलन शुरू हो गया।

गृहमंत्री रामकिशोर व्यास के निवास स्थान पर प्रदर्शन किया गया। बहुत से भूस्वामी गोविन्दसिंह जी आमेट के नेतृत्व में गिरफ्तार किये गये। आन्दोलन चलता रहा, भूस्वामी जेल जाते रहे और मार्च 1956 में आयुवानसिंह जी को बन्दी बना लिये गये। भूस्वामी बन्दियों को राजनैतिक कैदी मानकर बी श्रेणी में रखा गया। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु आयुवानसिंह जी ने जोधपुर जेल में अनशन शुरू कर दिया। 22 मार्च, 1956 को आयुवानसिंह जी को टोंक जेल में भेज दिया गया जहाँ तनसिंह जी व सवाईसिंह जी धमोरा भी बन्दी थे। यहां इन दोनों ने भी अनशन शुरू कर दिए अन्त में सरकार को भूस्वामियों को राजनैतिक कैदी मानना पड़ा व उनको 'बी' श्रेणी की सुविधायें देनी पड़ी।

रामराज्य परिषद् व हिन्दू महासभा के नेताओं ने इस आन्दोलन का पूर्ण समर्थन किया। रामराज्य परिषद् के संस्थापक स्वामी करपात्री जी महाराज, स्वामी कृष्ण बौधाश्रम जी महाराज (जो बाद में ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य बने), स्वामी स्व. रूपानन्दजी सरस्वती (ज्योर्तिमठ के तत्कालीन शंकराचार्य), लोकसभा के सदस्य नन्दलाल जी शर्मा (तत्कालीन लोकसभा सदस्य), केशव जी शर्मा, राजा महेन्द्रप्रताप जी वृन्दावन जैसी विशिष्ठ प्रतिभाओं का मार्ग दर्शन भी प्राप्त हुआ। (संघ शक्ति अक्टूबर 80 में श्री भानु के लेख से साभार) इनके अतिरिक्त पृथ्वीराजसिंह जी दिल्ली, ओंकारलाल जी सर्राफ, सत्यनारायण जी सिन्हा, जुगलकिशोर जी बिड़ला, डॉ. बलदेव जी आदि का सराहनीय योगदान रहा ।

इस आन्दोलन को सफल बनाने में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के अलावा राजस्थान के बाहर के राजपूतों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा। मालवा के बासेन्द्रा ठिकाने के कँवर तेजसिंह जी सत्याग्रहियों का जत्था लेकर पहुंचे। राव कृष्णपालसिंह जी, रामदयालसिंह जी ग्वालियर, जनेतसिंह जी इटावा, महावीरसिंह जी भदौरिया, ठाकुर कोकसिंह जी, डॉ. ए.पी. सिंह जी लखनऊ, प्रेमचन्द जी वर्मा, सौराष्ट्र (गुजरात) से एडवोकेट नटवरसिंह जी जाड़ेजा, मास्टर अमरसिंह जी बड़गुजर भौड़सी (हरियाणा) आदि साहसी व्यक्ति भी इस आन्दोलन में कुद पड़े।
यों तो राजस्थान के तीन लाख से अधिक भूस्वामी इस आन्दोलन में सम्मिलित हुए पर सबका यहां नाम अंकित करना सम्भव नहीं। विशेष व्यक्तियों के अतिरिक्त जिनका अधिक सक्रिय योगदान रहा उनमें कल्याणसिंह जी कालवी, विजयसिंह जी नदेरा, रिसालसिंह जी जोधपुर, सूरसिंह जी रेटा (एस.एस. नाथावत), खण्डेला राजा लक्ष्मणसिंह जी, छोटा पाना धौंकलसिंह जी चरला, रघुनाथ सहाय जी वकील जयपुर, देवीसिंह जी व स्वरूपसिंह जी खुड़ी, उम्मेदसिंह जी कनई, नरपतसिंह जी खवर, हेमसिंह जी मगरासर, कानसिंह जी बोघेरा, सज्जनसिंह जी देवली, मास्टर अमरसिंह जी अलवर, राजा अर्जुनसिंह जी किशनगढ़, बलवन्तसिंह जी नेतावल (मेवाड़), हेमसिंह जी चौहटन, माधोसिंह जी ऊनावड़, उदयभानसिंह जी चनाना, सूरजसिंह जी झाझड़, बाघसिंह जी नेवरी, गणपतसिंह जी चंवरा (जयपुर जेल से छूटने के बाद वहीं देवलोक हुए), चैनसिंह जी भाकरोद, उदयसिंह जी भाटी, रणमलसिंह जी सापणदा, उदयसिंह जी आवला, हरिसिंह जी राठौंड (गढ़ियावाला रावजी), हरिसिंह जी और कुमसिंह जी (सोलंकी तला-बाड़मेर), भूरसिंह जी व हरिसिंह जी (सिन्दरथ-सिरोही), नरपतसिंह जी सराणा, मालमसिंह जी बड़गांव, कर्नल माधोसिंह जी ऊनावड़ा, जयसिंह जी नदेरा, गिरधारीसिंह जी खोखर, प्रतापसिंह जी सापून्दा, ठाकुर रिडमलसिंह जी सापून्दा, उम्मेदसिंह जी भदूण, महाराजा अर्जुनसिंह जी, ले. जनरल नाथूसिंह जी, राजा संग्रामसिंह जी खण्डेला, हनुवन्तसिंह जी खण्डेला आपजी भोमसिंह जी कुन्दनपुर कोटा, प्रो. मदनसिंह जी अजमेर, राव कल्याणसिंह जी, राजा सुदर्शनसिंह जी, शाहपुरा, तख़्तसिंह जी मलसीसर, नारायणसिंह जी सरगोठ, राव वीरेन्द्रसिंह जी खवा, (जयपुर) अमरसिंह जी, व आनन्दसिंह जी बोरावड़, तेजसिंह जी विचावा, ठा. मानसिंह जी कैराफ, तख्तसिंह जी, भीमसिंह जी, साण्डेराव, ठा. सवाईसिंह जी फालना के नाम गिनाये जा सकते हैं।

आन्दोलन तेज गति से चलने लगा, जयपुर की सड़कों और चौराहों पर केशरिया साफा बांधे हुए भूस्वामियों के जत्थे नजर आते थे। दिन प्रतिदिन भूस्वामियों से जेल भरी जाने लगी थी। ऐसे समय राजा मानसिंह जी जयपुर का सहयोग लेने के लिए आयुवानसिंह जी ने उनको एक पत्र लिखा जिसका भाव यह था कि हमारे पूर्वजों ने जयपुर रियासत की रक्षार्थ व प्रजा की रक्षार्थ सिर कटाये हैं। अब आपको जरा भी ध्यान है तो हमारी सहायता करें। यह पत्र खण्डेला राजा संग्रामसिंह जी के माध्यम से महाराजा के पास पहुँचाया गया। पत्र पढ़कर महाराजा मानसिंह जी प्रभावित हुए और उन्होंने भूस्वामियों को सहायता करने का मानस बना लिया तथा शीघ्र ही ही तत्कालीन प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू से सम्पर्क साधा। दूसरी ओर इसी समय मोहरसिह जी लखाऊ व देवीसिंह जी महार दिल्ली पहुंचे और जुगलकिशोरजी बिड़ला के माध्यम से सत्यनारायण सिन्हा भी भूस्वामियों की मांगों से सहमत हुए और उन्होंने शीघ्र ही नेहरूजी से सम्पक किया। नेहरू जी ने भूस्वामियों की मांगों पर विचार करना स्वीकार किया। नेहरूजी के हस्तक्षेप से भूस्वामी कार्यकारिणी के सदस्यों को पन्द्रह दिन के लिए पेरोल पर रिहा किया। भूस्वामी सदस्या के अध्ययन और समाधान के लिए एक समिति निर्मित की गई। भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के अनुभवी प्रशासक त्रिलोकसिंह व नवाबसिंह इनके सदस्य थे।

रघुवीरसिंह जी जावली, तनसिंह जी बाड़मेर व आयुवानसिंह जी ने भूस्वामियों की ओर से एक प्रतिवेदन तैयार किया इस समिति के सामने रखा। नेताओं से बातचीत की। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के मंत्री डॉ. ए.पी. सिंह जी, ठाकुर रघुवीरसिंह जी व आयुवानसिंह जी सहित छ: सदस्यों के शिष्टमण्डल ने नेहरूजी को स्मरण पत्र दिया। कुछ लोगों ने आन्दोलनकारियों में फूट डालकर इसे विफल करने का प्रयास भी किया पर भूस्वामी टस से मस नहीं हुए। नेहरूजी की भूस्वामियों के साथ सहानुभूति पर भी राज्य सरकार भूस्वामी वर्ग की सहृदयता को कमजोरी मान रही थी। अत: वार्ता असफल हो गई तो 29 मई 1956 को यह आन्दोलन पुन: जोर पकड़ने लगा। भैंरूसिंह जी बड़ावर, ठाकुर देवीसिंह जी खुड़ी और सवाईसिंह जी धमोरा वापिस जेल गए। पं. नेहरू को जब यह हालात मालुम हुए तो वयोवृद्ध गांधीवादी विचारक रामनारायण जी चौधरी की जयपुर भेजा।

भूस्वामी नेताओं से उन्होंने शीघ्र ही सम्पर्क किया। तनसिंह जी ने 1 जून 1956 को आमरण अनशन शुरू कर दिया था। राजस्थान सरकार का रवैया अच्छा न होने के कारण अयुवानसिंह जी ने पुनः 23 जून, 1956 को व्यक्तिगत सत्याग्रह का नोटिस दिया। इसी समय रघुवीरसिह जी जावली, रामनारायण जी चौधरी, उदयभानसिंह जी चनाना व विजयसिंह जी नदेरा भी आयुवानसिंह जी से जेल मिलने आये। आयुवानसिंह जी, सवाईसिंह जी धमारा व तनसिंह जी से लम्बी बातचीत की। अच्छा वातावरण बना प्रस्ताव तैयार किया गया। इस प्रस्ताव को दिखाने शिवचरणदास जी, ठा. रणमलसिंह जी सापणदा, उदयभाणसिंह जी चनाना, सुरसिंह जी रेटा जेल में मिलने गये।

26 जून 1956 को उच्च न्यायालय के आदेश से रिहा किये गए पर आयुवानसिंह जी व सवाईसिंह जी धमोरा जेल में ही रहे। बाद में मोहरसिंह जी एडवोकेट ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से 13 अगस्त 1956 की रिहा करवाया। इस आन्दोलन का सरकार पर अधिक दबाव आयुवानसिंह जी के व्यक्तिगत सत्याग्रह, उनकी भूख हड़ताल व उनके अनशन के कारण पड़ा। ठाकुर बाघसिंह जी शेखावत बरडुवा और नागौर जिले के गुरडवा ठाकुर ने भी आयुवानसिंह जी के समर्थन में अनशन किये। इन सबका मुख्यमंत्री सुखाड़िया पर नैतिक दबाव पड़ा। साथ ही भैरूसिंह जी की सहानुभूति भी भूस्वामियों के साथ थी।

इस कारण सरकार ने समझौता वार्ता शुरू की व समझौता हुआ। इस समझौते के अनुसार भूस्वामियों को खुदकाश्त के लिए मुरब्बे (जमीन), राजकीय सर्विस में जागीरदारों की नियुक्ति, जागीर कर्मचारियों के पेंशन की सुविधा, जागीर मुवावजे में वृद्धि आदि लाभ दिये गये। ये सुविधाएं नेहरू अवार्ड के नाम से जानी गई। राजस्थान के भूस्वामी संघ के आन्दोलन की समाप्ति के बाद गुजरात के भूस्वामियों को लाभ दिलाने के लिए आयुवानसिंह जी अपने पचास साथियों सहित कच्छभूज गए और सौराष्ट्र तथा कच्छ का दौरा किया। अहमदाबाद में स्वयं ने अनशन की घोषणा की। इनके साथ वहां सवाईसिंह जी धमोरा, रघुवीरसिंह जी जावली आदि भी थे।

अन्त में गुजरात सरकार को भी वहां के भूस्वामियों को सुविधाएं देनी पड़ी। इस प्रकार भूस्वामी संघ के इन राजपूती चरित्र के युवकों ने जागीरदारी उन्मूलन के मामलों पर राजस्थान सरकार को झुकाया और गुजरात सरकार को भी प्रभावित किया। क्षत्रिय युवक संघ के युवाओं द्वारा किये गये ये कार्य जाति के इतिहास में अपना विशेष सीन रखते है। अत: इन सब का उल्लेख यहां किया गया है।

साभार : राजपूत सोसायटी मासिक पत्रिका अंक दिसंबर 2014


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