धरती का सुहाग

"वसुधा वीरा री वधू ,वीर तिको ही बिन्द "
धरती वीरों की वधू होती है और वीर उसके पति |
" वीर भोग्या वसुंधरा " इस धरती को वीर ही भोगते है |
लेकिन इस धरती को भोगना और इसका स्वामी बने रहना इतना आसान भी नहीं है इस धरती के सुहाग की रक्षा के लिए,इसकी इज्जत आबरू के लिए बलिदान करने होते है तभी कोई वीर इसका स्वामी बने रह सकता है उसे इस धरती रूपी वधू के प्रति बहुत सारे कर्तव्य निभाने पड़ते है जो शायद आज हम भूल रहे है उन्ही कर्तव्यों की याद दिला रही है बाड़मेर के पूर्व सांसद स्व.श्री तन सिंह जी की यह रचना -
युगों से दृश्य बदलते गए पर एक दृश्य पर मेरी आँख ठिठक गयी | दृश्य पटल पर मैंने एक नारी को देखा | गौर वर्ण,सरोवर से सजल और बड़े बड़े नेत्र,हरी-हरी साड़ी पहने ऊपर नदियों के गोटे लगे हुए थे | सलमे सितारों की जगमागाहट से उसका रूप कहीं अधिक जगमगा रहा था | उसके सतोगुणीय सोंदर्य के सागर में आनंदातिरेक से उद्विग्न हो मेरा मन गहरे गोते लगा रहा था किन्तु मैंने देखा उसकी आँखों में नारायण की व्यथा समाई हुई थी | उसे एक दुष्ट पुरुष अपनी जांघ पर बिठाना चाहता था | वह उसकी हरी हरी सुन्दर साड़ी का पल्ला खींच रहा था और वह अर्धनग्न नारी किसी दुखिया की करुण पुकार-सी पछाड़ खाती हुई मुझसे अभय मांग रही थी | उसकी अस्त व्यस्त केश-राशि मेरे पुरुषार्थ को चुनोती दे रही थी | मैंने सोचा यह दृश्य तो द्रोपदी का है और वह दुष्ट पुरुष शायद दुर्योधन है | शायद मै द्वापर युग के चीरहरण का दृश्य देख रहा था , परन्तु जब मैंने आर्श्चय से मेरी खुद की तस्वीर को दृश्य पटल पर देखा तो संशय हुआ शायद वह कलियुग का ही कोई दृश्य है |
दृश्य पटल पर स्थितिप्रज्ञ की भांति मै खडा था और वह द्रोपदी अपना परिचय दे रही थी -" मै द्रोपदी नहीं धरती हूँ -तेरी स्त्री हूँ ! सतीत्व ही एक मात्र मेरा धन है जिसे यह दुष्ट पुरुष बरबस लुट रहा है ! मुझे बचाओ मेरे नाथ ! मुझे बचाओ !!
लेकिन मै दृश्य पटल पर चुप ही खडा था |
उसने बताया मै किसी एक की होकर नहीं रहना चाहती थी | मुझे अपनी बनाने के लिए कितने ही इतिहास रंगे गए पर तुम्हारे पूर्वजों ने मुझे बलपूर्वक अपनी बना लिया | मेरे लिए लम्बे लम्बे युद्ध चले , लाखों का संहार हुआ , इतना कि मै रक्तस्नाता हो गई | आखिर हार कर मैंने सोच ही लिया कि यह मुझे किसी भी कीमत पर छोड़ नहीं सकता | तभी मैंने अपना कुल्टापन छोडा और वीर भोग्या बनी | पर मुझे एसा मालूम होता कि तेरे जीवित रहते मुझे कोई ले जा सकता है तो मै किसी एक के घर साध्वी बनकर रहने की छलना में कभी नहीं छली जाती | होनहार ने मेरा सारा गर्व खंडित कर दिया , तेरे जैसा नाजोगा पति देखने को मिला अन्यथा मै बहुत पहले ही किसी का पल्ला पकड़ लेती "|
लेकिन मै दृश्य पटल पर चुप ही खडा था |
उसने मुझे याद दिलाया - " मेरे लिए तेरे पूर्वजों ने क्या नहीं किया ? कौनसा पाप नहीं किया ? भाई-भाई आपस में मेरे लिए मर मिटे | पिता ने पुत्र को और पुत्र ने पिता को मारा , सिर्फ मेरे लिए | मेरे लिए एक युद्ध में तेरी बारह बारह पीढियां काम आई | मेरे लिए ही तेरी माँ बहनों ने जलती ज्वालाओं ने जलकर प्राण त्यागे , मेरे लिए ही तेरे पूर्वज केसरिया बाना पहन कर बिना सिर लड़ते रहे | मेरे लिए ही समस्त संसार में सर्वाधिक कीमत चुकाने वाले तेरे ही पूर्वज थे, इसीलिए जन्म जन्मान्तरों तक मै तुम्हारे चरणों की दासी बनी रही | जीने के लिए मरते रहे और मरने के लिए जीते रहे ,पर जिन्दा रहते मेरे किसी पति ने मेरा इस प्रकार परित्याग नहीं किया जिस प्रकार आज तू कर रहा है | जरा देख तो सही,तेरे जीते जी ये दुष्ट मुझे ले जा रहा है |"
लेकिन फिर भी मैंने कुछ नहीं किया | दृश्य पटल पर मौन खडा रहा | केवल इतना ही कहा -" देवी ! धन और धरती बंट कर रहेगी |"
उसने मुझे फटकारा -" मुर्ख पतिदेव ! कायर ! शिखंडी !" और भी न जाने कितनी गलियां उसने मुझे सुना दी | उसने मुझे ललकारा -" बहुत युग बाद तत्व ज्ञानी बना है ! आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध और महावीर ने तुझे समझाया था तब तू क्यों नहीं चुप रहा ? सैकडो ऋषि और मुनियों ने तुझे अहिंसा का उपदेश दिया था उस समय तुने अपनी तलवार को म्यान में क्यों नहीं डाला था ? कितने साहित्यकारों और कवियों ने तुझे काव्यमयी भाषा में समझाया ! उस समय तेरी अक्ल क्या घास चरणे गयी थी जो आज तत्वद्रष्टा का स्वांग बनाकर ज्ञान झाड़ रहा है ? मै तेरी नारी हूँ ,माँ हूँ ,पुत्री और भगिनी हूँ तेरी इज्जत और आबरू हूँ ,तेरे घर की शोभा और सुख हूँ |
तेरा तत्वज्ञान वेश्याओं के कोठे पर सुना ,क्योंकि सरे बाजार में उन्ही के सतीत्व का बंटवारा हुआ करता है | मै साध्वी हूँ ! पीढियों से तेरे कुल की कुलवधू हूँ
" निवीर्य ! यदि रूप के बाजार में ही बैठाना था तो दूल्हा बनकर तुम और तुम्हारे पूर्वजों ने मेरा पाणिग्रहण ही क्यों किया था ? और पाणिग्रहण ही किया था तो वही पाणी आज एक पर पुरुष पकड़ रहा है ! अब तो कदम बढा,एक कदम तो आगे आ |"
किन्तु मेरे कदम दृश्यपटल पर अडिग खड़े थे |
उसके ललाट पर एक बड़ी-सी सिंदूरी लाल बिंदी थी ,जिसे आँचल से पोंछते हुए उसने कहा -" यह तो पूर्वजों की खून की बिंदी थी |" उसने अपनी मांग बताई , वह भी वैसे ही लाल रंग की थी | कहा -यह भी तो तेरे पूर्वजों का खून था जिससे मैंने अपनी मांग भरी थी |
अपने ही पतियों को मारकर उन्ही के खून से मांग भर कर मै सुहागिन रहा करती थी और शायद असंख्य पतियों की हत्या का पाप ही है जिसके प्रायश्चित में मै आज यह फल भोग रही हूँ | अफ़सोस तो यह है कि उनमे से एक भी मैंने जिन्दा नहीं छोडा,अन्यथा अपने ही हाथों मै अपनी मांग नहीं पोंछती | मुझे क्या मालूम था कि मेरी सासुओं की कोख किसी दिन इस प्रकार दगा दे जायेगी !
उसने यह कहते हुए मांग का खून भी पोंछ लिया पर मेरा खून तो शून्य बिंदु की शीतलता तक जमा हुआ था , जमा हुआ ही रहा |
मैंने देखा ,उस दुष्ट दुर्योधन ने निर्लज्जतापूर्वक अपना हाथ बढा कर उस रमणी को आबद्ध कर बलपूर्वक अपनी जांघ पर बैठा लिया | बाण लगी हुई हिरणी के समान धरती ने एक कातर चीत्कार की | यदि क्षीरसागर की नागश्य्या पर नारायण उस समय सोये न होते तो धरती की ऐसी करुणोत्पादक व्यथा से व्याकुल होकर सुदर्शन चक्र ले नंगे पैरों उसकी सहायता के लिए दौडे आते | धरती ने करुण रुदन किया | पहाडों को पिघलाने वाली और नदियों को सुन्न करने वाली उसकी एक हिचकी मेरे रोम रोम में वेदना के बांध तोड़ रही थी परन्तु दृश्यपटल पर खड़ी मेरी तस्वीर हिली भी नहीं | अकस्मात डूबते हुए गजराज ने अपनी सूंड से एक कमल पुष्प को तोड़कर भगवान की सहायता मांगी थी और उस धरती ने भी उसी प्रकार कमल के स्थान पर अपने हाथ को उठाकर चूडा दिखाया ; सिर्फ इतना ही कहा - यह तेरा पहनाया हुआ है |"
छ्नकता हुआ चूडा मेरी और चुनौती दे रहा था | मौन होकर भी उसने मुझे बहुत कुछ कह दिया ,फिर भी मै चुप खडा रहा |
अंत में उस दुर्योधन ने धरती के अधोवस्त्र का स्पर्श कर लिया | धरती जो अभी तक द्रोपदी बनी हुई थी सहसा क्रोध और अपमान की उत्तेजना से कालिका सी दिखाई देने लगी | छविगृह के सभी दर्शकों में कुहराम मच गया | आने वाले दृश्य को न देखने के लिए मैंने आँखे बंद करली तब मुझे उस मेदिनी का कंठस्वर सुनाई दिया ,- देखते क्या हो ? इस वस्त्र का भी अपहरण कर मेरे इस बेशर्म पतिदेव को दे दो ताकि यह इसे पहन ले ! मै तो इसे मर्द समझकर सधवा होने के भ्रम में थी पर यह तो जनाना ही नहीं ,नामर्द है |"
रील टूट गयी | छविगृह प्रकाश से जगमगा उठा | मेरे पास बैठा व्यक्ति मुझसे पूछने लगा -" भाई साहब ! क्या आप बता सकते है ,-यह कौन था जो भूमि का स्वामी बना हुआ चित्रपट पर आया था ? मै उसको परिचय नहीं बता सका | मैंने सावधानी से अपना मुंह उसकी और से फिर लिया ताकि वह मुझे पहचान कर भंडाफोड़ न कर दे कि कलाकार साहब यहीं बैठे है मैंने उसके प्रश्न का उत्तर मुंह घुमाये ही दिया -" नाम तो नहीं जानता पर शायद यह भी एक क्षत्रिय था |"
पडौसी दर्शक ने भोंहे ऊँची उठाकर आश्चर्य से कहा -" अच्छा !"
प्रकाश फिर बुझ गया ,लोगों की नजरे फिर दृश्यपट की और घूम गयी | मैंने भी छुटकारे की सांस ली |
चित्रपट चल रहा था और दृश्य बदलते जा रहे थे |
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क्या मृत्यु समय का मृत्युपूर्व पूर्वाभास होता है ?

कई बार कई बुजुर्ग व्यक्ति अपनी मृत्यु से सम्बंधित ऐसी बाते कहते है जिससे लगता है कि उन्हें अपनी मृत्यु के समय का पूर्वाभास हो गया है लेकिन उनकी बातों पर ये समझकर कि बुढापे की बिमारियों या सठिया जाने की वजह से ये ऐसा कह रहे है उनकी बाते परिजन अनसुनी कर देते है लेकिन जब उस व्यक्ति की मौत होती है और उसके द्वारा कही गयी बाते सत्य निकलती है तब चर्चा चलती है कि फलां व्यक्ति को अपनी मौत का पूर्वाभास हो गया था लेकिन इस बात पर परिजनों के अलावा जो व्यक्ति वहां मौजूद होते है वे तो सच मानते है लेकिन सुनने वाले इस बात को अपने परिजन को महिमा मंडित करने की चाल बताकर खारिज कर देते है | इसी तरह की एक घटना का जिक्र मै यहाँ कर रहा हूँ जो कभी कभी मुझे सोचने पर मजबूर कर देती है कि कुछ लोगो को क्या मृत्यु के समय का पूर्वाभास हो जाता है ?
७ जून २००० को सायं ८ बजे मै अपने एक मित्र दातार सिंह जी के साथ बैठा था और चर्चा चल रही थी उनके वृद्ध पिताजी के स्वास्थ्य की | उनके पिताजी बीमार थे दातार जी दो तीन दिन पहले ही उन्हें संभालकर गांव से आये थे और बता रहे थे कि गांव से पिताजी की मृत्यु का समाचार कभी भी आ सकता है इतने में ही उनके मोबाइल की घंटी बज उठी फोन उनके गांव से ही था फोन करने वाला उनका परिजन बता रहा था कि आपके पिताजी का आज रात निकलना भी मुश्किल लग रहा है वे आज दिन भर एक बात कर रहे है मुझे अगले मुकाम जाना है इसलिए मेरे पुत्र को बुला दीजिए ताकि मै उससे मिलकर बेफिक्र होकर जा सकूँ | इसलिए आप अभी बस पकड़ कर गांव के लिए रवाना हो जाईये |
समाचार मिलते ही मैंने दातार जी को बदरपुर बॉर्डर तक ले जाकर धोला कुवां के लिए ऑटो रिक्शा पकडवा दिया ताकि वे वहां से लाडनू के पास हुडास नामक अपने गांव जाने वाली रात्री बस पकड़ कर घर पहुँच सके | दुसरे दिन उनके घर पहुँचते ही उनके स्व.पिताजी श्री नारायण सिंह जी ने एक एक कर सभी ग्रामवासियों को बुलाना शुरू कर दिया ताकि वे उनसे अपने जीवन की आखिरी मुलाकात कर सके | मिलने आने वाले लोगो में बहुत सारे लोग वही रुक गए वैसे भी गांव में जब कोई बीमार होता है तो उसके पास गांव वासियों का जमघट लग जाता है पता नहीं कब किसकी कैसे जरुरत पड़ जाए इसलिए लोग वही रुक जाते है | नारायण सिंह जी रुके लोगों से बाते करते रहे और कहते रहे कि आज उन्हें अगले मुकाम जाना ही है थोडी धुप कम हो जाये तब जाऊँगा इसलिए किसी को कोई काम है वो कर आओ तीन बजे तक जरुर वापस आ जाना | आखिर तीन भी बज गए तीन बजते ही उन्होंने अपने सभी भाइयों व प्रतिष्ठित गांव वासियों को अपने पास बुला लिया और उन्हें कहने लगे - ये मेरा पुत्र दातार अब अकेला रह जायेगा इसलिए मुझे वचन दो हमेशा इसका साथ निभावोगे | मेरी आपसे यही विनती है आप इसका हर सुख दुःख में साथ दे | भाईयों व ग्रामीणों द्वारा उनके पुत्र को साथ देने का वायदा करने के बाद संतुष्ट हो नारायण सिंह जी ने अपनी कमीज पहनी , जेब में चेक किया कि कितने पैसे है उनमे से कुछ यह कहकर रख लिए कि शायद रास्ते में कही इनकी जरुरत पड़ जाये बाकी पैसे उन्होंने वहां उपस्थित छोटे बच्चो में बाँट दिए और यह कहकर उठने लगे कि अब समय हो गया है इजाजत दीजिए ताकि में अगले मुकाम की अपनी यात्रा शुरू कर सकूँ और ऐसा कह कर उठते समय वे पूरा उठ ही नहीं पाए कि उनके प्राण पखेरू उसी वक्त उड़ गए |
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आशीष जी का रिलेटेड पोस्ट विजेट और ब्लॉग ट्रेफिक

दीपावली पर लोगो को घरों पर रंग रोगन करते व साज सज्जा करते देख अपने ब्लॉग की साज सज्जा करने का विचार पैदा हुआ और उसी के चलते ज्ञान दर्पण का टेम्पलेट बदल डाला लेकिन जो नया टेम्पलेट लगाया वह देखने में तो खुबसूरत था पर उसमे वह कोड नहीं था जिसके नीचे हिंदी ब्लॉग टिप्स वाले आशीष जी का रिलेटेड पोस्ट वाले विजेट का कोड लगाया जाना था परिणाम स्वरूप ज्ञान दर्पण पर यह रिलेटेड पोस्ट वाला विजेट नहीं लग पाया | और इसका नतीजा यह निकला कि ज्ञान दर्पण पर जो पाठको आये वे उस विषय से सम्बंधित दुसरे लेख नहीं पढ़ पाए और उस विजेट की वजह से जो यातायात बढा था वह अचानक २०% से ज्यादा गिर गया और पेज व्यू कम होने से ब्लॉग अलेक्सा रेंक में भी पिछड़ गया | हालाँकि इस दरमियान ब्लॉग पर आने वाले पाठको की संख्या में कोई कमी नहीं आई परन्तु पाठक जो लेख किसी सर्च या एग्रीगेटर से पढने आये वे सिर्फ उसी लेख को पढ़कर चलते बने जबकि आशीष जी के रिलेटेड पोस्ट वाले विजेट की बदौलत उस पोस्ट के नीचे उससे सम्बंधित सभी लेबल वाले लेखो की सूचि उपलब्ध रहती है जिस पर नजर पड़ते ही पाठक अपनी रूचिनुसार उन्हें भी पढता है और इस तरह एक पाठक द्वारा कई लेख पढने से ब्लॉग यातायात के पेज व्यू बढ़ जाते है इसी तरह ये विजेट ब्लॉग पर यातायात बढाने में सहायक का कार्य करते है | मेरी पिछली पोस्ट विबिया टूलबार बढ़ावा दे आपके ब्लॉग को पर ज्ञान दत्त जी ने टिप्पणी में लिखा कि लिंकविदीन विजेट ने उनके ब्लॉग पर ८% यातायात बढाया है लिंकविदीन विजेट भी पोस्ट के नीचे कोई भी पॉँच पोस्ट दिखता है |
ज्ञान दर्पण पर आशीष जी के रिलेटेड पोस्ट विजेट की बदौलत बढा यातायात और फिर बिना उस विजेट के गिरा २०% गिरा यातायात और लिंकविदीन विजेट से ज्ञान दत्त जी के ब्लॉग पर बढा ८% यातायात इन विजेट्स की महत्ता का प्रमाण है |
आशीष जी को आज एक फिर रिलेटेड पोस्ट विजेट बनाने के लिए हार्दिक धन्यवाद |
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यु-ट्यूब विडियो डाउनलोड टूल

ज्ञान दर्पण पर "यु ट्यूब से वीडियो कैसे डाउनलोड करे" करे शीर्षक पोस्ट में यु ट्यूब से विडियो डाउनलोड करने के लिए http://convert.playtube.com/ लिंक दिया गया था लेकिन पिछले दिनों में कई मित्रों के मेल आये कि कन्वर्ट प्ले ट्यूब से विडियो डाउनलोड नहीं हो पा रहे है | आज अंतरजाल पर भटकते हुए एक और यु-ट्यूब डाउनलोडर औजार मिला जिससे आप यु-ट्यूब से सीधे विडियो डाउनलोड कर सकते है |

इस औजार तक पहुँचने के लिए यहाँ चटका लगायें
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चाँद फिर निकला

ये चाँद आज फिर निकला है यु सज धज के
मुहबत का जिक्र हो शायद हाथो की लकीरों मे

याद दिलाता है मुझे एक अनजान राही की
याद दिलाता है उन मुहबत भरी बातो की

टूट कर चाहा इक रात दिल ने एक बेगाने को
कबूल कर लिया था उसकी रस भरी बातो को


वोह पास हो कर भी दूर है मुझ से
दूर होकर भी कितने करीब है दिल के

उनको देखने के लिये ये नैन कितने प्यासे थे
उनको देखने की चाह मे हम दूर तक गए थे

डूब जाते है चश्मे नाज़ मे उनका कहना था
जिंदगी कर दी हमारे नाम उनका ये दावा था

आज चाँद फिर निकला बन ठन कर
चांदनी का नूर छलका हो यु ज़मीं पर

याद आयी नाखुदा आज फिर शब्-ए-गम की
मदभरी,मदहोश,रिश्ता-ए-उल्फ़ते,शबे दराज की

नैनो मे खो गए थे नैन कुछ ऐसे उस रात
छु लिया यूँ करीब हो कर खुल गया हर राज़
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आज पूरण माशी का चाँद फिर निकला
सवाल करता है आपसे आज दिल मेरा

मेरे चाँद

तोड़ कर खिलोनो की तरह यह दिल
किसके सहारे छोड़ देते हो यह दिल

अगर वायदे निभा नहीं सकते थे तुम
जिंदगी का सफ़र न कर सकते थे तुम

कियों आवाज दी इस मासूम दिल को
कियों कर दस्तक देते हो इस दिल को


मत खेलो इस दिल से मेरे हजूर
मत छीनो मेरी आँखों का नूर
हमारा तो पहला पहला प्यार है
आँखों मे तुम्हारा ही खुमार है
हर रोज तुम्हारा ही इंतजार है
दिन रात दिल रोये जार जार है

या तो हमें सफ़र मे साथ लेलो

या फिर अपनी तरह
हमें भी खुद को भुलाना सीखा दो
जीना सिखा दो मरना सिखा दो
अभी तो ज़िन्दगी एक इल्जाम है
बिन तुम्हारे सुनी दुनिया
हमारा तो संसार ही बेजार है
कमलेश चौहान द्वारा लिखित

all rights reserved with Kamlesh Chauhan none of the lines and words are allowed to manipulate and changed. Thanks
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विबिया टूलबार बढ़ावा दे आपके ब्लॉग को

ज्ञान दर्पण पर पिछले कई दिनों से आप एक टूलबार देख रहे होंगे | ढेरों विशेषताओं वाले इस टूलबार को आप भी अपने ब्लॉग पर आसानी से लगा सकते है | इसके लिए आपको विबिया.कॉम पर अपना खाता बनाना होगा | खाता बनाने के एक दो दिन बाद आपको विबिया से मेल द्वारा निमंत्रण मिलेगा जिससे आप अपने खाते में लोगिन कर इस शानदार टूलबार का कोड प्राप्त कर अपने ब्लोगर खाते में लेआउट में जाकर HTML/JAVA विजेट लेकर उसमे कोड चिपका सहेज दे | टूलबार आपके ब्लॉग पर दिखाई देने लगेगा | अब सवाल ये उठता है कि -इस टूलबार में ऐसी कौनसी विशेषता है जो इसे हम अपने ब्लॉग पर जगह दे ? तो आईये चर्चा करते है इसकी विशेषताओं पर -
१- सबसे पहले गिनते है इसकी कुल विशेषताएँ जो चित्र में दिखाई दे रही है

२- यह टूलबार गूगल सर्च के साथ आपके ब्लॉग से सम्बंधित सर्च की भी सुविधा प्रदान करता है |
३- यह आपके ब्लॉग पर लिखे आपके हिंदी लेखों को ११ विदेशी भाषाओँ में अनुवाद कर पढने की सुविधा उपलब्ध कराता है जिससे ११ भाषाओँ के जानकर लोग आपका हिंदी में लिखा अपनी भाषा में पढ़ कर आपके बोद्धिक ज्ञान का फायदा उठा सकते है इस तरह इतने लोगों की पहुँच में आने से आपके ब्लॉग पर पाठकों का आवागमन बढेगा |

४- यह टूलबार आपके हाल ही के दिनों में लिखे दिखाने की सुविधा प्रदान करता है जिससे आपको इसके लिए अलग से कोई विजेट लगाने की जरुरत नहीं पड़ती | और पाठको को आपके ताजा लेखों की सूचि मिलने से वे आपका लिखा ज्यादा पढ़ पाएंगे |

५- यह टूलबार आपके लेख को ११ अलग अलग सामाजिक वेब साइट्स पर साझा करने की सुविधा देता है पाठक आपके लेख को बिना आपका ब्लॉग बंद किये सीधे इन वेब साइट्स पर जाकर साझा कर सकता है |

६- आपके लिखों की फीड सब्सक्रिप्शन की सुविधा भी इसमें समाहित है |
७- सुचनापट्ट- अपने पाठको को आप इस सुचनापट्ट के जरिए अपने आगामी लेख या अन्य सुचना दे सकते है इसके लिए विबिया.कॉम पर अपने खाते में लोगिन कर Live Notifications में अपनी सूचना लिख दे यह सुचना अपने आप आपके टूलबार पर प्रसारित होती रहेगी |

८- उपरोक्त सुविधाओं के अलावा भी इस टूलबार में फेसबुक फेन,ट्विटर,फोटो एल्बम, खेल आदि जोड़ने के कई विकल्प है जो आप अपनी रूचि के अनुसार जोड़ सकते है |
९- यही नहीं इस टूलबार ने आपके ब्लॉग पर कितने प्रष्ट पाठको को पढ़वाए और आपके ब्लॉग का ट्रेफिक बढाया इसका लेखा जोखा भी देखने की सुविधा देता है |

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काश उन मामलों को मै ऐसे निपटाता !

आज राम सिंह को कारखाने के प्रबंधक पद से सेवा मुक्त हुए पूरा महीना बीत गया लेकिन पद पर रहते जो लोग उसके आगे पीछे घुमा करते थे वे आजतक मिलने भी नहीं आये जिन कारखाना मालिकों के फायदे के लिए राम सिंह दूसरो का बुरा करने तक में नहीं चूका उन मालिकों का भी कभी कोई फोन तक राम सिंह के पास नहीं आया | घर में अकेला बैठा राम सिंह अब अतीत में कारखाने में लिए गए अपने निर्णयों का विश्लेषण करने लगा | उस हर एक मामले के द्रश्य अब राम सिंह की दिखाई देने लगे जिनमे निर्णय करते वक्त राम सिंह ने मानवीय पक्ष दरकिनार करते हुए सिर्फ कारखाने का पक्ष देखा | आज राम सिंह को अपने द्वारा किये गए गए गलत निर्णयों का वीभत्स चेहरा नजर आने से वह अन्दर तक हिल चूका है और सोचता है कि उन मामलों में मानवीय पक्ष देखकर भी तो मै कोई निर्णय कर सकता था जैसे;-
१- कारखाने में काम करने वाली एक गर्भवती महिला प्रबन्धक राम सिंह के पास गर्भावस्था अवकाश लेने आती है लेकिन राम सिंह उससे कहता कि छुट्टी नहीं मिलेगी तुम्हारी जगह काम कौन करेगा ? इसलिए मै तुम्हे नौकरी से हटा कर तुम्हारी जगह किसी और की नियुक्ति कर देता हूँ | और राम सिंह उसे नौकरी से निकल देता है | महिला राम सिंह को बुरा भला कहकर कोसती हुई , बद-दुआएं देती , रोती हुई अपने घर जाती है |
उस घटना को याद कर आज राम सिंह सोचता है काश उस मामले को मैंने कुछ इस तरह निपटाया होता -
जैसे ही वह गर्भवती महिला राम सिंह के कक्ष में गर्भावस्था अवकाश का आवेदन लेकर प्रवेश करने के साथ अभिवादन करती है | और राम सिंह से अपनी छुट्टी की बात करती है |
राम सिंह - अच्छा आप आराम से छुट्टी कीजिए और आपके साथ काम करने वाली किसी सहकर्मी को अपना कार्य समझा दीजिए उसे आपका कार्य करने के बदले कम्पनी ओवर टाइम दे देगी जिससे उसकी भी कुछ आय बढ़ जायेगी और आपके अवकाश की वजह से कारखाने का कोई काम भी नहीं अटकेगा | और कोई दिक्कत हो तो मुझे बताइगा |
महिला राम सिंह को धन्यवाद देती हुई ख़ुशी ख़ुशी अपने को लौटती है |
२- कारखाने में मशीन पर काम करने वाले बनवारी का हाथ दुर्घटनावश मशीन में फंस गया जिसे डाक्टर ने ओपरेशन कर काट दिया था आज अस्पताल से छुट्टी होने के बाद बनवारी वापस कारखाने में काम पर लौटा है लेकिन राम सिंह ने यह सोचकर कि बनवारी एक हाथ कैसे मशीन चलाएगा उसकी तो अब कार्य क्षमता कम हो चुकी सो बनवारी को अपने कक्ष में बुलाकर कहता है
राम सिंह - देख बनवारी ! अब एक हाथ से तू मशीन तो चला नहीं सकता इसलिए तू कारखाने में किस काम का ? मैंने तेरी जगह दूसरा आदमी भर्ती कर लिया और तेरा हिसाब बनाने के लिए बोल दिया इसलिए ऑफिस में बाबू के पास जा और अपना हिसाब लेकर अपने घर चलता बन |
राम सिंह की बात सुनकर बनवारी रोंर लगता है ,राम सिंह की मिन्नते करता है गिड़गिडाता कि उसके बाल बच्चे बहुत छोटे है और हाथ काटने की वजह से उसे कही और जगह काम नहीं मिलेगा इसलिए उसे नौकरी से न निकला जाए लेकिन राम सिंह पर बनवारी के रोने पीटने का कोई असर नहीं पड़ता | और बनवारी राम सिंह को बद-दुआएं देता रोता हुआ अपने घर को रवाना होता है |
आज राम सिंह उस घटना को याद करने पर अपनी गलती का अहसास होता है और वह सोचता है काश बनवारी के मामले को मैंने इस तरह निपटाया होता -
अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद बनवारी कारखाने काम पर लौटता है सबसे पहले वह प्रबन्धक राम सिंह से मिलने उसके कक्ष में प्रवेश कर राम सिंह को अभिवादन करता है |
राम सिंह - अरे आओ आओ बनवारी ! बैठो और बताओ अब तुम्हारी तबियत कैसी है | भई तुम्हारा दुर्घटना में हाथ जाता रहा इसका मुझे बहुत अफ़सोस है तुम्हारी दुर्घटना के बाद मै कारखाने में कुछ और भी ऐसे उपाय करवा रहा हूँ ताकि इस तरह की दुर्घटना रोकी जा सके और तुम्हारी तरह किसी और श्रमिक को ये सब नहीं भुगतना पड़े खैर -- अब तुम मशीन पर तो काम कर नहीं पावोगे इसलिए मैंने तुम्हारे काम पर अन्य श्रमिक को लगा दिया है और तुम्हारे लायक दूसरा काम तलाश लिया जो तुम एक हाथ से भी आसानी से कर सकते है | इससे कारखाने का कार्य भी प्रभावित नहीं होगा और तुम्हे भी कोई तकलीफ नहीं होगी | अब जावो और अपना नया कार्यभार संभालो | कोई दिक्कत परेशानी हो तो बेझिझक मुझे बताना |
और बनवारी खुश होकर राम सिंह को हार्दिक धन्यवाद देता हुआ उसके कक्ष से बाहर निकल अपने नए कार्य पर ख़ुशी ख़ुशी जुट जाता है |
ऐसे ही मामलों में लिए अनेक निर्णय आज पूर्व कारखाना प्रबन्धक राम सिंह की आँखों में घूम रहे है और उनके बारे में सोच सोच कर वह बैचेन हो उठता है पर अब बैचेन होने के सिवा कर भी तो क्या सकता है आखिर वो समय तो निकल चूका जब वो मानवता के लिए कुछ कर सकता है |
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चेतावनी रा चुंग्ट्या : कवि की कविता की ताकत

1903 मे लार्ड कर्जन द्वारा आयोजित दिल्ली दरबार मे सभी राजाओ के साथ हिन्दू कुल सूर्य मेवाड़ के महाराणा का जाना राजस्थान के जागीरदार क्रान्तिकारियो को अच्छा नही लग रहा था इसलिय उन्हे रोकने के लिये शेखावाटी के मलसीसर के ठाकुर भूर सिह ने ठाकुर करण सिह जोबनेर व राव गोपाल सिह खरवा के साथ मिल कर महाराणा फ़तह सिह को दिल्ली जाने से रोकने की जिम्मेदारी क्रांतिकारी कवि केसरी सिह बारहट को दी | केसरी सिह बारहट ने "चेतावनी रा चुंग्ट्या " नामक सौरठे रचे जिन्हे पढकर महाराणा अत्यधिक प्रभावित हुये और दिल्ली दरबार मे न जाने का निश्चय किया |और दिल्ली आने के बावजूद समारोह में शामिल नहीं हुए |
पग पग भम्या पहाड,धरा छांड राख्यो धरम |
(ईंसू) महाराणा'र मेवाङ, हिरदे बसिया हिन्द रै ||1||

भयंकर मुसीबतों में दुःख सहते हुए मेवाड़ के महाराणा नंगे पैर पहाडों में घुमे ,घास की रोटियां खाई फिर भी उन्होंने हमेशा धर्म की रक्षा की | मातृभूमि के गौरव के लिए वे कभी कितनी ही बड़ी मुसीबत से विचलित नहीं हुए उन्होंने हमेशा मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह किया है वे कभी किसी के आगे नहीं झुके | इसीलिए आज मेवाड़ के महाराणा हिंदुस्तान के जन जन के हृदय में बसे है |
घणा घलिया घमसांण, (तोई) राणा सदा रहिया निडर |
(अब) पेखँतां, फ़रमाण हलचल किम फ़तमल ! हुवै ||2||

अनगिनत व भीषण युद्ध लड़ने के बावजूद भी मेवाड़ के महाराणा कभी किसी युद्ध से न तो विचलित हुए और न ही कभी किसी से डरे उन्होंने हमेशा निडरता ही दिखाई | लेकिन हे महाराणा फतह सिंह आपके ऐसे शूरवीर कुल में जन्म लेने के बावजूद लार्ड कर्जन के एक छोटे से फरमान से आपके मन में किस तरह की हलचल पैदा हो गई ये समझ से परे है |
गिरद गजां घमसांणष नहचै धर माई नहीं |
(ऊ) मावै किम महाराणा, गज दोसै रा गिरद मे ||3||


मेवाड़ के महाराणाओं द्वारा लड़े गए अनगिनत घमासान युद्धों में जिनमे हजारों हाथी व असंख्य सैनिक होते थे कि उनके लिए धरती कम पड़ जाती थी आज वे महाराणा अंग्रेज सरकार द्वारा २०० गज के कक्ष में आयोजित समरोह में कैसे समा सकते है ? क्या उनके लिए यह जगह काफी है ?
ओरां ने आसान , हांका हरवळ हालणों |
(पणा) किम हालै कुल राणा, (जिण) हरवळ साहाँ हंकिया ||4||


अन्य राजा महाराजाओं के लिए तो यह बहुत आसान है कि उन्हें कोई हांक कर अग्रिम पंक्ति में बिठा दे लेकिन राणा कुल के महाराणा को वह पंक्ति कैसे शोभा देगी जिस कुल के महाराणाओं ने आज तक बादशाही फौज के अग्रिम पंक्ति के योद्धाओं को युद्ध में खदेड़ कर भगाया है |
नरियंद सह नजरांण, झुक करसी सरसी जिकाँ |
(पण) पसरैलो किम पाण , पाणा छतां थारो फ़ता ! ||5||


अन्य राजा जब अंग्रेज सरकार के आगे नतमस्तक होंगे और उसे हाथ बढाकर झुक कर नजराना पेश करेंगे | उनकी तो हमेशा झुकने की आदत है वे तो हमेशा झुकते आये है लेकिन हे सिसोदिया बलशाली महाराणा उनकी तरह झुक कर अंग्रेज सरकार को नजराना पेश करने के लिए आपका हाथ कैसे बढेगा ? जो आज तक किसी के आगे नहीं बढा और न ही झुका |
सिर झुकिया सह शाह, सींहासण जिण सम्हने |
(अब) रळनो पंगत राह, फ़ाबै किम तोने फ़ता ! ||6||


हे महाराणा फतह सिंह ! जिस सिसोदिया कुल सिंहासन के आगे कई राजा,महाराजा,राव,उमराव ,बादशाह सिर झुकाते थे | लेकिन आज सिर झुके राजाओं की पंगत में शामिल होना आपको कैसे शोभा देगा ?
सकल चढावे सीस , दान धरम जिण रौ दियौ |
सो खिताब बखसीस , लेवण किम ललचावसी ||7||


जिन महाराणाओं का दिया दान,बख्शिसे व जागीरे लोग अपने माथे पर लगाकर स्वीकार करते थे | जो आजतक दूसरो को बख्शीस व दान देते आये है आज वो महाराणा खुद अंग्रेज सरकार द्वारा दिए जाने वाले स्टार ऑफ़ इंडिया नामक खिताब रूपी बख्शीस लेने के लालच में कैसे आ गए ?
देखेला हिंदवाण, निज सूरज दिस नह सूं |
पण "तारा" परमाण , निरख निसासा न्हांकसी ||8||


हे महाराणा फतह सिंह हिंदुस्तान की जनता आपको अपना हिंदुआ सूर्य समझती है जब वह आपकी तरफ यानी अपने सूर्य की और स्नेह से देखेगी तब आपके सीने पर अंग्रेज सरकार द्वारा दिया गया " तारा" (स्टार ऑफ़ इंडिया का खिताब ) देख उसकी अपने सूर्य से तुलना करेगी तो वह क्या समझेगी और मन ही मन बहुत लज्जित होगी |
देखे अंजस दीह, मुळकेलो मनही मनां |
दंभी गढ़ दिल्लीह , सीस नमंताँ सीसवद ||9||


जब दिल्ली की दम्भी अंग्रेज सरकार हिंदुआ सूर्य सिसोदिया नरेश महाराणा फतह सिंह को अपने आगे झुकता हुआ देखेगी तो तब उनका घमंडी मुखिया लार्ड कर्जन मन ही मन खुश होगा और सोचेगा कि मेवाड़ के जिन महाराणाओं ने आज तक किसी के आगे अपना शीश नहीं झुकाया वे आज मेरे आगे शीश झुका रहे है |
अंत बेर आखीह, पताल जे बाताँ पहल |
(वे) राणा सह राखीह, जिण री साखी सिर जटा ||10||


अपने जीवन के अंतिम समय में आपके कुल पुरुष महाराणा प्रताप ने जो बाते कही थी व प्रतिज्ञाएँ की थी व आने वाली पीढियों के लिए आख्यान दिए थे कि किसी के आगे नहीं झुकना ,दिल्ली को कभी कर नहीं देना , पातळ में खाना खाना , केश नहीं कटवाना जिनका पालन आज तक आप व आपके पूर्वज महाराणा करते आये है और हे महाराणा फतह सिंह इन सब बातों के साक्षी आपके सिर के ये लम्बे केश है |
"कठिण जमानो" कौल, बाँधे नर हीमत बिना |
(यो) बीराँ हंदो बोल, पातल साँगे पेखियो ||11||


हे महाराणा यह समय बहुत कठिन है इस समय प्रतिज्ञाओं और वचन का पालन करना बिना हिम्मत के संभव नहीं है अर्थात इस कठिन समय में अपने वचन का पालन सिर्फ एक वीर पुरुष ही कर सकता है | जो शूरवीर होते है उनके वचनों का ही महत्व होता है | ऐसे ही शूरवीरों में महाराणा सांगा ,कुम्भा व महाराणा प्रताप को लोगो ने परखा है |
अब लग सारां आस , राण रीत कुळ राखसी |
रहो सहाय सुखरास , एकलिंग प्रभु आप रै ||12||


हे महाराणा फतह सिंह जी पुरे भारत की जनता को आपसे ही आशा है कि आप राणा कुल की चली आ रही परम्पराओं का निरवाह करेंगे और किसी के आगे न झुकने का महाराणा प्रताप के प्रण का पालन करेंगे | प्रभु एकलिंग नाथ इस कार्य में आपके साथ होंगे व आपको सफल होने की शक्ति देंगे |
मान मोद सीसोद, राजनित बळ राखणो |
(ईं) गवरमेन्ट री गोद, फ़ळ मिठा दिठा फ़ता ||13||


हे महाराणा सिसोदिया राजनैतिक इच्छा शक्ति व बल रखना इस सरकार की गोद में बैठकर आप जिस मीठे फल की आस कर रहे है वह मीठा नहीं खट्ठा है |
इन सौरठों की सही सही व्याख्या करने की राजस्थानी भाषा के साहित्यकार आदरणीय श्री सोभाग्य सिंह जी से समझकर भरपूर कोशिश की गई फिर भी किसी बंधू को इसमें त्रुटी लगे तो सूचित करे | ठीक कर दी जायेगी |

ताऊ डॉट इन: बाबा कायलदास प्रवचनम : खूंटे पै सम्मेलनम
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उबुन्टू लिनक्स : मोबाइल फ़ोन से इन्टरनेट कैसे जोड़े

उबुन्टू इंस्टाल करने के बाद ब्रोडबैंड इन्टरनेट बिना किसी कॉन्फिगरेशन के चालू हो जाता है लेकिन यदि आप अपने मोबाइल से लिनक्स में इन्टरनेट चलाना चाहते है तो थोडी सी कॉन्फिगरेशन करनी पड़ेगी जबकि विण्डो एक्सपी में संबंधित मोबाइल का पीसी सोफ्टवेयर इंस्टाल करना पड़ता है | लिनक्स में यह बहुत आसान है आईये आज इसी पर चर्चा करते है |
१- सबसे पहले system (तंत्र)-Preferences(वरीयता) -network connections पर क्लिक करे एक विण्डो खुलेगी

२- जोड़े पर चटका लगाये फिर एक विण्डो खुलेगी


३- आगे पर चटका लगाये



४-अपना मोबाइल सेवा प्रदाता का नाम चुने और आगे बढे



५- लागू करे पर चटका लगते ही कार्य पूरा हो गया अब जहाँ नेटवर्क कनेक्शन का आइकन दिखाई दे रहा है उस चटका लगाये आपके सामने दो आप्शन होंगे १- वायर्ड नेटवर्क २- मोबाइल ब्रोडबैंड . जिसमे मोबाइल ब्रोड बैंड को चुन ले बस अब आपका नेट आपके मोबाइल से चलने लगेगा |
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हिंदी उपन्यास "सात समन्दर पार" : समीक्षा

चंडीगढ़ के यूनिस्टार पब्लिकेशन ने "सात समन्दर पार " हिंदी उपन्यास प्रकाशित किया है जिसे लिखा है अमेरिका में रहने वाली भारतीय महिला कमलेश चौहान ने | कमलेश चौहान पंजाब साहित्य सभा द्वारा प्रेस्टीयस एन आर आई एकेडमी अवार्ड जनवरी २००९ से भी सम्मानित है |
उपन्यास अमेरिका में रहने वाले एक एनआरआई से शादी करने वाली महिला के जीवन की सच्ची घटना पर आधारित है | इस उपन्यास की मुख्य किरदार सुन्दरी नामक एक महिला है | साधारण परिवार में जन्मी सुन्दरी स्वतंत्र विचारों वाली ,बहादुर,चतुर ,वाक्पटु और सुन्दर महिला है | अपनी दो बहनों की शादी के खर्च के वित्तीय बोझ से दबे परिवार पर सुंदरी कभी बोझ नहीं बनना चाहती इसीलिए वह अपनी शादी की बजाए अपनी पढाई को प्राथमिकता देती है साथ ही गलत सामाजिक अवधारणाओं के खिलाफ आवाज उठाती है | सुन्दरी आकाश नाम के एक लड़के जिसे वह अपने सपनो का राजकुमार समझती है से बेइन्तहा प्यार करती है लेकिन उसके इस प्यार के रिश्ते को उसके घर वाले कभी स्वीकार नहीं करते और उसकी शादी एक एन आर आई से कर दी जाती है | अपने परिवार की आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियों के चलते सुन्दरी उस एनआरआई से शादी कर लेती है और इस तरह शुरू होती है सुन्दरी की सात समंदर पार यात्रा |
सुन्दरी एक पढ़ी लिखी महिला होने के बावजूद उसे महसूस कराया जाता है कि वह विदेशी वातावरण के लायक नहीं है उसका पति उसे अहसास करता है कि वह सामाजिक तौर पर उसकी बराबरी की नहीं है और वह उसकी भावनात्मक व वास्तविक इच्छाएँ कभी पूरी नहीं करता | वह हमेशा अपनी नौकरानी की तरह आज्ञाओं का पालन करवाना चाहता है लेकिन सुन्दरी इन सबके खिलाफ आवाज उठाती है और अपना एक अलग अपने खुद के उसूलों वाला व्यक्तित्व तैयार करती है | वह विदेशी कानून की मदद से तलाक़ लेकर खुद को अपने पति से अलग कर लेती है और समाज में अपनी पहचान बनाने का संघर्ष शुरू करती है इसी संघर्ष को इस पुस्तक में उकेरा गया है | इसके अलावा इस पुस्तक में भावनात्मक विषयों को छुआ गया है | जो भारतीय महिलाऐं शादी करके पश्चिमी देशो में पंहुच हिंसा, भावनात्मक व शारीरिक शोषण का शिकार बनती है उनके अनगिनत किस्से इस पुस्तक में संजोये गए है | और शोषण का शिकार बनी महिलाओं को उपन्यास के माध्यम से उनके अधिकारों से परिचित कराना व उनकी शक्ति को बढ़ाना है |
उपन्यास में एक नारी के अरमानो व भावनाओं कोप गंभीरता से दर्शाने का प्रयत्न किया गया है | उपन्यास की किरदार सुन्दरी अपने प्यार से वंचित हो एक प्रेमरहित विवाह करती है ताकि वह अपने परिवार की वित्तीय सहायता व सामजिक प्रतिष्ठा बना सके लेकिन लेकिन इन प्रेमरहित बांहों के दलदल से निकलने के लिए वह जो संघर्ष कर एक ऐसी नारी बनती है जो समाज में अपना एक अलग निशान छोड़ती है |

कमलेश चौहान एनआरआई से शादी करने के चक्कर में ठगी गयी भारतीय महिलाओं पर एक और उपन्यास लिख रही है " धोखा सात फेरों का "
कमलेश चौहान के इस उपन्यास को यहाँ चटका लगाकर उनकी वेबसाइट से ख़रीदा जा सकता है |;;
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मैनेजर ताऊ और तीन लिफाफे

कई सालों से मैनेजर ताऊ अपनी कम्पनी को बढ़िया तरीके से लाभ में चला रहा था | कम्पनी में काम करने वाले कई सहकर्मी मैनेजर ताऊ की इस सफलता से मन ही मन बड़े जलते थे | लेकिन ताऊ के आगे उनकी एक न चलती थी लेकिन जब से सेठ के छोरे ने विदेश से प्रबंधन की पढाई कर लौटने के बाद कम्पनी का कार्यभार संभाला ताऊ विरोधियों ने उसे ताऊ के खिलाफ बहला फुसला दिया | चापलूसों से घिरा सेठ का छोरा उनके कहने पर कम्पनी कार्यों में कई उल्टे सीधे निर्णय लेने लगा जाहिर है ऐसे में कम्पनी का नुकसान होना तय था | मेनेजर ताऊ ने सेठ के छोरे को खूब समझाया कि ये हिंदुस्तान है यहाँ सफल होने के लिए सिर्फ पढाई से काम नहीं चलता " पढाई के साथ गुणाई भी चाहिए जो विदेशों में नहीं सिर्फ ताऊ प्रबंधन विश्वविद्यालय में ही मिलती है जिसका पास आउट मै हूँ इसलिए मेरा कहना मान वर्ना इन चमचो के कहने से चलेगा तो तेरी ये कम्पनी एक दिन बंद हो जायेगी | पर चमचों से घिरे सेठ के छोरे को ताऊ की बात कहाँ समझ आने वाली थी |
बदली परिस्थितियां देखा मैनेजर ताऊ ने इस्तीफा देकर किसी अन्य कम्पनी की राह पकड़ी | पर ताऊ को पता था कि अब ये चापलूस मण्डली कोई भी आने वाले मैनेजर को ढंग से काम नहीं करने देगी और घाटे में जाने के कारण बेचारे की नौकरी ना चली जाए अतः ताऊ ने नए मैनेजर को कार्यभार सौंपते हुए तीन लिफाफे यह कहते हुए दिए कि जब भी तुम्हारी नौकरी के ऊपर कोई संकट आये तब इन लिफाफों में से लिखे नंबर के अनुसार बारी बारी से खोलना तुम्हे संकट से निकलने का रास्ता मिलेगा |
साल भर बाद जैसे ही कम्पनी का लाभ-हानि खाता बना कम्पनी घाटे में थी इस वजह से अपनी नौकरी पर लटकी तलवार का संकट देख नए मैनेजर को ताऊ के लिफाफे याद आये उसने तुंरत लिफाफा न. १ खोला जिसमे लिखा था -
" अपनी नाकामयाबियों का सारा दोष मेरे ऊपर डाल दो " |
मैनेजर ने यही किया सेठ को कह दिया कि " ताऊ के कार्यकाल में उसके द्वारा लिए गए गलत निर्णयों की वजह से कम्पनी में घाटा हुआ है यह तो मै था सो कम्पनी को कुछ संभाल लिया वरना ताऊ तो पूरी कम्पनी को ही डुबोने का काम कर गया था |
इस तरह मैनेजर ने अपनी नाकामयाबी का दोष ताऊ के सिर मढ़ अपनी नौकरी बचा ली | पर अगले साल फिर कम्पनी घाटे में | फिर मैनेजर ने ताऊ का लिफाफा खोला | लिखा था -" सारा दोष सरकारी नीतियों पर डाल दो " मैनेजर पढ़कर समझ गया और उसने यही किया सारा दोष सरकार की बदली नीतियों पर डाल कर फिर नौकरी बचा ले गया |
तीसरी साल कम्पनी फिर घाटे में | मैनेजर ने ताऊ द्वारा दिया तीसरा लिफाफा खोला जिसमे लिखा था|
"अब बहुत हो गया इसलिए अब इस्तीफा देकर नए मैनेजर के लिए तू भी ऐसे ही तीन लिफाफे तैयार करले "
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जुगाड़ ब्लॉग एग्रीगेटर का

पिछले दिनों जब ब्लोगवाणी ने फालतू आलोचनाओं से विचलित हो गुड बाय कह दिया तो महसूस हुआ क्यों न एक ब्लॉग एग्रीगेटर का भी जुगाड़ कर लिया जाय | जब हमारे देश में हर जगह जुगाड़ करने का प्रचलन है तो एक ब्लोगर के लिए ब्लॉग एग्रीगेटर का जुगाड़ करने में क्या बुराई है | अब देखिये न घर में कोई भी काम या समारोह हो बड़े बुजुर्ग उसकी व्यवस्था का जुगाड़ करने में लग जाते है या छोटो को सम्बंधित व्यवस्था का जुगाड़ करने का आदेश थमा देते है | चुनावों में भी नेता पहले टिकट का जुगाड़ करने में जुटते है , टिकट का जुगाड़ हो जाए तो चुनाव खर्च , कार्यकर्ताओं व वोटों का जुगाड़ और फिर जीत गए तो येन-केन प्रकारेण मंत्रिपद पाने का जुगाड़ करने में लग जाते है | पार्टियाँ भी पहले तो जिताऊ उम्मीदवारों का जुगाड़ करती है फिर सरकार बनाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना कर संख्या बल का जुगाड़ करने का भरसक प्रयास करती है जैसे अब इन चुनावों के बाद हरियाणा मेंभुप्पी भैया ने बहुमत से कम सीटे आने पर जुगाड़ कर सरकार बनाने का दावा ठोक दिया |कहने का मतलब हमारे यहाँ हर जगह जुगाड़ लगाना पड़ता है चाहे घर हो,राजनीती हो,कारखाने हो या व्यापार हर जगह बिना जुगाड़ कोई कार्य संपन्न होता ही नहीं |
इसी जुगाड़ तंत्र से प्रेरित होकर मैंने भी एक ब्लॉग एग्रीगेटर के जुगाड़ का मन बनाया | नेट पर फ्री में मिलने वाली कई वेब स्क्रिप्ट तलाशी लेकिन कोई काम की नहीं निकली कुन्नु जी ने भी एक स्क्रिप्ट बताई लेकिन उसके लिए जरुरी पाइथोन मेरे होस्टिंग सर्वर पर उपलब्ध नहीं है और हो भी नहीं सकता | फिर वर्डप्रेस के ऑटोब्लोगिंग प्लगिन्स खंगाले उनमे कई चीजे काम की लगी जिन्हें एग्रीगेटर के बतौर इस्तेमाल किया जा सकता है लेकिन वहां भी मजा नहीं आया आखिर जब ब्लोगर के विजेट्स पर दिमाग दौडाया तो पता चला यह जुगाड़ तो पहले से ही है और हर ब्लोगर आंशिक तौर पर इसका इस्तेमाल भी कर रहा है | यह तो वो बात हुई " गोद में छोरो और गांव में हेरो " | मै बात कर रहा हूँ ब्लोगर के विजेट ब्लॉग रोल की | जिसके जरिये हम अपने ब्लॉग पर पसंदीदा चिट्ठे जोड़ते है और उन चिट्ठों की फीड हमारे ब्लॉग पर अवतरित होती रहती है इसी विजेट को हम अपने ब्लॉग के मुख्य प्रष्ठ पर लगादे जिसमे जुड़े सभी चिट्ठों की फीड अपडेट होती रहेगी और एक विजेट साइड बार में लगादे जिसमे चिट्ठे की फीड का पता टिप्पणी वाला जोड़ दे जिससे वहां उन चिट्ठों पर हुई टिप्पणियाँ भी दिखाई देती रहेगी टिप्पणी की फीड http://yourblog.blogspot.com/feeds/comments/default लिख कर जोड़ी जा सकती है बस बन गया आपका ब्लॉग एग्रीगेटर | इसमें न तो पसंद का चटका होगा और न ही किसी टांग खेंचू को टांग खींचने का कोई मौका मिलगा |
तो अब यहाँ चटका लगाकर देखिये इस ब्लॉग एग्रीगेटर जुगाड़ को |


डिस्क्लेमर :- कृपया इसे गंभीरता से ना ले और ब्लोगवाणी और चिट्ठाजगत का इस्तेमाल करते रहे |
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माइक्रोसोफ्ट का you may victim of software वाला सन्देश कैसे हटाएँ ?


आज से तीन साल पहले एक मित्र ने सहारा का नया लेपटोप ख़रीदा था | तीन चार महीने बाद जब भी लेपटोप चालू किया जाता माइक्रोसोफ्ट का एक चेतावनी भरा सन्देश आता you may be a victim of software counterfeiting |
सन्देश देखकर मित्र घबरा गए उन्होंने मुझसे भी सलाह मांगी लेकिन उस वक्त मुझे भी कंप्यूटर के सम्बन्ध में प्रयाप्त ज्ञान नहीं था कई और जानकार मित्रों ने यही बताया कि लेपटोप विक्रेता ने हो सकता है एक्सपी का ट्राइल वर्जन इंस्टाल कर दिया होगा जिसकी मियाद ख़त्म होने के बाद अब माइक्रोसोफ्ट आपको चेतावनी सन्देश भेज रही है और आप कभी भी फंस सकते है आखिर कईयों की सलाह और डर के मारे मित्र ने लेपटोप किसी हार्डवेयर इंजिनियर को बुला कर फोर्मेट ही करवा डाला |
अब जब हम भी कंप्यूटर के बारे में थोडा जानने लगे है तब पता लगा कि इस तरह का सन्देश देने वाली फ़ाइले तो पहले ही विण्डो एक्सपी में मौजूद रहती है और इन्हें आसानी से हटाया जा सकता है | तो आईये अब चर्चा करते है इन्हें हटाने के तरीके पर -
१- सबसे पहले my computer की C Drive खोले
२- अब windows नाम का फोल्डर खोलकर उसमे system32 नाम का फोल्डर खोलें |
३- system32 फोल्डर में ये दो फ़ाइले खोजे - 1- Wgalogon.dll 2- WgaTray

४- हमें इन दोनों फाइल्स को हटाना है लेकिन हम कितनी भी कोशिश करे ये डिलीट नहीं होती
अतः इन्हें १-यहाँ से कट कर कहीं अन्य जगह पेस्ट कर दे २- या इनका नाम बदल दें
अब कंप्यूटर रिस्टार्ट करे उपरोक्त सन्देश आना बंद हो जायेगा |
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दीवाली की खुशियाँ ,प्रदूषण और ब्लॉग ट्रेफिक

दीपावली आई अपने साथ ढेरों खुशियाँ और उपहारों के साथ ढेरों शुभकामना सन्देश लाई लेकिन इन सब खुशियों का इजहार करने के लिए हम ने जो पटाखे छोड़े उन्होंने प्रदूषण भी जम कर फैलाया | दीपावली वाली रात्री को प्रदूषण का आलम यह था कि घर के बाहर निकलते दम घुट रहा था चारों और धुँवा ही धुँवा | सुबह जब उठे तो देखा घर के बाहर सड़क पटाखों के कूड़े से पटी पड़ी है | इस प्रदूषण की मर तो सह गए लेकिन इस त्यौहार पर ब्लॉग के ट्रेफिक पड़े साइड इफेक्ट का दर्द अभी भी कचोट करा है |
दीवाली के एक दिन पहले से ही ब्लॉग पर ट्रेफिक का ग्राफ गिरने लग गया था जो अभी भी संभलने की ही कोशिश कर रहा है |

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हूँ मर ज्या सूं जद थारौ कांई हुसी :ताऊ बुझागर

एक सुबह जब किसान अपने खेतों में पहुंचे तब रेत के धोरों पर उगी अपनी बाजरे की तहस नहस फसल देख बड़े निराश हुए और जब फसल उजाड़ने वाले की तलाश की तो किसानो को खेत में किसी जानवर के बड़े-बड़े गोल-गोल आकृति के पदचिन्ह दिखाई दिए जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखे थे इस तरह अनजान पदचिन्ह देख किसान घबरा कर उल्टे पांव गांव दौड़ आये और अपनी समस्या से हमेशा की तरह ताऊ बुझागर को अवगत करा समाधान खोजने का आग्रह किया |
ताऊ बुझागर जी गाँव के बुजुर्ग व्यक्ति थे और गांव वालों की नजर में सबसे बुद्धिमान और हर विषय के जानकर | गांव में चाहे कोई महामारी फैले , किसी में भुत-प्रेत की छाया आये , कोई बीमार हो या किसी और समस्या से पीड़ित | सबका इलाज और आसरा ताऊ बुझागर जी ही थे |
किसानो के आग्रह पर ताऊ बुझागर जी खेतो में वे बड़े-बड़े पदचिन्ह देखने गए लेकिन ऐसे पदचिन्ह तो ताऊ बुझागर जी ने भी पहली बार देखे थे लेकिन बुझागर जी ठहरे पक्के ताऊ सो बुझागर जी ने अपने दिमाग का इस्तेमाल करते हुए किसानो से कहा -
ताऊ बुझागर जी :- अरे भाई गांव वालो ! जिस दिन हूँ मर ज्यासूं जद थारौ कांई हुसी ! अरे बावली बुचौ तुम इन पदचिन्हों को भी नहीं पहचान सके | तुम्हारा तो भगवान् ही मालिक है | अरे बिना अक्ल वालो यह तो घटियों के पदचिन्ह है | तुम्हारे गाँव की घटियां रात को चरने के लिए खेतों में आने लग गयी है आज रात उन्हें रस्सों से कस कर बाँध देना |
(घटियां पत्थर से बनी छोटी छोटी हाथ से चलने वाली चक्कियों को कहा जाता है गांवों में छोटी चक्कियां अभी भी दलिया वगैरह दलने के लिए इस्तेमाल की जाती है |)
ताऊ बुझागर जी की सलाह पर गाँव वालों ने अपने अपने घरों में रखी घटियों को रस्सों से बाँध दिया लेकिन जब दुसरे दिन खेतों में गए तब फिर अपनी उजड़ी फसल देख हैरान हो गए | ताऊ बुझागर जी ने फिर कह दिया - कि तुम्हारी घटियां जादुई हो गयी है अतः अपने आप रस्सों से खुलकर खेतो में पहुँच जाती है अतः आज रात अपनी अपनी घटियों पर पहरा रखो |
गांव वाले ताऊ की बात मान रात भर घटियों की पहरेदारी करते रहे और उधर वह बड़ा जानवर उनके खेतो में खड़ी फसल तबाह करता रहा | आखिर परेशान हो गांव के किसानो ने खेतों में पहरा देने का निश्चय किया |
चांदनी रात थी पहरा देते किसानो ने देखा एक बहुत बड़ा काले रंग का भीमकाय जानवर जिसके आगे पीछे दोनों और पूछ थी अपनी अगली पूंछ से बाजरे की फसल को तोड़-तोड़ कर खा रहा था और अपने बड़े बड़े पैरों से कुचल कर फसल उजाड़ रहा था | किसानो ने ऐसा जानवर पहले कभी नहीं देखा था अतः वे डर के मारे वहीँ दुबक गए और एक व्यक्ति को ताऊ बुझागर जी को बुलाने भेजा ताकि वे इस मुसीबत से उन्हें बचा सके | ताऊ बुझागर जी भी अपनी लाठी व लालटेन हाथ में ले वहां आ गए लेकिन यह जानवर तो उन्होंने भी जिन्दगी में पहली बार देखा था | लेकिन ताऊ कैसे मान ले कि उन्होंने उस जानवर को नहीं पहचाना | सो ताऊ बुझागर जी ने उस भीमकाय जानवर को देख वहां उपस्थित किसानो को कहा -
ताऊ बुझागर जी :- अरे बावली बुचौ ! कभी अपना दिमाग भी इस्तेमाल करना सीख जावो वरना ' जिस दिन हूँ मर ज्या सूं जद थारौ कांई हुसी |
अरे बावलों ! यो या तो चाँद रौ चन्द्रोल्यों हुसी नहीं तो बैतो(चलता हुआ) सूरजी तुय गयो हुसी |
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