राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .

जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !

मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.

भूतों का महल : भानगढ़ का सच

राजस्थान के भानगढ़ का उजड़ा किला व नगर भूतों का डरावना किले के नाम से देश विदेश में चर्चित है.

"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था

उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.

क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत

आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.

Sep 21, 2014

मरू -मान

पील ,मीठी पीमस्यां
खोखा, सांगर, बेर |
मरु धरा सु जूझता
खींप झोझरू कैर ||

जूझ जूझ इण माटी में
बन ग्या कई झुंझार ।
सिर निचे दे सोवता
बिन खोल्यां तरवार ॥

ऊँचा रावला कोटड़याँ
सिरदारां की पोळ |
बैठ्या सामां गरजता
मिनखां की रमझोळ ॥

मरुधर का बे मानवी
कतरा करां बखाण
सर देवण रे साट में
नहीं जाबा दी आण ||

चाँदण उजली रातडली,
सोना जेड़ी रेत् |
सज्या -धज्या टीबड़ा,
ज्यूँ सामेळ जनेत ||

ऊँडो मरू को पाणी है,
उणसु ऊंडी सोच ।
साल्ल रात्यूं आपजी न
जायोडा री मोच ||

चीतल, तीतर, गोयरा
छतरी ताण्या मोर |
मोड्यां कुहकु -कुहकु बोलती
दिन उगता की ठोड़ ||

बे नाडयाँ बे खालडया
बे नदयां का तीर |
सुरग भलेही ना मिले,
बी माटी मिले शरीर ॥

लेखक : गजेन्द्रसिंह सिंह शेखावत

Sep 18, 2014

जब हम पूर्ण विकसित होंगे : व्यंग्य

मोदी (Narendra Modi) के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में विकास की बड़ी बड़ी बातें चल रही है| हर देशवासी के दिल में अब पूर्ण विकसित होने की उम्मीदें हिल्लोरें मारने लगी है| आखिर मारे भी क्यों नहीं देशवासियों को अब विकास के अमेरिकी पश्चिम मॉडल, मास्को व चीन के वामपंथी मॉडल के साथ खांटी गुजराती मॉडल जो मिल गया| आजकल देश का हर व्यक्ति, सत्ता की सीढियों पर शोर्टकट रास्ते चढने की महत्वाकांक्षा रखने वाला हर नेता गुजराती विकास मॉडल का जाप जप रहा है| मोदी प्रधानमंत्री पद पर आसीन होने के बाद तो गुजराती विकास मॉडल की ही नहीं, गुजराती गरबा संस्कृति की खासियत, उसकी श्रेष्ठता आदि की चर्चाएँ ही नहीं चल रही बल्कि लोग गुजरात की संस्कृति अपनाते हुए गरबा में डूबे है|

लेकिन हम हिन्दुस्तानियों (Indians)की ख़ास आदत है| हम अपनी अच्छी चीजें छोड़ दूसरों की घटिया चीजें अपनाते हुए गौरव महसूस करते है| अब जब हम जैसे विकासशील या पिछड़े देश को इतने सारे विकास मॉडल मिल गए तो हम इन सबका घालमेल कर अपना विकास जरुर करेंगे| जब हम विकास के अपने भारतीय सांस्कृतिक मॉडल को छोड़ कई तरह के मॉडलस के घालमेल वाले संस्करण से विकास करेंगे ( Fully Developed Nations)तब तो विकास कुछ इस तरह नजर आयेगा-

पाश्चात्य अमेरिकी विकास मॉडल अपनाते हुए हम शिक्षित होंगे और उनकी संस्कृति अपनायेंगे, तब हम कपड़े पहनने के झंझट से मुक्त हो जायेंगे| कपड़ों पर होने वाला खर्च बच जायेगा| जो जितना विकसित होगा उसका उतना शरीर नंगा दिखाई देगा| कपड़ों की मांग घटने से देश के कपड़ा उद्योग कपड़ा बनाते व रंगाई-छपाई करते समय जो प्रदूषण फैलाते है, वो बंद हो जायेगा| इस तरह विकसित होने के साथ साथ हम पर्यावरण की रक्षा करते हुए ओजोन परत बचाकर धरती पर बहुत बड़ा अहसान भी कर देंगे|

गुजराती विकास और सांस्कृतिक मॉडल अपनाने के बाद देश में औद्योगिक विकास (Industrial Development) तो धड़ल्ले होगा, जिसमें गरीब, किसान को कुछ मिले या नहीं, पर पूंजीपतियों की पौबारह होगी| देश में जब अमीरों के आने जाने के लिए चौड़ी चौड़ी सड़कें बनेगी, उद्योग लगेंगे तब किसानों की जमीन का सरकार उनके लिए अधिग्रहण कर, उसका मुआवजा देकर किसान को घाटे की खेती करने से निजात दिला देगी| यही नहीं किसान भी भूमि के मुआवजे से मिले धन से कुछ समय तक अमीरों की तरह एशोआराम कर उसका सुख भोग सकेगा|

आज पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP Model)से सड़कें बन रही है| जब हम ज्यादा विकास करेंगे तब शहर, गांव, कच्ची बस्ती तक की सड़कें इसी मॉडल के तहत बनवा देंगे| जिस तरह आज राजमार्गों पर चढ़ते ही टोल चुकाना पड़ता है, उसी तर्ज पर घर से निकलते ही व्यक्ति को गली की सड़क पर पैर रखने के लिए टोल चुकाना पड़ेगा| गरीब जो टोल नहीं चुका सकता वह घर से बाहर ही नहीं निकलेगा और इस तरह गरीबी घर में दुबकी बैठी रहेगी| देश में जिधर नजर पड़ेगी उधर अमीर व्यक्ति ही नजर आयेंगे, जिससे विदेशियों की नजर में हम गरीब देश नहीं अमीर देश कहलायेंगे|

अपनी स्थानीय संस्कृति छोड़, गरबा जैसी दूर से मजेदार दिखने वाली संस्कृति अपनायेंगे तो उसके पीछे का सांस्कृतिक प्रदूषण भी साथ आयेगा| उसके समर्थक नेता उस प्रदूषण के फायदे भी गिनवायेगा कि छोरी के गरबा में किसी के साथ सेटिंग कर भाग जाना घर वालों के लिए फायदे का सौदा है, उनका दहेज़ में किया जाने वाला धन बच गया|

आधुनिक शिक्षा ग्रहण कर जब हम पूर्ण विकसित हो जायेंगे तब घर में बूढ़े माँ-बाप की सेवा करने को रुढ़िवादी क्रियाक्लाप समझ, माँ-बाप को घर से बाहर निकाल देंगे| उन्हें किसी धर्मार्थ संस्थान या सरकार द्वारा संचालित वृद्धाश्रम में छोड़ आयेंगे| सरकारें भी हर वर्ष निर्माण किये वृद्धाश्रमों की संख्या दर्शाते हुए विकास के आंकड़े प्रचारित करेगी|

इस तरह हमारे द्वारा अपनाये गए खिचड़ी विकास मॉडल के फायदे ही फायदे होंगे, भले हम अपनी मूल संस्कृति, विकास का प्राचीन भारतीय मॉडल जिसकी बदौलत भारत दुनियां में सोने की चिड़िया हुआ करता था, को खो देंगे| जिसके लिए कभी विश्विद्यालयों में शोध होगा| कई लोग डाक्टर की उपाधियों से विभूषित भी हो जायेंगे| पर हमारा देश कभी सोने की चिड़िया बनेगा, का सपना भी नहीं ले पायेगा| यह बिंदु वामपंथी इतिहाकारों के लिए भी फायदे का सौदा साबित होगा, वे भारत कभी सोने की चिड़िया था ही नहीं, पर ढेरों किताबें लिखेंगे और शोध पत्र छापेंगे कि ये कोरी कल्पना थी कि भारत कभी सोने की चिड़िया भी था|


Sep 11, 2014

शास्त्रों में वर्णित महिलाओं की चार श्रेणियां

भारतीय शास्त्रों में रूप, गुण व आदतों के अनुसार महिलाओं को चार श्रेणियों में बांटा है| पद्मिनी, चित्रणी, हस्तिनी व संखिणी| महिलाओं की इन चार श्रेणियों पर विभिन्न काल में विभिन्न साहित्यकारों द्वारा बहुत कुछ लिखा गया है| प्रस्तुत है इसी सम्बन्ध में किसी साहित्यकार (शायद जायसी) द्वारा लिखी इन श्रेणियों पर काव्य रचना !!

पद्मिनी पद्म गन्धा च पुष्प गन्धा च चित्रणी|
हस्तिनी मच्छ गन्धा च दुर्गन्धा भावेत्संखणी||

पद्मिनी की काया कमल की भाँती सुगन्धित होती है तो चित्रणी फूलों की महक लिये, हस्तिनी में मछली की महक आती है तो संखिणी में दुर्गन्ध आती है|

पद्मिनी स्वामिभक्त च पुत्रभक्त च चित्रणी|
हस्तिनी मातृभक्त च आत्मभक्त च संखिणी ||

पद्मिनी पतिभक्त होती है तो चित्रणी पुत्र भक्त, हस्तिनी अपनी माँ की भक्त होती है वहीं संखिणी केवल अपनी भक्त होती है|

पद्मिनी करलकेशा च लम्बकेशा च चित्रणी |
हस्तिनी उर्द्धकेशा च लठरकेशा च संखिणी ||

पद्मिनी के केश घुंघराले होते है, चित्रनी के लम्बे, हस्तिनी के खुरदरे तो संखिणी के उलझे हुए|

पद्मिनी चन्द्रवदना च सूर्यवदना च चित्रणी |
हस्तिनी पद्मवदना च शुकरवदना च संखिणी ||

पद्मिनी की काया चंद्रमा की तरह होती है वहीं चित्रणी की काया सूर्य के समान, हस्तिनी कमल के समान तो संखिणी की काया कुत्ते के समान|

पद्मिनी हंसवाणी च कोकिलावाणी च चित्रणी |
हस्तिनी काकवाणी च गर्दभवाणी च संखिणी ||

पद्मिनी की वाणी हंस के समान, चित्रणी की कोयल के समान, हस्तिनी की वाणी कौवे के समान तो संखिणी की वाणी गधे सरीखी होती है|
पद्मिनी पावाहारा च द्विपावाहारा च चित्रणी |

त्रिपदा हारा हस्तिनी ज्ञेया परं हारा च संखिणी ||

पद्मिनी की खुराक बहुत ही कम होती है, चित्रणी की उससे दुगुनी, हस्तिनी की तिगुनी तो संखिणी दूसरों का हिस्सा भी खा जाती है|
चतु वर्षे प्रसूति पद्मन्या त्रय वर्षाश्च चित्रणी |

द्वि वर्षा हस्तिनी प्रसूतं प्रति वर्ष च संखिणी ||

पद्मिनी चार वर्ष के अंतराल बाद र्भधारण कर संतान को जन्म देती है, चित्रणी तीन वर्ष में एक बार हस्तिनी दो वर्ष में वहीं संखिणी हर वर्ष गर्भधारण कर संतान को जन्म देती है|

पद्मिनी श्वेत श्रृंगारा, रक्त श्रृंगारा चित्रणी |
हस्तिनी नील श्रृंगारा, कृष्ण श्रृंगारा च संखिणी ||

पद्मिनी श्वेत वस्त्र या श्रंगार पसंद करती है, चित्रणी ला, हस्तिनी नीला तो संखिणी काला पसंद करती है|

पद्मिनी पान राचन्ति, वित्त राचन्ति चित्रणी |
हस्तिनी दान राचन्ति, कलह राचन्ति संखिणी ||

पद्मिनी पान की शौक़ीन होती है तो चित्रणी धन की, हस्तिनी दान की तो संखिणी को कलह करने का शौक होता है|

पद्मिनी प्रहन निंद्रा च, द्वि प्रहर निंद्रा च चित्रणी |
हस्तिनी प्रहर निंद्रा च, अघोर निंद्रा च संखिणी ||

पद्मिनी दिन में सिर्फ एक बार सोती है, चित्रणी दो बार, हस्तिनी तीन बार तो संखिणी को हर सोते रहने रहना चाहती है|

चक्रस्थन्यो च पद्मिन्या, समस्थनी च चित्रणी|
उद्धस्थनी च हस्तिन्या दीघस्थानी संखिणी||

पद्मिनी गोल स्तन धारण किये होती है, चित्रणी के आनुपातिक, हस्तिनी के छोटे और संखिणी के लंबे स्तन होते है|

पद्मिनी हारदंता च, समदंता च चित्रणी|
हस्तिनी दिर्घदंता च, वक्रदंता च संखिणी||

पद्मिनी के दांत माला की तरह होते है, चित्रणी के एक समान, हस्तिनी के लंबे तो संखिणी के अटपटे, टेढ़े-मेढ़े होते है|

पद्मिनी मुख सौरभ्यं, उर सौरभ्यं चित्रणी|
हस्तिनी कटि सौरभ्यं, नास्ति गंधा च संखिणी||

पद्मिनी की रौनक या कांति उसके चेहरे से झलकती है तो चित्रणी की उसके स्तनों से, हस्तिनी की कमर से तो संखिणी में किसी तरह की रौनक या कांति होती ही नहीं|

पद्मिनी पान राचन्ति, फल राचन्ति चित्रणी|
हस्तिनी मिष्ट राचन्ति, अन्न राचन्ति संखिणी||

पद्मिनी पान की शौक़ीन, चित्रणी फल की, हस्तिनी मिठाई की संखिणी अनाज की|

पद्मिनी प्रेम वांछन्ति, मान वांछन्ति चित्रणी |
हस्तिनी दान वांछन्ति, कलह वांछन्ति संखिणी ||

पद्मिनी के मन में प्रेम पाने की इच्छा रहती हैं चित्रणी को मान-सम्मान की, हस्तिनी को दान की तो संखिणी को कलह करने की|

महापुण्येन पद्मिन्या, मध्यम पुण्येन चित्रणी |
हस्तिनी च क्रियालोपे, अघोर पापेन संखिणी ||

पद्मिनी महापुण्य में विश्वास रखती है, चित्रणी साधारण पूण्य में, हस्तिनी संसार में तो संखिणी घोर पाप करने में|

Sep 4, 2014

कीटनाशक : मानव के लिए सबसे बड़ा खतरा

गांव में बचपन से ही मोरों (Peacock)को देखा है| सुबह उठते ही मोरों की मधुर आवाज सुनाई देती थी| हवेली से बाहर निकलते ही प्रांगण में माँ सा, दादीसा या घर के अन्य बुजुर्गों द्वारा डाला दाना चुगते मोर-मोरनी नजर आते थे| मयूर (Peacock) को दाना चुगाने के लिए घर के छोटे बच्चों के हाथों में अनाज भरकर कटोरी दे मयूर के पास भेजते और जब बच्चे के हाथों मयूर दाना चुगते तो छुपकर फोटो लेने का आनंद ही कुछ और होता था| बच्चे भी अपने हाथों मोर को दाना चुगाने से बड़े खुश होते| खेतों में पंख फैलाकर नाचते मयूर को देखते ही बनता था| वर्षा ऋतू में तो मोरों की आवाजें सून बुजुर्ग वर्षा का अनुमान लगा लेते थे, यही नहीं कई बार रात में मोरों की क्रंदन आवाजें सून घर के बड़े बुजुर्ग आस-पास किसी अनहोनी की आशंका का अंदाजा लगा लिया करते थे|

मोरों द्वारा अपने पंख छोड़ने का बचपन में हम सभी साथियों को बेसब्री से इन्तजार रहता था| सुबह सुबह ही गांव के सारे बच्चे अपने अपने खेतों में मयूर पंख की तलाश में निकल जाते थे ताकि पंख एकत्र कर बेचकर पैसे कमाये जा सके| पंखों के बदले मिले पैसों से एक अलग ही आत्म संतोष मिलता था आखिर वो खुद की कमाई जो होती थी|

ऐसा नहीं है कि मयूरों से सब खुश ही रहते थे| उस वक्त हमारे यहाँ सिर्फ वर्षा ऋतू की फसलें ही होती थी| वर्षा के बाद जब फसल बोई जाती तब खेतों में मयूर बोये गए बीज को खा जाते थे| सो फसल बोने के बाद आठ-दस दिन तक सुबह सुबह सभी बच्चों की ड्यूटी खेतों में मोरों से फसल (Crop) की रखवाली के लिए लगती थी| बाद में जब फसल में अनाज के दाने पड़ते तब भी पकने तक कृषक मोरों सहित अन्य पक्षियों से फसल की रक्षा को तैनात रहते| फसलों को मोरों द्वारा नुकसान पहुंचाने के बावजूद मोर का राष्ट्रीय पक्षी वाला रुतबा व सम्मान कायम था| गांव में मोर के शिकार पर प्रतिबंध था| मोर का शिकार करने वाले को गांव में ग्रामीण दंड देते और उसे घृणा से देखते थे| गांव में सिर्फ एक बावरिया जाति का परिवार ही मोर का शिकार कर खाता था| जिसका गांव वाले पूरा ध्यान रखते थे कि वह मोर का शिकार ना कर पाये|

लेकिन अफ़सोस ! राष्ट्रीय पक्षी मोर को सरकार ही नहीं ग्रामीणों द्वारा इतना संरक्षण देने के बावजूद आज मेरे गांव में एक भी मोर मौजूद नहीं है| जिस मोर को दिखाकर गांवों में छोटे बच्चों का मन बहलाया जाता था, आज गांव में बच्चों को मोर का परिचय कराने के लिए सिर्फ मोरों के चित्र ही बचे है| मोरों को संरक्षण के साथ इतना सम्मान देने के बावजूद मोर नहीं बचे, और हमारा आधुनिक कृषि विकास मोरों को निगल गया|

दरअसल जब से किसान आधुनिक कीटनाशक (Modern Pesticides) से ट्रीटमेंट किया बीज बोने लगे वही मोरो के लिए काल साबित हुआ| कीटनाशक (Pesticides) लगा बीज खाने से गांव के सभी मोर एक के बाद बीमार होकर कालकलवित हो गए और आज गांव में एक भी मोर नहीं बचा| मोर ही नहीं तीतर जैसे पक्षी जो लोगों द्वारा शिकार कर खाने की पहली पसंद है भी इन कीटनाशक लगे बीजों को खाकर बीमार पड़ जाते है और उनका शिकार कर खाने वाले भी एक बार अस्पताल पहुँच गए थे| तब से लोग तीतर का शिकार करने से भी बचने लगे है|

जिस तरह से खेतों में किसान कीटनाशकों (Phorate, DAP, uria Pesticides)का उपयोग कर रहे है उसे देखते हुए अंदाज लगाया जा सकता है कि वो दिन दूर नहीं जब इनके साइड इफेक्ट से बीमार हुए इंसानों से अस्पताल भरे मिलेंगे| इसका उदाहरण बीकानेर के अस्पताल में व बीकानेर से भटिंडा के बीच चलने वाली रेलगाड़ी में देखा जा सकता है| इस रेलगाड़ी में आपको कैंसर मरीज, उनके तीमारदार या फिर उन मरीजों से मिलने वाले यात्री ही मिलेंगे| स्थानीय निवासियों ने तो उस रेल का नाम ही कैंसर एक्सप्रेस रख दिया है| और ये सभी कैंसर मरीज पंजाब के खेतों में भारी मात्रा में इस्तेमाल किये कीटनाशकों व नहरों में पंजाब की फैक्ट्रियों से निकलने वाले रसायनयुक्त प्रदूषित पानी के मिलने से कैंसर से ग्रसित हुए होते है| जिनकी संख्या देखकर मन में आशंका उठती है कि यदि इसी प्रकार हम जहरीले कीटनाशक प्रयोग करते रहे तो वो बिना किसी महायुद्ध के ही हम मानव सभ्यता खो बैठेंगे|

फसलें ही नहीं, पशुओं का चारा घास भी इन कीटनाशकों की पूरी जद में है| आज हर किसान बीज के साथ फोरेट Phorate नामक घातक कीटनाशक बोता है| जिसका असर उस जमीन, उस फसल व वहां उगे घास में 45 दिन तक रहता है| यदि 45 दिन के भीतर कोई पशु वहां उगी घास Grass को खा ले तो फोरेट Phorate का जहर पशु के शरीर में अवश्य जाएगा और अपना साइड इफेक्ट उसे बीमार करके दिखाया| यही नहीं उस पशु का दूध भी दूषित ही होगा और वह पीने वाले को नुकसान पहुंचाएगा जिसके जहरीले परिणाम देर सवेर जरुर दिखाई देंगे|

इन कीटनाशकों के प्रयोग से ज्यादा फसल Crop लेकर मुनाफा कमाने के चक्कर में किसान तो इसका जिम्मेदार है ही, कीटनाशक बेचने वाले सबसे ज्यादा जिम्मेदार है| अक्सर अनपढ़ किसान कीटनाशक प्रयोग करने की विधि व मात्रा आदि की जानकारी दुकानदार से ही लेते है और कीटनाशक बेचने वाले दुकानदार ज्यादा बिक्री से मुनाफा कमाने के चक्कर में किसानों को अनचाहा कीटनाशक तो बेचते ही है साथ ही आवश्कता से अधिक कीटनाशक की मात्रा इस्तेमाल करने की सलाह देते है| ताकि उनकी बिक्री बढे और वे ज्यादा मुनाफा कमायें|

अत: मुनाफा कमाने के चक्कर में स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वाले इस खेल पर नियंत्रण की आवश्यकता है वरना वो दिन दूर नहीं जब इन कीटनाशकों के अति इस्तेमाल के चलते इनके साइड इफेक्ट से बीमार लोगों से अस्पताल भरे मिलेंगे या फिर जिस तरह मेरे गांव से मोर ख़त्म हुए वैसे कभी मानव भी ना बचे|


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