राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .

जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !

मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.

भूतों का महल : भानगढ़ का सच

राजस्थान के भानगढ़ का उजड़ा किला व नगर भूतों का डरावना किले के नाम से देश विदेश में चर्चित है.

"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था

उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.

क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत

आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.

Mar 19, 2015

घास की रोटियां का बिलाव द्वारा छीन ले जाना : एक इतिहास प्रवाद, एक भ्रान्ति

भारत में इतिहास लेखन कभी रुचिकर नहीं रहा| भारतीय शासक इतिहास लेखन को लेकर प्राचीन काल से उदासीन रहे| लेकिन भारत के साहित्यकारों ने अपने साहित्य में ऐतिहासिक घटनाकर्मों का जमकर जिक्र किया| यही कारण है कि राजस्थान सहित भारत का ज्यादातर साहित्य वे ही लोग समझ सकते है जो इतिहास के जानकार है| और इतिहास भी वे ही लोग ठीक ढंग से व सही अर्थ में समझ सकते है, जिन्हें भारतीय साहित्य की समझ हो| चूँकि भारतीय साहित्य स्थानीय भाषाओँ में लिखा है, जो हर किसी के समझ में आ जाये संभव नहीं| हर भाषा का साहित्य उसी क्षेत्र के लोग जो उस स्थानीय भाषा से जुड़े हों, ही समझ सकते है| यही कारण है कि विदेशियों द्वारा लिखे गए इतिहास में बहुत सी भ्रांतियां लिख दी गई, हालाँकि कर्नल टॉड जैसे इतिहास लेखकों की मंशा कतई गलत नहीं थी, पर सही ऐतिहासिक तथ्यों की नासमझी और सुनी सुनाई बातों के आधार पर उन्होंने इतिहास लिख डाला|

लेकिन इस साहित्य में साहित्यकारों द्वारा युद्धों व उनमें अपने पसंदीदा नायकों का जिस अतिश्योक्ति से वर्णन किया है और अपने नायक के खिलाफ लड़ रहे को खलनायक साबित किया, उसने इतिहास में सबसे ज्यादा भ्रांतियां फ़ैलाने का काम किया| उदाहरण के तौर पर पृथ्वीराज चौहान और जयचंद का मामला लिया जा सकता है| इतिहासकारों के अनुसार पृथ्वीराज-गौरी युद्ध में जयचंद में कोई भूमिका ही नहीं थी, लेकिन चंदरबरदाई के पृथ्वीराज रासो के चलते जयचंद को आज गद्दार का पर्यायवाची शब्द बना दिया गया| जबकि जयचंद का कसूर सिर्फ इतना ही था कि उसके पृथ्वीराज से अच्छे संबंध नहीं थे|

इस मामले के साथ ही यदि हम महाराणा प्रताप के हल्दीघाटी युद्ध के इतिहास पर चर्चा करें तो आज हर जगह महाराणा के जीवन पर बोलने वाले वक्ताओं के मुंह से महाराणा का इतिहास सुनने को मिलेगा -"महाराणा ने घास की रोटियां खाई, राजकुमार अमरसिंह के हाथ से जब बन बिलाव घास की रोटी छिनकर भाग गया तो राजकुमार अमरसिंह बिलख उठे| और यह दृश्य देख महाराणा की आँखे भर आई|

दरअसल राजस्थान के महान साहित्यकार व कवि स्व.कन्हैयालाल सेठिया ने, जिनका कुछ वर्ष पहले ही निधन हुआ है, ने महाराणा के संघर्ष को अपनी रचना में उकेरने, उपमा देने हेतु घास की रोटियां खाना और राजकुमार के हाथ से बन बिलाव द्वारा घास की रोटी छीन लेने की बात कही| और महाराणा के स्वतंत्रता हेतु संघर्ष को उपमाएं देने की इस बात को आज हम इतिहास मान बैठे| साहित्य हमें इतिहास की घटना की सूचना तो दे सकता है पर साहित्य में प्रयुक्त किये सभी शब्द व वाक्य इतिहास सम्मत हो ये जरुरी नहीं| चूँकि सेठिया जी की "अरे घास री रोटी ही, जद बन बिलाव ले भाग्यो" कविता ज्यादा पुरानी नहीं है, फिर भी लोगों ने इस कविता में दी गई उपमाओं को इतिहास मान लिया तो हम समझ सकते है कि प्राचीन साहित्यिक ग्रंथों में लिखे इतिहास संबंधी तथ्य कैसे होंगे?

यदि सेठिया की इस रचना के ऐतिहासिक तथ्यों पर चर्चा करें तो पायेंगे कि इस कविता या रचना में बन बिलाव द्वारा अमर सिंह के हाथ से रोटी छिनने के बारे में बताई गई घटना मात्र काल्पनिक है| इसका इतिहास से कोई लेना देना नहीं| क्योंकि कवि ने अपनी रचना में जो कहानी बताई है वह ऐतिहासिक तथ्यों के एकदम विपरीत है| राजकुमार अमरसिंह हल्दीघाटी के युद्ध व उसके बाद राणा के संघर्ष के समय 17 वर्ष की आयु के थे| उस काल में 17 वर्ष का राजपूत बालक शेर व हाथियों से टक्कर लेने में सक्षम होता था| चित्तौड़ के इतिहास पर भी नजर डालें तो गोरा-बादल, पत्ता आदि बहुत कम उम्र के थे पर उन्होंने युद्धों में दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए थे और अपनी अप्रत्याशित वीरता की छाप छोड़ी थी| गोरा-बादल तो महज १२-१३ वर्ष के थे जब उन्होंने रानी पद्मिनी की योजनानुसार अलाउद्दीन खिलजी की कैद से राणा रतन सिंह को कमांडो ऑपरेशन कर छुड़ा लिया था| पत्ता ने अकबर द्वारा सूंड पर तलवारें बांधकर नशे में चूर मदमस्त भेजे गए हाथियों से टक्कर ली थी|

ऐसी दशा में समझा जा सकता है कि एक 17 वर्षीय राजकुमार और वह भी महाराणा प्रताप की परम्परा वाले उनके पुत्र के हाथों से कोई बन बिलाव रोटी छिनकर ले जाए, संभव नहीं| हल्दीघाटी का युद्ध जून 1576 में लड़ा गया था, जबकि राजकुमार अमरसिंह का जन्म 16 मार्च 1559 को हुआ था| इस तिथि से उनकी आयु देखी समझी जा सकती है| इस तरह साफ़ है कि सेठिया जी की कविता "अरे घास री रोटी ही" मात्र साहित्यिक कल्पना है और यह महाराणा के संघर्ष को उपमाएं देने के लिए है ना कि इतिहास| इस तरह की रचनाओं व जनश्रुतियों को इतिहास ना मानकर सिर्फ इन्हें सुन या गाकर सिर्फ रसास्वादन मात्र करना चाहिए| इन्हें इतिहास मानकर कहीं भाषण या ज्ञान आदि नहीं झाड़ना चाहिए क्योंकि हमारा यह अल्प ज्ञान ही आगे चलकर इतिहास में भ्रांतियां पैदा करता है|



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Mar 15, 2015

अतिक्रमण को जातिवाद का संरक्षण

इस देश में आजादी के बाद जातिवाद ख़त्म कर समानता की बड़ी बड़ी बातें की जाती है पर आज भी समानता की जगह लोगों को जातीय आधार पर विशेषाधिकार चाहिए| किसी को दलित होने के नाम पर तो, किसी को पिछड़ा होने के नाम पर, किसी को आर्थिक आधार पर किसी को किसी अन्य आधार पर नौकरियों, विधायिका, संसद आदि में आरक्षण चाहिए| साथ ही सरकारी भूमि पर कब्जे का विशेषाधिकार चाहिए|

यही नहीं आरक्षण जैसी व्यवस्था के चलते बिना क़ाबलियत नौकरी पाने के बाद भी हाल यह है कि लोग नौकरी का अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा के साथ निभाना नहीं चाहते बल्कि बिना काम किये वेतन पाना चाहते है| हाल ही में देखा, एक गांव के स्वास्थ्य केंद्र पर तैनात एएनएम (नर्स) पिछले एक वर्ष से मनमाने तरीके से ड्यूटी पर आती है| स्वास्थ्य केंद्र का समय सुबह 9 से 1 बजे व शाम 4 से 6 बजे तक होता है| नियमनुसार नर्स को स्वास्थ्य केंद्र की 8 किलोमीटर की परिधि में रहना होता है लेकिन उक्त नर्स स्वास्थ्य केंद्र से 31 किलोमीटर दूर शहर में रहती है| तथा सुबह 9 के बजाय 11 बजे तक आती है और 1 बजे अपने घर| स्वास्थ्य केंद्र के आस-पास दलित बस्ती है और चूँकि नर्स भी दलित है तो उसका वहां आना ना आना किसी भी दलित को चुभता नहीं, हाँ ! इससे पूर्व जो अन्य जाति की नर्स थी, उसका एक घंटा भी स्वास्थ्य केंद्र पर नहीं रहना दलितों को गंवारा नहीं था| जबकि वह नर्स गांव में रहती थी और पुरे 24 घंटे सेवा कार्य के लिए उपलब्ध होती थी|

दुसरे मामले में गांव के कुछ जागरूक युवाओं के अनुसार गांव के सरकारी विद्यालय के खेल मैदान पर कुछ दलित परिवारों ने अतिक्रमण कर रखा है, चूँकि प्रधानाध्यापक और ब्लॉक शिक्षा अधिकारी भी दलित है अत: इन युवाओं की शिकायत ना तो प्रधानाध्यापक ने सुनी ना ब्लॉक शिक्षा अधिकारी ने| युवाओं के अनुसार ब्लॉक शिक्षा अधिकारी ने तो शिकायत करने गए युवाओं को धमकाया भी कि वे उसके पास सीधे क्यों चले आये| आखिर युवा एसडीएम से मिले और एसडीएम ने ब्लाक शिक्षा अधिकारी को मामले में उचित कार्यवाही करने के आदेश दिए, लेकिन ब्लाक शिक्षा अधिकारी अभी भी अतिक्रमणकारों को जातीय आधार पर बचाने में लगे है और कार्यवाही के नाम पर लीपापोती कर रहे है|

इस तरह जातिवाद के नाम पर एक नर्स अपनी ड्यूटी निभाये बिना वेतन उठा रही है तो दूसरी और जातीय आधार पर शिक्षा अधिकारी अतिक्रमणकारियों को बचाने में लगे जबकि अतिक्रमण हटाना उसका कर्तव्य है|

यही नहीं इस तरह अतिक्रमण करने या सरकारी नौकरी में हरामखोरी करने वालों की शिकायत करने वालों को इन कथित, शोषित दलितों की और से जाति सूचक शब्द कहने के नाम पर झूंठे मुकदमें में फंसाने की धमकियाँ भी मिलती है, जिसकी वजह से उच्च जाति का कोई भी व्यक्ति इनके खिलाफ बोलना या इनकी शिकायत करने से बचता है और यदि शिकायत कर दी भी जाए तो अधिकारी इन पर कोई भी कार्यवाही करने से डरते है|

Mar 1, 2015

दिल्ली में गूंजी राजस्थानी होली गीतों की स्वर-लहरियां

देश की राजधानी दिल्ली के आयानगर खेल परिसर में शनिवार शाम आठ बजे से देर रात तक रामगढ शेखावाटी से आये राजस्थानी कलाकारों ने होली गीतों पर थिरकते हुए शमा बांधे रखी| कार्यक्रम का आयोजन राजस्थानी संस्कृति परिषद, आयानगर दिल्ली द्वारा किया गया| इस अवसर पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में रहने वाले सैकड़ों परिवारों के साथ ही स्थानीय आयानगर निवासियों ने राजस्थानी कलाकारों द्वारा प्रस्तुत नृत्य व गीतों का सुनने का लुफ्त उठाया|

कार्यक्रम अंजनी गनेडीवाल की अध्यक्षता में हुआ जिसमें जोधपुर सांसद गजेन्द्र सिंह शेखावत, सीकर सांसद स्वामी सुमेघानन्द व मौसम विभाग भारत के महानिदेशक डा.लक्ष्मण सिंह राठौड़ विशिष्ठ अतिथि थे| इस अवसर पर स्थानीय विधायक करतार सिंह तंवर, कस्तूरबानगर विधायक एडवोकेट मदनलाल व पूर्व विधायक ब्रह्मसिंह तंवर भी शरीक हुए| सभी अतिथियों का स्वागत राजस्थानी संस्कृति के अनुरूप राजस्थानी साफा पहना व संस्था का प्रतीक चिन्ह देकर किया गया|

शेखावाटी से आये लोक कलाकारों के साथ ही जयपुर से आई प्रसिद्ध राजस्थानी लोक नर्तिका निष्ठा अग्रवाल ने अपनी नृत्य प्रस्तुती से दर्शकों का मन मोह लिया| निष्ठा अग्रवाल ने नुकीली कीलों व दो नंगी तलवारों की धार पर खड़े होकर सिर पर कई मटके रख नृत्य प्रस्तुत किया जिसे देख दर्शक अचम्भित हो गए|
सुजान गढ़ से आये शिव कुमार पारीक ने कार्यक्रम में शानदार मंच संचालन किया वहीं परिषद के कार्यकर्ता सुरेन्द्र शर्मा, रमाकांत पारिक, गोविन्द पारीक, शार्दुल सिंह राठौड़, रामकरण मीणा आदि ने आयोजन को सफल बनाने हेतु कठोर परिश्रम किया|

परिषद अध्यक्ष ओनार सिंह शेखावत ने ज्ञान दर्पण से विशेष बातचीत में बताया कि आधुनिकता की अंधी दौड़ व राजस्थान से दूर रहने के चलते नई पीढ़ी अपनी संस्कृति को भूलती जा रही है| अत: नई पीढ़ी को राजस्थानी संस्कृति से जोड़े रखने व इसका प्रचार-प्रसार करने हेतु उनकी संस्था हर वर्ष होली से पूर्व इस तरह का सांस्कृतिक आयोजन करती है और आगे भी करती रहेगी|


Jan 31, 2015

भोजन में बदलाव से करें मधुमेह का निदान

भारत में मधुमेह रोगियों की संख्या चार करोड़ से अधिक होने के साथ इसका विश्व में पहला स्थान है जो विश्व की कुल पीड़ितों की आबादी का 15 प्रतिशत है। जीवन शैली में आए बदलाव, व्यायाम से दूर भागती पीढी, अंधाधुंध शहरीकरण, कैलोरी की खपत बढ़ना, मोटापा बढ़ना, फास्ट फूड का बढ़ता चलन भारत में मधुमेह की बढ़ती महामारी के मुख्य कारण हैं। दूसरी ओर शारीरिक श्रम वाले कार्यों में आ रही कमी और सेवा क्षेत्र की नौकरियों में बढ़ोतरी, वीडियो गेम्स का बढ़ता चलन, टेलीविजन और कंप्यूटर जिससे लोग घंटों चिपक कर बैठे रहते हैं मधुमेह रोग को बढ़ावा देते हैं।

मधुमेह पर एक करोड़ से ज्यादा पृष्ठों की रपट बनाने व छत्तीसगढ़ के पारम्परिक चिकित्सकों द्वारा मधुमेह के इलाज वाले लाखों फार्मूलों पर शोध कर उन्हें एकत्र करने वाले पंकज अवधिया अपने ब्लॉग पर लिखते है कि भारत में जितने मधुमेह के रोगी है उतने ही मधुमेह को ठीक करने वाले नुस्खे यहाँ मौजूद है. पर अफ़सोस इसके बावजूद मधूमेह रोग भारत में अपने पाँव पसारता जा रहा है. यही नहीं भारत के प्राकृतिक चिकित्सकों का मानना है कि मधूमेह रोग का महज भोजन व दिनचर्या में बदलाव कर शर्तिया निदान किया जा सकता है. लेकिन मधूमेह का रोगी ऐसा कौनसा भोजन ले और कैसी दिनचर्या अपनाई का जाय जिससे मधूमेह के रोगी बिना दवा के इस घातक बीमारी का निदान स्वयं कर सके, बता रहे है फरीदाबाद के प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ महेश चौहान ..

1- सुबह उठने पर दैनिक कार्यों से निवृत होने के बाद एक छोटा सा अदरक का टुकड़ा व तुलसी के दस पत्ते मुंह में डाल कर धीरे धीरे चबायें| पूरा चबाने के बाद नारियल पानी भी ले सकते है|

2- नाश्ते से पहले या सुबह 7-8 बजे के लगभग – 50 ग्राम अंकुरित मूंग दाल, 50 ग्राम नारियल, 20 ग्राम बादाम जो रातभर पानी में भीगें हों, एक बड़ा टमाटर, मध्यम आकार का चकुंदर, एक हरी मिर्च, कुछ धनिया पत्ते व स्वादानुसार नींबू लें. चुकंदर का छिलका उतारें व उसे छोटे छोटे टुकड़ों में काट लें, टमाटर, हरा धनिया, हरी मिर्च आदि भी बारीक़ काट लें और बादाम, अंकुरित मूंग, नारियल के टुकड़े आदि सभी को मिलाकर स्वादानुसार नींबू डाल कर खाएं|

3- इस नाश्ते के दो तीन घंटे बाद यानी 10-11 बजे के घुलनशील कार्बोहाइड्रेट का सेवन करें जो फलों से मिलते है. इसके लिए 300 ग्राम दो तीन प्रकार के खट्टे फलों का चयन करें. और उन्हें धीरे धीरे चबाकर खाएं. 300 ग्राम फल खाने में कम से कम 20 मिनट का समय लगायें|

4- दोपहर के भोजन में कई कटी कच्ची सब्जियों के मिश्रण का सेवन करें जैसे एक बड़ा टमाटर, एक खीरा, 100 ग्राम फ्रेंच बीन्स, 2 बड़ी शिमला मिर्च, 1 हरी मिर्च, 50 ग्राम चने की दाल जो रात में भिगोई हो, धनिया, लहसुन व स्वादानुसार नींबू|

खीरे, टमाटर, हरी व शिमला मिर्च, आदि सभी के छोटे छोटे टुकड़े काटें, भीगी हुई चने की डाल को बीस मिनट धीमी आंच पर भाप में पकाएं और सभी कटी सब्जियां व फल एक बर्तन में मिलाकर स्वादानुसार नींबू डालकर सेवन करें. साथ में टमाटर की चटनी भी खाई जा सकती है|

5- शाम का नाश्ता (5 बजे)- जो फल आपने सुबह नाश्ते में खाए थे, इस समय भी खा सकते है, पर अगर दवा या इंसुलिन लेने का समय है तो दवा या इंसुलिन लेने से पहले ब्लड शुगर का स्तर देखें क्योंकि सुबह और दोपहर के समय उपरोक्त भोजन लेने के बाद ब्लड शुगर के स्तर में अवश्य ही कमी आई होगी|

6- रात का भोजन – रात्री भोजन 8 बजे से पहले कर लेना चाहिए तथा रात्री भोजन में सेवन के लिए दोपहर को जो भोजन सेवन किया वही सेवन करें| उपरोक्त भोजन सेवन करने से पहले मधुमेह की जांच अवश्य करा लें ताकि इसके सेवन के कुछ दिन बाद पुन: जाँच करवाकर मधुमेह के स्तर का पता लगाकर इस भोजन विधि से मिले फायदे का पता चल सके|

ब्लड शुगर को ख़त्म करने के लिए निम्न बातों पर भी ध्यान दें

1. इस तरह के भोजन में ली जाने वाली मात्रा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. डायबिटीज टाइप 1 व 2, दोनों तरह के रोगियों को अपनी आयु, भार तथा लम्बाई के अनुसार निर्धारित मात्रा में भोजन की मात्रा सेवन करनी चाहिए|

2. उक्त भोजन को चबाकर धीरे धीरे खाना चाहिए. आम तौर पर जिस गति से आप खाते है उससे दुगना समय लें और आपको डायबिटीज टाइप 1 है तो भोजन के समय को तिगुना कर दें|

3. भोजन का समय प्रतिदिन एक ही रखें. ज्यादा से ज्यादा पन्द्रह बीस मिनट ही आगा पीछा करें|

4. किसी भी तरह के बाजारू पोषक आहार (फ़ूड सप्लीमेंट), टॉनिक, पाउडर आदि का सेवन बंद कर देना चाहिए|

5. टाइप 1 व 2 के रोगियों को प्रतिदिन कम से कम आधा घंटा सूर्य के प्रकाश से सीधे संपर्क में रहना चाहिए यानी धूप का सेवन अवश्य करें. नारंगी रंग की बोतल में सूर्यतप्त जल का भी सेवन करें|

6. पनीर, दूध, मख्खन, घी, सहित डेयरी उत्पाद, चीनी, नमक, रिफाइंड तेल, बिस्कुट, सॉस, जैम, ब्रेड आदि डिब्बा बंद फास्ट फ़ूड, मछली व अन्य जल जीवों के साथ मांसाहार का पूर्णतया त्याग करें|

7. कम से कम सुबह आधा घंटा या अधिक ऐसा व्यायाम करें जिसमें गहरी सांसे भरने का अवसर मिले यथा- सुर्यभेदी, कपालभाती, नाड़ी शोधन प्राणायाम, महामुद्रा, हलासन, पश्चिमोतानासन, भजंगासन, चक्रासन, मंडूकासन, आदि योगासन लाभप्रद है. सुबह की सैर भी लाभदायक है|

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