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Jun 24, 2016

Maharaj Shakti Singh History in Hindi

यहीं शक्तिसिंह आ के मिला, राम से ज्यों था भरत मिला।
बिछुड़े दिल यदि मिलते हों तो, पगले अब तो मिलने दे।

लेखक :छाजू सिंह, बड़नगर

शक्तिसिंह मेवाड़ के राणा उदयसिंह के द्वितीय पुत्र थे। यह राणा प्रताप से छोटे थे। शक्तिसिंह अपने पिता के समय ही मेवाड़ छोड़कर मुगल दरबार में चले गये थे। शक्तिसिंह के मेवाड़ छोड़ने का कारण अपने बड़े भाई प्रताप से शिकार के मामले में कहासुनी हो गई थी। शक्तिसिंह के अभद्र व्यवहार के कारण उदयसिंह अप्रसन्न हो गए थे। अतः अपने पिता से रुष्ट होकर वह अकबर की सेना में चले गए||

अकबर मेवाड़ पर चढाई करने का इरादा कर धौलुपर में ठहरा हुआ था। जहाँ शक्तिसहि भी उपस्थित थे। एक दिन अकबर ने उनसे कहा कि बड़े-बड़े राजा मेरे अधीन हो चुके हैं, केवल राणा उदयसिंह अब तक मेरे अधीन नहीं हुये, अतः मैं उन पर चढ़ाई करने वाला हूँ, तुम मेरी क्या सहायता करोगे ? यह बात शक्तिसिंह के मन को कचोट गई। उन्होंने सोचा, ‘शाही इरादा तो मेवाड़ पर सेना लेकर चढ़ाई करने का पक्का लगता है। यदि मैं बादशाह के साथ मेवाड़ पहुँचा तो वहाँ लोगों को मन में संदेह होगा कि मैं ही अपने पिता के राज्य पर मुगल बादशाह को चढ़ा लाया हूँ। इससे मेरी बदनामी होगी। अपने चुने हुए साथियों के साथ शाही शिविर छोड़कर वह रातों-रात मेवाड़ आ गये। उन्होंने उदयसिंह को अकबर के चित्तौड़ पर चढ़ाई करने की खबर दी। इस पर सब सरदार दरबार में बुलाए गए। युद्ध से निपटने के लिए मन्त्रणा हुई। उस युद्ध परिषद' में शक्तिसिंह भी शामिल थे। चित्तौड़ में हुए ऐतिहासिक परामर्श के बाद शक्तिसिंह का क्या हुआ था कोई नहीं कह सकता । सम्भव है वह चित्तौड़ के आक्रमण के समय काम आ गये या घायल हो गये| किसी भी ऐतिहासिक ग्रन्थ में इसके बाद उनका नाम नहीं मिलता है|

चारण कवि गिरधर आशिया द्वारा रचित "सगत रासो' से कुछ गुत्थी सुलझती है। यह रचना वि.सं. 1721 (ई.स. 1664) के आसपास की है। लेकिन इसका दिया हुआ घटना क्रम अभी इतिहासकार स्वीकार नहीं कर पाए हैं। सगत रासो के अनुसार चित्तौड़ पहुँचने पर शक्तिसिंह को दुर्ग रक्षकों ने ऊपर नहीं चढ़ने दिया और वह बिना पिता से मिले ही, डूंगरपुर चले गये। वहाँ से भीण्डर के निकट बेणगढ़ जाकर रहने लगे। यहाँ उन्होंने मिर्जा बहादुर की फौज को परास्त किया।

कनल टॉड ने हल्दीघाटी के रणक्षेत्र से राणा प्रताप के लौटने का वर्णन करते हुए लिखा है। जब राणा प्रताप अपने घायल चेतक पर सवार होकर जा रहा थे, तब दो मुगल सवारों ने उसका पीछा किया। वे राणा के पास पहुँचकर उन पर प्रहार करने वाले थे । इतने में पीछे से आवाज आई - ‘‘आो नीला घोड़ा रा असवार।” प्रताप ने मुड़कर देखा तो पीछे उनका भाई शक्तिसिंह घोड़े पर आता हुआ दिखाई दिया। व्यक्तिगत द्वेष से शक्तिसिंह अकबर की सेवा में चले गए थे। और हल्दीघाटी के युद्ध में वह शाही सेना की तरफ से लड़े था। मुगल सैनिकों द्वारा प्रताप का पीछा करना उन्होंने देख लिया, जिससे उसका भ्रातृप्रेम उमड़ आया। शक्तिसिंह ने दोनों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया और प्रताप को अपना घोड़ा दिया। वहीं चेतक घोड़ा मर गया था। जहाँ उसका चबूतरा बना हुआ है।
किसी भी फारसी तवारीख में उल्लेख नहीं है कि शक्तिसिंह ने इस युद्ध में शाही सेना की तरफ से भाग लिया हो और न ही तत्कालीन मेवाड़ के ऐतिहासिक ग्रन्थों में है। हल्दीघाटी युद्ध के बहुत बाद के कुछ ग्रन्थों में इस घटना का जिक्र है। राजप्रशस्ति महाकाव्य जो कि इस युद्ध के लगभग सौ वर्ष बाद का है, उसमें यह घटना है। यह साक्ष्य ठीक नहीं है क्योंकि इतने वर्षों में कई अनिश्चित बातें भी प्रसिद्धि के कारण सही मान ली जाती हैं। शक्तिसिंह के बारे में शाही सेना में शामिल होने व हल्दीघाटी के युद्ध में शामिल होने सम्बन्धी सभी कथाएँ काल्पनिक हैं। शक्तिसिंह अकबर से मानसिंह के मार्फत मिले अवश्य थे, लेकिन वहाँ रुके नहीं वापस लौट आये, हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप का न तो किसी ने पीछा किया और न ही शक्तिसिंह वहाँ थे।

शक्तिसिंह के वंशज शक्तावत सीसोदिया कहलाते हैं। भीण्डर इनका मुख्य ठिकाना है। इनकी उपाधि ‘महाराज' है। ये मेवाड़ में प्रथम श्रेणी के उमराव हैं। मेवाड़ में और भी कई ठिकाने शक्तावतों के हैं। शक्तावतों ने मेवाड़ की सेवा करके नाम कमाया था । हल्दीघाटी के बाद राणा प्रताप के साथ उनके हर सैनिक अभियानों में रहकर मेवाड़ की सेवा की। जहाँगीर के साथ राणा अमरसिंह की लड़ाइयों में ये राणा अमरसिंह के साथ रहे। ऊँटाले के युद्ध में बलू शक्तावत ने अद्भुत पराक्रम दिखाया। ऊँटाले के किले के दरवाजे पर, जिसके किवाड़ों पर तीक्ष्ण भाले लगे हुए थे, हाथी टक्कर नहीं मार रहा था क्योंकि वह मुकना (बिना दाँत का) था। वीर बलू भालों के सामने खड़ा हो गया और महावत को कहा कि अब टक्कर दिला। वीर बलू इस तरह से वीरतापूर्वक काम आया। ऊँटाले पर अमरसिंह का अधिकार हो गया। विपद काल में मेवाड़ के राणाओं की सेवा के कारण शक्तावतों का यशोगान हुआ है। शक्तावत अपनी शूरवीरता के कारण इतिहास में प्रसिद्ध हैं।


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Jun 23, 2016

Raja Mansingh,Amer History in Hindi, Raja Mansingh of Amer

ये लाल किले ये मोती मस्जिद हाय-हाय क्या सुना रही।
काबुल में जाकर के देखो कबरें अब भी सिसक रही।।


लेखक : छाजू सिंह, बड़नगर

राजा मानसिंह आमेर के राजा भगवन्तदास कछावा के बड़े पुत्र थे। इनका जन्म वि.सं. 1607 पोष बदि 13 (ई.स. 1550 दिसम्बर 21) को हुआ था। ये बारह वर्ष की उम्र में ई.स. 1562 में शाही सेवा में चले गए थे। अकबर बादशाह ने चित्तौड़ पर हमला किया तब ये भी बादशाह के साथ थे। वि.स. 1633 ज्येष्ठ सुदी द्वितीया (ई.स. 1576 जून 18) में हुए हल्दीघाटी के युद्ध में मानसिंह मुगल सेना के सेनापति थे, जिसमें शाही सेना को विजय प्राप्त हुई। मानसिंह जी शाही सेवा में रहते हुए कई सूबों के सूबेदार रहे। ये पंजाब, बिहार, बंगाल, काबुल आदि सूबों के सूबेदार रहे। काबुल में विभिन्न अफगान कबीलों का दमन किया।

राजस्थानी योद्धाओं में अपराजित कहे जाने वाले चन्द नाम ही गिनाए जा सकते हैं, जिन्होंने अपने जीवन में कोई युद्ध हारा ही नहीं। उनमें मानसिंह जी का भी एक नाम है जिन्होंने 77 बड़े युद्ध लड़े थे। उत्तर भारत में ये जहाँ भी युद्ध करने गए उस राज्य को जीता। अगर वहाँ का शासक हिन्दू था तो उससे अधीनता स्वीकार करवा कर, कर वसूल किया, उसे पूरी तरह से नष्ट नहीं किया । जहाँ शासक मुस्लिम थे उनका राज्य छीन कर अपने विश्वासी राजपूत को सौंप दिया। जिसका उदाहरण आज भी बिहार, बंगाल, उड़ीसा में बहुत से राजपूत हैं जो उनके समय में राजस्थान से गए थे।

मानसिंह की राणा प्रताप से कोई द्वेष भावना नहीं थी। हल्दीघाटी के युद्ध में विजयी होने पर उन्होंने न तो मेवाड़ को लूटने का आदेश दिया और न ही राणा प्रताप व उसकी सेना का पीछा करने का आदेश दिया। यही नहीं प्रताप का पीछा करने वाले सैनिकों को रोका भी। मानसिंह द्वारा प्रताप के प्रति किए गए इस व्यवहार की शिकायत अकबर से की गई, जिसके कारण अकबर मानसिंह से नाराज हुआ।
मानसिंह सनातन धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने वृन्दावन में गोविन्ददेव जी का मन्दिर बनवाया जो बड़ा विशाल तथा सुन्दर शिल्पकला का नमूना है। आमेर के महल पहले नीचे थे। राजा मानसिंह जी ने पहाड़ के ऊपर नए सुन्दर महल बनवाए जो आज भी पर्यटकों के आकर्षण के केन्द्र हैं। आमेर में जगत शिरोमणि जी का विशाल मन्दिर बनवाया। देश के दूसरे हिस्सों में भी इन्होंने मन्दिर और महल बनवाए। मानसिंहजी ने बंगाल और बिहार में अनेक मन्दिर बनवाए। बनारस में मान मन्दिर तथा घाट बनवाया।
मानसिंह जी का स्वर्गवास दक्षिण में इलीचपुर में वि.सं. 1671 आषाढ सुदी 10 (ई.स. 1614 जुलाई 6) को हुआ।

मानसिंह जी ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए जो योगदान दिया है उसका पूरा देश ऋणि है। उस योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है। मुस्लिम आक्रान्ता उस समय लगातार दल-के-दल भारत में आ रहे थे। उनका उद्देश्य लूटपाट करना और यहाँ पर मुस्लिम धर्म स्थापित करना था। उन्होंने कुछ समय में ही पूरे मध्य एशिया को शत प्रतिशत मुस्लिम बना लिया था लेकिन वे भारत में सफल नहीं हो सके।

महमूद गजनवी के समय से ही आधुनिक शस्त्रों से सज्जित यवनों के दलों ने अरब देशों से चलकर भारत पर आक्रमण करना शुरू कर दिया था। ये आक्रान्ता काबुल (जहाँ आज अफगानिस्तान है) होकर देश में आते थे। वहाँ पर उस समय पाँच मुस्लिम राज्य थे, जहाँ पर भारी मात्रा में आधुनिक शस्त्रों का उत्पादन किया जाता था। वे भारत पर आक्रमण करने वाले आक्रान्ताओं को शस्त्र प्रदान करते थे व बदले में भारत से लूटकर ले जाए जाने वाले धन का आधा भाग प्राप्त करते थे। इस प्रकार काबुल का यह क्षेत्र उस समय बड़ा भारी शस्त्र उत्पादक केन्द्र बन गया था। जिसकी मदद से पहले यवनों ने भारत में लूट की व बाद में राज्य स्थापना की चेष्टा में संलग्न हुए।
इतिहासकारों ने इस बात को छुपाया है कि बाबर के आक्रमण से पूर्व बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू शासकों के परिवारजन व सेनापति राज्य के लोभ में मुसलमान बन गए थे व यह क्रम बराबर जारी था। ऐसी परिस्थिति में आमेर के शासक भारमलजी व उनके पौत्र मानसिंहजी ने मुगलों से सन्धि कर अफगानिस्तान (काबुल) के उन पाँच यवन राज्यों पर आक्रमण किया व उन्हें इस प्रकार तहस-नहस किया कि वहाँ आज तक भी राजा मानसिंह के नाम की इतनी दहशत फैली है कि वहां की स्त्रियाँ अपने बच्चों को राजा मानसिंह के नाम से डराकर सुलाती हैं। मानसिंह ने वहाँ के तमाम हथियार बनाने के कारखानों को नष्ट कर दिया व श्रेष्ठतम हथियार बनाने वाली मशीनों व कारीगरों को वहाँ से लाकर जयगढ़ (आमेर) में शस्त्र बनाने का कारखाना स्थापित करवाया। इस कार्यवाही के परिणाम स्वरूप ही यवनों के भारत पर आक्रमण बन्द हुए व बचे-खुचे हिन्दू राज्यों को भारत में अपनी शक्ति एकत्र करने का अवसर प्राप्त हुआ।

मानसिंहजी की इस कार्यवाही को तत्कालीन संतों ने पूरी तरह संरक्षण दिया व उनकी मृत्यु के बाद हरिद्वार में उनकी स्मृति में हर की पेड़ियों पर उनकी विशाल छतरी बनवाई। यहाँ तक कि अफगानिस्तान के उन पाँच यवन राज्यों की विजय के चिन्ह स्वरूप जयपुर राज्य के पचरंग ध्वज को धार्मिक चिन्ह के रूप में मान्यता प्रदान की गई व मन्दिरों पर भी पचरंग ध्वज फहराया जाने लगा। मानसिंह ने उड़ीसा में पठानो का दमन कर जगन्नाथपुरी को मुसलमानों से मुक्त कर वहाँ के राजा को प्रबन्धक बनाया। हरिद्वार के घाट, हर की पैडियों का भी निर्माण मानसिंह ने करवाया। आज भी लोगों की जबान पर सुनाई देता है

‘‘माई एड़ौ पूत जण, जै ड़ो मान मरद।
समदर खाण्डो पखारियो, काबुल पाड़ी हद।’


नाथ सम्प्रदाय के लोग "गंगामाई" के भजनों में धर्म रक्षक वीरों के रूप में अन्य राजाओं के साथ राजा मानसिंह का यशोगान आज भी गाते है|

इस प्रकार मानसिंह के सद प्रयत्नों से मुसलमानों की भारत के इस्लामीकरण की योजना हमेशा के लिए दफ़न हो गई| पर अफ़सोस जिस मानसिंह को तत्कालीन हिन्दू संतों ने हिन्दुत्त्व का रक्षक माना, उसी मानसिंह को आज के मुगलों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित कथित हिन्दुत्त्ववादी मानसिंह की आलोचना करते है|


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Jun 21, 2016

Why Yoga?

सुखी जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है- स्वस्थ शरीर ! और हो भी क्यों न, स्वास्थ्य के साथ ही सभी सुख जुड़े हुए हैं। जीवन सुखमय बना रहे-यही प्रयत्न हर क्षण होना चाहिए। हम स्वस्थ हैं तो कठिनाई भी सरलता से हल हो जाएगी। इसके विपरीत स्वस्थ न होने पर बड़ा सुख भी छोटा ही लगता है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति का यह नैतिक कर्त्तव्य है कि अपने को बीमारी से दूर रखे, दूसरों को समय देने के साथ-साथ अपने-आपको भी समय दे। अच्छे स्वास्थ्य के तीन लक्षण हैं—अच्छी नींद, अच्छी भूख, अच्छा पसीना।

नींद में हमारा शरीर विकास करता है। दिन में कार्य करते समय जो शक्ति का ह्रास और टूट-फूट होती है, उस कमी को नींद पूरी कर देती है। मरम्मत का यह स्वाभाविक नियम है। आराम के दौरान थकान दूर होने के साथ ही तनावग्रस्त मांसपेशियाँ स्वाभाविक रूप में आ जाती हैं; हड्डियों का ढाँचा, हृदय, स्नायुतन्त्र, फेफड़े आदि आराम से अपनी क्षीण हुई शक्ति को पुनः प्राप्त करते हैं। इसी प्रकार ठीक भूख लगने पर जब भोजन किया जाता है तो वह रस में परिवर्तित हो रक्त, मांस आदि में बदलकर शरीर को हृष्ट-पुष्ट बनाता है। वास्तविकता यह है कि स्वास्थ्य चेहरे पर झलक जाता है। अब शेष रहा स्वास्थ्य का तीसरा लक्षण-अच्छा पसीना ! पसीने का सम्बन्ध शरीर की गन्दगी निकालने से है। व्यायाम द्वारा निकाला गया पसीना त्वचा को सौम्य, चमकीला व खिचा हुआ रखता है। साधारणतया आज व्यक्ति समय से पहले ही

अपने को बूढ़ा व थका हुआ अनुभव करने लगा है। साथ ही उसके चेहरे व शरीर पर भी असमय ही बुढ़ापे का प्रभाव झलक जाता है। शरीर में शिथिलता, मन में साहस न होने के कारण शक्ति का अभाव, मानसिक तनाव और अशुद्ध वातावरण व्यक्ति को उम्र से पहले बुढ़ापे के दर्शन करा देते हैं । हम स्वस्थ बने रहें, इसके लिए तीन बातों की आवश्यकता है—
1. मन में शान्ति रहे जिससे प्रसन्नता आना स्वाभाविक है।
2. ईश्वर की सत्ता में पूर्ण आस्था रहे।
3. अपनी क्षमता पर पूर्ण विश्वास रखें।

अगर हम अपने शरीर के आसपास के वातावरण को अपने अन्दर से ही नियन्त्रित कर लें तो हम लम्बे समय तक युवा बने रह सकते हैं। युवा दिखने के साथ अनुभव करना और भी आनन्ददायक है। आज 30-35 आयु के स्त्री-पुरुषों को ही नहीं, बल्कि 18-20 आयु के युवक-युवतियों को भी त्वचा की परेशानियाँ हैं। मुँहासे तो युवावस्था के आगमन का चिह्न हैं वे तो स्वाभाविक हैं, लेकिन चेहरे की झुर्रियाँ और कई प्रकार के धब्बे पूरी तरह अस्वाभाविक हैं। झुर्रियाँ और त्वचा लटक जाना ढलती उम्र में तो होता ही है, लेकिन तब भी बहुत हद तक यह हमारे हाथ में है कि हम किस प्रकार अपनी त्वचा व अपने शरीर की देखभाल करते हैं। उम्र का अन्दाजा चेहरे से लगता है और चेहरे में भी ऑखों व गर्दन से। आँखों की चमक कम हो जाना, त्वचा में झुर्रियाँ पड़ जाना, त्वचा लटक जाना, पूरे चेहरे से तेज गायब हो जाना-वर्तमान समय में बूढ़ी होती जवानियों की आम पहचान बन गई है। यदि अभी आप युवा हैं, परन्तु आपके चहरे की कांति खो गई है, शरीर तथा चेहरा झुर्रियों से भर गया है, त्वचा की कसावट शिथिल हो। गई है, तो आपको इनसे मुक्ति पाने के लिए अपने जीवन-जीने का ढंग बदलना होगा। अपने भोजन में कुछ परिवर्तन करें, प्रतिदिन यौगिक क्रियाएँ करें, मन को प्रसन्न रखें और विशेषतौर पर अपने चिन्तन में

बना लेते हैं। यदि उन रोगों को तत्काल शरीर से बाहर निकालने का प्रयत्न करते हैं जिससे शरीर कमजोर होता चला जाता है। शरीर की रोगों से लड़ने की शक्ति दिन-प्रतिदिन क्षीण होती चली जाती है और अन्त में उस जर्जर शरीर को अस्पताल की शरण लेनी पडती है, जहाँ धन तथा समय की बर्बादी होती है और भरी जवानी में बुढापा आ जाता है। अगर आप समय रहते योगासनों के प्रति ध्यान दें तो आप शारीरिक एवं मानसिक रूप से ही नहीं, अपनी कार्यशैली में भी जवान दिखेंगे; स्फूर्ति, शक्ति और आनन्द 24 घण्टे महसूस कर आज के समय में व्यक्ति अपने से ज्यादा प्यात अनेक और व्यापार को देते हैं। सारा समय यह बुद्धि और मानसिक शक्ति, धन कमाने में ही लगा देते हैं। यह एक निवेश है जो व्यापार को उन्नति के शिखर पर पहुँचा देता है। मैं मानता हूँ कि आप अगर पूर्ण निष्ठा से अपने कार्य को समर्पित हैं तो सफलता अवश्य मिलेगी और आप उच्चशिखर पर पहुँच जाएँगे। लेकिन यदि इस प्रक्रिया में आप अपना स्वास्थ्य खो बैठे तो उन्नति का शिखर अवनति के रसातल में भी बदल और आपका कार्य भी रूप से चलता रहे ।

तो क्या करें? अगर आप देखते हैं कि आपकी परिस्थिति उपरोक्त प्रकार की है तो अपने काम और स्वयं अपने में संतुलन खोजें। शरीर और कर्म में तारतम्यता होनी जरूरी है। समय में बँधकर नहीं समय को अपने अनुसार बाँधकर काम करें तो अधिक ठीक होगा। समय को अपने अनुसार बाँधकर आप अपने जीवन को सन्तुलित बनाएँ तब ठीक अर्थों में आप व्यापार में सफल होंगे। क्रिया की प्रतिक्रिया अवश्य होती है-यह प्रकृति का नियम है। जब हम क्रियात्मक रूप में आसन करते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया हमारे शरीर के एक-एक अंग पर पड़ती है। इसलिए अगर आप प्रतिदिन केवल 20 से 30 मिनट तक योगासन के लिए दें तो आप अपने शरीर में क्रान्तिकारी परिवर्तन देखेंगे-रोगों से मुक्त, खिला हुआ आपका चेहरा, आपके परिवार को भी स्वस्थ बनाएगा। एक पशु जानता है कि उसे कितना खाना है, कितना सोना है और अपने शरीर से कितना कार्य लेना है। वह शरीर को उसी सीमा तक प्रयोग में लाता है जिस सीमा तक वह सुखपूर्वक आराम से आनन्द में बना रहे। जहाँ उसे अपने में असंतुलन दिखाई देने लगे वहीं वह चिन्ता शुरू कर देता है। विद्रोह उत्पन्न कर अपने बाहरी व भीतरी वातावरण को सन्तुलित कर लेता है, अपने शरीर के तापमान को बाहरी तापमान से मिला लेता है। कुत्ता अपनी खाँसी को जंगली घास खाकर भगा देता है। बिल्ली सोने के बाद उठकर अपने शरीर को खींचकर हड्डियों को लचीला बना लेती है। शेर अपने अधिकार के लिए दहाड़कर आवाज को जोशीला रूप देता है। नाग अपने फन को उठाकर अपनी मांसपेशियों को मजबूत बना लेता है। मगरमच्छ ऊपर से कठोर लेकिन ठण्डे रेत पर पड़े रहने से अपने पेट को मुलायम रखता है क्योंकि उसे जटिल से जटिल वस्तुओं को पचाना होता है। तितली अपने हल्के पंखों के कारण अपने जोड़ों को लचीला बनाए रखती है। मेंढक सदा दो पैर पेट के बीच में रखने से अपने पाचन-तन्त्र को ठीक बनाकर रखता है क्योंकि उसकी रीढ़ की हड्डी की स्थिति सभी से अलग होती है। पक्षी भारी होते हुए भी लम्बी से लम्बी यात्रा बिना रुके कर लेते हैं। जब यह खोज ऋषियों ने की तो उन्होंने इन जीवों की आकृति को उनके कार्य करने के ढंग को, देख-परखकर इसे आसनों का रूप प्रदान किया जिससे हम मनुष्य भी यह गुण अपने शरीर के द्वारा जीवन मैं ढालकर स्वास्थ्य के सागर में डुबकी लगा सकें।
हम सभी प्रायः देखते हैं कि जो जीव जंगल में अपने बल पर रहते हैं वे रोगी कम होते हैं। अगर कभी रोगी हो भी जाते हैं तो प्राकृतिक नियमों का पालन करते हैं। प्रकृति स्वयं उनके रोगों को हर लेती है। उन जीवों को मनुष्य की तरह अस्पताल की जरूरत नहीं होती न ही दवाओं की और न ही अन्य भौतिक साधनों की। अगर दो जीव जंगल में भिड़ जाते हैं और स्थिति यहाँ तक हो जाए कि एक दूसरे के शरीर से खून की धार फूट पड़ी और दोनों घायल हो जाएँ तो उन्हें किसी चिकित्सालय में जाने की जरूरत नहीं पड़ती। वे प्राकृतिक उपायों को अपनाकर अपनी चिकित्सा स्वयं कर लेते हैं। ये उपचार वे मिट्टी से, झरनों के पानी से, सूरज की धूप व शुद्ध हवा से करते हैं।

वही प्रकृति, वही स्थिति, मनुष्य के लिए भी है। पशु-पक्षी, जीव-जन्तु एवं हम सभी पंचतत्त्वों की उपज हैं। मनुष्य, बुद्धि के कारण दूसरे जीवों से श्रेष्ठ कहा जाता है। वास्तविकता है भी यही कि मनुष्य जो चाहे अपने लिए कर सकता है। अगर वह सुखी रहना चाहे तो उसी के हाथ में सुख का नियन्त्रण मन्त्र (रिमोट) है। किसी से अगर पूछा जाए कि क्या ओप सुखी रहना चाहते हैं? क्या आप चाहते हैं कि आपका जीवन आनन्द से भर जाए? आप सारा जीवन सदा मुस्कराते रहें? तो सभी का उत्तर ‘हाँ' में ही मिलेगा। सभी सुख के भिखारी हैं। मनुष्य के पास बुद्धि है उसने अपनी बुद्धि से विज्ञान की नई-नई खोज की, ऐसे आविष्कार किए जिनसे मानव-समाज सुखी हुआ। तेज रफ्तार की गाड़ियों का आविष्कार, मोबाईल, राकेट, अन्तरिक्ष तकनीक इत्यादि हमने कितने आविष्कार किये हैं और न जाने आगे कितने और करेंगे। सभी कुछ हमने अपनी सुख-सुविधा के लिए किया है।

क्या हमने कभी सोचा है कि कम्प्यूटर सर्जरी से हृदय प्रत्यारोपण (Heart Transplantation), गुर्दा (Kidney) बदलना या फिर गले से आवाज के लिए Wall की जरूरत क्यों पड़ी ? शरीर में इतने भयंकर रोगों ने कहाँ से जन्म ले लिया और हमें पता भी नहीं चला। हजारों हस्पताल, डॉक्टर, नसिंग होम, स्वास्थ्य संस्थान-चिकित्सा में लगे हैं फिर भी लोग रोज नए-नए रोगों का शिकार होकर मृत्यु के ग्रास बन रहे हैं।

ऐसी नई बीमारियों को, जिनका नाम कभी सुना भी न था, हम देख रहे हैं ? मनुष्य ने अपनी बुद्धि से विकास तो किया लेकिन क्या लाभ ऐसे बाहरी विकास का जो बाहर से और भीतर से मनुष्य को बीमार, लाचार, अपंग बना दे। अगर विकास से मनुष्य के शरीर व मन पर बुरा प्रभाव न पड़े और वह साथ ही प्रकृति के अनुकूल भी हो, तो उचित है। लेकिन जिस विकास से शरीर में रोग उत्पन्न होने लगें या फिर प्रकृति में हानि दिखे तो ऐसे विकास का क्या लाभ ? जो स्वस्थ है वह कुछ भी न होते हुए दुनिया का सबसे सुखी व्यक्ति है, जो बीमार है वह संसार का सबसे दुखी व्यक्ति है। सुख का आधार भौतिक विकास नहीं, स्वस्थ शरीर व मन है।

स्वस्थ व्यक्ति ही संसार में सबकुछ प्राप्त कर सकता है और संसार के सारे सुख-वैभव का भोग कर सकता है।


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