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इतिहास व महापुरुष हथियाने की कोशिश

भारत में सदियों से जाति व्यवस्था रही है। सभी जातियां अन्य दूसरी जातियों का सम्मान करते हुए, एक साझी संस्कृति में प्रेमपूर्वक रहती आई है। देश के महापुरुष भले किसी जाति के हों, वे सबके लिए आदरणीय व प्रेरणास्त्रोत होते थे। लेकिन आजादी के बाद देश के नेताओं ने एक तरफ जहाँ जातिवाद खत्म करने की मोटी मोटी बातें की, वहीं वोट बैंक की फसल काटने हेतु जातिवाद को प्रत्यक्ष बढ़ावा दिया। जिससे कई जातियों में प्रबल जातीय भाव बढ़ा और वे दूसरी जातियों पर राजनैतिक वर्चस्व बनाने के लिए लामबंद हो गई। नतीजा जातीय सौहार्द को तगड़ा नुकसान पहुंचा। महापुरुषों को भी जातीय आधार पर बाँट दिया गया। आजकल यह रिवाज सा ही प्रचलित हो गया कि महापुरुषों की जयन्तियां व उनकी स्मृति में आयोजन उनकी जाति के लोग ही करते है, बाकी को कोई मतलब नहीं रह गया।
ऐसे में बहुत सी ऐसी जातियां, जिनकी जाति में कोई महापुरुष पैदा नहीं हुए वे अपना मनघडंत इतिहास रचकर अपनी जाति के नए नायक व महापुरुष घड़ने में लगे हैं। यही नहीं अपने जातीय अहंकार के लिए महापुरुष घड़ने की इस श्रृंखला में बहुत सी जातियां देश के इतिहास में प्रसिद्ध महापुरुषों, योद्धाओं को अपना प्रचारित कर उन पर कब्जा जमाने की कोशिशों में जुटी है। कहीं मिहिरभोज को गुर्जर सम्राट प्रचारित किया जा रहा है, तो कहीं सुहैलदेव बैस को सुहैलदेव पासी या सुहैलदेव राजभर प्रचारित करने पर विभिन्न जातियों में झगड़ा चल रहा है। यही नहीं राठौड़ वीर दुर्गादास व इतिहास प्रसिद्ध हम्मीर हठी तक पर राजपूतों से इतर जातियों द्वारा दावा ठोका जा रहा है कि वे राजपूत नहीं, हमारी जाति के थे।

सोशियल मीडिया के बढ़ते चलन के बाद यह समस्या आम राजपूत युवा के सामने है, राजपूत युवा इस समस्या से परिचित व त्रस्त है और अपने पूर्वजों को दूसरी जातियों द्वारा हथियाने जाने के खिलाफ सोशियल मीडिया में तीखी प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर रहा है।

पर क्या आपने सोचा कि इस समस्या का जिम्मेदार कौन है? समस्या के समाधान के लिए यदि आप अपने अंतर्मन में झांकेंगे तो पायेंगे कि इस समस्या का कारण भी हम ही हैं। हमने ही अपने महान पूर्वजों को भुला दिया, अपने आदर्श छोटे कर लिए और मध्यकाल के एक आध क्षत्रिय महापुरुष की जयंती मनाकर, अपने आपको धन्य समझते हुए, अपने महान पूर्वजों को याद करना छोड़, उन्हें लावारिश छोड़ दिया। आप जानते ही होंगे कि लावारिश हालात या सूनी पड़ी किसी भी वस्तु पर कोई भी अधिकार जमा लेता है। ठीक इसी तरह हमने अपने जिन महान पूर्वजों को भुला दिया, उनकी याद में कोई आयोजन नहीं करते, उनका इतिहास नहीं लिखते, यदि किसी ने लिखा है तो उसकी लिखी पुस्तक तक नहीं खरीदते, तो ऐसी हालात में अन्य जातियां उन्हें अपना बता कब्जा करेंगी ही। आखिर उन्हें भी तो अपनी जाति को महान इतिहास से जोड़ना है। रही सही कसर राजनेता पूरी कर देते है, वोट बैंक के लालच में वे उस जाति का समर्थन करते हुए उनके द्वारा हथियाये महापुरुष को उनका पूर्वज घोषित करते हुए बयान जारी कर देते है या उनकी याद में कोई स्मारक आदि बनवा देते है।

इस समस्या के समाधान के लिए हमें अपने अपने क्षेत्रों के स्थानीय महापुरुषों की जयन्तियां मनानी होगी, उनकी याद में अनेक कार्यक्रम आयोजित करने होंगे, ताकि अन्य जातियों को इतिहास के साथ छेड़छाड़ कर उन्हें अपना घोषित कर पाने का मौका ना मिले। आज हरियाणा में महाराणा प्रताप की जयंती से ज्यादा आवश्यकता हरराय चौहान पर समारोह आयोजित करने की है। आज हरराय चौहान के वंशज ही नहीं जानते कि हरयाणा के संस्थापक राजा हरराय चौहान थे, तो दूसरों से क्या उम्मीद रखी जाय। यदि हरयाणा में हर वर्ष हरराय चौहान पर बड़ा आयोजन हो तभी लोगों को पता चलेगा कि यह प्रदेश हरराय चौहान का हरयाणा है, हरराय चौहान हरयाणा के संस्थापक है। ठीक इसी तरह अन्य प्रदेशों में भी वहां के महान शासकों की याद में कार्यक्रम आयोजित होने चाहिए, उनकी स्मृति में सामुदायिक भवनों का नामकरण होना चाहिए। पत्र-पत्रिकाओं व इंटरनेट पर उनके बारे में अनेक लेख प्रकाशित करने चाहिए, ताकि देश के हर नागरिक को पता हो कि फलां महापुरुष फलां राजपूत था।
यदि ऐसा होता है तो महापुरुषों को अन्य जातियों द्वारा हथियाने जाने वाली यह समस्या अपने आप खत्म हो जायेगी।

आतम औषध

मौसम विभाग, भारत के पूर्व महानिदेशक ड़ा.लक्ष्मण सिंह राठौड़ की कलम से....
स्वामी सम्पूर्णानन्द बाल्यकाल से ही शुक्र-ज्ञानी तथा वाकपटु थे| माँ-बाप का दिया नाम कोजा राम था| प्यार से लोग उन्हें कोजिया बुलाते थे| पर वे अपने आप को बचपन से ही सुन्दर व सम्पूर्ण मानते थे| इसलिए शिक्षा में विशेष रूचि नहीं रखते हुए अल्प आयु में ही बोध-ज्ञान मार्ग पर प्रशस्त हो गए थे| आठवीं कक्षा में अन्नुतीर्ण रहने के पश्चात्, वे चौसठ कलाएं सीखने में व्यस्त हो गए| अल्प समय में ही सभी विद्ध्याओं में निष्णात प्राप्त कर ली| परन्तु अति-विशिष्ट बीस एक विद्याओं जैसे कि गान, नृत्य, नाट्य, जल को बांधना, विचित्र सिद्धियाँ दिखलाना, इंद्रजाल-जादूगरी, चाहे जैसा वेष धारण करना, कूटनीति, ग्रंथ पाठन चातुर्य, तोता-मैना बोलियां बोलना, शकुन-अपशकुन जानना, शुभ-अशुभ बतलाना, सांकेतिक भाषा बनाना, नयी-नयी बातें निकालना, छल से काम निकालना, वस्त्रों को छिपाना या बदलना, द्यू्त क्रीड़ा, तंत्र-मन्त्र, विजय प्राप्त करवाना, भूत-प्रेत आदि को वश में करना इत्यादि में वाचस्पति हासिल कर ली| ज्ञान एवं कला की इस प्रतिमा को नासमझ लोग लम्पट समझने लगे| इस प्रसिद्धी के फलस्वरूप सगाई-ब्याह से वंचित रहे| मांस-मदिरा के धुर विरोधी कोजिये की संगत में ऐसे ही अन्य मित्र भी जुट गए| संगत में केवल उन्ही दोस्तों को तरजीह दी जाती जो मांसाहार से परहेज रखते तथा शुद्ध शाकाहारी तत्व जैसे गांजा, अफीम इत्यादि के सेवन द्वारा ही ध्यान साधना करते| जाति धर्म का कोई बंधन नहीं| सदस्यता की पात्रता विचारों के मेल तथा मण्डली के प्रति सत्यनिष्ठा पर आधारित थी| वे कर्म-कांडों के पाखण्ड से दूर, सत्य की खोज तंत्र-ज्ञान द्वारा करने लगे| श्रम से पूर्ण परहेज था अतः आय का साधन नहीं था| फलस्वरूप जीवकोपार्जन कठिन था| घर वालों के तमाम उलाहनों के बावजूद बड़ा दिल रखते हुए उनकी नादानियों का कभी बुरा नहीं मानते थे| बिना श्रम के बना-बनया खाना इत्यादि जो मिल रहा था| परन्तु मुख्य परेशानी मंडल-संगत आयोजन हेतु निरंतर बढ़ते आर्थिक बोझ को लेकर रहती थी|

एक दिन शुभ-घड़ी में घर वालों की अज्ञानता व गाँव वालों की हेयता को क्षमा प्रदान कर, मुफ्त मिल रही तमाम सुविधओं का त्याग कर, सिद्धि प्राप्ति हेतु बोध-मार्ग पर चल पड़े| बाहरी आवरण बदल कर सुदूर एक पर्वतीय वन में अवस्थित एक मठ में शरण ली| चूँकि चिलम भरने की कला में पारंगत थे, अल्प अवधि में ही वहां स्थान पक्का हो गया| दुखी जनों की मानसिक कमजोरियों को भांपने की विशिष्टता तथा वाक पटुता के माध्यम से मेहर बरसाने की दक्षता, उन्होंने मठ में आने वाले साधकों पर प्रयोग करते हुए प्राप्त की| धीरे-धीरे इनके आशीर्वचन से कई लोगों को आर्थिक एवं स्वास्थ्य लाभ होने लगा| कौशल प्राप्ति के प्रारंभिक लाभार्थी उनकी अपनी मण्डली के गण ही थे| इन उपलब्धियों का झूठा-सच्चा परन्तु अच्छा प्रचार-प्रसार किया गया| एकाध सटीक टोटके के कारण लोग फंसने लगे तथा कुछ समय पश्चात् नामचीन हो गए| अब कोजा राम, स्वामी सम्पूर्नानद के नाम से विख्यात हो गए| मजमा दिनों-दिन बढ़ने लगा| प्रसिद्धी का विकास क्रम तेजी से उत्कर्ष उन्मुख होने लगा| परन्तु असली प्रसिद्धि दो एक निसंतान दम्पतियों को औलाद सुख प्रदान करने से हुआ| एक बार एक आस्थाशील साधिका को बिना मांगे पुत्र-प्रसाद देने के फेर में काफी हील हुज्जत हुयी| बाद में सिद्ध कर दिया गया कि महिला ही चरित्रहीन थी| तदुपरांत दुःख निवारण सदकार्य काफी संभल कर करने लगे| अब वे प्रवचन व चौमासा करने लगे थे| कुछ ही दिनों में शास्त्र पठन-वमन करते-करते अपना अलग मठ स्थापित कर स्वयं महंत बन गए| चेलों की फौज तैयार करली| धन बहने लगा व महंत जी तैरने लगे| अब पैसा साधकों का, लंगर महंत जी का| दिन रात का भंडारा चल निकला| एक स्थानीय नेता जो राज्य सरकार में मंत्री थे, वे भी मत्था टेकने आते थे|

आश्रम के पडोसी गाँव में अवधेश नमक युवक रहता था| विलक्षण बुद्धि का धनी अवधेश पढाई में हमेशा अव्वल आता था| जब नौकरी हेतु रोजगार बाजार में उतरा तो असफलता हाथ लगी| उसके अधिकांश सहपाठी अपना व्यवसाय अथवा रोजगार प्राप्त कर अपने घर बसा चुके थे| कुछ एक सहपाठी जो पढाई में अत्यंत कमजोर थे, सरकारी नौकरियां शीघ्र प्राप्त कर उच्च पदों पर आसीन हो चले थे| अपने से कम प्रतिभाशाली साथियों की उपलब्धियां इस बेरोजगार युवक को कुंठा प्रदान कर गयी| फलस्वरूप वह उलटे-सीधे हाथ मरने लगा| मजबूरी-वश गलत रास्ते पर उन्मुख हो गया| पर हर वक्त संस्कार आड़े आ जाते थे, सो निराशा बढती गयी| हताशा व निराशा की जकड में आकर किये गलत कार्यो के कारण परिवार-प्रतिष्ठा पर लगने वाले बट्टे के कारण उसे अपने आप से ग्लानी होने लगी| कालन्तर पश्चात् संयोग से युवक अवधेश, भूले से स्वामी सम्पूर्णानन्द की झोली में आ फंसा| मुंडन पश्चात नाम-दान प्रदान कर अवधेशानंद में रूपांतरित कर दिया गया| अपने गुरु की असीम सिद्धियों से प्रभावित युवा सन्यासी उनमें इश्वर की छवि देखता था| ऊम्र, जाति अथवा लिंग से परे, विरक्ति के अनेकों-अनेक कारण बड़े विचित्र होते हैं| कभी सुख-सम्पन्नता तो कभी दुःख-दरिद्रता| सुख त्याग कर मोक्ष मार्ग पर चलने वाले सभी लोग बुद्ध-महावीर नहीं बने तो भी समाज में सुख शांति हेतु अच्छे कार्य किये| ऐसे सन्यासियों के ठीक उलट, लम्पट योगी-गण भोले-भाले जन की भावनाओं का व्यापर करते हैं, जिससे लोगों का धर्म से विश्वास कम होता है| अवधेश पर गुरु-पाश प्रभावी अवश्य था, पर आश्रम के कार्य-कलाप उसे अक्सर परेशान करते थे| अतः वह यहाँ भी खुश नहीं था|

आश्रम के पास के एक अन्य गाँव में भोम सिंह का किसान-परिवार रहता था| कुल पच्चीस बीघा जमीन थी सो नाम भी सार्थक था| प्रगतिशील एवं मेहनती किसान होने के बावजूद माली हालत जर्जर ही थी| परिवार में पत्नी के अलावा एक पुत्र व एक पुत्री थी| बेटे ने गाँव के ही स्कूल से दसवीं कक्षा अच्छे अंको से उत्तीर्ण की| खेल कूद में भी अव्वल था| आगे पढना चाहता था पर गाँव से बाहर की पाठशाला में भेजने का मतलब, अतिरिक्त आर्थिक बोझ| यह परिवार के आर्थिक सामर्थ्य के बाहर का विषय था| खेती से गुजारा मुश्किल हो रहा था, सो तय पाया की नौकरी ढून्ढ़ी जावे| होम गार्ड में भर्ती निकली हुयी थी| स्वजातीय नेता ने निस्वार्थ मदद का भरोसा दिलाया| नेताजी ने बताया की उन्हें कुछ नहीं चाहिए, पर ऊपर जो देना होता है, उसके बिना काम नहीं बनने वाला| भारतीय किसान के पास कोई बचत तो होती ही नहीं, सो भोम सिंह पर कहाँ होती| पैसे के नाम पर उसके पास अन्य किसानों की भांति ऋण मात्र था| मोटी अक्ल वाले किसान को समझाया गया कि थोडा और उधार ले कर बच्चे का भविष्य बनालो| ऐसे मौके बार बार नहीं आते| दो साल की तनख्वाह से भरपाई हो जावेगी| सो एक साहूकार से रकम कर्ज ली गयी और दूसरे को दे दी गयी| नेताजी जानते थे कि यह परिवार नोट तो एक ही बार देगा, परन्तु वोट हमेशा ही देगा| सो पूरी साहूकारी से सहायता की| इस प्रकार दो साहूकारों की कृपा से बालक होम गार्ड में भर्ती करा दिया गया|

किसान के भाग्य का मौसम से सीधा सम्बन्ध होता है| अभी पिछले साल के अकाल की छाया से उबरे नहीं थे की इस साल पाला पड़ गया| उसका दुर्भाग्य सच्चे दोस्त की भांति साथ छोड़ने को तैयार ही नहीं था| एक अहिंसक आंदोलन में हुयी पत्थर बाजी से भोम सिंह के पुत्र का सर फूट गया व परिवार टूट गया| उसकी नयी नौकरी थी सो ना तो पेंशन, ना ही अन्य बचत| ले-दे कर मृत्यु ग्रेचुयअटी से मिले पैसों से रिश्वत हेतु लिया कर्ज उतार कर हिसाब बराबर किया|

परिवार की माली हालत और जर्जर हो गयी| चूँकि जमीन का मालिक था सो भूमीहीनों या लघु किसानों को मिलने वाली सहयता प्राप्त करने का भी अधिकारी नहीं था| बेटी के ब्याह की समस्या अलग| उस गाँव का सरपंच बड़ा दयालु था| उसने भोम सिंह को सुझाव दिया कि मनरेगा में नाम लिखा कर अस्सी दिन घर बैठे मजदूरी दे दूंगा| सरपंच जी अपने ट्रेक्टर से विकास कार्य करते हुए निश्चित मजदूरी का एक तिहाई भोम सिंह को घर-बाहर की थोड़ी बहुत बेगारी के बाद दे देते| जीवट व इच्छा शक्ति के धनी राजस्थानी किसान की संघर्ष क्षमता बहुत थी| अन्यथा उसे मौसम की मार, महंगे खाद-बीज सहित ऊँची लागत तथा उत्पाद के अनुचित मूल्य का गणित पता था| पर अन्य विकल्प भी नहीं थे| सो अन्नदाता बने रहने की मजबूरी धारण किये रखी| आर्थिक संकट से उबरने के लिए पत्नी व पुत्री के साथ दिन रात खेत में खपता रहता| परन्तु फसल के अंत में अपने को जीवित-मात्र रख सकने वाले घर खर्च के बाद की बची धन-राशि से बैंक के ऋण कि किश्त मात्र चुका पा रहा था|

इधर कुछ दिनों से ख़बरों में सुर्खियाँ थी कि शहरों में सब्जियां ऊँचे दाम पर बिक रही थी| अतः इस बार कुछ अधिक कर्ज लेकर सब्जियां लगाई| ईश्वर की कृपा से मौसम ने इस बार भरपूर साथ दिया| फसल जब पकी तो मन हर्षित हो गया| छोटा सा परिवार खुशियों के सपने देखने लगा| कुछ योजनायें भी बना डाली, जिनमें छप्पर की मरम्मत, दहेज़ का सामान खरीदना इत्यादि को प्राथमिकता दी गयी| टमाटर की भरपूर फसल हुयी| परन्तु क्षेत्र में ज्यादा उत्पादन होने के कारण बाज़ार मंदा हो गया| पचास पैसे प्रति किलो से भी कोई व्यापारी सूंघने को तैयार नहीं हुआ| अगली फसल के लिए खेत खाली करना था, सो हार कर सड़कों पर फेंकना पड़ा| सारा खर्च माथे पड़ गया, मेहनत बेकार गयी सो अलग| अतः बैंक का डिफाल्टर बन गया| कीट-नाशकों का छिडकाव करने के दौरान गले में होने वाली ख़राश बढ़ कर फेफड़े लील करने लगी, पर पैसे के अभाव से दवा संभव नहीं थी| सरकारी अस्पतालों के चार-पांच चक्कर पश्चात् मिलने वाली दवाइयां कारगर सिद्ध नहीं हुयी| भोम सिंह असाध्य रोग से ग्रस्त हो गया| तन व धन से वह पूर्णतया टूट गया| खाट पकड़ ली पर हिम्मत नहीं छोड़ी| तमिलनाडु के किसानों द्वारा मल-मूत्र सेवन करने, छतीसगढ़ के भाइयों द्वारा सड़कों पर सब्जियां बिछाने, तेलंगाना वालों द्वारा मिर्चें जला देना, महाराष्ट्र में दूध सड़कों पर फ़ैलाने की ख़बरें सुन कर उसे लगता था कि वह अकेला नहीं है| परन्तु अनेक राज्यों में आत्महत्या कर रहे किसानों से वह खुश नहीं था| उन्हें कायर व कमजोर मानता था, वरना खुद कि पहाड़ जैसी परेशानियों से आजिज, कीट नाशक फसल पर छिडकने की बचत कर खुद मुक्ति पा लेता| हिम्मत नहीं हरी सो नहीं हारी| हाँ शारीर की व्याधि उसके बस से बाहर थी|

भोम सिंह की इच्छा के विपरीत उसकी पत्नी उसे स्वामी सम्पूर्णानन्द के आश्रम रोग निवारण हेतु लेकर आई| स्वामी जानते थे कि रोगी और भोगी को ठगना बहुत आसन काम है| यह भी जानते थे कि उसके पास देने को पैसा नहीं होगा| पर सोचा कमजोर मनोदशा में उसकी पुत्री अपने पिता के साथ आश्रम में रह कर सेवा करेगी| भोम सिंह की पत्नी ने स्वामी से निवेदन किया-
“काया को जो कष्ट है उसे सह्यो नहीं जाय, माया मो पर है नहीं स्वामी करो उपाय“ |

स्वामी जी के आश्रम में काया का महत्व माया से कम नहीं था| सो उसने किसान की पत्नी व पुत्री को ठगने के प्रपंच से मन्त्र विद्या द्वारा भोम सिंह को रोग कष्ट-मुक्ति का ढाढस दिया| किसान का अनुभव-ज्ञान स्वामी जी के समग्र ज्ञान व ठग-लकड़ी से अधिक दर्शनपूर्ण था| वह भली भांति जनता था कि रोगी को आशा-उपचार के लालच में अक्सर ठगा जाता है, एवं स्वामी की गिद्ध-दृष्टि कहाँ है| कमजोर मनोदशा पर ठग-पाश का फंदा तुरंत प्रभाव से जकड़ता है| पर वह कमजोर नहीं था, सो उसने एक उपेक्षा भरी मुस्कान के साथ स्वामी को कहा-
“काया है तो कष्ट है अर कष्ट तज्यो नहीं जाय, मुक्ति की औषध नहीं एहिरो आतम ज्ञान उपाय” |


स्वामी जी अज्ञानी किसान की बात का बुरा मान गए, सो उस नास्तिक का उपचार करने से मना कर दिया| परन्तु नास्तिक किसान के अज्ञान से अवधेशानन्द का उपचार हो गया| वह पुनः अवधेश बन कर जीवन श्रम में जुट गया|

लेखक- डॉ लक्षमण सिंह राठौड़, पूर्व महानिदेशक, मौसम विभाग, भारत

हठीलो राजस्थान-33

हर पूनम मेलो भरै,
नर उभै कर जोड़ |
खांडै परणी नार इक,
सती हुई जिण ठोड ||१९६||

वीर की तलवार के साथ विवाह करने वाली वीरांगना जिस स्थान पर सती हुई ,वहां आज भी हर पूर्णिमा को मेला भरता है तथा लोग श्रद्धा से खड़े हो उसका अभी-नंदन करते है |

घर सामी एक देवरों ,
सांझ पड्यां सरमाय |
दिवला केरो लोय ज्यूँ ,
दिवलो चासण जाय ||१९७||

घर के सामने ही एक देवालय है,जहाँ वह दीपक की लौ जैसी (सुकुमार) कामिनी, सांझ पड़े शर्माती हुई दीपक जलाने जाती है |

उण भाखर री खोल में,
बलती रोज बतोह |
जीवन्त समाधि उपरै,
तापै एक जतिह ||१९८||

उस पहाड़ की कन्दरा में रोजाना एक दीपक जला करता था | वहीँ उस संत ने जीवित समाधी ली थी | वहीँ पर आज एक अन्य संत तपस्या कर रहा है |

राम नाम रसना रहै,
भगवा भेसां साध |
पग पग दीसै इण धरा ,
संता तणी समाध ||१९९||

इस राजस्थान की धरती पर ऐसे संतों की समाधियाँ कदम कदम पर दिखाई देती है जिन्होंने भगवा वेश धारण किया था व जिनकी जिव्हा पर हमेशा राम नाम की ही रट रहती थी |

गिर काला काला वसन,
काला अंग सुहाय |
धुंवा की-सी लीगटी,
बाला छम छम जाय ||२००||

काले पर्वतों के बीच काले वस्त्र पहने इस श्यामा के अंग सुहावने है | धूम्र रेखा -सी यह छम-छम घुंघरू बजाती जा रही है |

राखी जाती गिर-धरा,
अटका सर अणियांह |
काला चाला भील-जन ,
काली भीलणियांह ||२०१||

काले रंग के इस भील भीलनियों ने भालों की तीखी नोकों का अपने मस्तक से सामना कर के इस गिरि-प्रदेश की शत्रुओं से रक्षा की है |

गिर-नर काला गोत सूं,
काली नार कहाय |
तन कालख झट ताकतां,
मन कालख मिट जाय ||२०२||

इस पर्वतीय प्रदेश के नर (भील) व नारी (भीलनियां) दोनों ही काले शरीर के है लेकिन उनमे इतनी पवित्रता है कि उनके काले शरीर को देखते ही देखने वाले के मन का समस्त कलुष समाप्त हो जाता है |

स्व.आयुवानसिंह शेखावत

हठीलो राजस्थान-32

धरती जाती नह रुकै,
निबलां नांजोगांह |
रजवट बाँधी आ रसा,
जावै नह जोगांह ||१९०||

निर्बल और योग्य व्यक्तियों के अधिकार से जाती हुई धरती रूकती नहीं है क्योंकि यह धरती योग्य व्यक्तियों के साथ वीरता की रस्सी से बंधी है, अत: उन्हें छोड़कर ये नहीं जा सकती |

निबला पासै ना रुकै,
अकड़ भोग, अधिकार |
डोको फाडै डाँग नै,
टणकाई बलिहार ||१९१||

निर्बल व्यक्तियों के पास स्वाभिमान,भोग व अधिकार नहीं रुक सकते है | बलवान का डोका (सरकंडा) निर्बल की लाठी को भी चीर देता है,अत: मैं बल को ही नमस्कार करता हूँ |

व्हाली इज्जत इण धरा,
व्हालो धरम विसेस |
व्हालो रण में मरण नित,
नित व्हालो निज देस ||१९२||

इस मेरे देश की भूमि इज्जत वाली व धर्म को ही विशिष्ट मानने वाली है | यहाँ के लोग युद्ध में मरने को अभिलाषा रखने वाले व नीति पालन वाले है |

जलम लियौ जिण देस में,
भोग्यो चकवै राज |
भूल्यां उण नै किम सरै,
अबखी बेलां आज ||१९३||

हे चकवा ! मैंने इस देश में जन्म लिया है, यहीं पर मैंने राज्य भोगा है | अब इस विपत्ति की बेला में इस देश को भूलने से कैसे काम चलेगा |

की चाढूं इण देस पर,
की राखूँ करतार ?
सिर चाढूं सौ जलमती,
उतरै नी रिण-भार ||१९४||

हे विधाता ! मैं इस देश पर क्या चढ़ाऊँ व क्या रखूँ ? यदि सौ जन्म लेकर भी मैं प्रत्येक जन्म में इस देश की रक्षा के लिए मस्तक कटवाता रहूँ तो भी इस देश के ऋण से उऋण नहीं हो सकता |

बन निरजन घूंघूट करै,
पग उरभांण पंत |
भोम्याजी रो थांन लख,
कामण लाज करंत ||१९५||

निर्जन जंगल में भी भोमियाजी का थान(स्थान) देखकर कामिनी (स्त्री) आदर स्वरूप अपनी जूतियाँ उतारकर घूंघुट निकाल लेती है | (जन्म भूमि के उत्सर्ग होने वालों का मृत्यु के बाद भी सम्मान होता है )||

स्व.आयुवानसिंह शेखावत

हठीलो राजस्थान-31

लोपण पहलां पाल पर,
कोपण पहलां पेख |
रोपण चाल्यो आज थूं ,
मणधर माथै मेख ||१८४||

हे वीर ! तू शत्रु-सेना को देखने से पहले ही क्रुद्ध हो उसे सीमा प्रवेश करने से पूर्व ही ध्वंस करने के चल पड़ | इस प्रकार तू निश्चय ही मणिधर सर्प (शत्रु) के माथे पर (अपने शौर्य या विजय की) मेख रोपने जा रहा है |

जालै झाला, बिस जबर,
किण विध आवै हाथ ?
बल बिन चाल्यो बावला,
नागां घालण नाथ ||१८५||

जला देने वाली लपटें व भयंकर विषधारी सर्प को किस प्रकार पकड़ा जा सकता है ? हे पागल ! तू बिना बल संचय किए ही सांपो को पकड़ने के लिए चल पड़ा है |

दुबकै, भभकै ,फिर डसै,
बंबी पड़ीयां तांण |
हथ देतां जांणी नहीं,
भुजंग री आ बांण ||१८६||

उपरोक्त दोहे के प्रसंग में कहा गया है कि तू बांबी में हाथ डाल रहा है क्या तू सर्प की आदत नहीं जानता | बांबी पर जब आंच आती है तो विषधर पहले कुछ दुबकता है ,फिर फुफकारता है तथा अंत में डस लेता है |

दुसमण ! सुण ले सोचलै,
इण धरती मत झाँख |
खुड्को होतां सिव-धरा,
खुल जासी सिव-आँख |१८७||

हे दुश्मन ! तुम भली भाँती सोचलो और सुनलो | इस धरती की और कभी आँख मत उठाना | यह भूमि भगवान शंकर द्वारा रक्षित है | तुम्हारे आगमन की आहट पाते ही यहाँ शिव का तीसरा नेत्र खुल जायेगा अर्थात यहाँ के वीर प्रलयंकारी आक्रमण करके तुम्हे क्षण भर में ही नष्ट कर देंगे |

झगड़ा टणकी जातियां,
जीवै सदा जहान |
झगड़ो जीवण जगत रो,
विध रो अटल विधान ||१८८||

युद्ध करने वाली वीर जातियां इस संसार में हमेशा जीवित रहती है | संघर्ष ही जीवन है यह जगत का अटल विधान है |

जी सी वाही जातड़ी,
लड़सी झाड़ो झाड़ |
लडै पडै ,पड़ पड़ लडै,
पटकै अंत पछाड़ ||१८९||

संसार में वही जाति जीवित रहेगी जो कदम कदम पर संघर्ष करने को उधत है | जो जाति युद्ध करती है, पराजित होने पर फिर उठ खड़ी होती है , फिर लडती है व अंत में शत्रु पर विजय प्राप्त करती है , वही दीर्घकाल तक जीवित रह सकती है |

स्व.आयुवानसिंह शेखावत

यहाँ भी पढ़े -

हठीलो राजस्थान-30

तोपां जाझां ताखड़ी,
सीस पडै कट कट्ट |
बण ठण बैठा किम सरै,
रण माची गहगट्ट ||१७८||

वीर पत्नी पति से कहती है - तोपें गरजती हुई गोले बरसा रही है,जिससे शत्रुओं के मुंड कट कट कर गिर रहे है | हे स्वामी ! बन ठन कर बैठने से कैसे काम चलेगा ? देखते नहीं, युद्ध की भयंकर मार काट मची हुई है |

मत इतरावो ठाकरां,
छैलां री लख छैल |
थोडा रहसी ठायणे,
रण माचंता रौल ||१७९||

हे ठाकुर ! अपने द्वारा पाले हुए छैलों की उपरी सजधज देखकर अभिमान मत करो | जब युद्ध छिड़ेगा उस समय तुम्हारे साथ थोड़े ही लोग रह जायेंगे | अर्थात ये बन ठन कर रहने छैले उस समय नजर भी नहीं आयेंगे |

सूरां खूब सतावियो ,
कूरा कीधो मोल |
ठीक पडैला ठाकरां,
रण माचंता रौल ||१८०||

हे ठाकुर ! तुमने वीरों को तो खूब सताया और कायरों का आदर किया | अब युद्ध छिड़ने पर तुम्हे पता चलेगा कि वीरों की अवमानना करने का परिणाम क्या होता है |

निरबल धरती आ नहीं,
रिपुवां रोको सोर |
की सीहां रो सोवणों,
की अगनी कमजोर ||१८१||

शत्रु पक्ष के बढ़ते प्रताप को देखते हुए भी जो लोग संघर्ष के लिए आतुर नहीं होते उनके लिए कहा गया है - तुम सिंह हो,सिंह को उठने के एक क्षण लगता है फिर तुम उठ क्यों नहीं रहे हो | तुम अग्नि हो ,जो राख हटाते ही प्रज्वलित होने की क्षमता रखती है व जिस धरती पर तुम पैदा हुए हो वह भी निर्बल नहीं है ,फिर तुम्हारे में यह निर्बलता कहाँ से व्याप्त हुई ? उठो व शत्रुओं की बकवास को बंद करो |

अरियां थे खप जाव सौ,
इण धरती रण धीर |
रण न्योतो पा आवसी ,
लड़वा पांचू पीर ||१८२||

हे शत्रुओ ! तुम नष्ट हो जावोगे | इस धरती पर रण बाँकुरे निवास करते है | रण निमंत्रण मिलते ही यहाँ के पांचो पीर युद्ध करने के लिए आ पहुंचेंगे |
(पाँचों पीरों में लोक देवता - हडबूजी,पाबूजी ,रामदेवजी,मांगलिया मेहाजी व गोगाजी शामिल है)

देख घोर घमसाण जुध,
तोपां टूटत कोट |
पांचू पीर पधारसी ,
डंके हन्दी चोट ||१८३||

टॉप के गोलों से दुर्ग भग्न होता तथा घमासान युद्ध छिड़ता देख कर पाँचों पीर अवश्य ही आ उपस्थित होंगे |

स्व.आयुवानसिंह शेखावत


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