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Sep 27, 2016

Bhati Vansh ki Kuldevi Swangiya Mata भाटी वंश की कुलदेवी स्वांगियां माता

राजस्थान के जनमानस में आस्था की प्रतीक लोकदेवियों, कुलदेवियों के उद्भवसूत्र पर यदि दृष्टि डाली जाये तो हम पायेंगे कि शक्ति की प्रतीक बहुत सी प्रसिद्ध देवियों का जन्म चारणकुल में हुआ है। चारणकुल में जन्मी प्रसिद्ध देवियों में आवड़, स्वांगियां, करणी माता आदि प्रमुख है। विभिन्न राजवंशों की गौरवगाथाओं के साथ इन देवियों की अनेक चमत्कारिक घटनाएँ इतिहास के पन्नों पर दर्ज है। वीर विनोद के लेखक श्यामलाल ने चारणों की उत्पत्ति देव सर्ग में बतलाते हुये उनकी गणना देवताओं में की है। इसके लिए उन्होंने श्रीमद्भागवत का संदर्भ दिया है।

चारणकुल में जन्मी इन देवियों ने अपने जीवनकाल में ही प्रत्यक्ष चमत्कारों के बलबूते राजस्थान के आम जन मानस को नहीं, तत्कालीन शासकों को भी प्रभावित किया है। यही कारण है कि इन देवियाँ को इनके जीवनकाल में ही जहाँ आम जनता ने ईष्टदेवी के रूप में मान्यता दी, वहीं शासकों ने इन्हें अपने कुल की देवी के रूप में स्वीकार किया। राजस्थान के प्रत्येक राजवंश ने देवीशक्ति के महत्त्व को मानते हुए अपने राज्य की स्थापना को कुलदेवी का आशीर्वाद माना तथा विभिन्न युद्धों में विजयी होने और राज्य के चहुँमुखी विकास में सफल होने पर अपनी कुलदेवी में पूर्ण आस्था रखते हुए अनेकानेक भव्य मंदिरों का निर्माण कराया व उनकी पूजा अर्चना का पुख्ता प्रबंध करवाते हुए जन जन में देवी के प्रति आस्था की अलख जगाई।

उतर भड़ किंवाड़ के विरुद से विभूषित, शक्ति के उपासक राजस्थान में जैसलमेर के भाटी राजवंश ने चारणकुल में जन्मी देवी स्वांगियां को शक्ति का प्रतीक मानते हुए कुलदेवी के रूप में स्वीकार किया। स्वांगियां जिसे आवड़ माता के नाम से भी जाना जाता है, की भाटी राजवंश की गौरवगाथाओं के साथ अनेक चमत्कारी घटनाएँ जुड़ी है।

ऐसी मान्यता है कि देवी आवड़ के पूर्वज जो सउवा शाखा के चारण थे, सिंध के निवासी थे। उनका गौपालन के साथ घोड़ों व घी का व्यवसाय था। उसी परिवार का एक चेला नामक चारण मांड प्रदेश (वर्तमान जैसलमेर) के चेलक गांव में आकर बस गया। उसके वंश में मामड़िया नाम का एक चारण हुआ, जिसके जिसके घर सात कन्याओं ने जन्म लिया। लोकमान्यता के अनुसार मामड़िया चारण के संतान नहीं थी, सो संतान की चाहत में उसने संवत 808 में हिंगलाज की यात्रा की। तब हिंगलाज ने ही सात कन्याओं के रूप में उसके घर जन्म लिया। इन सातों कन्याओं में सबसे बड़ी कन्या का नाम आवड़ (aavad) रखा गया। मांड प्रदेश में अकाल के वक्त ये परिवार सिंध में जाकर हाकड़ा नदी के किनारे कुछ समय रहा। जहाँ इन बहनों ने सूत कातने का कार्य भी किया। इसलिए ये कल्याणी देवी कहलाई। फिर आवड़ देवी की पावन यात्रा और जनकल्याण की अद्भुत घटनाओं के साथ ही क्रमशः सात मंदिरों यथा काला डूंगरराय का मंदिर, भादरियाराय का मंदिर, तन्नोटराय का मंदिर, तेमड़ेराय का मंदिर, घंटीयाली राय का मंदिर, देगराय का मंदिर, गजरूप सागर देवालय का निर्माण हुआ और समग्र मांड प्रदेश में लोगों की आस्था उस देवी के प्रति बढती गई।(हुकुम सिंह भाटी, राजस्थान की कुलदेवियां, पृष्ठ-44)

सिंध से लौटने पर क्षेत्र के लोगों ने जिस गांव में देवी का अभिनन्दन किया उस गांव का नाम आइता रखा गया और देवी ने गांव के पास स्थित काले रंग की पहाड़ी जिसे स्थानीय भाषा में डूंगर कहा जाता है, पर आवास किया। जहाँ चमत्कारों की चर्चा सुनने के बाद लोद्रवा के परमार राजा जसभाण ने उपस्थित होकर देवी के दर्शन किये। बाद में ‘‘यहाँ संवत 1998 में महारावल जवाहरसिंह ने मंदिर का निर्माण कराया।(हुकुम सिंह भाटी, राजस्थान की कुलदेवियां, पृष्ठ-45) जैसलमेर से 25 किलोमीटर दूर काले रंग की पहाड़ी पर बने मंदिर को काला डूंगरराय मंदिर के नाम से जाना जाता है तथा डूंगर पर मंदिर होने के कारण स्थानीय लोगों में माता का नाम डूंगरेचियां भी प्रचलन में है।

डा.हुकम सिंह भाटी के अनुसार बहादरिया भाटी के अनुरोध पर देवी आवड़ अपनी बहनों के साथ आकर एक टीले पर रुकी। जहाँ राव तणु भाटी ने पहुँच कर दर्शन किये और लकड़ी के बने हुए आसन (सहंगे) पर देवी को विराजमान किया गया। तीन बहनों को दाई ओर तथा तीन को बाईं तरफ खड़ा किया और अपने हाथ से चंवर ढुलाए। तब आवड़ जी ने आशीर्वाद देते हुए कहा-‘‘मांड प्रदेश में तुम्हारे वंशजों की स्थायी राजधानी स्थापित होगी और वहां पर तुम्हारा राज्य अचल होगा।’’ सहंगे पर बैठने के कारण आवड़ जी स्वांगियां कहलाई।
इस प्रकार राव तणु भाटी के बाद भाटी राजवंश ने देवी आवड़ जी को स्वांगियां माता के नाम से कुलदेवी के रूप में स्वीकार किया। बहादरिया भाटी के अनुरोध पर देवी जिस टीले पर आई बाद में उस जगह का नाम भादरिया पड़ा। जो जैसलमेर के शासकों के साथ ही स्थानीय जनता की श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है। कहा जाता है कि संवत 1885 में बीकानेर और जैसलमेर की सेनाओं के मध्य युद्ध हुआ, जिसमें स्वांगियांजी के अदृश्य चक्रों से बीकानेर सेना के अनेक सैनिक मारे गये और बाकी भाग खड़े हुए। तब तत्कालीन महारावल ने भादरिया में भव्य मंदिर का निर्माण कराया। आज भी भाटी वंश के लोग अपनी इस कुलदेवी के प्रति पूर्ण आस्था रखते है तथा देवी के प्रतीक के रूप में त्रिशूल का अंकन कर धूप दीप, पूजा-अर्चना आदि के रूप में उपासना करते है।

माता स्वांगियां का एक मंदिर भारत-पाक सीमा पर तन्नोट गांव में भी है। जैसलमेर से लगभग एक सौ तीस कि॰मी॰ की दूरी पर तनोट राय को हिंगलाज माँ का ही एक रूप माना जाता है। हिंगलाज माता जो वर्तमान में बलूचिस्तान जो पाकिस्तान में है, स्थापित है। भाटी राजपूत नरेश तणुराव ने वि.सं. 828 में तनोट का मंदिर बनवाकर मूर्ति को स्थापित कि थी। भाटी तणुराव द्वारा निर्मित इस मंदिर में सैकड़ों वर्षों से अखण्ड ज्योति आज तक प्रज्वलित है। तणुराव भाटी द्वारा निर्मित होने के कारण इस मंदिर को तनुटिया तन्नोट मंदिर के नाम से जाना जाता है। 1965 ई. में हुए भारत-पाक युद्ध में भारतीय सेना के पक्ष में देवी द्वारा दिखाये चमत्कार के बाद मंदिर की देखरेख, पूजा अर्चना का कार्य सीमा सुरक्षा बल के जवानों द्वारा सम्पादित किया जाता है। 1965 ई. में हुए भारत-पाक युद्ध में पाक सेना ने भारतीय क्षेत्र में शाहगढ़ तक आगे बढ़कर लगभग 150 किलोमीटर कब्जा कर तन्नोट को घेर बम वर्षा की। पर देवी की कृपा से 3000 पाकिस्तानी बमों में से एक भी नहीं फटा। जिससे क्षेत्र में कोई नुकसान नहीं नहीं हुआ। अकेले मंदिर को निशाना बनाकर करीब 450 गोले दागे गए। परंतु चमत्कारी रूप से एक भी गोला अपने निशाने पर नहीं लगा और मंदिर परिसर में गिरे गोलों में से एक भी नहीं फटा और मंदिर को खरोंच तक नहीं आई।

सैनिकों ने यह मानकर कि माता अपने साथ है, कम संख्या में होने के बावजूद पूरे आत्मविश्वास के साथ दुश्मन के हमलों का करारा जवाब दिया और उसके सैकड़ों सैनिकों को मार गिराया। दुश्मन सेना भागने को मजबूर हो गई। कहते हैं सैनिकों को माता ने स्वप्न में आकर कहा था कि जब तक तुम मेरे मंदिर के परिसर में हो मैं तुम्हारी रक्षा करूँगी।

इसी तरह माता के घंटियालीराय मंदिर में इसी युद्ध में पाक सैनिकों ने मूर्तियों को खंडित कर माता के कोपभाजन का शिकार बने। प्रतिमाओं को खंडित करने वाले पाक सैनिकों के मुंह से खून निकलने लगा और वे अपने शिविर में पहुँचने से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हुए। इस तरह की घटना के बाद भारतीय सेना के जवानों के साथ स्थानीय जनता में माता के प्रति श्रद्धा और अधिक बढ़ गई।
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Sep 19, 2016

भारतीय स्थापत्यकला एवं मूर्तिकला का गौरव, प्रतिहारकालीन मंदिर स्थापत्य मूर्तिकला का सुन्दर उदाहरण, प्राचीन भारतीय वास्तुकला की उत्कृष्ट कला का प्रतिनिधित्व करता, दधिमती माता का मंदिर राजस्थान के नागौर जिले के जायल कस्बे के पास गोठ मांगलोद गांव में स्थित है। महामारू शैली का श्वेत पाषाण से निर्मित शिखरबद्ध यह मंदिर पूर्वाभिमुखी है। डा. राघवेन्द्र सिंह मनोहर के अनुसार-“वेदी की सादगी जंघा भाग की रथिकाओं में देवी देवताओं की मूर्तियाँ, मध्य भाग में रामायण दृश्यावली एवं शिखर प्रतिहारकालीन परम्परा के अनुरूप है। चार बड़े चौक वाला यह मंदिर भव्य व विशाल है।

मंदिर का जंघा भाग पंचरथ है। जिसकी मध्यवर्ती प्रधान ताक में पश्चिम की ओर आसनस्थ चार भुजाओं वाली दुर्गा, उतर की ओर तपस्यारत चार भुजाओं वाली पार्वती तथा दक्षिण की ओर आसनस्थ आठ भुजाओं वाली गणपति प्रतिमा विद्यमान है। इसके समीप स्थानक दिकपाल वाहनों सहित अंकित है यथा मेषवाहना अग्नि, महिषवाहना यम, नरवाहना नैऋत्य तथा मकरवाहना वरुण।”
मंदिर में रामायण की घटनाओं का चित्रों के माध्यम से मनोहारी चित्रण किया है। डा. राघवेन्द्र सिंह मनोहर के अनुसार-“चित्रों में राम का चित्रण सामान्य पुरुष रूप में, ब्रह्मचारी वेश में, जटामुकुट धारण किये, हाथ में धनुष, पीठ पर तरकश बांधे प्रत्यालीढ़ मुद्रा में किया गया है, अवतार के दिव्य रूप में नहीं। नाटकीयता को महत्त्व देने के लिए उन महत्त्वपूर्ण घटनाओं को चुना गया है, जो आश्चर्य एवं विस्मय का भाव उत्पन्न करती है। हनुमान का चित्र का वानर के रूप में किया गया है। इन अर्धचित्रों से यह सिद्ध होता है कि राजस्थान के शिल्पियों में बाल्मीकि रामायण लोकप्रिय थी तथा भारत का यह भू-भाग रामायण के कथानक से जुड़ा हुआ था, जिसका उल्लेख रामायण के इस श्लोक में हुआ है-

आदौ रामतापोवनादिगमनं हत्या मृगं कांचनम।
वैदेहि हरणं जटायुमरणं सुग्रीव संभाषणम।।
वाली निर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरी दाहनम।
पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद्धि रामायणम ।।”

देवी के इस मंदिर में रामायण के इन चित्रों में राम, लक्ष्मण, सीता वन गमन से शुरू होकर, मारीच वध, कुंभकर्ण, रावण वध, वानरों द्वारा समुद्र पर सेतु बांधने आदि कई घटनाओं के सुन्दर चित्रों का समायोजन किया गया है जो दर्शनीय है।

मंदिर निर्माण की प्राचीनता के बारे रामकरण आसोपा ने इसे गुप्तकालीन मानते हुए 608 ई. में निर्माण माना है, जबकि डा. राघवेन्द्र सिंह मनोहर आदि इतिहासकार इस मंदिर का निर्माण प्रतिहार नरेश भोजदेव प्रथम (836-892 ई.) के समकालीन मानते है।

राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार ‘‘इस मंदिर के आस-पास का प्रदेश प्राचीनकाल में दधिमती (दाहिमा) क्षेत्र कहलाता था। उस क्षेत्र से निकले हुए विभिन्न जातियों के लोग, यथा ब्राह्मण, राजपूत, जाट आदि दाहिमे ब्राह्मण, दाहिमे राजपूत, दाहिमे जाट कहलाये, जैसे कि श्रीमाल (भीलमाल) नगर के नाम से श्रीमाली ब्राह्मण, श्री महाजन आदि।’’
ब्राह्मण, जाट व अन्य जातियों के अलावा दाहिमा व पुण्डीर राजपूत दधिमती माता को अपनी कुलदेवी मानते हुए इसकी उपासना करते है। चूँकि दाहिमा राजपूत इसी क्षेत्र से निकले होने के कारण दाहिमा कहलाये। हालाँकि इस क्षेत्र में दाहिमा राजपूतों का कभी कोई बड़ा राज्य प्राचीनकाल में भी नहीं रहा। वे पृथ्वीराज चौहान तृतीय के सामंतों में थे और पृथ्वीराज के दरबार में दाहिमा राजपूतों का बड़ा महत्व व प्रभाव था। कुं. देवीसिंह मण्डावा के अनुसार ‘‘कैमास दाहिमा पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर के समय से ही चौहान साम्राज्य का प्रधानमंत्री रहा था। सोमेश्वर ने उसे नागौर का क्षेत्र जागीर में दिया था।’’ सोमेश्वर की मृत्यु के समय पृथ्वीराज बालक थे, अतः उनकी माता कर्पूरी देवी राज्य का प्रशासन देखती थी, जिसने भी कैमास दाहिमा पर भरोसा करते हुए उसे प्रधानमंत्री रखा। कैमास दाहिमा ने गौरी का घग्घर नदी के पास मुकाबला किया था, जिसमें वह घायल हुआ। उसकी मृत्यु के बाद पृथ्वीराज ने उसके पुत्र को प्रधानमंत्री बनाया और हांसी की जागीर दी थी। दाहिमा राजपूतों के अलावा पुण्डीर राजपूत भी दधिमता माता को कुलदेवी मानते है और माता की पूजा-आराधना-उपासना करते है।

अन्य मंदिरों की भांति माता के इस मंदिर से भी चमत्कार की कई दंतकथाएँ जुड़ी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार विकटासुर नाम का दैत्य संसार के समस्त पदार्थों का सारतत्व चुराकर दधिसागर में जा छुपा था। तब देवताओं की प्रार्थना पर स्वयं आदिशक्ति ने अवतरित होकर उस दैत्य का वध किया और सब पदार्थ पुनः सत्वयुक्त हुए। दधिसागर को मथने के कारण देवी का नाम दधिमती पड़ा। अन्य जनश्रुतियों के अनुसार कपालपीठ कहलाने वाला माता का यह मंदिर स्वतः भूगर्भ से प्रकट हुआ है। तो एक अन्य जनश्रुति के अनुसार प्राचीनकाल में राजा मान्धाता द्वारा माघ शुक्ल सप्तमी को किये गए एक यज्ञ के समय यज्ञकुण्ड से पैदा होने की किवदंती प्रचलित है। वर्तमान में मंदिर की सम्पूर्ण व्यवस्था मंदिर प्रन्यास व अखिल भारतीय दाधीच ब्राह्मण महासभा द्वारा की जाती है। दाधीच ब्राह्मण महासभा द्वारा ही मंदिर का नवीनीकरण एवं जीर्णोद्धार किया गया व बरामदों युक्त अनेक कमरों का निर्माण कराया गया है। चैत्र और आश्विन के नवरात्रों में यहाँ मेलों का आयोजन होता है, जिनमें बड़ी संख्या में माता के भक्त, श्रद्धालु दर्शनार्थ यहाँ आते है।

जायल कस्बे के नजदीक इस मंदिर तक पहुंचने के लिए विभिन्न स्थानों से रेल, बस, टैक्सी आदि से आसानी से पहुंचा जा सकता है। जयपुर, जोधपुर, अजमेर, बीकानेर, दिल्ली, नागौर से डेगाना, छोटी खाटु आदि से रेल द्वारा और उसके बाद टैक्सी या बस द्वारा पहुंचा जा सकता है।


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Sep 18, 2016

Karni Mata Deshnok, Bikaner

राजस्थान के बीकानेर शहर से 32 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में बीकानेर नागौर सड़क मार्ग पर देशनोक बसा हुआ है। इसी देशनोक में विश्व में चूहों वाले मंदिर के नाम विख्यात, शक्ति के उपासकों का श्रद्धास्थल, गौसेवा व शक्ति की प्रतीक श्री करणी माता का मंदिर है। श्री करणी मढ देशनोक के नाम प्रसिद्ध इस मंदिर में राजस्थान, गुजरात, हरियाणा सहित देश के विभिन्न भागों से देवी के भक्तगण माता करणी के दर्शनार्थ आते है। आश्विन नवरात्री के अवसर पर आस-पास के जिलों सहित दूर-दराज के हजारों श्रद्धालु पदयात्रा करते हुए करणी माता की पूजा अर्चना, उपासना करने हेतु पहुँचते है। विशाल भव्य मंदिर के उन्नत सिंहद्वार के भीतर प्रशस्त प्रांगण है। आगे मध्य द्वार है। अन्दर संगमरमर का चौक बना है। तीसरा अन्तराल द्वार है और सामने निजमढ़ जिसके द्वार पर स्वर्णजटित कपाट है। निजमढ़ अखण्ड दीपशिखा से आलौकित है, निजमंदिर के ठीक मध्य में माता श्री करणी जी की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर में जिधर नजर दौड़ाई जाय उधर चूहे ही चूहे नजर आते है, इन्हीं चूहों में एक सफेद चूहिया भी किसी को कभी कभार दिख जाती है। ऐसी मान्यता है कि जिस पर माता की खास कृपा हो, सफेद चूहिया उसे ही नजर आती है।
करणी माता के वंशज ही माता के पुजारी है, जो बारी बारी से एक एक मास पूजा करने का दायित्व संभालते है। शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को बारी बदलती है। जिस पुजारी की बारी रहती है उसका मंदिर छोड़कर जाना निषेध है। अतः बारीदार पुजारी अपनी बारी के एक मास तक मंदिर में रहता है, परिवार की महिला उसे भोजन कराकर संध्या समय अपने घर चली जाती है और पुजारी परम्परा का पालन करते हुए मंदिर में ही सोता है।

राजस्थान के पांच पीरों में से एक मेहाजी मांगलिया द्वारा मेहाजी चारण को प्रदत सुवाप गांव में मेहाजी चारण की धर्म पत्नी देवल देवी के गर्भ से आश्विन शुक्ल सप्तमी, शुक्रवार, वि.सं. 1444 (28 सितम्बर 1387) को श्री करणी माता का जन्म हुआ। करणी माता के पिता मेहाजी किनिया शाखा के चारण थे। जिन्हें जोधपुर जिले की फलौदी तहसील में स्थित सुवाप गांव मेहाजी मांगलिया से उदक में मिला था। माता करणी अपनी पांच बहनों से छोटी थी, वे अपनी माता के गर्भ में 21 माह रही यानी प्रसूति में 21 माह का समय लगा। ऐसा प्रचलित है कि करणी जी के जन्म के समय उनकी माता कुछ समय के लिए मूर्छित हो गई थी और उसी अवस्था में उन्हें साक्षात् दुर्गा के दर्शन हुए। होश आने पर देवल देवी ने अपनी कन्या को देखा तो अपने पास में काली-कलूटी चौड़े मुंह की स्थूल देह वाली कन्या को पाया। करणी माता ने अपने जन्म के समय से चमत्कार दिखाने शुरू कर दिये। उस युग में कन्या के जन्म को अशुभ माना जाता था, फिर मेहाजी के घर पहले से पांच कन्याएं थी। ऐसे में उनकी बुआ ने मेहाजी को प्रसव की जानकारी देते हुए हाथ का डूचका देते हुए कहा कि फिर पत्थर आ गया है अर्थात् लड़की हुई है। उनके इतना कहते ही उनके उस हाथ की सभी अंगुलियाँ ज्यों की त्यों जुड़ी रह गई और खुली नहीं। यह एक तरह से करणी जी के जन्म पर उनका उपहास उड़ाने की सजा थी।

करणी माता का नामकरण संस्कार में रिधूबाई नाम रखा गया। उनके नाम के अनुरूप ही उनके पिता की समृधि प्रतिदिन बढ़ने लगी। कुछ समय बाद करणी माता की बुआ अपने पीहर में आई हुई थी। बुआ अन्य बहनों की अपेक्षा रिधूबाई से ज्यादा प्रेम करने लगी। एक दिन वह रिधूबाई को नहला रही थी तभी रिधूबाई ने उनके हाथ के बारे में पूछा। बुआ ने उनके जन्म के समय की पूरी कहानी बता डाली। तभी रिधूबाई ने बुआ का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा यह तो एकदम ठीक है और ऐसा ही हुआ। बुआ का हाथ ठीक हो गया। उसी दिन बुआ ने रिधूबाई का नाम यह कहते हुए कि यह साधारण कन्या नहीं है यह संसार ने अपनी करनी दिखलायेगी। अतः इसका नाम करणी होना चाहिये। तभी से रिधूबाई का नाम करणी पड़ा और करणी अपनी करनी से श्री करणी माता के नाम से विश्व विख्यात हुई।

बुआ का हाथ ठीक करने के बाद छः वर्षीय करणी ने विषैले सर्प द्वारा डसने से अपने मृत पिता को जीवनदान देकर, सुवा ब्राह्मण व अपने पिता को पुत्र प्राप्ति का वरदान देकर, अपने बचपन में ही अपने चमत्कारों से लोगों को प्रभावित कर अपने दैवीय गुण प्रदर्शित कर दिए थे। 27 वर्ष की आयु में करणी जी का साठिका गांव के केलूजी बिठू के पुत्र देपाजी के साथ पाणिग्रहण संस्कार हुआ। चूँकि करणी जी को गायें बहुत प्रिय थी और वो गौसेवा में वह तल्लीन रहती थी, सो विवाह के समय उनके पिता द्वारा भेंट की गई 400 गायों में से 200 गायें वे अपने ससुराल साथ ले गई। चूँकि करणी जी गौसेवा के रत रहती थी, साथ ही देवी का अवतार थी। अतः उन्होंने गृहस्थी चलाने के लिए देपाजी के साथ अपनी छोटी बहिन गुलाब बाई का विवाह करा दिया। इस सम्बन्ध में डा. नरेन्द्रसिंह चारण अपने शोध ग्रन्थ ‘‘श्री करणी माता का इतिहास’’ के पृष्ठ संख्या 55 पर लिखते है- ‘‘देपाजी ने श्रीकरणीजी को पानी का पूछने के लिए जैसे ही रथ का पर्दा उठाया तो देखा कि वहां पर एक सिंह सवार, सूर्य का लावण्य धारण करने वाली रूप और सौन्दर्य की पूंजरूप श्री महाशक्ति स्वयं हाथ में त्रिशूल लिए खड़ी है। यह देखते ही देपाजी दूर जा खड़े हुये तब देवी ने कहा कि आपको मैंने अपना लौकिक और वास्तविक दोनों रूप बता दिए है, आप जिस रूप में चाहें मुझे देख सकते है क्योंकि मेरा भौतिक रूप विरूप, काला रंग, मोटा और चौड़ा चेहरा है। मैं आपकी सहधर्मिणी अवश्य हूँ, परन्तु मेरा यह भौतिक शरीर आपके उपभोग का साधन नहीं है। आप मुझसे गृहस्थ सम्बन्ध नहीं रख सकते। अपनी गृहस्थी के लिए आप मेरी छोटी बहिन गुलाब बाई से विवाह कर लेना और वह आपकी गृहस्थी संभालेगी। मैं तो इस लोक में दीन-दुखियों पर अत्याचार करने वाले, संपत्तियों को लूटने वाले वे लोग, जो अपना कर्तव्य भूल गये है, उनको कर्तव्य का बोध कराने के लिए मुझे इस लोक में आना पड़ा है।’’
करणीजी की ससुराल में पानी की कमी थी। गांव में एक ही कुआ होने के चलते उनकी गायों को पीने के पानी की किल्लत होती थी। गांव के लोग भी उनके ज्यादा पशुधन को पानी की कमी मानते थे। अतः करणीजी ने निर्णय किया कि वे अपना ससुराल छोड़कर अपनी गायों के साथ ऐसे स्थान पर जायेगी जहाँ उनकी गायों को भरपूर चारा और पानी मिल सके। इस निर्णय के बाद करणी जी अपने परिजनों व पशुधन के साथ साठिका गांव का परित्याग कर जांगलू देश के जाल वृक्षों से आच्छादित जोहड़ पहुंची और वहीं अपना स्थाई निवास बनाया। उनका यही स्थान आगे चलकर देशनोक कहलाया। चूँकि करणीजी के चमत्कारों से प्रभावित बहुत से लोग अपने दुखों से छुटकारा पाने व उनसे आशीर्वाद लेने इस स्थान पर आते थे, इस तरह से यह स्थान उस काल उस क्षेत्र का प्रतिष्ठित स्थान मतलब देश की नाक समझा गया और देशनाक से जाना जाने लगा, जो आगे चलकर भाषा के अपभ्रंश के चलते देशनोक हो गया।

उस काल जांगलू देश की स्थिति बहुत खराब थी। उदावत राठौड़, सांखला व भाटी राजपूत, जाट व मुसलमानों के कई छोटे छोटे राज्य थे जो आपस में एक दूसरे के राज्य में लूटपाट किया करते थे। जिससे स्थानीय प्रजा बहुत दुखी थी, जो करणीजी के दैवीय चमत्कारों के बारे सुनकर अपनी समस्या के निदान हेतु उनके पास आती थी। उस काल के कई शासक भी करणीजी के अनन्य भक्त थे। मण्डोर के शासक रणमल व उनके पुत्रों पर भी करणीजी का बहुत प्रभाव था। यही कारण था कि बीकानेर के संस्थापक राव बीका जांगलू क्षेत्र की अराजक स्थिति का लाभ उठाकर वहां अपना राज्य स्थापित करने के उद्देश्य से आये तो वे सबसे पहले करणीजी के पास आशीर्वाद लेने पहुंचे व अपना मंतव्य बताया। तब करणीजी ने वहां की अराजकता से प्रजा को निजात दिलाने हेतु बीका को योग्य पुरुष समझ आशीर्वाद दिया कि ‘‘तेरा प्रताप जोधा से सवाया बढेगा और बहुत से भूपति तेरे चाकर होंगे।’’ यह आशीर्वाद लेकर बीका ने चूंडासर में रहते हुए आप-पास के छोटे छोटे राज्यों को जीतकर जांगलू प्रदेश पर अपना अधिकार कायम किया और करणीजी की सलाह व आशीर्वाद से उस क्षेत्र में गढ़ बनवाकर बीकानेर नगर की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाया। करणीजी ने अपने जीवनकाल में सामाजिक सरोकारों से जुड़े कई कार्य किये, जांगलू प्रदेश में राव बीका जैसे योग्य व्यक्ति की सत्ता स्थापित करवाना, लोगों के आपसी झगड़े निपटाना, स्त्री सशक्तिकरण, गौ सेवा आदि के साथ पर्यावरण के लिए माता ने भरपूर कार्य किया। देशनोक में उन्होंने दस हजार बीघा भूमि पर ओरण बनवाया जो पर्यावरण व पशुधन के लिए वरदान साबित हुआ। यही नहीं करणीजी की प्रेरणा से प्रेरित होकर भविष्य में भी राजपूत राजाओं द्वारा अपने राज्यों में इस तरह के ओरण हेतु भूमि छोड़ने की परम्परा बन गई जो पर्यावरण के लिए वरदान साबित हुई।

150 वर्ष की आयु होने व अपने दैवीय अवतारों के कार्य पूर्ण होने पर करणीजी ने अपनी भौतिक देह त्याग करने का मानस बनाया और अपनी इच्छा परिजनों को बताई कि मैं जैसलमेर होती हुई तेमड़ाराय के दर्शन करके बहिन बूट और बहुचरा से मिलने खारोड़ा (सिंध, पाकिस्थान) जाऊँगी और वापसी के समय रास्ते में अपनी भौतिक देह का त्याग करुँगी। वि.सं. 1594 (1537 ई.) के माघ मास में अपने ज्येष्ठ पुत्र पूण्यराज, सारंगिया विश्नोई (रथवान) और एक सेवक के साथ करणीजी अपनी इस यात्रा के लिए रवाना हुई। वापसी यात्रा के समय वि.सं. 1595 (1538 ई.) चैत्र शुक्ला नवमी गुरुवार को गड़ियाला और गिराछर के बीच धीनेरू गांव की तलाई के पास पहुँचने पर करणीजी ने रथ को रुकवाया और वहीं अपनी देह त्याग हेतु मिट्टी की एक चौकी बनवाकर उस बैठे। रथवान सारंगिया विश्नोई को आदेश दिया कि उनके शरीर पर पानी उढेल दे। डा. नरेंद्रसिंह चारण के अनुसार ‘‘रथवान सारंगिया विश्नोई ने झारी लेकर उसका पानी उन पर उढेल दिया। ज्योंही झारी का पानी उनके भौतिक शरीर पर गिरा त्योंही उनके शरीर से एक ज्वाला निकली और उस ज्वाला में उसी क्षण उनका वह भौतिक शरीर अदृश्य हो गया। वहां कुछ भी नहीं था। ज्योति में ज्योतिर्लीन हो गये। इस प्रकार वि.सं. 1595 (1538 ई.) चैत्र शुक्ला नवमी गुरुवार को श्रीकरणीजी ज्योतिर्लीन हुए।’’

श्री करणी माता के मंदिर में आज भी दूर-दराज से भक्तगण उनके दर्शनार्थ आते है। राव बीका के वंशज बीका राठौड़ श्री करणी माता को अपनी ईष्ट देवी मानते हुए उनकी आराधना, उपासना करते है।


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