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Aug 25, 2016

आमेर के इतिहास प्रसिद्ध राजा मानसिंह हिन्दू धर्म के अनन्य उपासक थे. वे हिन्दू धर्म के सभी देवी और देवताओं के भक्त थे व हिन्दू धर्म में प्रचलित सभी सम्प्रदायों का समान रूप से आदर करते थे| उनकी धार्मिक आस्था पर भले ही समय समय पर किसी सम्प्रदाय विशेष का प्रभाव रहा हो, पर वे हमेशा एक आम राजपूत की तरह अपने ही कुलदेवी, कुलदेवता व इष्ट के उपासक रहे| अपनी दीर्घकालीन वंश परम्परा के अनुरूप राजा मानसिंह ने सभी सम्प्रदायों के संतों का आदर किया पर उनके जीवन पर रामभक्त संत दादूदयाल का सर्वाधिक प्रभाव रहा. यद्धपि राजा मानसिंह सनातन धर्म के दृढ अनुयायी रहे फिर भी वे धर्मान्धता और अन्धविश्वास से मुक्त धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोत थे. जिसकी पुष्टि रोहतास किले में एक पत्थर पर उनके द्वारा उत्कीर्ण करवाई एक कुरान की आयात से होती है, जिसमें कहा गया है कि- "धर्म का कोई दबाव नहीं होता, सच्चा रास्ता झूठे रास्ते से अलग होता है|"

राजा मानसिंह के काल में अकबर ने धर्म क्षेत्र में नया प्रयोग किया और अपने साम्राज्य में एक विश्वधर्म की स्थापना के लिए "दीने इलाही" धर्म विकसित किया| राजा मानसिंह अकबर के सर्वाधिक आज्ञाकारी सेवक थे, फिर भी अकबर की लाख कोशिशों के बाद भी वे अपने स्वधर्म से एक इंच भी दूर हटने को तैयार नहीं हुये| अकबर के दरबारी इतिहासकार बदायुनी का कथन है कि "एक बार 1587 में जब राजा मानसिंह बिहार, हाजीपुर और पटना का कार्यभार संभालने के लिए जाने की तैयारी कर रहे थे तब बादशाह ने उसे खानखाना के साथ एक मित्रता का प्याला दिया और दीने इलाही का विषय सामने रखा| यह मानसिंह की परीक्षा लेने के लिए किया गया| कुंवर ने बिना किसी बनावट के कहा अगर सेवक होने का मतलब अपना जीवन बलिदान करने की कामना से है तो मैंने अपना जीवन पहले ही अपने हाथ में ले रखा है| ऐसे में और प्रमाण की क्या जरुरत| अगर फिर भी इस बात का दूसरा अर्थ है और यह धर्म से सम्बन्धित है तो मैं निश्चित रूप से हिन्दू हूँ|"

इस तरह राजा मानसिंह ने अकबर द्वारा मित्रतापूर्वक धर्म परिवर्तन का प्रस्ताव ठुकरा कर अपने स्वधर्म में अप्रतिम आस्था प्रदर्शित की| रॉयल ऐशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल के जरनल में मि. ब्लौकमैन ने अपने लेख में लिखा है- "अकबर के अनुयायी मुख्यरूप से मुसलमान थे| केवल बीरबल को छोड़कर जो आचरणहीन था, दूसरे किसी हिन्दू सदस्य का नाम धर्म परिवर्तन करने वालों में नहीं था| वृद्ध राजा भगवंतदास, राजा टोडरमल और राजा मानसिंह अपने धर्म पर दृढ रहे यद्धपि अकबर ने उनको परिवर्तित करने की चेष्टा की थी|

राजा मानसिंह ने हिन्दू धर्म शास्त्रों के साथ साथ कुरान का भी गहन अध्ययन किया था और उसकी मूलभूत बातों से वे परिचित थे| मुंगेर में दौलत शाह नाम के एक मुस्लिम संत ने भी राजा मानसिंह को इस्लाम की शिक्षाओं से प्रभावित कर उनका धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश की पर राजा मानसिंह मानते थे कि परमात्मा की मोहर सबके हृदय पर है| यदि किसी की कोशिश से मेरे हृदय का वह ताला हटा सकती है तो मैं उसमें तत्काल विश्वास करने लग जावुंगा| यानी वह किसी भी धर्म को तभी स्वीकार करने को तैयार है बशर्ते वह धर्म उनके मन में सत्यज्ञान का उदय कर सके| इस तरह अकबर के साथ कई मुस्लिम सन्तों की चेष्टा भी राजा मानसिंह की स्वधर्म में अटूट आस्था को नहीं तोड़ सकी| राजा के निजी कक्ष की चन्दन निर्मित झिलमिली पर राधाकृष्ण के चित्रों का चित्रांकन राजा मानसिंह की हिन्दू धर्म में अटूट आस्था के बड़े प्रमाण है| आमेर राजमहल में राजा मानसिंह का निजी कक्ष में विश्राम के लिए अलग कक्ष व पूजा के लिए अलग कक्ष व पूजा कक्ष के सामने एक बड़ा तुलसी चत्वर, राजमहल के मुख्य द्वार पर देवी प्रतिमा राजा मानसिंह के धार्मिक दृष्टिकोण को समझने के लिए काफी है|
राजा मानसिंह ने अपने जीवनकाल में कई मंदिरों का निर्माण, कईयों का जीर्णोद्धार व कई मंदिरों के रख रखाव की व्यवस्था कर हिन्दूत्व के प्रचार प्रसार में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई| यही नहीं राजा मानसिंह ने हिन्दू मंदिरों के लिए अकबर के खजाने का भरपूर उपयोग किया और दिल खोलकर अकबर के राज्य की भूमि मंदिरों को दान में दी| बनारस में राजा मानसिंह ने मंदिर व घाट के निर्माण पर अपने एक लाख रूपये के साथ अकबर के खजाने से दस लाख रूपये खर्च कर दिए थे, जिसकी शिकायत जहाँगीर ने अकबर से की थी, पर अकबर ने उसकी शिकायत को अनसुना कर मानसिंह का समर्थन किया|

राजा मानसिंह ने अपने राज्य आमेर के साथ साथ बिहार, बंगाल और देश के अन्य स्थानों पर कई मंदिर बनवाये| पटना जिले बरह उपखण्ड के बैंकटपुर में राजा मानसिंह ने एक शिव मंदिर बनवाया और उसके रखरखाव की समुचित व्यवस्था की जिसका फरमान आज भी मुख्य पुजारी के पास उपलब्ध है| इसी तरह गया के मानपुर में भी राजा ने एक सुन्दर शिव मंदिर का निर्माण कराया, जिसे स्वामी नीलकंठ मंदिर के नाम से जाना जाता है| इस मंदिर में विष्णु, सूर्य, गणेश और शक्ति की प्रतिमाएं भी स्थापित की गई थी| मि. बेगलर ने बंगाल प्रान्त की सर्वेक्षण यात्रा 1872-73 की अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि- "राजा मानसिंह ने बड़ी संख्या में मंदिर बनाये और पुरानों का जीर्णोद्धार करवाया| ये मंदिर आज भी बिहार में बंगाल के उपखंडों में विद्यमान है| रोहतास किले में भी राजा मानसिंह द्वारा मंदिर बनवाये गए थे|

मथुरा के तत्कालीन छ: गुंसाईयों में से एक रघुनाथ भट्ट के अनुरोध पर राजा मानसिंह ने वृन्दावन में गोविन्ददेव का मंदिर बनवाया था|

आमेर के किले शिलादेवी का मंदिर भी राजा मानसिंह की ही देन है| शिलादेवी की प्रतिमा राजा मानसिंह बंगाल में केदार के राजा से प्राप्त कर आमेर लाये थे| परम्पराएं इस बात की तस्दीक करती है कि राजा मानसिंह ने हनुमान जी की मूर्ति को और सांगा बाबा की मूर्ति को क्रमश: चांदपोल और सांगानेर में स्थापित करवाया था| आज भी लोक गीतों में गूंजता है-

आमेर की शिलादेवी, सांगानेर को सांगा बाबो ल्यायो राजा मान|

आमेर में जगत शिरोमणी मंदिर का निर्माण कर उसमें राधा और गिरधर गोपाल की प्रतिमाएं भी राजा मानसिंह द्वारा स्थापित करवाई हुई है|
मंदिर निर्माणों के यह तो कुछ ज्ञात व इतिहास में दर्ज कुछ उदाहरण मात्र है, जबकि राजा मानसिंह ने हिन्दू धर्म के अनुयायियों हेतु पूजा अर्चना के के कई छोड़े बड़े असंख्य मंदिरों का निर्माण कराया, पुराने मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया और कई मंदिरों के रखरखाव की व्यवस्था करवाकर एक तरह से हिन्दुत्त्व के प्रसार में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई|

पर अफ़सोस जिस राजा मानसिंह ने हिन्दुत्त्व के प्रसार से इतना सब कुछ किया आज उसी राजा मानसिंह को वर्तमान हिन्दुत्त्ववादी कट्टर सोच के लोग अकबर का चरित्र हनन करते समय मानसिंह का भी चरित्र हनन कर डालते है| मानसिंह ने राणा प्रताप के खिलाफ युद्ध लड़ा, उसके लिए वे राणा के दोषी हो सकते है, लेकिन मानसिंह ने अकबर जैसे विजातीय के साथ अपने पुरखों द्वारा उस समय की तत्कालीन आवश्यकताओं व अपने राज्य के विकास हेतु की गई संधि को निभाते हुये, उसी की सैनिक ताकत से हिदुत्त्व की जो रक्षा की वह तारीफे काबिल है। लेकिन अफसोस वर्तमान पीढी बिना इतिहास पढ़े देश की वर्तमान परिस्थियों से उस काल की तुलना करते उनकी आलोचना करने में जुटी रहती है|


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Aug 24, 2016

किसी भी राजा या धर्म की ध्वजा उनके वर्चस्व, प्रतिष्ठा, बल और इष्टदेव का प्रतीक होता है। हर राजा, देश या धर्म की अपनी अपनी अलग अलग रंग की ध्वजा (झण्डा) होती है। हिन्दू मंदिरों में भगवा व पंचरंगा ध्वज लहराते नजर आते है। भगवा रंग हिन्दू धर्म के साथ वैदिक काल से जुड़ा है, हिन्दू साधू वैदिक काल से ही भगवा वस्त्र भी धारण करते आये है। लेकिन मुगलकाल में हिन्दू मंदिरों में पंचरंगा ध्वज फहराने का चलन शुरू हुआ। जैसा कि ऊपर बताया जा चूका है ध्वजा वर्चस्व, प्रतिष्ठा, बल और इष्टदेव का प्रतीक होती है। अपने यही भाव प्रकट करने के लिए आमेर के राजा मानसिंह ने कुंवर पदे ही अपने राज्य के ध्वज जो सफ़ेद रंग का था को पंचरंग ध्वज में डिजाइन कर स्वीकार किया।

राजा मानसिंहजी ने मुगलों से सन्धि के बाद अफगानिस्तान (काबुल) के उन पाँच मुस्लिम राज्यों पर आक्रमण किया, जो भारत पर आक्रमण करने वाले आक्रान्ताओं को शस्त्र प्रदान करते थे, व बदले में भारत से लूटकर ले जाए जाने वाले धन का आधा भाग प्राप्त करते थे। राजा मानसिंह ने उन्हें तहस-नहस कर वहाँ के तमाम हथियार बनाने के कारखानों को नष्ट कर दिया व श्रेष्ठतम हथियार बनाने वाली मशीनों व कारीगरों को वहाँ से लाकर जयगढ़ (आमेर) में शस्त्र बनाने का कारखाना स्थापित करवाया। इस कार्यवाही के परिणाम स्वरूप ही यवनों के भारत पर आक्रमण बन्द हुए व बचे-खुचे हिन्दू राज्यों को भारत में अपनी शक्ति एकत्र करने का अवसर प्राप्त हुआ। यही नहीं राजा मानसिंह आमेर ने भारतवर्ष में जहाँ वे तैनात रहे वहां वहां उन्होंने मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया व नए नए मंदिर बनवाये। मंदिरों की व्यवस्था के लिए भूमि प्रदान की. उड़ीसा में पठानो का दमन कर जगन्नाथपुरी को मुसलमानों से मुक्त कर वहाँ के राजा को प्रबन्धक बनाया। हरिद्वार के घाट, हर की पैडियों का भी निर्माण भी मानसिंह ने करवाया।
मानसिंहजी की इस कार्यवाही को तत्कालीन संतों ने पूरी तरह संरक्षण व समर्थन दिया तथा उनकी मृत्यु के बाद हरिद्वार में उनकी स्मृति में हर की पेड़ियों पर उनकी विशाल छतरी बनवाई। यहाँ तक कि अफगानिस्तान के उन पाँच यवन राज्यों की विजय के चिन्ह स्वरूप जयपुर राज्य के पचरंग ध्वज को धार्मिक चिन्ह के रूप में मान्यता प्रदान की गई व मन्दिरों पर भी पचरंग ध्वज फहराया जाने लगा। नाथ सम्प्रदाय के लोग "गंगामाई" के भजनों में धर्म रक्षक वीरों के रूप में अन्य राजाओं के साथ राजा मानसिंह का यशोगान आज भी गाते।

आमेर राज्य के सफ़ेद ध्वज की जगह पंचरंग ध्वज के पीछे की कहानी-
इतिहासकार राजीव नयन प्रसाद ने अपनी पुस्तक "राजा मानसिंह" के पृष्ठ संख्या 111 पर जयपुर के पंचरंग ध्वज के बारे में कई इतिहासकारों के सन्दर्भ से लिखा है- "श्री हनुमान शर्मा ने अपनी पुस्तक "जयपुर के इतिहास" में लिखा है कि जयपुर पंचरंगा ध्वज की डिजाइन मानसिंह ने बनायी थी। जब वह काबुल के गवर्नर थे। इसके पहले राज्य का ध्वज श्वेत रंग था। श्री शर्मा आगे चलकर कहते है कि जब मनोहरदास जो मानसिंह का एक अधिकारी था, उत्तर-पश्चिम सीमान्त प्रदेश के अफगानों से लड़ रहा था। उसने लूट के माल के रूप में उनसे भिन्न-भिन्न पांच रंगों के ध्वज प्राप्त किये थे। ये ध्वज नीले, पीले, लाल, हरे और काले रंग के थे। मनोहरदास ने कुंवर को सुझाव दिया कि राज्य का ध्वज कई रंगों का होना चाहिये केवल श्वेत रंग का नहीं। इस सुझाव को शीघ्र स्वीकार कर लिया गया। उस समय से जयपुर राज्य का ध्वज पांच रंगों वाला हो गया। ये रंग है नीला, पीला, लाल और काला।

श्री शर्मा के कथन के पीछे स्थानीय परम्परा है। जयपुर के लोग इस कथन की पुष्टि करते है कि राज्य का पंचरंगा झण्डा सबसे पहले कुंवर मानसिंह ने तैयार किया था। उस समय वे काबुल के गवर्नर थे। इसके अतिरिक्त श्री पट्टाभिराम शास्त्री जो महाराजा संस्कृत कालेज जयपुर के प्रिंसिपल थे ने अपने जयवंश महाकाव्य की भूमिका में इस तथ्य का उल्लेख किया कि जयपुर के पंचरंग ध्वज की कल्पना मानसिंह द्वारा की गई थी।"

रियासती काल में झंडे की वंदना में यह उल्लेखित है:-
मान ने पांच महीप हराकर,
पचरंगा झंडा लहराकर,
यश से चकित किया जग सारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा। (मदनसिंह जी झाझड़)

26 अगस्त 1915 ई. को सलेमाबाद में निम्बार्क पीठ के राधा-कृष्ण के भव्य मंदिर को ए.जी.जी. राजपुताना के सैक्रेटरी और इंस्पेक्टर जनरल पुलिस मिस्टर केई ने नसीराबाद छावनी के 50 सैनिकों, पुलिस दल व किशनगढ़ राज्य के दीवान के नेतृत्व में आये घुड़सवारों के दल के साथ प्रात:काल से ही घेर रखा था. गढ़ीनुमा बने इस मंदिर की एक बुर्ज पर देश की स्वतंत्रता के लिए क्रांति के अग्रदूत राव गोपालसिंह जी और उनके काका मोड़सिंह जी मरने का प्रण लेकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा जमाये बैठे थे. मन्दिर के महन्त श्री बालकृष्ण शरण देवाचार्य जी क्रांतिकारी राव गोपालसिंह जी से मंदिर के पिछले रास्ते से निकल जाने की विनती कर रहे थे, वे क्रांतिकारियों से कह रहे थे कि- देश में स्वतंत्रता की अलख जगाने के लिए आपका जीवित व स्वतंत्र रहना आवश्यक है, अत: आप पीछे के रास्ते से निकल जाईए, उसके बाद जो होगा मैं सह लूँगा, वैसे भी मुझ फक्कड़ का सरकार क्या बिगाड़ लेगी? लेकिन क्षात्र धर्म के अटूट अनुयायी राव साहब अंग्रेजों को पीठ कैसे दिखा सकते थे. अत: उन्होंने महन्त जी बात को अस्वीकार कर आखिरी दम तक संघर्ष करने का फैसला करते हुए मोर्चे पर डटे रहने का निर्णय लिया.

मन्दिर के घेरे का संचालक मि. केई रक्तपात के पक्ष में नहीं था. वह जानता था कि मंदिर में रक्तपात और राजपुताना के प्रभावशाली और लोकप्रिय व्यक्ति राव गोपालसिंह जी की हत्या के बाद राजपुताना के राजनैतिक हालात ख़राब हो सकते है. अत: वह बिना किसी रक्तपात के राव गोपालसिंह जी को बन्दी बनाना चाहता था. अजमेर-मेरवाड़ा के चीफ कमिश्नर मि. केई को उसके उच्चाधिकारियों द्वारा यही राय दी गई थी कि खरवा राव साहब को ससम्मान समर्पण के लिए तैयार किया जाये. अत: मि. केई उन्हें आत्म-समर्पण के लिए तैयार करने के प्रयत्न में लगा.

मि. केई वार्तालाप करने के लिए मन्दिर के अन्दर गया. उसने राव गोपालसिंह जी को आत्म-समर्पण करने का अनुरोध करते हुए बताया कि उनके विरुद्ध काशी-षड्यंत्र केस में शामिल होने का पुख्ता सबूत सरकार को नहीं मिला है. आप पर केवल "भारत रक्षा कानून" के तहत टॉडगढ़ से फरार होने का अभियोग है, जिसके फलस्वरूप आपको अधिक हानि नहीं होगी. मि. केई ने ये सब बातें लिखित में दे दी. राव गोपालसिंह जी ने शर्त रखी कि शस्त्र राजपूतों के लिए पूजनीय धार्मिक चिन्ह माने जाते है. अत: उनसे शस्त्र लेने की चेष्टा न की जाये. इस शर्त को मानने में क़ानूनी बाधाएं पैदा हो सकती थी. अत: तय किया गया कि सरकार राव गोपालसिंह जी से शस्त्र नहीं लेगी, किन्तु वे अपने शस्त्र मन्दिर में ठाकुर जी की प्रतिमा के भेंट चढ़ा देंगे, जो मन्दिर की सम्पत्ति मानी जायेगी. उन्हें वहां से हटाने का किसी को भी अधिकार नहीं होगा.
मन्दिर में हुए वार्तालाप में राव साहब ने इच्छा प्रकट की थी कि मि. केई घेरा उठाकर अजमेर चले जायें तथा वे स्वयं दूसरे दिन सुबह अजमेर पहुँच जायेंगे. मि. केई राव साहब के कथन पर विश्वास करके घेरा उठाकर अजमेर चला गया.
27 अगस्त 1915 को राव गोपालसिंह जी मंदिर में ठाकुर जी की प्रतिमा के आगे शस्त्र समर्पित कर अजमेर पहुँच गये. भारत रक्षा कानून के तहत नजरबन्दी तोड़ने के अपराध में उन पर मुकदमा चलाया गया. अजमेर के जिला कमिश्नर ए.टी.होम ने जिला मजिस्ट्रेट की हैसियत से उन पर मुकदमें की सुनवाई की. उन्हें दो वर्ष के कारावास की सादी सजा सुनाई गई. बनारस षड्यंत्र के अभियोग में उन्हें मुक्त कर दिया गया. उन्हें अजमेर जेल में रखा गया. यह सजा पूरी होने के बाद उन्हें मुक्त कर देना आवश्यक था. परन्तु भारत में चल रही क्रांतिकारी गतिविधियों को मध्यनजर रखते हुए सरकार ने ऐसे प्रभावशाली और लोकप्रिय व्यक्ति का जनता के बीच में रहना खतरनाक समझा. उन्हें भारत रक्षा कानून के तहत पुन: नजरबन्द कर दिया गया. पांच माह पश्चात् उन्हें "तिलहर" नामक स्थान पर स्थान्तरित कर दिया गया. तिलहर उत्तरप्रदेश के शाहजहांपुर जिले में है. तिलहर में दो वर्ष नजरबन्दी जीवन बिताने के पश्चात् मार्च 1920 में उन्हें मुक्त किया गया. जेल से मुक्त होने पर वे अजमेर आये जहाँ नगर की जनता ने अपने प्रिय नेता का अभूतपूर्व स्वागत किया.

राव गोपालसिंह जी द्वारा ठाकुर जी की प्रतिमा के आगे समर्पित किये शस्त्र आज भी मंदिर की सम्पत्ति है. कुछ वर्ष पहले मंदिर के मंदिर के पुजारियों ने शस्त्रों के साथ छेड़छाड़ कर उन्हें बदल दिया और वहां नकली शस्त्र रख दिए लेकिन राजपूत समाज के एक जागरूक बंधू की कोशिशों ने पुजारियों की करतूतें विफल कर दी और वे हथियार आज मंदिर में सुरक्षित है.

(हथियारों के सम्बन्ध में पुजारियों की करतूत की प्रमाणिक रिपोर्ट फिर कभी)


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Aug 22, 2016

Truth of Tantya Tope's hanging


सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के चर्चित और महत्त्वपूर्ण नायक तांत्या टोपे के बारे में इतिहास में प्रचलित है कि- "तांत्या टोपे को उनके एक सहयोगी राजा मानसिंह कछवाह अंग्रेजों से मिल गये और तांत्या के साथ विश्वासघात कर उन्हें पकड़वा दिया। पकड़ने के बाद अंग्रेजों ने तांत्या टोपे को 18 अप्रैल सन 1859 को ग्वालियर के राजा सिन्धिया के महल के सामने फांसी दे दी गई।" आप इंटरनेट पर सर्च करें या स्वतंत्रता आन्दोलन का इतिहास पढ़ें, सभी लोगों ने बिना शोध किये कॉपी पेस्ट कर यही उक्त प्रचारित बात लिख कर तांत्या टोपे को शरण देने वाले, उनके परम सहयोगी और अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंक कर स्वतंत्रता समर के महानायक तांत्या टोपे के प्राण बचाने वाले, राजा मानसिंह कछवाह को इतिहास में बदनाम कर दिया। उन्हें तांत्या टोपे व देश का गद्दार घोषित करने की कोशिश की गई। ठीक उसी तरह जैसे कन्नौज के धर्मपरायण और देशभक्त महाराज जयचंद गहड़वाल पर मुहम्मद गौरी को बुलाने का आरोप प्रचारित कर उनका नाम गद्दार का पर्यायवाची बना दिया. जबकि इतिहास में कहीं भी जयचंद पर यह आरोप नहीं कि गौरी को उन्होंने बुलाया, चंदबरदाई ने भी अपने पृथ्वीराज रासो में कहीं नहीं लिखा कि गौरी को जयचंद ने बुलाया था। फिर भी पंडावादी तत्वों व बाद में कथित सेकुलर गैंग के लेखकों ने उन्हें गद्दार प्रचारित कर दिया।

ठीक इसी तरह तांत्या टोपे की गिरफ्तारी पर तांत्या टोपे व राजा मानसिंह कछवाह द्वारा अंग्रेजों को बेवकूफ बनाने की चाल वाली योजना पर बिना शोध किये कई लेखकों ने सुनी सुनाई बात के आधार पर राजा मानसिंह को गद्दार लिख दिया। इसी तरह के एक कथित इतिहासकार सुन्दरलाल अपनी पुस्तक "भारत में अंग्रेजी राज- भाग-2" के पृष्ठ 962 पर लिखते है कि- "मानसिंह इस समय तक अंग्रेजों से मिल चुका था। उससे जागीर का वायदा कर लिया गया था। 7 अप्रैल सन 1859 को ठीक आधी रात के समय सोते हुये तांत्या टोपे को शत्रु के हवाले कर दिया गया। 18 अप्रैल सन 1859 को तांत्या टोपे को फांसी पर लटका दिया गया।"

जबकि हकीकत यह है कि करीब एक वर्ष तक साधनहीन रहते हुए तांत्या टोपे युद्ध करते हुए नरवर राज्य के पास पाडोन के जंगल में राजा मानसिंह के पास पहुँच गया। राजा मानसिंह तांत्या टोपे के अभिन्न मित्र थे, अत: उन्होंने तांत्या टोपे की सहायता की। अंग्रेजों को तांत्या टोपे के राजा मानसिंह के पास रहने की सूचना मिल गई। ब्रिटिश सेनाधाकारी भीड़ के सैनिकों ने तांत्या टोपे को पकड़ने के लिए पाडोन में आकर राजा मानसिंह के परिवार को बन्धक बना लिया। जिससे कि राजा मानसिंह पर दबाव डालकर तांत्या टोपे को गिरफ्तार किया जा सके। राजा मानसिंह के परिजनों को मुक्त करने के बदले अंग्रेजों ने शर्त रखी कि वह तांत्या टोपे को अंग्रेजों के हवाले करे, तभी उनका परिवार मुक्त किया जायेगा।

इधर राजा मानसिंह ने बड़ी चतुराई से तांत्या टोपे को राजस्थान होते हुए महारष्ट्र की ओर भेज दिया। राजा मानसिंह ने योजनानुसार तांत्या टोपे के हमशक्ल नारायणराव भागवत को उनकी सहमति से तांत्या टोपे को बचाने के लिए नारायणराव को तांत्या टोपे बनाकर अंग्रेज अधिकारी भीड़ को 7 अप्रैल सन 1859 को सुपुर्द कर दिया। इसी तथाकथित तांत्या टोपे को शिवपुरी ले जाकर ग्वालियर के राजा सिन्धिया के महल के सामने उन पर सैनिक अदालत में मुकदमे का नाटक चलाकर दोषी घोषित करते किया गया और 18 अप्रैल सन 1859 को महल के सामने फांसी दे दी गई। नारायणराव ने राष्ट्रहित में शहादत देकर तांत्या टोपे को बचा लिया था। कई कथित कॉपी पेस्ट कर इतिहास लिखने वाले लेखकों ने बिना इस तथ्य पर ध्यान दिए राजा मानसिंह पर लांछन लगा दिया। जबकि "राजस्थान हिस्ट्री कांग्रेस के नवें अधिवेशन में कुछ ऐतिहासिक सामग्री प्रकाश में आई है, उसके अनुसार मानसिंह व तांत्या टोपे ने एक योजना बनाई, जिसके अनुसार टोपे के स्वामिभक्त साथी को नकली तांत्या टोपे बनने क एलिए राजी कर तैयार किया गया और इसके लिए वह स्वामिभक्त तैयार हो गया। उसी नकली तांत्या टोपे को अंग्रेजों ने पकड़ा और फांसी दे दी। असली तांत्या टोपे इसके बाद भी आत-दस वर्ष तक जीवित रहा और बाद में वह स्वाभाविक मौत से मरा। वह हर वर्ष अपने गांव जाता था और अपने परिजनों से मिला करता था (रण बंकुरा, अगस्त 1987 में कोकसिंह भदौरिया का लेख) ।"
गजेन्द्रसिंह सोलंकी द्वारा लिखित व अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक "तांत्या टोपे की कथित फांसी" में अनेक दस्तावेजों एवं पत्रों का उल्लेख किया है तथा उक्त पुस्तक के मुख्य पृष्ठ पर नारायणराव भागवत का चित्र भी छापा है। पुस्तक में उल्लेख है कि सन 1957 ई. में इन्दौर विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित डा. रामचंद्र बिल्लौर द्वारा लिखित "हमारा देश" नाटक पुस्तक के पृष्ठ स.46 पर पाद टिप्पणी में लिखा है कि इस सम्बन्ध में एक नवीन शोध यह है कि राजा मानसिंह ने तांत्या टोपे को धोखा नहीं दिया, बल्कि अंग्रेजों की ही आँखों में धूल झोंकी। फांसी के तख़्त पर झूलने वाला कोई देश भक्त था। जिसने तांत्या टोपे को बचाने के लिए अपना बलिदान दे दिया।

तांत्या टोपे स्मारक समिति ने "तांत्या टोपे के वास्ते से" सन 1857 के क्रांतिकारी पत्र के नाम से सन 1978 में प्रकाशित किये है। उक्त पत्रावली मध्यप्रदेश अभिलेखागार भोपाल (म.प्र.) में सुरक्षित है। इसमें मिले पत्र संख्या 1917 एवं 1918 के दो पत्र तांत्या टोपे के जिन्दा बचने के प्रमाण है। उक्त पुस्तक में यह भी उल्लेख किया गया है कि तांत्या टोपे शताब्दी समारोह बम्बई में आयोजित किया गया था। जिसमें तांत्या टोपे के भतीजे प्रो. टोपे तथा उनकी वृद्धा भतीजी का सम्मान किया गया था। अपने सम्मान पर इन दोनों ने प्रकट किया कि तांत्या टोपे को फांसी नहीं हुई थी। उनका कहना था कि सन 1909 ई. में तांत्या टोपे का स्वर्गवास हुआ और उनके परिवार ने विधिवत अंतिम संस्कार किया था।

सन 1926 ई. में लन्दन में एडवर्ड थाम्पसन की पुस्तक "दी अदर साइड ऑफ़ दी मेडिल" छपी थी। इस पुस्तक में भी तांत्या टोपे की फांसी पर शंका प्रकट की गई है। इससे सिद्ध होता है कि राजा मानसिंह ने तांत्या टोपे के साथ कभी भी विश्वासघात नहीं किया और न ही उन्हें अंग्रेजों द्वारा कभी जागीर दी गई थी। पर अफ़सोस कुछ इतिहासकारों ने बिना शोध किये उन पर यह लांछन लगा दिया। तात्या टोपे से जुड़े नये तथ्यों का खुलासा करने वाली किताब 'टोपेज़ ऑपरेशन रेड लोटस' के लेखक पराग टोपे के अनुसार- "शिवपुरी में 18 अप्रैल, 1859 को तात्या को फ़ाँसी नहीं दी गयी थी, बल्कि गुना ज़िले में छीपा बड़ौद के पास अंग्रेज़ों से लोहा लेते हुए 1 जनवरी, 1859 को तात्या टोपे शहीद हो गए थे।" पराग टोपे के अनुसार- "इसके बारे में अंग्रेज़ मेजर पैज़ेट की पत्नी लियोपोल्ड पैजेट की किताब 'ऐंड कंटोनमेंट : ए जनरल ऑफ़ लाइफ़ इन इंडिया इन 1857-1859' के परिशिष्ट में तात्या टोपे के कपड़े और सफ़ेद घोड़े आदि का जिक्र किया गया है और कहा कि हमें रिपोर्ट मिली की तात्या टोपे मारे गए।" उन्होंने दावा किया कि टोपे के शहीद होने के बाद देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी अप्रैल तक तात्या टोपे बनकर लोहा लेते रहे। पराग टोपे ने बताया कि तात्या टोपे उनके पूर्वज थे। उनके परदादा के सगे भाई। उपरोक्त ऐतिहासिक सन्दर्भ साफ़ करते है कि नरवर के पास पाडोन के राजा मानसिंह कछवाह ने अभिन्न मित्र और स्वतंत्रता संग्राम के एक नायक तांत्या टोपे के साथ को विश्वासघात नहीं किया, बल्कि उन्होंने तांत्या टोपे द्वारा बनाई गई योजनानुसार अंग्रेजों को बेवकूफ बनाया और स्वतंत्रता सेनानी तांत्या टोपे की जान बचाई, वहीं उक्त ऐतिहासिक तथ्य नारायणराव भागवत के बलिदान को भी उजागर करते है, जिन्होंने भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों से लोहा ले रहे एक नायक को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।

हम देश हित में तांत्या टोपे के प्राण बचाने हेतु अपने प्राणों का बलिदान करने वाले नारायणराव भागवत को उनके महान बलिदान पर शत शत नमन करते है और तांत्या टोपे की सहायता करने व उसके प्राण बचाने हेतु योजनानुसार अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंकने पर राजा मानसिंह कछवाह पर गर्व है।


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