राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .

जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !

मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.

भूतों का महल : भानगढ़ का सच

राजस्थान के भानगढ़ का उजड़ा किला व नगर भूतों का डरावना किले के नाम से देश विदेश में चर्चित है.

"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था

उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.

क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत

आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.

Jun 17, 2013

नहीं सुलझा जोधा-अकबर सीरियल विवाद

Zee TV पर कल से प्रसारित होने जा रहे धारावाहिक जोधा अकबर पर देशभर के क्षत्रिय समाज में रोष है और देशभर से जगह जगह इस धारावाहिक के विरोध प्रदर्शनों की ख़बरें आ रही है| राजस्थान के बड़े केबल ऑपरेटर्स ने भी श्री राजपूत करणी सेना की अपील पर इस सीरियल को अपने अपने केबल नेटवर्क पर न दिखाने का आश्वासन है साथ ही राजस्थान के कई बड़े केबल ऑपरेटर्स ने Zee TV से भी अपील की है कि जन भावनाओं को आहत व इतिहास से छेड़छाड़ करने वाले इस सीरियल को ना दिखाये|

क्षत्रिय समाज के रोषपूर्ण विरोध को देखते हुए Zee TV प्रबंधन ने संवेदशीलता का परिचय देते हुए पहले भी इंडियन ब्राडकास्टिंग फाउंडेशन के दफ्तर में क्षत्रिय नेताओं के साथ एक बैठक कर उनका पक्ष सुना और बालाजी टेलीफिल्म्स को बताया पर बालाजी टेलीफिल्म्स ने इस मामले में कोई रुची नहीं ली पर देशभर में विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए आखिर बालाजी टेलीफिल्म्स ने भी इस मुद्दे की संवेदनशीलता समझी और आज क्षत्रिय समाज के नेताओं को दिल्ली में वार्ता के लिए आमंत्रित कर उनका पक्ष सुना व सीरियल के इतिहास पर अपना पक्ष भी रखा| बैठक का प्रतिनिधित्व करने के लिए बालाजी टेलीफिल्म्स की और से एकता कपूर के पिता जितेन्द्र खुद विशेष तौर से मुंबई से दिल्ली आये|

बैठक में क्षत्रिय समाज की और इतिहासकार प्रो.प्रहलाद सिंह ने जोधा के बारे में ऐतिहासिक तथ्य पेश करते हुए बताया कि अकबर के जोधा नाम की कोई बीबी नहीं थी, जिसे आप जोधा कह रहे है उसका नाम हरखा था|

बालाजी टेलीफिल्म्स की और से ड़ा. बोधित्सव ने अपना पक्ष रखते हुए कुछ इतिहास पुस्तकें प्रस्तुत की जिनमें अकबर की पत्नी का नाम जोधा अंकित था| पर वे पुस्तकें कुछ वर्ष पहली की ही प्रकाशित है साथ ही जिन लेखकों ने लिखी है उनकी इतिहासकारों में कोई मान्यता नहीं है| ये लगभग पुस्तकें मुगले आजम फिल्म के बाद की लिखी गयी है जिनमें मुगले आजम से प्रेरित होकर अकबर की पत्नी का नाम हरखा की जगह जोधा लिखा गया है| अत: इन पुस्तकों की विश्वसनीयता व प्रमाणिकता को ठुकराते हुए क्षत्रिय प्रतिनिधियों ने इन पुस्तकों को झूंठ को पुलिंदा बताते हुए उनके शोध को हास्यास्पद बताया कि वे खुद अकबर के सामने उसके काल में लिखी अबुल फजल द्वारा लिखी पुस्तक आईने अकबरी, अकबर नामा, जहाँगीर के काल में लिखी जहाँगीर नामा पुस्तकों को अपने शोध में शामिल नहीं किया और कल के छिछोरे पूर्वाग्रह से ग्रसित लेखकों की किताबों पर भरोसा कर रहे है|

आपसी वार्ता में Zee TV टीम व बालाजी टेलीफिल्म्स के जितेन्द्र ने क्षत्रिय प्रतिनिधियों द्वारा दिए गये ऐतिहासिक साक्ष्यों को प्रमाणिक मानते हुए स्वीकार भी किया कि ये मुगले आजम फिल्म के वक्त गलती हुई है पर चूँकि मुगले आजम की प्रसिद्धि के बाद आम जनता में अकबर की बीबी का नाम जोधा चढ़ गया इसलिए अब कोई फ़िल्मकार इससे बाहर निकलने को राजी नहीं| साथ ही जितेन्द्र ने क्षत्रिय प्रतिनिधियों को आश्वस्त भी किया कि वे इस सीरियल की स्टोरी में व आगे भी कोई सीरियल बनायेंगे तो क्षत्रिय समाज की भावनाएं किसी तरह आहत ना हो इसका पूरा ध्यान रखेंगे| साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वे शुरू से ही राजपूत संस्कृति व राजपूत समाज को बहुत आदर से देखते है और उनके मन में राजपूतों के शौर्य, ईमानदारी, वचनबद्धता, देशभक्ति आदि के लिए असीम आदर है|

लेकिन सीरियल के नाम बदलने व उसे बंद करने में उन्होंने असमर्थता जताते हुए कहा कि सीरियल बनाने से पहले उन्होंने इस पर पूरा शोध करवाया पर अफ़सोस कि उन्हें जो इतिहास पुस्तकें मिली उनमें अकबर की बीबी का नाम जोधाबाई ही लिखा हुआ है व यदि उन्हें जोधा-अकबर फिल्म के विवाद का भी पता होता तो वे इसे शुरू करने से बचते| पर चूँकि अब वे इसमें काफी आगे बढ़ चुके है अत: पीछे लौटना उनके लिए मुश्किल है पर वे कोशिश करेंगे कि सीरियल में किसी भी तरह किसी की भावनाएं आहत ना हो|

जी टीवी टीम ने भी राजपूत समाज के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चलने की अपनी प्रतिबद्धता जताई पर सीरियल के मामले में साफ़ किया कि वे व्यापारिक अनुबंध के चलते इसे प्रसारित करने को मजबूर है पर राजपूत समाज की भावनाओं की कद्र करते हुए सीरियल के साथ इसका ऐतिहासिक तथ्यों से कोई लेना देना नहीं का या समाज चाहे वैसा डिस्क्लेमर चला सकते है व वे चलाएंगे भी|साथ ही Zee TV टीम ने अपने समाचारों में व अलग कार्यक्रम बना इस मुद्दे पर क्षत्रिय प्रतिनिधियों व इतिहासकारों द्वारा पेश साक्ष्यों पर चर्चा कर इस मामले में सही सन्देश व ऐतिहासिक साक्ष्य जनता तक पहुँचाने पर जोर दिया व इसकी व्यवस्था करने का खुद जिम्मा लिया|

लेकिन क्षत्रिय प्रतिनिधियों व नेताओं ने साफ कह दिया कि वे सीरियल में अकबर के साथ जोधा नाम जोड़ने के किसी भी कृत्य को स्वीकार नहीं करेंगे और उनका विरोध जारी रहेगा साथ ही न्यायालय में भी वे इस सीरियल को रोकने के लिए याचिका दायर करेंगे| हालाँकि इस सीरियल को रोकने हेतु जयपुर व जोधपुर उच्च न्यायालय में दो याचिकाएं दायर कर दी गयी है|
इस वार्ता में करणी सेना के संस्थापक लोकेन्द्र सिंह कालवी के साथ रतन सिंह शेखावत, राजेंद्र सिंह नरुका, गणपत सिंह राठौड़, प्रहलाद सिंह व कुलदीप तोमर थे, वहीँ बालाजी टेलीफिल्म्स की टीम में एकता कपूर के पिता जितेन्द्र के साथ डा. बोधित्सव व उनके क़ानूनी सलाहकार थे| Zee TV टीम में एक्सिक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट आलोक गोविल, अजय भंवरकर, एडिटर वासिन्द्र मिश्रा, भरत कुमार रांका, पुरुषोतम आदि उपस्थित थे|


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Jun 15, 2013

जोधा-अकबर : कहाँ से शुरू हुआ भ्रम और विवाद ?

गोवरिकर की फिल्म जोधा-अकबर को श्री राजपूत करणी सेना ने इतिहास के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए विरोध कर राजस्थान के किसी सिनेमाघर में आजतक प्रदर्शित नहीं होने दी| यह विवाद अभी ठीक से शांत ही नहीं हुआ था कि एकता कपूर की बालाजी टेलीफिल्म्स ने इसी विषय जोधा-अकबर पर सीरियल बना जी टीवी पर प्रसारित करने की घोषणा व तैयारी करली| जी. टीवी पर इस सीरियल के प्रोमो देखने के बाद देशभर के राजपूत संगठनों में इस सीरियल को लेकर रोष भड़क गया, इंडियन ब्राडकास्टिंग फाउंडेशन में शिकायत के बाद फाउंडेशन के अधिकारीयों व राजपूत संगठनों के प्रतिनिधियों से इस मुद्दे पर चर्चा हुई व जी. टीवी टीम ने राजपूत संगठनों द्वारा व्यक्त रोष व ऐतिहासिक तथ्य बालाजी टेलीफिल्म्स को देने के बाद बालाजी टेलीफिल्म्स विवाद को सुलझाने के बजाय उल्टा जी टीवी को हड़काने लगी कि आप उन्हें कैसा सीरियल बनाना है पर राय देने वाले कौन होते है ?

बालाजी टेलीफिल्म्स को जोधा का अकबर की बेगम नहीं होने के प्रमाणिक ऐतिहासिक संदर्भ देने के बावजूद बालाजी टेलीफिल्म्स सीरियल में झूंठा इतिहास दिखाने पर तुली है|

जबकि इतिहास में कहीं भी जोधाबाई का अकबर की पत्नी के रूप में उल्लेख नहीं है| कोई भी ऐतिहासिक साक्ष्य या ऐतिहासिक स्रोत भी इस बारे में कोई संकेत नहीं देता है कि “जोधाबाई-अकबर की पत्नी थी|” प्रश्न उठता है कि इस विवाद की शुरुआत कहाँ से हुआ ? और पुरे ऐतिहासिक साक्ष्य मिलने के बावजूद फ़िल्मकार इस गलती को सुधारने में रूचि क्यों नहीं लेते ? हम इस पर दृष्टिपात करें –

अग्रवाल स्नातकोतर महाविद्यालय के इतिहास विभागाध्यक्ष और प्रिंसिपल प्रो. राजेंद्र सिंह खंगारोत इस संबंध में लिखते है :--

“इस सब की शुरुआत हुई कर्नल जेम्स टॉड की पुस्तक “एनल्स एंड एंटीकिव्टीज ऑफ़ राजस्थान” से| इस पुस्तक के भाग 2 में उन्होंने लिखा- “जोधाबाई के अकबर विवाह के कारण शाही परिवार का संबंध जोधपुर से स्थापित हुआ|” (पृष्ठ ९६५) यहाँ टॉड ने उल्लेख किया है कि- “ये जोधाबाई जोधपुर की जोधाबाई है न कि आमेर की|” (पृष्ठ ९६५) पर इसी पुस्तक में पुस्तक के संपादक विलियम कुक ने “आईने ए अकबरी” पृष्ठ ६१९ का सन्दर्भ देते हुए तोड़ के आशय को स्पष्ट किया है| कुक लिखते है- “जोधाबाई के बारे में कुछ संदेह हो सकता है परन्तु यह स्पष्ट है कि वह जहाँगीर की पत्नी थी, अकबर की नहीं|” (पृष्ठ ९६५)

अन्यत्र कर्नल जेम्स टॉड ने “जोधाबाई को जोधपुर के मोटाराजा उदयसिंह की पुत्री बताया है|” (एनल्स एंड एंटीकिव्टीज ऑफ़ राजस्थान, अंक 1 (पृष्ठ 389), इसी पृष्ठ पर फुटनोटों में कुक ने स्पष्ट किया है- “शाहजहाँ की माँ जोधबाई का विशाल मकबरा आगरा के पास सिकन्दर में अवस्थित है और निकट ही अकबर के अवशेष भी जमीदोज किये गये है| जोधबाई एक संबोधन है जिसका मतलब है “जोधपुर की बेटी|” उनकी पहचान के संबंध में कुछ संदेह उत्पन्न हो सकते है लेकिन यह निर्विवाद है कि वे उदयसिंह की पुत्री और जहाँगीर की पत्नी थी|” (आईने ए अकबरी पृष्ठ ६१९)

इस निष्कर्ष के साथ कि जोधाबाई शाहजहाँ की माँ थी; यह स्वत: सिद्ध हो जाता है कि वह जहाँगीर की ही पत्नी थी| “जोध” शब्द मूलतः जोधपुर का प्रारंभिक शब्दांश ही प्रतीत होता है| कुक ने यहाँ यह स्पष्ट कर दिया है कि जोधबाई “जोधपुर की बेटी” के रूप में प्रचलित अभिधा (नाम) का ही पर्याय है|

फिल्म “मुग़ल ए आजम” में फ़िल्मकार ने टॉड के मत से प्रेरणा लेकर जोधाबाई को अकबर की पत्नी बताया| फिल्म के पटकथा लेखक ने फुटनोटों के रूप में कुक के दिए स्पष्टीकरणों को नजर अंदाज कर दिया, साथ ही निर्माता और निर्देशक ने भी ऐतिहासिक तथ्यों पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया|

फिल्मांकन की दृष्टि से यह फिल्म इतनी भव्य थी कि जिसने भी इस फिल्म को देखा सभी ने जोधाबाई को अकबर की पत्नी के रूप में स्वीकारा| जिसने भी इस तथ्य के विरुद्ध कोई विचार या सत्य व्यक्त करने का प्रयास करना चाहा उन्हें व्यर्थ सिद्ध कर दिया गया| इससे सिद्ध होता है कि सिनेमा- चाहे वह सही हो या गलत- किस हद तक आम आदमी के मस्तिष्क को प्रभावित करता है|

इतिहास केवल और केवल तथ्यों पर ही आधारित होता है| किसी को भी तथ्यों को बदलने का अधिकार नहीं है और न ही ये बदले जाने चाहिये| इतिहास में दर्ज प्रत्येक घटना भी तथ्यों पर आधारित होती है और यह तथ्य अपरिवर्तनीय होते है| जो बदल सकता है वह है उस घटना की केवल विश्लेषणात्मक व्याख्या| उदाहरण के लिए पानीपत का प्रथम युद्ध २१ अप्रैल १५२६ को लड़ा गया और बेनजीर भुट्टो की हत्या २७ दिसम्बर २००७ में हुई- ये तथ्य है; कैसे, कब, कहाँ, किसने, और क्यों ? –ये विश्लेषण के विषय हो सकते है|

दिग्भ्रमित गाइड फतेहपुर सीकरी स्थित जोधाबाई के महल को अकबर-जोधा संबंधों की पुष्टि के एक और तर्क के रूप में प्रस्तुत करते है और उस महल को अकबर की पत्नि जोधाबाई का महल बताते है जबकि वी.एस. भार्गव इसे स्पष्ट करते हुए कहते है कि –“अनभिज्ञ गाइडों द्वारा फतेहपुर सीकरी स्थित महल को जोधाबाई- जो कि उनके अनुसार अकबर की बेगम थी का महल बताने से पर्यटकों के मध्य एक गलत परम्परा पड़ी, परन्तु समकालीन इतिहास इस परम्परा की पुष्टि नहीं करता| इसीलिए भारत के इतिहास की इस प्रमुख समस्या के समाधान हेतु इसे नकारना उचित होगा|” (देखें- “मारवाड़ एंड द मुग़ल एम्परर्स” पृष्ठ 59)

सतीश चन्द्र ने अपनी पुस्तक “मीडिवल इंडिया” में फतेहपुर सीकरी के उस महल के बारे में वर्णन करते हुए कहा है- “हरम के महलों में से एक महल को जोधाबाई का महल” कहा गया जबकि जोधाबाई उसकी पुत्रवधू थी, पत्नी नहीं|” (पृष्ठ 436)

सामान्य रूप से लेखन करने वाले लेखकों और इतिहास के प्रबुद्ध विद्वानों में पर्याप्त अंतर होता है| साधारण तौर पर, लिखने वाले “मुग़ल ए आजम” या “अनारकली” जैसी फिल्मों से कथ्य ग्रहण कर सकते है परन्तु इतिहास के विद्वान् प्राथमिक और प्रमाणिक तथ्यों का अनुसंधान कर ही अपनी लेखनी को लिपिबद्ध करेंगे| कुछ इत्तेफकिया लेखकों द्वारा भ्रमवश जोधाबाई को अकबर की पत्नी बताने की गलती द्वारा अथवा कुछ सरकारी अधिकारीयों द्वारा लिखित “कॉफी टेबल” पुस्तकों द्वारा या टूरिस्ट गाइडों द्वारा इसी भ्रमित पथ का राही बनने के बावजूद प्रमाणिक ऐतिहासिक तथ्यों को झुठलाया नहीं जा सकता|

सामयिक या ऐतिहासिक फिल्में सिनेमा का अत्यावश्यक हिस्सा है और होनी भी चाहिये परन्तु उपयुक्त शोध के बिना ये फ़िल्में निरर्थक हो जाती है| सामान्य व्यक्तियों के अवचेतन पर सिनेमा का गहरा प्रभाव होता है| जैसा कि पहले भी कहा गया है इतिहास सिर्फ और सिर्फ तथ्यों पर आधारित होता है, कल्पना पर नहीं| हाँ ! ऐतिहासिक तथ्यों के दिग्दर्शन हेतु वेशभूषा, आभूषण तथा तत्कालीन वातावरण को कल्पना के उपयुक्त सांचों में ढाला जा सकता है|

सिनेमाई, साहित्यिक, काव्यात्मक, कलात्मक अधिकारों में छूट लेना ठीक हो सकता है परन्तु क्या हमें इतिहास को बदलने का अधिकार है ?

क्या हम अपना स्वयं का नया इतिहास सृजित करने की छूट ले सकते है ? क्या “मुगले ए आजम” में हुई गलती को दोहराया जाना चाहिये ? क्या दो गलतियाँ मिलकर “एक सही” का निर्माण कर सकती है ? कदापि नहीं, निश्चित तौर पर नहीं| इन्हें समय के साथ सुधारना ही होगा|”

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Jun 12, 2013

जान - चढण को बखत (बारात रवाना होने का वक्त)

राजस्थान में 80- व् 90 के दशक तक बारातों का आनंद कुछ अलग तरह का होता था। उस समय बरातों का समय भी अलग था तो बाराती भी अलग श्रेणी के लोग होते थे। उस समय में बच्चों का बरातों में जाना एक तरह से वर्जित ही था। घर के मुखिया व बड़े, बुजुर्ग ही अमूमन बरातों में जाते थे। महिलाओं की उस समय बारात में जाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

जैसा की आजकल बारात के खाने पर विभिन्न तरह के पकवानों से लगी स्टालें लगायी जाती है वे उस समय नहीं होती थी, परन्तु मनुहार व् प्यार से परोसे गए "नुक्ती, नमकीन, लड्डू, पेठे, चक्की आदि मिठाई" में ही इससे कही अधिक आनंद आता था ।

आज भी बचपन में देखा "जान -चढ़ण रो बखत" उस समय का एक दृश्य मानस- पटल पर अंकित है जिसे मायड़ भाषा में उकेरने का प्रयास किया है ।
---जान -चढण को बखत ----

जद जान – बरातां रात न ही चढ्या करती ।
जानेत्यां न जान की त्यारी दिन में ही करनी पड़ती ।।

"ठाकरसाब जान म पधारो", नाई बुलावो देतो ।
बड़ा - बुढा ने साथ लेज्याबा, को भाव सब में रहतो ।।

टाबर जान में कांई करसी , मुख्य या बात होती ।
मारवाड़ में रात ने जास्यां, पड़ गो दूर बहुत ही ।।

मोटर को हॉर्न सुन , टाबर झु-झुर रोता ।
कोई का छोटा भाई - भतीजा, कोई दादा का पोता ।।
सामान की सम्भ्लावनी देता, ध्यान राखज्यो थेला को ।
बिस्तर - चादर बांध दी है, खाणो-दाणो गेला को ।।

घरां की रुखाली खातर, रुखालो छोड र जाता ।
मोटर माय बैठ इष्ट देव को, जैकारो लगवाता ।।

जान -चढ़ी का गीत लुगायां, छतां पे रुल -रुल गाती ।
कुवे पर जा दरोगण, दोघड भर के ल्याती।।

भाई प्रसंगा -सगा अंदर में, ”बन्ना” छत पे सारा।
बोनट कनै बिन्द बैठतो, सारे भायला - प्यारा ।।

उण बखत को स्वाद, "गजू", अब तो बिगड़ को सारों ।
न्यारी-न्यारी मोटर सबकी, न्यारो सब को ढारो ।।

न्यारो सब को ढारो, मनमानी अपणी चलावे ।
बुढा- बुजुर्गां नै छोड़ घरां न, बायाँ सागैं जावे ।।

लेखक : गजेन्द्र सिंह शेखावत


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Jun 10, 2013

मेरे नगमें मेरी नज्में

वोह सुनहरी दोपहर, वोह छुक छुक चलती गाड़ी का रुक रुक कर चलना
तुम्हारी प्यारी सी उंगलियों से लिखे संदेशे का मेरे फ़ोन पर सवाल भेजना

तुम क्या सोचते हो मै तुम्हारी, उन बेताबियों की दोपहर को भूल चुकी हूँ
तुम क्या जाने मेरे हसीन साथी, तेरी खुबसूरत शाम को गीतों में ढाल चुकी हूँ

बज उठेंगे वीणा के तार तार महक जायेगा सारा आलम फिर कोई किसी के प्यार में
मेरी नज्मो में सुनेगा तेरा नाम सारा जहान खिल उठेंगे मुरझाये फूल भी वादियों में

मैं वो गीत हूँ जो आज तक कोई कवि अपनी रचना में ना रच सका
मैं वो अधखिला फुल हूँ जो कभी बहारों के आने पर भी ना खिल सका

आकर तुमसे दूर न खबर है तन बदन की, ना होश है मुझे अपने उड़ते दामन का
जुबान खामोश है, रात की स्याही से, ले कलम लिखती हूँ गीत कोई तेरे नाम का


लेखिका : कमलेश चौहान ( गौरी)
कापी राईट @ कमलेश चौहान ( गौरी)

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