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Jul 27, 2016

Haldighati war v/s Diver war story in Hindi


हल्दीघाटी युद्ध महाराणा प्रताप ने अपनों के साथ लड़ा, उसका क्या निर्णय हुआ वह हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता| लेकिन हल्दीघाटी युद्ध हमारी संस्कृति में इसलिए बहुत महत्त्वपूर्ण है कि इस युद्ध में रामशाह तोमर, हकीम खां सूर, झाला मान आदि सूरमाओं ने देश की स्वाधीनता के लिए बलिदान दिया, जिन्हें हम कभी नहीं भूला सकते, साथ ही युद्ध में महाराणा का साथ देने वाले पूंजा भील, भामाशाह आदि की भूमिका भी कभी नहीं भुलाई जा सकती| ना ही हम मानसिंह जैसे अपने लोगों उन लोगों की गलतियों को भूला सकते हैं, जिन्होंने किसी कारण वश महाराणा के सामने अकबर की ओर से युद्ध किया| इस युद्ध में अपनों ने जो गलतियाँ की, हम उससे शिक्षा लेकर अपना वर्तमान सुधार सकते है| जिन्होंने इस युद्ध में महाराणा का साथ दिया, उनके लिए लड़ते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया, उनके प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करने के लिए हल्दीघाटी हमारे लिए, हमारी संस्कृति के लिए बहुत कुछ मायने रखता है| हम इतिहास की उस दुखद घटना को कभी भुला नहीं सकते| इस युद्ध में मानसिंह की विजय हुई या महाराणा की विजय होती वह कोई मायने नहीं रखती क्योंकि दोनों पक्षों की हार-जीत हमारी तो हार ही थी, आखिर दोनों और हमारे अपने ही थे|

लेकिन इस देश के पूर्वाग्रह से ग्रसित इतिहासकारों के लिए हल्दीघाटी युद्ध दिवेर युद्ध से ज्यादा महत्त्वपूर्ण इसलिए हो गया, क्योंकि दिवेर युद्ध में महाराणा प्रताप की सेनाओं ने मुग़ल सेना को बुरी तरह पराजित कर मेवाड़ से भगा दिया था| जबकि हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप को रणनीतिक रूप से युद्धभूमि छोड़नी पड़ी थी| उनकी यह रणनीति कथित इतिहासकारों की नजर में हार थी और यही हार उनके लिए महत्त्वपूर्ण थी| इसीलिए आप इतिहास उठाकर पढ़ लीजिये, हल्दीघाटी युद्ध पर इतिहास की किताबों के पन्ने भरे पड़े है| जबकि दिवेर युद्ध जिसमें महाराणा ने अकबर की सेना को नाकों को चने चबवा दिए और बुरी तरह पराजित कर मेवाड़ से भगा दिया, का कहीं जिक्र नहीं मिलता और मिलता भी है तो कुछ पंक्तियों में|
इतिहास साक्षी है किसी भी देश या राजा के युद्ध में विजय की घटना को इतिहास में प्रमुखता दी जाती रही है और हार पर बहुत कम जानकारी लिखी गई है या फिर इतिहासकार हार वाली घटना पर मौन साध गया| अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फजल का लिखा इतिहास पढ़ लीजिये, उसमें मुग़ल सेना द्वारा जीते युद्धों का शानदार वर्णन किया गया है, जबकि हारे हुए युद्धों पर या तो मौन साध लिया गया या फिर बहुत कम लिखा गया| मुहम्मद गौरी पर लिखे मुस्लिम इतिहासकारों के लिखे इतिहास पर नजर डाल लीजिये उन्होंने गौरी व पृथ्वीराज के मध्य दो तीन युधों का वर्णन किया है, उसमें में भी जीत वाले युद्ध का सबसे ज्यादा| जबकि दोनों के मध्य कई युद्ध हुए थे और गौरी कई बार हार कर भागा पर मुस्लिम इतिहासकारों ने उस पर चुप्पी साध ली| सिकन्दर भारत से हार कर गया फिर भी उसके देश के इतिहासकारों ने उसको विजेता लिखकर महिमामंडित किया|

इसके ठीक विपरीत यहाँ के कथित इतिहासकारों ने किया| जिस दिवेर युद्ध को महाराणा ने जीता, जिस युद्ध पर भारतवासी आज गर्व सकते थे, उस युद्ध पर वे या मौन रह गए या फिर उस पर उनकी कलम बहुत कम चली| जबकि हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा हारे, उस युद्ध में भारतवासियों के लिए गर्व करने वाली कोई बात नहीं, उल्टा अपनों का महाराणा के सामने लड़ना शर्मिदा होने वाली बात है, उसको खूब बढ़ा चढ़ा कर लिखा गया ताकि हम उसे पढ़कर अपनी एकता पर शर्मिंदा होते रहे, उस युद्ध को याद कर आज भी वंशवाद के अनुसार एक दूसरे का चरित्रहनन कर लड़ते रहें| यह सब वामपंथी व कथित सेकुलर गैंग द्वारा हमारे स्वाभिमान पर चोट कर हमारे मनोबल को तोड़ने का एक सोचा-समझा षड्यंत्र है| यह तो एक उदाहरण है, इन कथित इतिहासकारों ने हमारे मनोबल व स्वाभिमान को तोड़ने, पुरानी घटनाएँ याद कर वर्तमान में हम आपस में लड़ते रहे, एक दूसरे से नफरत करते रहे, के लिए लिखा है|

अत: हमें अपने इतिहास पर शोधकर इतिहास का पुनर्लेखन करना चाहिए, दिवेर युद्ध जिसमें महाराणा की शानदार विजय हुई, जैसी घटनाओं को ज्यादा से ज्यादा प्रचारित करना चाहिए| ताकि हमारी आने वाली पीढियां अपनी उन विजयों का गर्व कर सके, ताकि उनका स्वाभिमान और मनोबल ऊँचा रहे|

मुझे ख़ुशी है कि पंजाब निवासी कैप्टन कुंवर विक्रम सिंह जी ने दिवेर युद्ध के महत्त्व को समझा और वे इसे आम क्षत्रिय युवाओं प्रचारित करने लिए क्षत्रिय वीर ज्योति मिशन के तहत क्षत्रिय महासभा, पंजाब के बैनर तले पंजाब में 28 अगस्त 2016 को दिवेर युद्ध विजय उत्सव मनाने जा रहे है, साथ ही कुंवर विक्रम सिंह जी दिवेर युद्ध पर एक डाक्यूमेंट्रि फिल्म बनाने की दिशा में भी प्रयासरत है| क्षत्रिय युवाओं से मेरा आव्हान है कि वे भी राष्ट्र गौरव महाराणा प्रताप द्वारा विजित इस युद्ध पर सोशियल मीडिया में ज्यादा से ज्यादा जानकारियां साझा करे, इस युद्ध को विजयोत्सव के रूप में जगह जगह मनाएं ताकि हमारी नई पीढ़ी का मनोबल ऊँचा रहे, उनके मन में भी महाराणा प्रताप की तरह स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा रहे| नई पीढ़ी को पता चले कि महाराणा प्रताप अकबर से हार कर जिंदगीभर जंगलों में नहीं भटके, बल्कि आखिर उन्होंने उस समय के विश्व के सबसे ताकतवर सम्राट अकबर की विशाल सेना को युद्धभूमि में धूल चटवा कर भगा दिया था और मेवाड़ को विजय कर लिया था|

मैं श्री कृष्ण जुगनू जी और एस.के. गुप्ता जी जैसे इतिहासकारों का आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने दिवेर युद्ध पर शोध कर अपनी कलम चलाई और जनता को दिवेर युद्ध के बारे में अवगत कराया|


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Jul 14, 2016

कुम्हार के घड़े की मिट्टी की तरह होता है नन्हा बालक, जिसे माता-पिता व गुरूजन जैसा बनाना चाहें वैसा बना सकते हैं। परिवार शिशु की प्रथम पाठशाला है। माता-पिता के क्रिया-कलापों, उनके आचरण, उनके व्यवहार को बालक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ग्रहण करता है और यहीं से शुरू होता है उसके भविष्य का निर्माण।

एकजुटता, शक्ति प्रदर्शन अच्छी बात है, इससे एक तरफ जहाँ आत्मविश्वास बढ़ता है वहीं दूसरी ओर उन लोगों को प्रेरणा मिलती है जो मानवता के लिए, समाज के लिए, देश के लिए और खास कर भावी पीढ़ी के लिए कुछ करना चाहते हैं।

हरियाणा अभिभावक एकता मंच के बैनर के तले हल्ला बोल रैली जिसमें सर्व कर्मचारी संघ हरियाणा, सी.आई.टी.यू. इत्यादि संगठनों ने हिस्सा लिया और कहा कि ३1 जुलाई तक जनप्रतिनिधियों ने स्कूलों की मनमानी के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया तो उनका पुतला फूंका जाएगा।

अभिभावकों का ट्रेड यूनियन नेताओं की तरफ रूझान व उनकी भाषा जहाँ उनके नेतागिरी की तरफ अधिक और बच्चों के भविष्य की तरफ कम ध्यान के बारे में सोचने को मज़बूर करती है, वहीं सवाल पैदा होता है कि क्या पुतला फूंकने या हल्ला बोलने से, यातायात अवरूद्ध करने से या फीस कम करवाने से बच्चों की शिक्षा का स्तर सुधर् जाएगा ? बच्चे कर्त्तव्यपरायण, सहिष्णु, उदार, संस्कारी और चरित्रवान बन जाएँगे जो भारतीय संस्कृति की समृद्धता के लिए अनिवार्य है ?
अगर हम अच्छा खाने, अच्छा पहनने, अच्छी सुख सुविधाएँ पाने की इच्छा रखते हैं तो उसके अनुसार हमें दाम भी चुकाने होते हैं। अगर कोई अधिक वसूलता है तो कानून के दायरे में रह उसकी शिकायत की जा सकती है परतु किसी को जबरन मजबूर नहीं किया जा सकता कि दाम हमारी इच्छानुसार ही लें।

इन सब से अधिक महत्वपूर्ण है मेरे भारत की भावी पीढ़ी का भविष्य। बच्चे के अंत:करण में जैसा बीज रोपा जाएगा वो प्रस्फुटित होने पर वैसा ही फल समाज को देगा। बच्चों को आदर्शवान व अनुशासित बनाने के लिए आवश्यक है कि बच्चों को आदर, श्रद्धा, स्नेह, सौहार्द, सद्भावपूर्ण वातावरण प्रदान किया जाए जिससे वह एक अच्छा नागरिक बन समाज व देश का नाम ऊँचा कर सकें।

Jul 9, 2016

Prithviraj Chauhan : The Great Hindu King

लेखक : सचिन सिंह गौड़, संपादक, सिंह गर्जना

भारत वर्ष के अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान को उनकी जयंती पर समर्पित खोज परक लेखों की एक विशेष श्रंखला जिसका उद्देश्य पृथ्वीराज चौहान के विराट और महान व्यक्तित्व को सही ढंग से प्रस्तुत करना है। पृथ्वीराज चौहान भारतीय इतिहास का एक ऐसा चेहरा है जिसके साथ वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष इतिहासकारों ने सबसे ज्यादा ज्यादती की है।
पृथ्वीराज जैसे महान, निर्भीक योद्धा, स्वाभिमानी युगपुरुष, अंतिम हिन्दू सम्राट, तत्कालीन भारतवर्ष के सबसे शक्तिशाली एवं प्रतापी राजा को इतिहासकारों ने इतिहास में बमुश्किल आधा पन्ना दिया है और उसमें भी मोहम्मद गौरी के हाथों हुयी उसकी हार को ज्यादा प्रमुखता दी गयी है।

विसंगतियों से भरे पड़े भारतीय इतिहास में विदेशी, विधर्मी, आततायी, मलेच्छ अकबर महान हो गया और पृथ्वीराज गौण हो गया। विडंबना देखिये आज पृथ्वीराज पर एक भी प्रामाणिक पुस्तक उपलब्ध नहीं है। महान पृथ्वीराज का इतिहास आज किंवदंतियों से भरा पड़ा है। जितने मुँह उतनी बात। जितने लेखक उतने प्रसंग। तमाम लेखकों ने सुनी सुनाई बातों या पुराने लेखकों को पढ़कर बिना किसी सटीक शोध के पृथ्वीराज चौहान पर पुस्तकें लिखी हैं। जन सामान्य में पृथ्वीराज चौहान के बारे में उपलब्ध अधिकांश जानकारी या तो भ्रामक है या गलत। आधी अधूरी जानकारी के साथ ही हम पृथ्वीराज चौहान जैसे विशाल व्यक्तित्व, अंतिम हिन्दू सम्राट, पिछले 1000 साल के सबसे प्रभावशाली, विस्तारवादी, महत्वकांक्षी, महान राजपूत योद्धा का आंकलन करते हैं, जो सर्वथा अनुचित है।

पृथ्वीराज चौहान के जन्म से लेकर मरण तक इतिहास में कुछ भी प्रमाणित नहीं मिलता। विराट भारत वर्ष के विराट इतिहास का पृथ्वीराज एक अकेला ऐसा महानायक, जिसके जीवन की हर छोटी बड़ी गाथा के साथ तमाम सच्ची झूंठी किंवदन्तिया और कहानियां जुड़ी हुयी हैं। इस नायक की जन्म तिथि 1149 से लेकर 65, 66, 69 तक मिलती है। इसी तरह मरने को लेकर भी तमाम कपोल कल्पित कल्पनायें हैं। कोई कहता है कि अजमेर में मृत्यु हुयी तो कोई कहता है अफगानिस्तान में, कोई कहता है मरने से पहले पृथ्वीराज ने मोहम्मद गौरी को मार दिया था तो कोई कहता है गौरी पृथ्वीराज के बाद भी लम्बे समय तक जीवित रहा। पृथ्वीराज और मोहम्मद गौरी के युद्धों की संख्या से लेकर उनके युद्धों के परिणामों तक, पृथ्वीराज को दिल्ली की गद्दी मिलने से लेकर अनंगपाल तोमर या तोमरों से उसके रिश्तों तक सब जगह भ्रान्ति है। यही नहीं पृथ्वीराज और जयचंद के संबंधों की बात करें या पृथ्वीराज-संयोगिता प्रकरण की कहीं भी कुछ भी प्रामाणिक नहीं। पृथ्वीराज के विवाह से लेकर उसकी पत्नियों तथा प्रेम प्रसंगों तक, हर विषय पर दुविधा और भ्रान्ति मिलती है। पृथ्वीराज से जुड़े तमाम किस्से कहानियां जो आज अत्यंत प्रासंगिक और सत्य लगते हैं, इतिहास की कसौटी पर कसने और शोध करने पर उनकी प्रमाणिकता ही खतरे में पड़ जाती है। इनमें सबसे प्रमुख है पृथ्वीराज और जयचंद के सम्बन्ध। इतिहास में इस बात के कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिलते कि गौरी को जयचंद ने बुलाया था या उसने पृथ्वीराज के खिलाफ गौरी का साथ दिया था, क्योंकि किंवदंतियों तथा चारणों के इतिहास में इस बात की प्रमुख वजह पृथ्वीराज द्वारा संयोगिता का बलात् हरण करना बताया गया है। जबकि इतिहास में कहीं भी प्रामाणिक तौर पर संयोगिता का जिक्र ही नहीं मिलता। जब संयोगिता ही संदिग्ध है तो संयोगिता की वजह से दुश्मनी कैसे हो सकती है? लेकिन हाँ ! इतना तय है कि पृथ्वीराज और जयचंद के सम्बन्ध मधुर नहीं थे और शायद अत्यंत कटु थे। लेकिन इसकी वजह उनकी आपसी प्रतिस्पृधा तथा महत्वाकांक्षाओं का टकराव था। यह बात दीगर है कि पृथ्वीराज चौहान उस समय का सबसे शक्तिशाली एवं महत्वाकांक्षी राजा था। जिस तेजी से वो सबको कुचलता हुआ, हराता हुआ साम्राज्य का विस्तार कर रहा था, वो तत्कालीन भारतवर्ष के प्रत्येक राजवंश के लिये खतरे की घंण्टी थी। पृथ्वीराज तत्कालीन उत्तर और पश्चिम भारत के सभी छोटे बड़े राजाओं सहित गुजरात के भीमदेव सोलंकी तथा उत्त्तर प्रदेश के महोबा के चंदेल राजा परिमर्दिदेव को हरा चूका था, जिसके पास बनाफर वंश के आल्हा उदल जैसे प्रख्यात सेनापति थे। मोहम्मद गौरी के कई आक्रमणों को उसके सामंत निष्फल कर चुके थे।
ये पृथ्वीराज चौहान ही था जिसके घोषित राज्य से बड़ा उसका अघोषित राज्य था। जिसका प्रभाव आधे से ज्यादा हिंदुस्तान में था और जिसकी धमक फारस की खाड़ी से लेकर ईरान तक थी। जो 12 वीं शताब्दी के अंतिम पड़ाव के भारत वर्ष का सबसे शक्तिशाली सम्राट और प्रख्यात योद्धा था। जो जम्मू और पंजाब को भी जीत चुका था। गुजरात के सोलंकियों, उज्जैन के परमारों तथा महोबा के चन्देलों को हराने के बाद बड़े राजाओं तथा राजवंशों में सिर्फ कन्नौज के गहड़वाल ही बचे थे, जिन्हें चौहान को हराना था। उस समय की परिस्थितियों का अवलोकन करने तथा पृथ्वीराज के शौर्य का अवलोकन करने के बाद यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि पृथ्वीराज चौहान, जयचंद गहड़वाल को आसानी से हरा देता।

राजपूत काल के प्रारम्भ (7 वीं सदी ) से राजतन्त्र की समाप्ति तक (1947) पूरे राजपूत इतिहास में कोई भी राजपूत राजा पृथ्वीराज के समक्ष शक्तिशाली, महत्वाकांक्षी नहीं दिखता है। एक भी राजा ऐसा पैदा नहीं हुआ जिसने इतनी महत्वाकांक्षा दिखायी हो, इतना सामर्थ दिखाया हो जो आगे बढ़कर किसी इस्लामिक आक्रांता को ललकार सका हो, चुनौती दे सका हो, जिसने कभी दिल्ली के शासन पर बैठने की इच्छा रखी हो (अपवाद स्वरूप राणा सांगा का नाम ले सकते हैं)।

यदि पृथ्वीराज चौहान को युगपुरुष कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। पृथ्वीराज दो युगों के बीच का अहम केंद्र बिंदु है। हम इतिहास को दो भागों में बाँट सकते हैं एक पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु से पहले का एक उसकी मृत्यु के बाद का। सन 712 (प्रथम मुस्लिम आक्रमण ) से लेकर 1192 (पृथ्वीराज की हार) तक का युग है राजपूतों के मुस्लिमों से संघर्ष का उन्हें हराने का उनसे जमकर मुकाबला करने का उनके प्रत्येक हमले को विफल बनाने का। जबकि 1192 में पृथ्वीराज की हार के बाद का युग है राजपूतों का मुसलमानों के मातहत उनका सामंत बनकर अपना राज्य बचाने तथा उनको देश की सत्ता सौंप उन्हें भारत का भाग्य विधाता बनाने का। पृथ्वीराज चौहान की हार सिर्फ पृथ्वीराज की हार नहीं थी बल्कि पूरे राजपूत समाज की, राजपूत स्वाभिमान की, सम्पूर्ण सनातन धर्म की, विश्व गुरु भारत वर्ष की तथा भारतीयता की हार थी। इस एक हार ने हमारा इतिहास सदा सदा के लिये बदल दिया। 800 साल में एक राजा पैदा ना हुआ जिसने विदेशी-विधर्मियों को देश से बाहर खदेड़ने का प्रयास किया हो। जिसने सम्पूर्ण भारत की सत्ता का केंद्र बनने तथा उसे अपने हाथ में लेने का प्रयास किया हो।


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