राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .

जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !

मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.

भूतों का महल : भानगढ़ का सच

राजस्थान के भानगढ़ का उजड़ा किला व नगर भूतों का डरावना किले के नाम से देश विदेश में चर्चित है.

"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था

उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.

क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत

आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.

Aug 13, 2014

वीर दुर्गादास राठौड़ : स्वामिभक्त ही नहीं, महान कूटनीतिज्ञ भी था

वीर शिरोमणी दुर्गादास राठौड़ (Durgadas Rathore) को आज की नई पीढ़ी मात्र इतना ही मानती है कि वे वीर थे, स्वामिभक्त थे, औरंगजेब का बड़ा से बड़ा लालच भी उन्हें अपने पथ से नहीं डिगा सका| ज्यादातर इतिहासकार भी दुर्गादास पर लिखते समय इन्हीं बिन्दुओं के आगे पीछे घूमते रहे, लेकिन दुर्गादास ने उस काल में राजनैतिक व कूटनीतिक तौर जो महान कार्य किया उस पर चर्चा आपको बहुत ही कम देखने को मिलेगी| उस काल जब भारत छोटे छोटे राज्यों में बंटा था| औरंगजेब जैसा धर्मांध शासक दिल्ली की गद्दी पर बैठा था| इस्लाम को तलवार व कुटनीति के जरीय फैलाने का इरादा रखता था| सभी शासक येनकेन प्रकारेण अपना अपना राज्य बचाने को संघर्षरत थे|

उसी वक्त जोधपुर के शिशु महाराज (Maharaja Ajeet Singh, Jodhpur)को औरंगजेब के चुंगल से निकाला| उसका यथोचित लालन पालन करने की व्यवस्था की| मारवाड़ (Jodhpur State) की आजादी के लिए औरंगजेब की अथाह शक्ति के आगे मराठाओं की तर्ज पर छापामार युद्ध जारी रखकर उसे उलझाए रखा| औरंग द्वारा दिए बड़े बड़े प्रलोभनों को ठुकराकर स्वामिभक्ति का कहीं नहीं मिलने उदाहरण पेश किया| जो सब जानते है लेकिन मैं चर्चा करना चाहता हूँ दुर्गादास की कुटनीति, राजनैतिक समझ पर जिसे कुछ थोड़े से इतिहासकारों को छोड़कर बाकियों द्वारा आजतक विचार ही नहीं किया|

दुर्गादास राठौड़ का बचपन अभावों में, कृषि कार्य करते बीता| ऐसी हालत में उन्हें शिक्षा मिलने का तो प्रश्न ही नहीं था| दरअसल दुर्गादास की माँ एक वीर नारी थी| उनकी वीरता के चर्चे सुनकर ही जोधपुर के सामंत आसकरण ने उससे शादी की| लेकिन दुर्गादास की वीर माता अपने पति से सामंजस्य नहीं बिठा सकी| इस कारण आसकरण ने दुर्गादास व उसकी माता को गुजर बसर के लिए कुछ भूमि देकर अपने से दूर कर लिया| जहाँ माता-पुत्र अपना जीवन चला रहे थे| एक दिन दुर्गादास के खेतों में जोधपुर सेना के ऊंटों द्वारा फसल उजाड़ने को लेकर चरवाहों से मतभेद हो गया और दुर्गादास ने राज्य के चरवाहे की गर्दन काट दी| फलस्वरूप जोधपुर सैनिकों द्वारा दुर्गादास को महाराजा जसवंतसिंह के सामने पेश किया गया| दरबार में बैठे उसके पिता ने तो उस वक्त उसे अपना पुत्र मानने से भी इनकार कर दिया था| लेकिन महाराजा जसवंत सिंह ने बालक दुर्गादास की नीडरता, निर्भीकता देख उसे क्षमा ही नहीं किया वरन अपने सुरक्षा दस्ते में भी शामिल कर लिया| दुर्गादास के लिए यही टर्निंग पॉइंट साबित हुआ| उसे महाराज के पास रहने से राजनीति, कूटनीति के साथ ही साहित्य का भी व्यवहारिक ज्ञान मिला| जिसका फायदा उसने महाराजा जसवंतसिंह के निधन के बाद पैदा हुई परिस्थितियों ने उठाया| दुर्गादास राठौड़ के पास ऐसा कोई पद नहीं था न ही वो मारवाड़ राज्य का बड़ा सामंत था फिर भी उस वक्त मारवाड़ में उसकी भूमिका और अहमियत सबसे बढ़कर थी|

जब सब राज्य अपने अपने मामलों में उलझे थे, दुर्गादास ने औरंगजेब के खिलाफ राजस्थान के जयपुर, जोधपुर, उदयपुर के राजपूतों को एक करने का कार्य किया| यही नहीं दुर्गादास ने राजपूतों व मराठों को भी एक साथ लाने का भरसक प्रयास किया और इसमें काफी हद तक सफल रहा| मेरी नजर में राणा सांगा के बाद दुर्गादास ही एकमात्र व्यक्ति था जिसने मुगलों के खिलाफ संघर्ष ही नहीं किया, बल्कि देश के अन्य राजाओं को भी एक मंच पर लाने की कोशिश की| और दुर्गादास जैसे साधारण राजपूत की बात मानकर उदयपुर, जयपुर, जोधपुर के राजपूत और मराठा संभा जी जैसे लोग औरंगजेब के खिलाफ लामबंद हुये, इस बात से दुर्गादास की राजनीतिक समझ और उसकी अहमियत समझी का सकती है|

औरंगजेब के एक बेटे अकबर को औरंगजेब के खिलाफ भड़काकर उससे विद्रोह कराना और शहजादे अकबर के विद्रोह को मराठा सहयोग के लिए संभा जी के पास तक ले जाना, दुर्गादास की कुटनीति व देश में उसके राजनैतिक संबंधों के दायरे का परिचय कराता है| इस तरह की कूटनीति मुगलों ने खूब चली लेकिन हिन्दू शासकों द्वारा इस तरह की चाल का प्रयोग कहीं नहीं पढ़ा| लेकिन दुर्गादास ने यह चाल चलकर साथ ही अकबर की पुत्री व पुत्र को अपने कब्जे में रखकर औरंगजेब को हमेशा संतापित रखा| महाराष्ट्र से शहजादा अकबर को औरंगजेब के खिलाफ यथोचित सहायता नहीं मिलने पर दुर्गादास ने अकबर को ईरान के बादशाह से सहायता लेने जल मार्ग से ईरान भेजा| जो दर्शाता है कि दुर्गादास का कार्य सिर्फ मारवाड़ तक ही सीमित नहीं था|

एक बार संभाजी की हत्या कर उसके सौतेले भाई को आरूढ़ करने की चाल चली गई| उस चाल में संभाजी के राज्य में रह रहे शहजादे अकबर को भी शामिल होने का प्रस्ताव मिला| अकबर को प्रस्ताव ठीक भी लगा क्योंकि संभाजी उसे उसके मनमाफिक सहायता नहीं कर रहे थे| लेकिन अचानक अकबर ने इस मामले में दुर्गादास से सलाह लेना मुनासिब समझा| तब दुर्गादास ने उसे सलाह दी कि इस षड्यंत्र से दूर रहे, बल्कि इस षड्यंत्र की पोल संभाजी के आगे भी खोल दें, हो सकता है संभाजी ने ही तुम्हारी निष्ठा जांचने के लिए पत्र भिजवाया हो| और अकबर ने वैसा ही किया| संभाजी की हत्या का षड्यंत्र विफल हुआ और उनके मन में अकबर के प्रति सम्मान बढ़ गया|

इस उदाहरण से साफ़ है कि दुर्गादास षड्यंत्रों से निपटने के कितना सक्षम थे| उन्होंने एक ही ध्येय रखा कभी निष्ठा मत बदलो| जो व्यक्ति बार बार निष्ठा बदलता है वही लालच में आकर षड्यंत्रों में फंस अपना नुकसान खुद करता है| राजपूती शौर्य परम्परा और भारतीय संस्कृति में निहित मूलभूत मानदंडों के प्रति दुर्गादास पूरी तरह सजग था| यही कारण था कि उसके निष्ठावान तथा वीर योद्धाओं के दल में सभी जातियों और मतों के लोग शामिल था| उसकी धार्मिक सहिष्णुता तथा गैर-हिन्दुओं के धार्मिक विश्वासों और आचरणों के प्रति उसके वास्तविक आदर-भाव का परिचय शहजादे अकबर की बेटी को इस्लामी शिक्षा दिलाने की व्यवस्था करना था| जिसकी जानकारी होने पर खुद औरंगजेब भी चकित हो गया था और उसके बाद औरंग ने दुर्गादास के प्रति असीम आदरभाव प्रकट किये थे|

दुर्गादास के जीवन का अध्ययन करने के बाद कर्नल टॉड ने लिखा – राजपूती गौरव में जो निहित तत्व है, दुर्गादास उनका एक शानदार उदाहरण है|शौर्य, स्वामिभक्ति, सत्य निष्ठा के साथ साथ तमाम कठिनाइयों में उचित विवेक का पालन, किसी भी प्रलोभन के आगे ना डिगने वाले गुण देख कहा जा सकता है कि वह अमोल था|

इतिहासकार यदुनाथ सरकार लिखते है – “उसके पच्चीस साल के अथक परिश्रम तथा उसकी बुद्धिमत्तापूर्ण युक्तियों के बिना अजीतसिंह अपने पिता का सिंहासन प्राप्त नहीं कर पाता| जब चारों से और विपत्तियों से पहाड़ टूट रहे थे, सब तरफ दुश्मनों के दल था, जब उसके साथियों का धीरज डगमगा जाता था और उनमें जब अविश्वास की भावना घर कर बैठती, तब भी उसने अपने स्वामी के पक्ष को सबल तथा विजयी बनाये रखा| मुगलों की समृद्धि ने उसे कभी नहीं ललचाया, उनकी शक्ति देखकर भी वह कभी हतोत्साहित नहीं हुआ| अटूट धैर्य और अद्वितीय उत्साह के साथ ही उसमें अनोखी कूटनीतिक कुशलता और अपूर्व संगठन शक्ति पाई जाती थी|”

“यह दुर्गादास राठौड़ की प्रतिभा थी, जिसके फलस्वरूप औरंगजेब को राजपूतों के संगठित विरोध का सामना करना पड़ा, जो कि उसके मराठा शत्रुओं की तुलना में किसी भी तरह कम भीषण नहीं था|” सरदेसाई, न्यू हिस्ट्री ऑफ़ द मराठाज|

Aug 4, 2014

सामाजिक दशा और दिशा: निर्भर है योग्य नेतृत्व पर

किसी भी समाज की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक दशा की कसौटी आदर्श, ईमानदार, सिद्धांतो पर चलने वाले योग्य राजनैतिक व सामाजिक नेतृत्व पर निर्भर करती है। कोई भी समाज जब पतन और उत्थान के संक्रमणकाल से गुजर रहा होता है तब सबसे पहले उसे योग्य नेतृत्व की आवश्यकता की अनुभूति होती है। हमारे समाज की वर्तमान अधोगति का मुख्य कारण नेतृत्त्व ही रहा है। स्व. आयुवान सिंह हुडील के अनुसार - “योग्य नेतृत्त्व स्वयं प्रकाशित, स्वयं-सिद्ध और स्वयं निर्मित होता है। फिर भी सामाजिक वातावरण और देश-कालगत परिस्थितियां उसकी रुपरेखा को बनाने और नियंत्रित करने में बहुत बड़ा भाग लेती है। किसी के नेतृत्व में चलने वाला समाज यदि व्यक्तिवादी अथवा रुढ़िवादी है तो उस समाज में स्वाभाविक और योग्य नेतृत्व की उन्नति के लिए अधिक अवसर नहीं रहता। राजपूत जाति में नेतृत्व अब तक वंशानुगत, पद और आर्थिक संपन्नता के आधार पर चला आया है। वह समाज कितना अभागा है जहाँ गुणों और सिद्धांतो का अनुकरण न होकर किसी तथाकथित उच्च घराने में जन्म लेने वाले अस्थि-मांस के क्षण-भंगुर मानव का अंधानुकरण किया गया।”

समाज की वर्तमान दशा का कारण भी स्व.आयुवान सिंह जी द्वारा बताया गया उपरोक्त कारण प्रमुख है लेकिन आज भी हम नेतृत्व के मामले में रुढ़िवादी विचार रखते है, वर्षों से पालित और पोषित समाज को जिस कुसंस्कारित नेतृत्व ने वर्तमान दशा में ला पटका आज भी हम उसी रूढ़ीवाद का अनुसरण करते हुये उसी वंशानुगत नेतृत्व के पीछे भागते है। चुनावों में देश की सत्ता में भागीदारी के समय अक्सर देखा जाता है कि -हम किसी योग्य आम प्रत्याशी को छोड़ किसी बड़े राजनीतिक घराने के कुसंस्कारित प्रत्याशी के पीछे भागते है और हमारी यही कमी भांप राजनैतिक पार्टियाँ हमारी जातीय भावनाओं का वोटों के रूप में दोहन करने के लिए किसी राजनैतिक घराने या राजघराने के व्यक्ति को जिसके आचरण में कोई सिद्धांत तक नहीं होता, को टिकट देकर हमारे ऊपर थोप देती है और हम उनकी जयकार करते हुए उसके पीछे हो जाते है। और इस तरह एक सिधांतहीन और योग्य व्यक्ति को अपना नेतृत्व सौंप हम समाज को और गहरे गर्त में डाल देते है।

और जो व्यक्ति समाज को सही दिशा देने के लिए सिद्धांतो की अभिलाषा लेकर राजनीति में उतरता है वह अकेला रह जाता है। यह हमारे समाज की विडम्बना ही है कि इस तरह नेतृत्व करने के लिए आगे आने वाले युवावर्ग को समाज के स्थापित नेता कई तरह के कुत्सित षड्यंत्र रचकर आगे नहीं बढ़ने देते ताकि नया नेतृत्व खड़ा होकर उनके सिद्धांतहीन नेतृत्व को चुनौती नहीं दे सके।

साथ ही समाज में ऐसे भी व्यक्ति बहुतायत से मौजूद है जो सिद्धांतो का नाम लेकर अपनी नेतृत्व की भूख शांत करने हेतु संगठन बनाते है और चाहते है कि समाज उनका नेतृत्व स्वीकारे| अक्सर देखने को मिलता है कि चुनावों के समय कई सामाजिक संगठन सक्रीय हो जाते है और समाज के नेतृत्व का दावा करते हुये विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के साथ सौदेबाजी करते है| कई बार समाज ऐसे लोगों के झांसे में आकर उनका समर्थन भी करता है तो वे उस समर्थन का प्रयोग अपने निजी हित साधन में करते है। लेकिन जब ऐसे ही नेताओं के सिद्धांतों, विचारधारा और कुकृत्यों को समाज समझने लगता है और उनका साथ छोड़ देता है| तब वो कोई सामाजिक मुद्दा उठा फिर समाज को बरगलाने की कोशिश करते है और जब समाज उनके पीछे नहीं आता तब वे समाज को ही दोषी ठहराने लगते कि समाज साथ नहीं देता।

लेकिन ऐसे लोग यह नहीं समझते कि समाज कोई भेड़ बकरी नहीं जो जिसके पीछे चल पड़े। यह हमारे समाज का सौभाग्य भी है कि समाज अब ऐसे लोगों को समझने लगा और उन्हें बहिष्कृत करने लगा है इसलिए आजकल देखा जा रहा कि ऐसे व्यक्तियों और उनके संगठन किसी भी मुद्दे पर दस-पांच से ज्यादा व्यक्ति नहीं जुटा पाते। कई बार अक्सर देखा जाता है कि किसी मुद्दे पर विरोध जताने के लिए तीस चालीस समाज बंधू इकट्ठा हुए है और जब मीडियाकर्मी संगठन का नाम पूछता है तब वहां बीस के लगभग संगठनों की सूची बन जाती है, कहने का मतलब साफ है कि संगठन बीस और आदमी तीस से चालीस, फिर इन संगठनों में उस कार्य की श्रेय लेने की होड़ भी मच जाती है, हर संगठन अपने अपने उद्देश्यों को वरीयता देकर प्रेस विज्ञप्ति जारी कर देता है| इस तरह के संगठन समाज को नई दिशा देने के बजाय उल्टा वर्तमान दशा बिगाड़ने का काम कर रहे है|

अतः समाज को चाहिये कि वह नेतृत्व के मामले में वंशानुगत, पद और आर्थिक संपन्नता व रूढिगत आधार पर चली आ रही व्यवस्था व मानसिकता से निकले और ऐसे व्यक्तियों को नेतृत्व सौंपे जिनकी विचारधारा में समाज के सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा, धर्म का पालन करते हुए सिद्धांतों पर चलने के गुण, समाज के प्रति पीड़ा, ध्येय व वचन पर दृढ़ता, अनुशासन, दया, उदारता, विनय, क्षमा के साथ सात्विक क्रोध, स्वाभिमान, संघर्षप्रियता, त्याग, निरंतर क्रियाशीलता आदि स्वाभाविक गुण मौजूद हो, ऐसे ही योग्य व्यक्ति समाज का नेतृत्व कर सही दिशा दे सकते है।

समाज का नेतृत्व कैसे लोगों के हाथों में हो का अध्ययन करने के लिए स्व.आयुवान सिंह हुडील द्वारा लिखित पुस्तक “राजपूत और भविष्य” पढनी चाहिए जिसमें वास्तविक नेतृत्व कैसा हो पर विस्तार से शोधपूर्ण लिखा गया है।

Jul 22, 2014

Font Converter, Chanakya, krutidev. 4cgandhi to unicode and unicode to chanakya, krutidev, 4cgandhi

 




4c Gandhi to unicode font converter, 4CGandhi to Chanakya, 4CGandhi to Unicode, 4CGandhi to Unicode to 4CGandhi Converter, All Font converters, All Hindi Font Converters, Chanakya kundli krutidev to Unicode Converter, Chanakya to Unicode, Change font, convert any hindi font to unicode hindi font., Convert Hindi fonts: 4CGandhi to Unicode, Convert Unicode Hindi Font to Krutidev Font . This conversion tool can convert Unicode Hindi font such as Mangal font to Krutidev, Converter Unicode to 4cGandhi / Chankya / Kruti Dev. Unicode text-box. 4CGandhi / Chankya / Kruti Dev text-box., Download Hindi font converter, Download Hindi Fonts Converter, Free Hindi Unicode Converter, Free Online Font Converter, Free Online Font Converter Tools, Hindi Font Converter, i convert all hindi fonts in chanakya font and how? plz. send …, Kruti Dev to Unicode, KrutiDev to Unicode, KrutiDev Unicode Converter, online All Font converters, Online Font Converter, Online Font Converter Converts Your Fonts, Online Kruti Dev Hindi to Unicode Hindi Converter, Unicode Hindi Converter | Unicode Data Conversion | Conversion, Unicode to 4CGandhi, unicode to chanakya, Unicode to Chanakya font Converter, Unicode to Chanakya krutidev kundli Converter, Unicode to Kruti Dev, Unicode To Kruti Dev Converter, Unicode to KrutiDev

Jul 8, 2014

रेल विभाग लगा है राणा सांगा स्मारक हटाने की जुगत में

भारत की स्वतंत्रता के लिए देश के लगभग राजाओं को एक झंडे के नीचे लाकर बाबर से लड़ने वाले राणा सांगा का स्मारक रूपी चबूतरा जहाँ राणा का अंतिम संस्कार किया गया था अब तक उपेक्षित था| स्वतंत्रता और राष्ट्रवाद के प्रतीक राणा के चबूतरे का रख रखाव करने में आजतक ना सरकार ने कोई कदम उठाया ना राणा के उतराधिकारियों ने अलवर जिले के बसवा गांव में रेल पटरियों के पास बने इस स्मारक की मरम्मत कराने पर ध्यान दिया|

हाँ ! यदि स्मारक के पास राणा को भवन बनाकर छोड़ जाते तो उनके वर्तमान उतराधिकारी उसकी साज सज्जा पर अवश्य ध्यान देते क्योंकि भवन हेरिटेज होटल बना कमाई का जरिया बनता, लेकिन स्मारक से कोई कमाई नहीं की जा सकती सो उतराधिकारी भी क्यों ध्यान दे?

खैर.....अब तक भले स्मारक उपेक्षित था, उसका रख रखाव नहीं हो पाया लेकिन कम से कम उस जगह स्थापित तो था लेकिन अफ़सोस अब यह स्मारक रूपी चबूतरा भी वहां से हटने की कगार है| जिस देश की सरकार किसी अनजान इंसान की कब्र तक को हटाने की हिम्मत नहीं कर पाती उसी सरकार का रेलवे विभाग रेल मार्ग चौड़ा करने के लिए राणा के चबूतरे को 15 मीटर दूर खिसकाना चाहते है| जबकि रेल मार्ग चौड़ाई दूसरी और की भूमि अधिग्रहित करके भी चौड़ी की जा सकती है, लेकिन रेल के अधिकारी दूसरी और के किसान की भूमि बचाकर राणा को विस्थापित करना चाहते है|

देखते है राष्ट्रवाद के नाम का दम भरने वाली सरकार राष्ट्रवाद के प्रतीक राणा सांगा का स्मारक बचाती है या कथित विकासवाद को राष्ट्रवाद के नाम से जोड़कर राष्ट्रवाद के प्रतीक राणा का स्मारक हटाती है?

सरकार के साथ उन उन संगठनों की भूमिका भी देखते है जो जाति के नाम पर गाल फुलाते है तो कई संगठन राष्ट्रवाद व हिन्दुत्त्व के नाम पर गाल फुलाते है या राणा सांगा के स्मारक को बचाने हेतु आगे आते है ????

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Share

Twitter Delicious Facebook Digg Stumbleupon Favorites More