राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .

जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !

मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.

भूतों का महल : भानगढ़ का सच

राजस्थान के भानगढ़ का उजड़ा किला व नगर भूतों का डरावना किले के नाम से देश विदेश में चर्चित है.

"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था

उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.

क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत

आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.

Oct 19, 2014

गादड़ी गारंटी और काला धन

लोकसभा चुनाव पूर्व बाबा रामदेव देशभर में काले धन को वापस लाने के लिए अभियान चलाये हुए थे और वे दावा कर रहे थे कि मोदी जी प्रधानमंत्री बने और भाजपा का राज आया तो सौ दिन में काला धन विदेशी बैंकों से वापस लाया जायेगा| देशी भाषा में कहूँ तो बाबा विदेशी बैंकों में जमा भारतियों का काला धन सौ दिनों में वापस लाने की गारंटी दे रहे थे| लेकिन ख़बरें पढने को मिल रही है कि भाजपा की मोदी सरकार ने घोषणा की है कि सरकार काला धन विदेशों में जमा कराने बालों के नाम बताने नहीं जा रही| यानी सरकार काला धन वापस लाना तो दूर काला धन जमा करने वालों के नामों का खुलासा भी नहीं करना चाहती| इससे साफ़ जाहिर है कि बाबा की गारंटी के साथ केंद्र में बनी कथित राष्ट्रवादी सरकार ने भी सरकार बनाते ही सौ दिन में जो काला धन वापस लाने का वचन दिया था उससे पल्टी मार गई और जनता को दिया वचन भंग कर दिया|

इस प्रकरण को देखते हुए एक लोक कहानी याद आ गई जो बचपन से सुनते आ रहे है कि एक गीदड़ ने गीदड़ी को शहर घुमाने की झूंठी गारंटी दी और गारंटी फ़ैल हो गई| इस कहानी के साथ साथ गांवों में जब भी कोई गारंटी देने की बात करता है तो लोग मजाक में कह देते कि भाई ये तेरी गारंटी "गादड़ी गारंटी" तो साबित नहीं होगी| कहानी के अनुसार एक गीदड़ अपनी गीदड़ी के पास अक्सर डींगे हांकता कि वह शहर में जाकर नित्य फिल्म देखता है और अच्छे अच्छे पकवान खाता है, बेचारी गीदड़ी समझाती कि शहर की और मत जाया करो, शहर के कुत्ते कभी मार डालेंगे| तब गीदड़ उसे एक कागज का टुकड़ा दिखाते हुए कहता कि उसके पास गारंटी पत्र है सो कोई कुत्ता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता|

गारंटी देख गीदड़ी आश्वस्त हो गई और एक दिन गीदड़ से जिद करने लगी कि उसे भी शहर घुमाने ले चले| अब गीदड़ फंस गया पर करता क्या? सो बेमन से गीदड़ी को लेकर शहर की और चल पड़ा| दोनों शहर के पास पहुंचे ही थे कि कुत्तों को भनक गई और वे उन्हें पकड़ने को पीछे भागे| कुतों के झुण्ड को अपनी और आते देख गीदड़ जंगल की और बचने भागा तो गीदड़ी ने कहा - इनको गारंटी दिखाओं ना !
गीदड़ बोला - भाग लें ! ये कुत्ते अनपढ़ है सो गारंटी में नहीं समझते |
इस तरह गीदड़ द्वारा गारंटी को लेकर हांकी गई डींग की पोल खुल गई |

बाबा भी काले धन को लेकर जिस तरह देशवासियों को गारंटी देते घूम रहे थे, वो भी ठीक वैसे ही डींग साबित हुई जैसे गीदड़ वाली गारंटी साबित हुई थी| अत: बाबा रामदेव की गारंटी को भी "गादड़ी गारंटी" की संज्ञा दी जाए तो कोई गलत नहीं|

Oct 17, 2014

सरकारी योजनाओं की आड़ में वामपंथी चंदा

आज से डेढ़ दो साल पहले फोन पर पता चला कि गांव में लड़कियों के लिए फॉर्म भरे जा रहे है, जिनके आधार पर लड़की को विवाह के समय पचास हजार रूपये मिलेंगे| ये फॉर्म भरते समय किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि ये फॉर्म किस योजना व किस विभाग में जमा कराया जा रहा है| ना भरवाने वालों ने बताने का कष्ट किया| बस आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के मार्फत दलाल सक्रीय हो गए और तीन सौ रूपये प्रति फॉर्म लेकर सम्बंधित विभाग में जमा करा दिए गए| गांव यात्रा पर जब लोगों से जानकारी ली तो पता ही नहीं चला कि कौनसे विभाग की क्या योजना थी|
हाँ ! उस वक्त गांव प्रवास पर मेरी पुत्री ने यह जरुर बताया कि - "उसने किसी का फॉर्म पढ़ा तो वो श्रमिकों के लिए था, हो सकता है गरीब श्रमिकों की बेटियों की शादी पर आर्थिक सहायता दी जावे|"

अभी इसी हफ्ते गांव यात्रा के दौरान पता चला कि उन फॉर्म की अब डायरियां (पासबूक्स) आई है और एक वर्ष पूरा हो चूका है अत: उनका नवीनीकरण होना है| मैंने एक आवेदक की डायरी देखी तब पता चला कि वे पासबुक्स "श्रम विभाग एवं भवन व अन्य संनिर्माण श्रमिक कल्याण बोर्ड" द्वारा जारी की गई थी| पासबुक पर सीकर कार्यालय का कोई पता नहीं था, हाँ जयपुर मुख्यालय का पता जरुर लिखा था, साथ ही पासबुक में वामपंथी श्रमिक संगठन "सीटू" का लाल स्टीकर लगा था| नवीनीकरण के इच्छुक एक आवेदक को साथ लेकर मैं शहर गया, उससे पहले गांव में कार्यालय का पता पूछा तो सबने कहा- कोर्ट के सामने मिलन रेस्टोरेंट वाली गली है| यानी जिसने भी बताया उसने माकपा कार्यालय के बारे में बताया|

माकपा (CPM)कार्यालय में जाकर पूछा तो किसी ने बताया कि डायरियां बनने का काम बेसमेंट में होता है, मुझे भी आश्चर्य हो रहा था कि सरकारी काम किसी राजनैतिक पार्टी के दफ्तर में कैसे ही रहा है ? बेसमेंट में काफी भीड़ थी, सीटू का बैनर लगा था, दो कार्यकर्त्ता लोगों को फॉर्म भरवाने में सहायता कर रहे थे, तीसरा रसीद बुक लेकर प्रत्येक फॉर्म की 120 रूपये की सीटू की रसीद काट रहा था| मुझे भी बताया गया कि फॉर्म भरकर ये रसीद कटवा लें, फिर एक ऑफिस का पता बताएँगे जहाँ जाकर फॉर्म जमा करवा दें| जिनकी रसीद कट चुकी थी, उन्हें रसीद काट कर रूपये उगाहने वाला बता रहा था कि ये रसीद जेब में रखे और फलां पते पर जाकर दुसरे कार्यालय में फॉर्म जमा करवा दें, वहां भी 60 रूपये की एक और रसीद कटेगी|

इस कार्य में माकपा कार्यकर्त्ता अनपढ़ श्रमिकों को फॉर्म भरवाने की सहायता का एक तरफ सराहनीय कार्य कर रहे थे दूसरी और उसी कार्य के बदले एक गरीब, अनपढ़ श्रमिक जो उन्हें वोट भी देता है, बेचारे से मुफ्त में 120 रूपये वसूल कर उसकी गरीब जेब पर आर्थिक बोझ डालकर एक घ्रणित कार्य भी कर रहे थे| और बेचारा गरीब श्रमिक उनके द्वारा वसूला गए धन को सरकारी योजना में अपने नवीनीकरण की एक साधारण प्रक्रिया समझ रहा था और कोमरेडों का मन से शुक्रिया भी अदा कर रहा था कि उनकी वजह से उसे आर्थिक सहायता मिल जायेगी|

इस तरह सीकर जिले में वामपंथी कार्यकर्त्ता सरकारी योजनाओं की आड़ में अपने श्रमिक संगठन की सदस्यता बढाने व चंदा एकत्र करने के घिनौने कार्य में सलंग्न है| हालाँकि किसी भी पार्टी द्वारा चंदा एकत्र करना या सदस्य बनाना गलत नहीं है लेकिन मैंने जो देखा उससे लगा कि जिसे सदस्य बना उसकी सदस्यता की फीस की रसीद काटी जा रही थी, उसे पता ही नहीं कि ये वामपंथी अपने लिए ले रहे है, यदि उसे पता चल जावे तो वो उनकी और झांके तक नहीं|

और हाँ इस तरह की शानदार सरकारी योजनाओं को जरुरतमंदों तक पहुंचाने में कांग्रेस, भाजपा (BJP)कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता देख मन में बड़ा दुःख हुआ, जबकि इन पार्टियों के कार्यकर्ताओं का भी कर्तव्य बनता है कि इस तरह की योजनाओं का जरुरतमंदों को लाभ दिलावे, उनकी आवेदन फॉर्म भरने में सहायता कर वे अपने पार्टी का जनधार भी बढ़ा सकते है लेकिन अफ़सोस इस मामले में वे वामपंथी कार्यकर्ताओं से बहुत पीछे है और यही कारण है कि वामपंथी विधायकों को भाजपा बिना मोदी लहर के आजतक हरा नहीं पाई|

Oct 10, 2014

लोकतंत्र में रामराज्य दिवा-स्वप्न

आज देश का हर नागरिक चाहता है कि देश में रामराज्य स्थापित हो। देश की सभी राजनैतिक पार्टियाँ भी हर चुनाव में जनता को रामराज्य स्थापित करने का स्वप्न दिखाती है। हर पार्टी रामराज्य स्थापित करने का वादा करती है। महात्मा गांधी ने तो आजादी के आन्दोलन में देश की जनता से रामराज्य स्थापित करने के नाम पर ही समर्थन जुटाया था। महात्मा गांधी की हर सभा व हर काम राम के नाम से शुरू होता था। गांधी का भजन रघुपति राघव राजा राम आज भी जन जन की जुबान पर है। जनता द्वारा रामराज्य की कामना और नेताओं द्वारा रामराज्य स्थापित करने की बात करने से साफ है कि शासन पद्धतियों में रामराज्य सर्वश्रेष्ठ थी और आज भी है। एक ऐसी राजतंत्र शासन पद्धति जिसमें जनता को सभी लोकतांत्रिक अधिकार प्राप्त हो, जनता का राजा से सीधा संवाद हो, जातिगत व्यवस्था होने के बावजूद कोई जातिगत भेदभाव नहीं हो, सभी के मूलभूत अधिकारों व सुरक्षा के लिए राजा व्यक्तिगत रूप से प्रतिबद्ध हो, राज्य के संसाधनों पर सभी नागरिकों का समान अधिकार हो, श्रेष्ठ होगी ही। रामराज्य में ये सब गुण थे, तभी तो आज लोग रामराज्य का स्वप्न देखते है।

लेकिन क्या वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में रामराज्य की स्थापना संभव है? शायद नहीं ! क्योंकि रामराज्य के लिए सबसे पहले देश में एक क्षत्रिय राजा का होना अनिवार्य है, जो वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं है। आज देश में संसदीय शासन प्रणाली है जिसमें प्रधानमंत्री सर्वेसर्वा होता है। प्रधानमंत्री से ऊपर राष्ट्रपति होता है पर असली शासनाधिकार प्रधानमंत्री के पास होते है, राष्ट्रपति के पास नहीं। अतः सीमित अधिकारों वाले राष्ट्राध्यक्ष को राजा की संज्ञा नहीं दी जा सकती। शासन के अधिकार प्रधानमंत्री के पास होते है। जनता पांच वर्ष के लिए शासन करने हेतु प्रधानमंत्री को सत्ता सौंपती है। लेकिन वह भी प्रधान मंत्री ही होता है, राजा नहीं। जब जिस देश में राजा ही नहीं, उसमें रामराज्य कैसे स्थापित हो सकता है? जबकि हमारे वेदों में भी लिखा है कि आदर्श शासन व्यवस्था एक क्षत्रिय राजा ही दे सकता है। योगीराज अरविन्द ने कहा है कि जिस देश में क्षत्रिय राजा नहीं, ब्राह्मणों को उस देश का त्याग कर देना चाहिये, क्योंकि क्षत्रियविहीन राजा के बिना सुशासन स्थापित नहीं हो सकता। विश्व में राजनीति के अबतक सबसे प्रसिद्ध आचार्य चाणक्य ने भी लिखा है कि जिस देश का राजा क्षत्रिय नहीं हो, उस राजा के खिलाफ क्षत्रियों को बगावत कर राजा को बंदी बना लेना चाहिए। इससे साफ जाहिर है कि एक क्षत्रिय राजा ही सुशासन दे सकता है। प्रजा का भला क्षत्रिय राजा के राज में ही संभव है, क्योंकि राम क्षत्रियों के पूर्वज व आदर्श है, सो कोई भी क्षत्रिय राजा कैसा भी हो अपने पूर्वज व आदर्श राम का कुछ तो अनुसरण करेगा ही, और उसके द्वारा थोड़ा सा ही अनुसरण करना सीधा जनहित में होगा।

लेकिन आज देश में उपस्थिति सभी राजनैतिक दल व उनके नेता रामराज्य देने की कल्पना तो करते है, स्वप्न भी दिखाते है, लेकिन राम का अनुसरण करने के बजाय रावण का अनुसरण ज्यादा करते है। हाँ ! राम के नाम पर या राम नाम की खिलाफत कर कई राजनीतिक दल जनता की भावनाओं का दोहन कर वोट प्राप्त करने के लिए राजनीति करते है। देश में ऐसा समय भी आया है, जब राम का नाम लेकर नेता सत्ता की सीढियों पर चढ़ गए, लेकिन राम को भूल गए। मेरा मतलब राममंदिर निर्माण से नहीं, राम का अनुसरण करने से है। महात्मा गांधी ने राम का नाम लेकर लोगों को खुद से जोड़ा। आजादी के बाद लोकतांत्रिक रामराज्य का सपना दिखाया। लेकिन आजादी के बाद उन्हीं की पार्टी ने राम व उनकी शासन व्यवस्था का अनुसरण कर जनता को सुशासन देने की बात करना तो दूर, राम नाम लेने वालों को ही साम्प्रदायिक घोषित कर दिया। अदालत में लिखित हलफनामा देकर राम के अस्तित्व को ही नकार दिया। ऐसे दलों से रामराज्य स्थापना की उम्मीद कैसे की जा सकती है? आज ज्यादातर राजनैतिक दलों में तथाकथित बुद्धिजीवी धर्म के ठेकेदारों का वर्चस्व है, जिन्होंने सदियों से राम के नाम पर अपना जीवनयापन किया, अपनी धर्म की दूकान चलाई। आज वे रावण को महिमामंडित करने में लगे है। जिस उद्दण्ड परसुराम को राम ने सबक सीखा कर उसकी उद्दंडता पर अंकुश लगाया और जनता के मन में बैठे उसके आतंक का अंत किया, जो अपनी माँ की हत्या का अपराधी है, उसे भगवान के रूप में महिमामंडित किया जा रहा है। आचार्य द्रोण जैसे श्रेष्ठ योद्धा को छोड़ अश्व्थामा जैसे अनैतिक व्यक्ति का महिमामंडन किया जा रहा है। आज ऐसे लोगों की जयन्तियां मनाई जा रही है। ऐसे माहौल में रामराज्य की कल्पना भी कैसे की जा सकती है?

बाल्मीकि द्वारा लिखी रामायण के बाद धर्म के ठेकेदारों ने अपने हिसाब से कई तरह से रामायण लिखी। बाल्मीकि का लिखा गायब किया गया और नई कहानियां जोड़ी गई। रावण जो आतंक का पर्याय था, को महिमामंडित करने के लिए उसे उस वक्त का सबसे ज्यादा बुद्धिजीवी व ज्ञानवान पंडित बताया गया। इनकी लेखनी का कमाल देखिये एक तरफ रावण को व्याभिचारी, आतंकी, राक्षक, लम्पट, कपटी, क्रूर, स्वेच्छाचारी, अनैतिक लिखा गया वहीं दूसरी और उसे शास्त्रों का ज्ञाता, ज्ञानवान, धर्म का मर्म समझने वाला लिखकर महिमामंडित करने की कोशिश की गई। आप ही सोचिये कोई व्यक्ति धर्म, शास्त्र आदि का ज्ञानी हो, वो ऐसा क्रूर आतंकी हो सकता है? जिसकी क्रूरता के चलते आज भी उसके पुरे खानदान को राक्षक कुल समझा जाता हो और उसे बुराई का प्रतीक। जबकि उसके कुल में विभीषण जैसा ज्ञानी और धर्मज्ञ उसका भाई था, जाहिर करता है कि रावण का खानदान राक्षक नहीं, मानव ही था, लेकिन उसकी क्रूरता ने उसे राक्षक का दर्जा दिया। ऐसे ऐसे अनैतिक लोगों का आज महिमामंडन हो रहा है, उनकी जयन्तियां मनाई जा रही है, जो भविष्य में आने वाली पीढ़ियों को उनका ही अनुसरण करने की प्रेरणा देगी। जब लम्पट, क्रूर, आतंकी, उद्दण्ड, माँ के हत्यारे आने पीढ़ियों के आदर्श होंगे व उनका अनुसरण होगा, उस हाल में रामराज्य की कल्पना कैसे की जा सकती है?

आज राजनैतिक दल एक तरफ धर्मयुक्त रामराज्य की स्थापना का स्वप्न दिखाते है, दूसरी और धर्म को अफीम का नशा बताकर, या धार्मिक व्यक्ति को साम्प्रदायिक बताकर, या धर्म व जाति के आधार पर जनता को बांटकर उनके वोटों से सत्ता प्राप्त करना चाहते है, तब रामराज्य तो कतई स्थापित नहीं हो सकता। रावण राज्य जरुर स्थापित हो जायेगा। देश की शासन व्यवस्था का वर्तमान माहौल देखने पर रावण राज्य की झलक अवश्य दिखाई पड़ रही है। सरेआम बच्चियों के साथ बलात्कार, आतंकी घटनाएं, चोरियां, डाके, भ्रष्टाचार, व्याभिचार, अनैतिकता, गरीब का शोषण, जातिय उत्पीड़न, धार्मिक दंगे, बेकाबू महंगाई, नेताओं द्वारा देश की संपदा लूट कर विदेशों में ले जाना, चरित्रहीन व भ्रष्ट नेताओं का नेतृत्व रावण राज्य की, क्या झलक नहीं दिखाते?



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Oct 5, 2014

शोषक नहीं प्रजा पोषक थे राजा

आजादी के बाद देश के सभी राजनैतिक दलों द्वारा सामंतवाद और देशी रियासतों के राजाओं को कोसना फैशन के समान रहा है| जिसे देखो मंच पर माइक हाथ में आते ही मुद्दे की बात छोड़ राजाओं को कोसने में थूक उछालकर अपने आपको गौरान्वित महसूस करता है| इस तरह नयी पीढ़ी के दिमाग में देशी राजाओं के प्रति इन दुष्प्रचारी नेताओं ने एक तरह की नफरत भर दी कि राजा शोषक थे, प्रजा के हितों की उन्हें कतई परवाह नहीं थी, वे अय्यास थे आदि आदि|
लेकिन क्या वाकई ऐसा था? या कांग्रेसी नेता राजाओं की जनता के मन बैठी लोकप्रियता के खौफ के मारे दुष्प्रचार कर उनका मात्र चरित्र हनन करते थे?
यदि राजा वाकई शोषक होते तो, वे जनता में इतने लोकप्रिय क्यों होते ? कांग्रेस को क्या जरुरत थी राजाओं को चुनाव लड़ने से रोकने की ? यह राजाओं की लोकप्रियता का डर ही था कि 1952 के पहले चुनावों में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने राजाओं को चुनावी प्रक्रिया से दूर रखने के लिए स्पष्ट चेतावनी वाला व्यक्तव्य दिया कि – यदि राजा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ खड़े हुए तो उन्हें अपने प्रिवीपर्स (हाथखर्च) और विशेषाधिकारों से हाथ धोना पड़ेगा|

यह धमकी भरा व्यक्तव्य साफ़ करता है कि राजा जनमानस में लोकप्रिय थे और नेहरु को डर सता रहा था कि राजाओं के सामने उसे बुरी तरह हार का सामना करना पड़ेगा और हुआ भी यही| जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह जी ने उस चुनाव में राजस्थान के 35 स्थानों पर अपने समर्थित प्रत्याशी विधानसभा चुनाव में उतारे जिनमें से 31 उम्मीदवार जीते| मारवाड़ संभाग में सिर्फ चार सीटों पर कांग्रेस जीत पाई| यह जोधपुर के महाराजा की लोकप्रियता व जनता से जुड़ाव का नतीजा ही था कि सत्तारूढ़ कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास जो कथित रूप से जनप्रिय थे, जिनके नाम से आज भी जोधपुर में कई भवन, विश्वविद्यालय आदि कांग्रेस ने बनवाये, कांग्रेस की पूरी ताकत, राज्य के सभी प्रशासनिक संसाधन महाराजा के खिलाफ झोंकने के बावजूद सरदारपूरा विधानसभा क्षेत्र से बुरी तरह हारे| उस चुनाव में महाराजा के आगे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आरुढ़ जयनारायण व्यास को मात्र 3159 मत मिले थे| यही नहीं व्यास जी ने डर के मारे आहोर विधानसभा क्षेत्र से भी चुनाव लड़ा, जहाँ महाराजा ने एक जागीरदार को उतारा, वहां भी व्यास जी नहीं जीत पाये| उसी वक्त लोकसभा चुनाव में भी महाराजा के आगे कांग्रेस को मात्र 38077 मत मिले जबकि महाराजा को 1,39,833 मत मिले|

उक्त चुनाव परिणाम साबित करते है कि देशी राजाओं व प्रजा के बीच कोई मतभेद नहीं था| झूंठे आरोपों के अनुरूप यदि राजा प्रजा के शोषक होते तो प्रजा के दिल में उनके प्रति इतना प्यार कदापि नहीं होता|

ऐसे में राजाओं के आलोचक एक बात कहकर अपने दिल को शांत कर सकते है कि राजाओं के पास साधन थे अत: वे चुनावों में भारी पड़े, लेकिन जो दल लोकप्रिय होता है और जनता जिसके पीछे होती है उसे चुनावों में साधनों की जरुरत नहीं होती| भैरोंसिंह जी के पास उस चुनाव में पैदल घुमने के अलावा कोई चारा नहीं था फिर भी वे बिना धन, बिना साधन विधानसभा में पहुंचे थे| केजरीवाल की पार्टी भी इसका ताजा उदाहरण है कि जनता जिसके पीछे हो उसे किसी साधन व धन की जरुरत नहीं पड़ती|

अत: साफ़ है कि राजाओं के खिलाफ शोषण का आरोप निराधार झूंठ है और मात्र उन्हें चुनावी प्रक्रिया से दूर रखने का षड्यंत्र मात्र था|

नेहरु के उक्त धमकी भरे वक्तव्य का जबाब जोधपुर महाराजा ने निडरता से इस तरह दिया जो 7 दिसंबर,1951 के अंग्रेजी दैनिक “हिंदुस्तान-टाइम्स” में छपा –
“राजाओं के राजनीति में भाग लेने पर रोक टोक नहीं है| नरेशों को उन्हें दिए गए विशेषाधिकारों की रक्षा के लिए हायतौबा करने की क्या जरुरत है? जब रियासतें ही भारत के मानचित्र से मिटा दी गई, तो थोथे विशेषाधिकार केवल बच्चों के खिलौनों सा दिखावा है| सामन्ती शासन का युग समाप्त हो जाने के बाद आज स्वतंत्र भारत में भूतपूर्व नरेशों के सामने एक ही रास्ता है कि वे जनसाधारण की कोटि तक उठने की कोशिश करें| एक निरर्थक आभूषण के रूप में जीवन बिताने की अपेक्षा उनके लिए यह कहीं ज्यादा अच्छा होगा कि राष्ट्र की जीवनधारा के साथ चलते हुए सच्चे अर्थ में जनसेवक और उसी आधार पर अपने बल की नींव डाले|
दिखने के यह विरोधाभास सा लग सकता है, लेकिन सत्य वास्तव में यही है कि क्या पुराने युग में और क्या वर्तमान जनतंत्र के युग में, सत्ता और शक्ति का आधार जनसाधारण ही रहा है| समय का तकाजा है कि राजा लोग ऊपर शान-बान की सूखी व निर्जीव खाल को हटायें और उसके स्थान पर जनता से सीधा सम्पर्क स्थापित करके मुर्दा खाल में प्राणों में संचार करें| उन्हें याद रखना चाहिए कि जनता में ही शक्ति का स्त्रोत निहित है, नेतृत्व और विशेषाधिकार जनता से ही प्राप्त हो सकते है| मैं अपने विषय में निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि मुझे जनसाधारण का जीवन बिताने में गर्व है|”

और अपने इस वक्तव्य में जोधपुर महाराजा ने जनता के सामने अपने बहुआयामी व्यक्तित्व की छाप छोड़ी| वे चुनाव में उतरे, जनता को उन्होंने एक ही भरोसा दिलाया – “म्है थां सूं दूर नहीं हूँ” (मैं आप लोगों से दूर नहीं हूँ)|

इस नारे ने अपने लोकप्रिय राजा को जनता के और पास ला खड़ा किया और मारवाड़ में कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ कर दिया| पर अफ़सोस चुनाव परिणाम आने से पहले ही महाराजा हनुवंत सिंह विमान दुर्घटना के शिकार हो गए और भ्रष्ट व छद्म व्यक्तित्त्व वाले नेताओं को चुनौती देने वाला नरपुंगव इस धरती से हमेशा के लिए विदा हो गया|




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