राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .

जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !

मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.

भूतों का महल : भानगढ़ का सच

राजस्थान के भानगढ़ का उजड़ा किला व नगर भूतों का डरावना किले के नाम से देश विदेश में चर्चित है.

"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था

उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.

क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत

आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.

Jan 26, 2015

तंवर वंश की कुलदेवी : चिलाय माता

लेखक : करण सिंह तंवर


तु संगती तंवरा तणी चावी मात चिलाय!
म्हैर करी अत मात थूं दिल्ली राज दिलाय!!


चिलाय माता की तंवर वंश कुलदेवी के रूप में पूजा आराधना करता है। इतिहास में तंवरों की कुलदेवी के अनेक नाम मिलते हैं जैसे चिलाय माता, जोग माया (योग माया), योगेश्वरी (जोगेश्वरी), सरूण्ड माता, मनसादेवी आदि।

दिल्ली के इतिहास में तंवरो की कुलदेवी का नाम योगमाया मिलता है। तंवरों के पुर्वज पांडवों ने भगवान कृष्ण की बहन को कुलदेवी मानकर इन्द्रप्रस्थ में कुलदेवी का मंदिर बनवाया और उसी स्थान पर दिल्ली के संस्थापक राजा अनंगपाल प्रथम ने पुनः योगमाया के मंदिर का निर्माण करवाया। इसी मंदिर के कारण तंवरों की राजधानी को योगिनीपुर भी कहा गया, जो महरौली के पास स्थित है। यह इतिहास ग्रंथो व भारतीय पुरातत्व विभाग से पुष्ट है। तोमरों की अन्य शाखा और ग्वालियर के इतिहास में तंवरो की कुलदेवी का नाम योगेश्वरी ओर जोगेश्वरी भी मिलता है। ऐसा माना जाता है कि योगमाया (जोग माया) को ही बाद में योगेश्वरी, जोगेश्वरी के नाम से पुकारा जाने लगा।

राजस्थान में तोरावाटी (तंवरावाटी) के नाम से नव स्थापित तंवर राज्य के तंवर कुलदेवी के रूप में सरूण्ड माता को पुजते है। पाटन के इतिहास मे पाटन के राजा राव भोपाजी तंवर द्वारा कोटपुतली के पास कुलदेवी का मंदिर बनवाने का विवरण मिलता है। जहाँ पहले अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने योगमाया का मंदिर बनाया था। यह मंदिर अरावली श्रंखला की पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर परिसर में उपलब्ध शिलालेख के आधार पर 650 फुट ऊँचा मंदिर एक छत्री (चबूतरा) में स्थित है। इस छत्री के चार दरवाजे हैं उसके अन्दर माता की प्रतिमा विराजमान है। छत्री के बाद का मंदिर 7 भवनों वाला है। मंदिर का मुख्य मार्ग दक्षिण में व माता के निज मंदिर का द्वार पश्चिम में है। इस मंदिर में माता की 8 भुजावाला आदमकद स्वरुप प्रतिमा स्थित है। स्तम्भों व दिवारांे पर वाम मार्गियों व तांत्रिकों की मूर्तियाँ की मौजुदगी इनका प्रभाव दर्शाती है। मंदिर में माता को पांडवो द्वारा स्थापित करने के साक्ष्य रूप में छत्री स्थित हैं। मंदिर की परिक्रमा में चामुंडा की मूर्ति है जो आज भी सुरापान करती है। मंदिर की छत्री, जो लाल पत्थर की है का वजन लगभग 5 टन का है। मंदिर पीली मिट्टी से बना हुआ है इसके बावजूद बारिश में इसमें कहीं भी पानी नहीं टपकता। मंदिर तक पहुँचने के लिए 282 सीढियाँ है। इनके मध्य में माता की पवन चरण के निशान हैं! यहाँ 52 भैरव व 64 योग्नियां है ! सरुंड देवी की पहाड़ी से सोता नदी बहती है जिसके पास एशिया प्रसिद्ध बावड़ी है जो बिना सीमेन्ट, चूने आदि के बनी हुई है। इसे द्वापर युग में पाण्डवांे द्वारा 2500 चट्टानों से बनाई गई माना जाता है। योगमाया का मंदिर सरूण्ड गांव में स्थित होने से इसे सरूण्ड माता भी बोलते हैं।

तंवरांे के बडवा के अनुसार तंवरांे की कुलदेवी चिलाय माता है।
जाटू तंवरों ओर बड़वांे की बही के अनुसार तंवरो की कुलदेवी ने चिल पक्षी का रूप धारण कर राव धोतजी के पुत्र जयरथ के पुत्र जाटू सिंह की बाल अवस्था में रक्षा की थी जिसके कारण माँ जोगमाया को चिलाय माता कहा जाने लगा और कालांतर में जोगमाया माता को चिलाय माता पुकारा जाने लगा।
इतिहासकारांे के अनुसार कुलदेवी का वाहन चिल पक्षी के होने कारण यह चिलाय माता कहलाई। राजस्थान के तंवर चिलाय माता को ही कुलदेवी मानते हैं। लेकिन चिलाय माता के नाम से कोई भी पुराना मंदिर नहीं मिलता। जिससे जाहिर होता है कि जोगमाया का नाम चिलाय माता सिर्फ तंवरावाटी में ही प्रचलित हुआ। चिलाय माता के दो मंदिरों का विवरण मिलता है। जाटू तंवर और पाटन के इतिहास के अनुसार 12 वीं शताब्दी में जाटू तंवरो ने खुडाना में चिलाय माता का मंदिर बनाया था और माता द्वारा मनसा (मनोकामना) पूर्ण करने के कारण उसे मनसादेवी के नाम से पुकारा जाने लगा।
एक और चिलाय माता मंदिर का विवरण मिलता है जो पाटन के राजाओं ने गुडगाँव में 14 वीं शताब्दी में बनवाया और ब्राह्मणों को माता की सेवा के लिए नियुक्त किया। लेकिन 17 वीं शताब्दी के बाद पाटन के राजा द्वारा माता के लिए सेवा जानी बन्द हो गयी थी। आज स्थानीय लोग चिलाय माता को शीतला माता समझ कर शीतला माता के रूप में पुजते है।

विभिन्न स्त्रोतों और पांडवो या तंवरो द्वारा बनवाये गये मंदिर से यही प्रतीत होता है कि तोमर (तंवर) की कुलदेवी माँ योगमाया है, जो बाद में योगेश्वरी कहलाई। और योगमाया को ही बाद में विभिन्न कारणों से स्थानीय रूप में योगेश्वरी, जोगमाया, चिलाय माता, सरुंड माता, मनसा माता, शीतला माता आदि के नाम से पुकारा जाने लगा और आराधना की जाने लगी।


Tnawaron ki kuldevi Chilay Mata
Chilay Mata Kuldevi Of Tnawar Rajput's
Chilay mata, Sarund Mata, Goddess of Tomar and Tanwar Rajputs
Chilay Mata Kuldevi of Tomar Rajputs

Jan 25, 2015

ठाकुर देवीसिंह मंडावा, बहुआयामी, अविस्मर्णीय व्यक्तित्व

लेखक : ठा.सौभाग्य सिंह शेखावत

लोक जीवन और लोकमानस में वे ही पात्र गरिमामय स्थान प्राप्त कर सकते है जिनमें सामान्यजन से कुछ विशिष्टताएँ होती है अथवा अतिमानवीय गुण होते है। ऐसे चरित्र समाज में वंदनीय बनकर युग-युगान्तर तक अजर-अमर बने रहते है। वे लोकादर्श, लोक स्मरणीय और जनमानस के प्रेरणा स्त्रोत बन जाते है। ऐसे ही क्षत्रिय इतिहास के मर्मज्ञ, विद्वत विभूति थे ठाकुर देवीसिंह मंडावा।

मुद्राशास्त्र व इतिहास के श्रेष्ठ विद्वानों की सूची में शूमार ठा. देवीसिंह, मंडावा का जन्म शेखावाटी आँचल के मंडावा ठिकाने के यशस्वी ठाकुर जयसिंह की ठकुरानी गुलाबकँवर चांपावत जी की कोख 19 मार्च 1922को हुआ था। आपने अजमेर की प्रसिद्ध मेयो कालेज से आपने आधुनिक शिक्षा ग्रहण की। मसूदा ठिकाने की राजकुमारी सज्जनकुमारी के साथ आप दाम्पत्य जीवन में बंधे। राजनीति में भी आपकी आरम्भ से रूचि रही। आपके क्षेत्र में किसान आन्दोलन की आड़ में जागीरदारों की छवि बिगाड़ने की भरपूर कोशिश के बावजूद भी प्रथम आम चुनाव 1952 ई. में राम राज्यपरिषद के प्रत्याशी के रूप में आपने गुढा (उदयपुर) निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीता। जो जागीरदार के रूप में जनता के बीच आपकी लोकप्रियता का सबूत था। 1964.1970 तक आप राज्यसभा के सदस्य भी रहे। राजपूत सभा जयपुर के लम्बे अर्से तक आप अध्यक्ष रहे। अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष के साथ आप राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष भी रहे। मेयो कालेज कौंसिल बोर्ड के आप उपाध्यक्ष के साथ हैरिटेज होटल्स एसोसिएशन, भवानी निकेतन शिक्षण संस्था के संस्थापक सदस्य, शार्दुल एजूकेशन ट्रस्ट झुंझनु के ट्रस्टी रहे है।

राजनीति के साथ आपकी सामाजिक कार्यों व इतिहास शोध व लेखन में भी विशेष रूचि रही और इन कार्यों में आप जीवन पर्यन्त सक्रीय रहे। धरातल पर काम करने के साथ ही राजपूत संस्कृति और समाज सुधार पर आपकी कलम कभी नहीं रुकी। इस विषय के लेख नियमित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहते थे। “रणबांकुरा” के नाम से आपने एक मासिक पत्रिका भी पप्रकाशन व संपादन भी किया. आपकी शोध साधना की ज्योति के प्रकाशपुंज से परिपूर्ण ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक पत्रिका रणबंकुरा ने क्षत्रिय समाज को ही नहीं बल्कि राष्ट्र के सम्पूर्ण जन मानस को दैदीप्य किया।

राजनीति, समाज सुधार के साथ आपने अपनी जीवन यात्रा में श्रम, लगन और सतत-साधना से भारतवर्ष के गरिमामय इतिहास पर सम्यक चिंतन कर कई शोध इतिहास शोध ग्रंथ प्रस्तुत किये। भारतीय इतिहास के विभिन्न काल-खण्डों के विलुप्त और विस्मृत हुए तथ्यों को गहराई तक पहुंचकर नवीनतम शोध के साथ उजागर कर विद्वानों तथा शोध छात्रों के लिए प्रस्तुत किया। जो आज भी विभिन्न शोधार्थियों व क्षत्रिय समाज के इतिहास जिज्ञासू युवाओं के लिए अमृत वरदान स्वरूप है। आपने भारतीय व विदेशी इतिहासकारों के विभिन्न ग्रंथों का अध्ययन करके समीक्षात्मक तथ्यों को समाहित कर कई महत्वपूर्ण इतिहास ग्रंथों की रचना की। यथा- क्षत्रिय, क्षत्रिय शाखाओं का इतिहास, भारत और भारतीयता के रक्षक, प्रतिहार और उनका साम्राज्य, मालव नरेश भोज परमार, भरतेश्वर पृथ्वीराज चैहान, राजस्थान के कछवाह, स्वतंत्रता के पुजारी महाराणा प्रतापसिंह, देशभक्त दुर्गादास राठौड़, शार्दुल सिंह शेखावत आदि लिखकर इतिहास जगत को उपकृत किया। आप तीक्षण दृष्टि वाले तलस्पर्शी अध्येता थे।

मानव उत्पति के प्रति विश्व में प्रचलित नाना प्रकार की मान्यताओं और अदभुत आर्य जाति के उदगम जैसे विषय पर आपने गहन अध्ययन किया। डॉ. हाइसन, जोसफ बरेल, कीथर, मैक्समुलर, लाथम, डॉ. पन्निकर, मजुमदार, अबुलफजल, नैणसी, ओझा, टॉड आदि कई इतिहासकारों, साहित्यकारों, ज्योतिषियों, कलाविदों और गणितज्ञों तथा भ्रमणकारी विदेशी यात्रियों व व्यापारियों के यात्रा संस्मरण विवेचनों व मान्यताओं पर शोध-मंथन कर आर्यों के उदगम के प्रति प्रचलित मिथ्या धारणाओं और आर्यों को भारत के मूलवासी न होकर विदेशी मानने वाले तर्कों का निराकरण किया। आपकी कृति “क्षत्रिय” में आपने इस विषय में सविस्तार लिखा है।

आपने जिस लगन से बचपन से लेकर जीवनपर्यन्त अपने अपने आपको इतिहास शोध साधना में रत रखा, उसका मूल्यांकन तथा शब्दांकन करना सहज नहीं है। बिरला ही ऐसा विषय होगा जिसकी जानकारी आपके स्मरण में ना रही हो। आपने मुद्राओं पर भी गहन अध्ययन कर कई लेख प्रकाशित किये। आपका दस हजार से ज्यादा पुराने सिक्कों का मुद्रा संग्रह और भी महत्त्व का था जिस पर आपका अध्ययन जारी था और राठौड़ शासक एवं उनकी मुद्राओं पर आप अपने जीवन के अंतिम दिनों में शोध कर रहे थे। आपके संग्रह में मुद्राओं के साथ देश विदेश के ख्याति प्राप्त इतिहासकारों, साहित्यकारों की रचनाओं, ऐतिहासिक चित्रों का समृद्ध व बेजोड़ संग्रह शामिल है।

ऐतिहासिक चित्रों का संग्रह कर उन्हें प्रकाशित कराना तो आपका विशेष गुण था। आपने अपने अमर लेखन में शिलालेखों, प्राचीन ख्यातों, लोक-कथाओं, लोक मान्यताओं और परम्पराओं के सारगर्भित तथ्यों को समाहित कर शोध छात्रों के लिए प्रेरणा-पथ का निर्माण किया। विदेशी इतिहासकार व उन्हीं के पदचिन्हों के अनुगामी कुछ भारतीय इतिहासकारों द्वारा विकृत किये गए भारतीय इतिहास को परिष्कृत करने में आप द्वारा रचित शोधपूर्ण ग्रंथ शोधकर्ताओं के लिए गवाह का प्रतिरूप है। अपने इतिहास शोध के साथ ही राजपूत इतिहास के अन्य शोधार्थियों की शोध रचनाओं के प्रकाशन में आपका सहयोग स्मरणीय है। 15 जनवरी, 1999 को हमेशा के लिए इहलोक छोड़कर स्वर्ग के लिए विदा लेने के बाद यद्यपि आज हमारे बीच आप नहीं है, इस रिक्तता से हृदय विह्लल हो उठता है और आपके वरदहस्त से हम वंचित भी है। तदापि आपने क्षत्रिय समाज और इतिहास जगत को जो प्रेरणास्पद लेखन दिया है, वह हमारे लिए अजर अमर निधि है। आप जैसी विभूति के पद पंकज का सानिध्य पुनः मिले यही हमारे श्रद्धासुमन है।

नोट: लेखक राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार व इतिहासकार है और ठाकुर देवीसिंह, मंडावा के साथ इतिहास शोध में साथ रहे है|

Thakur Devi Singh, Mandawa

Jan 11, 2015

आओ कॉपी-पेस्ट जैसी महान तकनीकि के सहारे ब्लॉग, किताब लिखें और नोट कमायें

जब से इंटरनेट आया है, आसानी से हिंदी लिखने के औजार उपलब्ध हुए है, ब्लॉग लिखने के लिए मुफ्त के प्लेटफ़ॉर्म उपलब्ध हुए है, लेखकों को अपनी लेखनी ब्लॉगस पर प्रकाशित कर अपनी लेखन हुड़क मिटाने का तगड़ा मौका मिला है| इतना ही नहीं सोने पे सुहागा ये कि अब हिंदी ब्लॉगस पर गूगल ने विज्ञापन देना शुरू कर लेखकों को डालर कमाने का शानदार मौका और दे दिया|

तो आईये ब्लॉग लिखें और धन कमायें|
चूँकि ब्लॉग लिखना बहुत आसान है, लिखो और प्रकाशित कर दो| खुद ही संपादक, खुद लेखक, खुद प्रकाशक| अब बात आती है कि ब्लॉग पर लिखा क्या जाय? तो इसके लिए आपको ज्यादा दिमाग खपाने की आवश्यकता नहीं क्योंकि इंटरनेट पर इतना लिखा पड़ा है कि पसंद आई सामग्री कॉपी करो और अपने ब्लॉग पर पेस्ट कर दो| उसके बाद उसका लिंक फेसबुक पर शेयर कर वाह वाही लूटो| क्योंकि आपकी मित्र मण्डली को क्या पता कि आपने कॉपी पेस्ट जैसी महान तकनीकि का इस्तेमाल किया है| इस महान तकनीकि को मैंने फेसबुक व ब्लॉगस पर बहुत जगह देखा है कि बन्दे को एक शब्द लिखने की फुर्सत ना मिले लेकिन इधर उधर से कॉपी मारकर खूब वाह वाही लुटता है| तो आप भी क्यों ना इस महान कॉपी पेस्ट तकनीकि का फायदा उठा बतौर लेखक अपना नाम रोशन करें| वैसे भी आजकल काम करने का स्मार्ट तरीका काम लिया जाता है| मेहनत करने वाले तो गधे कहे जाते है, सो क्यों खाम खां की बोर्ड खटखटाया जाय, जब इतनी महान तकनीकि उपलब्ध है|

इस महान तकनीकि से सिर्फ ब्लॉग लेखक बन वाह वाही ही नहीं, पुस्तक लेखक बनकर भी बिना मेहनत किये वाह-वाही लुटने के साथ धन भी कमाया जा सकता है| इसके लिए पहले फेसबुक पर प्रचार शुरू कर दो कि मैं पुस्तक लेखन के लिए आजकल बहुत बड़ा शोध कर रहा हूँ और उसमें इतना व्यस्त हूँ कि सिर्फ फेसबुक स्टेटस लिखने के लिए ही समय निकाल पाता हूँ| बस इतना करने भर से ही आपको वाह-वाही मिलने लगेगी, कई मित्र आपके इस कार्य को महान कार्य बताते हुए लाइक के साथ टिप्पणी भी कर जायेंगे| सिर्फ लाइक और टिप्पणियाँ ही क्यों? हो सकता है फेसबुक पर मौजूद आपके समाज का कोई धनी व्यक्ति भी आपके इस कार्य को पुनीत कार्य समझ आपके खाते में आपकी मनचाही रकम जमा करा दे| इस तरह नाम, वाह-वाही के साथ धन का भी तगड़ा जुगाड़|
जब कोई धन की व्यवस्था हो जाए तब आपको इतना ही शोध करना है कि कौनसी सामग्री किस ब्लॉग से उड़ानी है, यानी आपको वे ब्लॉग तलाशने है जिन पर आपकी जरुरत की सामग्री भरी पड़ी है| इस तरह के ब्लॉग तलाशने को भी आप शोध का दर्जा दे सकते है आखिर उनको तलाशना भी तो किसी शोध से कम नहीं| इस तरह कॉपी पेस्ट जैसी महान तकनीकि के सहारे आप एक छोटी-मोटी पुस्तक के लायक सामग्री कबाड़ लीजिये| यदि आपको कोई विषय नहीं सूझे तो सबसे बड़ा विषय है अपने ही समाज से संबंधित पुस्तक| आप प्रचारित कर सकते है कि आपके समाज का आजतक जिन लेखकों ने इतिहास लिखा था उन्होंने आपके समाज के प्रति दुर्भावनाओं व पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर गलत लिखा और अब आप उसे ठीक व सही तरीके से लिखने का महान कार्य कर समाज का खोया गौरव लौटाने की कोशिश कर रहे है|

आपके इस तरह के डायलोग पढने के बाद समाज के कई संगठन आपके सहयोग के लिए आगे आ जायेंगे क्योंकि वे भी अपनी समाज सेवा में अक्सर ऐसा वादा करते रहते है पर वादा पूरा नहीं कर पाते, सो उन्हें भी आपके रूप में तारणहार मिल जायेगा| आपकी पुस्तक के बहाने आपसे जुड़े संगठन भी आपकी पुस्तक को अपनी महान उपलब्धि बताते हुए उसका प्रचार-प्रसार कर देंगे| इस तरह आपको सामाजिक भावनाओं का दोहन कर अपनी पुस्तक की धाक ज़माने में बड़ी आसानी होगी|

तो फिर इस महान तकनीकि को अपनाकर हो जाईये शुरू और बन जाईये ब्लॉग व पुस्तक लेखक, साथ कमाईये मोटा धन और सामाजिक प्रतिष्ठा|

Jan 10, 2015

कुलदेवता, रक्षक देवता आदि अवधारणा और रहस्य

हमारी सनातन परम्परा में हर वर्ग व हर कुल अपना एक कुलदेवता, कुलदेवी और रक्षक देवता मानता आया है और उनकी आराधना करता आया है| लोगों को विश्वास है कि उनके कुलदेवता, कुलदेवी जहाँ उनकी मांगी हुई मुराद पूरी करते है, वहीं रक्षक देवता उनकी रक्षा करते है|

मेरे एक मित्र अर्द्ध सैनिक बल में अधिकारी है और उनके विभाग में उन्हें बेस्ट परफोर्मर माना जाता है| पर अक्सर वे ड्यूटी समय में कई सामाजिक कार्यों में व्यस्त हो जातें है, कई सामाजिक सभाओं में भी वे शामिल होने चले जाते है| मैं अक्सर ऐसे मौकों पर उन्हें पूछ लेता हूँ कि आपका कार्य कौन देखेगा? तब जबाब होता है- श्री कृष्ण| मैंने उनके साथ बहुत बार अनुभव किया कि जब तक सामाजिक कार्य में वे संलग्न रहते है, कार्यालय से उनके पास किसी का काम को लेकर कोई फोन नहीं आता और जैसे ही वे उस कार्य से निवृत होते है, उनके कार्यालय से फोन आ जाता है और वे मुस्करा कर कह देते है कि श्री कृष्ण का काम (समाज सेवा) मैं कर रहा था उससे मैं निवृत हो गया और बदले में श्री कृष्ण मेरा कार्य कर रहे थे वे भी मेरे कार्य से निवृत हो गए|

दरअसल उन्हें भरोसा है कि जब वे किसी अन्य सामाजिक कार्य में व्यस्त है तो कृष्ण इस बीच कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं होने देंगे और हर बार उनका भरोसा मजबूत होता है| जब वे अपना हर कार्य निर्विध्न पूरा कर आते है| ठीक इसी तरह के मामले में अलादीन के चिराग के जिन्न की चर्चा करते हुए "रहस्य" "The Secret" नामक पुस्तक के लेखक Rhonda Byrne रांण्डो बर्न लिखते है "याद रखें, अलादीन को अपनी मनचाही चीजें मांगनी होती है| फिर ब्रह्माण्ड जिन्न बन जाता है| विभिन्न परम्पराओं ने इसके अलग-अलग नाम दिए है- आपका रक्षक देवदूत, आपका उच्चतर स्वरूप| हम इस पर कोई भी लेबल लगा सकते है और अपने लिए सबसे अच्छी तरह काम करने वाले लेबल को चुन सकते है, लेकिन हर परम्परा ने हमें बताया अहि कि कोई चीज है, जो हमसे ज्यादा बड़ी है| और जिन्न हमेशा एक ही बात कहता है : "आपकी इच्छा ही मेरा आदेश है|"

जिन्न की कहानी के उदाहरण से बर्न समझाता है कि आप जो मांगेंगे, किसी कार्य के लिए जो सोचेंगे वह आकर्षण के नियम के तहत अवश्य पूरा होगा| अर्थात आप जो मनोकामना करेंगे, जिससे करेंगे वो ब्रह्मांड अवश्य पूरी करेगा| जिसे आप कोई भी लेबल दे सकते है जैसे- मेरा रक्षक देवता, मेरा कुलदेवता या इच्छा पूरी करने वाला जिन्न ही सही|

बर्न के अनुसार जिन्न आकर्षण का नियम है और यह हमेशा मौजूद हा आप भी जो भी सोचते, बोलते और करते है, उसे यह जिन्न हमेशा सुन रहा होता है| और आप जो पाना चाहते है वह आपके आदेशों के आदेशों की पालना करते हुए आपको उपलब्ध करा देता है| आपके मन में जैसे ही विचार आता है, जिन्न व्यक्तियों, परिस्थितियों और घटनाओं के माध्यम से आपकी इच्छा पूरी करने के लिए ब्राह्मण को फ़ौरन सक्रीय कर देता है|

यदि हम बर्न के रहस्य नियम को सही माने तो हमारी सनातन परम्परा में कुलदेवता, रक्षक देवता आदि से मांगने व इच्छा पूरी होनी वाली अवधारणा व विश्वास पर विश्वास किया जा सकता है| दरअसल हम जैसा सोचेंगे, वैसा अवश्य होता है, जिसकी कामना करते है वह अवश्य मिलता है| इच्छा पूरी होने पर आप उसे कोई लेबल दे सकते है जैसे- मेरे कुलदेवता ने दिया, मेरे रक्षक देवता ने दिया या किसी और ने|

अत: सकारात्मक सोचें, अच्छा पाने की सोचे, मन में अच्छे विचार सोचें| आपको सब कुछ मिलेगा|

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