राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .

जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !

मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.

भूतों का महल : भानगढ़ का सच

राजस्थान के भानगढ़ का उजड़ा किला व नगर भूतों का डरावना किले के नाम से देश विदेश में चर्चित है.

"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था

उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.

क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत

आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.

Nov 15, 2014

आरटीआई का असर

भारत में सरकारें योजना बनाती है, जिम्मेदार और ईमानदारी अधिकारी जनहित में निर्णय लेते हुए अपने अधीनस्थों को काम करने हेतु निर्देश देते है, लेकिन अक्सर देखा जाता है कि सरकारी विभागों में बैठे अधिकारी, बाबू हरामखोरी करते हुए उन निर्देशों का पालन नहीं करते और जनता दुखी होती है| ऐसा ही एक जनहित व निगम के हित में 21 फरवरी 2013 को निर्णय कर निर्देश दिया था राजस्थान परिवहन निगम के कार्यकारी निदेशक (यातायात) जयपुर ने सीकर आगार प्रबंधक को- "दिनांक 21-02-2013 को अपने आदेश क्रमांक :- एफ12 /मु/याता./संचा./2013/314 के तहत यात्रीगणों की मांग/ सुविधार्थ एवं निगम हित को ध्यान में रखते हुए सीकर आगार के अधीनस्थ ग्राम+पोस्ट “भगतपुरा” तह. दांतारामगढ, जिला सीकर को निगम द्वारा संचालित समस्त द्रुतगामी बसों का ठहराव स्थल घोषित किया गया था| इस हेतु संबंधित मुख्य प्रबंधक को उक्त मार्ग पर संचालित समस्त वाहनों के चालकों, परिचालकों को उक्त निर्धारित बस स्टैंड पर यात्रियों को चढाने/उतारने हेतु आवश्यक रूप से पाबन्द करने का आदेश जारी किया गया था| आदेश में उक्त ठहराव स्थल की किराया तालिका मुख्य प्रबंधक, सीकर आगार को निर्धारित करने का निर्देश था|"

लेकिन अपनी आदत के अनुरूप सीकर आगार प्रबंधक ने कोई कार्यवाही नहीं की, इस बीच दो बार ग्रामीण जोनल मैनेजर, सीकर आगार से भी मिले| जोनल मैनेजर ने भी आदेश की पालना का निर्देश दिया, लेकिन प्रबंधक पर कोई असर नहीं हुआ| मैं खुद एक दिन जोनल मैनेजर से मिला तब गांव का नाम सुनते ही जोनल मैनेजर मामला समझ गया और सम्बंधित अधिकारी व बाबू को काफी लताड़ा व एक हफ्ते में कार्य पूर्ण करने का निर्देश दिया| मेरे अनुरोध पर भास्कर समाचार पत्र ने भी मामला उठाया और प्रबंधक से बात की तब प्रबंधक ने एक हफ्ते में काम करने का आश्वासन दिया, लेकिन कार्य नहीं किया| जिसका खुलासा अभी एक आरटीआई के जबाब में मिली प्रति की तारीख देखने पर हुआ|

मैंने इस सम्बन्ध में 24 अक्टूबर 2014 को सीकर आगार में स्पीड पोस्ट के माध्यम से एक आरटीआई भेजी, जिसके बाद साल भर पहले जो कार्य करना था, वह आगार प्रबंधक ने 31 अक्टूबर 2014 को किया और उसके बाद मुझे 03 नवंबर को जबाब भेजा| इससे साफ़ है कि यदि मैं आरटीआई से जबाब नहीं मांगता तो ये अधिकारी अभी भी इस कार्य को आगे नहीं बढ़ता| लेकिन आरटीआई का जबाब देने के दबाव में पहले काम किया फिर जबाब दिया|
इससे साफ़ जाहिर है कि हम हरामखोर सरकारी कर्मचारियों को सुधारने के लिए आरटीआई को एक शानदार औजार के रूप में इस्तेमाल कर सकते है, बिना कहीं जाए, घर बैठे !!

अत: आईये और आरटीआई के माध्यम से अपनी ताकत का इस्तेमाल कर अपने देश प्रदेश व जिले को अभिनव बनायें !! मैं तो अपने जिले सीकर को इस माध्यम से "अभिनव सीकर" बनाने में जुट गया हूँ यदि आप नहीं जुटे तो जुट जाईये और देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के यज्ञ में अपनी आरटीआई रूपी आहुति दें !!

वह आदेश जो कार्यकारी निदेशक (यातायात) जयपुर ने सीकर आगार प्रबंधक को भेजा

आरटीआई आवेदन

आरटीआई आवेदन मिलने के बाद आगार प्रबंधक द्वारा अन्य आगारों को भेजे गए पत्र की प्रति

आरटीआई का जबाब

मांगी गई किराया सूची
RTI ACT 2005, how to file rti against rajasthan roadways, rti against rajasthan rajy path parivahan nigam

Nov 1, 2014

काव्य कथा ने बना दिया एक देशभक्त राजा को देशद्रोही

ज्ञान दर्पण पर पिछली पोस्ट में भी आपने पढ़ा कि पत्रकार, साहित्यकार डा. आनन्द शर्मा ने कैसे जयचंद पर शोध किया और उन्हें जयचंद के खिलाफ इतिहास में ऐसे कोई सबूत नहीं मिले कि जिनके आधार पर जयचंद को गद्दार ठहराया जा सके| डा. आनंद शर्मा अपने ऐतिहासिक उपन्यास “अमृत पुत्र” के पृष्ठ 48 पर राजस्थान के राठौड़ राजवंश का परिचय देते हुए लिखते है – “राठौड़ राजवंश की गहड़वाल (गहरवार) शाखा के चन्द्रदेव ने सन 1080 के आ-पास कन्नौज विजय के द्वारा राठौड़ राज्य की स्थापना की पुन:प्रतिष्ठा की| इसके वंशज जयचंद्र ने सन 1170 में कन्नौज का राज्य संभाला| उत्तर भारत के प्रमुख चार राजवंशों में से एक, दिल्ली और अजमेर के अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज के साथ जयचंद्र का शत्रु भाव था| इसी कारण गजनी के महत्वाकांक्षी और शक्तिशाली सुल्तान शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी के भारत आक्रमण पर पृथ्वीराज के साथ हुए “तराइन” के प्रथम युद्ध में उसने पृथ्वीराज की सहायता नहीं की| वस्तुत: पृथ्वीराज ने जयचंद्र जैसे शक्तिशाली राजा की उपेक्षा करते हुए अन्य राजाओं की तरह उसे युद्ध सहायता के लिय निमंत्रित ही नहीं किया| इस युद्ध में पृथ्वीराज विजयी हुआ और शहाबुद्दीन गोरी किसी तरह प्राण बचा कर भाग निकलने में सफल हो गया| किन्तु अगले वर्ष सन 1192 में शहाबुद्दीन गोरी फिर चढ़ आया| “तराइन” के इस दुसरे युद्ध में उसने पृथ्वीराज को बंदी बनाकर मार डाला| युद्ध निमंत्रण न मिलने के कारण जयचंद्र इस बार भी युद्ध से तटस्थ रहने के लिए विवश था|

अपने विश्वस्त गुलाम कुतुबुद्दीन को दिल्ली का सूबेदार बना कर गोरी गजनी लौट गया| इसी के साथ भारत में मुस्लिम शासन की स्थापना हो गई| तराइन के युद्धों में उत्तर भारत के अधिकांश राजाओं द्वारा पृथ्वीराज की सहायता करने के विपरीत कन्नौज नरेश का न आना, कालांतर में अनेक प्रवादों को जन्म दे गया| विदेशी आक्रान्ताओं को आमंत्रित कर सहायता करने का आरोप लगाकर जयचंद को देशद्रोही हिन्दू राजा के रूप में बदनाम तक कर दिया गया| जबकि जयचंद्र ने शहाबुद्दीन को भारत पर आक्रमण करने के लिए न कभी निमंत्रित किया और न ही किसी प्रकार की सहायता ही की थी| आपसी मनोमालिन्य के बावजूद तराइन के दोनों युद्धों में पृथ्वीराज का साथ न देने के पीछे भी पृथ्वीराज द्वारा सहायता के लिए निमन्त्रण न मिलना ही एकमात्र कारण था| किन्तु पृथ्वीराज के आश्रित कवि चन्दबरदाई ने अपने प्रशस्ति काव्य पृथ्वीराज रासो में जयचंद्र की पुत्री संयोगिता का पृथ्वीराज द्वारा हरण की काल्पनिक कथा जोड़कर इसे इन दो तेजस्वी राजाओं के मध्य शत्रुता का कारण बता दिया|
इतिहास धरा रह गया और चारणी कल्पना से उत्पन्न प्रवाद कालांतर में धार्मिक जयचंद्र को देशद्रोही का स्थायी कलंक दे गया, जबकि जयचंद्र के न तो कोई संयोगिता नामक पुत्री थी और न ही पृथ्वीराज की इस नाम से कोई राणी थी|”

अपनी पुस्तक के इसी पृष्ठ पर डा.आनंद शर्मा आगे लिखते है “ अपने स्वामी की वंदना और उसके विरोधी की निंदा ही चारणों का कार्य रहा है| किन्तु इससे पूर्व इन वंदना स्वरों ने किसी निर्दोष को देशद्रोही घोषित कर देने जैसा पाप नहीं किया था| पृथ्वीराज रासो की अप्रमाणिकता का अनुमान इससे ही हो जाता है कि चंदरबरदाई ने तराइन युद्ध में पृथ्वीराज को बंदी बनाकर गजनी ले जाने और अँधा करके आँखों में नींबू-मिर्च डाल कर यातनाएं देने के बाद, अंधे पृथ्वीराज द्वारा शहाबुद्दीन का शब्द भेदी बाण द्वारा वध करने का उल्लेख तक कर डाला था| यह समस्त प्रकरण घोर काल्पनिक है| पृथ्वीराज को तो तराइन युद्ध में ही बंदी बनाकर मारा जा चूका था| यही इतिहास प्रमाणित सत्य है| किसी भी इतिहासकार ने पृथ्वीराज रासो में वर्णित घटनाओं को सत्य नहीं माना| लेकिन एक चारण की काव्य कथा ने धर्मपरायण महाराजा को कालांतर में देशद्रोही सिद्ध कर दिया था|
kya jaichand gaddar tha ? charni kavy ka shikar jaichand, raja jaichand, rathore, kannauj, gaharwal, mummad gauri, chandarbardayi,

Oct 21, 2014

गद्दार नहीं धर्मपरायण और देशभक्त राजा थे जयचंद

जयचंद का नाम आते ही हर किसी व्यक्ति के मन में एक गद्दार की छवि उभर आती है| यही नहीं जयचंद नाम को गद्दार के पर्यायवाची के रूप में प्रयोग किया जाने लगा है| जबकि जयचंद जिन पर आरोप है कि उन्होंने पृथ्वीराज से बदला लेने के लिए गौरी को बुलाया और उसकी सहायता की| लेकिन जब इस सम्बन्ध में प्राचीन इतिहास पढ़ते है तो उसमें ऐसे कोई सबूत नहीं मिलते जिनके आधार पर जयचंद को गद्दार ठहराया जा सके| इतिहासकार तो जयचंद के संयोगिता नाम की किसी पुत्री होने का भी खंडन करते है ऐसे में जब संयोगिता नाम की पुत्री ही नहीं थी तो दोनों के बीच कैसा वैमनस्य ?
लेकिन जब भी कहीं इस बारे में चर्चा की जाती है तो कोई भी व्यक्ति जयचंद के पक्ष में इन दलीलों को मानने के लिए राजी नहीं होता क्योंकि जनमानस में जयचंद के प्रति नफरत इतनी ज्यादा घर कर गई कि कोई उनके पक्ष में सुनकर ही राजी नहीं|

हाल में जयपुर के वरिष्ठ पत्रकार व साहित्य लेखक डा.आनंद शर्मा जो कई पुरस्कारों से नवाजे जा चुके है और उनकी कई कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी है का “अमृत-पुत्र” ऐतिहासिक उपन्यास पढने को मिला| उक्त उपन्यास से जयचंद की कहानी का कोई सम्बन्ध नहीं है फिर भी लेखक ने यह उपन्यास देश के पूर्व उपराष्ट्रपति स्व.भैरोंसिंह जी को समर्पित करने के कारणों पर जिक्र करते हुए पुस्तक की भूमिका में जयचंद पर अपने ऐतिहासिक शोध का जिक्र करते हुए जयचंद को धर्मपरायण व देशभक्त राजा की संज्ञा दी है क्योंकि लेखक को इतिहास में ऐसा कुछ नहीं मिला जिनके आधार पर जयचंद को गद्दार माना जाय|

पुस्तक में “अपनी बात” शीर्षक में लेखक डा.आनन्द शर्मा लिखते है – 1 सितम्बर, 2003 को भैरोंसिंह जी ने दिल्ली में मेरे ऐतिहासिक उपन्यास “नरवद सुप्यारदे” का लोकार्पण किया था| राजस्थान के राठौड़ वंश से सबंधित होने के कारण मैं उपन्यास के आरम्भ में “पूर्व कथा” के रूप में राठौड़ों के कर्णाटक, महाराष्ट्र, कन्नौज होते हुए राजस्थान आने का अज्ञात और सांप-सीढी जैसा रोमांचक इतिहास देने का लोभ संवरण नहीं पाया था| लगभग एक हजार वर्ष के इस इतिहास की प्रमाणिकता पर पूरा ध्यान देने पर भी एक जगह चूक हो ही गई| मैं कन्नौज नरेश जयचंद और दिल्ली-अजमेर नरेश पृथ्वीराज चौहान के शत्रुता प्रकरण में बहुचर्चित संयोगिता-हरण की घटना और उसके कारण प्रतिशोधाग्नि से धधकते जयचंद द्वारा गजनी सुल्तान शहाबुद्दीन गौरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण के लिए आमंत्रित करने की बात लिख गया था| विख्यात प्रकरण होने के कारण मैंने इसकी प्रमाणिकता खोजने का प्रयास नहीं किया था| वैसे भी उपन्यास के मुख्य कथानक से संबंधित न होने के कारण यह मेरी शोध का विषय नहीं था| मेरी कलम ने भी जयचंद को देशद्रोही जैसे रूप में प्रस्तुत कर दिया था|

पुस्तक लोकार्पण से पूर्व राजनेता उसे पढ़ते नहीं है| किन्तु भैरोंसिंह जी इसके अपवाद है| लोकार्पण से पूर्व पुस्तक को पूरी न पढ़ पाने पर भी उसे सरसरी तौर पर अवश्य पढ़ते है|

आगे भैरोंसिंह जी द्वारा पुस्तक पढ़कर उस पर टिप्पणी करने के संबंध में आनंद शर्मा लिखते है – उपन्यास की भरपूर सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि उनके विचार में जयचंद और पृथ्वीराज में वैमनस्य का कारण सिर्फ संयोगिता-हरण नहीं हो सकता| इसके अन्य कारण भी होने चाहिए| उन्होंने तो संयोगिता-हरण प्रकरण पर ही संदेह व्यक्त करते हुए मुझसे इस बारे में शोध करके सही तथ्य सामने लाने का सुझाव तक दिया था|

अपनी बात में आनंद शर्मा आगे लिखते है – 3 सितम्बर के पत्र में भी अन्य बातों के साथ इस प्रकरण के उल्लेख ने मुझे सोचने के लिए विवश कर दिया| तीस वर्षों के सम्बन्धों के कारण में उनकी प्रकृति से परिचित था| अकारण और व्यर्थ की बात कहना उनके स्वभाव में नहीं था|

पत्र मिलने के बाद उनकी जबाब-तलबी से बचने के लिए मैंने आधे-अधूरे मन से पृथ्वीराज –जयचंद्र प्रकरण पर शोध आरम्भ किया| मेरी निजी लाइब्रेरी में पर्याप्त संदर्भ ग्रन्थ उपलब्ध होने के कारण मुझे कहीं जाना भी नहीं था| सब कुछ मेरे हाथ के नीचे था| लेकिन किसी भी इतिहास-ग्रन्थ में संयोगिता-पृथ्वीराज का उल्लेख न पाकर मैं हतप्रद रह गया| हैरत की बात यह थी कि जयचंद्र के संयोगिता नाम की कोई पुत्री ही नहीं थी| ऐसे में उसका स्वयंवर आयोजित होने और संयोगिता-हरण के कारण कन्नौज-दिल्ली की सेनाओं में युद्ध होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था| इसी प्रकार जयचंद्र द्वारा राजसूय यज्ञ करने का उल्लेख भी नहीं मिला| जब यज्ञ और स्वयंवर का आयोजन ही नहीं हुआ तो द्वार पर पृथ्वीराज की मूर्ति लगवाने, संयोगिता-हरण के बाद दिल्ली-कन्नौज की सेनाओं में भयंकर युद्ध होने के प्रवाद स्वत; ही समाप्त हो जाते है| इतना ही नहीं, जयचंद्र भी कन्नौज के स्थान पर काशी के तेजस्वी गहरवाल राजा निकले| कन्नौज तो बिहार के गया तक फैले उनके विशाल राज्य का एक भाग था| काशी के यशस्वी गहरवाल शासकों का इतिहास तो सर्वविदित है|

इसके बाद तो मेरे अन्वेषी-मन को चैतन्य होना ही था| खोजने के प्रयास में जयचंद्र का जैसे कायाकल्प ही हो गया था| वे देशद्रोही के स्थान पर धर्मपरायण और देशभक्त राजा सिद्ध हो रहे थे| संयोगिता प्रकरण न होने के कारण उनके द्वारा शहाबुद्दीन को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित करने का कारण भी नहीं रह जाता था| “कन्नौज का इतिहास खंगालने पर भी जयचंद्र – शहाबुद्दीन दुरभिसंधि का एक भी प्रमाण नहीं मिला| बस, जयचंद्र और पृथ्वीराज के बीच मनोमालिन्य की बात ही सामने आई| “भविष्य पुराण” ने वैमनस्य का कारण भी बता दिया| इसके अनुसार दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर की दो पुत्रियाँ थी| इनमें चन्द्रकान्ति बड़ी व किर्तिमालिनी छोटी थी| चन्द्रकान्ति का विवाह कान्यकुब्ज के राजा देवपाल अथवा विजयपाल के साथ हुआ, जिसके गर्भ से जयचंद्र ने जन्म लिया था| किर्तिमालिनी के अजमेर के चौहान राजा सोमेश्वर के साथ हुए विवाह से पृथ्वीराज पैदा हुआ था| पुत्रहीन राजा अनंगपाल ने अपनी छोटी पुत्री के पुत्र पृथ्वीराज को गोद लेकर दिल्ली का राज्य सौंप दिया था| जबकि जयचंद्र न केवल अनंगपाल की ज्येष्ठ पुत्री का पुत्र था, अपितु आयु और अपने 5600 वर्गमील राज्य के कारण भी पृथ्वीराज से बड़ा था| पिता सोमेश्वर से पृथ्वीराज को मिला अजमेर राज्य जयचंद्र के कान्यकुब्ज के मुकाबले काफी छोटा था|

यह सच है कि सन 1191 में शहाबुद्दीन और पृथ्वीराज के बीच हुए तराईन के प्रथम युद्ध में जयचंद्र ने पृथ्वीराज का साथ नहीं दिया था| किन्तु इसका कारण भिन्न था| जयचंद्र के साथ वैमस्य और अपनी शक्ति के प्रति आश्वस्त होने के कारण पृथ्वीराज ने कन्नौज नरेश को निमंत्रण ही नहीं भेजा था| जबकि जयचंद्र से छोटे राजाओं तक को उन्होंने सैन्य-सहायता के लिए आमंत्रित किया था| ऐसे में कन्नौज नरेश आगे बढ़कर सहायता करने क्यों जाते?

सन 1193 के द्वितीय तराईन के युद्ध में भी यही हुआ| निमंत्रण न मिलने के कारण जयचंद्र इस बार भी युद्ध से तटस्थ रहे| इस युद्ध में 26 वर्षीय पृथ्वीराज को बंदी बना कर मार डालने के बाद शहाबुद्दीन गोरी का दिल्ली से अजमेर तक के विशाल क्षेत्र पर अधिकार हो गया| अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का सूबेदार बनाकर वह गजनी लौट गया| अगले वर्ष फिर लौटा| इस बार उसने जयचंद्र को परास्त करके राठौड़ों का राज्य भी समाप्त कर दिया था| पृथ्वीराज पर आक्रमण में जयचंद्र के सहायक होने की स्थिति में गोरी कन्नौज पर आक्रमण कैसे कर सकता था? वह तो कुतुबुद्दीन के स्थान पर जयचंद्र को अपना करद राजा बनाकर दिल्ली-अजमेर का राज्य सौंप कर निश्चिन्त हो सकता था| फिर तराईन के दोनों युद्धों में जयचंद्र द्वारा शहाबुद्दीन को किसी मामूली सहायता प्रदान करने का उल्लेख किसी भी इतिहास में नहीं मिलता| इसके बाद तो इस आधारहीन प्रवाद का उदगम खोजना मेरे लिए आवश्यक हो गया| मैं यह जानकार हतप्रभ रह गया कि यह सारा वितण्डावाद पृथ्वीराज के आश्रित चारण चन्दबरदाई रचित “पृथ्वीराज रासो” ने फैलाया है| इसी काव्य में चन्दरबरदाई ने अपने आश्रयदाता की प्रशंसा में जमीन-आसमान मिला दिए थे| उसने ही काल्पनिक संयोगिता का सृजन करके उसे दोनों नरेशों की शत्रुता का कारण ही नहीं बनाया, तराईन युद्ध में मारे गए पृथ्वीराज के शब्दभेदी बाण के द्वारा गोरी के मारे जाने तक का उल्लेख कर डाला| जबकि गोरी तराईन युद्ध के लगभग 10 वर्ष बाद सन 1205-06 में झेलम जिले (अब पाकिस्तान) के समीप शत्रु कबीले द्वारा सोते समय घात लगाकर किये हमले में मारा गया था| स्मिथ ने भी “अर्ली हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया” में यही लिखा था|

इतिहास के सभी विद्वानों ने “पृथ्वीराज रासो” को अप्रमाणिक माना है| इस पर भी इतिहास धरा रह गया, रासो की कथा जन-जन में प्रचारित हो गई| एक धर्मपरायण राजा देशद्रोही के रूप में सामान्यजन की घृणा का पात्र बन गया|
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Oct 19, 2014

गादड़ी गारंटी और काला धन

लोकसभा चुनाव पूर्व बाबा रामदेव देशभर में काले धन को वापस लाने के लिए अभियान चलाये हुए थे और वे दावा कर रहे थे कि मोदी जी प्रधानमंत्री बने और भाजपा का राज आया तो सौ दिन में काला धन विदेशी बैंकों से वापस लाया जायेगा| देशी भाषा में कहूँ तो बाबा विदेशी बैंकों में जमा भारतियों का काला धन सौ दिनों में वापस लाने की गारंटी दे रहे थे| लेकिन ख़बरें पढने को मिल रही है कि भाजपा की मोदी सरकार ने घोषणा की है कि सरकार काला धन विदेशों में जमा कराने बालों के नाम बताने नहीं जा रही| यानी सरकार काला धन वापस लाना तो दूर काला धन जमा करने वालों के नामों का खुलासा भी नहीं करना चाहती| इससे साफ़ जाहिर है कि बाबा की गारंटी के साथ केंद्र में बनी कथित राष्ट्रवादी सरकार ने भी सरकार बनाते ही सौ दिन में जो काला धन वापस लाने का वचन दिया था उससे पल्टी मार गई और जनता को दिया वचन भंग कर दिया|

इस प्रकरण को देखते हुए एक लोक कहानी याद आ गई जो बचपन से सुनते आ रहे है कि एक गीदड़ ने गीदड़ी को शहर घुमाने की झूंठी गारंटी दी और गारंटी फ़ैल हो गई| इस कहानी के साथ साथ गांवों में जब भी कोई गारंटी देने की बात करता है तो लोग मजाक में कह देते कि भाई ये तेरी गारंटी "गादड़ी गारंटी" तो साबित नहीं होगी| कहानी के अनुसार एक गीदड़ अपनी गीदड़ी के पास अक्सर डींगे हांकता कि वह शहर में जाकर नित्य फिल्म देखता है और अच्छे अच्छे पकवान खाता है, बेचारी गीदड़ी समझाती कि शहर की और मत जाया करो, शहर के कुत्ते कभी मार डालेंगे| तब गीदड़ उसे एक कागज का टुकड़ा दिखाते हुए कहता कि उसके पास गारंटी पत्र है सो कोई कुत्ता उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता|

गारंटी देख गीदड़ी आश्वस्त हो गई और एक दिन गीदड़ से जिद करने लगी कि उसे भी शहर घुमाने ले चले| अब गीदड़ फंस गया पर करता क्या? सो बेमन से गीदड़ी को लेकर शहर की और चल पड़ा| दोनों शहर के पास पहुंचे ही थे कि कुत्तों को भनक गई और वे उन्हें पकड़ने को पीछे भागे| कुतों के झुण्ड को अपनी और आते देख गीदड़ जंगल की और बचने भागा तो गीदड़ी ने कहा - इनको गारंटी दिखाओं ना !
गीदड़ बोला - भाग लें ! ये कुत्ते अनपढ़ है सो गारंटी में नहीं समझते |
इस तरह गीदड़ द्वारा गारंटी को लेकर हांकी गई डींग की पोल खुल गई |

बाबा भी काले धन को लेकर जिस तरह देशवासियों को गारंटी देते घूम रहे थे, वो भी ठीक वैसे ही डींग साबित हुई जैसे गीदड़ वाली गारंटी साबित हुई थी| अत: बाबा रामदेव की गारंटी को भी "गादड़ी गारंटी" की संज्ञा दी जाए तो कोई गलत नहीं|

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