वीर चिलाराय (शुक्लध्वज): पूर्वोत्तर भारत के “संग्रामसिंह” की ऐतिहासिक गाथा
(सरत चन्द्र घोषाल कृत “History of Cooch Behar” में वर्णित विवरणों के आधार पर)
पूर्वोत्तर भारत के 16वीं शताब्दी के इतिहास में यदि किसी सेनानायक का नाम अद्वितीय तेजस्विता, अद्भुत गतिशीलता और व्यापक विजयों के साथ लिया जाता है, तो वह हैं शुक्लध्वज, जिन्हें लोक में चिलाराय कहा गया। कोच राज्य के महाराजा नरनारायण के छोटे भाई और युवराज के रूप में उन्होंने जिस पराक्रम, संगठन-शक्ति और कूटनीतिक सूझ-बूझ का परिचय दिया, उसने कामता–कोच राज्य को मिथिला से लेकर असम की पूर्वी सीमा, हिमालय से लेकर चिटगाँव के निकट बंगाल की खाड़ी तक प्रभावी शक्ति बना दिया।
प्रारम्भिक जीवन और पद प्रतिष्ठा
शुक्लध्वज, कोच वंश के आदिपुरुष हरिया मंडल के पुत्र और विश्वसिंह के वंशज थे। नरनारायण के राज्यारोहण के बाद शुक्लध्वज को युवराज बनाया गया और उन्हें “संग्रामसिंह” की उपाधि भी प्राप्त हुई। “History of Cooch Behar” में उनका चित्रण केवल एक सेनापति के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में मिलता है जो पूर्वोत्तर भारत की शक्ति-संतुलन रचना में निर्णायक थे। विदेशी यात्री राल्फ फिच (1586 ई.) ने भी उन्हें “राजा” समझ लिया—यह उनके प्रभाव और प्रताप का संकेत है।
असम (अहोम) अभियान और अधीनता
1563 ई. में चिलाराय के नेतृत्व में कोच सेना ने अहोमों की राजधानी Gargao पर अधिकार किया। इस विजय के बाद अहोम राजा ने संधि कर नरनारायण की अधीनता स्वीकार की और स्वर्ण-रजत पात्र, हाथी, वस्त्र और अन्य उपहार भेंट किए। ब्रह्मपुत्र के उत्तर का विस्तृत भूभाग कोच प्रभाव में आ गया। यह विजय केवल सैन्य नहीं थी; यह पूर्वोत्तर के राजनीतिक मानचित्र को पुनर्गठित करने वाली घटना थी।
चिलाराय की युद्ध-नीति तेज, चपल और निर्णायक थी—इसी तीव्रता के कारण उन्हें “चिलाराय” (चील की तरह झपटने वाला) कहा गया।
कछार पर धावा: बिजली-सी गति
असम के पश्चात चिलाराय ने कछार की ओर रुख किया। “History of Cooch Behar” में वर्णन है कि वे केवल बीस घुड़सवारों के साथ अचानक माईबांग (कछार की राजधानी) पहुँच गए। इस अप्रत्याशित आक्रमण से कछार राजा भयभीत होकर 28 हाथी और बहुमूल्य भेंटें देकर अधीन हो गया तथा वार्षिक कर देने को सहमत हुआ। कछार में एक कोच उपनिवेश की स्थापना की गई; वहाँ के “धेयान” (देवान) समुदाय का उल्लेख इसी प्रसंग में मिलता है।
मणिपुर और जयंतिया की विजय
इसके बाद मणिपुर ने बिना बड़े युद्ध के संधि कर वार्षिक कर स्वीकार किया। जयंतिया के विरुद्ध युद्ध में वहाँ का राजा मारा गया; परंतु नरनारायण के आदेश से उसके पुत्र को राज्य लौटा दिया गया, किंतु अपने नाम से सिक्के ढालने पर रोक लगा दी गई। यह नीति कोच प्रभुत्व को स्थापित करती थी, पर स्थानीय राजवंशों को पूरी तरह समाप्त नहीं करती थी—एक व्यावहारिक कूटनीति।
जयंतिया के सिक्कों पर “श्री शिव-चरण-कमल-मधुकरस्य” जैसे अभिलेख मिलते हैं, जो नारायणी सिक्कों की परंपरा से साम्य रखते हैं—यह कोच प्रभाव का प्रमाण है।
श्रीहट्ट (सिलहट) और त्रिपुरा
श्रीहट्ट के अमील ने अधीनता अस्वीकार की। दो दिनों के भीषण युद्ध के बाद चिलाराय स्वयं रणभूमि में उतरे और अमील का वध किया। उसके भाई को पद पर पुनःस्थापित कर भारी वार्षिक कर निर्धारित किया गया—100 हाथी, तीन लाख रजत मुद्राएँ, 10,000 स्वर्ण मुद्राएँ और घोड़े।
त्रिपुरा के विरुद्ध लंकाई नामक स्थान पर युद्ध हुआ। विजय के प्रतीक के रूप में चिलाराय ने भूमि में उलटी तलवार (लंकाई) और बाँस गाड़ा। अंततः त्रिपुरा ने कर स्वीकार किया और कछार पर उसका प्रभुत्व समाप्त हुआ। ब्रह्मपुर (बाद में कोचपुर/खासपुर) में सैनिक टुकड़ी रखकर कोच अधिकार सुनिश्चित किया गया।
ब्रह्मपुत्र की धारा और प्रशासनिक दृष्टि
असम से लौटते समय नरनारायण द्वारा ब्रह्मपुत्र की धारा सीधी करने हेतु नहर खुदवाने का उल्लेख मिलता है। यह केवल जल-प्रबंधन नहीं, बल्कि सामरिक और आर्थिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कदम था। चिलाराय की विजयों ने जिन प्रदेशों को जोड़ा, उनके प्रशासन और संचार के लिए नदी-मार्ग अत्यंत आवश्यक थे।
गौड़ अभियान: पराजय और पुनरुत्थान
गौड़ (बंगाल) पर आक्रमण का प्रसंग जटिल है। पठानों और मुगलों के संघर्षकाल में चिलाराय का अभियान अंततः सफलता नहीं पा सका; वे बंदी बना लिए गए। किंवदंती है कि गौड़ की रानी को सर्पदंश से बचाने पर उन्हें सम्मान सहित मुक्त किया गया और विवाह-संबंध तथा परगनों का दान मिला।
इस प्रसंग से दो बातें स्पष्ट होती हैं—पहली, चिलाराय का व्यक्तित्व शत्रु-दल में भी सम्मानित था; दूसरी, पराजय के बाद भी कोच शक्ति पूरी तरह क्षीण नहीं हुई। नरनारायण ने बाद में कूटनीति से प्रभाव बनाए रखा।
मुगलों से संबंध
अकबर के दरबार में “नज़र” भेजे जाने का उल्लेख मिलता है। यह पूर्ण अधीनता का प्रमाण नहीं, बल्कि कूटनीतिक मित्रता का संकेत माना गया है। “बहारिस्तान-ए-ग़ायबी” में कोच राज्य की स्वतंत्र स्थिति का उल्लेख भी मिलता है। इस समय बंगाल में पठान-मुगल संघर्ष तीव्र था; कोच राज्य ने संतुलन साधते हुए अपनी स्वायत्तता बनाए रखी।
रघुदेव नारायण का विद्रोह
चिलाराय की मृत्यु के बाद उनके पुत्र रघुदेव नारायण ने नरनारायण के विरुद्ध विद्रोह किया। अंततः संकोश नदी के पूर्व का प्रदेश उसे देकर “छोटो राजा” बनाया गया, शर्त यह कि वह वार्षिक कर देगा और अपने नाम से सिक्के नहीं ढालेगा (या नरनारायण का नाम अंकित करेगा)। यह विभाजन 1581 ई. के आसपास माना जाता है।
यह प्रसंग दर्शाता है कि चिलाराय की मृत्यु के बाद भी उनका वंश और प्रभाव राज्य-राजनीति में निर्णायक रहा।
व्यक्तित्व और विरासत
“History of Cooch Behar” में चिलाराय को गहन विद्वान, उदार, निःस्वार्थ और भाई-भक्त बताया गया है। वे केवल रणकुशल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उन्नयन के भी प्रेरक थे। उनके समय में पंडितों—विद्यावागीश और सिद्धांतवागीश—का आगमन हुआ; धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन समृद्ध हुआ।
तुफानगंज में “चिलारायर कोट” के अवशेष और जालधोआ के किले के चिह्न उनकी सैन्य उपस्थिति के साक्ष्य हैं। बाराकोदाली और नाक-कातिगाछ के शिव मंदिरों की स्थापना भी उनसे जोड़ी जाती है।
मृत्यु और ऐतिहासिक मूल्यांकन
चिलाराय की मृत्यु 1571 ई. के आसपास (चेचक से) मानी जाती है। यद्यपि उनके जीवन के कुछ प्रसंगों में किंवदंती का रंग है, परंतु उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्य यह सिद्ध करते हैं कि वे 16वीं शताब्दी के पूर्वोत्तर भारत के सबसे प्रभावशाली सेनानायकों में से थे।
उनकी विजयों ने कोच राज्य को एक विशाल शक्ति बनाया, जिसने असम, कछार, जयंतिया, त्रिपुरा और बंगाल की राजनीति में निर्णायक हस्तक्षेप किया। उनकी कूटनीति ने पराजयों के बाद भी राज्य की प्रतिष्ठा बनाए रखी।
निष्कर्ष
चिलाराय (शुक्लध्वज) केवल एक सेनापति नहीं थे; वे पूर्वोत्तर भारत की शक्ति-राजनीति के शिल्पी थे। उनकी तीव्र युद्ध-नीति, व्यापक विजयों और व्यावहारिक कूटनीति ने कोच राज्य को 16वीं शताब्दी में चरम पर पहुँचाया।
आज भी असम और उत्तर बंगाल में उनका नाम वीरता, संगठन और दूरदर्शिता के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। सरत चन्द्र घोषाल की “History of Cooch Behar” में वर्णित घटनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि चिलाराय ने अपने युग की सीमाओं को तोड़ते हुए एक ऐसे राज्य की रचना की, जिसने पूर्वोत्तर भारत के इतिहास को नई दिशा दी।
वे सचमुच “संग्रामसिंह” थे—रणभूमि के शेर और नीति के चतुर शिल्पकार।

