राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .

जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !

मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.

भूतों का महल : भानगढ़ का सच

राजस्थान के भानगढ़ का उजड़ा किला व नगर भूतों का डरावना किले के नाम से देश विदेश में चर्चित है.

"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था

उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.

क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत

आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.

Feb 25, 2009

राजिया रा सौरठा -4

कवि कृपाराम जी द्वारा लिखित नीति सम्बन्धी राजिया रा दोहा |
आवै नही इलोळ बोलण चालण री विवध |
टीटोड़यां रा टोळ, राजंहस री राजिया ||

महान व्यक्तियों के साथ रहने मात्र से ही साधारण व्यक्तियों में महानता नही आ सकती | जैसे राजहंसों का संसर्ग पाकर भी टिटहरियों का झुण्ड हंसो की सी बोल-चाल नहीं सीख पाता |

मणिधर विष अणमाव, मोटा नह धारे मगज |
बिच्छू पंछू वणाव, राखै सिर पर राजिया ||

बड़े व्यक्ति कभी अभिमान नही किया करते | सांप में बहुत अधिक जहर होता है, फ़िर भी उसे घमंड नही होता, जबकि बिच्छू कम जहर होने पर भी अपनी पूंछ को सिर पर ऊपर उठाये रखता है |

जग में दीठौ जोय, हेक प्रगट विवहार म्हें |
काम न मौटो कोय, रोटी मोटी राजिया ||

प्रत्यक्ष व्यवहार में हमने तो इस संसार में यही देखा है, कि काम बड़ा नही होता, रोटी बड़ी होती है | हे राजिया ! सारी भागदौड ही एक जीविका के लिए होती है

कहणी जाय निकांम, आछोड़ी आणी उकत |
दांमा लोभी दांम , रन्जै न वांता राजिया ||

अच्छी-अच्छी उक्तियों के साथ कही गई सभी बाते लोभी व्यक्तियों के लिए तो निरर्थक है | सच है, धन का लोभी धन से ही प्रसन्न होता है बातों से नही |

हुनर करो हजार,सैणप चतुराई सहत |
हेत कपट विवहार, रहै न छाना राजिया ||

चाहे हजारों तरह की चालाकी और चतुराई क्यों न की जाय , किंतु हे राजिया ! प्रेम और कपट का व्यवहार छिपा नही रहता |

लह पूजा गुण लार, नर आडम्बर सूं निपट |
सिव वन्दै संसार , राख लगायाँ राजिया ||

गुण के पीछे पूजा होती है , न कि आडंबर से | हे राजिया ! भस्मी लगाये रहने पर भी शिव की वंदना सारा संसार करता है |

लछमी कर हरि लार, हर नै दध दिधौ जहर |
आडम्बर इकधार, राखै सारा राजिया ||

समुद्र ने लक्ष्मी तो विष्णु को दी और जहर महादेव को दिया | सच है आडम्बर का विशेष लिहाज सभी रखते है |

सो मूरख संसार, कपट ञिण आगळ करै |
हरि सह ञांणणहार , रोम-रोम री राजिया ||

संसार में वे व्यक्ति मुर्ख है, जो भगवान के सामने कपट व्यवहार करते है, जो रोम-रोम की सब बाते जानने वाला होता है |

औरुं अकल उपाय, कर आछी भुंडी न कर |
जग सह चाल्यो जाय, रेला की ज्यूँ राजिया ||

और भी बुद्धि लगाकर भला करने का उपाय करो, किसी का बुरा मत करो | यह संसार तो पानी के रेले की तरह निरंतर बहता चला जा रहा है ( क्षणभंगुर जीवन की सार्थकता तो सत्कर्मो से ही है ) |

औसर पाय अनेक,भावै कर भुंडी भली |
अंत समै गत एक , राव रंक री राजिया ||

जीवन में अनेक अवसर पाकर मनुष्य चाहे तो भलाई करे,चाहे बुराई, किंतु हे राजिया ! अंत में तो सब की एक ही गति होती है मृत्यु, चाहे राजा हो या रंक |

करै न लोप, वन केहर उनमत वसै |
करै न सबळा कोप, रंकां ऊपर राजिया ||

जंगल में उन्मत शेर बसता है,किंतु वह लोमडियों का समूल नाश नही करता, क्योंकि हे राजिया !
शक्तिशाली कभी गरीब पर कोप नही करते |

पहली हुवै न पाव, कोड़ मणा जिण में करै |
सुरतर तणौ सुभाव, रंक न जाणै राजिया ||

जहाँ पहले पाव भर अनाज भी नही होता था,वहां करोड़ों मन कर देता है | कल्पवृक्ष के स्वभाव को रंक व्यक्ति नही जान सकता | (उदारता और दयालुता तो स्वाभाविक गुण होते है )|

पाल तणौ परचार, किधौ आगम कांम रौ |
वरंसतां घण वार , रुकै न पाणी राजिया ||

पानी को रोकने के लिए पाल बाँधने का कार्य तो अग्रिम ही लाभदायक होता है | घने बरसते पानी को रोकना सम्भव नही, यह कार्य तो पहले ही होना आवयश्क है |

कांम न आवै कोय, करम धरम लिखिया किया |
घालो हींग घसोय, रुका विचाळै राजिया ||

जिस पन्ने पर लिखी हुयी कर्म-धर्म की बाते यदि कुछ काम नही आती तो हे राजिया ! उस रुक्के में भले ही हींग की पुडिया बांधो, क्योकि वह तो रद्दी कागज के समान है |

भाड़ जोख झक भेक, वारज में भेळा वसै |
इसकी भंवरो एक,रस की जांणे राजिया ||

बड़ा मेंडक जोंक मछली और दादुर सभी जल में कमल के अन्दर ही रहते है,किंतु कमल के रस का महत्व तो केवल रसिक भ्रमर ही जनता है ( गुण को गुणग्राही और रस को रसज्ञ ही जान सकता है |

डा.शक्तिदान कविया द्वारा लिखित पुस्तक "राजिया रा सौरठा" से साभार |
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अगली कड़ी जोधपुर यात्रा से लौटने के बाद |




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Feb 24, 2009

राजिया रा सौरठा - 3

कवि कृपाराम जी द्वारा लिखित नीति के दोहे
देखै नही कदास, नह्चै कर कुनफ़ौ नफ़ौ |
रोळां रो इकळास, रौळ मचावै राजिया ||

जो लोग हानि-लाभ की और कभी देखते नही,ऐसे विचारहीन लोगों से मेल-मिलाप अंततः उपद्रव ही पैदा करता है |

कूड़ा कुड़ प्रकास, अण हुती मेलै इसी |
उड़ती रहै अकास, रजी न लागै राजिया ||

झूटे लोग ऐसी अघटित बातों का झूटा प्रचार करते है कि वे आकाश में ही उड़ती रहती है | हे राजिया ! धरती की रज तो उन्हें छू भी नही पाती |

उपजावे अनुराग, कोयल मन हरकत करै |
कड्वो लागे काग, रसना रा गुण राजिया ||

कोयल लोगो के मन में प्रेम,अनुराग उत्पन्न कर आनन्दित करती है, जबकि कौवा सब को कड़वा लगता है | हे राजिया ! यह सब वाणी का ही परिणाम है |

भली बुरी री भीत, नह आणै मन में निखद |
निलजी सदा नचीत, रहै सयांणा राजिया ||

नीच व्यक्ति अपने मन में भली और बुरी बातों का तनिक भी भय नही लाते | हे राजिया ! वे निर्ल्लज तो सयाने बने हुए सदैव निश्चिंत रहते है |

ऐस अमल आराम, सुख उछाह भेळ सयण |
होका बिना हगांम, रंग रौ हुवे न राजिया ||

ऐस आराम,अफीम रस की मान मनुहार और मित्र मंडली के साथ आनंद उत्सव के समय हे राजिया ! यदि
हुक्का नही हो,तो मजलिस में रंग नही जमता |

मद विद्या धन मान, ओछा सो उकळै अवट |
आधण रे उनमान , रहैक वीरळा राजिया ||

विद्या, धन और प्रतिष्ठा पाकर ओछे आदमी अभिमान में उछलने लग जाते है | आदहन की भांति मर्यादा में यथावत रहने वाले लोग तो विरले ही होते है |

तुरत बिगाड़े तांह , पर गुण स्वाद स्वरूप नै |
मित्राई पय मांह , रीगल खटाई राजिया ||

जिस प्रकार दूध में खटाई पड़ने पर उसके गुण,स्वाद और स्वरूप में विकृति आ जाती है, उसी प्रकार हे राजिया ! मसखरियों से मन मन फटकर मित्रता शीघ्र ही नष्ट हो जाती है |

सब देखै संसार, निपट करै गाहक निजर |
जाणै जांणणहार, रतना पारख राजिया ||

यों तो सभी लोग ग्राहक की नजर से वस्तुओ को देखते है किंतु उनके गुण दोषों की पहचान हर एक व्यक्ति नही कर सकता | हे राजिया ! रत्नों की परख तो केवल जौहरी ही कर सकता है |

मूरख टोळ तमांम घसकां राळै अत घणी |
गतराडो गुणग्रांम, रांडोल्या मझ राजिया ||

मूर्खों की मंडली में ही मूढ़ व्यक्ति बहुत अधिक गप्पे हांकता रहता है, जैसे रांडोल्यों में हिजड़ा भी गुणवान समझा जाता है |

हुवै न बुझणहार, जांणै कुण कीमत जठै |
बिन गाहक ब्योपार, रुळयौ गिणैजै राजिया ||

जहाँ पर कोई पूछने वाला भी न हो, वहां उस व्यक्ति या वस्तु का मूल्य कौन जानेगा ? निश्चय ही बिना ग्राहक के व्यापार चौपट हो जाता है | हे राजिया ! इसी तरह गुणग्राहक के बिना गुणवान की कद्र नही हो सकती |

गुणी सपत सुर गाय, कियौ किसब मुरख कनै |
जांणै रुनौ जाय, रन रोही में राजिया ||

गायक ने गीत के सातों स्वरों को गाकर मूर्ख व्यक्ति के सामने अपनी कला का प्रदर्शन किया, किंतु उसे ऐसा लगा,मानो वह सुने जंगल में गाकर रोया हो | (अ-रसिक एवं गुणहीन व्यक्ति के संमुख कला का प्रदर्शन अरण्य रोदन के समान ही होता है )

पय मीठा पाक, जो इमरत सींचीजिए |
उर कड़वाई आक, रंच न मुकै राजिया ||

आक भले ही मीठे दूध अथवा अमृत से सींचा जाय, किंतु वह अपने अन्दर का कड़वापण किंचित भी नही छोड़ता | इसी प्रकार हे राजिया ! कुटिल व्यक्ति के साथ कितना ही मधुर व्यवहार किया जाए वह अपनी कुटिलता नही छोड़ता |

रोटी चरखो राम, इतरौ मुतलब आपरौ |
की डोकरियां कांम, रांम कथा सूं राजिया ||

बूढीयाओं को तो रोटी,चरखा और राम-भजन, केवल इन्ही से सरोकार है ! हे राजिया उन्हें राजनितिक चर्चाओं से भला क्या लेना देना ?

जिण मारग औ जात, भुंडी हो अथवा भली |
बिसनी सूं सौ बात, रह्यो न जावै राजिया ||

व्यसनी पुरूष जिस मार्ग पर चलता है,चाहे वह वस्तु बुरी हो या भली वह किसी भी स्थिति में उसे छोड़ नही सकता,यह सौ बातों की एक बात है |

कारण कटक न कीध, सखरा चाहिजई सुपह |
लंक विकट गढ़ लीध, रींछ बांदरा राजिया ||

युद्ध विजय के लिए बड़ी सेना की अपेक्षा कुशल नेतृत्व ही मुख्य कारण होता है | हे राजिया ! श्रेष्ठ संचालक के कारण लंका जैसे अजेय दुर्ग को रींछ और बंदरों ने ही जीत लिया |

डा. शक्तिदान कविया द्वारा लिखित पुस्तक "राजिया रा सौरठा" से साभार |
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Feb 23, 2009

राजिया रा सौरठा -2

अपने सेवक राजिया को संबोधित करते कवि कृपाराम जी द्वारा लिखित नीति सम्बन्धी दोहे |
खळ धूंकळ कर खाय, हाथळ बळ मोताहळां |
जो नाहर मर जाय , रज त्रण भकै न राजिया ||

सिंह युद्ध में अपने पंजों से शत्रु हाथियों के मुक्ताफल-युक्त मस्तक विदीर्ण कर ही उन्हें खाता है | वह चाहे भूख से मर जाय,किंतु घास कभी नही खायेगा |

नभचर विहंग निरास, विन हिम्मत लाखां वहै |
बाज त्रपत कर वास , रजपूती सूं राजिया ||

आकाश में लाखों पक्षी हिम्मत के बिना (भूख के मारे) उड़ते रहते है,किंतु हे राजिया ! बाज अपने पराक्रम से ही पक्षियों का शिकार कर तृप्त जीवन जीता है |

घेर सबल गजराज , कहर पळ गजकां करै |
कोसठ करकम काज, रिगता ही रै राजिया ||

सिंह बलवान हाथी को घेर कर और मार कर उसके मांस का आहार करता है किंतु हे राजिया ! उसी वक्त गीदड़ हड्डियों के ढांचे के लिए ही ललचाते रहते है |

आछा जुध अणपार, धार खगां सनमुख धसै |
भोगे हुवे भरतार ,रसा जिके नर राजिया ||

जो लोग अनेक बड़े युद्धों में तलवारों की धारों के सन्मुख निर्भीक होकर बढ़ते है,वे ही वीर भरतार बनकर इस भूमि को भोगते है |

दांम न होय उदास, मतलब गुण गाहक मिनख |
ओखद रो कड़वास, रोगी गिणै न राजिया ||

गुणग्राहक मनुष्य अपनी लक्ष्य-सिद्धि के लिए किसी भी कठिनाई से निराश नही होता , ठीक उसी तरह, जिस तरह हे राजिया ! रोगी व्यक्ति औषध के कड़वेपन की परवाह नही करता |

गह भरियो गजराज, मह पर वह आपह मतै |
कुकरिया बेकाज, रुगड़ भुसै किम राजिया ||

मस्त गजराज तो अपनी मर्जी से प्रथ्वी पर हर जगह विचरण करता है किंतु हे राजिया ! ये मुर्ख कुत्ते व्यर्थ ही उसे देखकर क्यों भोंकते है |

असली री औलाद, खून करयां न करै खता |
वाहै वद वद वाद, रोढ़ दुलातां राजिया ||

शुद्ध कुल में जन्म लेना वाला तो अपराध करने पर भी झगडा नही करता,जबकि अकुलीन व्यक्ति अकारण ही झगडे करता रहता है ठीक उसी तरह जिस तरह हे राजिया ! खच्चर व्यर्थ ही बढ-बढ कर दुलत्तियाँ झाड़ता रहता है |

ईणही सूं अवदात, कहणी सोच विचार कर |
बे मौसर री बात, रूडी लगै न राजिया ||

सोच-समझकर कही जाने वाली बात ही हितकरणी होती है, हे राजिया ! बिना मौके कही गई बात किसी को अच्छी नही लगती है |

बिन मतलब बिन भेद, केई पटक्या रांम का |
खोटी कहै निखेद, रांमत करता राजिया ||

कई राम के मारे दुष्ट लोग ऐसे होते है, जो बिना मतलब और बिना विचार किए हँसी-ठिठोली में ही किसी अप्रिय एवं अनुचित बाते कह देते है |

पल-पल में कर प्यार,पल-पल में पलटे परा |
ऐ मतलब रा यार, रहै न छाना राजिया ||

जो लोग पल-पल में प्यार का प्रदर्शन करते है और पल-पल में बदल भी जाते है, हे राजिया ! ऐसे मतलबी यार दोस्त छिपे नही रह सकते वे तुंरत ही पहचाने जाते है |

सार तथा अण सार, थेटू गळ बंधियों थकौ |
बड़ा सरम चौ भार, राळयं सरै न राजिया ||

परम्परा के रूप में जो भी सारयुक्त अथवा सारहीन तत्व हमारे गले बंध गया है, पूर्वजों की लाज-मर्यादा के उस भार को फेंकने से काम नही चलता उसे तो निभाना ही पड़ता है |

पहली कियां उपाव, दव दुस्मण आमय दटे |
प्रचंड हुआ विस वाव , रोभा घालै राजिया ||

अग्नि,दुश्मन और रोग तो आरंभ में ही दबाने से दब जाते है ,लेकिन हे राजिया ! विष (शत्रुता एवं रोग) और वायु प्रचंड हो जाने पर सदा कष्ट देते है |

एक जतन सत एह , कुकर कुगंध कुमांणसां |
छेड़ न लीजे छेह, रैवण दीजे राजिया ||

कुत्ता,दुर्गन्ध और दुष्टजन से बचने का एक मात्र उपाय यही है कि उन्हें छेड़ा न जाय और ज्यों का त्यों पड़ा रहने दिया जाय |

नरां नखत परवाण, ज्याँ उंभा संके जगत |
भोजन तपै न भांण, रावण मरता राजिया ||

मनुष्य की महिमा उसके नक्षत्र से होती है, इसलिय उसके जीते जी संसार उससे भय खाता है | रावण जैसे प्रतापी की मृत्यु होते ही सूर्य ने उसके रसोई घर में तपना (भोजन बनाना) बंद कर दिया था |

हीमत कीमत होय, विन हीमत कीमत नही |
करै न आदर कोय, रद कागद ज्यूँ राजिया ||

हिम्मत से ही मनुष्य का मूल्यांकन होता है,अतः पुरुषार्थहीन व्यक्ति का कोई महत्व नही होता | हे राजिया ! साहस रहित व्यक्ति रद्दी कागज की भांति होता है जिसका कोई भी आदर नही करता |

डा. शक्तिदान कविया द्वारा लिखित पुस्तक "राजिया रा सौरठा" से साभार |
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Feb 22, 2009

क्या आप भी regsvr.exe वायरस से परेशान है ?

पिछले कई दिनों से regsvr.exe नामक एक वायरस ने कंप्युटर जी की गति धीमी कर दुखी कर रखा था जिसे हटाने के लिए एक के बाद एक कई एंटी वायरस काम लिए लेकिन नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात | नोर्टन और McAfee एंटी वायरस भी इस वायरस को हटाना तो दूर पकड़ ही नही सके | यह वायरस कंप्युटर की क्षमता का ७० से ८० % तक या कभी कभी १००% तक इस्तेमाल करना शुरू कर देता है जिससे अन्य कार्य करने पर कंप्युटर हेंग हो जाता है | यही नही १००% क्षमता का इस्तेमाल होने पर कंप्युटर का प्रोसेसर गर्म होकर ख़राब होने की भी आशंका बन जाती है | पहले पहल तो समझ ही नही आया कि अलग-अलग एंटी-वायरस सोफ्टवेयर से कंप्युटर को क्लीन करने के बाद भी कंप्युटर धीमे क्यो चल रहा है जब टास्क मेनेजर खोल कर देखा तब पता चला कि कंप्युटर जी की क्षमता का १०० % इस्तेमाल हो रहा है और टास्क मेनेजर की processes में देखने पर पाया कि regsvr.exe अप्लिकेशन सबसे ज्यादा क्षमता का इस्तेमाल कर रही है जैसे ही इस फाइल का प्रोसेस को बंद किया कंप्युटर जी अपने आप सही काम करने लग गए लेकिन कुछ ही देर बाद ये वायरस फ़िर सक्रीय हो कंप्युटर की गति धीमी कर देता है | पहले तो यह समझ ही नही आया कि ये कोई वायरस ही है या विण्डो की कोई अप्लेकाशन फाइल | आख़िर गूगल बाबा से पूछताछ से पता चला कि ये वायरस ही है और पेन ड्राइव के द्वारा आने वाला यह वायरस आसानी से जाने वाला नही है अतः गूगल बाबा की झोली से इस वायरस को हटाने के कुछ नुस्खे ढूंढे और यहाँ लिखे एक नुस्खे की सहायता से इस वायरस को निकालने का अभियान शुरू किया सारे स्टेप पार करने के बाद आखिरी स्टेप में सभी .exe फाइल डिलीट करने में डर लगा कि कही कोई काम की फाइल डिलीट ना हो जाए अतः समस्या फ़िर ज्यों की त्यों | आख़िर फ़िर गूगल बाबा की सहायता से इसे हटाने के regsvr.exe रिमूवल टूल ढूंढे और कई एंटी वायरस रूपी हथियार इस्तेमाल करने के बाद भी यह वायरस हटने का नाम ही नही ले रहा था लेकिन आखिरी कोशिश के तहत यहाँ से एक औजार मिला जिसकी सहायता से इस regsvr.exe नामक वायरस को हटाने में कामयाबी मिली | regsvr.exe से तो निजात मिल गई लेकिन अब जिस औजार का इस्तेमाल किया उसने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए अतः उसे भी बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा | मेरी पिछली पोस्ट में तरुण ने अपनी टिप्पणी में सही कहा था कि नेट पर फ्री में मिलने वाली चीजे सोच समझ कर ही इस्तेमाल करनी चाहिए | फ्री में मिलने वाले सभी सोफ्टवेयर अच्छे नही होते | अब कंप्युटर जी की सुरक्षा के लिए एक अग्नि रेखा (Firewall) खींचने के आलावा McAfee को तैनात किया है देखते है ये व्यवस्था कब तक कंप्युटर जी की वायरस से सुरक्षा कर पाती है |
वैसे मेरे विचार से इन सब झंझट से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है लिनक्स का इस्तेमाल जिसमे कम से कम वायरस का तो कोई झंझट नही | हालाँकि मैंने तो उबुन्टू लिनक्स इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है लेकिन बच्चे अभी फोटोशॉप,ड्रीमवीवर व कोरल ड्रो के चक्कर में विण्डो का मोह नही त्याग पा रहे है |


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Feb 21, 2009

राजिया रा सौरठा -1

पिछले लेख कवि "कृपाराम जी और रजिया के दोहे" पढने के बाद कई बंधुओ ने राजिया के दोहे लिखने का अनुरोध किया था अतः आज से "राजिया रा सौरठा" नाम से यह श्रंखला पेश कर रहा हूँ |
कुट्ळ निपट नाकार, नीच कपट छोङे नहीं |
उत्तम करै उपकार,रुठा तुठा राजिया ||

कुटिल और नीच व्यक्ति अपनी कुटिलता और नीचता कभी नही छोड़ सकते, जबकि हे राजिया ! उत्तम कोटि के व्यक्ति चाहे रुष्ट हो या तुष्ट, वे हमेशा दूसरो का भला ही करेंगे |

सुख मे प्रीत सवाय, दुख मे मुख टाळौ दियै |
जो की कहसी जाय, रांम कचेडी राजिया ||

जो लोग सुख में तो खूब प्रीत दिखाते है किंतु दुःख पड़ने पर मुंह छिपा लेते है, हे राजिया ! वे ईश्वर की अदालत में जाकर क्या जबाब देंगे |

समझणहार सुजांण, नर मौसर चुकै नहीं |
औसर रौ अवसांण,रहै घणा दिन राजिया ||

समझदार एव विवेकशील व्यक्ति कभी हाथ लगे उचित अवसर को खोता नही,क्यों कि हे राजिया ! अवसर पर किया गया अहसान बहुत दिनो तक याद रहता है |

किधोडा उपकार, नर कृत्घण जानै नही |
लासक त्यांरी लार,रजी उडावो राजिया ||

जो लोग कृत्धन होते है, वे अपने पर किए गए दूसरो के उपकार को कभी नही मानते,इसलिए,हे राजिया ! ऐसे निकृष्ट व्यक्तियों के पीछे धुल फेंको |

मुख ऊपर मिथियास, घट माहि खोटा घडे |
इसडा सूं इकलास, राखिजे नह राजिया ||

जो मनुष्य मुंह पर तो मीठी-मीठी बाते करते है,किंतु मन ही मन हानि पहुँचाने वाली योजनायें रचते है,ऐसे लोगो से, हे राजिया ! कभी मित्रता नही रखनी चाहिए |

अहळा जाय उपाय,आछोडी करणी अहर |
दुष्ट किणी ही दाय, राजी हुवै न राजिया ||

दुष्ट व्यक्ति के साथ कितना ही अच्छा व्यवहार और उपकार क्यों न किया जाए,वह निष्फल ही होगा,क्यों कि हे राजिया ! ऐसे लोग किसी भी तरह प्रसन्न नही होते |

गुण सूं तजै न गांस,नीच हुवै डर सूं नरम |
मेळ लहै खर मांस, राख़ पडे जद राजिया ||

नीच मनुष्य भलाई करने से कभी दुष्टता नही छोड़ता,वह तो भय दिखाने से ही नम्र होता है, जिस प्रकार,हे राजिया ! गधे का मांस राख़ डालने से ही सीझता (पकता ) है |

दुष्ट सहज समुदाय,गुण छोडे अवगुण गहै |
जोख चढी कुच जाय, रातौ पीवै राजिया ||

दुष्टों का समुदाय गुण छोड़ कर अवगुण ग्रहण करता है, क्योंकि यह उनका सहज स्वभाव है,जिस प्रकार,हे राजिया ! जोंक स्तन पर चढ़ कर भी दूध की जगह रक्त ही पीती है |

केई नर बेकार,बड करतां कहताँ बळै |
राखै नही लगार,रांम तणौ डर राजिया ||

कई लोग किसी की कीर्ति करने अथवा कहने से व्यर्थ ही जलने लगते है | ऐसे ईर्ष्यालु व्यक्ति तो परमात्मा का भी किंचित भय नही रखते |

चुगली ही सूं चून, और न गुण इण वास्तै |
खोस लिया बेखून,रीगल उठावे राजिया ||

जिन लोगो के पास चुगली करने के अलावा जीविकोपार्जन का अन्य कोई गुण नही होता,ऐसे लोग ठिठोलियाँ करते-करते ही निरपराध लोगो की रोजी रोटी छीन लेते है |

आछो मांन अभाव मतहीणा केई मिनख |
पुटियाँ कै ज्यूँ पाव , राखै ऊँचो राजिया ||

कई बुद्धिमान व्यक्तियों को सम्मान मिलने पर वे पचा नही पाते और उस अ-समाविष्ट स्थिति मे अभिमान के कारण पुटियापक्षी की तरह सदैव अपने पैर ऊपर (आकाश) की और किए रहते है |

गुण अवगुण जिण गांव, सुणै न कोई सांभळै |
उण नगरी विच नांव , रोही आछी राजिया ||

जहाँ गुण अवगुण का न तो भेद हो और न कोई सुनने वाला हो , ऐसी नगरी से तो,हे राजिया ! निर्जन वन ही अच्छा है |

कारज सरै न कोय, बळ प्राकम हिम्मत बिना |
हलकाऱ्या की होय, रंगा स्याळां राजिया ||

बल पराकर्म एवं हिम्मत के बिना कोई भी कार्य सफल नही होता | हे राजिया रंगे सियारों की तरह ललकारने से भी क्या होता है |

मिले सिंह वन मांह, किण मिरगा मृगपत कियो |
जोरावर अति जांह, रहै उरध गत राजिया ||

सिंह को वन मे किन मृगो ने मृगपति घोषित किया था | जो शक्तिशाली होता है उसकी उर्ध्वगति स्वत: हो जाती है |

Feb 17, 2009

राजस्थानी कहावतें हिन्दी व्याख्या सहित -2

घणा बिना धक् जावे पण थोड़ा बिना नीं धकै |
अधिक के बिना तो चल सकता है,लेकिन थोड़े के बिना नही चल सकता |

मनुष्य के सन्दर्भ में अधिक की तो कोई सीमा नही है - दस,बीस,सौ,हजार,लाख,अरब-खरब भी सीमा का अतिक्रमण नही कर सकते | सामान्य अथवा गरीब व्यक्ति के लिए अधिक धन के बिना तो जीवन चल सकता है,लेकिन थोड़े के बिना एक घड़ी भी नही चल सकता | ऐश्वर्य का अभाव उतना नही खलता,जितना न्यूनतम जरूरतों की पूर्ति का न होना भयंकर कष्ट दायक होता है | बड़े से बड़ा दार्शनिक भी इतने सरल शब्दों में इतनी बड़ी बात नही कह सकता | जितनी यहाँ एक छोटी सी कहावत के द्वारा आम आदमी द्वारा कह दी जाती है | सीधी और सहज उक्ति ही सुगम्भीर ज्ञान झेल सकती है,वाग्जाल से बात बनती नही |
गाभां में सै नागा = कपड़ो में सब नंगे |

बाहरी लिबास पर ही लोक-द्रष्टि अटक कर रह जाती है | वह वस्त्रो के ठेठ भीतर तक देख लेती है कि बाहरी पहनावे से सब अलग-अलग दीखते है,पर भीतर से सब एक है - निपट निरावर्त और पशु | हर व्यक्ति अपनी कमजोरियों को अनदेखा करना चाहता है,लेकिन लोक द्रष्टि से कुछ भी छिपा नही रहता कि ऐसा कोई मनुष्य हो जो अवगुणों से परे हो | पशुता को ढकने से वह ढकी नही रह जाती | चाहे संत-सन्यासी हो,चाहे दरवेश या कोई आम आदमी | - आदमी पहले पशु है,फ़िर नागरिक |
अन्तर बाजै तौ जंतर बाजै = अन्तर बजे तो साज सजे |
कितना सटीक निरिक्षण है कि ह्रदय की वीणा मौन तो हाथ की वीणा भी मौन | भीतर से उदभासित होने पर ही प्रत्येक कला निखरती है | साहित्य या अन्य कला का स्त्रोत अंतरात्मा से उगमता है तो बाहर तरह-तरह के फूल खिलते है | और तरह-तरह की सौरभ महकती है | ह्रदय की आँखे न खुलें तब तक बाहर की झांकी या ब्रह्म की झलक जीवंत रूप में द्रष्टिगोचर नही होती | पानी केवल पानी ही दीखता है,बिजली केवल बिजली ही नजर आती है | उन में प्राणों का स्पंदन महसूस नही होता | कितने सरल शब्दों में सहज भाव से लोक द्रष्टि ने कला के मूल उत्स की पड़ताल कर ली | अपने देश के ऋषि-मुनि अंतप्रज्ञा से जो ज्ञान प्राप्त करते थे,उसे लोक जीवन अपने सामूहिक अवचेतन से अर्जित करता है,पर दोनों की उंचाईयों में किसी भी प्रकार का अन्तर नही है |
चोरी रो गुड मिठो = चोरी का गुड मीठा |

अपने घर में शक्कर,खांड,मिश्री,और गुड के भंडार भरे हो,पर चोरी का गुड अधिक मीठा लगता है | इसलिए कि चोरी के गुड में जीवट का मिठास घुला होता है | जो वस्तु सहज ही उपलब्ध हो जाती है,उसके उपयोग में आनंद नही मिलता, जितना अप्राप्य वस्तु प्राप्त करने में मिलता है |
धणी गोङै जावता छिनाल नह बाजै = पति के पास जाने पर छिनाल नही कहलाती |

सामाजिक स्वीकृति के बिना प्राकृतिक जरूरतों के लिए किए गए कार्य भी अवैध कहलाते है | नारी और पुरूष का स्वाभाविक व प्राकृतिक मिलन,जब तक समाज के द्वारा मान्यता प्राप्त न हो,वह संगत या वैध नही होता | पर उसी कर्म को जब सामाजिक मान्यता मिल जाती है तो वह प्रतिष्ठित मान लिया जाता है | मैथुन कर्म वही है, पर पर पति-पत्नी दुराचारी या लम्पट नही कहलाते | किंतु पर-पुरूष और पर-नारी के बीच यही नैसर्गिक कर्म असामाजिक हो जाता है | सामाजिक प्रथाये समय के अनुरूप बदलती रहती है,फ़िर भी मनुष्य का सामाजिक मान्यताओ को माने बिना काम नही चल सकता | वह पशुओं कि भांति अकेला जीवन व्यतीत नही करता,समाज को मान कर चलना अनिवार्य है |
ये थी कुछ राजस्थानी कहावते और वर्तमान सन्दर्भ में उनकी हिंदी व्याख्या | ये तो सिर्फ़ बानगी है ऐसी ही 15028 राजस्थानी कहावतों को हिंदी व्याख्या सहित लिखा है राजस्थान के विद्वान लेखक और साहित्यकार विजयदान देथा ने | विजयदान देथा किसी परिचय के मोहताज नही शायद आप सभी इनका नाम पहले पढ़ या सुन चुके होंगे | और इन कहावतों को वृहद् आठ भागो में प्रकाशित किया है राजस्थानी ग्रंथागार सोजती गेट जोधपुर ने |

Feb 16, 2009

डिलीट फाइलें रिकवर कैसे करें ?

कई बार गलती से या कम महत्व की समझ हम कई फाइलें अपने कंप्युटर से डिलीट कर देते है लेकिन कभी न कभी उन फाइलों की हमें जरुरत पड़ जाती है ऐसी स्थिति में जाल तंत्र पर ऐसे कई डाटा रिकवरी सोफ्टवेयर उपलब्ध है जो डिलीट की हुयी फाइलों को कंप्युटर से वापस खोज निकालते है यही नही ये इस तरह के डाटा रिकवरी टूल सोफ्टवेयर फॉर्मेट की हुयी हार्ड डिस्क से भी डाटा रिकवर कर लेते है | कंप्युटर विशेषग्य इन्ही डाटा रिकवरी टूल्स की सहायता से कंप्युटर ख़राब होने से खोये डाटा वापस रिकवर करते है | आपको भी कभी ऐसी जरुरत पड़ जाए तो यहाँ चटका लगाकर डाटा रिकवरी सोफ्टवेयर डाउनलोड कर अपने कंप्युटर में इंस्टाल करलें | इस सोफ्टवेयर को काम लेना भी बड़ा आसान है |
Recuva - File Recovery



Recuva (pronounced "recover") is a freeware Windows utility to restore files that have been accidentally deleted from your computer. This includes files emptied from the Recycle bin as well as images and other files that have been deleted by user error from digital camera memory cards or MP3 players. It will even bring back files that have been deleted by bugs, crashes and viruses!

Feb 15, 2009

जालौर का जौहर और शाका


सोमनाथ मन्दिर को खंडित कर गुजरात से लौटती अलाउद्दीन खिलजी की सेना पर जालौर के शासक कान्हड़ देव चौहान ने पवित्र शिवलिंग शाही सेना से छीन कर जालौर की भूमि पर स्थापित करने के उदेश्य से सरना गांव में डेरा डाली शाही सेना पर भीषण हमला कर पवित्र शिवलिंग प्राप्त कर लिया और शास्त्रोक्त रीती से सरना गांव में ही प्राण प्रतिष्ठित कर दिया |
मुंहता नैन्सी की ख्यात के अनुसार इस युद्ध में जालौर के राजकुमार विरमदेव की वीरता की कहानी सुन खिलजी ने उसे दिल्ली आमंत्रित किया | उसके पिता कान्हड़ देव ने अपने सरदारों से विचार विमर्श करने के बाद राजकुमार विरमदेव को खिलजी के पास दिल्ली भेज दिया जहाँ खिलजी ने उसकी वीरता से प्रभावित हो अपनी पुत्री फिरोजा के विवाह का प्रस्ताव राजकुमार विरमदेव के सामने रखा जिसे विरमदेव एकाएक ठुकराने की स्थिति में नही थे अतः वे जालौर से बारात लाने का बहाना बना दिल्ली से निकल आए और जालौर पहुँच कर खिलजी का प्रस्ताव ठुकरा दिया |
मामो लाजे भाटिया, कुल लाजे चव्हान |
जो हूँ परणु तुरकड़ी तो उल्टो उगे भान ||

शाही सेना पर गुजरात से लौटते समय हमला और अब विरमदेव द्वारा शहजादी फिरोजा के साथ विवाह का प्रस्ताव ठुकराने के कारण खिलजी ने जालौर रोंदने का निश्चय कर एक बड़ी सेना जालौर रवाना की जिस सेना पर सिवाना के पास जालौर के कान्हड़ देव और सिवाना के शासक सातलदेव ने मिलकर एक साथ आक्रमण कर परास्त कर दिया | इस हार के बाद भी खिलजी ने सेना की कई टुकडियाँ जालौर पर हमले के लिए रवाना की और यह क्रम पॉँच वर्ष तक चलता रहा लेकिन खिलजी की सेना जालौर के राजपूत शासक को नही दबा पाई आख़िर जून १३१० में ख़ुद खिलजी एक बड़ी सेना के साथ जालौर के लिए रवाना हुआ और पहले उसने सिवाना पर हमला किया और एक विश्वासघाती के जरिये सिवाना दुर्ग के सुरक्षित जल भंडार में गौ-रक्त डलवा दिया जिससे वहां पीने के पानी की समस्या खड़ी हो गई अतः सिवाना के शासक सातलदेव ने अन्तिम युद्ध का ऐलान कर दिया जिसके तहत उसकी रानियों ने अन्य क्षत्रिय स्त्रियों के साथ जौहर किया व सातलदेव आदि वीरों ने शाका कर अन्तिम युद्ध में लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की |
इस युद्ध के बाद खिलजी अपनी सेना को जालौर दुर्ग रोंदने का हुक्म दे ख़ुद दिल्ली आ गया | उसकी सेना ने मारवाड़ में कई जगह लूटपाट व अत्याचार किए सांचोर के प्रसिद्ध जय मन्दिर के अलावा कई मंदिरों को खंडित किया | इस अत्याचार के बदले कान्हड़ देव ने कई जगह शाही सेना पर आक्रमण कर उसे शिकस्त दी और दोनों सेनाओ के मध्य कई दिनों तक मुटभेडे चलती रही आखिर खिलजी ने जालौर जीतने के लिए अपने बेहतरीन सेनानायक कमालुद्दीन को एक विशाल सेना के साथ जालौर भेजा जिसने जालौर दुर्ग के चारों और सुद्रढ़ घेरा डाल युद्ध किया लेकिन अथक प्रयासों के बाद भी कमालुद्दीन जालौर दुर्ग नही जीत सका और अपनी सेना ले वापस लौटने लगा तभी कान्हड़ देव का अपने एक सरदार विका से कुछ मतभेद हो गया और विका ने जालौर से लौटती खिलजी की सेना को जालौर दुर्ग के असुरक्षित और बिना किलेबंदी वाले हिस्से का गुप्त भेद दे दिया | विका के इस विश्वासघात का पता जब उसकी पत्नी को लगा तब उसने अपने पति को जहर देकर मार डाला | इस तरह जो काम खिलजी की सेना कई वर्षो तक नही कर सकी वह एक विश्वासघाती की वजह से चुटकियों में ही हो गया और जालौर पर खिलजी की सेना का कब्जा हो गया | खिलजी की सेना को भारी पड़ते देख वि.स.१३६८ में कान्हड़ देव ने अपने पुत्र विरमदेव को गद्दी पर बैठा ख़ुद ने अन्तिम युद्ध करने का निश्चय किया | जालौर दुर्ग में उसकी रानियों के अलावा अन्य समाजों की औरतों ने १५८४ जगहों पर जौहर की ज्वाला प्रज्वलित कर जौहर किया तत्पश्चात कान्हड़ देव ने शाका कर अन्तिम दम तक युद्ध करते हुए वीर गति प्राप्त की |कान्हड़ देव के वीर गति प्राप्त करने के बाद विरमदेव ने युद्ध की बागडोर संभाली | विरमदेव का शासक के रूप में साढ़े तीन का कार्यकाल युद्ध में ही बिता | आख़िर विरमदेव की रानियाँ भी जालौर दुर्ग को अन्तिम प्रणाम कर जौहर की ज्वाला में कूद पड़ी और विरमदेव ने भी शाका करने हेतु दुर्ग के दरवाजे खुलवा शत्रु सेना पर टूट पड़ा और भीषण युद्ध करते हुए वीर गति को प्राप्त हुआ | विरमदेव के वीरगति को प्राप्त होने के बाद शाहजादी फिरोजा की धाय सनावर जो इस युद्ध में सेना के साथ आई थी विरमदेव का मस्तक काट कर सुगन्धित पदार्थों में रख कर दिल्ली ले गई | कहते है विरमदेव का मस्तक जब स्वर्ण थाल में रखकर फिरोजा के सम्मुख लाया गया तो मस्तक उल्टा घूम गया तब फिरोजा ने अपने पूर्व जन्म की कथा सुनाई..
तज तुरकाणी चाल हिंदूआणी हुई हमें |
भो-भो रा भरतार , शीश न धूण सोनीगरा ||

फिरोजा ने उनके मस्तक का अग्नि संस्कार कर ख़ुद अपनी माँ से आज्ञा प्राप्त कर यमुना नदी के जल में प्रविष्ट हो जगाई |
सन्दर्भ पुस्तक- रावल विरमदेव
इस पुस्तक के लेखक श्री देवेन्द्र सिंह जी पुलिस अधिकारी,इतिहास विद एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओ में स्तम्भ लेखक है |

Feb 14, 2009

पगड़ी को भैंस खा गई

पगड़ी नै भैंस खायगी = पगड़ी को भैंस खा गई |

सन्दर्भ कथा :- आज सुबह ताऊ के शनिवारीय खूंटे पर आपने पढ़ा कि कैसे ताऊ ने एक ईमानदार जज से भी हारने वाला केस जीत लिया आज मै ताऊ के एक ऐसे ही मुकदमे का जिक्र कर रहा हूँ जिसकी सुनवाई करने वाली कचहरी का हाकिम बेईमान था बात-बात में रिश्वत लेता था और ताऊ का मुकदमा साधन संपन और तेज तर्रार बनिए के साथ चल रहा था | बनिया हाकिम साहब की न्यायप्रियता से परिचित था अतः बनिए ने हाकिम साहब के घर जाकर एक बहुत ही बढ़िया पगड़ी उपहार में दे दी | लेकिन कहते है न कि हवा के भी कान होते है और फ़िर ताऊ तो ठहरा ताऊ ! कही से ताऊ को इस बात का पता चल गया और ताऊ ने अमावस्या की रात को हाकिम साहब के घर एक भैंस हाकिम साहब के बच्चों को दूध पिने के लिए पहुँचा दी अमावस्या की रात को इसलिए क्योकि अमावस्या की रात काली होती है और भैंस का रंग भी काला सो किसी को पता तक नही चलेगा | चूँकि भैंस का मूल्य भी पगड़ी से ज्यादा होता है और भैंस का दूध पुरे परिवार के लिए स्वास्थ्य वर्धक भी | और बनिए की पगड़ी तो सिर्फ़ हाकिम साहब का सिर ही ढक सकती थी | भैंस का दूध मिलने से हाकिम साहब का पुरा परिवार भी ताऊ के पक्ष में हो गया | जब फैसले की बारी आई तब हाकिम ने ताऊ के पक्ष में फैसला सुनाया जिसे सुनकर बनिया बौखला गया और अपनी पगड़ी हाथ में लेकर इशारे से हाकिम को समझाने की कोशिश करने को कहने लगा , हुजुर मेरी पगड़ी की तो लाज रखनी थी | हाकिम भी कोई कम समझदार नही था और हाजिर जबाब भी था सो हाकिम ने बनिए को तुंरत जबाब दिया - सेठजी थारी पगड़ी तो भैंस चरगी | बनिए क्या करता सो सहमते हाथो से अपनी पगड़ी सिर पर रखी और ताऊ के आगे से टका-सा मुंह लेकर चला गया |

शेखावाटी की धमाल

राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र की अपनी विशिष्ठ सांस्कृतिक पहचान है इस क्षेत्र ने भारतीय सेना को सबसे अधिक वीर सैनिक दिए है यहाँ के लोग अपनी वीरता,कर्तव्यनिष्ठा के अलावा अपनी जिन्दादिली के लिए भी जाने जाते है और इसी जिन्दादिली का प्रमाण है कि फाल्गुन का महिना लगते ही पुरे शेखावाटी क्षेत्र में चंग (ढफ) पर थाप के साथ ही होली के गीतों की धमाल शुरू हो जाती है | गांव-गांव और हर शहर में शाम होते ही लोगों के झुंड के झुंड जुट जाते है और चंग (ढफ) पर थाप के साथ ही होली के गीतों में झूम उठते है यह क्रम होली आने तक चलता रहता है "होरियों" के नाम से प्रसिद्ध इन लोक गीतों को गाने की भी अपनी एक विशिष्ठ शैली होती है | अब फाल्गुन का महिना लग चुका है और शेखावाटी क्षेत्र में इन "होरियों" के लोक गीतों के कार्यक्रम शुरू हो चुके है, अब जब पुरा शेखावाटी क्षेत्र होली के लोक गीतों की मस्ती में झूम रहा है तो आप पीछे क्यों रहे, आईये रूप सिंह शेखावत और उनके साथी कलाकारों के साथ आप भी होली की इस धमाल में शामिल होकर मस्त हो जाईये | वैसे भी आज आपने ताऊ की शनिश्चरी पहेली में काफी दिमाग लगाया होगा सो अब कुछ मनोरंजन कर फ्रेश हो जाईये |

Feb 13, 2009

कुछ राजस्थानी कहावतें हिंदी व्याख्या सहित

घोड़ा रो रोवणौ नीं,घोड़ा री चाल रौ रोवणौ है |=घोडे का रोना नही घोडे की चाल का रोना है |

एक चोर किसी का घोड़ा ले गया | पर घोडे के मालिक को घोडे की चिंता नही थी | उसका रोना तो फकत इस बात का था कि अन्भिज्ञ चोर घोडे की चाल बिगाड़ देगा | उपभोक्ता संस्कृति और आधुनिक विज्ञानं एवं प्रोद्योगिकि ने सब देशो की स्वस्थ और जीवन्त परम्परा का अपहरण कर लिया तो कोई बात नही, पर इससे मनुष्य की सारी चाल ही बिगड़ गई | यदि उसका मनुष्यत्व नष्ट हो गया तो क्या उसकी पूर्ति बेइंतहा पूंजी से हो जायेगी ? मनुष्य के लिए उसका आचरण बिगड़ने की क्षति ही सबसे क्षति है |
भौतिक नुकसान चाहे जितना हो,उसकी पूर्ति सम्भव है | किंतु भ्रष्ट चरित्र की पूर्ति लाख कोहिनूर हीरों से भी नही हो सकती | व्यक्ति के आदर्श एवं नैतिक वजूद की आज जितनी जरुरत है,उतनी पहले कभी नही थी | विकार-ग्रस्त मनुष्य की मामूली कुंठा हजारों प्राणियों को सांसत में डाल सकती है |
म्है ही खेल्या अर म्है ई ढाया |= हम ही खेले और हमने ही बिखेरे |

हमने ही घरोंदे बनाये और हमने ही ढहाए | यह कहावत समिष्टि के लिए उपयुक्त है और समिष्टि के लिए भी कि मनुष्य बचपन और युवावस्था में नए-नए खेल खेलता है और उन्हें भूलता रहता है | घरोंदे बनाना और बिखेरना,यह मानव जाति और व्यक्ति के जीवन की अनंत गाथा है |-- आधुनिक सभ्यता के नाम पर मनुष्य ने क्या-क्या करतब नही रचे , और साथ ही विध्वंसक हथियारों की होड़ में कोई कसर बाकी नही रखी | मनुष्य ही समूचे विकास का नियंता है और वही समूचे विनाश का कारण बनेगा |- इस कहावत की तह में झांक कर देखें तो अमरीका का चेहरा उस में स्पष्ट नजर आता है कि वह ऐश्वर्य और विलास की उंचाईयों छूने जा रहा है,साथ-साथ वह समूची दुनिया का संहार का भी निमित्त बनेगा | इन लोक-वेद की रचनाओं को अपने प्रादेशिक आँचल से हटा कर अब अंतर्राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में समझना जरुरी है और व्यापक प्रष्ठभूमि में परखना अनिवार्य है |
आज री थेप्योड़ी आज नीं बले = आज के पाथे हुए कंडे आज नही जलते |

प्रत्येक काम के लिए अपना समय अपेक्षित है | जल्दबाजी करने से काम नही होता |किसी भी काम की योग्यता निरंतर अभ्यास से हासिल होती है,कोई भी व्यक्ति एक दिन में पारंगत नही हो सकता | सभी तथ्य समय सापेक्ष होते है,समय के महत्व को नजर-अंदाज करने का नतीजा बड़ा घातक होता है | मनुष्य के जीवन में धेर्य का भी बड़ा महत्त्व है |
ये थी कुछ राजस्थानी कहावते और वर्तमान सन्दर्भ में उनकी हिंदी व्याख्या | ये तो सिर्फ़ बानगी है ऐसी ही 15028 राजस्थानी कहावतों को हिंदी व्याख्या सहित लिखा है राजस्थान के विद्वान लेखक और साहित्यकार विजयदान देथा ने | विजयदान देथा किसी परिचय के मोहताज नही शायद आप सभी इनका नाम पहले पढ़ या सुन चुके होंगे | और इन कहावतों को वृहद् आठ भागो में प्रकाशित किया है राजस्थानी ग्रंथागार सोजती गेट जोधपुर ने |

Feb 12, 2009

हाड़ी रानी और उसकी सैनाणी ( निशानी )

अपने पिछले लेख " बीच युद्ध से लौटे राजा को रानी की फटकार " के आख़िर में मैंने एक ऐसी रानी का जिक्र किया था जिसने युद्ध में जाते अपने पति को निशानी मांगने पर अपना सिर काट कर भिजवा दिया था | यह रानी बूंदी के हाडा शासक की बेटी थी और उदयपुर (मेवाड़) के सलुम्बर ठिकाने के रावत चुण्डावत की रानी थी | जिनकी शादी का गठ्जोडा खुलने से पहले ही उसके पति रावत चुण्डावत को मेवाड़ के महाराणा राज सिंह (1653-1681) का औरंगजेब के खिलाफ मेवाड़ की रक्षार्थ युद्ध का फरमान मिला | नई-नई शादी होने और अपनी रूपवती पत्नी को छोड़ कर रावत चुण्डावत का तुंरत युद्ध में जाने का मन नही हो रहा था यह बात रानी को पता लगते ही उसने तुंरत रावत जी को मेवाड़ की रक्षार्थ जाने व वीरता पूर्वक युद्ध करने का आग्रह किया | युद्ध में जाते रावत चुण्डावत पत्नी मोह नही त्याग पा रहे थे सो युद्ध में जाते समय उन्होंने अपने सेवक को रानी के रणवास में भेज रानी की कोई निशानी लाने को कहा | सेवक के निशानी मांगने पर रानी ने यह सोच कर कि कहीं उसके पति पत्नीमोह में युद्ध से विमुख न हो जाए या वीरता नही प्रदर्शित कर पाए इसी आशंका के चलते इस वीर रानी ने अपना शीश काट कर ही निशानी के तौर पर भेज दिया ताकि उसका पति अब उसका मोह त्याग निर्भय होकर अपनी मातृभूमि के लिए युद्ध कर सके | और रावत चुण्डावत ने अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया और वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृभूमि के लिए शहीद हो गया |
इस घटना पर कवि मेघराज "मुकुल" की एक रचना मुझे मिली जो मै यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ |

सैनांण पड्यो हथलेवे रो,हिन्लू माथै में दमकै ही |
रखडी फैरा री आण लियां गमगमाट करती गमकै ही |
कांगण-डोरों पूंछे माही, चुडलो सुहाग ले सुघडाई |
चुन्दडी रो रंग न छुट्यो हो, था बंध्या रह्या बिछिया थांई |

अरमान सुहाग-रात रा ले, छत्राणी महलां में आई |
ठमकै सूं ठुमक-ठुमक छम-छम चढ़गी महलां में सरमाई |
पोढ़ण री अमर लियां आसां,प्यासा नैणा में लियां हेत |
चुण्डावत गठजोड़ो खोल्यो, तन-मन री सुध-बुध अमित मेट |

पण बाज रही थी सहनाई ,महलां में गुंज्यो शंखनाद |
अधरां पर अधर झुक्या रह गया , सरदार भूल गयो आलिंगन |
राजपूती मुख पीलो पड्ग्यो, बोल्यो , रण में नही जवुलां |
राणी ! थारी पलकां सहला , हूँ गीत हेत रा गाऊंला |
आ बात उचित है कीं हद तक , ब्या" में भी चैन न ले पाऊ ?
मेवाड़ भलां क्यों न दास, हूं रण में लड़ण नही ञाऊ |
बोली छात्रणी, "नाथ ! आज थे मती पधारो रण माहीं |
तलवार बताधो , हूं जासूं , थे चुडो पैर रैवो घर माहीं |

कह, कूद पड़ी झट सेज त्याग, नैणा मै अग्नि झमक उठी |
चंडी रूप बण्यो छिण में , बिकराल भवानी भभक उठी |
बोली आ बात जचे कोनी,पति नै चाहूँ मै मरवाणो |
पति म्हारो कोमल कुम्पल सो, फुलां सो छिण में मुरझाणो |
पैल्याँ कीं समझ नही आई, पागल सो बैठ्यो रह्यो मुर्ख |
पण बात समझ में जद आई , हो गया नैन इक्दम्म सुर्ख |
बिजली सी चाली रग-रग में, वो धार कवच उतरयो पोडी |
हुँकार "बम-बम महादेव" , " ठक-ठक-ठक ठपक" बढ़ी घोड़ी |

पैल्याँ राणी ने हरख हुयो,पण फेर ज्यान सी निकल गई |
कालजो मुंह कानी आयो, डब-डब आँखङियां पथर गई |
उन्मत सी भाजी महलां में, फ़िर बीच झरोखा टिका नैण |
बारे दरवाजे चुण्डावत, उच्चार रह्यो थो वीर बैण |
आँख्या सूं आँख मिली छिण में , सरदार वीरता बरसाई |
सेवक ने भेज रावले में, अन्तिम सैनाणी मंगवाई |
सेवक पहुँच्यो अन्तःपुर में, राणी सूं मांगी सैनाणी |
राणी सहमी फ़िर गरज उठी, बोली कह दे मरगी राणी |

फ़िर कह्यो, ठहर ! लै सैनाणी, कह झपट खडग खिंच्यो भारी |
सिर काट्यो हाथ में उछल पड्यो, सेवक ले भाग्यो सैनाणी |
सरदार उछ्ल्यो घोड़ी पर, बोल्यो, " ल्या-ल्या-ल्या सैनाणी |
फ़िर देख्यो कटयो सीस हंसतो, बोल्यो, राणी ! राणी ! मेरी राणी !

तूं भली सैनाणी दी है राणी ! है धन्य- धन्य तू छत्राणी |
हूं भूल चुक्यो हो रण पथ ने, तू भलो पाठ दीन्यो राणी |
कह ऐड लगायी घोड़ी कै, रण बीच भयंकर हुयो नाद |
के हरी करी गर्जन भारी, अरि-गण रै ऊपर पड़ी गाज |

फ़िर कटयो सीस गळ में धारयो, बेणी री दो लाट बाँट बळी |
उन्मत बण्यो फ़िर करद धार, असपत फौज नै खूब दळी |
सरदार विजय पाई रण में , सारी जगती बोली, जय हो |
रण-देवी हाड़ी राणी री, माँ भारत री जय हो ! जय हो !
हाड़ी रानी पर अंग्रेजी में जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Feb 11, 2009

क्या आप धीमी डाउनलोड गति से परेशान है ?


भारत में ज्यादातर लोगों के पास धीमी गति का इन्टरनेट कनेक्शन ही है जिससे वेब ब्राउजिंग में तो खास दिक्कत नही आती लेकिन जब कुछ डाउनलोड करना हो तो कछुआ चाल इन्टरनेट से बड़ी झल्लाहट होती है जब भी कोई बड़ी फाइल डाउनलोड करनी हो बहुत देर लगती है और जो थोडी बहुत डाउनलोड होती है वह भी कई बार बिजली विभाग की मेहरबानी से बेकार जाती है |यदि लंबा बिजली कट लग गया तो जितना डाउनलोड हुआ है उसे दुबारा करना पड़ता है | अतः इस समस्या से निजात पाने का एक ही हल है वो है डाउनलोड मेनेजर सोफ्टवेयर अपने कंप्युटर में इंस्टाल कर लेना | इससे आप एक बार किसी फाइल की डाउनलोड शुरू कर देते है तो ये डाउनलोड मेनेजर अपने आप सक्रीय होकर डाउनलोड शुरू कर देता है और बीच में कंप्युटर बंद हो जाए उस स्थिति में ये जितनी साइज़ डाउनलोड की है वह सेव कर लेता है दुबारा जब भी कंप्युटर ऑन करते है इस डाउनलोड मेनेजर को खोल कर डाउनलोड चालू करदे ये उसके बाद की डाउनलोड शुरू कर देगा और इस तरह यह सोफ्टवेयर कितनी भी बड़ी फाइल हो उसे किस्तों में डाउनलोड कर लेता है मेरे पास एयर टेल का ६४ के बी पी एस स्पीड का ब्रॉडबैंड कनेक्शन है जिसमे डाउनलोड करने के लिए ८ से १० के बी पी एस की स्पीड मिलती है लेकिन मुझे ७०० एम् बी फाइल भी डाउनलोड करनी पड़े तो कोई टेंशन नही | मेरा गिगागेट डाउनलोड मेनेजर अपने आप किस्तों में सही डाउनलोड कर ही लेता है | जालतंत्र पर ढेर सारे डाउनलोड मेनेजर फ्री में उपलब्ध है बस डाउनलोड कीजिय और इंस्टाल कर धीमी डाउनलोड स्पीड की चिंता से मुक्ति प् लीजिये |
१- गिगागेट डाउनलोड मेनेजर डाउनलोड करने के लिए यहाँ चटका लगाये |
२- अन्य डाउनलोड मेनेजर आप यहाँ से भी डाउनलोड कर सकते है |

हिन्दी ब्लोग्स का बेहतर भविष्य -?

कल हिन्दी ब्लोग्स टिप्स पर " हिन्दी ब्लोगिंग आपको क्या देती है " व्यंग्य पोस्ट पढ़ी | आशीष जी ने ब्लॉग लिखने की १० मजेदार वजह भी बताई हालाँकि दशों वजहें बड़ी मजेदार लगी लेकिन आखिरी वजह " बेहतर भविष्य" में आशीष जी ने लिखा .
मेरे जैसे ब्लोगर इसमे अपना बेहतर भविष्य देखते है ..सोचते है क्या पता भविष्य में ऊंट किस करवट बैठे ..शायद हिन्दी ब्लोग्स पर भी एडसेंस मेहरबान हो जाए और कमाई होने लगे ..या पता नही कोई सुंदर सी कन्या इस ब्लॉग को पढ़ बैठे और वेलेंटाईन डे पर मुझे प्रपोज कर दे |

ये बेहतर भविष्य वाली वजह पढ़कर मुझे एक सर्कस वाले गधे का किस्सा याद आ गया | इस किस्से के अनुसार ..
एक धोबी के पास दो गधे थे एक दिन उस शहर में भयंकर तूफान आया और इस तूफान में दोनों में से एक गधा बिछुड़ गया | उस बिछुडे गधे को आवारा घूमते देख एक सर्कस वाले लोग पकड़ कर ले गए | सर्कस का सामान ढुलवाने के अलावा सर्कस वालों ने उसे कुछ करतब भी सिखा दिए जो उसे हर शो में दिखाने होते थे इतनी कड़ी मेहनत के बाद बेचारे को थोडी सी घास खाने को मिलती थी जिससे वह बहुत कमजोर व दुबला हो गया | संयोग से एक दिन सर्कस उसी शहर में वापस पहुँच गया |
और सामान आदि ढोने के बाद सर्कस वालों ने उस गधे को घास चरने के लिए उस दिन खुला छोड़ दिया | इस दरमियान अचानक उसकी अपने पुराने साथी धोबी के गधे से मुलाकात हो गई और दोनों ने एक दुसरे को पहचान भी लिया | आपसी खुशल-क्षेम पूछने के बाद खुले घूम कर घास खा-खा मोटे ताजे हुए धोबी के गधे ने सर्कस के दुबले पतले गधे से पूछा -
धोबी का गधा--- अरे यार तुम तो सर्कस में काम करते हो इतने करतब भी सीख गए हो फ़िर इतने दुबले पतले व कमजोर कैसे हो गए |
सर्कस का गधा -- क्या करूँ यार ! दिन भर कभी करतब दिखाओ,कभी करतब दिखाने की प्रेक्टिस करो और जब शो नही हो तब सर्कस का सारा सामान भी ढोना होता है और इतनी कड़ी मेहनत के बाद खाने में थोडी सी खास मिलती है वो भी सूखी |
बड़ा परेशान हूँ यार ...
धोबी का गधा --- अरे यार ! इतने परेशान हो तो सर्कस से भाग क्यों नही जाते ,अभी तो तुम्हे खुला भी छोड़ रखा है भाग लो
सर्कस का गधा -- यार सर्कस में मेहनत तो बहुत है खाने को भी कम ही मिलता है लेकिन मेरे यार सर्कस में मेरा फ्यूचर बहुत ब्राईट है |
धोबी का गधा -- अरे वो कैसे ?
सर्कस का गधा-- अरे यार तुमने सर्कस के शो में उस खूबसूरत लड़की को तो देखा ही होगा जो रस्से पर चलती है ?
धोबी का गधा -- हाँ देखा है लेकिन तेरे बेहतर भविष्य का उस लड़की से क्या देना ?
सर्कस का गधा -- यही तो बात है यार ! शो करने से पहले हर बार उस सुंदर लड़की का बाप उस लड़की को धमकाता है कि शो में रस्सी पर अच्छी तरह चलना जिस दिन रस्सी से गिर गई उस दिन तेरी शादी इस गधे से कर दूंगा | मै तो दोस्त उस लड़की के गिरने के इंतजार में सर्कस में बैठा हूँ कभी तो गिरेगी ही ! इसलिए कह रहा हूँ कि भविष्य बहुत सुनहरा है |
इसलिय भाईयों हम भी आशीष जी की बताई नो वजहों के अलावा दशवीं वजह की वजह से ही उम्मीद में बैठे है कभी तो गूगल बाबा हिन्दी ब्लोग्स पर मेहरवान होगा ही | और जिस दिन गूगल बाबा के विज्ञापन हिन्दी ब्लोग्स पर आने शुरू हो जायेंगे उस दिन कमाई भी होगी ही | तब तक आशीष जी द्वारा और हाँ मेरी हिन्दी वेब साईट पर गूगल के विज्ञापन खूब आते है तो उम्मीद है जल्द ही हिन्दी ब्लोग्स पर भी गूगल विज्ञापन जरुर दिखेंगे |बताई नो वजहों का ध्यान रखते हुए ब्लोगरी कर ही रहे है |

Feb 10, 2009

कवि कृपाराम जी और " राजिया के दोहे"

नीति सम्बन्धी राजस्थानी सौरठों में "राजिया रा सौरठा" सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है भाषा और भाव दोनों द्रष्टि से इनके समक्ष अन्य कोई दोहा संग्रह नही ठहरता | संबोधन काव्य के रूप में शायद यह पहली रचना है | इन सौरठों की रचना राजस्थान के प्रसिद्ध कवि कृपाराम जी ने अपने सेवक राजिया को संबोधित करते हुए की थी | कवि कृपाराम जी तत्कालीन मारवाड़ राज्य के खराडी गांव के निवासी खिडिया शाखा के चारण जाति के जगराम जी के पुत्र थे | जगराम जी को कुचामण के शासक ठाकुर जालिम सिंह जी ने जसुरी गांव की जागीर प्रदान की थी वही इस विद्वान कवि का जन्म हुआ था | राजस्थानी भाषा डिंगल और पिंगल के उतम कवि व अच्छे संस्कृज्ञ होने नाते उनकी विद्वता और गुणों से प्रभावित हो सीकर के राव राजा लक्ष्मण सिंह जी ने महाराजपुर और लछमनपुरा गांव इन्हे वि.स, 1847 और 1858 में जागीर में दिए थे | अपने पुत्र विहीन राजिया को अमर करने के लिए ही विद्वान कवि ने उसे संबोधित करते हुए नीति सम्बन्धी दोहो की रचना की जिनकी संख्या लगभग १४० थी और अब भी १२३ दोहे उपलब्ध है जो राजिया के दोहे या राजिया रे सौरठे नाम से प्रसिद्ध है |
यहाँ उनके लिखे कुछ दोहे प्रस्तुत है ...

उद्दम करो अनेक, अथवा अनउद्दम करौ |
होसी निहचै हेक , रांम करै सो राजिया ||

( मनुष्य चाहे कितना ही उधम करे अथवा न करे , किंतु हे राजिया ! निश्चय ही होता वही है जो ईश्वर करता है |

पढ़बो वेद पुराण , सोरौ इण संसार में |
बांता तणौ बिनाँण, रहस दुहेलौ राजिया ||

इस संसार में वेद-पुराण आदि शास्त्रों को तो पढ़ना आसान है किंतु हे राजिया ! बात करने की विशिष्ट विद्या का रहस्य सीखना-समझना बहुत कठिन है |

आछा जुद्ध अणपार, धार खगां सन्मुख धसै |
भोगै हुए भरतार , रसा जीके नर राजिया ||

जो लोग अनेक बड़े युद्धों में तलवारों की धारों के सम्मुख निर्भिख होकर बढ़ते है,वे ही वीर भरतार बनकर इस भूमि को भोगते है |

हीमत कीमत होय,विन हिमत कीमत नही |
करे न आदर कोय,रद कागद ज्यूं राजिया||

हिम्मत से ही मनुष्य का मुल्यान्कन होता है ,अत: पुरुषार्थहीन पुरुष का कोइ महत्व नही | हे राजिया ! साहस से रहित व्यक्ति रद्दी कागज की भांति होता है,जिसका कोई आदर नही करता |

साचो मित्र सचेत , कह्यो काम न करै किसौ |
हर अरजन रै हेत, रथ कर हाक्यों राजिया ||

जो सच्चा मित्र होता है,वह अपने मित्र के हितार्थ तत्परता से कौन सा कार्य नही करता ? श्री कृष्ण ने तो अपने मित्र अर्जुन के लिए रथ अपने हाथो से हांका था |

अवनी रोग अनेक,ज्यांरो विधि किधौ जतन |
इण परकत री एक,रची न ओखद राजिया ||

प्रथ्वी पर अनेक रोग है जिनके विधाता ने इलाज बनाये है | लेकिन हे राजिया ! इस प्रकृति ( स्वभाव ) का के इलाज की एक भी दवा नही रची |
हर कोई जोड़े हाथ,कामण सूं अनमी किसा |
नम्या त्रिलोकी नाथ,राधा आगळ राजीया ||

सभी लोग उसे हाथ जोड़ते है अतः स्त्री के आगे न झुकने वाला व्यक्ति भला कोन हो सकता है ? हे राजिया ! जब तीनो लोकों के स्वामी श्री कृष्ण भी राधा जी के आगे झुकते थे, तो साधारण मनुष्य की तो बात ही क्या है ?

Feb 9, 2009

एक कवि ने अपने नौकर को अमर किया

अमरता शरीर से नही अच्छे कर्म से प्राप्त होती है आज कितने ही देश भक्त वीरों का नाम मातृभूमि के लिए बलिदान करने से अमर है कितने ही शासक, जननायक,वैज्ञानिक,साधू महात्मा और अच्छे इन्सान अपने अच्छे कार्यों के लिए जाने जाते है वे मर कर भी अमर है, लेकिन अमरता प्राप्त करने लिए जरुरी नही कि कोई बहुत बड़ा कार्य ही किया जाए यदि कोई छोटा आदमी भी अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभा अमर हो सकता है भरोसा नही तो उदहारण आपके सामने है |
राजिया नामक एक व्यक्ति राजस्थान के मशहूर कवि कृपाराम जी सेवक था एक बार कवि के बीमार पड़ने पर सेवक राजिया ने उनकी खूब सेवा सुश्रुषा की | इस सेवा कवि बहुत प्रसन्न हुए | कहते है राजिया के कोई संतान नही होने के कारण राजिया बहुत दुखी रहता था कि मरने के बाद उसका कोई नाम लेने वाला भी नही होगा | अतः उसके इसी दुःख को दूर करने हेतु अपनी सेवा से खुश कवि ने कहा वह अपनी कविता द्वारा ही उसे अमर कर देंगे | और उसके बाद कवि ने राजिया को संबोधित कर "नीति " के सोरठे रचने शुरू कर दिए | जिनकी संख्या लगभग १४० थी अभी भी १२३ के लगभग सौरठे (दोहे) मौजूद है |
और उन सार गर्भित सौरठों के भावों, कारीगरी और कीर्ति से प्रभावित हो जोधपुर के तत्कालीन विद्वान् महाराजा मान सिंह जी ने उस राजिया को देखने हेतु आदर सहित अपने दरबार में बुलाया और उसके भाग्य की तारीफ करते हुए ख़ुद सौरठा बना भरे दरबार में सुनाया ----
सोनै री सांजांह जड़िया नग-कण सूं जिके |
किनौ कवराजांह , राजां मालम राजिया ||
अर्थात हे राजिया ! सोने के आभूषणों में रत्नों के जड़ाव की तरह ये सौरठे रच कर कविराजा ने तुझे राजाओं तक में प्रख्यात कर दिया |
कुचामन ठिकाने के जसुरी गांव में सन १८२५ के आस पास जन्मे राजिया को कवि ने अपने दोहों के माध्यम वास्तव में इतना प्रख्यात कर दिया की आज भी लोग राजिया का नाम तो जानते है पर कवि कृपाराम जी को बहुत कम लोग ही जानते है | मैंने अपनी स्कूल शिक्षा के दौरान हिन्दी की पुस्तक में राजिया के दोहे नामक शीर्षक से पाठ पढ़ा था उस समय राजिया के दोहे पढ़कर राजिया का नाम तो जानता था पर कवि कृपाराम जी के बारे में बहुत बाद में जानने लगा | आज भी राजस्थान में जन मानस की जबान पर राजिया के दोहे सुने जा सकते है |
(अगले लेख में कवि कृपाराम जी के बारे में व उनके लिखे कुछ नीति सम्बन्धी सौरठे राजिया को संबोधित करते हुए )

Feb 8, 2009

हट जा ताऊ पाछे ने

शनिवार के खूंटे पर कालेज की छोरियों से आई एम् सोरी और मेन्शन नॉट बोलने के चक्कर में ताऊ ने खूब लितर (सैंडिल)खाए लेकिन फ़िर भी ताऊ कहाँ मानने वाला था आज जालतंत्र पर विचरण करते हुए मैंने गूगल बाबा से ताऊ के बारे में पूछा तो गूगल बाबा ने ताऊ के लिए मुझे यु ट्यूब का पता दे दिया वहां जाकर देखने पर पता चला की ताऊ अपने एक और साथी ताऊ के साथ किसी डिस्को थेक में छोरों और छोरिओं के साथ नाचने के लिए मचल रहा था और बेचारे छोरे से ताऊ से मिन्नते कर रहे थे कि " हट जा ताऊ पीछे ने ...नाचण दे जी भरके ने ..

और अब आप ही देख लीजिये कि ताऊ छोरे छोरियों संग कैसे मटक रहा है |



इस अल्बम के अन्य गाने MP3फॉर्मेट में डाउनलोड करने व सुनने के लिए यहाँ चटका लगाये

Feb 6, 2009

कुछ स्क्रब पाकिस्तान से ..

ऑरकुट पर मुझे एक पाकिस्तानी दोस्त कँवलजीत सिंह सोढा से भी अक्सर स्क्रब मिलती रहती है | कंवलजीत सिंह सोढा पाकिस्तान के अमरकोट के रहने वाले है और मेरा उनसे परिचय ऑरकुट पर ही हुआ है प्रस्तुत है उनके द्वारा भेजी गई कुछ स्क्रब ..

मैने खुदा से पू खूबसूरतीछा कि क्या है?
तो वो बोले ::::
खूबसूरत है वो लब जिन पर दूसरों के लिए एक दुआ है
खूबसूरत है वो मुस्कान जो दूसरों की खुशी देख कर खिल जाए
खूबसूरत है वो दिल जो किसी के दुख मे शामिल हो जाए और किसी के प्यार के रंग मे रंग जाए
खूबसूरत है वो जज़बात जो दूसरो की भावनाओं को समझे
खूबसूरत है वो एहसास जिस मे प्यार की मिठास हो
खूबसूरत है वो बातें जिनमे शामिल हों दोस्ती और प्यार की किस्से कहानियाँ
खूबसूरत है वो आँखे जिनमे कितने खूबसूरत ख्वाब समा जाएँ
खूबसूरत है वो आसूँ जो किसी के ग़म मे बह जाएँ
खूबसूरत है वो हाथ जो किसी के लिए मुश्किल के वक्त सहारा बन जाए
खूबसूरत है वो कदम जो अमन और शान्ति का रास्ता तय कर जाएँ
खूबसूरत है वो सोच जिस मे पूरी दुनिया की भलाई का ख्याल

D se dosti,
D se dushmani,
D se dil,
D se dard,
D se dillagi,
D se deewangi,
But...........
D se itna bhi door na ho jana ke
H se Hamara saath hi chhut jaye.

Sawaal paani ka nahin, pyaas ka hai.
Sawaal maut ka nahin, saans ka hai.
Dost to duniya mein bahut hai magar,
Sawaal dosti ka nahin VISHWAS

और उन्ही के द्वारा भेजी गई दूसरी स्क्रब

एक बार एक लड़का था ! जो एक लड़की को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता था ! उसके परिवार वालो ने भी उसका कभी साथ नहीं दिया ,फिर भी वो उस लड़की को प्यार करता रहा लेकिन लड़की कुछ देख नहीं सकती थी मतलब अंधी थी ! लड़की हमेशा लड़के से कहती रहती थी की तुम मुझे इतना प्यार क्यूँ करते हो !में तुम्हारे किसी काम नहीं आ सकती में तुम्हे वो प्यार नहीं दे सकती जो कोई और देगा लेकिन वो लड़का उसे हमेशा दिलाषा देता रहता की तुम ठीक हो जोगी तुम्ही मेरा पहला प्यार हो और रहोगी फिर कुछ साल ये सिलसिला चलता रहता है लड़का अपने पैसे से लड़की का ऑपरेशन करवाता है लड़की ऑपरेशन के बाद अब सब कुछ देख सब
सकती थी लेकिन उससे पता चलता है की लड़का भी अँधा था तब लड़की कहती है की में तुमसे प्यार नहीं कर सकती तुम तोह अंधे हो.में किसी अंधे आदमी को अपना जीवन साथी चुन सकती तुम्हारे साथ मेरा कोई future नहीं है ..तब लड़का मुस्कुराता है औरजाने लगता है और उसके आखिरी बोल होते है take care of my eyes.
this is a real love
pass this 2 all of your friends if u believe in love& love sum1

क्या पता कल हो ना हो

ऑरकुट पर भी इंटरनेट दोस्तों से तरह-तरह के और बड़े मजेदार स्क्रब मिलते रहते है इसी कड़ी में बाड़मेर से थान सिंह राठौड़ ने यह कविता स्क्रब की जो यहाँ प्रस्तुत है |

आज एक बार सबसे मुस्करा के बात करो
बिताये हुये पलों को साथ साथ याद करो
क्या पता कल चेहरे को मुस्कुराना
और दिमाग को पुराने पल याद हो ना हो

आज एक बार फ़िर पुरानी बातो मे खो जाओ
आज एक बार फ़िर पुरानी यादो मे डूब जाओ
क्या पता कल ये बाते
और ये यादें हो ना हो

आज एक बार मन्दिर हो आओ
पुजा कर के प्रसाद भी चढाओ
क्या पता कल के कलयुग मे
भगवान पर लोगों की श्रद्धा हो ना हो

बारीश मे आज खुब भीगो
झुम झुम के बचपन की तरह नाचो
क्या पता बीते हुये बचपन की तरह
कल ये बारीश भी हो ना हो

आज हर काम खूब दिल लगा कर करो
उसे तय समय से पहले पुरा करो
क्या पता आज की तरह
कल बाजुओं मे ताकत हो ना हो

आज एक बार चैन की नीन्द सो जाओ
आज कोई अच्छा सा सपना भी देखो
क्या पता कल जिन्दगी मे चैन
और आखों मे कोई सपना हो ना हो

क्या पता
कल हो ना हो
............................................................................................................
एक और इन्टरनेट मित्र ने सीकर से यह कविता स्क्रब की

अरे हमें तो अपनों ने लूटा,
गैरों में कहाँ दम था.
मेरी हड्डी वहाँ टूटी,
जहाँ हॉस्पिटल बन्द था.

मुझे जिस एम्बुलेन्स में डाला,
उसका पेट्रोल ख़त्म था.
मुझे रिक्शे में इसलिए बैठाया,
क्योंकि उसका किराया कम था.

मुझे डॉक्टरों ने उठाया,
नर्सों में कहाँ दम था.
मुझे जिस बेड पर लेटाया,
उसके नीचे बम था.

मुझे तो बम से उड़ाया,
गोली में कहाँ दम था.
और मुझे सड़क में दफनाया,
क्योंकि कब्रिस्तान में फंक्शन था

Feb 3, 2009

सर प्रताप और जोधपुरी कोट

पिछले लेखों में चर्चा जोधपुर के खानपान के उत्पादों व जोधपुर के राजा रानियों की चल रही थी लेकिन आज एक ऐसे शख्स का जिक्र कर रहा हूँ जो जोधपुर का राजा तो नही बना लेकिन उसके समय के सभी राजा उसके ही इशारों पर नाचते रहे एक ऐसे शख्स की चर्चा कर रहा हूँ जो ख़ुद तो अनपढ़ थे लेकिन उन्होंने मारवाड़ में शिक्षा की ज्योति जगाने के लिए उल्लेखनीय कार्य किया | ये जब तक रहे जोधपुर राज्य में हुक्म व प्रतिष्ठा के मामले में राजस्थान के अन्य महाराजाओं से भी आगे रहे और अपने समय की जोधपुर राजाओं की तीन पीढियों के गार्जियन भी रहे |

जी हाँ में बात कर रहा हूँ जोधपुर राजघराने के राजकुमार सर प्रताप सिंह की | सर प्रताप जोधपुर महाराजा तख्त सिंह जी के तीसरे राजकुमार थे जिनका जन्म..... को हुआ था | इन्हे ईडर की जागीर मिली थी लेकिन ये पुरे समय जोधपुर के मुसाहिबे आला ही बने रहे | सर प्रताप ने जोधपुर राज्य के विकास हेतु कई महत्वपूर्ण कार्य किए | जोधपुर रिसाला नाम की एक मिलिट्री इन्फेंट्री गठन भी इन्होने ही किया था जिसमे एक सिपाही से लेकर अफसर तक के लिए खादी पहनना अनिवार्य था |सर प्रताप ने मारवाड़ राज्य की कानून व्यवस्था सुधारने के लिए उल्लेखनीय योगदान दिया जोधपुर में कचहरी परिसर का निर्माण भी इन्ही के मार्ग दर्शन में ही हुआ था | बाल विवाह व मृत्यु भोज जेसी सामाजिक कुरूतियों के वे सख्त खिलाफ थे, दहेज़ प्रथा का भी उन्होंने विरोध किया इसीलिए ख़ुद उन्होंने साधारण कन्याओं से विवाह किए और महाराजा उम्मेद सिंह जी का विवाह भी साधारण कन्या से करवाया | ख़ुद अनपढ़ रहते हुए भी शिक्षा के लिए मारवाड़ राज्य की ज्यादातर स्कूल उन्ही की देन है जिनमे जोधपुर की प्रसिद्ध चौपासनी स्कूल एक है | प्रथम विश्व युद्ध में अद्वितीय वीरता दिखने के बदले अंग्रेज सरकार ने इन्हे सर का खिताब दिया | ४ सितम्बर १९२२ को ७६ वर्ष की आयु में उनका निधन हो हुआ | बहु प्रतिभाओ के धनी सर प्रताप एक अच्छे प्रशासक व समाज सुधारक थे |

जोधपुरी कोट

सन् १८८७ से फैशन की दुनियां में कितनी ही फैशन आई और गई, इतने समय में परिधानों की कितनी डिजाईन आई और गई लेकिन जोधपुरी बंद गले का कोट एक ऐसा परिधान है जो आज भी लोगो के दिलो दिमाग पर छाया हुआ है | जोधपुरी कोट भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गाँधी और मनमोहन सिंह तक सभी की पसंद रहा है इतने सालों से हर वर्ग के लोगों की पसंद रहा यह परिधान भी सर प्रताप की ही देन है |

बात सन् १८८७ की है जब सर प्रताप महारानी विक्टोरिया के हीरक जयंती समारोह में भाग लेने लन्दन गए थे | जिस जहाज में उनके कपड़े थे वह जहाज लापता हो गया था | सर प्रताप ने इस परिस्थिति में भी विदेशी वस्त्र नही पहने बल्कि एक सफ़ेद कपड़े का थान ख़रीदा और अपने हाथो अपने पहनने हेतु परिधान की कटिंग की | लेकिन लन्दन के दर्जियों ने उनके बताये अनुसार सिलने में असमर्थता जाहिर की | बहुत खोजबीन के बाद एक दर्जी इसे सिलने हेतु सहमत हुआ |

और उसने सर प्रताप द्वारा कटिंग किए वह परिधान सिले जो जोधपुरी कोट व बिरजस थे | सर प्रताप के इस जोधपुरी कोट और दुसरे परिधान बिरजस को लोगों ने इतना पसंद किया कि फैशन की दुनियां में तहलका मच गया और वो दर्जी जोधपुरी कोट सिलते-सिलते मालामाल हो गया | सन् १८८७ से लेकर आज तक इस जोधपुरी कोट ने फैशन की दुनियां में अपना स्थान बना रखा है और हर वर्ग के लोगों की पसंद बना हुआ है |

Feb 1, 2009

बीच युद्ध से लौटे राजा को रानी की फटकार


बात जोधपुर की चल रही है तो यहाँ के अनेक राजाओं में एक और यशस्वी राजा जसवंत सिंह जी और उनकी हाड़ी रानी जसवंत दे की भी चर्चा करली जाए | महाराज जसवन्त सिंह जी ने दिल्ली की और से बादशाह शाहजहाँ और औरंगजेब की और से कई सफल सैनिक अभियानों का नेतृत्व किया था तथा जब तक वे जीवित रहे तब तक औरंगजेब को कभी हिन्दू धर्म विरोधी कार्य नही करने दिया चाहे वह मन्दिर तोड़ना हो या हिन्दुओं पर जजिया कर लगना हो , जसवंत सिंह जी के जीते जी औरंगजेब इन कार्यों में कभी सफल नही हो सका | २८ नवम्बर १६७८ को काबुल में जसवंत सिंह के निधन का समाचार जब औरंगजेब ने सुना तब उसने कहा " आज धर्म विरोध का द्वार टूट गया है " |

ये वही जसवंत सिंह थे जिन्होंने एक वीर व निडर बालक द्वारा जोधपुर सेना के ऊँटों की व उन्हें चराने वालों की गर्दन काटने पर सजा के बदले उस वीर बालक की स्पष्टवादिता,वीरता और निडरता देख उसे सम्मान के साथ अपना अंगरक्षक बनाया और बाद में अपना सेनापति भी | यह वीर बालक कोई और नही इतिहास में वीरता के साथ स्वामिभक्ति के रूप में प्रसिद्ध वीर शिरोमणि दुर्गादास राठौड़ था |

महाराज जसवंत सिंह जिस तरह से वीर पुरूष थे ठीक उसी तरह उनकी हाड़ी रानी जो बूंदी के शासक शत्रुशाल हाड़ा की पुत्री थी भी अपनी आन-बाण की पक्की थी | १६५७ ई. में शाहजहाँ के बीमार पड़ने पर उसके पुत्रों ने दिल्ली की बादशाहत के लिए विद्रोह कर दिया अतः उनमे एक पुत्र औरंगजेब का विद्रोह दबाने हेतु शाजहाँ ने जसवंत सिंह को मुग़ल सेनापति कासिम खां सहित भेजा | उज्जेन से १५ मील दूर धनपत के मैदान में भयंकर युद्ध हुआ लेकिन धूर्त और कूटनीति में माहिर औरंगजेब की कूटनीति के चलते मुग़ल सेना के सेनापति कासिम खां सहित १५ अन्य मुग़ल अमीर भी औरंगजेब से मिल गए | अतः राजपूत सरदारों ने शाही सेना के मुस्लिम अफसरों के औरंगजेब से मिलने व मराठा सैनिको के भी भाग जाने के मध्य नजर युद्ध की भयंकरता व परिस्थितियों को देखकर ज्यादा घायल हो चुके महाराज जसवंत सिंह जी को न चाहते हुए भी जबरजस्ती घोडे पर बिठा ६०० राजपूत सैनिकों के साथ जोधपुर रवाना कर दिया और उनके स्थान पर रतलाम नरेश रतन सिंह को अपना नायक नियुक्त कर औरंगजेब के साथ युद्ध कर सभी ने वीर गति प्राप्त की |इस युद्ध में औरग्जेब की विजय हुयी |

महाराजा जसवंत सिंह जी के जोधपुर पहुँचने की ख़बर जब किलेदारों ने महारानी जसवंत दे को दे महाराज के स्वागत की तैयारियों का अनुरोध किया लेकिन महारानी ने किलेदारों को किले के दरवाजे बंद करने के आदेश दे जसवंत सिंह को कहला भेजा कि युद्ध से हारकर जीवित आए राजा के लिए किले में कोई जगह नही होती साथ अपनी सास राजमाता से कहा कि आपके पुत्र ने यदि युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त किया होता तो मुझे गर्व होता और में अपने आप को धन्य समझती | लेकिन आपके पुत्र ने तो पुरे राठौड़ वंश के साथ-साथ मेरे हाड़ा वंश को भी कलंकित कर दिया | आख़िर महाराजा द्वारा रानी को विश्वास दिलाने के बाद कि मै युद्ध से कायर की तरह भाग कर नही आया बल्कि मै तो सेन्य-संसाधन जुटाने आया हूँ तब रानी ने किले के दरवाजे खुलवाये | लेकिन तब भी रानी ने महाराजा को चाँदी के बर्तनों की बजाय लकड़ी के बर्तनों में खाना परोसा और महाराजा द्वारा कारण पूछने पर बताया कि कही बर्तनों के टकराने की आवाज को आप तलवारों की खनखनाहट समझ डर न जाए इसलिए आपको लकड़ी के बर्तनों में खाना परोसा गया है | रानी के आन-बान युक्त व्यंग्य बाण रूपी शब्द सुनकर महाराज को अपनी रानी पर बड़ा गर्व हुआ |


ज्ञात रहे इसी हाड़ी रानी की भतीजी जो सलुम्बर के रावत चुण्डावत की रानी थी ने युद्ध में जाते अपने पति द्वारा निशानी मांगने पर अपना सिर काट कर निशानी के तौर पर भेज दिया था | इस रानी के कृतित्व पर विस्तार से चर्चा फ़िर कभी

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