खाटू का युद्ध : शेखावतों और मुगलों के मध्य बाबा श्याम की नगरी में लड़ा गया युद्ध

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 खाटू का युद्ध (वि. 1837 ई. 1780)

महाराजा जयपुर ने समझौते के अनुसार दिल्ली बादशाह को खिराज अदा नहीं की तो हिम्मतबहादुर को जयपुर भेजा पर हिम्मत बहादुर भी एक वर्ष जयपुर में पड़ा रहा पर वह राजा से खिराज वसूल न कर सका तब नजब खां वि० 1836 में कानूड़ विजय के बाद जयपुर पर आक्रमण करना चाहता था। नजब खां इस समय बादशाह का वकील ए मुतालक था। उसने जयपुर को दो ओर से घेरने की योजना बनाई। उसने महबूब अली नाम के एक कुशल सेनानायक को जो अवध के नवाब से रूठ कर मक्का जा रहा था, इस शर्त परा रख लिया कि वह अपने सैनिकों का वेतन खिराज वसूल कर चुकायेगा। उसने यह शर्त स्वीकार कर ली और एक बड़ी सेना तैयार कर ली तब उसे आगरा होकर जयपुर पर दक्षिण की ओर से आक्रमण करने की आज्ञा दी।

दूसरी ओर नजब खां ने मुर्ताज खां भडेच को भी महबूब अली की तरह तैयार किया और उसे आदेश दिया कि वह शेखावाटी होकर उत्तर की ओर से जयपुर पर आक्रमण करे। वह नजबखां की आज्ञा पर महबूब अली आगरा से जयपुर की ओर बढा । दौलतराम हल्दिया जिसको जयपुर के दीवान के पद से हटा दिया गया था, महबूब अली को जयपुर का मार्ग बताता रहा। वह 20 अक्टू. 1780 (वि. 1836) को जयपुर के द्वार पर पहुंच गया। वह जयपुर से जबरदस्ती खिराज वसूल करना चाहता था, पर राजा दुर्ग के अन्दर डटा रहा और उसका मनोरथ पूर्ण नहीं हुआ। इसी बीच जयपुर के दीवान खुशाली राम बोहरा ने अपनी कूटनीति से नजबखां के साथ खिराज चुकाने का समझौता कर लिया। अतः महबूब को लौट जाना पड़ा और जब उसके सैनिकों को वेतन नहीं मिला तो वे तितर बितर हो गये।

महबूब अली की तरह ही मुर्ताज खां नजब खां की आज्ञा से पचास हजार सेना के साथ आगे बढा तथा शेखावाटी के प्रदेश में उसने प्रवेश किया। यहां उसे उन शेखावतों से सामना करना पड़ा जो जयपुर के राजपूतों में सबसे अधिक वीर माने जाते थे।" नारनोल से आगे बढने पर संभवतः नीम का थाना के पास शेखावतों ने उसके मार्ग को रोका। छः घण्टे युद्ध हुआ। दोनों पक्षों की बहुत हानि हुई। दोनों पक्षों के करीब दो हजार आदमी मारे गये। अन्त में इस लड़ाई में शेखावत हार गये। मुर्ताज खां अब आगे बढा। 20 जुलाई 1780 वि. 1837 को आगे बढकर उसने उदयपुर और उसके आस पास के क्षेत्र को लूटा। उसके बाद थोई, श्रीमाधोपुर फिर रींगस को लूटा। उसके बाद वह जयपुर पर आक्रमण करने आगे बढा और खाटू पहुंचा। इससे पूर्व उसने सीकर के देवीसिंह के पास समाचार भेजा था कि वह खिराज अदा करे पर देवीसिंह ने उत्तर दिया कि वह राजा जयपुर को खिराज अदा करता है अतः उसे खिराज नहीं देगा।

शेखावतों ने सीकर शासक देवीसिंह के नेतृत्व में खाटू के मैदान में मुर्ताज खां की सेना को फिर रोका, जयपुर की सेना भी मदद पर वहां पहुंच गई। खाटू के मैदान में युद्ध ठन गया। देवीसिंह के साथ बिसाऊ के सूरजमल, दांता के अमानीसिंह, खूड़ के बख्तसिंह, खाचरयास के दुल्हेसिंह अपनी अपनी सेना लेकर खाटू के मैदान में आ डटे। जयपुर की तरफ से दलेलसिंह खंगारोत, चूहड़सिंह नाथावत अपनी सेना के साथ आ डटे तथा मंगल महन्त अपनी नागा जमात के साथ आकर रणभूमि में पग रोप दिये। सावण सुदि 15 वि० 1837 के दिन शेखावतों और मुर्ताज खां भड़ेच के मध्य लड़ाई का बिगुल बजा । योद्धाओं की तलवारें चली। 

वीर देवीसिंह ने शाही सेना पर कहर ढाया। बख्तसिंह खूड व उनके पुत्र मोतीसिंह इस युद्ध में लड़े। मोती सिंह काम आये। दूजोद के सल्हेदी सिंह लड़ाई के मैदान में डटे रहे। अन्त में वे भी काम आये। नाहरसिंह का पुत्र हणुवन्त सिंह बलारा भी काम अया। मिश्री खां कायमखानी भी शत्रु से लड़ता हुआ रणभूमि में सो गया। बाघ सिंह टकनेत तिहावली की वासे शत्रु मुग्ध हुआ। पालड़ी ठिकाने कां ठाकुर उम्मेदसिंह शत्रु से जूझा। देवकरण व सूजा नामक धाभाई तथा दो कायस्त र्जन उम्मेद इस युद्ध में काम आये। बेरी के चांदापो व चौहाणों ने भी इस लड़ाई में तलवारें बजाई। सोलानरसाल के तीन मेलकों ने शत्रु से जूझते हुए वीरगति प्राप्त की| राज के दो दरोगा, एक राणा व एक पुरोहित ने भी प्राणों की आहुति दी| चोखा के बास के चारण क्या कम थे | हिन्दुदान और महादान दोनों चारण मैदान में सो गये। हुक्म सिंह शेखावत और दुर्जन सिंह झिलमिल (राव जी का) ने भी कसर नहीं छोड़ी| दोनों वीरों ने मुर्ताज खां को रण में हाथ दिखाए। महन्त मंगलदास अपने दो हजार नागाओं के साथ शत्रु को रण पाठ पढाता हुआ युद्ध भूमि में काम आया। हिन्दूसिंह गजसिंहोत, स्वरूप जी बडुवा व हमीरा नाई ने भी युद्ध भूमि में प्राणों की आहुति देकर मातृभूमि का कर्ज चुकाया। काशी के बास के काशीराम चारण, उम्मेदसिंह सागल्यां के पुत्र चैनसिंह, सल्हेदीसिंह फतहसिंहोत जाहोता आदि कितने ही वीर रणभूमि में सो गये। जालिमसिंह चांदपोता ने भी इसमें वीरता दिखाई। चिमन रचित देवगुण प्रकाश के अनुसार इनके अतिरिक्त उम्मेदसिंह सुजास, दुल्हेसिंह खाचर्यास, धीरसिंह डाबड़ी, पूर्णमल कासली, पदमसिंह बठोठ, सल्हेदीसिंह मेड़तिया, गुलाबसिंह गोपालजी का, दुल्हेसिंह, प्रभुदानसिंह जाहोता, चिमनसिंह, जैतसिंहोत, दुल्हेसिंह (बख्तसिंह का पौत्र) जालिमसिंह गोपालजी का, अजीतसिंह पहाड़सिंहोत, साहिबसिंह नवलसिंहोत, सांवतसिंह नाथावत, माधोसिंह, महोबतसिंह नरूका, किशनसिंह, संगतसिंह, और दुल्हेसिंह, हमीरदे का मलो, अणेद, सादूल, पदम, दुर्जनशाल, मालसिंह, कीर्तसिंह, उदयसिंह, सरदारसिंह, हरिसिंह, प्रेमसिंह, और भौमसिंह। सालिमसिंह, अचलसिंह, पूर्णमल, सूरसिंह, बैरीशाल खंगारोत, ज्ञानसिंह, सवाई सिंह, भीमसिंह, सूरसिंह, दुर्जनशाल, उदयसिंह मिल्कपुरिया, भीमसिंह हरिरामजी का, सूरसिंह, दुर्जनसिंह, उदयसिंह गौड़, भोपतसिंह, लखधीरसिंह अखैसिंहोत, अमरसिंह राठौड़, दलेलसिंह ज्ञानसिंहोत, अभयसिंह मोहनसिंहोत शिवदास अचलदास जी का ने भी इस युद्ध में मातृभूमि की रक्षार्थ तलवारें चलाई। (सौभाग्यसिंह के सौजन्य से)

जयपुर एण्ड लेटर मुगल्स के अनुसार मुर्ताज खां की सेना के बाईस हजार सैनिक इस युद्ध में काम आये" और अन्त में निस्सहाय अवस्था में भड़ेच को खाटू का मैदान छोड़ कर भागना पड़ा। 22 शेखावतों ने इस समय ढाल बनकर जयपुर की रक्षा की। यह युद्ध शेखावाटी के युद्धों में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

स्रोत : शेखावाटी प्रदेश का राजनैतिक इतिहास : लेखक - रघुनाथसिंह काली पहाड़ी 


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