11/29/2009 07:16:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
रामसिंह अपनी कालेज की पढाई पूरी करने के बाद दिल्ली आ गया | उसके गांव में ज्यादातर बुजुर्ग भारतीय सेना के रिटायर्ड थे और गांव के ज्यातर युवा भी फ़ौज में थे जिनसे राम सिंह को हमेशा ईमानदारी पूर्वक कार्य करने की शिक्षा व प्रेरणा ही मिली थी | पारिवारिक संस्कारों में भी ईमानदारी महत्वपूर्ण थी |
दिल्ली आकर रामसिंह एक प्राइवेट कंपनी में कार्य करने लगा जहाँ रामसिंह को कंपनी के लिए कई तरह के कच्चे माल खरीदने का कार्य सौपा गया जिसे रामसिंह ने पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ वर्षों तक किया | कंपनी के उत्पादन के लिए किसी भी तरह का कच्चा माल खरीदने में रामसिंह हमेशा इमानदार रहा | कभी किसी कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता ने रामसिंह को लालच देने की कोशिश भी की तो रामसिंह ने उसे झिडक्ने के साथ आगे के लिए उससे कच्चा माल लेना ही बंद कर दिया | ऐसे ही ईमानदारी व निष्ठा पूर्वक रामसिंह अपना कर्तव्य सालों निभाता रहा लेकिन फिर भी कंपनी के मालिको की नजर में उसकी कोई अहमियत नहीं थे अत: उसकी कभी तरक्की भी नहीं हुई
| जबकि जो लोग बेईमान थे वे अक्सर उस कंपनी में तरक्की पाते रहे फिर भी रामसिंह कभी इस बात से भी विचलित नहीं हुआ |
एक दिन रामसिंह को अचानक किसी आपात कार्य की वजह से एक आपूर्तिकर्ता के दफ्तर जाना पड़ा ,अक्सर उस कम्पनी का प्रतिनिधि ही रामसिंह के पास आता रहता था इसलिए रामसिंह उसके यहाँ कभी कभार ही जाते थे | उस दिन वह प्रतिनिधि छुट्टी गया हुआ था इसलिए रामसिंह उस आपूतिकर्ता के दफ्तर खुद ही चले गए | कार्य सम्बन्धी चर्चा करने के बाद जब रामसिंह जाने के लिए उठे तभी उस आपूर्तिकर्ता ने रामसिंह को एक लिफाफा पकड़ाते हुए क्षमा याचना की कि इस बार उसके प्रतिनिधि के छुट्टी पर चले जाने के कारण यह हर बार की तरह यह लिफाफा आपको भेज नहीं सका |
"हर बार नहीं भेज सका " सुनते ही रामसिंह ने चोंक कर आपूर्तिकर्ता से पूछा - क्या आप ऐसे कमीशन के लिफाफे हर महीने भेजते हो ? और ये कब से भेजते हो ?
इस पर आपूर्तिकर्ता ने बताया - सर ! जब से आपने हमें आर्डर देना शुरू किया है तभी से मै तो आपका जितना कमीशन बनता है वह हर महीने अपने प्रतिनिधि के साथ भेज रहा हूँ | क्या आपको कभी नहीं मिला क्या ?
रामसिंह - नहीं तो !
अब रामसिंह को समझते देर नहीं लगी कि मेरे नाम से इसका प्रतिनिधि वर्षों से हर माह इससे कमीशन की राशी लाकर खुद अपने ही पास रखता रहा | मै कितना भी ईमानदार रहूँ इसकी नजर में तो मै बेईमान ही हूँ | रामसिंह चुपचाप वह लिफाफा ले रवाना हो गया और रास्ते भर सोचता रहा पता नहीं इसकी तरह ही कितने आपूर्तिकर्ताओं की जेब से मेरे नाम से कमीशन का पैसा निकाल कर उनके प्रतिनिधि ही बीच में ही खा जाते है | इससे बढ़िया तो मै ही इस पैसे को रख ले लेता और उसे अपने गरीब व जरुरत मंद रिश्तेदारों व गांव के सार्वजनिक कार्यों में खर्च करता |
और उस दिन के बाद रामसिंह ने वो ईमानदारी का चौला उतार फैंका जो पारिवारिक संस्कारों व गांव के बुजुर्गो ने उसे पहनाया था जिसे उसने वर्षो बड़ी ईमानदारी के साथ पहने रखा | और उसके बाद रामसिंह ने सभी आपूर्तिकर्ताओं से सीधे बात कर कमीशन की राशी खुद मंगवाना शुरू कर दिया | और उस पैसे को सार्वजनिक कार्यों पर खर्च करने के अलावा अपने रिश्तेदारों,मित्रों ,अपने अधिनस्त कर्मचारियों पर दिल खोलकर खर्च करना शुरू कर दिया | अधिनस्त कर्मचारियों पर खुला पैसा खर्च करने के कारण वे कम्पनी में सबसे ज्यादा उसका कहा मानने लगे जो काम कर्मचारी दुसरे प्रबंधकों के कहने पर चार दिन में पूरा करते थे वही काम वे रामसिंह के कहने पर एक दिन में ही कर देते थे इससे कम्पनी के मालिको को भी रामसिंह सबसे ज्यादा सफल प्रबंधक नजर आने लगा और एक बाद एक कम्पनी के सभी कार्य उन्होंने रामसिंह को सुपुर्द कर उसे पूरी कम्पनी का प्रबंधक बना दिया |
आज टूटे स्कूटर पर चलने वाले रामसिंह के पास कम्पनी की दी हुई शानदार बड़ी सी गाड़ी है ,वह बस या रेल की जगह हवाई यात्रा करता है | तरक्की व कमीशन की सम्मिलित कमाई से उसके पास शानदार घर व अन्य संपत्तियां है | रिश्तेदारों ,मित्रों व अधिनस्त कर्मचारियों पर खुलकर खर्च करने की आदत के चलते सभी लोग रामसिंह के दीवाने है | गांव में सार्वजनिक कार्यों में खर्च करने से अब वह गांव का सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति है |
कई बार आपसी चर्चा में रामसिंह खुद कहता है कि " जब ईमानदार रहे तब किसी ने कदर नहीं की , उन मालिकों ने भी नहीं जिनके लिए पूरी ईमानदारी व निष्ठा के साथ काम किया |
आज जब बेईमानी सीखी तब सभी वाह वाह कर रहे चाहे कम्पनी के मालिक हो या और लोग |"
डिस्क्लेमर - यह लेख सच्ची कहानी पर आधारित है बस पात्र का नाम बदल दिया गया |
"ताऊ गोल्डन पहेली " पर ताऊ पहेली संपादक मंडल को ढेरों बधाइयों सहित शुभकामनाएँ - 50
11/28/2009 06:06:00 AM
Ratan Singh Shekhawat
आजकल नेट बेंकिंग व ऑनलाइन खरीददारी करने का चलन बढ़ता जा रहा है जब एक क्लिक पर घर बैठे कंप्यूटर से बैंक खाता संचालित किया जा सकता है तो हम बैंक जाकर वहां क्यों भीड़ बढ़ाये व अपना समय बरबाद करें | और आजकल तो टेलीफोन बिल ,क्रेडिट कार्ड का भुगतान , बीमा पालिसी सब कुछ ऑनलाइन जमा हो जाता है | लेकिन इस सुविधा के साथ सबसे बड़ा खतरा सायबर क्राइम का है | ज्यादातर लोग अपने घरों में अपने कंप्यूटर में सस्ता या फिर फ्री का एंटी वायरस इन्स्टाल करके रखते है जो मेलावेयर व ट्रोजन आदि को नहीं रोक सकते | चूँकि ये मेलावेयर या ट्रोजन कंप्यूटर को ख़राब नहीं करते इसलिए जब तक हमारा कम्पुटर virus से ख़राब नहीं हो जाता हम भी निश्चिंत रहते है और ये ट्रोजन और मेलावेयर आपके कंप्यूटर की सभी महत्त्वपूर्ण सूचनाएं अपने मालिक को भेजते रहते है | फलस्वरूप आपके बैंक खाते, क्रेडिट कार्ड आदि के पासवर्ड हैक होने का पूरा इंतजाम रहता है |
पर क्या इससे डरकर हम ऑनलाइन बैंकिंग करना छोड़ दे ? में तो कहूँगा नहीं !
इसके लिए सायबर जालसाजों से बचने के बहुत सारे तरीके है पर मुझे तो विंडो उपयोगकर्ताओं के लिए सबसे ज्यादा बढ़िया लगा जब भी ऑनलाइन लेन देन करना हो लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम की लाइव सी डी का इस्तेमाल करते हुए अपना कंप्यूटर चला ऑनलाइन लेन-देन करें | लिनक्स एक एसा ऑपरेटिंग सिस्टम है जो बिना इंस्टाल किये सीधा सी डी से बूट होकर कंप्यूटर चलाता है जिसमे न तो कोई virus आने का डर है और ना ही किसी मेलावेयर या ट्रोजन घुसने का | दिल्ली ब्लागर सम्मेलन के बाद ताऊ ने रिपोर्टिंग से तौबा की
11/25/2009 06:06:00 AM
Ratan Singh Shekhawat
11/24/2009 06:06:00 AM
Ratan Singh Shekhawat
11/23/2009 04:04:00 PM
Ratan Singh Shekhawat

वर्ड प्रेस के प्लेटफॉर्म पर बने ब्लोगों में प्रोफाइल का पृष्ठ ब्लॉग पर होता है जबकि ब्लोगर पर अभी तक ऐसा पृष्ठ जोड़ने की कोई सुविधा नहीं है | इसलिए हमें अपनी प्रोफाइल ब्लोगर पर ही बनानी पड़ती है और हमारे ब्लॉग पर आये पाठक को हमारी प्रोफाइल देखने के लिए हमारा ब्लॉग छोड़ ब्लोगर प्रोफाइल पर जाना पड़ता है | दो चार रोज पहले यह बात मेरे दिमाग में घूम रही थी काश ऐसा ब्लोगर पर भी होता लेकिन थोड़ी देर बाद इसका भी जुगाड़ करने की इच्छा हुई और थोडा सा दिमाग लगते ही हो गया जुगाड़ " अपनी प्रोफाइल अपने ब्लॉग पृष्ठ पर लगाने का " |
यह बहुत ही आसान है बस अपने बारे में जानकारी लिखिए जो आप सार्वजानिक कर सकते है और "मेरा परिचय" या "मेरे बारे में " नाम से एक पोस्ट ठेल दीजिये ,पोस्ट में अपनी मन पसंद फोटो भी चिपका डालिए | अब इस पोस्ट का लिंक मीनू बार में दे दीजिए | मीनू बार में दिए लिंक पर क्लिक करते ही आपके परिचय वाली पोस्ट का पृष्ठ खुल जायेगा | उदहारण देखने के लिए यहाँ चटका लगाईये ताऊ पहेली-49
11/22/2009 01:09:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
चिट्ठाजगत से मिलने वाली डाक में समीर जी का सन्देश पढने के बाद कि नया हिंदी चिट्ठा शुरू करवाए तब से हिंदी ब्लोगिंग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मेरी अक्सर कोशिश रहती है कि किसी मित्र से नया हिंदी ब्लॉग शुरू करवाया जाय पर मेरे मित्रों में ज्यादातर इन्टरनेट का इस्तेमाल नहीं करते और जो इस्तेमाल करते है उन्हें अपने मेल संदेशों का जबाब तक देने की फुर्सत तक नहीं मिलती तो उनसे ब्लॉग पढने व लिखने की उम्मीद कैसे की जाय | हाँ ऐसे लोगों का ताऊ के खूंटे से जरुर परिचय करवा देता हूँ ताकि वे अपनी व्यस्त दिनचर्या के कारण होने वाले तनाव से ताऊ के खूंटे पर हंसकर ,गुदगुदाकर अपना तनाव कम कर सके |
कल शाम को मेरे दो मित्र लक्ष्मण सिंह जी व रामबाबू सिंह का अचानक घर आना हुआ | मै उस वक्त अपने कंप्यूटर पर ब्लॉग खोल कर ही बैठा था | लक्ष्मण जी के साथ रामबाबू सिंह को देखकर मुझे अचानक याद आया कि क्यों न रामबाबू सिंह को आज हिंदी ब्लॉगजगत से रूबरू करवा इनका भी ब्लॉग शुरू करवाया जाये | चूँकि लक्ष्मण जी पर तो मै ब्लोगिंग रूपी जाल कई बार फैंक चूका था वे उस वक्त तो ब्लोगिंग के लिए जोर शोर से अपना डोमेन तक खरीद लेते है लेकिन बाद में इधर झांकते तक नहीं | लेकिन आज उनके साथ रामबाबू भी साथ आये थे सो हमने शिकारी की तरह अपना ब्लोगिंग रूपी पूरा जाल उन्ही पर फैंकने पर ध्यान केन्द्रित किया इसके लिए हमने सबसे पहले उन्हें ज्ञान दर्पण की सैर करायी ,ज्ञान दर्पण पर आने वाले पाठको की संख्या के आंकड़े स्टेट काउंटर व गूगल विश्लेषण के जरिये दिखाए कि कितने लोग हमें पढने कहाँ कहाँ से आते है , उसके बाद अलबेला खत्री जी की कविताओं व चुटकलों से गुदगुदवाया अलबेला जी को उन्होंने आज तक टी वी पर ही देखा था हमने उन्हें बताया कि देख लीजिए इसी ब्लॉग के जरिये हमें टी वी वाले अलबेला जी भी जानते है | उसके बाद उन्हें ब्लॉग वाणी व चिट्ठाजगत की सैर करवाई गई जिसके लिए सुबह उन्होंने फोन पर बताया की चिट्ठाजगत की मेहरवानी से उन्हें तो इन्टरनेट पर हिंदी में पढने का खजाना ही मिल गया | ब्लॉग एग्रीगेटर्स की सैर के बाद हमने रामबाबू को बाबा ताऊ आनंद के आश्रम में गड़े खूंटे पर बाँध दिया जहाँ वे अपने घर जाने के बाद भी सुबह चार बजे तक बंधे ताऊ जी के किस्सों का भरपूर रसास्वादन कर रहे थे साथ ही बीच बीच में हमारे द्वारा उनके लिए बनाए गए सुसज्जित ब्लॉग को निहारते रहे |
हमारे मित्र रामबाबू सिंह एलोवेरा के स्वास्थ्य वर्धक उत्पाद भी बेचते है अत: हमने उनकी नब्ज देखकर उनका ब्लॉग भी एलोवेरा प्रोडक्ट के नाम से बना दिया क्योंकि मुझे पता है अभी तो रामबाबू अपने एलोवेरा के उत्पादों की खूबियों वाली पोस्टे ठेलंगे पर आखिर कितने दिन | क्योंकि हमें तो उनके एलोवेरा के उत्पादों की संख्या की गिनती तक पता है | उसके बाद तो वे भी ठीक उसी तरह इस ब्लोगिंग रूपी समुद्र में गोते लगाकर टिप्पणियाँ व पाठक ढूंढते रहेंगे जैसे आज हम सभी लोग | मैंने भी शुरू में राजपूत वर्ल्ड ब्लॉग अपने इतिहास प्रसिद्ध योद्धा पूर्वजो के शोर्यपूर्ण इतिहास का बखान करने के उद्देश्य से ही बनाया था | लेकिन हाय री ये टिप्पणियाँ व पाठक संख्या , कभी टिप्पणियों की संख्या ,कभी पाठक संख्या ,कभी अलेक्सा रेंक तो कभी चिट्ठाजगत रेंक में ऐसे उलझे कि इतिहास छोड़कर विविध विषयों पर लिखने लग गए | और इसमें इतने उलझ गए कि निकलने के बजाय ज्यादा उलझने का ही मन करता है |
कल से रामबाबू भी हिंदी ब्लोग्स को पाकर एसा महसूस कर रहे है जैसे उन्हें कोई खजाना मिल गया हो और पढने में मशगूल है उनकी इस तरह की रूचि देखकर मुझे लगता है कि वे भी अब हमारी तरह हिंदी ब्लोगिंग में उलझे ही रहेंगे और नियमित पढ़ते व लिखते रहेंगे | बस उन्हें थोड़ी सी जरुरत है आपके टिप्पणियों रूपी प्रोत्साहन की |
तो आईये रामबाबू के ब्लॉग पर जाकर उनका स्वागत कर उन्हें अपना टिप्पणी रूपी प्रोत्साहन दें |
11/20/2009 09:42:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
आज ही के दिन २० नव.२००८ को ब्लोगर से कस्टम डोमेन लेकर ज्ञान दर्पण की शुरुआत की गई थी , एक वर्ष कब बीत गया पता ही नहीं चला ,कल ही की बात लग रही है जब हिंदी ब्लॉग टिप्स पर आशीष जी ने अपने ब्लॉग को कस्टम डोमेन पर ले जाने सम्बंधित पोस्ट लिखी थी और उसकी प्रेरणा से ज्ञान दर्पण .कॉम डोमेन खरीदकर यह ब्लॉग बनाया गया |
पिछले एक साल में ज्ञान दर्पण पर प्रकाशित २४४ लेखों को ब्लोगर साथियों व गूगल से आने वाले पाठको के स्टेट काउंटर के अनुसार ६२६०० हिट मिले और आप सभी के सक्रिय सहयोग से ज्ञान दर्पण चिट्ठाजगत में भी ३६ वीं रेंक पर आने में कामयाब रहा | यह सब आप सभी ब्लोगर साथियों के सक्रिय सहयोग व आपसे मिली प्रेरणा के चलते ही संभव हो पाया है |
पिछले एक साल में ज्ञान दर्पण को मिले सहयोग व प्रेरणा के लिए आप सभी ब्लोगर साथियों व ब्लॉग एग्रीगेटर्स का हार्दिक आभार व धन्यवाद |;
11/18/2009 06:00:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
स्वर्ग के रमणीक दृश्य एक के बाद एक आने लगे | सुन्दर और मनोरम घाटियाँ ,टेढी मेढ़ी सुन्दर राहें ,दोनों और कभी न कुम्हलाने वाले अनुपम रंगों वाले आकर्षक पुष्प ,लहलहाकर कर स्वागत करने वाली झाडियाँ , अमृत फलों से लदे हुए घने वृक्ष ,मलय पर्वत से अधिक शीतलता और सौरभ प्रदान करने वाली वायु के नशीले झोंके , चाँद सूर्य के बिना भी प्रकाशमान और उज्जवल आकाश में देवकुमारों के खिलोनों से गुड्कते हुए श्वेत और सुन्दर बादल ,निर्भीक और पुष्ट मृग शावकों की मनमोहक अठखेलियाँ ,किन्नर और यक्षों की अक्षत यौवनाओं के सुरीले गले से निकली हुई अल्हड राग की तानो के कुछ टूटे शब्द ,कहीं गन्धर्वों के तानपुरों और बंशियों से निकली हुई मातृ-भूमि के विरह विप्रलभ के संगीत सी लोरें , सिद्ध पुरुषों के देदीप्यमान और उड़ते हुए विमान दिखाई दे रहे थे और उनके बीच मै मचलता कूदता ,मस्त होकर गुनगुनाता हुआ जा रहा था | स्वर्ग लोक की सुन्दर दृश्यावली के बीच बढती हुई मेरी तस्वीर को देखकर इस बार मैंने संतोष की सांस ली शायद इस बार वैसा ही कोई करुण और तड़पाने वाला दृश्य नहीं दिखाई देगा | सत्कर्मों के फलस्वरूप ही स्वर्ग मिला है ,इसलिए यहाँ तो मेरा आदर सत्कार ही होगा और बाद में अपने पडौसी दर्शक को बता सकूँगा कि वह चित्र मेरा ही था - अपनी प्रियतमा और सदापत्नी धरती के त्याग स्वरूप ही मुझे स्वर्ग मिला है | मेरा त्याग कितना कठिन था किन्तु उसका फल कितना महान है ! जो जन हित में अपने कलेजे पर पत्थर रख कर इतना त्याग करते है उन्हें हमेशा अच्छा ही फल मिलता है | जो त्याग प्रारम्भ में विष के समान लगता है और परिणाम स्वरूप अमृत के समान लगता हो वही त्याग सात्विक है | सोचते सोचते मै अपनी कुर्सी पर डट कर बैठ गया और दृश्य पटल को उत्सुकता से देखने लगा |
स्वर्ग में मै चला जा रहा था | एक स्थान पर मैंने बहुत बड़ा शामियाना देखा | नीचे इन्द्र -वरुणाआदि देवता बैठे हुए थे | कोई सत्संग या उत्सव चल रहा था जो अब समाप्त हो गया था | मैंने देखा राम,कृष्ण ,अर्जुन ,भीम आदि भी वहीँ थे - उठ कर जा रहे थे | मै दौड़ा -दौड़ा उनके पीछे गया और अपना परिचय देने लगा -मै आप ही की संतान हूँ | आप लोग शायद मुझे नहीं पहचानते किन्तु मैंने मृत्यु लोक में आपकी बहुत सी तस्वीरें देखि है , इसलिए मैंने आपको देखते ही पहचान लिया | मै भी सूर्यवंशी हूँ | मैंने सिर झुका कर उनका अभिवादन किया , किन्तु उन्होंने मुझे आशीर्वाद नहीं दिया ,उल्टा दुत्कारा -'हट ,भाग जा यहाँ से ! तुम और हमारी संतान ! यह मुंह और मसूर की दाल ! चल भाग यहाँ से | लोगों को छलकपट से अपनाने की राजनीती मृत्युलोक में चला करती है | यहाँ हम नहीं ठगे जा सकते | तुम हमारी संतान नहीं हो | अपने बाप को त्याग कर दूसरो की संतान बनने में लज्जा नहीं आती ? क्या यही कलि युग का धर्म है ? हमने तो गुण रहित धर्म को भी श्रेष्ठ बताया था | हमारी परम्पराएं ही कुछ और थी | हमारी स्त्रियों के अपहरण पर हमने अपहर्ता के साम्राज्य और सर्वस्व का संहार कर दिया था और कल तुमारी जोरू धरती का अपहरण हुआ और तुमने परम्परा डाली है टुकर टुकर देखने की और आज तुम परम्परा डाल रहे हो तुम्हारी ही स्त्री को कुदृष्टि से देखने वाले का क्रिपभाजन बनने के लिए चाटुकारी करने की ! अपने श्रेष्ठ धर्म संस्कृति को छोड़कर तुम राह चलते हुए किसी भले आदमी को पकड़ कर बाप कहने लग जाते हो | भाग जाओ यहाँ से !' अभिमन्यु पास ही खडा था | उसने मेरे मुंह पर थूक दिया |
मै स्तम्भित ,लज्जित और किंकर्तव्य विमूढ़ सा खडा रहा | अपना समझ कर जिनके पास दौड़ा हुआ गया था ,उन्होंने ही मुझे तज दिया | वे चले गए और मै हारा , थका ,निराश होकर काफी देर तक खडा रहा | फिर सोचा इनका क्या दोष है ? मेरे और इनके बीच युगों का अंतर पड़ गया है | खून में भी अंतर आया ही होगा , शायद इसलिए इन्होने मुझे नहीं पहचाना होगा | चलो, अभी अभी जो मृत्युलोक से आए है -वे भी कहीं मिल सकते है | स्वर्ग पहुंचकर भी मै किसके पास ठहरूं ,सोचता सोचता चल पड़ा |
इस बार मुझे सुन्दर सुन्दर दृश्य और रमणीक स्थान कुछ भी अच्छे नहीं लगे | मै अपनी ही व्यथा और समस्याओं में उलझा हुआ आगे बढ़ गया था ,कि एक जगह कुछ परिचित से लोग दिखाई दिए | मैंने देखा महाबली पृथ्वीराज चौहान खड़े है ,पास ही महाराणा सांगा, प्रताप और हम्मीर खड़े है | मैंने उनके पास जाकर उन्हें प्रणाम किया और समाचार देना शुरू किया -" हे हिन्दू सम्राट ! आपने अनुपम बहादुरी का परिचय देकर भी जिस तख्त को खो दिया था ,उसे हमने वापस प्राप्त कर लिया है | शताब्दियों बाद आज हिंदुस्तान हिन्दुओं का हुआ | महाराणा संग्राम सिंह जी ! आपने जिस उद्देश्य के लिए दो लाख सेना इकट्ठी कर खानवा के युद्ध में संग्राम छेड़ा था फिर भी सफल नहीं हो सके ,उस सफलता को हमने बिना एक रक्त की बूंद बहाए ,बिना किसी की जान खोए ,केवल नारों और जुलूसों से ऐसे बाबर को समुद्र पार भगा दिया जिसके राज्य में कभी सूर्य अस्त नहीं होता था | महाराणा प्रताप सिंह जी ! आज आपका मेवाड़ स्वतंत्र है ,सारा राजस्थान ही नहीं ,समूचा भारत आजाद है | पच्चीस वर्ष तक कष्ट सहन कर हल्दी घाटी का लोमहर्षक युद्ध लड़कर भी आप जिन अरमानो को पूरा नहीं कर सके ,वे अरमान अब पूर्णत: पुरे हो गए है | आज आपके मेवाड़ में सुख और समृद्धि है ,लहलहाते हुए खेत है | वीरान मगरे भी अब इतने जन संकुचित हो गए है कि भूमि रखने की भी अधिकतम सीमा निर्धारित कर दी गयी है |जिस चित्तोड़ के लिए आपने भूमि पर शयन किया ,घास की रोटियां खाई ,पत्तलों पर भोजन किया ,वही चित्तोड़ अब हमारा हो गया है | गाडोलिया लुहार उसमे विजयी होकर घुसे है | यदि आप अपनी पूर्व प्रतिज्ञानुसार स्वर्ग में भी धरती पर शयन और पत्तलों में भोजन करते हो तो अब ऐसा करना छोड़ दीजिए | इस आजादी की हम अनेक वर्षगाँठ मना चुके है | आज हम पूर्ण रूप से सुखी है | हमारे घरों में आज बीसियों भेडें और पच्चासों बकरियां है | अकेला मै तीन सहकारी समितियों का सदस्य था | विधानसभा व लोकसभा का भी लगातार पन्द्रह वर्षों तक सदस्य रह चूका हूँ | आपके वंशज अब भी हिंदुआ सूरज कहलाते है | हमें किसी चीज की कोई कमी नहीं है | राज्य करने से अब हमें छुट्टी मिल गयी है | घर बैठे ही हमें बड़ी बड़ी रकमे हाथ खर्च के लिए मिल जाया करती है | आपके और दुसरे उमरावों को अब न तो आवश्यक रूप से घोडे रखने पड़ते है और न युद्ध के लिए सदा तैयार रहना पड़ता है | घर बैठे ही २२ वर्ष तक उन्हें रुपया ब्याज सहित मिलता जावेगा |'
लेकिन इतने उत्साहप्रद समाचार सुनने के बाद भी उनमे से कोई नहीं बोला | पृथ्वीराज ने तो मुंह फिर लिया | सांगा ने नीचे देखना शुरू कर दिया | प्रताप कुछ क्रोधित दिखाई दे रहे रहे थे | परन्तु हम्मीर से चुप नहीं रहा गया ,बोला - ' शर्म नहीं आती बकवास करते ! हमारे घावों को फिर हरा करना चाहते हो | तुम तुम्हारा काला मुंह कही और जाकर करो | हमारे तो सारे इतिहास और परिश्रम पर तुमने पानी फिर दिया और फिर हमी से अपनी कायरता और नपुसंकता की प्रशंसा करवाना चाहते हो | धूर्त कहीं के ! भाग यहाँ से - भाग जा !' मै समझ नहीं पाया , आखिर उनकी अप्रसन्नता का कारण क्या था ? मैंने सोचा किसी संजीदे आदमी के पास जाऊं | उसके पास जाऊं जिसने कर्तव्य के लिए आराम से कभी रोटी भी नहीं खायी , जिसके सामने मारवाड़ (जोधपुर) जैसे राज्य का प्रलोभन भी सिर ऊँचा नहीं कर सका और अंत में कर्तव्य के लिए जिसने अपनी मातृभूमि को सैकड़ो मील दूर पीछे छोड़कर क्षिप्रा के एकांत किनारे अपनी समाधी बनाई | छोड़ने के बाद एक बार भी घूमकर अपने घर को नहीं देखा | उस वीर दुर्गादास के पास जाऊं ,शायद वह बेटा कहकर मुझे स्नेह्संबोधन देगा , मेरी राजनीती की प्रशंसा कर धैर्य रखने का आदेश देगा | सौभाग्यवश वे मुझे दिख ही गए ,मैंने उन्हें सारा हाल बताया - मारवाड़ का हाल बताया और यह भी बताया कि हम्मीर और अभिमन्यु किस बुरी तरह से मुझसे पेश आये थे | दुर्गाबाबा आखिर दुर्गाबाबा निकले | उन्होंने मुझे बड़े ध्यान और धैर्य से सुना | उनकी सहृदयता ने मुझे खूब प्रभावित किया पर ज्यों ही मै पेट भर बातें कह चूका , उन्होंने कहा - 'पर तुम आखिर यहाँ कैसे आये ?'
मैंने कहा ,- यह तो स्वर्ग है , कोई बुरी जगह तो है नहीं | सभी इसी की कामना करते है और मुझे तो यह धरती रूपी पत्नी त्याग पर ही अनायास ही प्राप्त हुआ है | पृथ्वी पर मेरे महान उत्तरदायित्वों की पूर्ति हो गयी और इसलिए भाग्यवानों की श्रेणी में मेरी गणना होकर फलस्वरूप यह स्वर्ग मिला है |'
उन्होंने कहा - ' जब तेरे जैसे सैकड़ों भाई बंधू नरक की यातनाओं से पृथ्वीलोक में कलबला रहे है , तब तुझे स्वर्ग के सुख भोग की लालसा प्राप्त ही कैसे हुई ? निर्दयी ! क्या स्वजनों की व्यथा और तेरे अपने समाज की व्याधि भी तेरा कलेजा नहीं कंपा सकी , जो तू ऐसे समय में स्वर्गिक सुखों की खोज में उन्हें छोड़कर यहाँ आया है ? मृत्युलोक में तो तू उनके लिए इतने गाल बजाता था , खूंटे तोड़ता था और अब उनके लिए तेरे अंत:करण में कोई माया -ममता और स्नेहादि भाव नहीं रहे | तुम आदमी हो या घनचक्कर !'
उनकी आँख से निकले हुए तेज के सामने मेरे समस्त तर्क और तत्व ज्ञान की घिग्घी बंध गयी | जिस स्वर्ग -प्राप्ति के लिए अभी-अभी मै इतना पुलकित हो रहा था और भाग्य की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहा था वही स्वर्ग अब मुझे काटता हुआ दिखाई दे रहा था | इतने बड़े लोक में सिर छिपाने जितनी भी जगह नहीं दिखाई दे रही थी | इतने में ही एक पत्र -वाहक ने आकर मुझे एक बंद लिफाफा दिया | उत्सुकता और भय -मिश्रित भावो से मैंने उसे खोल डाला | वह निमंत्रण पत्र था जो किसी इतरलोक से आया हुआ था ,जिसमे मुझे भोजन ,विश्राम और निवास तक के लिए आमंत्रित किया गया था | निमन्त्रण के नीचे विभीषण , शल्य , जयचंद , भीम सिंह जसड़ोत ,शिलादित्य और न जाने कितनो के हस्ताक्षर थे | स्वर्ग छोड़ने का मैंने तत्काल ही निर्णय कर लिया और मुट्ठियाँ बंद कर वहां से भागा | अचानक मार्ग में उर्वशी से टकरा गया | उसने आँखे तरेर कर कहा - ' आदमी हो या घनचक्कर ?' मै उसे प्रत्युतर देने ही वाला था -कि मै पथ के बाँई और चल रहा था , मेरी कोई गलती नहीं थी |' पर मै कुछ कहूँ उससे पहले ही नारद जी का भीषण अट्टहास सुनाई दिया - ' घनचक्कर नहीं यह भी एक क्षत्रिय है |'
एक छत पर से मेनका में अपना गला निकाला और मुझे देखकर खिन -खिन का हंसने लगी |
चित्रपट चल रहा था दृश्य बदल रहे थे | ;;स्व.श्री तन सिंह जी , बाड़मेर
11/17/2009 07:17:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
हाथ लुळीयौ जकौ ई आछौ = हाथ झुका वही बहुत
सन्दर्भ कथा - एक मुस्टंड साधू सवेरे सवेरे कंधे पर झोली टांग कर बस्ती में घर घर आटे के लिए घूमता | एक घर में एक ताई के अलावा उसे कोई भी मना नहीं करता था | फिर भी वह बिना नागा किये ताई के घर भी फेरी लगता | ताई उसे बहुत बुरा भला कहती - पांच आदमियों जितना काम करे ऐसा मुस्टंडा है , भीख मांगते लाज शर्म नहीं आती ? तेरी खातिर खेतों में पसीना नहीं बहाते ! अनाज का एक एक दाना हमारे खून से पैदा हुआ है | सो तुझे पिसा -पिसाया आता डाल दे ! खबरदार जो मेरे घर की और मुंह किया तो दांत तोड़ दूंगी ! मुझे निट्ठले आदमी से कुत्ते जैसी घिन्न है |... पर ठंडे दिमाग वाले साधू ने उसके कहने का कुछ भी बुरा नहीं माना | दुसरे दिन भी सबसे पहले वह उसी ताई के घर गया | ताई बाहर के आँगन में फूस निकाल रही थी | गुस्से में झाडू फेंका तो साधू की पीठ पर थोडा लगा | साधू झाडू हाथ में लेकर उसे देने की खातिर आगे बढा | ताई ने मुंह मस्कोर कर झाडू वापस तो ले लिया पर कहा कुछ भी नहीं | साधू चुपचाप लौट गया | लेकिन साधू भी कम जिद्दी नहीं था | भीख मांगना उसका धर्म था ! धर्म के मार्ग में कठिनाइयाँ तो आती ही है | इतनी जल्दी वह हार कैसे मान लेता ? अगले दिन तीन घडी दिन चढ़े ,उसने ताई के खुले दरवाजे पर खड़े होकर आवाज दी - ताई , आटा डालना तो ...|
आवाज की भनक कानो में पड़ते ही ताई समझ गई कि वही निर्लज्ज साधू है और इस बार उसे सबक सिखाना ही होगा कि आइन्दा इस रास्ते पर ही नहीं आये | ताई चूल्हे के पास बैठी सोगरे (बाजरे की रोटियां ) बना रही थी | आग बबूला होकर बाहर आई सामने ही एक गोल पत्थर पड़ा था | उसे उठाने के लिए झुकी तो साधू ठट्ठा मारकर हंसा | ताई ने पत्थर तो उतावली में उठा लिया ,पर फेंका नहीं | वह हतप्रद सी वहीँ खड़ी रही | साधू उसी तरह हंस रहा था | ताई ने पत्थर को कसकर मुट्ठी में पकडा | और पूछा - मैंने तो तुझे मारने के लिए पत्थर उठाया था और तू निर्लज्ज की तरह दांत निकाल रहा है ? साधू ने उसी तरह मुस्कराते हुए कहा - जब मन में ख़ुशी होती है तो होंटो पर हंसी आ ही जाती है |
ख़ुशी ? ख़ुशी किस बात की ? सिर फूटने की ?
नहीं सिर तो अभी सलामत है | मुझे तो तुम्हारा हाथ झुकने की ख़ुशी हुई है | आज पत्थर के लिए हाथ झुका तो कल आटे के लिए भी झुकेगा | बस, आदत पड़नी चाहिए | मनुष्य के जीवन में आदत ही तो सब कुछ है | इतना कह कर मुस्कराते हुए वह साधू रवाना हो गया | वह कोई पांच सात कदम ही आगे बढा होगा कि पीछे से ताई की आवाज सुनाई पड़ी - थोडा रुकिए ! मेरी आदत तो एक ही बार में बदल गयी | वह जल्दी से रसोई घर में गई और और एक बड़ा सा बर्तन आटे का भर लाइ और सारा आटा साधू की झोली में खाली कर दिया |
अपार धैर्य हो तभी भिक्षा जैसे धर्म का निबाह होता है | आदत तो जैसी पटको ,वैसी ही पड़ जाती है | आकस्मिक हृदय परिवर्तन के लिए वैसा ही सशक्त आधार अपेक्षित है |विजयदान द्वारा लिखित
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11/16/2009 04:14:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
लिनक्स के नए उपयोगकर्ता लिनक्स ओपरेटिंग सिस्टम की iso इमेज डाउनलोड करने के बाद अक्सर उलझ जाते है कि अब इसकी सी डी कैसे बनाए ? क्योंकि ज्यादातर कंप्यूटर उपयोगकर्ता विण्डो का इस्तेमाल करते है और उसमे सी डी बर्न करने के लिए nero उपयोग करते है जिससे वे लिनक्स की सी डी बनाने में विफल रहते है | पहले पहल मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था मैंने उबुन्टू लिनक्स डाउनलोड तो कर लिया पर उसकी सी डी न बना सका | इसी तरह की उलझन के चलते कई लोग चाहते हुए भी लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम इस्तेमाल करने से वंचित रह जाते है | तो आइये आज चर्चा करते है लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के iso इमेज की सी डी बर्न करने के बारे में -
यह बहुत आसान है और इसके लिए अंतरजाल पर कई सारे सोफ्टवेयर मुफ्त में उपलब्ध है जिन्हें डाउनलोड कर इंस्टाल कर iso इमेज की सी डी आसानी से बनाई जा सकती है ऐसा ही एक सोफ्टवेयर InfraRecorder है जिसे आप यहाँ से डाउनलोड कर अपने कंप्यूटर में इंस्टाल कर लिनक्स इमेज की सी डी बना सकते है |
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11/15/2009 08:46:00 AM
Ratan Singh Shekhawat
गांव के बाहर एक बाबा जी का आश्रम था बाबा जी भांग का नशा करते थे अतः आश्रम में नित्य भांग घोटने का कार्य होता रहता था | गांव के कुछ निट्ठले युवक भी भांग का स्वाद चखने के चलते रोज बाबा जी के पास चले आया करते थे | इनमे से कुछ युवक भांग का नित्य सेवन करने के कारण भांग के नशे के आदि हो चुके थे अतः वे रोज भांग पीने के चक्कर में बाबा जी के आश्रम पर पहुँच ही जाते फलस्वरूप बाबा जी का भांग का खर्च बढ़ गया जिसे कम करने के लिए बाबा जी ने निश्चय कर लिया था |
एक दिन उनका एक एसा चेला जीवा राम जो भांग के नशे का आदि हो चूका था हमेशा की तरह आश्रम पहुंचा | आश्रम का दरवाजा बंद देख जीवा ने बाबा जी को आवाज लगाई |
जीवा :- बाबा जी ! बाबा जी !! दरवाजा खोलिए |
बाबा जी :- अरे कौन ?
जीवा :- बाबा जी ! मै जीवो !
बाबाजी :- बेटा ! अब घर में ही घोटो और पीवो | मुफ्त का माल समझ सेवन करने वाले ऐसे ही आदि हो जाते है अतः मुफ्त के माल का सेवन करने में भी मितव्यता बरतनी चाहिए |
11/11/2009 06:49:00 AM
Ratan Singh Shekhawat
अब आप अपने ब्लॉग पर ब्लोगिंग के साथ साथ ऑनलाइन दुकान भी चला सकते है और इस ई-दुकान से कोरियर से भेजी जा सकने वाली वस्तुएं बेच कर लाभ कमा सकते है | यही नहीं अब ब्लॉग पर ebay जैसी साईट की तरह किसी भी वस्तु की बोली लगवाकर नीलामी के जरिये भी सामान बेचा सकता है | और यह सब संभव बनाया है वर्डप्रेस के प्लगिन्स ने |
जी हाँ ! यदि आप अपनी वेब होस्टिंग लेकर वर्डप्रेस की ब्लॉग स्क्रिप्ट का इस्तेमाल करते हुए ब्लोगिंग कर रहे है तो यह जानकारी आपके फायदे की है | वर्डप्रेस के ई कॉमर्स प्लगिन्स की सहयता से अब आप अपने ब्लॉग पर ई शॉप लगा सकते है |इन प्लगिन्स में WP e-Commerce,Quick Shop,eShop,WP Live-Shopping,YAK Shopping Cart,Zingiri Web Shop आदि प्रमुख है मैंने Zingiri Web Shop का प्रयोग कर देखा है जिसका डेमो आप यहाँ चटका लगाकर देख सकते है |यदि आप बोली लगाकर नीलामी वाला प्लगिन्स इस्तेमाल करना चाहते है तो WP Auctions प्लगिन्स इंस्टाल कर इस्तेमाल कर सकते है |

तो फिर देर किस बात की यदि आप अपनी ई-दुकान लगाना चाहते है तो आज ही अपने हिंदी ब्लोगर कुन्नु सिंह जी से सस्ती वेब होस्टिंग लीजिए और लगा लीजिए अपनी ई-दुकान अपने ब्लॉग पर |;
11/10/2009 06:06:00 AM
Ratan Singh Shekhawat
11/09/2009 04:44:00 AM
Ratan Singh Shekhawat
गांव के बाहर खेतों में बने घर को राजस्थान में ढाणी कहकर पुकारा जाता है खेती करने वाले किसान अपने खेतों की अच्छी तरह से देखभाल करने के लिए अक्सर खेत में बनी ढाणियों में ही रहते है |ये ढाणियां वहां रहने वाले की आर्थिक स्थिति के हिसाब से पक्के मकानों की या फिर कच्चे झोंपड़ों की बनी होती है | प्रकृति माँ की गोद में बसी इन ढाणियों के शांत व् एकांत वातावरण में रहना बहुत शकुन देता है लेकिन जीने के लिए जरुरत की अल्प सुविधाओं के चलते इन ढाणियों में रहना इतना आसान भी नहीं है हालाँकि आजकल बिजली की सुविधा के चलते किसानो द्वारा सिंचाई के लिए अपने अपने खेतों में कुँए व ट्यूब वेळ बनाने से रौशनी व पानी की सुविधा होने से ढाणियों में भी रहना आसान हो गया है , व्यक्तिगत यातायात व संचार के बढे साधनों ने भी ढाणियों का जीवन आसान किया है वरना पहले ढाणियों में आने जाने के लिए कई कई किलोमीटर पैदल ही चलना पड़ता था साथ ही पानी की कमी ढाणियों के जीवन को सबसे ज्यादा कठिन बनाती थी आज भी बाड़मेर व जैसलमेर जिलों की ढाणियों में रहना बहुत ही दुष्कर है वहां के लोगो को आज भी कई कई किलोमीटर चलकर सिर पर पानी के मटके ढ़ोने पड़ते है |
ढाणी शब्द की लोकप्रियता को देखते हुए आजकल महानगरो के पास ढाणी के नाम से राजस्थानी थीम के कई होटल और रिसोर्ट खुल गए है जैसे चोखी ढाणी,आपणी ढाणी आदि आदि | इन ढाणी के नाम वाले होटलों में राजस्थानी खाना ,नृत्य ,संगीत व राजस्थानी आवभगत की व्यवस्था होती है | राजस्थानी परिवेश को दर्शाती ये ढाणी के नाम वाली होटल्स आगुन्तक को बहुत अच्छा प्रभावित करती है | जयपुर के पास चोखी ढाणी नाम से बना रिसोर्ट तो देश विदेश में अपनी पहचान बना चूका है |

11/07/2009 09:07:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
"वसुधा वीरा री वधू ,वीर तिको ही बिन्द "
धरती वीरों की वधू होती है और वीर उसके पति |
" वीर भोग्या वसुंधरा " इस धरती को वीर ही भोगते है |
लेकिन इस धरती को भोगना और इसका स्वामी बने रहना इतना आसान भी नहीं है इस धरती के सुहाग की रक्षा के लिए,इसकी इज्जत आबरू के लिए बलिदान करने होते है तभी कोई वीर इसका स्वामी बने रह सकता है उसे इस धरती रूपी वधू के प्रति बहुत सारे कर्तव्य निभाने पड़ते है जो शायद आज हम भूल रहे है उन्ही कर्तव्यों की याद दिला रही है बाड़मेर के पूर्व सांसद स्व.श्री तन सिंह जी की यह रचना -
युगों से दृश्य बदलते गए पर एक दृश्य पर मेरी आँख ठिठक गयी | दृश्य पटल पर मैंने एक नारी को देखा | गौर वर्ण,सरोवर से सजल और बड़े बड़े नेत्र,हरी-हरी साड़ी पहने ऊपर नदियों के गोटे लगे हुए थे | सलमे सितारों की जगमागाहट से उसका रूप कहीं अधिक जगमगा रहा था | उसके सतोगुणीय सोंदर्य के सागर में आनंदातिरेक से उद्विग्न हो मेरा मन गहरे गोते लगा रहा था किन्तु मैंने देखा उसकी आँखों में नारायण की व्यथा समाई हुई थी | उसे एक दुष्ट पुरुष अपनी जांघ पर बिठाना चाहता था | वह उसकी हरी हरी सुन्दर साड़ी का पल्ला खींच रहा था और वह अर्धनग्न नारी किसी दुखिया की करुण पुकार-सी पछाड़ खाती हुई मुझसे अभय मांग रही थी | उसकी अस्त व्यस्त केश-राशि मेरे पुरुषार्थ को चुनोती दे रही थी | मैंने सोचा यह दृश्य तो द्रोपदी का है और वह दुष्ट पुरुष शायद दुर्योधन है | शायद मै द्वापर युग के चीरहरण का दृश्य देख रहा था , परन्तु जब मैंने आर्श्चय से मेरी खुद की तस्वीर को दृश्य पटल पर देखा तो संशय हुआ शायद वह कलियुग का ही कोई दृश्य है |
दृश्य पटल पर स्थितिप्रज्ञ की भांति मै खडा था और वह द्रोपदी अपना परिचय दे रही थी -" मै द्रोपदी नहीं धरती हूँ -तेरी स्त्री हूँ ! सतीत्व ही एक मात्र मेरा धन है जिसे यह दुष्ट पुरुष बरबस लुट रहा है ! मुझे बचाओ मेरे नाथ ! मुझे बचाओ !!
लेकिन मै दृश्य पटल पर चुप ही खडा था |
उसने बताया मै किसी एक की होकर नहीं रहना चाहती थी | मुझे अपनी बनाने के लिए कितने ही इतिहास रंगे गए पर तुम्हारे पूर्वजों ने मुझे बलपूर्वक अपनी बना लिया | मेरे लिए लम्बे लम्बे युद्ध चले , लाखों का संहार हुआ , इतना कि मै रक्तस्नाता हो गई | आखिर हार कर मैंने सोच ही लिया कि यह मुझे किसी भी कीमत पर छोड़ नहीं सकता | तभी मैंने अपना कुल्टापन छोडा और वीर भोग्या बनी | पर मुझे एसा मालूम होता कि तेरे जीवित रहते मुझे कोई ले जा सकता है तो मै किसी एक के घर साध्वी बनकर रहने की छलना में कभी नहीं छली जाती | होनहार ने मेरा सारा गर्व खंडित कर दिया , तेरे जैसा नाजोगा पति देखने को मिला अन्यथा मै बहुत पहले ही किसी का पल्ला पकड़ लेती "|
लेकिन मै दृश्य पटल पर चुप ही खडा था |
उसने मुझे याद दिलाया - " मेरे लिए तेरे पूर्वजों ने क्या नहीं किया ? कौनसा पाप नहीं किया ? भाई-भाई आपस में मेरे लिए मर मिटे | पिता ने पुत्र को और पुत्र ने पिता को मारा , सिर्फ मेरे लिए | मेरे लिए एक युद्ध में तेरी बारह बारह पीढियां काम आई | मेरे लिए ही तेरी माँ बहनों ने जलती ज्वालाओं ने जलकर प्राण त्यागे , मेरे लिए ही तेरे पूर्वज केसरिया बाना पहन कर बिना सिर लड़ते रहे | मेरे लिए ही समस्त संसार में सर्वाधिक कीमत चुकाने वाले तेरे ही पूर्वज थे, इसीलिए जन्म जन्मान्तरों तक मै तुम्हारे चरणों की दासी बनी रही | जीने के लिए मरते रहे और मरने के लिए जीते रहे ,पर जिन्दा रहते मेरे किसी पति ने मेरा इस प्रकार परित्याग नहीं किया जिस प्रकार आज तू कर रहा है | जरा देख तो सही,तेरे जीते जी ये दुष्ट मुझे ले जा रहा है |"
लेकिन फिर भी मैंने कुछ नहीं किया | दृश्य पटल पर मौन खडा रहा | केवल इतना ही कहा -" देवी ! धन और धरती बंट कर रहेगी |"
उसने मुझे फटकारा -" मुर्ख पतिदेव ! कायर ! शिखंडी !" और भी न जाने कितनी गलियां उसने मुझे सुना दी | उसने मुझे ललकारा -" बहुत युग बाद तत्व ज्ञानी बना है ! आज से ढाई हजार वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध और महावीर ने तुझे समझाया था तब तू क्यों नहीं चुप रहा ? सैकडो ऋषि और मुनियों ने तुझे अहिंसा का उपदेश दिया था उस समय तुने अपनी तलवार को म्यान में क्यों नहीं डाला था ? कितने साहित्यकारों और कवियों ने तुझे काव्यमयी भाषा में समझाया ! उस समय तेरी अक्ल क्या घास चरणे गयी थी जो आज तत्वद्रष्टा का स्वांग बनाकर ज्ञान झाड़ रहा है ? मै तेरी नारी हूँ ,माँ हूँ ,पुत्री और भगिनी हूँ तेरी इज्जत और आबरू हूँ ,तेरे घर की शोभा और सुख हूँ |
तेरा तत्वज्ञान वेश्याओं के कोठे पर सुना ,क्योंकि सरे बाजार में उन्ही के सतीत्व का बंटवारा हुआ करता है | मै साध्वी हूँ ! पीढियों से तेरे कुल की कुलवधू हूँ
" निवीर्य ! यदि रूप के बाजार में ही बैठाना था तो दूल्हा बनकर तुम और तुम्हारे पूर्वजों ने मेरा पाणिग्रहण ही क्यों किया था ? और पाणिग्रहण ही किया था तो वही पाणी आज एक पर पुरुष पकड़ रहा है ! अब तो कदम बढा,एक कदम तो आगे आ |"
किन्तु मेरे कदम दृश्यपटल पर अडिग खड़े थे |
उसके ललाट पर एक बड़ी-सी सिंदूरी लाल बिंदी थी ,जिसे आँचल से पोंछते हुए उसने कहा -" यह तो पूर्वजों की खून की बिंदी थी |" उसने अपनी मांग बताई , वह भी वैसे ही लाल रंग की थी | कहा -यह भी तो तेरे पूर्वजों का खून था जिससे मैंने अपनी मांग भरी थी |
अपने ही पतियों को मारकर उन्ही के खून से मांग भर कर मै सुहागिन रहा करती थी और शायद असंख्य पतियों की हत्या का पाप ही है जिसके प्रायश्चित में मै आज यह फल भोग रही हूँ | अफ़सोस तो यह है कि उनमे से एक भी मैंने जिन्दा नहीं छोडा,अन्यथा अपने ही हाथों मै अपनी मांग नहीं पोंछती | मुझे क्या मालूम था कि मेरी सासुओं की कोख किसी दिन इस प्रकार दगा दे जायेगी !
उसने यह कहते हुए मांग का खून भी पोंछ लिया पर मेरा खून तो शून्य बिंदु की शीतलता तक जमा हुआ था , जमा हुआ ही रहा |
मैंने देखा ,उस दुष्ट दुर्योधन ने निर्लज्जतापूर्वक अपना हाथ बढा कर उस रमणी को आबद्ध कर बलपूर्वक अपनी जांघ पर बैठा लिया | बाण लगी हुई हिरणी के समान धरती ने एक कातर चीत्कार की | यदि क्षीरसागर की नागश्य्या पर नारायण उस समय सोये न होते तो धरती की ऐसी करुणोत्पादक व्यथा से व्याकुल होकर सुदर्शन चक्र ले नंगे पैरों उसकी सहायता के लिए दौडे आते | धरती ने करुण रुदन किया | पहाडों को पिघलाने वाली और नदियों को सुन्न करने वाली उसकी एक हिचकी मेरे रोम रोम में वेदना के बांध तोड़ रही थी परन्तु दृश्यपटल पर खड़ी मेरी तस्वीर हिली भी नहीं | अकस्मात डूबते हुए गजराज ने अपनी सूंड से एक कमल पुष्प को तोड़कर भगवान की सहायता मांगी थी और उस धरती ने भी उसी प्रकार कमल के स्थान पर अपने हाथ को उठाकर चूडा दिखाया ; सिर्फ इतना ही कहा - यह तेरा पहनाया हुआ है |"
छ्नकता हुआ चूडा मेरी और चुनौती दे रहा था | मौन होकर भी उसने मुझे बहुत कुछ कह दिया ,फिर भी मै चुप खडा रहा |
अंत में उस दुर्योधन ने धरती के अधोवस्त्र का स्पर्श कर लिया | धरती जो अभी तक द्रोपदी बनी हुई थी सहसा क्रोध और अपमान की उत्तेजना से कालिका सी दिखाई देने लगी | छविगृह के सभी दर्शकों में कुहराम मच गया | आने वाले दृश्य को न देखने के लिए मैंने आँखे बंद करली तब मुझे उस मेदिनी का कंठस्वर सुनाई दिया ,- देखते क्या हो ? इस वस्त्र का भी अपहरण कर मेरे इस बेशर्म पतिदेव को दे दो ताकि यह इसे पहन ले ! मै तो इसे मर्द समझकर सधवा होने के भ्रम में थी पर यह तो जनाना ही नहीं ,नामर्द है |"
रील टूट गयी | छविगृह प्रकाश से जगमगा उठा | मेरे पास बैठा व्यक्ति मुझसे पूछने लगा -" भाई साहब ! क्या आप बता सकते है ,-यह कौन था जो भूमि का स्वामी बना हुआ चित्रपट पर आया था ? मै उसको परिचय नहीं बता सका | मैंने सावधानी से अपना मुंह उसकी और से फिर लिया ताकि वह मुझे पहचान कर भंडाफोड़ न कर दे कि कलाकार साहब यहीं बैठे है मैंने उसके प्रश्न का उत्तर मुंह घुमाये ही दिया -" नाम तो नहीं जानता पर शायद यह भी एक क्षत्रिय था |"
पडौसी दर्शक ने भोंहे ऊँची उठाकर आश्चर्य से कहा -" अच्छा !"
प्रकाश फिर बुझ गया ,लोगों की नजरे फिर दृश्यपट की और घूम गयी | मैंने भी छुटकारे की सांस ली |
चित्रपट चल रहा था और दृश्य बदलते जा रहे थे | ;;
11/06/2009 06:00:00 AM
Ratan Singh Shekhawat
कई बार कई बुजुर्ग व्यक्ति अपनी मृत्यु से सम्बंधित ऐसी बाते कहते है जिससे लगता है कि उन्हें अपनी मृत्यु के समय का पूर्वाभास हो गया है लेकिन उनकी बातों पर ये समझकर कि बुढापे की बिमारियों या सठिया जाने की वजह से ये ऐसा कह रहे है उनकी बाते परिजन अनसुनी कर देते है लेकिन जब उस व्यक्ति की मौत होती है और उसके द्वारा कही गयी बाते सत्य निकलती है तब चर्चा चलती है कि फलां व्यक्ति को अपनी मौत का पूर्वाभास हो गया था लेकिन इस बात पर परिजनों के अलावा जो व्यक्ति वहां मौजूद होते है वे तो सच मानते है लेकिन सुनने वाले इस बात को अपने परिजन को महिमा मंडित करने की चाल बताकर खारिज कर देते है | इसी तरह की एक घटना का जिक्र मै यहाँ कर रहा हूँ जो कभी कभी मुझे सोचने पर मजबूर कर देती है कि कुछ लोगो को क्या मृत्यु के समय का पूर्वाभास हो जाता है ?
७ जून २००० को सायं ८ बजे मै अपने एक मित्र दातार सिंह जी के साथ बैठा था और चर्चा चल रही थी उनके वृद्ध पिताजी के स्वास्थ्य की | उनके पिताजी बीमार थे दातार जी दो तीन दिन पहले ही उन्हें संभालकर गांव से आये थे और बता रहे थे कि गांव से पिताजी की मृत्यु का समाचार कभी भी आ सकता है इतने में ही उनके मोबाइल की घंटी बज उठी फोन उनके गांव से ही था फोन करने वाला उनका परिजन बता रहा था कि आपके पिताजी का आज रात निकलना भी मुश्किल लग रहा है वे आज दिन भर एक बात कर रहे है मुझे अगले मुकाम जाना है इसलिए मेरे पुत्र को बुला दीजिए ताकि मै उससे मिलकर बेफिक्र होकर जा सकूँ | इसलिए आप अभी बस पकड़ कर गांव के लिए रवाना हो जाईये |
समाचार मिलते ही मैंने दातार जी को बदरपुर बॉर्डर तक ले जाकर धोला कुवां के लिए ऑटो रिक्शा पकडवा दिया ताकि वे वहां से लाडनू के पास हुडास नामक अपने गांव जाने वाली रात्री बस पकड़ कर घर पहुँच सके | दुसरे दिन उनके घर पहुँचते ही उनके स्व.पिताजी श्री नारायण सिंह जी ने एक एक कर सभी ग्रामवासियों को बुलाना शुरू कर दिया ताकि वे उनसे अपने जीवन की आखिरी मुलाकात कर सके | मिलने आने वाले लोगो में बहुत सारे लोग वही रुक गए वैसे भी गांव में जब कोई बीमार होता है तो उसके पास गांव वासियों का जमघट लग जाता है पता नहीं कब किसकी कैसे जरुरत पड़ जाए इसलिए लोग वही रुक जाते है | नारायण सिंह जी रुके लोगों से बाते करते रहे और कहते रहे कि आज उन्हें अगले मुकाम जाना ही है थोडी धुप कम हो जाये तब जाऊँगा इसलिए किसी को कोई काम है वो कर आओ तीन बजे तक जरुर वापस आ जाना | आखिर तीन भी बज गए तीन बजते ही उन्होंने अपने सभी भाइयों व प्रतिष्ठित गांव वासियों को अपने पास बुला लिया और उन्हें कहने लगे - ये मेरा पुत्र दातार अब अकेला रह जायेगा इसलिए मुझे वचन दो हमेशा इसका साथ निभावोगे | मेरी आपसे यही विनती है आप इसका हर सुख दुःख में साथ दे | भाईयों व ग्रामीणों द्वारा उनके पुत्र को साथ देने का वायदा करने के बाद संतुष्ट हो नारायण सिंह जी ने अपनी कमीज पहनी , जेब में चेक किया कि कितने पैसे है उनमे से कुछ यह कहकर रख लिए कि शायद रास्ते में कही इनकी जरुरत पड़ जाये बाकी पैसे उन्होंने वहां उपस्थित छोटे बच्चो में बाँट दिए और यह कहकर उठने लगे कि अब समय हो गया है इजाजत दीजिए ताकि में अगले मुकाम की अपनी यात्रा शुरू कर सकूँ और ऐसा कह कर उठते समय वे पूरा उठ ही नहीं पाए कि उनके प्राण पखेरू उसी वक्त उड़ गए |
11/04/2009 02:22:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
दीपावली पर लोगो को घरों पर रंग रोगन करते व साज सज्जा करते देख अपने ब्लॉग की साज सज्जा करने का विचार पैदा हुआ और उसी के चलते ज्ञान दर्पण का टेम्पलेट बदल डाला लेकिन जो नया टेम्पलेट लगाया वह देखने में तो खुबसूरत था पर उसमे वह कोड नहीं था जिसके नीचे हिंदी ब्लॉग टिप्स वाले आशीष जी का रिलेटेड पोस्ट वाले विजेट का कोड लगाया जाना था परिणाम स्वरूप ज्ञान दर्पण पर यह रिलेटेड पोस्ट वाला विजेट नहीं लग पाया | और इसका नतीजा यह निकला कि ज्ञान दर्पण पर जो पाठको आये वे उस विषय से सम्बंधित दुसरे लेख नहीं पढ़ पाए और उस विजेट की वजह से जो यातायात बढा था वह अचानक २०% से ज्यादा गिर गया और पेज व्यू कम होने से ब्लॉग अलेक्सा रेंक में भी पिछड़ गया | हालाँकि इस दरमियान ब्लॉग पर आने वाले पाठको की संख्या में कोई कमी नहीं आई परन्तु पाठक जो लेख किसी सर्च या एग्रीगेटर से पढने आये वे सिर्फ उसी लेख को पढ़कर चलते बने जबकि आशीष जी के रिलेटेड पोस्ट वाले विजेट की बदौलत उस पोस्ट के नीचे उससे सम्बंधित सभी लेबल वाले लेखो की सूचि उपलब्ध रहती है जिस पर नजर पड़ते ही पाठक अपनी रूचिनुसार उन्हें भी पढता है और इस तरह एक पाठक द्वारा कई लेख पढने से ब्लॉग यातायात के पेज व्यू बढ़ जाते है इसी तरह ये विजेट ब्लॉग पर यातायात बढाने में सहायक का कार्य करते है | मेरी पिछली पोस्ट विबिया टूलबार बढ़ावा दे आपके ब्लॉग को पर ज्ञान दत्त जी ने टिप्पणी में लिखा कि लिंकविदीन विजेट ने उनके ब्लॉग पर ८% यातायात बढाया है लिंकविदीन विजेट भी पोस्ट के नीचे कोई भी पॉँच पोस्ट दिखता है |
ज्ञान दर्पण पर आशीष जी के रिलेटेड पोस्ट विजेट की बदौलत बढा यातायात और फिर बिना उस विजेट के गिरा २०% गिरा यातायात और लिंकविदीन विजेट से ज्ञान दत्त जी के ब्लॉग पर बढा ८% यातायात इन विजेट्स की महत्ता का प्रमाण है |
आशीष जी को आज एक फिर रिलेटेड पोस्ट विजेट बनाने के लिए हार्दिक धन्यवाद |:;
11/03/2009 05:45:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
11/02/2009 10:06:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
ये चाँद आज फिर निकला है यु सज धज के
मुहबत का जिक्र हो शायद हाथो की लकीरों मे
याद दिलाता है मुझे एक अनजान राही की
याद दिलाता है उन मुहबत भरी बातो की
टूट कर चाहा इक रात दिल ने एक बेगाने को
कबूल कर लिया था उसकी रस भरी बातो को
वोह पास हो कर भी दूर है मुझ से
दूर होकर भी कितने करीब है दिल के
उनको देखने के लिये ये नैन कितने प्यासे थे
उनको देखने की चाह मे हम दूर तक गए थे
डूब जाते है चश्मे नाज़ मे उनका कहना था
जिंदगी कर दी हमारे नाम उनका ये दावा था
आज चाँद फिर निकला बन ठन कर
चांदनी का नूर छलका हो यु ज़मीं पर
याद आयी नाखुदा आज फिर शब्-ए-गम की
मदभरी,मदहोश,रिश्ता-ए-उल्फ़ते,शबे दराज की
नैनो मे खो गए थे नैन कुछ ऐसे उस रात
छु लिया यूँ करीब हो कर खुल गया हर राज़
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आज पूरण माशी का चाँद फिर निकला
सवाल करता है आपसे आज दिल मेरा
मेरे चाँद
तोड़ कर खिलोनो की तरह यह दिल
किसके सहारे छोड़ देते हो यह दिल
अगर वायदे निभा नहीं सकते थे तुम
जिंदगी का सफ़र न कर सकते थे तुम
कियों आवाज दी इस मासूम दिल को
कियों कर दस्तक देते हो इस दिल को
मत खेलो इस दिल से मेरे हजूर
मत छीनो मेरी आँखों का नूर
हमारा तो पहला पहला प्यार है
आँखों मे तुम्हारा ही खुमार है
हर रोज तुम्हारा ही इंतजार है
दिन रात दिल रोये जार जार है
या तो हमें सफ़र मे साथ लेलो
या फिर अपनी तरह
हमें भी खुद को भुलाना सीखा दो
जीना सिखा दो मरना सिखा दो
अभी तो ज़िन्दगी एक इल्जाम है
बिन तुम्हारे सुनी दुनिया
हमारा तो संसार ही बेजार है
कमलेश चौहान द्वारा लिखित
all rights reserved with Kamlesh Chauhan none of the lines and words are allowed to manipulate and changed. Thanks
11/01/2009 10:40:00 AM
Ratan Singh Shekhawat