अब घर में ही घोटो और पीवो

गांव के बाहर एक बाबा जी का आश्रम था बाबा जी भांग का नशा करते थे अतः आश्रम में नित्य भांग घोटने का कार्य होता रहता था | गांव के कुछ निट्ठले युवक भी भांग का स्वाद चखने के चलते रोज बाबा जी के पास चले आया करते थे | इनमे से कुछ युवक भांग का नित्य सेवन करने के कारण भांग के नशे के आदि हो चुके थे अतः वे रोज भांग पीने के चक्कर में बाबा जी के आश्रम पर पहुँच ही जाते फलस्वरूप बाबा जी का भांग का खर्च बढ़ गया जिसे कम करने के लिए बाबा जी ने निश्चय कर लिया था |
एक दिन उनका एक एसा चेला जीवा राम जो भांग के नशे का आदि हो चूका था हमेशा की तरह आश्रम पहुंचा | आश्रम का दरवाजा बंद देख जीवा ने बाबा जी को आवाज लगाई |
जीवा :- बाबा जी ! बाबा जी !! दरवाजा खोलिए |
बाबा जी :- अरे कौन ?
जीवा :- बाबा जी ! मै जीवो !
बाबाजी :- बेटा ! अब घर में ही घोटो और पीवो |

मुफ्त का माल समझ सेवन करने वाले ऐसे ही आदि हो जाते है अतः मुफ्त के माल का सेवन करने में भी मितव्यता बरतनी चाहिए |




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Comments :

13 comments to “अब घर में ही घोटो और पीवो”
M VERMA said...
on 

सही है कब तक मुफ्त का माल उडाने देते

काजल कुमार Kajal Kumar said...
on 

:)

धीरेन्द्र गोदारा said...
on 

wahh bahut achha Ratan Singh Ji.

रतनसिंह जी आपने जाटों की दुखती हुई रग पर हाथ रखा है। जाट आज की तारीख में शिक्षा के क्षेत्र में बहुत आगे हैं, लेकिन ऐसी शिक्षा किस काम की, जो संस्कार विहीन हो। अगर आप साक्षर हैं, पढ़े-लिखे हैं, तो आप अपना, अपने परिवार का और अपने समाज का अच्छा या बुरा समझ सकते हैं। लेकिन.... (log on - http://jujharujat.blogspot.com/2009/11/blog-post.html?showComment=1258273714154#c7864400390827945270

राज भाटिय़ा said...
on 

बहुत सुंदर जी....

कुन्नू सिंह said...
on 

बिलकूल सही, अपनी मेहनत से खरीदा समान ही हमारे लिये बहुत मुल्यवान होता है और मुफ्त मे मिलने वाले समान कि किमत ना लेने वाला करता है और ना ही देने वाला।

Udan Tashtari said...
on 

हा हा!! बाबा जी तो शायर हो गये!! :)

dhiru singh {धीरू सिंह} said...
on 

लत तो लग ही गई क्या घर क्या बाहर . नशा ऎसे ही फ़ैलाया जाता है . पहले फ़्री फ़िर ....

ताऊ रामपुरिया said...
on 

बेटा ! अब घर में ही घोटो और पीवो |

बहुत जोरदार.:)

रामराम.

ललित शर्मा said...
on 

रतन सिग जी, जब आपकी पोस्ट आई थी तो घोटणे लगे थे(नेट बंद) अब जाके माल तैयार हुआ है, आओ पधारो पहली धार की है-स्वागत है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...
on 

बहुत बढ़िया!
जब माल-पानी खत्म हो जायेगा तो बात करेंगे!

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...
on 

रोचक और मजेदार जवाब दिया बाबाजी ने। लेकिन जीवो वापस कत्तई नहीं गया होगा। नशा कैसा जो छूट जाय..? :)

रंजन said...
on 

मुफ्त का चंदन घिसो मेरे नंदन.. पर कब तक..

Rambabu Singh said...
on 

बहुत जोरदार.:)

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