Jun 5, 2009

क्रांतिकारी कवि केसरी सिंह बारहट



मानव जीवन में जिन लोगों ने समाज और राष्ट्र की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित किया ऐसे बिरले पुरुषों का नाम ही इतिहास या लोगो के मन में अमर रहता है | सूरमाओं,सतियों,और संतो की भूमि राजस्थान में एक ऐसे ही क्रांतिकारी,त्यागी और विलक्षण पुरुष हुए कवि केसरी सिंह बारहट | जिनका जन्म २१ नवम्बर १८७२ में चारण जाति के श्री कृष्ण सिंह बारहट के घर उनकी जागीर के गांव देवपुरा रियासत शाहपुरा में हुआ | केसरी सिंह की एक माह की आयु में ही उनकी माता का निधन हो गया अतः उनका लालन-पालन उनकी दादी माँ ने किया | उनकी शिक्षा उदयपुर में हुई | उन्होंने बंगला,मराठी,गुजराती आदि भाषाओँ के साथ इतिहास,दर्शन (भारतीय और यूरोपीय) मनोविज्ञान,खगोल शास्त्र,ज्योतिष का अध्ययन कर प्रमाणिक विद्वता हासिल की | डिंगल- पिंगल भाषा की काव्य सृजना तो उनके जन्म जात संस्कारों में शामिल थी ही साथ ही बनारस से श्री गोपीनाथ जी नाम के पंडित को बुलाकर इन्हें संस्कृत भाषा की शिक्षा दिलवाई गई | केसरी सिंह के स्वध्याय के लिए उनके पिता कृष्ण सिंह का प्रसिद्ध पुस्तकालय " कृष्ण वाणी विलास " तो उपलब्ध था ही |
राजनीती में वे इटली के राष्ट्रपिता मैजिनी को अपना गुरु मानते थे | मैजिनी की जीवनी वीर सावरकर ने लन्दन में पढ़ते समय मराठी में लिखकर गुप्त रूप से लोकमान्य तिलक को भेजी थी क्योंकि उस समय मैजिनी की जीवनी पुस्तक पर ब्रिटिश साम्राज्य ने पाबन्दी लगा रखी थी | केसरी सिंह जी ने इस मराठी पुस्तक का हिंदी अनुवाद किया था |
शिक्षा प्रसार हेतु योजनाएं :-
केसरी सिंह जी ने समाज खास कर क्षत्रिय जाति को अशिक्षा के अंधकार से निकालने हेतु कई नई-नई योजनाएं बनाई ताकि राजस्थान भी शिक्षा के क्षेत्र में दुसरे प्रान्तों की बराबरी कर सके | उस समय राजस्थान के अजमेर में मेयो कालेज में राजाओं और राजकुमारों के लिए अंग्रेजों ने ऐसी शिक्षा प्रणाली लागु कर रखी थी जिसमे ढल कर वे अपनी प्रजा और देश से कट कर अलग-थलग पड़ जाए | इसीलिय सन १९०४ में नेशनल कालेज कलकत्ता की तरह जिसके प्रिंसिपल अरविन्द घोष थे अजमेर में क्षत्रिय कालेज स्थापित करने की योजना बनाई जिसमे जिसमे राष्ट्रिय भावना की शिक्षा दी जा सके | इस योजना में उनके साथ राजस्थान के कई प्रमुख बुद्धिजीवी साथ थे | इससे भी महत्वपूर्ण योजना राजस्थान के होनहार विद्यार्थियों को सस्ती तकनीकी शिक्षा के लिए सन १९०७-०८ में जापान भेजने की बनाई क्योकि उस सदी में जापान ही एक मात्र एसा देश था जो रूस और यूरोपीय शक्ति को टक्कर दे सकता था |अपनी योजना के प्रारूप के अंत में उन्होंने बड़े ही मार्मिक शब्दों में जापान का सहयोग करने के लिए आव्हान किया -
"जापान ही वर्तमान संसार के सुधरे हुए उन्नत देशों में हमारे लिए शिक्षार्थ आश्रणीय है ; हमारे साथ वह देश में देश मिलाकर (एशियाटिक बनकर) ,रंग में रंग मिलाकर, (यहाँ रंग से मतलब Racial Colours से है जैसे व्हाइट,रेड ब्लैक) दिल में दिल मिलाकर , अभेद रूप से , उदार भाव से, हमारे बुद्ध भगवान के धर्मदान की प्रत्युपकार बुद्धि से- मानव मात्र की हित-कामना-जन्य निस्वार्थ प्रेमवृति से सब प्रकार की उच्चतर महत्वपूर्ण शिक्षा सस्ती से सस्ती देने के लिए सम्मान पूर्वक आव्हान करता है |"
इस स्कीम में उन्होंने ऐसे नवीन विचार पेश किये जो उस समय सोच से बहुत आगे थे कि अब जमाना " यथा राजा तथा प्रजा " का न होकर "यथा प्रजा तथा राजा" का है |

शिक्षा के माध्यम से केसरी सिंह जी ने सुप्त क्षात्रधर्म को जागृत करने हेतु क्षत्रिय और चारण जाति को सुशिक्षित और सुसंगठित कर उनके वंशानुगत गुणों को सुसंस्कृत कर देश को स्वत्तन्त्रता दिलाने का एक भगीरथ प्रयत्न प्रारंभ किया था | इनकी इस योजना में सामाजिक और राजनैतिक क्रांति के बीज थे | केसरी सिंह ने इस विस्तृत योजना में क्षात्र शिक्षा परिषद् और छात्रावास आदि कायम कर मौलिक शिक्षा देने की योजना बनाई और सन १९११-१२ में "क्षत्रिय जाति की सेवा में अपील " निकाली | यह अपील इतनी मार्मिक थी कि बंगाल के देशभक्त विद्वानों ने कहा कि यह अपील सिर्फ क्षत्रिय जाति के लिए ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतीय जाति के नाम निकालनी चाहिए थी |
अक्षर के स्वरूप पर शोध कार्य
शिक्षा के प्रसार के साथ ही वैज्ञानिक खोज का एक बिलकुल नया विषय केसरी सिंह जी ने सन १९०३ में ही " अक्षर स्वरुप री शोध " का कार्य आरम्भ किया | कुछ वर्ष पहले इस प्रारम्भिक शोध के विषय पर केसरी सिंह जी के एक निकट सम्बन्धी फतह सिंह मानव ने राजस्थान विश्वविद्यालय के फिजिक्स के विभागाध्यक्ष से बात करी तो उन्होंने बताया कि अमेरिका की एक कंपनी Bell Company ने लाखों डालर अक्षर के स्वरूप की शोध में खर्च कर दिए लेकिन सफलता नहीं मिली | उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि राजस्थान जैसे पिछडे प्रदेश में और उसमे भी शाहपुरा जैसी छोटी रियासत में रहने वाले व्यक्ति के दिमाग में अक्षर के स्वरूप की शोध की बात कैसे आई |
शस्त्र क्रांति के माध्यम से देश की स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रयास :
उन्नीसवी शताब्दी के प्रथम दशक में ही युवा केसरी सिंह का पक्का विश्वास इसी सिद्धांत पर था कि आजादी सशस्त्र क्रांति के माध्यम से ही संभव है | अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के ज्ञापनों से आजादी नहीं मिल सकती | सन १९०३ में वायसराय लार्ड कर्जन द्वारा आहूत दिल्ली दरबार में शामिल होने से रोकने के लिए उन्होंने उदयपुर के महाराणा फतह सिंह को संबोधित करते हुए " चेतावनी रा चुंगटिया " नामक सौरठे लिखे जो उनकी अंग्रेजो के विरूद्व भावना की स्पष्ट अभिव्यक्ति थी | सशस्त्र क्रांति की तैयारी के लिए प्रथम विश्व युद्ध (१९१४) के प्रारम्भ में ही वे इस कार्य में जुट गए और अपने दो रिवाल्वर क्रांतिकारियों को दिए और कारतूसों का एक पार्सल बनारस के क्रांतिकारियों को भेजा व रियासती और ब्रिटिश सेना के सैनिको से संपर्क किया | एक गुप्त रिपोर्ट में अंग्रेज सरकार ने कहा कि केसरी सिंह राजपूत रेजिमेंट से संपर्क करना चाह रहा था |
उनका संपर्क बंगाल के विप्लव दल से भी था और वे श्री अरविन्द से बहुत पहले १९०३ में ही मिल चुके थे तथा महान क्रान्तिकारी रास बिहारी बोस व शचीन्द्र नाथ शान्याल,ग़दर पार्टी के लाला हरदयाल और दिल्ली के क्रान्तिकारी मास्टर अमीरचंद व अवध बिहारी से घनिष्ठ सम्बन्ध थे | ब्रिटिश सरकार की गुप्त रिपोर्टों में राजपुताना में विप्लव फैलाने के लिए केसरी सिंह बारहट व अर्जुन लाल सेठी को खास जिम्मेदार माना गया |
राजद्रोह का मुकदमा :
केसरी सिंह पर ब्रिटिश सरकार ने प्यारे लाल नाम के एक साधू की हत्या और अंग्रेज हकुमत के खिलाफ बगावत व केन्द्रीय सरकार का तख्ता पलट व ब्रिटिश सैनिकों की स्वामिभक्ति खंडित करने के षड़यंत्र रचने का संगीन आरोप लगाकर मुकदमा चलाया गया | इसकी जाँच के लिए मि. आर्मस्ट्रांग आई.पी.आई. जी. इंदौर को सौंपी गई जिसने २ मार्च १९१४ को शाहपुरा पहुँच शाहपुरा के राजा नाहर सिंह के सहयोग से केसरी सिंह को गिरफ्तार कर लिया | इस मुकदमे में स्पेशल जज ने केसरी सिंह को २० वर्ष की सख्त आजन्म सजा सुनाई और राजस्थान से दूर हजारी बाग़ केन्द्रीय जेल बिहार भेज दिया गया | जेल में उन्हें पहले चक्की पिसने का कार्य सौपा गया जहाँ वे दाल व अनाज के दानो से क ख ग आदि अक्षर बना कर अनपढ़ कैदियों को अक्षर ज्ञान देते और अनाज के दानो से ही जमीन पर भारत का नक्शा बना कर कैदियों को देश के प्रान्तों का ज्ञान कराते थे | केसरी सिंह का नाम उस समय कितना प्रसिद्ध था उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस समय श्रेष्ठ नेता लोकमान्य तिलक ने अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन में केसरी सिंह को जेल से छुडाने का प्रस्ताव पेश किया था |
जेल से छूटने के बाद :
हजारी बाग़ जेल से छूटने के बाद अप्रेल १९२० में केसरी सिंह ने राजपुताना के एजेंट गवर्नर जनरल (आबू ) को एक बहुत सारगर्भित पत्र लिखा जिसमे राजस्थान और भारत की रियासतों में उतरदायी शासन पद्धति कायम करने के लिए सूत्र रूप से योजना पेश की | इसमें "राजस्थान महासभा" के गठन का सुझाव था जिसमे दो सदन (प्रथम) भूस्वामी प्रतिनिधि मंडल (जिसमे छोटे बड़े उमराव,जागीरदार) और "द्वितीय सदन" सार्वजनिक प्रतिनिधि परिषद् (जिसमे श्रमजीवी,कृषक,व्यापारी ) का प्रस्ताव था | महासभा के अन्य उद्देश्यों के साथ एक उद्देश्य यह भी था :-
"राज्य में धार्मिक,सामाजिक,नैतिक,आर्थिक,मानसिक,शारीरिक और लोक हितकारी शक्तियों के विकास के लिए सर्वांगीण चेष्ठा करना |" इस पत्र में उनके विचार कितने मौलिक थे उसका अंदाज उनके कुछ वाक्यांशों को पढने से लगता है , " प्रजा केवल पैसा ढालने की प्यारी मशीन है और शासन उन पैसों को उठा लेने का यंत्र " ....... शासन शैली ना पुरानी ही रही ना नवीन बनी , न वैसी एकाधिपथ्य सत्ता ही रही न पूरी ब्यूरोक्रेसी ही बनी | ........ अग्नि को चादर से ढकना भ्रम है -खेल है- या छल है मेरी यही शाक्षी देती है | जिस ज़माने में ब्रिटिश सत्ता को कोई खास चुनौती नहीं थी और रियासतों में नरेशों का एक छत्र शासन था उस समय सन १९२०-२१ में उनके विचारों में प्रजा की शक्ति का कितना महत्व था कि उन्होंने रियासतों के राजाओं के लिए लिखा - " भारतीय जन शक्ति के अतिरिक्त भारत में और कोई समर्थ नहीं,अतः उससे सम्बन्ध तोड़ना आवश्यक नहीं" |
उत्तर जीवन :
सन १९२०-२१ में सेठ जमनालाल बजाज द्वारा आमंत्रित करने पर केसरी सिंह जी सपरिवार वर्धा चले गए | जहाँ विजय सिंह पथिक जैसे जन सेवक पहले से ही मौजूद थे | वर्धा में उनके नाम से " राजस्थान केसरी " साप्ताहिक शुरू किया गया जिसके संपादक विजय सिंह पथिक थे | वर्धा में ही केसरी सिंह का महात्मा गाँधी से घनिष्ठ संपर्क हुआ | उनके मित्रो में डा.भगवानदास (पहले भारत रत्न) ,राजर्षि बाबू पुरुषोतम दास टंडन,गणेश शंकर विद्यार्थी , चंद्रधर शर्मा , माखनलाल चतुर्वेदी राव गोपाल सिंह खरवा ,अर्जुनलाल सेठी जैसे स्वतंत्रता के पुजारी शामिल थे |
देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ होम कर देने वाले क्रान्तिकारी कवि केसरी सिंह ने १४ अगस्त १९४१ को " हरी ॐ तत् सत् " के उच्चारण के साथ अंतिम साँस ली |
महाराणा फतह सिंह को दिल्ली दरबार में जाने से रोकने के लिए रचे सौरठे "चेतावनी रा चुंगटिया " और लार्ड कर्जन की कोटा यात्रा के समय कोटा के राजकीय कवि की हैसियत से कर्जन को भेंट (द्विअर्थी )लघु काव्य "कुसुमांजलि" के बारे में चर्चा अगले लेख में |

पिछली गांव यात्रा के दौरान केसरी सिंह जी के बारे में जानकारी मांगने पर आदरणीय श्री सोभाग्य सिंह जी ने अपनी वर्द्धावस्था के बावजूद जागती जोत मासिक पत्रिका का नवम्बर १९९६ का अंक ढूंढ़ कर मुझे दिया | इस अंक में केसरी सिंह जी के जीवन पर फतह सिंह मानव जो केसरी सिंह जी निकट रिश्तेदार है (शायद दामाद ) के द्वारा राजस्थानी भाषा में काफी लम्बा आलेख छपा था जिसे मैंने हिंदी में अनुवाद कर संक्षिप्त रूप से यहाँ पेश किया है |






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19 comments:

  1. क्रांतिकारी कवि केसरी सिंह बारहट के बारे में अच्छी जानकारी .

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  2. अच्छा आलेख है। लेकिन भारत की आजादी और आजादी के बाद की व्यवस्था के बारे में उन के विचार इस में सम्मिलित नहीं हैं। जिस से यह पता लगता कि वे आजादी के बाद देश को कैसा देखना चाहते थे? यदि वह होता तो आलेख सोने में सुहागा हो जाता।

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    1. जी सही बात कही आपने

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    2. जी ऐसे तेजस्वि वीरो के विचार जानने के लिए हम हमेशा उत्सुक है

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  3. केसरी जी जैसे प्रेरक व्‍यक्तित्‍व से परिचित कराने के लिए हार्दिक आभार।

    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  4. बहुत आभार आपका इस विस्तृत परिचय के लिये.

    रामराम.

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  5. अभी तक तो केवल नाम ही पढा था आज उनके बारे मे विस्तार से पढने को मिला है । इसके लिये आभार ।

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  6. क्रांतिकारी कवि केसरी सिंह बारहट जी के बारे जान कर, पढ कर बहुत अच्छा लगा, आप का धन्यवाद

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  7. क्रांतिकारी कवि केसरी सिंह बारहट के बारे में अच्छी जानकारी

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  8. rajputi mp3 song ki list uplabdh kravo sa

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  9. RAJASTHANI RAJPUTO KI VIRTA KI ACHCHHI JANKARI MILI HE.

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  10. sir aap bahut achha kam kar rahe hai...really...hame apni history aur virasat ko sambhalna hai.

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  11. sir aap bahut achha kam karahe ho.....

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  12. good knowledge and great informations..sadhuwad

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  13. Bhaiya me bhi ek Parewar se hou, meri maa ek ajad hind foje Ke Bathi hai. Gesne Aaj bhhi hame samaj samene nehi aane dati, Jasa Dada ne keya tha?

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  14. Startling. The author is doing marvelous work in the field of history specially Rajput history and bringing out gems from the mines in simple and touching language. Salute.

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  15. Thankyou for this detailed and inspirational description of kesri sing ji.

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