जयपुर जिले में जोबनेर से लगभग 7 कि.मी. पहले कालख का किला विद्यमान है। जयपुर रियासत के अन्तर्गत कालख कछवाहों की खंगारोत शाखा का ताजीमी ठिकाना था । कालख के खंगारोत नरायणा के पराक्रमी शासक तथा मुगल मनसबदार भोजराज की वंश परम्परा में हैं। कालख के ठाकुर जोरावरसिंह जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह के विश्वस्त सामंतों में से थे। परवर्ती शासकों के समय उन्होंने मरहठों से अनेक लड़ाइयों में भाग लिया था । सवाई प्रतापसिंह के शासनकाल में कालख के खंगारोतों की जयपुर राज्य से अनबन हो गयी, जिसके परिणामस्वरूप दीवान दौलतराम हल्दिया ने एक शक्तिशाली सेना के साथ कालख के किले पर घेरा डाल दिया जो कई दिनों तक चला। कालख के ठाकुर बैरीसालसिंह अपने अनेक योद्धाओं सहित वीरगति को प्राप्त हुए। परन्तु कालख की इस लड़ाई में वि.सं. 1850 (1795 ई.) में जयपुर के दीवान दौलतराम हल्दिया की किले के ऊपर से दागी गयी तोप का गोला लगने से मृत्यु हो गयी । कालख बाँध के किनारे दौलतराम हल्दिया की स्मारक छतरी विद्यमान है । खंगारोतों को कालख की एवज में खंडेल दे दिया गया, परन्तु वे इससे संतुष्ट नहीं हुए।
एक ऊँची और खड़ी पहाड़ी पर बना कालख का किला दुर्जेय दुर्ग माना जाता था। इस किले की स्थापत्य की प्रमुख विशेषता यह है कि किले को विशालकाय बुर्जों को परस्पर जोड़कर रक्षा-व्यवस्था को सुदृढ़ किया गया है। कालख का किला सुदृढ़ बुर्जों का समूह है जिसमें प्राचीर नहीं है।
कालख का किला एक सैन्य दुर्ग है जिसमें सामरिक सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा गया है। किले के भीतर सैनिकों के आवासगृह और पानी का टांका भी विद्यमान है। कालख के किले के विषय में नाथावतों के इतिहास का उल्लेख दृष्टव्य है- " जयपुर राज्य में कालख का किला विख्यात है । वह एक सीधे पर्वत की चोटी पर बनाया गया है। उसमें शत्रु का प्रवेश सहज ही नहीं होता है। उसकी चाँद बुर्ज अपना अलग महत्त्व रखती है। किले के समीप पहाड़ जैसा एक टीबा है जो 'नान्ही डूंगरी' या 'बागड़ों के बास' नाम से विख्यात है। "
विक्रम संवत् 1897-98 (नवम्बर, 1840 ई.) में खंडेल के ठाकुर किशनसिंह खंगारोत ने मेघसिंह डिग्गी और कुछ अन्य सामंतों की सहायता से कालख के किले पर आक्रमण किया तथा दुर्गरक्षक भैरूसिंह नाथावत और उसके सैनिकों को खदेड़कर कालख के किले पर अधिकार कर लिया।
विद्रोह की यह घटना महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय (नाबालिग शासक) के शासनकाल में हुई। जयपुर के तत्कालीन अंग्रेज एजेन्ट थर्सवी ने जयपुर की फौज, शेखावाटी की सेना और नाथावतों की सहायता से कालख पर चढ़ाई की। नाथावतों के इतिहास में उक्त प्रसंग का इस प्रकार उल्लेख है'—“उक्त लड़ाई में जयपुर की फौजों का डेरा नान्हा डूंगरी के पास था। मार्गशीर्ष बुदी 13 सोमवार को युद्ध आरम्भ हुआ। जंगी तोपों की सहायता से किले की दीवारों में छेद किये गये। ऊपर से दुर्गरक्षक बन्दूकों की बौछार कर रहे थे और नीचे जयपुर के सैनिक किले की दीवारें ढहा रहे थे। कालख की इस लड़ाई में खंडेल की ओर से 300 आदमी मारे गये तथा जयपुर की फौज का सेनापति मेजर फॉस्टर और उसका पुत्र कालख की लड़ाई में घायल हो गये। ठाकुर किशनसिंह को बंदी बना लिया गया, परन्तु उसने जयपुर पहुँचने से पहले ही कटार से आघात कर आत्महत्या कर ली। यह घटना 1814 ई. में घटित हुई । "
ठाकुर किशनसिंह खंडेल का यह विद्रोह अपने पैतृक ठिकाने कालख को फिर से पाने की स्वाभाविक अभिलाषा का परिणाम था ।
सन्दर्भ : राजस्थान के प्रमुख दुर्ग - लेखक - डॉ राघवेंद्र सिंह मनोहर
