अल्लाउदीन खिलजी द्वारा निष्काषित करने के बाद अन्हलवाड़ा के प्रसिद्ध बलहरा राजवंश के सोलंकी मध्य भारत में आ गए और उन्होंने टोंक, टोडा और बनास के आस-पास की धरती पर अधिकार कर लिया | इसी वंश में एक सुरतान सोलंकी थे, जो अपने भाई श्यामसिंह के साथ टोडा में रहते थे, इनसे लाल खां अफगान ने टोडा छीन लिया, तब ये लोग मेवाड़ के महाराणा के की शरण में चले गए | महाराणा ने सुरतान सोलंकी को बदनोर की जागीर दी | इस तरह सुरतान सोलंकी बदनोर के शासक बने |
सुरतान सोलंकी की पुत्री तारा रूपवती होने के साथ ही उच्चश्रेणी की राजपूत रमणी थी | अपने कुटुम्ब की वर्तमान पतित अवस्था के साथ अतीत कीर्ति के गौरव को सुन सुन कर उसे स्फूर्ति होती थी और उसके मन में उस प्राचीन को गौरव को पुन: स्थापित करने की इच्छा जागृत हो गई | इसी वजह से उसे स्त्रियों के गृहकार्य से घृणा हो गई और अपने राज्य का पुन: उद्दार करने की ठान ली, इसके लिए उसने घुड़सवारी और शस्त्र संचालन सीखा, उसने रणक्षेत्र में अश्व संचालन की विधि सीखी, तीर का लक्ष्य तो वह इतना अचूक साधती थी कि सरपट घोड़ा दौड़ाते हुए उसका चलाया हुआ तीर लक्ष्य पर सटीक लगता था | टोडा वापस लेने के लिए किये गए कई सैन्य अभियानों में उसने सक्रीय भाग लिया था |
तारा के रूप और बहादुरी सुनने के बाद कई राजकुमारों ने उससे विवाह की इच्छा प्रकट की, पर तारा ने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि जब तक वह अपने पैतृक राज्य टोडा का उद्दार नहीं कर देती तब शादी नहीं करेगी |
उस समय के यशस्वी योद्धा और मेवाड़ के राजकुमार पृथ्वीराज को जब तारा के इस प्रण का पता चला तो उन्होंने यह बीड़ा उठाया कि वह टोडा का उद्दार करेगा, अन्यथा वह सच्चा राजपूत नहीं" और इस मुद्दे पर अपने पिता की स्वीकृति लेकर टोडा के उद्दार के बाद तारा से विवाह करना स्वीकार किया |
अली के शहीद पुत्रों की बरसी का दिन इस आक्रमण के लिये चुना गया। पृथ्वीराज ने 500 चुने हुए वीर सवारों का एक रिसाला तैयार किया और अपनी स्त्री सुन्दरी तारा को, जिसको कीर्ति और संकट दोनों में अपने पति का साथ देने की हठ थी, साथ ले, वे ठीक उस समय टोड़ा पहुँचे जब कि शहीद भाइयों का ताजिया चौक के बीचो बीच रखा गया था। पृथ्वीराज, ताराबाई और उनका भक्त, कभी साथ न छोड़ने वाला, सेंगर सरदार, ये तीनों रिसाले को छोड़ जलूस में, जब कि वह उन झरोखों के नीचे से निकल रहा था जहां कि अफगान सरदार नीचे आने के लिये कपड़े बदल रहा था, मिल गये । ज्यों ही वह पूछने लगा कि भीड़ में ये अपरिचित सवार कौन हैं, पृथ्वीराज के भाले और उनकी वीरांगना के धनुष से छुटे हुए तीर ने उसे आंगन में गिरा दिया । भीड़ के इस भयप्रद हलचल से सचेत होने के पहले ही वे तीनों नगर द्वार पर जा पहुँचे । वहाँ उन्होंने देखा कि एक हाथी उन्हें बाहर जाने से रोकने को खड़ा है । ताराबाई ने तलवार से उसकी सूंड काट डाली और भगा दिया । और वे समीप खड़े हुए अपने रिसाले में जा मिले ।
अफगानों से मोर्चा लिया गया, परन्तु वे (अफगान) आक्रमण को सहन न कर सके और जो (अफगान ) नहीं भागे, वे मारे गये ।
इस प्रकार वीर पृथ्वीराज ने अपनी धर्मपत्नी के पिता को उनकी बापौती में ला बसाया । अफगान के एक भाई ने टोडा के पुनरुद्धार के प्रयत्न में अपने प्राण गमाये ।
अजमेर के तत्कालीन शासक नवाब मल्लूखां ने युवराज का सामना करने का विचार किया, परन्तु राजकुमार पृथ्वीराज ने स्वयं ही उस पर आक्रमण करने का निश्चय कर तीव्रगति से अजमेर की ओर कूच कर दिया, और प्रातःकाल होते ही उसके डेरों पर हमला कर दिया जिस में अत्यन्त रक्तपात हुआ और अन्त में भगौड़ों के साथ ही साथ उन्होंने भी सुप्रसिद्ध गढ़ बीटली (तारागढ़) में प्रवेश किया।
ख्यात में लिखा है कि उनके इन कामों से उनकी कीर्ति राजस्थान भर में फैल गई, और उनकी इस कीर्ति और लगन से उत्तेजित हो 1000 राजपूत योद्धा पृथ्वीराज के नक्कारे के चारों ओर एकत्रित हो गये । उनकी तलवारें आकाश में चमकती थी और उनके भय से पृथ्वी कांपती थी, परन्तु वे असहाय के सहायक थे ।
