ठाकुर जालिमसिंह, किशोरसिंह के वंशज के रूप में मीठड़ी में पैदा हुए। भाइयों में सबसे छोटे जालिमसिंह बचपन से ही कुशल संगठक, वीर प्रवृत्ति एवं जुझारू थे । युवावस्था में आने से पूर्व ही आस-पास के क्षेत्र में अपना प्रभाव कायम कर लिया । मीठड़ी किशोरसिंह के जागीरी शासन में थी मगर सारी व्यवस्था जाटों के पास थी। सशक्त जाटों के द्वारा एक बार किशोरसिंह की पत्नी हाड़ीजी (जालिमसिंह की माँ) के आदेश को नहीं मानने की वजह से जालिमसिंह ने जाटों से लड़कर मीठड़ी से मनाणा तक का क्षेत्र मुक्त करा लिया। यह लड़ाई उनके लिए प्रतिष्ठा कारक सिद्ध हुई । इसके पश्चात् भोमिया राजपूतों से लड़कर जूसरी को भी जीत लिया जिसका प्रभाव डेगाना तक था। जूसरी को सुरक्षा केन्द्र का रूप दिया गया। एक दोहा भी प्रचलित है, 'लड़ी लड़ायी दूसरी, जालिम जित्यों जूसरी । "
भाइयों में बड़े भाई बनेसिंह एवं शक्तिसिंह के साथ जागीर को लेकर मनमुटाव हुआ मगर मन में कर गुजरने की असीम लालसा थी । मीठड़ी छोड़कर अपनी माँ हाड़ी रानी, अपनी पत्नी एवं बच्चे के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गये। जब वे दिल्ली यात्रा के लिए कुचामन आये तो कुचामन खारड़ा के पास एक ढाणी में उन्हें आश्रय मिला और वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने अपने संरक्षक के रूप में उनसे आग्रह किया कि आप यहीं रुककर हमें संरक्षण प्रदान करें। यह ढाणी कुचबंधिया लोगों की थीं, जो इस क्षेत्र में विशाल मात्रा में होने वाले कुँचो (सरकंड़ों) का काम करते थे। अपनी माँ के साथ विश्राम कर रहे जालिमसिंह ने देखा की पश्चिमोत्तर पहाड़ी से धुआँ उठ रहा है। पूछने पर जानकारी मिली कि पहाड़ी पर बाबा हरिदास (बनखण्डी बाबा ) की धूणी है जिन्हें लोग आलूनाथ भी कहते हैं । ठाकुर जालिमसिंह पहाड़ी पर गये। बाबा को प्रणाम किया तो बाबा ने आशीर्वाद स्वरूप सात पत्थर दिये और कहा की गढ़ का निर्माण कर और तेरा वंश यहाँ राज करेगा। ऐसा भी कहा जाता है कि बाबा ने सात पीढ़ी राज करने का आशीर्वाद दिया ।
संवत् 1791 की कार्तिक कृष्णा 14 सोमवार सन् 1735 को कच्ची दीवाली के दिन कुचामन किले की नींव रखी गयी। धीरे-धीरे गढ़ की नींव ऊपर आती गयी और जालिमसिंह का प्रभाव भी बढ़ता गया। डेगाना के भोमिया राजपूतों से युद्ध हुआ, विजय प्राप्त की। 1791 में बांसा के मुसलमान ठाकुर अमीर खाँ से लड़ाई उसके दरवाजे पर ही हुई जिसमें अमीर खाँ और उनके भाई शहादत को प्राप्त हुए जिनकी कब्रों के निशान गाँव के बीच आज भी हैं । इस सम्बन्ध में एक दोहा भी प्रचलित है, "सोन चिड़ी सरनाटे बोली, तीतर बोल्यों घाटे; मीरों मर्द गढ़ी में बोल्यों, जालिम बोल्यों झाँटे" तथा 1792 में मराठों से भी युद्ध हुआ और विजय प्राप्त की ।
ठाकुर जालिमसिंह ने दिल्ली के बादशाह और जोधपुर के नरेश अभयसिंह की ओर से वि.सं. 1797 में अहमदाबाद का युद्ध लड़ा जिसमें शेर बुलंद पराजित हुआ। युद्ध में प्रदर्शित वीरता के प्रतिफल स्वरूप गाँव रीड़, मोड़ी एवं सीतावट के पट्टे उपहार स्वरूप मिले। अहमदाबाद के युद्ध में ही भगवान नटवरजी एवं नवनीत प्रियाजी की मूर्ति स्वप्न में हुए भगवत निर्देश से किसी साधु के द्वारा प्राप्त हुई, जिसे कुचामन किले में स्थापित किया गया और नवनीत प्रियाजी को मारवाड़ में डोडीयाणा में विराजमान किया गया। कुचामन में भगवान नटवरजी के नाम से राज चलाने का निर्णय लिया गया। इसी कारण इस कस्बे में हर परिवार की चाहत रही है कि किसी पुत्र का नाम नटवरलाल हो । ठाकुर जालिमसिंह जो कुचामन ठिकाने के बीज ठाकुर थे, का देहावसान 1807 में वैसाख कृष्णा 7 को हुआ । उनके उत्तराधिकारियों में सात पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े शोभागसिंह थे।
सन्दर्भ : कुचामन का इतिहास : लेखक नटवर लाल बख्ता