राजस्थान की धरती पर ऐसे अनेक ठिकाने हैं, जिनकी हवेलियों और किलेनुमा इमारतों के पीछे सदियों पुरानी शौर्यगाथाएँ और गौरवशाली इतिहास छुपा है। लेकिन अजमेर-मेरवाड़ा की धरती पर बसा **बड़ली ठिकाना** केवल एक जागीर की कहानी नहीं है… बल्कि यह एक ऐसे राजपूत शासक परिवार की कहानी है, जिसकी वंश परंपरा जोधपुर से **भिनाय, देवलिया कलां और फिर बड़ली** तक पहुंची।
आखिर कौन थे वे **ठाकुर देवीदास सिंह जी**, जिन्होंने वर्ष **1675 ईस्वी** में बड़ली ठिकाने की स्थापना की? किस राजवंश और किस शाखा से जुड़ा था यह जागीरदार परिवार? और क्यों देवीदास जी के वंशजों को आगे चलकर **“देविदासोत जोधा”** के नाम से जाना जाने लगा? इन सवालों के जवाब हमें राजस्थान के उस इतिहास तक ले जाते हैं, जहां **राठौड़ राजवंश की चंद्रसेन सिंहोत जोधा शाखा** की एक शाखा ने अपनी नई पहचान और अपना नया ठिकाना स्थापित किया।
जयपुर–उदयपुर राजमार्ग पर स्थित बड़ली आज भले ही एक शांत ऐतिहासिक स्थान दिखाई देता हो, लेकिन इसके पीछे छिपी है **वंश, जागीर और शौर्य की कई पीढ़ियों की कहानी।**
**बड़ली ठिकाने की स्थापना करने वाले देवीदास सिंह जी देवलिया के ठाकुर अक्षय राज सिंह जी के पुत्र थे । ठाकुर अक्षय राज सिंह जी भिनाय के ठाकुर श्याम सिंह जी के पुत्र थे और उन्हें देवलिया की जागीर मिली । इस तरह इस परिवार की ऐतिहासिक यात्रा भिनाय से शुरू होकर बड़ली तक पहुंची ।
भिनाय, देवलिया और बड़ली का यह परिवार जोधपुर के राजा चंद्रसेन जी का वंशज है । आपको बात दें चंद्रसेन जी जोधपुर के शक्तिशाली राजा मालदेव जी के सबसे छोटे पुत्र थे, जिनकी काबलियत को देखते हुए जोधपुर का राजा बनाया गया, जो उनके बड़े भाइयों को पसंद नहीं आया और इसी विवाद मे बादशाह अकबर की एंट्री हो गई, पर चंद्रसेन जी ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की और जीवन पर्यन्त अकबर के साथ संघर्ष किया ।
बड़ली के शासकों ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए समय समय पर कई युद्धों मे भाग लेकर वीरता प्रदर्शित की । इसी परंपरा में ठाकुर लालसिंह जी ने मराठों के साथ युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान दिया । वे सिर कटने के बाद भी तलवार चलाते रहे और दुश्मनों पर कहर बरसाते रहे । ठाकुर लालसिंह जी आज झूझार जी महाराज यानि लोकदेवता के रूप में पूजित है ।
आजादी के समय ठाकुर नरेंद्रसिंह जी बड़ली के ताजिमी जागीरदार थे । नरेंद्र सिंह जी अजमेर की मेयो कॉलेज से शिक्षित थे और आपका विवाह खचारियवास के ठाकुर कल्याण सिंह जी की सुपुत्री सुशीला कंवर जी के साथ हुआ । इस तरह बड़ली परिवार देश के उपराष्ट्रपति रहे स्व. भैरों सिंह जी शेखावत से भी सम्बद्ध है ।
ठाकुर नरेंद्र सिंह जी के पुत्र कुँवर दिलीप सिंह जी के असामयिक निधन के बाद ठकुरानी सुशीला कंवर ने अपने छोटे दोहिते देवराज सिंह को गोद लेने का निर्णय लिया । नरेंद्र सिंह जी की पुत्री का विवाह करणसर ठिकाने के उम्मेद सिंह जी राणावत के साथ हुआ है । जिनके दो पुत्र है दिव्य राज सिंह और देवराज सिंह है । दिव्य राज सिंह होटल व्यवसायी है तो देवराज सिंह पायलट है ।
वर्तमान में बड़ली गढ़ में एक शानदार हैरिटेज होटल संचालित है, जिससे गाँव में पर्यटन बढ़ा है । गाँव में होटल और पर्यटन बढ़ने से ग्रामीणों को रोजगार के अवसर उपलब्ध हुए हैं । बड़ली का पूर्व जागीरदार परिवार सामाजिक सरोकार निभाने में भी अग्रणी राहत है । बावड़ियों की सफाई हो, धर्मशाला की मरम्मत हो या फिर शिक्षा पर खर्च हो, हर काम में परिवार रुचि लेता है ।
बड़ली के पूर्व जागीरदार परिवार के साथ ग्रामीणों का आत्मीय भाव आज भी वैसा ही जैसा रियासती काल में था और परिवार द्वारा सामाजिक सरोकार निभाने की प्रतिबद्धता इस भाव को और बढ़ा देती है ।
