जब एक भाई ने दूसरे भाई के यहाँ डाका डाला और फिर जो हुआ

Gyan Darpan
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शेखावाटी के के चौकड़ी ठिकाने के ठाकुर गोपाल सिंह जी अपने जमाने के तगड़े सामंत थे । चौकड़ी ठिकाना झुंझुनू पर राज कायम करने वाले शार्दूल सिंह जी शेखावत की वंश परंपरा से है । इस ठिकाने की स्थापना जोरावर सिंह जी के पुत्र यानि शार्दूल सिंह जी के पोत्र बखत सिंह जी ने सं 1742 ई में की थी । इनसे पहले चौकड़ी ठिकाना उग्रसेन जी के शेखावतों के पास था, जिनसे बखत सिंह जी ने लेकर यहाँ गढ़ का निर्माण कराया । 

जयपुर की राजगद्दी को लेकर महाराजा सवाई ईश्वरी सिंह जी और उनके भाई माधो सिंह जी के मध्य हुए युद्ध में बखत सिंह जी ने माधोसिंह जी का साथ दिया था ।  

जब गोपाल सिंह जी सं 1893 में चौकड़ी ठिकाने की गद्दी पर बैठे तब देश में अंग्रेजों का राज था, जयपुर दरबार से अंग्रेजों की संधियाँ थी, पर ठाकुर गोपाल सिंह जी ने कभी किसी का डर नहीं माना, वे अपने हिसाब से ही राजकार्य चलाते थे । क्योंकि गोपाल सिंह जी सच्चे, खरे, बड़े निडर सामंत थे। वे ना  किसी का दबाव मानते ना किसी से डरते । 

उस जमाने में घोड़े रखना राजपूतों का खास शौक था, हर योद्धा राजपूत की पहली प्राथमिकता घोड़े घोड़ियाँ रखना होती थी । रियासती काल मे चौकड़ी का ठिकाना भी माना हुआ ठिकाना था । अब माने हुए ठिकाने में घोड़े घोड़ियाँ ना हो एसा तो हो नहीं सकता । चौकड़ी ठिकाने के तबेले यानि अश्वशाला में सौ सवा सौ घोड़े घोड़ियाँ थी । जिन पर काफी खर्च भी होता था। 

ठाकुर गोपाल सिंह जी ठाकुर मंगल सिंह जी के बड़े पुत्र थे । इसलिए ठिकाने की गद्दी पर बैठे, ठाकुर गोपाल सिंह जी के एक छोटे भी और थे, जिनका नाम था भूर सिंह । भूर सिंह जी गोपाल सिंह के विमाता के पुत्र थे और दोनों के मध्य जागीर के बंटवारे को लेकर अनबन चल रही थी । इसी अनबन को लेकर दोनों के बीच बोलचाल, उठ बैठ और आना जाना काम ही था । 

हालांकि इस बंटवारे को लेकर एक एग्रीमेंट भी हुआ था । ठाकुर मंगल सिंह जी के चार पुत्र थे, जिनमें रामलाल सिंह जी का निधन हो गया था अत: बंटवारे के  एग्रीमेंट के अनुसार गोपालसिंह जी को जागीर की आय से छ: हजार रुपये प्लस 2100 रुपये टिकाई होने के नाते, भूर सिंह जी और शिवनाथ सिंह जी को छ: छ: हजार रुपये और रामलाल सिंह जी की विधवा ठकुरानी को चार सौ रुपये का प्रबंध किया गया ।  

ठाकुर गोपाल सिंह जी चौकड़ी के गढ़ मे रहते थे और ठाकुर भूर सिंह जी अपने हिस्से मे आई जागीर के गढ़ में रहते ।  

राजस्थान में संवत 1956 में अकाल पड़ा, जिसे छप्पणीया अकाल के नाम से जाना जाता है । यह अकाल इतना भयंकर था कि लोग अनाज के दाने दाने को मोहताज हो गए थे, खाने को अनाज नहीं, पीने को पानी नहीं, पशुओं के लिए घास, चारा, पानी कुछ नहीं, लोग भूख से मर रहे थे । भूख से जीवन बचाने के लिए लोग खेजड़ी की छाल तक पीस कर खाने को मजबूर थे । 

गाँव गाँव में गायें, भेंसों, ऊंटों, भेड़ बकरियों के रेवड़ के रेवड़ तक मर गए और उनके कंकालों को ढेर लग गए । राजस्थान के ज्यादातर लोग अपनी जान बचाने और कमाने के लिए अपने बाल बच्चों को छोड़कर मालवा चले गए । गाँव के गाँव सुने हो गए । 

इस हालत में ठिकानेदारों ने भी अपनी प्रजा को भूख से बचाने के लिए जगह जगह खाने की व्यवस्था की, और कर्जे में डूब गए । ठाकुर गोपाल सिंह जी भी इस अकाल से अछूते नहीं रहे, धन खर्च हो गया, घोड़ों के लिए घास नहीं, चारा खरीदने के लिए रुपये नहीं, करे तो क्या करे ? 

अपने घोड़े, घोड़ियों और लोगों को बचाने के उपाय की उधेड़बुन में उन्होंने डाका डालने की सोची, पर आस-पास के धनी सेठों या किसी धनवान नागरिक के यहाँ डाका डालना तो क्षात्र धर्म के खिलाफ होगा, जिस प्रजा की रक्षा का भार उन पर है उसी के घर पर डाका कैसे  और क्यों डाला जाए।  

इसी उधेड़बुन में उन्होंने चार पाँच आदमी साथ लिए और अपने भाई ठाकुर भूर सिंह जी के गढ़ में गए । उस दिन ठाकुर भूर सिंह जी किसी जरूरी काम के सिलसिले में जयपुर गए हुए थे । ठाकुर गोपाल सिंह जी भूर सिंह जी के गढ़ में पहुंचे और घोड़े से उतर पर रावले में मर्दाना महल खुलवाने का संदेश भिजवाया । ठकुरानी ने डावड़ी के हाथ मर्दाना महल की चाबियाँ भेज खुलवा दिया । 

महल के दरवाजे खुलते ही ठाकुर गोपाल सिंह जी सीधे महल मे गए और तिजोरी तोड़कर उसमें रखे बीस हजार रुपये निकालकर वापस चौकड़ी आ गए ।

ठाकुर भूर सिंह जी के कामदार और ठकुरानी ने इस घटना की जानकारी के लिए तुरंत एक आदमी जयपुर भेजा, और पत्र में ठाकुर गोपाल सिंह जी द्वारा गढ़ में डाका डालने की सूचना दी । भूर सिंह जी सारे काम छोड़ अपने गढ़ में आए और सारी हकीकत मालूम की और लूटी गई रकम वापस लाने की तैयारी की । 

भूर सिंह जी ने अपने सभी लोगों और घुड़सवारों को बुला भेजा, हथियार खाने से तलवारें, ढाले, भाले, तीर कमान, गोफण, बंदूकें, जूजरबा, रेखले, आदि हथियार लेकर मरने मारने के लिए सजधज कर चौकड़ी गढ़ की ओर रवाना हुए। 

दूसरे ही दिन सुबह सुबह चौकड़ी गढ़ को भूर सिंह जी के हजार आठ सौ हथियार बंद लोगों ने घेर लिया । 

ठाकुर गोपाल सिंह जी को पता चलते ही वे नंगे पांव, बिना हथियार भूर सिंह जी के सामने दौड़े दौड़े चले आए और दूर से ही हाथ जोड़कर कहा - पधारो ठाकुर साहब पधारो । एसा कहते हुए वे ठाकुर भूर सिंह जी को सम्मान के साथ दरिखाने ले गए । सेवकों को गोठ की तैयारी का हुक्म देने के बाद भूर सिंह जी से पूछा - आज यह कृपा कैसे हुई ? धन्य भाग हमारे कि आज आप हमारे रावले में पधारे । 

इस तरह के मीठे वचन सुनते ही भूर सिंह जी का जोश और रोष जाता रहा । बड़े भाई के मीठे और नरमाई वाले शब्दों ने भूर सिंह जी के गुस्से को शांत कर दिया और वे बोले - राज आप मेरा खजाना लूट लाए, इस तरह तो किसी की टपरी भी नहीं लूटीजती । 

गोपाल सिंह जी बोले - गोपालौ किंण नै लूटै अर धन रौ कांई करै। अै ठाणां में बंधिया टौरड़ा भूखा मरै हा। अै आप रा ही टौरड़ा है। इणां रै घास दाणां खातर गोपालौ तौ ल्यायौ है। आप आं घोड़ा नै ले पथारौ। आप रा इज है। 

इस तरह गोपाल सिंह जी के बर्ताव से भूर सिंह जी का क्रोध शांत हो गया, दोनों भाइयों ने एक थाल में एक साथ भोजन किया, कई दिनों बाद एक दूसरे के हाल चाल पूछे, संकट में साथ देने का वायदा किया और भूर सिंह जी अपनी लूटी हुई रकम बिना लिए अपने गढ़ में वापस आ गए । 

इसीलिए कहा गया है - जुबान से अमृत बरसे, बोली से ही वैर बढ़ता है और बोली से ही विरोध मिटता है और आपसी भाईचारा और सौहार्द बढ़ता है । 

संदर्भ : 1. सौभाग्य सिंह जी शेखावत द्वारा लिखित पुस्तक "राजस्थानी साहित्य, संस्कृति इतिहास

2. "शेखावाटी प्रदेश का राजनीतिक इतिहास" लेखक -रघुनाथ सिंह जी कालीपहाड़ी  

   

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