सिर कटने के बाद भी लड़े थे कुंवर सुखसिंह मेड़तिया, आज भी पूजते है लोग

Gyan Darpan
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आप जो ये चित्र देख रहे हैं वो रियासती काल में अपने देश, धर्म और संस्कृति के लिए प्राणों का बलिदान देने वाले एक योद्धा का स्मारक है | आज इस महान योद्धा को सम्मान देने, पूजा अर्चना करने और उनका अभिषेक करने के लिए तीन गांवों के ग्रामीण एकत्र हुए हैं |  ये जगह है राजस्थान में परबतसर के पास नेतियास गांव में |

ये स्मारक है कुंवर सुखसिंह राठौड़ का | उस वक्त मारवाड़ में महाराजा रामसिंह जी का शासन था | युद्ध होना भी आम बात थी | सो कुंवर सुखसिंह जी मारवाड़ राज्य की रक्षा, अस्मिता के लिए हमेशा तत्पर रहते थे, परबतसर के पास पीपलाद गांव के समीप हुए किसी युद्ध में उन्होंने अदम्य वीरता प्रदर्शित की | दुश्मन के वारसे उनका मस्तक धड़ से अलग हो गया पर उनकी तलवार चलती रही, वे बिना सिर के लड़े, आखिर उनका घोड़ा उनकी धड़ को लेकर नेतियास गांव पहुंचा, जहाँ घोड़े से उनका धड़ गिरा वहां उनका दाह संस्कार कर स्मारक बनाया गया |

अल्पायु में ही अपनी मातृभूमि के लिए प्राणों का उत्सर्ग करने वाले कुंवर सुखसिंह जी राठौड़ वंश के महान वीर, लोइन ऑफ़ चित्तौड़ के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध वीरवर जयमल मेड़तिया की वंश परम्परा में जन्में थे |

जोधपुर के संस्थापक राव जोधा से बारहवीं और वीरवर जयमल मेड़तिया से नौवीं पीढ़ी में किसनसिंह जी हुए, किसनसिंह जी के पास बाजवास की जागीर थी | उनके तीन पुत्रों में से एक कुंवर सुखसिंह थे | सबसे बड़े फतेहसिंह जी बाजवास गांव रहे, सुखसिंह जी ने नेतियास गांव आबाद किया और तीसरे जालमसिंह जी ने जालमपुरा गांव बसाया |

रविवार 15 जुलाई 1759 को मारवाड़ राज्य की स्वतंत्रता और अस्मिता की रक्षा के लिए कुंवर सुखसिंह जी ने युद्ध में सिर कटने के बाद वे बिना सिर के लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए |

सिर कटने के बाद भी लड़ने वालों को राजस्थान में झुझार कहते हैं यानी जूझते हुए लड़ने वाला योद्धा और इस तरह जूझते हुए वीरगति को प्राप्त होने वाले योद्धा को झुझार जी महाराज के नाम से लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है |

सुखसिंह जी अल्पायु में ही झुझार हो गए थे अत: बाजवास से श्री रतन सिंह जी गोद आये और उन्होंने 3 मई 1767 रविवार के दिन सुखसिंह जी की लाल पत्थर से निर्मित देवली स्थापित कर उनका स्मारक बनाया | इस स्मारक पर उत्कीर्ण शिलालेख में लिखा है -

"आज श्री कँवर जी श्री सुखसिंह बना 1816 क सावण बदि 6 दीतवार क दिन काम आया संवत 1824 की बसाख सुद पंचमी दीतवार क दिन बनरी देवली खड़ी करी सुख सिंह क बेटा रतनसिंह जी छतरी रो काम सरू करायो" 

पर काल के थपेड़ों से अन्य स्मारकों की तरह यह स्मारक भी जीर्ण शीर्ण हुआ और अफ़सोस उसकी देखरेख करने बजाय आस-पास के लोग छतरी और चबूतरे के पत्थर तक उठा ले गए |

आखिर इस उपेक्षित और टूटी फूटी अवस्था को प्राप्त इस छतरी पर गांव के डॉ स्वरूप सिंह जी और उनके भाई आइपीएस बहादुर सिंह जी की नजर पड़ी और डॉ स्वरूपसिंह जी ने देवली पर अंकित शिलालेख को साफ़ किया और उसके चित्र लेकर उसे पढ़ा, अनुवाद किया और तीन गांवों यथा नेतियास, बाजवास और जालमपूरा गांव के मेडतिया सरदारों के सहयोग से वर्ष 2013-14 में जीर्णोद्धार करवाया |

आज इस महान योद्धा को सम्मान देने, याद करने के लिए  नेतियास, बाजवास और जालमपूरा तीनों गांवों के क्षत्रिय सरदार, क्षत्राणीयां प्रतिवर्ष श्रावण बदी छठ के दिन यहाँ एकत्र होते हैं, हवन पूजन कर प्रसादी पाते हैं और अपने महान पूर्वज के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं |

आप देख रहे हैं स्मारक पर हवन पूजन हो रहा है, महिलाएं गीत गा रही और अब ग्रामीण अपने महान पूर्वज का दुग्ध से अभिषेक कर रहे हैं |

इस अवसर पर पर्यावरण की रक्षा के लिए पौधारोपण भी किया जा रहा है जिसमें गांव के सरपंच एक परबतसर के विकास अधिकारी ... नाथावत भी भाग ले रहे हैं  |

आज इस महान योद्धा के स्मारक का जीर्णोद्धार हो चूका है, प्रतिवर्ष यहाँ हवन पूजन होता है, तीन गांवों के क्षत्रियों के नवविवाहिता जोड़े यहाँ धोक देने आते हैं |

आपके गांव के आस-पास भी यदि इसी तरह के किसी झुझार योद्धा की देवली हो, शिलालेख हो तो उसका संरक्षण करें और उनका सम्मान करें | यदि शिलालेख पढने में दिक्कत हो तो इन्टरनेट पर सेव अवर हैरिटेज सर्च करें उनकी टीम से संपर्क करें, वे किसी भी शिलालेख को पढने में आपकी सहायता कर देंगे, यदि देश, धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए प्राण उत्सर्ग कर चुके वीरों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी | 

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