डंगरसी रतनू कृत : चित्तौड़ के तृतीय साके का एक समकालीन काव्य ग्रन्थ

Gyan Darpan
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 लेखक : ठाकुर सौभाग्य सिंह जी शेखावत 

साका और जौहर के लिए विश्व के वीरसमाज में वंदनीय चित्तौड़ भारतीय समाज का पवित्र तीर्थ रहा है । चित्तौड़ ने जहां अनेक बार युद्ध लड़ श्रोणित-सलिल में स्नान किया, वहाँ तीन बार श्रोणित के साथ-साथ साके ही नहीं किये श्रपितु प्रज्वलित ज्वाला- नल में अपनी कमनीय कोमल काया की ग्राहूति देकर जौहर भी किया । स्वाभिमान और स्वतंत्रता की रक्षा के लिये बलिदान होने के कारण ही चित्तौड़ विश्व समाज में वीर भूमि, त्याग भूमि तथा वंदनीय भूमि कहलाया । भारतीय इतिहासकारों, यूरोपीय इति- हास मनीषियों और मुस्लिम इतिहास तथा काव्यकारों ने चित्तौड़ के शासकों, सामंतों और प्रजाजनों की वीरता की उन्मुक्त-वाणी में श्लाघा की है। मुस्लिम मुहम्मद जायसी ने तो अपने पद्मावत नामक प्रेमाख्यान काव्य में 'चितउर है हिन्दुन की माता' पंक्ति लिख कर स्पष्टतः ही चित्तौड़ के गौरव की उद्घोषणा की है ।

पूर्वकाल में ही नहीं ब्रिटिश शासनकाल में भी भारतीय स्वाधीनता के संघर्षशील सेनानियों के लिए चित्तौड़ साहस, चैतन्य तथा प्रेरणादाता रहा है। यह सब होने पर चित्तौड पर कोई प्राचीन काव्य नहीं पढने को मिला था। चित्तौड के युद्धों पर स्फुट गीत, दोहे तथा कवित्त अथवा "सगतरासो', "राणारासो", "राजविलास", "राज प्रशस्ति काव्य, राजप्रकास", " भीम विलास ", " भीम प्रकास", भीम प्रकास ( भिन्न) तथा बीसवीं शती में रचित "प्रताप चरित्र", "प्रताप यश चन्द्रोदय " आदि काव्यों में संदर्भगत वर्णन मात्र ही प्राप्त था । चित्तौड़ के गौरव को मंडित करने वाला 'भुरजाल भूषण' ही एक लघु मुक्तक- काव्यकृति उपलब्ध थी । एक सन्देह और विस्मय- सा बना हुआ था कि राज- स्थान के युद्धों पर एकाधिक काव्यों का सर्जन कर्त्ता चारण कवि चित्तौड़ के इतिहास प्रसिद्ध तृतीय साके पर कैसे मौन धार बैठा ?

क्या इतने प्रसिद्ध युद्ध पर कुछ स्फुट गीत, दोहे सोरठे रचकर ही राजस्थानी कवियों ने चित्तौड़ के उस साके को विस्मृत कर दिया ? किंतु यह संदेह गत दिनों श्री नटनागर शोध संस्थान, सीतामऊ ( मालवा ) के संग्रह में "दूहा जैमल वीरमदेऊत रा रतनू डंगरसी देवाउत रा कह्या" नामक १९७ दोहामयी काव्यकृति की प्राप्ति के साथ निरस्त हो गया ।

यह काव्यकृति चित्तौड़ के तृतीय साके की समकालीन कृति है जो भाषाशास्त्रीय अध्ययन, इतिहास और काव्य तीनों ही प्रकार से अनुपेक्षणीय मुक्तक काव्य मौक्तिक माला है । इसमें प्रबल प्रतापी मुगल सम्राट अकबर और महाराणा उदयसिंह, उसके सम्बन्धी, सेना नायक, सामंत और ग्रद्वितीय वीर राव जयमल्ल राठौड़ और उसके अनेक विख्यात तथा अल्पज्ञात सह- योगियों के युद्ध का वर्णन है । चित्तौड़ के सं० १६२४ विक्रमो के तृतीय साके के इतिहास के लिये यह कृति "मोहनोत नैणसी री ख्यात", कर्नल जेम्स टॉड कृत "एनात्स एण्ड ऐन्टीक्वीटीज ग्रॉफ राजस्थान", कविराजा श्यामलदास दधवाड़िया के 'वीर विनोद', पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा के 'राजपूताने का इतिहास' प्रभृति ग्रंथों सेभी उपयोगी और महत्त्व की कृति है । यह सम- कालीन होने के साथ-साथ उक्त युद्ध में वीरगति प्राप्त योद्धाओं के नाम - निर्देशन के कारण भी संदिग्ध महत्त्व की रचना है ।

कवि डंगरसी चारणों की रतनू शाखा का कवि था । उसके पिता का नाम दूदा और पितामह अथवा पूर्व पुरुष का नाम देवा था जिससे रतनू चारणों में इस देवाउत प्रशाखा का प्रचलन हुआ । कवि ने जैसलमेर के उदार शासक रावल हरराज की प्रशंसा में रचित अपने एक गीत के दो द्वाळों में इंगित किया है यथा-

संभव द्रोण मालदे संभव, कसट दूद अहिवन सुतकंद । 

रथ अंग खाग तणै बळि राखण, नंदन माल अनै नद नंद ||

जुजिठळ देवादि पंडवहर जोवतां, घणू जोवतां केल धरि । 

किन्हीं उवेळ बिये नह कीधी, हरे ऊवेळ ऊवेळ हरि ॥ 

डूंगरसी ने राव मालदेव और बादशाह शेरशाह के १६०० विक्रमी के गिरी समेल के युद्ध, पृथ्वीराज जैतावत बगड़ी और राव जयमल्ल के १६१३ वि. के मेड़ता स्थान के युद्ध और चित्तौड़ के उपर्युक्त तृतीय साके के युद्ध के अतिरिक्त रावल हरिराज, राव चंद्रसेन राठौड़, रात्र चांदा राठौड़, मांडण कूंपावत, राव मानसिंह अखैराजोत, राव भैरवदास चांपावत, राजा रायसिंह बीकानेर, सम्राट अकबर आदि समकालभव कतिपय योद्धानों की वीरता का अपने वीरगीतों, कवित्तों और दोहों-सोरठों में वर्णन किया है । इसलिए अनेक समकालीन रचनाओं की साक्षी से यह माना जा सकता है कि डूंगरसी रतनू चित्तौड़ के तीसरे साके का समसामयिक कवि था ।

डूंगरसी ने कथित साके में धराशायी हुए प्रसिद्ध सभी वीरों के अतिरिक्त राव जयमल्ल मेड़तिया और भाई-भतीजों तथा - निजी सैनिकों सहयोगियों के भी नाम दिये हैं । कतिपय नाम तो 'जयमलवंश प्रकाश' बदनौर के इतिहास में भी नहीं हैं, वे इस कृति में हैं। इसलिए इस रचना की बड़ी महत्ता है । “जयमलवंश प्रकाश" में राव जयमल्ल के निकटस्थ भ्राता ईश्वरदास, भातृज अजितसिंह और १० अन्य सहायकों का नामोल्लेख हुआ है, जबकि डोंगरसी ने राव जयमल्ल के भ्राता ईश्वरदास, पातल ( प्रतापसिंह), प्राश कर्ण, लखा, भैरवदास और पृथ्वीराज, घड़सी, सूरतसिंह, रूपसिंह, जयराम, उदयसिंह, तेजसिंह, महेशदास, अर्जुन रायमलोत ग्रादि कतिपय प्रमुख राठौड़ वीरों के वीरगति प्राप्त करने का वर्णन किया है। राठौड़ वीरों की भाँति हो रावत पत्ता चूंडावत, रावत सांईदास चूंडावत, पंचायन चहुवांन, मालदेव पंवार, उदयसिंह कूंपावत, चारण शूरा, ईश्वरदास व भोजराज पुर्बिया, ईश्वरदास, लूणकर्ण, भानीदास, सांडा डोडिया, मानसिंह राठौड़, रूपसिंह और श्यामलदास, सुरजन, तनय, पर्वतसिंह टाक, रतनसिंह सांखलो, राजराणा सुरतांण झाला, ईश्वरदास चहुवान, रावत सिंह सीसोदिया आदि अनेक सेना- पतियों का उल्लेख किया है ।

गरसी ने अपने इस दोहा काव्य में सांकळिया दोहा छंद का प्रयोग किया हैं । राजस्थानी छंदशास्त्रीय लक्षण ग्रंथों में दोहा छंद के कई भेदों का सोदाहरण विवेचन मिलता है पर कवियों ने आमतौर से पांच प्रकार के दोहों का राजस्थानी काव्य ग्रंथों में अधिक व्यवहार किया है । जैसे शुद्ध दोहा, सौर- ठिया दोहा, लंगड़ा दोहा, तू वेरी दूहा और सांकळिया दोहा । सांकळिया दोहा को 'वडादोहा' भी कहा जाता है। सांककिये दोहे पन्द्रहवीं, सोलहवीं और सत्तरहवीं शती के पश्चात्, बहुतायत से रचे हुए नहीं मिलते हैं । प्रथम द्वाले के अंतिम और चतुर्थ द्वाले के अंतिम शब्दों की तुकें मिलती हैं। राजस्थानी में ग्रचल- - दास खीची री वचनिका, रतनसिंह महेशदासोत दलपतोत री वचनिका, और माताजी री वचनिका में बड़े दोहे का पुष्कल प्रयोग हुआ है । दोहा काव्यों में 'केशरीसिंह भगवानदासोत रा गुण रूपक' में नाथा चारण कवि ने बड़ा दोहा ही प्रयोग किया है । बड़ा दोहाकार कवियों में डूंगरसी रतनू ही संख्या और स्तर की दृष्टि से बड़ा कवि कहा जा सकता है । डूंगरसी ने कूपा मेह- राजोत के १२९, पृथ्वीराज जैतावत के ८७ और जयमल्ल वीरम देवोत के ८७ दोहे इस प्रकार तीनों रचनाओं में कुल ३०३ दोहे लिखे हैं । तदनन्तर इस दोहा भेद का प्रायः प्रचल न लुप्त प्रायः सा ही हो गया है ।

कवि डंगरसी की भाषा, शब्द चयन, शब्द प्रयोग और अलं- कार योजना में सफलता से प्रतीत होता है कि वह सुशिक्षित कतिपय कलाओं तथा शालिहोत्र, संगीत, नाद, भागवत पुराण, महाभारत, रामायण, ज्योतिष आदि शास्त्रों, कलाओं तथा धर्म ग्रंथों का अध्येता विद्वान कवि था । रूपक, उपमा, उत्प्रेक्षा आदि अलंकार तो उसके शब्दों में नृत्य करते प्राभासित होते हैं । यहाँ कवि प्रणीत कुछ दोहे प्रस्तुत किये जा रहे हैं---

शाह की प्रबल और असीमित सेना की समुद्र के साथ अथवा छोळां चढ़ी नदी के साथ समता दर्शाते हुए कहा है-

उवह अछेह प्रताघ, सुभटे अनियै साहणै । 

वधतै राणा वधारियौ, इम अरसीहर माध ॥ 

मद में नदी मंभार, हालै जांण हेम कौं । 

षंभू ठांणे खैग से, आठां कुळ अणुहार ||

मेवाड़ की सेना भी शाही सेना से कम नहीं थी । मृत्यु मार- वण के मित योद्धाओं में राणा उदयसिंह तो नक्षत्र माला में पूर्ण कला उदित चंद्र ही भाषित था-

मिळि निसि नाखित्रमाळ, मांडाणौ मांही मयंक 1 

राणी अंतर रावतां, सोहै सूध पंषाळ ||

महाराणा उदयसिंह का प्रतिनिधित्व राव जयमल्ल ने ग्रहण किया । वह जयमल्ल कैसा था, जैसे सिंह शावक ने सन्नाह धारण कर लिया अथवा नंदिधोष में श्री कृष्ण और अर्जुन ग्रारूढ़ हो महाभारत में युद्धार्थ तत्पर हो । कवि ने उदयसिंह को श्री कृष्ण और जयमल्ल को अर्जुन उपमित किया है-

रांण श्रमै रढ़रांण, संपनौ जैमल सेवगर । 

सावज नै साझी सिलह, पहिरी जांण प्रांण ॥ 

दस सहसौदी वांण, बैठा मंदी घोष बे । 

ऊदौ हर जैमल अजण, जजिओ अंतर जांण ||

महार्णव मेवाड़ की तरंगों को अविचल अचल अकबर ही अवरुद्ध करने में समर्थ है-

महणारंभ मेवाड़, छौळां दळ वेळां छिलै ।

अकबर बिण कुण प्रांगमैं, पाउ नहीं पाहाड़ ||

तदनंतर कवि ने शाही सेना में नियत विभिन्न शाखाओं अथवा जातीय घटकों का नाम विवरण प्रस्तुत करते हुए उनकी भीमकायता, निशानेबाजी और संख्यातीतता का वर्णन करते हुए कहा है-

करिवा कहर कदंब, अकबर दळ प्राणाविया । 

भेळण लंका भेळिया, प्रमि नव दूर पदम्ब ।। 

शाही हाथी भी देखिये--

मल्हप दिसि मेवाड़, सिंभुर साहि आलम तणी । 

हरि जांणैकि हलाविया, बंधण पाज पहाड़ || 

साह आलम चै साथ, हाथी इरण भति हालिया । 

मिंद्रांचळ माल्हावियो, जांणै किरि जगनाथ ||

हाथी के शुण्डादण्ड की क्या ही सटीक उपमा दी है तेल की घांणी के साथ-

मांग सिन्दूर मंडि, गाडी सिर नाळी गहन ।

तिल पीड़रण काय काठ तकि, काय सिंधुर ची सुंडि ॥ 

चित्तौड़ पर शाही अभियान को राव जयमल्ल ने अभि- लषित तथा चिरकालाकांक्षा माना-

प्रबे वडे परजाइ, आयै अकबर आवियाँ । 

जैमल जेहवौ जोवतो, मरण तरणौ मन मांइ ॥

वीराग्रगण्य जयमल और रणोत्साही अनुज ईश्वरदास का पारस्परिक वार्तालाप तो क्षात्र तथा भ्रातृ-धर्म का अनूठा ही उदाहरण बन गया है, सुनिये-

लोह मरण मौ लाज, जैमळ इम जीहां जपै ।

वीर तणे घर री वडिम, ईसर तू  भुज आज ||

जैमल जपै जोइ, ईसर घर एकोज छै।

मौ मरते तोनू मंडळ, कुजस न भाषे कोइ ।।

आये अकबर आप, ईस कहै तो ओसलू ।

दरिणयर जो निसी देषिजै, ससि दिन हूं त्रे संताप || 

विढ़रण विसोहां वीसू, तू मुहियड़ वीरम तरणा । 

कदे अवि करतो नहीं, आज कयौ करि ईस || 

इण कारन असहास, करां जिंक जैमल कहै । 

ईस कहै कह करो, समहर तणौ समास || 

घट हूंता घण धाय, तौ राळा ईसर त । 

जो वसुधा तारायण वसै, व्योम वसै वणराय ।। 

ईसर जैमल ग्राकुळा, अरजण पती अगाहि । 

ताईयां सांम ताहि, चढ़सी चीत्रागढ़ चढ़ण ||

तब चित्तौड़ ने अपनी लज्जा की रक्षा का भार राव जयमल्ल को सौंपते हुए कहा-

भामी तूझ भुजांह, चवियों जैमल चीत्रगढ़। 

कहर दळां पतिसाह का प्रायो आवंतांह

राव जयमल्ल के साथी तृतीय साके के अन्य योद्धाओं का उत्साह - उदधि भी हिलोरे लेने लगा-

रावत पत्ता - प्राजोकौ प्रहाड़, मोटो कर माल्हावसी । 

झाकियो भूझाउवां, पातल पिण पाहाड़ ||

आवी विसमी वार, तो जेही जगमाल तण ।

पैले मांझीय पता, ताय साँचौ सिरदार ||

रावत सांईदास - ठावौ लावै ठौड़, पौढौ पांतरिजै नहीं । 

सांइयौ राउत सुमतिकज, चढियौ गज चित्रौड़ ||

अखैराज सोनगिरा- ज्ळवळ हिलिया ज्यार, रीसै रौद्रायण तणै । 

                             सोनगिरै सबाहियो, तीजौ लोचन त्यार ॥

पंचायन चहुवान -- षड़ि प्रायौ परसाण, दस सहसै ऊपरि दुरंग । 

                           राषण पांचौ रूकहथ, चढ़ियो गढ़ चहुत्रांण ॥

मालदेव पंवार - जग मुर में चष ज्यार, सुणियो पांचाउति संगठि । 

                         माली आयौ मरण कजि, पूरो पत्री पमार ॥

उदयसिंह कू पावत - आयौ वह वहति, कूंपाउत कूंपै ज्योंहि । 

                               काचौ पिंड सांचौ करण, उदलौ सांचै अंत !

शूरा चारण- चारण भाई षत्रियां, सांचौ बोल संसार || 

                  चढ़ियौ सूरौ चित्रगढ़, अंग अधिक अधिकार |

ईसर भोज पूर्वीया - मोटै गढ़ मन मांह, कीध उछब तिण कीयै ।।

                            आया पूरविया अभग, ईसर भोज अगाह ||

ईसर लूणी - करि ग्रहिये केवांण, भविसांचा दळ भंजिवा । 

                    ईसर लूणी आविया, जोड़े सावज जांण ॥

काभानी दास-भूझ्ण सुजड़ौ भाल, पिंड भांजण राषण प्रिसथ । 

                     आयौ गिरवर ऊपरी, होळी भानौ हाल ||

सांडा डोडिया - सझिये निय भुज सार, समहर साह आल सरस । 

                     दस सहसै ऊपरि दुरंग, सांडौ सिलहदार ॥

माना राठौड़ - सुर घड़ा उछेद, कुळवट उजवाळण कर्मध । 

                     चढियो मानौ चीत्रगढ़, जैमल सौजेताह ||

रूपसिंह - भारथ सांची भीर, चढियौ आवे चीत्रगढ़ । 

                राह वेधी रूपसी, सुरजन तणो सधीर ॥

श्यामलदास टाक - सिमर सझियौ ओप, सांमळ चित्रांगद सिरै । 

                          टाक नियाइ तरसीय, पित ज्येरो परताप ॥

कुभा राठोड़ - समहर भुज सोहेह, कमधज अति सांचे क्रमे । 

                         कुंभ चढ़वा कोडीयौ, लाषां तणै लोहेह ||

अखैराज - माजिब साहिब माग, औसीले आयां असुर । 

                  आखियो गिरवर ऊपरै, जैतै तणौ जड़ाग ||

शंकरदास - वसवा वैकुंठ वास, निरवे चढियौ जगनयण । 

                         सुरजन का साबास, सांकरिया साबास ॥

पातल राठौड़ - पातल विरद पगार, हैवै दळ आडौ हुत्रौ । 

                      सिर गिरवर सा मेर कौ, कमधज वडौ कंधार ॥

आसौ, लखौ, भैरव और पीथल डूंगरोत राठौड़-

                         आसौ लखौ प्रगाह, कहि भैरव पीथल कमंध | 

                             डूंगर का चत्र दीपिया, सिर गिरवर खम साह ||

पृथवीराज अखावत - अखा सामोभ्रम अंग, कूटाळे पीथल कमंध । 

                               सबदी जैतमालां सरस, जागेवौ रिण जंग ||

घड़सी पांचावत - ऊबारण अखियात, कमधज त्रिमियौ गढ़ कमळ | 

                              घड़सी लाधी घात, पिड़ि चढ़िवा पांचाउते ।।

सूरतसिंह राठौड़, रूपसिंह राठौड़, नाथा गोदावत टाक, कर्मचन्द, पर्वतसिंह, रतनसिंह नगराजोत, जयराम, उदयसिंह, तेजसिंह आदि समस्त सेनानायक राव जयमल्ल साथ ही युद्धार्थ तैयार हुए। दोनों ओर से तोपों के गोलों की वर्षा होने लगी ।

तोपों के धूम्र से सर्वत्र धूम्र ही धूम्र छा गया, मानो मत्यस्यगंधा सतीत्व हरण करने के लिए पराशर ऋषि ने अन्धकार किया हो- ने अन्धकार

अतस अंध अथाह, इसौ विसम गति वरतियौ । 

कजि जोजनगंधा कियौ, धोमर घूअर काह 11

दुर्गे की दीवार के उड़ने के दृश्य को हनुमान के द्रोणगिरी उठाने की क्रिया से उपमित किया है-- 

दहन पलीतौ देय, इण भति गढ़ उडाडियौ | 

हणवंत जांणै हालियो, गिरवर द्रोण ग्रहेय ॥

अंत में कवि ने उपर्युक्त योद्धाओं के रण कौशल, शत्रु संहार, सुर सुंदरियों द्वारा वरण आदि का बड़ा मार्मिक, ओजस्वी चित्रण किया है । उक्त शूरवीर के अंत होने पर ही सम्राट की सेना चित्तौड़ दुर्ग में प्रवेश कर सकी ।

निम्न अंतिम दोहे के साथ कवि ने इस काव्य कृति को पूर्ण किया है-

धुर लग सांचे धोड़, वासिग नाग जुळे वांछतां । 

वैकुंठ वसिया बीर रा, चढ़ि अकबर चीत्रोड़ ||

जैसाकि पहिले उल्लेख किया जा चुका है, यह दोहाकृत वीररस के साहित्य की क्या भाषा, क्या शैली और काव्य-व्यंजना सभी स्तर से अनुपम है ।


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