मिलजुल कर कृषि कार्य करना और "ल्हास" रूपी दावत का मजा

भारत की समृद्ध भाषाओँ में हर कार्य के लिए अलग-अलग शब्द प्रयुक्त किये गए है। कृषि कार्य में भी किये जाने वाले हर कार्य को अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे फसल में खड़ी खरपतवार को निकालने के लिए हमारे यहाँ राजस्थान में "निनाण" करना कहते है, फसल में पानी देने को "पाणत", बाजरे की फसल पकने पर बाजरे के सिट्टे तोड़कर इक्कट्ठा करने को "ढूचणी", बाजरे की फसल के तने को काटकर इक्कट्ठा करने को "कड़ब" काटना व गेहूँ,मोठ,गवार,मूंग,सरसों,चना, मेथी आदि फसलों के पकने के बाद इन्हें उखाड़कर इक्कट्ठा करने को "लावणी" कहते है। फसल पकने से पहले तक के काम तो अकेला किसान परिवार धीरे-धीरे करता रहता है पर फसल पकने पर "लावणी" के लिए हर किसान की इच्छा रहती है कि इस कार्य को एक दो दिन में ही खत्म कर लिया जाए ताकि उपज को किसी तरह का नुकसान ना पहुंचे।

आज से दो तीन दशक पहले तक राजस्थान में कृषि कार्य के लिए मजदूर बहुत कम मिलते थे साथ ही राजस्थान की रेतीली धरती में कृषि उपज कम होने के चलते कृषक किसी भी कार्य को मजदूरी देकर करवाने में असमर्थ भी थे। ऐसी हालात में किसान एक दुसरे के कृषि कार्य मिलकर सामूहिक रूप से करते थे। सब किसान या आपस में मित्रवत व्यवहार रखने वाले मिलकर एक एक कर एक दुसरे का कृषि कार्य कर देते थे। एक किसान द्वारा दुसरे किसान की मदद के लिए किया जाने वाला कार्य "बड़सी" कहलाता था, काम के बदले मजदूरी की जगह वापस काम करवा देना "बड़सी" कहलाता है, बड़सी को हम एक तरह से कार्य विनिमय मान सकते है।

मिलकर समूह में कार्य करते समय किसान अलग-अलग कृषि कार्यों के हिसाब से लोक गीत गाते हुए गीतों की धुन पर झूमते हुए कार्य करते थे जिससे एक तरफ उनका पूरा मनोरंजन होता था दूसरी और हंसी-ख़ुशी में झूमते हुए कार्य करने से कार्य क्षमता भी बढती थी और ऐसे माहौल में थकान होने का तो मतलब ही नहीं उठता था। सामूहिक तौर पर मिलकर "लावणी" करते समय शाम का भोजन उसी किसान के घर होता था जिसके खेत में कार्य किया जाता था। शाम को किसान के घर होने वाली इस दावत को "ल्हास" कहा जाता था।

इस तरह से मित्रवत व्यवहार रखने वाले किसान मिलकर कृषि कार्य करते हुए एक दुसरे की सहायता तो करते ही थे साथ ही काम करते हुए पूरा मनोरंजन भी करते थे| इस तरह का कार्य उनके बीच आपसी प्रेम व सौहार्द को भी बढ़ावा देते था।

कृषि कार्यों के समय गाये जाने गीत महज मनोरंजन के लिए ही नहीं होते थे बल्कि गीतों की धुन व बोल उस कार्य की प्रकृति के अनुरूप होते थे यथा फसल काटने के लिए झुकते समय के बोल व धुन उसी के अनुरूप तो काटने के लिए फसल की जड़ को उखाड़ने या औजार की चोट मारते समय के लिए अलग धुन व बोल तो उखड़ी फसल हाथ में लेकर वापस सीधे होने के लिए अलग धुन व बोल होते थे। उस धुन के अनुरूप कार्य करते देख कोई भी यही सोचता कि कार्य करने वाले झूमते हुए एक लयबद्ध तरीके से कार्य कर रहें है।

मित्र किसानों द्वारा इस तरह मिलकर कार्य किये जाने को स्व. आयुवानसिंह जी शेखावत ने अपनी काव्य पुस्तक “हठीलो राजस्थान” में एक सौरठे के माध्यम से इस तरह चित्रित किया है-

जीमण लासां जुगत सूं,
मिल मिल भीतडलाह |
लुल लुल लेवै लावणी,
गावै गीतडलाह ||

इस प्रदेश के किसान आवश्यकता पड़ने पर सब मिलकर एक किसान की मदद के लिए काम करते है व उस दिन उसी के यहाँ भोजन करते है जिसको "ल्हास" कहते है | फसल की कटाई (लावणी) के लिए गांव के मित्रगण "ल्हास" पर जाते है ,प्रेम पूर्वक गीत गाते हुए फसल की कटाई करते है व वहीँ पर भोजन करते है |

"लावणी" करते समय जोश दिलाने के लिए किसान एक दुसरे को संबोधित करते ही जो गीत गाते थे वो इस तरह होते थे-

बोल भिड़ी राम-नाम, बोल भिड़ी राम- नाम
आय सांकड़ो बाय बांकड़ो
भाइयो लीला भाइयो लीला, लीला करक
सौदागर कूं तेल को सीरो खाय मरेली
बाय बांकड़ो आय सांकड़ो
बोल भिड़ी राम-नाम ।

ऐसे कई गीत किसान कृषि कार्य करते समय गाया करते थे पर अफ़सोस अब न तो एक दुसरे के कार्य में हाथ बंटाकर सहयोग करने की परम्परा रही न ये लोक गीत रहे| इस तरह के लोक गीत तो लगभग विलुप्त ही हो गए| हाँ अब भी कुछ गांवों में बुजुर्ग किसानों को ये गीत याद है जिन्हें लिखकर इन दुर्लभ गीतों को विलुप्त होने बचाया जा सकता है|

राजस्थान के ग्रामीण युवाओं से मेरी विनम्र अपील है कि यदि उनके गांव में ये गीत जानने वाला कोई बुजुर्ग हों तो कृपया इन गीतों को उनसे सुनकर लिपिबद्ध जरुर करें| मैं भी अपने स्तर पर प्रयास कर रहा हूँ कि कुछ गीत लिखकर सहेज सकूँ|
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About Gyan Darpan

Ratan Singh Shekhawat, Bhagatpura, Rajasthan.
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11 comments:

  1. हमारे इधर बाजरे के डंठल के एक बंडल को "पुळा" और उठाने के लिए इकट्ठे किए गए 5 ,5 के बंडल को "पंजोळ" कहते हैं, काफी पंजोळ मिलकर एक "सुआ" बनाते हैं। मूंग,मोठ या चने के छोटे बंडल को "साँथरी" और 10 , 15 साँथरी मिलाकर एक "जेट" बनाई जाती है और बहुत सारी जेट मिलकर एक एक "खळा" (बड़ा आकार) या "खळी" (छोटा आकार) बनाया जाता है। जहां अनाज निकालते है उसको "लाट्टा" कहते हैं।

    जहां तक गीतों की बात है वो तो कभी सुने नहीं , ससायद बरसों पहले ही विलुप्त हो गए

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  2. बहुत बढिया । आपको दीपावली की शुभकामनायें

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  3. आपकी पोस्ट पढ़कर मैं दोबारा समझा "एकता में अनेकता " । मैं आशा करता हूँ की हमारे देश में सब लोग मिल जुल कर रहे । दीपावली की शुभकामनायें ।
    मेरी नयी पोस्ट " जन्म दिवस : मौलाना अबुल कलाम आज़ाद " को भी एक बार अवश्य पढ़े ।
    मेरा ब्लॉग पता है :- gyaan-sansaar.blogspot.com

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  4. सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    दीवाली का पर्व है, सबको बाँटों प्यार।
    आतिशबाजी का नहीं, ये पावन त्यौहार।।
    लक्ष्मी और गणेश के, साथ शारदा होय।
    उनका दुनिया में कभी, बाल न बाँका होय।
    --
    आपको दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  5. मांकी तरफ स्युं भी थाने दीवाली री शुभकानाएं।

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  6. एक साथ कार्य करने में थकान देने वाला कार्य भी आनन्द देने लगता है।

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  7. ***********************************************
    धन वैभव दें लक्ष्मी , सरस्वती दें ज्ञान ।
    गणपति जी संकट हरें,मिले नेह सम्मान ।।
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    दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं
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    अरुण कुमार निगम एवं निगम परिवार
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  8. शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन,पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने.बहुत खूब.
    बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.
    आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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  9. मारवाड़ मे कुछ ऐसे शब्द है जेसे :- जब किसान खेत मे काम करता है उसकी घरवाली जो खाना लाती है उसे "भातो" बोलते है इसका जिक्र वीर तेजा जी की कहानी मे भी किया गया है! खेत मे फसल उगाने से पहले जो खेत की साफ़ सफाई करने को "सूड" कहते है, जब लावणी करते है तो उस लवणी वो लम्बी लेन से किया जाता है उसे "पांत" कहते है!
    मे भी प्रयास करुगा की उन गीतों को संजोने की कोशिस करुगा !

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