राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .

जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !

मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.

"एलोवेरा " ब्लॉग ट्रैफिक के लिए भी है खुराक

एलोवेरा शारीरिक स्वास्थ्य के साथ साथ ब्लॉग के लिए भी एक बढ़िया टॉनिक है , एक बढ़िया की-वर्ड जो गूगल से आसानी से पाठक झटक कर आपके ब्लॉग पर ट्रैफिक बढ़ा सकता है |.

"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था

उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.

क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत

आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.

Dec 31, 2008

मै हूँ नेता तेरे देश का


लोगों को भड़काता हूँ, आपस में लड़वाता हूँ !
उनकी धन संपदा लेकर, फ़िर मै मौज मनाता हूँ !!
गबन करके सरकार की, आंखों में धुल उडाता हूँ !
गेहूँ,चावल,दाल दबाकर, महंगे दाम कमाता हूँ !!
बढ़ गई है आबादी देश की, दंगे करके मरवाता हूँ !
स्वार्थ सिद्ध करने को अपने, लोगों की बलि चढाता हूँ !!
तिकड़म से कुर्सी करता हासिल,सबकी सरकार गिरता हूँ !
एक्टिंग में भी हूँ मै माहिर,घडियाली आंसू बहाता हूँ !!
काले करतूतों की कालिख लगने पर,नोटों से दाग छुड़ाता हूँ !
मै हूँ नेता तेरे देश का, तुम सब पर राज चलाता हूँ !!

ऑरकुट और HI5.com पर भी बड़ी मजेदार स्क्रब और मेसेज मिलते रहते है इसी कड़ी में उपरोक्त कविता Hi5.com पर सकलदीप चौरसिया ने मुझे भेजी जो रोमन टंकण थी जिसे हिन्दी में टाइप कर मैंने यहाँ परोस दी !

नये वर्ष की शुभकामनायें

अगणित कटु मधु संघातों का निज अन्तस्तल में ले भार
गत संवत का चपल विहंगम उड़ा शून्य में पंख पसार
क्या चिन्ता बीता सो बीता हुआ विगत का विलय-प्रलय
आगत नये वर्ष का देखो हुआ विंहसता अरुणोदय .

कोटि-कोटि किरणें स्वागत में खड़ी खोल आशा के पट
आगे बढ़कर ललक प्रगति का नभ लें चूम स्नेह लटपट
चरण सदा उपलब्धि मार्ग पर बढ़ें आपके निर्भय हो
हे प्रिय, नवल वर्ष आपका, सुन्दर हो, मंगलमय हो .



Hi5.com पर हिमांशु ने यह कविता भेजी |

लिनक्स के साथ मेरा अनुभव

शनिवार को अपने कंप्युटर में उबुन्टु लिनक्स इंस्टाल करने के बाद से लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम इस्तेमाल कर रहा हूँ इससे पहले बड़ी हिचक थी कि पता नही लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम कैसे चलता होगा कही इसे इंस्टाल करने के बाद न चला सकूँ और अपनी विण्डो भी ख़राब कर बेठुं, लेकिन ये उबुन्टु लिनक्स भी बड़ा आसान निकला विण्डो एक्सपी से भी इस्तेमाल में आसान |
न इंस्टालेशन में कोई दिक्कत आई और न ही इसके इस्तेमाल में | मजे की बात है कि मैंने लिनक्स अपने कंप्युटर के F Drive इंस्टाल किया है जिससे मेरा विण्डो ऑपरेटिंग सिस्टम भी जस का तस है उसे भी जब मन करे इस्तेमाल कर सकता हूँ | जब भी कंप्यूटर ऑन करता हूँ मेरे सामने विण्डो एक्सपी और उबुन्टु लिनक्स चलाने के दोनों आप्शन आते है जिसे इस्तेमाल करना हो उसी को चुन लो मतलब कि आप दोनों ऑपरेटिंग सिस्टम अपने कंप्युटर में रख सकते है और जब जी चाहे मन पसंद ऑपरेटिंग सिस्टम इस्तेमाल करलो |
और हाँ लिनक्स इंस्टालेशन के बाद डिस्पले,ऑडियो,ब्लूटूथ आदि किसी के भी ड्राईवर की भी जरुरत नही पड़ती ये सब उबुन्टु लिनक्स में पहले से मौजूद है जबकि विण्डो एक्सपी इंस्टाल करने के बाद इन सब को अलग से इंस्टाल करना पड़ता है यदि कंप्युटर के मदर बोर्ड की सी डी न हो तो इन ड्राईवर को डालने में बड़ी दिक्कत हो जाती है
इसके अलावा भी लिनक्स में बहुत सारी चीजें है जो विण्डो एक्सपी में नही है और उन्हें अलग से इंस्टाल करनी पड़ती है मसलन
१- माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस एक्सपी में अलग से इंस्टाल करना पड़ता है जबकि लिनक्स में ओपन ऑफिस.ओ आर जी पहले से ही मौजूद है जिसमे माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस में वर्ड,एक्सेल व पावरपॉइंट की जगह रायटर,स्प्रेडसीट और प्रजेंटेशन तीनो मौजूद है |
२-फोटो शॉप भी एक्सपी में अलग से डालना पड़ता है जबकि लिनक्स में GIMP Image Editor पहले से साथ है |
३- Nero जेसे सी डी राइट करने के सोफ्टवेयर की जगह भी लिनक्स में Brasero Disk Burning सोफ्टवेयर पहले से ही मौजूद है इन्हे अलग से इंस्टाल करने की कोई जरुरत नही |
४- इन्टरनेट चलाने हेतु फायर फॉक्स, आउट लुक की जगह Evolution Mail, फोटो एडिट करने लिए Fspot Photo Manger, Paint की जगह ओपन ऑफिस का Drawing भी मौजूद है इसके अलावा वे सभी सुविधाए मौजूद है जो हमें विण्डो एक्सपी में मिलती है जिन्हें लिखना बहुत लंबा हो जाएगा |
कुल मिलाकर लिनक्स में ऐसे कई सोफ्टवेयर पहले से ही मौजूद है जबकि विण्डो एक्सपी में इन्ही कामों के लिए अलग सोफ्टवेयर लाकर इंस्टाल करने पड़ते है |
और हाँ उबंटू में एक और प्रोग्राम पिडगिन इन्टरनेट मेसेंजर भी मिला जिसके द्वारा में याहू , एमएसएन, जीमेल आदि साइट्स पर ऑनलाइन अपने दोस्तों से चेट कर सकता हूँ इसके लिए मुझे अलग-अलग मेसेंजर डाउनलोड कर इंस्टाल करने की भी जरुरत नही है | कुल मिलाकर मुझे तो लिनक्स इस्तेमाल करने में बहुत आसान लगा यदि आप भी इसे ट्राई करना चाहते है तो यहाँ चटका लगाकर इसे डाउनलोड कर सकते है या फ़िर यहाँ चटका लगाकर उबुन्टु लिनक्स की फ्री सी डी मंगवाने का अनुरोध भेज सकते है | जब मेरे जैसा नॉन टेक्नीकल आदमी भी लिनक्स आसानी से इंस्टाल कर इस्तेमाल कर सकता है तो आप क्यों नही ! और हाँ इस्तेमाल में कोई छोटी-मोटी दिक्कत आए तो उनके समाधान के लिए हमारे हिन्दी चिट्टाजगत में कई सारे तकनीकी धुरंधर बैठे ही ह ना !

Dec 30, 2008

बधाई संदेश-मेल से सावधान !

आपको क्रिसमस और नववर्ष के ढेरों बधाई संदेश और ई-ग्रीटिंग ई-मेल पर प्राप्त हो रहे होंगे ऐसे संदेशों व ग्रीटिंग को स्वीकार करते समय सावधानी बरते और अनजान बधाई संदेशों को स्वीकार करने से परहेज रखें तो ज्यादा अच्छा है हो सकता है इन संदेशों के साथ वायरस हो | और मेल पर क्लिक करते ही ये वायरस आपके कंप्युटर में फ़ैल जाए | दैनिक हिंदुस्तान के मुताबिक सरकारी संस्था कंप्युटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम ने इस सम्बन्ध में चेतावनी जारी कर इस तरह की मेल और साइट्स खोलने से मना किया है ये वायरस अवांछनीय मेल के साथ किसी ई-कार्ड के साथ भी हो सकते है जो आप द्वारा इन पर क्लिक करते ही ये मूल यु आर एल से कनेक्ट हो जाते है और बिना आपकी मंजूरी के ही डाउनलोड होकर आपके कंप्युटर में इंस्टाल हो जाते है जिसका आपको पता ही नही चलेगा और ये आपकी महत्वपूर्ण फाइलों को नुकसान पहुचाना शुरू कर देंगे |

Dec 28, 2008

ब्लॉग पढने के फायदे


ब्लॉग पढने के भी अपने फायदे है अब देखिये न कि कई दिनों से linux सीखने की जिज्ञासा लिए बैठा था लेकिन नही सीख पाया और ब्लॉग जगत की बदोलत आज में linux का इस्तेमाल करने लायक हो गया हूँ |
लिनुक्स का नाम सुनकर बड़ी जिज्ञासा थी कि इस आपरेटिंग सिस्टम को भी इस्तेमाल किया जाए कई साल पहले पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का भी अख़बार में वक्तव्य पढ़ा था कि कंप्यूटर सस्ते करने है तो लिनुक्स के इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहिए इसी से लिनुक्स के प्रति जिज्ञासा और बढ़ गई थी कि लिनुक्स में आख़िर ऐसा है क्या ?
लेकिन मुझे कोई भी ऐसा व्यक्ति नही मिला जो लिनुक्स इस्तेमाल करता हो और मुझे उससे मार्गदर्शन मिल जाए | लेकिन मुझे तो अपनी जिज्ञासा शांत करनी ही थी सो नेहरू प्लेस से फेडोरा लिनुक्स की एक डी वी डी खरीद लाया और बिना किसी मार्गदर्शन के अपने कंप्युटर में इंस्टाल कर नेट वगेरह तो चलाने में कामयाब हो गया लेकिन गाने, वीडियो आदि चलाने में नाकामयाब रहा और काफी माथापच्ची करने बाद लिनुक्स सिखने का कार्यक्रम बंद करना पड़ा | और अभी कुछ दिन पहले ब्लॉगजगत में टिपयाने के चक्कर में विचरण करते हुए अंकुर गुप्ता का तकनीकी ब्लॉग मिला जिसे खंगालने पर लिनुक्स से सम्बंधित कई जानकारियां मिली और मैंने अपनी प्रॉब्लम भी अंकुर गुप्ता के ब्लॉग पर लिखी सो अंकुर गुप्ता ने मुझे फेडोरा लिनुक्स की जगह उबुन्टु लिनुक्स इस्तेमाल की सलाह दी | उनके ब्लॉग से मुझे उबुन्टु लिनुक्स की वेबसाइट का लिंक मिला और यह भी पता चला की उबुन्टु वेबसाइट वाले फ्री में उबुन्टु लिनुक्स की सी डी भी भेज देते है | बस फ़िर क्या था हम निकल पड़े उबुन्टु लिनुक्स की वेबसाइट की यात्रा पर और भर दिया फ्री सी डी भेजने का अनुरोध फॉर्म |
अनुरोध के चार दिन बाद कल शनिवार को ही हमें कोरियर द्वारा फ्री की उबुन्टु लिनुक्स की सी डी मिल गई और नतीजा आपके सामने है कल ही रात को उबुन्टु लिनुक्स अपने कंप्युटर में इंस्टाल कर आज इसका इस्तेमाल कर रहा हूँ और नए ऑपरेटिंग सिस्टम का मजा ले रहा हूँ यह काम लेने में है बड़ा आसान है बस ज्यादा इस्तेमाल के लिए थोडी सी माथापच्ची और करनी होगी ताकि बाद में विण्डो की जरुरत ही ना पड़े | आपसे भी अनुरोध है कि आप भी यहाँ चटका लगा कर उबुन्टु लिनुक्स की फ्री सी डी मागवा कर लिनुक्स सिखने कि कोशिश करे,क्योकि ये फ्री है, विण्डो से ज्यादा सुरक्षित है साथ इसका प्रचलन बढ़ने से माइक्रो सॉफ्ट का वर्चस्व भी ख़त्म होगा और हमारी आने वाली पीढियाँ लिनुक्स की वजह से सस्ते कंप्युटर का इस्तेमाल कर पाएँगी |
अब तो आप समझ गए ना ब्लॉग जगत की अहमियत | आख़िर ब्लॉगजगत की थोडी सी मदद से ही मै लिनुक्स इस्तेमाल करना सीख पाया |

Dec 26, 2008

ताऊ का कप टेढा



दुनिया भर के उल्टे सीधे काम करने बाद भी ताऊ किसी काम में पुरी तरह कामयाब नही हो पाया, लूटपाट,डकैती,जालसाजी करने के बावजूद भी ताऊ रहा कड़का का कड़का | और अपने जी को कई लफडे भी पाल लिए उल्टे सीधे कारनामों की वजह से पुलिस का डर भी ताऊ को सता रहा था | इन सब से बचने को ताऊ ने अपने कुछ खास दोस्तों से सलाह मशविरा किया, दोस्तों की राय थी कि ताऊ को पुलिस आदि से बचना है तो राजनीती में उतर जाना चाहिए क्योंकि ताऊ के पास वो सारी योग्यताएं है जो एक नेता के पास होनी चाहिए| और इसी अनुभव और योग्यता व भोला-भाला चेहरा देख अजगर पार्टी की आलाकमान मैडम ने ताऊ को अपनी पार्टी में भरती कर लिया |

पार्टी में भरती होने के बाद ताऊ ने गांवों में सभाएं कर ऐलान कर दिया कि चुनाव जीतने के बाद जो सरकारी अधिकारी गांव वालों को परेशान करते है उन्हें अपने लट्ठ की दो-चार मार कर सीधा कर दूंगा और इसी बदोलत ताऊ के हल्के की जनता ताऊ की समर्थक बन गई बस फ़िर क्या था ताऊ ने आलकमान मैडम की कुछ शानदार रैलियां कर पार्टी में अपना सिक्का जमा लिया और पुरी पार्टी में उसी तरह छा गया जैसे ब्लॉगजगत में ताऊ रामपुरिया छा रहे है| ताऊ की बढती लोकप्रियता का होने वाले आगामी चुनाओं में फायदा उठाने लिए आलाकमान मैडम ने ताऊ को बिना चुनाव लड़े ही किसानो वाला मंत्रालय देकर मंत्री बना दिया | लेकिन मैडम ताऊ को मंत्री मंडल की बैठक, विदेश दौरे व पांचसितारा होटलों में होने वाली पार्टियों से ताऊ को गांव का ग्वार समझ दूर ही रखती थी उसे डर था कि पांचसितारा होटलों में ताऊ को चम्मच व काँटों से खाना तो आता नही सो कही ये बेइजती ना करा दे, और इसी कारण मैडम ने ताऊ को राजधानी में ना रहे गांवो के दौरे पर लगा कर रखा |

लेकिन एक दिन ताऊ जिद पर अड़ गया और मैडम से बोला :- मैडम मुझे भी पांचसितारा होटल की पार्टी में लेकर चलो बाजरे के टिक्कड़ पाड़ते बहुत दिन हो लिए अब मंत्री बनने के बाद भी पांचसितारा खाना नही खाया तो मंत्री बनने का क्या फायदा |

मैडम:- ताऊ तन्ने चम्मच और काँटों से खाना खाना नही आता तू वहां बड़े-बड़े लोगों और प्रेस वालों के सामने मेरी भी इन्सल्ट करवा देगा, इसलिए रहने दे इन पार्टियों में जाना |

ताऊ :- ठीक है मैडम, मुझे ये सब नही आता लेकिन में और लोगों की देखा-देखी सब सीख लूँगा |

मैडम:- तो ठीक है ताऊ तन्ने पहले मै एक टी पार्टी में साथ ले चलूंगी वहां तुने ठीक तरीके से चाय वगैरह पी ली तब अगली पांचसितारा पार्टी में लेकर जावुंगी |

और ताऊ भी मान गया|

मैडम ने ताऊ को समझा दिया की जिस तरह दुसरे बड़े लोग चाय का कप उठाये और वापस रखे उन्हें देखकर तुम्हे भी करना| और मैडम एक पांचसितारा होटल की चाय पार्टी में मंत्री बने ताऊ को साथ ले गई |पार्टी में ताऊ ने दुसरे लोगों ने कैसे चाय का कप उठाया, कैसे पकडा,और कैसे लोग चाय की चुस्कियां ले रहे है देखकर बड़े मजे से चाय पीली | मैडम भी ताऊ का क्रियाकलाप देखकर संतुष्ट थी लेकिन चाय पीने के बाद कुछ लोगों ने चाय का खाली कप प्लेट के अन्दर रख दिया और कुछ ने कप प्लेट के बाहर| अब ताऊ को समझ नही आया कि कुछ लोग कप प्लेट के बाहर व कुछ अन्दर क्यों रख रहे सो ताऊ ने अपना दिमाग लगाया और चाय के खाली कप को प्लेट में गोलाई वाली जगह टेढा करके रख दिया, मैडम यह सब देख ही रही थी| पार्टी ख़त्म होने के बाद मैडम ने ताऊ से पूछा -

मैडम:- ताऊ तुमने कप को प्लेट में टेढा क्यों रखा ? कप प्लेट के अन्दर रखते या फ़िर बाहर रखते|

ताऊ :- मैडम मैंने सोचा कि जिन लोगों ने कप प्लेट में रखा है उन्हें चाय और चाहिए और जिन्होंने कप बाहर रखा है उन्हें चाय दुबारा नही चाहिए| अतः मैंने कप को टेढा रख दिया कि भाई " डाल दोगे तो पी लेंगे वरना कोई बात नही " |

टिप्पणी कर दोगे तो ठीक वरना कोई बात नही ! ताऊ के कप की तरह टिप्पणी बॉक्स भी टेढा है |।

Dec 25, 2008

परमवीर हवलदार मेजर पीरु सिंह

6 राजपुताना रायफल्स के हवलदार मेजर पीरु सिंह शेखावत झुंझुनू के पास बेरी गांव के लाल सिंह शेखावत के पुत्र थे जिनका जन्म 20 मई 1918 को हुआ था | जम्मू कश्मीर में तिथवाल के दक्षिण में इन्हे शत्रु के पहाड़ी मोर्चे को विजय करने का आदेश मिला | दुश्मन ने यहाँ काफी मजबूत मोर्चा बंदी कर रखी थी ज्योही ही ये मोर्चे की और अग्रसर हुए दोनों और से शत्रु की और भयंकर फायरिंग हुयी व भारी मात्रा में इन पर बम भी फेंके गए | पीरु सिंह आगे वाली कंपनी के साथ थे और भारी संख्या में इनके साथी मारे गए और कई घायल हो गए ये अपने साथियों को जोश दिलाते हुए युद्ध घोष के साथ शत्रु के एम एम जी मोर्चे पर टूट पड़े और बुरी तरह घायल होने बावजूद अपनी स्टेनगन और संगीन से पोस्ट पर मौजूद दुश्मनों को खत्म कर एम एम जी की फायरिंग को खामोश कर दिया लेकिन तब तक उनकी कम्पनी के सारे साथी सैनिक मारे जा चुके थे वे एक मात्र जिन्दा लेकिन बुरी तरह घायल अवस्था में बचे थे चेहरे पर भी बम लगने के कारण खून बह रहा था लेकिन जोश और मातृभूमि के लिए बलिदान की कामना लिए वे शत्रु के दुसरे मोर्चे पर हथगोले फेंकते हुए घुस गए दुसरे मोर्चे को भी नेस्तनाबूत कर वे अपने क्षत-विक्षत शरीर के साथ दुश्मन के तीसरे मोर्चे पर टूट पड़े ,रास्ते में सिर में गोली लगने पर ये १९ जुलाई १९४८ को वीर गति को प्राप्त हुए |
भारत सरकार ने इन्हे मरणोपरांत इनकी इस महान और अदम्य वीरता के लिए वीरता के सबसे उच्च पदक परमवीर चक्र से सम्मानित किया |

Dec 24, 2008

फेल होने वाले छात्रों का क्या दोष ?

यदि कोई छात्र फेल होता है तो उसमे उसका क्या दोष, आख़िर साल में 365 दिन ही तो होते है जो एक शेक्षणिक सत्र के लिए कितने कम होते है यदि आपको कम नही लगते तो पढिय कि कैसे एक छात्र को पढने के लिए तो समय ही नही मिल पाता ?
1- रविवार :- एक साल 52 तो रविवार ही हो जाते है और आप जानते है रविवार को आराम करने के लिए छुट्टी होती है न कि पढने के लिए ! अब बचे 313 दिन
2- ग्रीष्मकालीन छुट्टियाँ :- ये भी एक सत्र में लगभग 50 हो जाती है और आप समझ सकते है कि इतने गर्म मौसम में छात्र कैसे पढ़ सकते है ! अब बचे 263 दिन
3- आठ घंटे छात्रों को रोज अच्छे स्वास्थ्य के लिए सोने को चाहिय मतलब 130 दिन ! अब बचे 141 दिन
4- एक घंटा छात्रों को अच्छी सेहत के लिए आख़िर खेलने को भी चाहिय मतलब साल में 15 दिन ! अब बचे 126 दिन
5- दो घंटे रोज बच्चों को खाना खाने और उसे सही तरीके से चबाकर पचाने के लिए भी चाहिए मतलब साल में 30 दिन ! अब बचे 96 दिन
6- आदमी आख़िर सामाजिक प्राणी है अतः उसे एक घंटा रोजाना आपसी बातचीत के लिए चाहिए यानी वर्ष में 15 दिन ! बचे 81 दिन
7- वर्षभर में परीक्षाओं में भी छात्रों के 35 दिन खर्च हो जाते है ! अब बचे 46 दिन
8- साल भर में त्योंहारों व अन्य कार्यकर्मों की छुटियाँ जोडें तो लगभग 40 दिन ! अब बचे 6 दिन
9- आखिर तीन दिन साल में कोई छात्र बीमार भी तो पड़ेगा तब पढेगा कैसे ! अब बचे 3 दिन
10- अरे भाई सिनेमा या अन्य सांस्कृतिक समारोह के लिए भी तो ज्यादा नही तो साल में दो दिन तो दोगे या नही ! अब बचा एक दिन
11- अब साल में एक दिन जन्म दिन भी तो आता है अब उस दिन छात्र अपना जन्म दिन भी तो मनायेगा,दोस्तों को पार्टी भी देगा तो उस दिन पढेगा कैसे ?
अब बचा 0 दिन पढाई के लिए

अब आप ही बताये बेचारे फेल होने छात्र का क्या कसूर ?

कुछ मजेदार परिभाषाएं

ऑरकुट पर एक मित्र ने कुछ शब्दों को मजेदार परिभाषाएं स्क्रब की जो यहाँ हुबहू प्रस्तुत है
अनुभव : भूतकाल में की गई गलतियों का दूसरा नाम ।

अवसरवादी : वह व्यक्ति, जो गलती से नदी में गिर पड़े तो नहाना शुरू कर दे।


कंजूस : वह व्यक्ति जो जिंदगी भर गरीबी में रहता है ताकि अमीरी में मर सके।

अपराधी : दुनिया के बाकी लोगों जैसा ही मनुष्य, सिवाय इसके कि वह पकड़ा गया है।


अधिकारी : वह जो आपके पहुंचने के पहले ऑफिस पहुंच जाता है और यदि कभी आप जल्दी पहुंच जाएं तो काफी देर से आता है।




समझौता : किसी चीज को बांटने का वह तरीका जिसमें हर व्यक्ति यह समझता है कि उसे बड़ा हिस्सा मिला।


कान्फ्रेन्स रूम : वह स्थान जहां हर व्यक्ति बोलता है, कोई नहीं सुनता है और अंत में सब असहमत होते हैं।


परम आनंद : एक ऐसी अनुभूति जब आप अनुभव करते हैं कि आप एक ऐसी अनुभूति को अनुभव करने जा रहे हैं जो आपने पहले कभी अनुभव नहीं की है।


श्रेष्ठ पुस्तक : जिसकी सब प्रशंसा करते हैं परंतु पढ़ता कोई नहीं है।


कार्यालय : वह स्थान जहां आप घर के तनावों से मुक्ति पाकर विश्राम कर सकते हैं।


समिति : ऐसे व्यक्ति जो अकेले कुछ नहीं कर सकते, परंतु यह निर्णय मिलकर करते हैं कि साथ साथ कुछ नहीं किया जा सकता।

Dec 22, 2008

बातां की ब्यालू (बातों ही बातों में डिनर)

बात बहुत पुराणी है उस ज़माने में यातायात के लिए मोटर-गाड़ी नही हुआ करती थी और राजस्थान में तो ऊंट गाड़ी ही यातायात का मुख्य साधन था | रेत के टिल्लो के बीच से दूर-दूर तक सफर बिना ऊंट के सम्भव ही नही था इसीलिए गांवों में लोग यातायात और खेती बाड़ी के कामों के लिए ऊंट पालते थे | शोकिया लोगों के ऊंट तो देखते ही बनते थे और अपणा ताऊ भी एक शानदार ऊंट और सजी-धजी गाड़ी रखता था आस-पास के धनी लोगों में यातायात के लिए ताऊ की ऊंट-गाड़ी काफी मशहूर थी और ताऊ को भी ऊंट-गाड़ी के किराये से अच्छी आमदनी हो जाया करती थी | एक दिन गांव के सेठ जी को सेठानी के संग दूर रिश्तेदारी में कही जाना था सो सेठ जी ने ताऊ की गाड़ी किराये कर ली और चल दिए यात्रा पर |ताऊ के साथ रास्ते में लुट-पाट का खतरा भी नही रहता था क्योकि ताऊ के लट्ठ से दूर-दूर के लुटेरे व उच्चके डरते थे | चूँकि सफर काफी लंबा था सो सेठानी ने पुडी,मालपुए,गुंद के लड्डू और हलवा आदि बनाकर रास्ते में खाने के लिए गाड़ी में रख लिया,चलते चलते रात होने पर ताऊ ने एक टिल्ले के पास गाड़ी रोककर डेरा जमा लिया कि खाने के बाद रात्रि विश्राम यही करेंगे |

ताऊ ने यह सोचकर कि सेठानी खाने में बड़ा अच्छा माल बनाकर लाएगी ही सो ताई को अपने साथ खाना बाँधने को मना कर दिया कि आज बाजरे के टिक्कड़ कौन खायेगा आज तो सेठानी जी के हाथ की बनी मिठाईयां ही खायेगे | और ये बात ताऊ की गठरी में खाना ना देख सेठानी भांप गई | डेरा ज़माने के बाद जैसे ताऊ पास ही की फोगडे की झाड़ी से ऊंट को बाँधने गया तभी मौका देख सेठानी ने सेठ से कहा कि ताऊ तो खाना लाया नही और हमने उसे खाने का पूछ लिया तो ये ताऊ हमारा सारा खाना खा जाएगा और हम भूखे रह जायेगे सो दोनों ने मिलकर प्लान बनाया कि किसी तरह ताऊ को बातों ही बातों में टरका दिया जाए और थक कर जब ताऊ सो जाएगा तब हम चुपचाप खाना खा लेंगे | इसी प्लान के अनुसार ताऊ के आते ही सेठ जी बोले -

ताऊ खाना न तो आप लाये न हम, अब क्यों न हम बातों की ही ब्यालू (रात का खाना) करले |

ताऊ भी अब सेठ जी व सेठानी का प्लान भांप गया आख़िर ताऊ भी तो ताऊ था |

ताऊ- तो ठीक है सेठ जी पहले आप शुरू करो |

सेठ जी - ताऊ जब रामपुर वाले शाह जी के बेटे की बारात में गए थे वहां क्या मिठाईयां बनी थी रस-गुल्ले, गाजर व दाल का हलवा वाह खा कर मजा आ गया और ताऊ श्यामगढ़ वाले शाह जी के यहाँ तो खाते-खाते पेट भर गया लेकिन दिल नही भरा क्या रस-मलाई थी इमरती का तो कोई जबाब ही नही था |

इस तरह सेठ जी ने खाने की बातें करते करते अपनी तोंद पर हाथ फेरा,एक झूटी डकार ली और बोले ताऊ मेरा तो पेट भर गया अब तुम शुरू करो |

ताऊ- सेठजी वो हमारे दोस्त है न भाटिया जी एक बार उनके यहाँ गए थे क्या खाना था भाटिया के यहाँ बकरे व मुर्गे का मीट और साथ में वो जर्मन वाली अंग्रेजी दारू, पीते गए और खाते गए नशा भी अच्छा हुआ और सेठ जी वो डूंगर सिंह जी के यहाँ बारात में जब गए थे मजा ही आ गया वो महणसर वाली महारानी दारू क्या नशा है उसमे, बस पीते गए पीते गए और इतना नशा हुआ कि कुछ पता ही नही, नशे में कितने लोगों को लट्ठ मार दिए | और सेठ जी अब तो उसे याद कर ही नशा चढ़ गया है |

और ताऊ ने नशे में टल्ली होने का नाटक करते हुए जोर-जोर से हाट-हूट कर चिल्लाते हुए हाथ पैर इधर उधर मारने शुरू कर दिए जिनकी एक आद सेठ-सेठानी को भी पड़ गई और दोनों डर के मारे कि - अब ताऊ को नशा हो गया है कहीं लट्ठ उठाकर मारधाड़ न करने लग जाए अतः भाग कर पास ही एक फोगडे कि झाड़ी में जाकर छुप गए |
तब ताऊ ने खोली खाने की पोटली और हाट-हूट का हल्ला करते हुए सेठानी का सारा खाना खा कर तन कर सो गया | बेचारे सेठ सेठानी को भूखे पेट कहाँ नींद आने वाली थी |
सुबह ताऊ उठते ही दोनों से बोला रात को नशा कुछ ज्यादा ही हो गया था कहीं नशे में आपको कुछ कह दिया तो बुरा मत मानना |

Dec 21, 2008

धरती का बीच(सेंटर पॉइंट)

गांव के चौपाल पर हथाई (बातें करने वालों की भीड़) जुटी हुई थी इन हथाइयों में गांववासी हर मसले पर अपने हिसाब से चर्चा करते रहते है |राजनीती,विज्ञान,खेतीबाड़ी,मौसम,धर्म,अर्थव्यवस्था और विदेश नीति तक पर बड़े मजेदार और चुटीली भाषा में चर्चाएँ होती सुनी जा सकती है| इन चर्चाओं में कई मुद्दों पर ताउओं की सीधी साधी व्याख्या और टिप्पणियाँ सुनकर बड़ा मजा आता है|

ऐसी एक हथाई में चौपाल पर गांव के पंडित जी जो काशी पढ़कर आए थे ज्योतिष और भूगोल पर अपना ज्ञान बघारते हुए भूमध्य रेखा आदि के बारे में व्याख्यान दे रहे थे कि बीच में ही एक ताऊनुमा आदमी पूछ बैठा कि धरती का बीच (सेंटर पॉइंट) कहाँ है अब बेचारे पंडितजी क्या जबाब दे उनके किसी भी उत्तर से कोई सहमत नही दिखा और बहस बढती गई किसी ने कहीं बताई तो किसी ने कहीं | आपसी बहस चल ही रही थी कि अपना ताऊ हाथ में लट्ठ लिए आता दिखाई दिया चूँकि गांव में लोग ताऊ को ज्यादा ही ज्ञानी समझते थे और समझे भी क्यों नही, ताऊ के तर्कों के आगे अच्छों अच्छों की बोलती बंद हो जाती है | सो ताऊ के चौपाल पर पहुचते ही लोगों ने प्रश्न किया कि ताऊ धरती का बीच कहाँ है?
ताऊ ठहरा हाजिर जबाब सो अपना लट्ठ वहीं रेत में गाड कर बोला -" ये रहा धरती का बीच" किसी को कोई शक हो तो नाप कर देख लो |

Dec 19, 2008

कांग्रेसी,कामरेड तंग करते है,बीजेपी अनाज नही होने देती

कांग्रेसी पुरे चौमासे तंग करते है कामरेड हमेशा परेशान करतें है और बीजेपी खेतों में अनाज पैदा नही होने देती | ये सब पढ़कर शायद आप चौंक रहे होंगे लेकिन ये सच है अभी दो दिन पहले राजस्थान के सीकर जिले स्थित अपने गांव के प्रवास के दौरान गुवाड़ (चौपाल) में किसानों द्वारा की जा रही चर्चा में एक किसान बोल रहा था कि रात को मेरे खेत में कोमरेडों ने फसल का काफी नुकशान कर दिया और उनको भगाने के चक्कर में रात को पुरी नींद सो नही पाया | ये बात सुनकर मै भी असमंजस में पड़ गया कि कामरेडों का फसल से क्या मतलब | पूछने पर एक किसान ने बड़े विनोदपूर्ण ढंग से बताया कि कांग्रेसी बरसात के दिनों में तंग करते है,कामरेड हमेशा तंग करते है और बीजेपी खेतों में फसल नही होने देती चौथी पार्टी यहाँ है नही | और उसके बाद इस सम्बन्ध में मुझे विस्तार से मिली जानकारी निम्न है -

1- कांग्रेसी :- बरसात में पैदा होने वाले एक कीडे को यहाँ के लोग कांग्रेसी कहते है यह शरीर पर जहाँ भी चल फ़िर जाता है वहां-वहां शरीर पर फोडे निकल जाते है यह कीड़ा पुरे बरसात के मौसम में लोगों को परेशान करता है |

2- कामरेड :- अमरीकन और जर्सी गायों के बछडे खेती बाड़ी के कामो में किसी तरह काम नही आते है अतः न तो उनका कोई उपयोग है और न ही वे बिकते है सो पशुपालक इन्हे बेकार समझ छोड़ देते है ऐसे छोड हुए बछडे आवारा होकर झुंड के झुंड खेतों में फसल को नुकसान पहुचाते है जिससे किसान बड़े परेशान रहते है उन्हें रात भर जागकर इन आवारा बछडों से अपनी फसल बचाने को खेतो की रखवाली करनी पड़ती है और ये बछडे भी इतने ढीठ होते है कि जब तक ताऊ ब्रांड लट्ठ की दो चार इन्हे नही पड़े ये भागते तक नही | चूँकि हमारे विधानसभा क्षेत्र में पिछले लगभग बीस सालों से कोमरेड विधायक जीतता आ रहा है लाख जतन करने के बावजूद दूसरी पार्टिया उसे हरा नही पाती| अब बाकि पार्टियों के लिए तो ये विधायक ऐसा ढीठ है कि उनसे कभी हारता ही नहीं| और हाँ ज्यादातर बेरोजगार आवारा युवक उसके कार्यकर्त्ता है जो इन्ही बछडों की तरह आवारा और ढीठ है अतः इनकी कुछ प्रकृति आपस समान होने के कारण किसानों ने इन बछडों का नामकरण कामरेड कर रखा है और आम बोलचाल में किसान इन आवारा बछडों को कोमरेड कह कर ही संबोधित करते है |

3- बीजेपी घास :- अटल जी प्रधान मंत्री बनने से पहले और राममंदिर मुद्दे के बाद जिस तरह तेजी से उभरी लगभग उसी समय और उसी तेजी से गेहूँ के बीज के साथ एक पीले फूलों वाली घास खरपतवार बनकर सारे खेतों में फ़ैल गई जब तक किसान इस आर्जीमोन श्रेणी की पीले फूलों वाली घास के बारे में कुछ जान पाता ये पुरे खेतों में इस तरह फ़ैल गई जैसे फसल बो रखी हो | बीजेपी और इस घास के फैलाव की समानता और इसके पीले फूलों की वजह से किसानो ने इस घास का नाम बीजेपी रख दिया और अब क्षेत्र का आम आदमी इसे बीजेपी घास के नाम से ही जनता है यह घास फसलों पर विपरीत असर डालती है जिस खेत में इसकी अधिकता है वहां अनाज के पौधे सही ढंग से पनप नही सकते | हालाँकि जागरूक और मेहनत-कश किसानो ने तो इस घास को उसी तरह उखाड़ फैंका जिस तरह राजस्थान की वसुंधरा सरकार को इन चुनाओ में | लेकिन आलसी किसानों के खेतों में यह घास अब भी बहुतायत से मौजूद है और हवा के साथ अपने बीजों का प्रसार करने में लगी है |

  
         कोमरेड                      बीजेपी घास                कोमरेड

राणा प्रताप जीवन दर्शन केंद्र बनाने का संकल्प

भूपेन्‍द्रसिंह चूण्‍डावत, उदयपुर
उदयपुर। राष्ट्रीय चरित्र की मिसाल अजेय महाराणा प्रताप के जीवन और दर्शन को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प करने वाले पूर्व पत्रकार विद्याधर पानट का कहना हैं कि उनके रग-रग में महाराणा प्रताप बसे हैं। उन्होंने इस हफ्ते मेवाड के कुंभलगढ, दिवेर, गोगुंदा, चित्तौडगढ, चावंड, हल्दीघाटी, उदयपुर का दौरा किया और प्रताप से जुडे सभी स्थानों की मिट्टी को सिर पर चढाई तथा प्रताप पर मराठी में हजार पेज लिखने का संकल्प किया।

विगत सात वर्ष से 9 राज्यों में जगह-जगह भ्रमण कर प्रताप के जीवन आदर्श को उजागर करने का प्रयास जारी है। अब तक दो हजार सभाओं के माध्यम से प्रताप के जीवन दर्शन को आम लोगों तक पहुंचाया है। प्रताप के जीवन दर्शन को सुनकर बडे तो क्या स्कूली छात्र-छात्रओं में राष्ट्रीयता का भाव देखा गया। उनके चेहरों पर अलग ही चेतना का भाव उजागर हुआ।

प्रभु एकलिंगनाथ के आशीर्वाद से जलगांव में पांच एकड में 10 करोड की लागत से महाराणा प्रताप जीवन दर्शन केंद्र बनाने का संकल्प लिया है। केंद्र को एक ट्रस्ट के रूप में तैयार किया जाएगा जिसमें प्रबुद्धजन सदस्य होंगे और ये केंद्र आम जनता का होगा। पांच वर्ष में तैयार होने वाले केंद्र में चार भव्य सभागृह होंगे। जिसमें प्रताप के जीवन आधारित चित्रों की प्रदर्शनी, अस्त्र-शस्त्र, थियेटर, पुस्तकालय होगा। यहां आकर छात्र-छात्राएं प्रताप के जीवन दर्शन को आधार मानकर पीएचडी कर सकेंगे। केंद्र का परकोटा कुंभलगढ के परकोटे के भांति होगा। केंद्र में 105 फीट ऊंची प्रताप की आदमकद प्रतिमा लगेगी। ये प्रतिमा महाराष्ट्र के बुलढाना जिले में स्थापित 105 फीट की हनुमान प्रतिमा की भांति होगी।

श्री पानट का कहना है कि वे केंद्र को इस प्रकार आकार देना चाहते है कि जो लोग अजंता-एलोरा की मूर्तियां देखने आते है वे जलगांव में प्रताप के केंद्र को देखे बिना नहीं जाए। श्री पानट उदयपुर में प्रताप से जुडे स्मारकों का अवलोकन करने उदयपुर आए हुए है।

Dec 14, 2008

राव जयमल,मेड़ता



"मरण नै मेडतिया अर राज करण नै जौधा "
"मरण नै दुदा अर जान(बारात) में उदा "
उपरोक्त कहावतों में मेडतिया राठोडों को आत्मोत्सर्ग में अग्रगण्य तथा युद्ध कौशल में प्रवीण मानते हुए मृत्यु को वरण करने के लिए आतुर कहा गया है मेडतिया राठोडों ने शौर्य और बलिदान के एक से एक कीर्तिमान स्थापित किए है और इनमे राव जयमल का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है | कर्नल जेम्स टोड की राजस्थान के प्रत्येक राज्य में "थर्मोपल्ली" जैसे युद्ध और "लियोनिदास" जैसे योधा होनी की बात स्वीकार करते हुए इन सब में श्रेष्ठ दिखलाई पड़ता है | जिस जोधपुर के मालदेव से जयमल को लगभग २२ युद्ध लड़ने पड़े वह सैनिक शक्ति में जयमल से १० गुना अधिक था और उसका दूसरा विरोधी अकबर एशिया का सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति था |अबुल फजल,हर्बर्ट,सर टामस रो, के पादरी तथा बर्नियर जैसे प्रसिद्ध लेखकों ने जयमल के कृतित्व की अत्यन्त ही प्रसंशा की है | जर्मन विद्वान काउंटनोआर ने अकबर पर जो पुस्तक लिखी उसमे जयमल को "Lion of Chittor" कहा |

राव जयमल का जन्म आश्विन शुक्ला ११ वि.स.१५६४ १७ सितम्बर १५०७ शुक्रवार के दिन हुआ था | सन १५४४ में जयमल ३६ वर्ष की आयु अपने पिता राव विरमदेव की मृत्यु के बाद मेड़ता की गद्दी संभाली | पिता के साथ अनेक विपदाओं व युद्धों में सक्रीय भाग लेने के कारण जयमल में बड़ी-बड़ी सेनाओं का सामना करने की सूझ थी उसका व्यक्तित्व निखर चुका था और जयमल मेडतिया राठोडों में सर्वश्रेष्ठ योद्धा बना | मेड़ता के प्रति जोधपुर के शासक मालदेव के वैमनस्य को भांपते हुए जयमल ने अपने सीमित साधनों के अनुरूप सैन्य तैयारी कर ली | जोधपुर पर पुनः कब्जा करने के बाद राव मालदेव ने कुछ वर्ष अपना प्रशासन सुसंगठित करने बाद संवत १६१० में एक विशाल सेना के साथ मेड़ता पर हमला कर दिया | अपनी छोटीसी सेना से जयमल मालदेव को पराजित नही कर सकता था अतः उसने बीकानेर के राव कल्याणमल को सहायता के लिए ७००० सैनिकों के साथ बुला लिया | लेकिन फ़िर भी जयमल अपने सजातीय बंधुओं के साथ युद्ध कर और रक्त पात नही चाहता था इसलिय उसने राव मालदेव के साथ संधि की कोशिश भी की, लेकिन जिद्दी मालदेव ने एक ना सुनी और मेड़ता पर आक्रमण कर दिया | पूर्णतया सचेत वीर जयमल ने अपनी छोटी सी सेना के सहारे जोधपुर की विशाल सेना को भयंकर टक्कर देकर पीछे हटने को मजबूर कर दिया स्वयम मालदेव को युद्ध से खिसकना पड़ा | युद्ध समाप्ति के बाद जयमल ने मालदेव से छीने "निशान" मालदेव को राठौड़ वंश का सिरमौर मान उसकी प्रतिष्ठा का ध्यान रखते हुए वापस लौटा दिए |
मालदेव पर विजय के बाद जयमल ने मेड़ता में अनेक सुंदर महलों का निर्माण कराया और क्षेत्र के विकास के कार्य किए | लेकिन इस विजय ने जोधपुर-मेड़ता के बीच विरोध की खायी को और गहरा दिया | और बदले की आग में झुलसते मालदेव ने मौका देख हमला कर २७ जनवरी १५५७ को मेड़ता पर अधिकार कर लिया उस समय जयमल की सेना हाजी खां के साथ युद्ध में क्षत-विक्षत थी और उसके खास-खास योधा बीकानेर,मेवाड़ और शेखावाटी की और गए हुए थे इसी गुप्त सुचना का फायदा मालदेव ने जयमल को परास्त करने में उठाया | मेड़ता पर अधिकार कर मालदेव ने मेड़ता के सभी महलों को तोड़ कर नष्ट कर दिए और वहां मूलों की खेती करवाई | आधा मेड़ता अपने पास रखते हुए आधा मेड़ता मालदेव ने जयमल के भाई जगमाल जो मालदेव के पक्ष में था को दे दिया | मेड़ता छूटने के बाद जयमल मेवाड़ चला गया जहाँ महाराणा उदय सिंह ने उसे बदनोर की जागीर प्रदान की | लेकिन वहां भी मालदेव ने अचानक हमला किया और जयमल द्वारा शोर्य पूर्वक सामना करने के बावजूद मालदेव की विशाल सेना निर्णायक हुयी और जयमल को बदनोर भी छोड़ना पड़ा | अनेक वर्षों तक अपनी छोटी सी सेना के साथ जोधपुर की विशाल सेना मुकाबला करते हुए जयमल समझ चुका था कि बिना किसी शक्तिशाली समर्थक के वह मालदेव से पीछा नही छुडा सकता | और इसी हेतु मजबूर होकर उसने अकबर से संपर्क किया जो अपने पिता हुमायूँ के साथ मालदेव द्वारा किए विश्वासघात कि वजह से खिन्न था और अकबर राजस्थान के उस समय के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक मालदेव को हराना भी जरुरी समझता था | जयमल ने अकबर की सेना सहायता से पुनः मेड़ता पर कब्जा कर लिया | वि.स.१६१९ में मालदेव के निधन के बाद जयमल को लगा की अब उसकी समस्याए समाप्त हो गई | लेकिन अकबर की सेना से बागी हुए सैफुद्दीन को जयमल द्वारा आश्रय देने के कारण जयमल की अकबर से फ़िर दुश्मनी हो गई | और अकबर ने एक विशाल सेना मेड़ता पर हमले के लिए रवाना कर दी | अनगिनत युद्धों में अनेक प्रकार की क्षति और अनगिनत घर उजड़ चुके थे और जयमल जनता जनता को और उजड़ देना नही चाहता था इसी बात को मध्यनजर रखते हुए जयमल ने अकबर के मनसबदार हुसैनकुली खां को मेड़ता शान्ति पूर्वक सौंप कर परिवार सहित बदनोर चला गया | और अकबर के मनसबदार हुसैनकुली खां ने अकबर की इच्छानुसार मेड़ता का राज्य जयमल के भाई जगमाल को सौंप दिया |
अकबर द्वारा चित्तोड़ पर आक्रमण का समाचार सुन जयमल चित्तोड़ पहुँच गया | २६ अक्टूबर १५६७ को अकबर चित्तोड़ के पास नगरी नामक गांव पहुँच गया | जिसकी सूचना महाराणा उदय सिंह को मिल चुकी थी और युद्ध परिषद् की राय के बाद चित्तोड़ के महाराणा उदय सिंह ने वीर जयमल को ८००० सैनिकों के साथ चित्तोड़ दुर्ग की रक्षा का जिम्मा दे स्वयम दक्षिणी पहाडों में चले गए | विकट योद्धों के अनुभवी जयमल ने खाद्य पदार्थो व शस्त्रों का संग्रह कर युद्ध की तैयारी प्रारंभ कर दी | उधर अकबर ने चित्तोड़ की सामरिक महत्व की जानकारिया इक्कठा कर अपनी रणनीति तैयार कर चित्तोड़ दुर्ग को विशाल सेना के साथ घेर लिया और दुर्ग के पहाड़ में निचे सुरंगे खोदी जाने लगी ताकि उनमे बारूद भरकर विस्फोट कर दुर्ग के परकोटे उड़ाए जा सकें,दोनों और से भयंकर गोलाबारी शुरू हुई तोपों की मार और सुरंगे फटने से दुर्ग में पड़ती दरारों को जयमल रात्रि के समय फ़िर मरम्मत करा ठीक करा देते |
अनेक महीनों के भयंकर युद्ध के बाद भी कोई परिणाम नही निकला | चित्तोड़ के रक्षकों ने मुग़ल सेना के इतने सैनिकों और सुरंगे खोदने वालो मजदूरों को मारा कि लाशों के अम्बार लग गए | बादशाह ने किले के निचे सुरंगे खोद कर मिट्टी निकालने वाले मजदूरों को एक-एक मिट्टी की टोकरी के बदले एक-एक स्वर्ण मुद्राए दी ताकि कार्य चालू रहे | अबुलफजल ने लिखा कि इस युद्ध में मिट्टी की कीमत भी स्वर्ण के सामान हो गई थी | बादशाह अकबर जयमल के पराकर्म से भयभीत व आशंकित भी थे सो उसने राजा टोडरमल के जरिय जयमल को संदेश भेजा कि आप राणा और चित्तोड़ के लिए क्यों अपने प्राण व्यर्थ गवां रहे हो,चित्तोड़ दुर्ग पर मेरा कब्जा करा दो मै तुम्हे तुम्हारा पैत्रिक राज्य मेड़ता और बहुत सारा प्रदेश भेंट कर दूंगा | लेकिन जयमल ने अकबर का प्रस्ताव साफ ठुकरा दिया कि मै राणा और चित्तोड़ के साथ विश्वासघात नही कर सकता और मेरे जीवित रहते आप किले में प्रवेश नही कर सकते |
जयमल ने टोडरमल के साथ जो संदेश भेजा जो कवित रूप में इस तरह प्रचलित है
है गढ़ म्हारो म्है धणी,असुर फ़िर किम आण |
कुंच्यां जे चित्रकोट री दिधी मोहिं दीवाण ||
जयमल लिखे जबाब यूँ सुनिए अकबर शाह |
आण फिरै गढ़ उपरा पडियो धड पातशाह ||एक रात्रि को अकबर ने देखा कि किले कि दीवार पर हाथ में मशाल लिए जिरह वस्त्र पहने एक सामंत दीवार मरम्मत का कार्य देख रहा है और अकबर ने अपनी संग्राम नामक बन्दूक से गोली दाग दी जो उस सामंत के पैर में लगी वो सामंत कोई और नही ख़ुद जयमल मेडतिया ही था | थोडी ही देर में किले से अग्नि कि ज्वालाये दिखने लगी ये ज्वालाये जौहर की थी | जयमल की जांघ में गोली लगने से उसका चलना दूभर हो गया था उसके घायल होने से किले में हा हा कार मच गया अतः साथी सरदारों के सुझाव पर जौहर और शाका का निर्णय लिया गया ,जौहर क्रिया संपन्न होने के बाद घायल जयमल कल्ला राठौड़ के कंधे पर बैठकर चल पड़ा रणचंडी का आव्हान करने | जयमल के दोनों हाथो की तलवारों बिजली के सामान चमकते हुए शत्रुओं का संहार किया उसके शौर्य को देख कर अकबर भी आश्चर्यचकित था | इस प्रकार यह वीर चित्तोड़ की रक्षा करते हुए दुर्ग की हनुमान पोल व भैरव पोल के बीच लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुवा जहाँ उसकी याद में स्मारक बना हुआ है |
इस युद्ध में वीर जयमल और पत्ता सिसोदिया की वीरता ने अकबर के हृदय पर ऐसी अमित छाप छोड़ी कि अकबर ने दोनों वीरों की हाथी पर सवार पत्थर की विशाल मूर्तियाँ बनाई | जिनका कई विदेश पर्यटकों ने अपने लेखो में उल्लेख किया है | यह भी प्रसिद्ध है कि अकबर द्वारा स्थापित इन दोनों की मूर्तियों पर निम्न दोहा अंकित था |
जयमल बड़ता जीवणे, पत्तो बाएं पास |
हिंदू चढिया हथियाँ चढियो जस आकास ||
हिंदू,मुस्लमान,अंग्रेज,फ्रांसिस,जर्मन,पुर्तगाली आदि अनेक इतिहासकारों ने जयमल के अनुपम शौर्य का वर्णन किया है |

जौहर और शाका

विश्व की सभी सभी जातियां अपनी स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए और समृद्धि के लिए निरंतर बलिदान करती आई है | मनुष्य जाति में परस्पर युद्धों का श्री गणेश भी इसी आशंका से हुआ कि कोई उसकी स्वतंत्रता छिनने आ रहा है तो कोई उसे बचाने के लिए अग्रिम प्रयास कर रहा है | और आज भी इसी आशंका के चलते आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक युद्ध छेड़ कर हमें अपनी स्वतंत्रता और सुरक्षा के लिए अग्रिम प्रयास जारी रखने होंगे |
राजस्थान की युद्ध परम्परा में "जौहर और शाकों" का विशिष्ठ स्थान है जहाँ पराधीनता के बजाय मृत्यु का आलिंगन करते हुए यह स्थिति आ जाती है कि अब ज्यादा दिन तक शत्रु के घेरे में रहकर जीवित नही रहा जा सकता, तब जौहर और शाके किए जाते थे |
जौहर : युद्ध के बाद अनिष्ट परिणाम और होने वाले अत्याचारों व व्यभिचारों से बचने और अपनी पवित्रता कायम रखने हेतु महिलाएं अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा कर,तुलसी के साथ गंगाजल का पानकर जलती चिताओं में प्रवेश कर अपने सूरमाओं को निर्भय करती थी कि नारी समाज की पवित्रता अब अग्नि के ताप से तपित होकर कुंदन बन गई है | पुरूष इससे चिंता मुक्त हो जाते थे कि युद्ध परिणाम का अनिष्ट अब उनके स्वजनों को ग्रसित नही कर सकेगा | महिलाओं का यह आत्मघाती कृत्य जौहर के नाम से विख्यात हुआ |सबसे ज्यादा जौहर और शाके चित्तोड़ के दुर्ग में हुए | चित्तोड़ के दुर्ग में सबसे पहला जौहर चित्तोड़ की महारानी पद्मिनी के नेतृत्व में 16000 हजार रमणियों ने अगस्त 1303 में किया था |
शाका : महिलाओं को अपनी आंखों के आगे जौहर की ज्वाला में कूदते देख पुरूष कसुम्बा पान कर,केशरिया वस्त्र धारण कर दुश्मन सेना पर आत्मघाती हमला कर इस निश्चय के साथ रणक्षेत्र में उतर पड़ते थे कि या तो विजयी होकर लोटेंगे अन्यथा विजय की कामना हृदय में लिए अन्तिम दम तक शौर्यपूर्ण युद्ध करते हुए दुश्मन सेना का ज्यादा से ज्यादा नाश करते हुए रणभूमि में चिरनिंद्रा में शयन करेंगे | पुरुषों का यह आत्मघाती कदम शाका के नाम से विख्यात हुआ |

Dec 12, 2008

राव विरमदेव, मेड़ता

राव विरमदेव ने 38 वर्ष की आयु में 1515 ई. में अपने पिता राव दुदा के निधन के बाद मेड़ता का शासन संभाला | व्यक्तित्व और वीरता की द्रष्टि से वे अपने पिता के ही समान थे और उन्होंने भी पिता की भांति जोधपुर राज्य से सहयोग और सामंजस्य रखा |
इसीलिए सारंग खां व मल्लू खां जैसे बलवानों को परास्त करने में विरमदेव सफल रहे | विरमदेव चित्तोड़ के महाराणा सांगा के विश्वासपात्र व्यक्ति थे | उन्होंने सांगा द्वारा गुजरात के बादशाह मुज्जफरशाह के विरुद्ध,सांगा के ईडर अभियान के अलावा मालवा और दिल्ली के सुल्तानों से सांगा के युधों में अपने शोर्य का डंका बजाया था |
लेकिन राव सुजा के पश्चात् जोधपुर की राजगद्दी के लिए जो उठापटक हुयी उसके चलते जोधपुर और मेड़ता के बीच वैमनस्य के बीज बो दिए | और दोनों राज्यों के बीच विरोध की खाई अधिक गहरी हो गई | जो सोहार्दपूर्ण सम्बन्ध मेड़ता और मेवाड़ के बीच रहे उसी प्रकार के संबंध जोधपुर के साथ भी रहते तो आज इतिहास कुछ और ही होता | 12 मई 1531 को राव गंगा के निधन के बाद राव मालदेव जोधपुर के शासक बनें जो अपने समय के राजपुताना के सबसे शक्तिशाली शासक माने जाते थे उनके मन में विरमदेव के प्रति घृणा के बीज पहले से ही मौजूद थे अतः शासक बनते ही उन्होंने मेड़ता पर आक्रमण शुरू कर दिए | पराकर्मी विरमदेव ने अजमेर में मालवा के सुल्तान के सूबेदार को भगाकर अजमेर पर भी कब्जा कर लिया जो मालदेव को सहन नहीं हुआ और उसने अपने पराकर्मी सेनापति जैता और कुंपा के नेतृत्व में विशाल सेना भेज कर मेड़ता और अजमेर पर हमला कर विरमदेव को हरा खदेड़ दिया लेकिन साहसी विरमदेव ने डीडवाना पर अधिकार जा जमाया | किन्तु मालदेव की विशाल सेना ने वहां भी विरमदेव को जा घेरा जहाँ विरमदेव ने मालदेव की सेना से युद्ध में जमकर तलवार बजायी | उनकी वीरता से प्रभावित होकर सेनापति जैता ने विरमदेव की वीरता की प्रशंसा करते हुए कहा कि आप जैसे वीर से यदि मालदेव का मेल हो जाये तो मालदेव पुरे हिन्दुस्थान पर विजय पा सकतें है | डीडवाना भी हाथ से निकलने के बाद विरमदेव अमरसर राव रायमल जी के पास आ गए जहाँ वे एक वर्ष तक रहे और आखिर वे शेरशाह सूरी के पास जा पहुंचे | मालदेव कि विरमदेव के साथ अनबन का फायदा शेरशाह ने उठाया,चूँकि मालदेव की हुमायूँ को शरण देने की कोशिश ने शेरशाह को क्रोधित कर दिया था जिसके चलते शेरशाह ने अपनी सेना मालदेव की महत्त्वाकांक्षा के मारे राव विरमदेव व बीकानेर के कल्याणमल के साथ भेजकर जोधपुर पर चढाई कर दी |
मालदेव भी अपनी सेना सहित सामना करने हेतु आ डटे लेकिन युद्ध की शुरुआत से पहले ही विरमदेव की वजह से अपने सामंतों की स्वामिभक्ति से आशंकित हो मालदेव युद्ध क्षेत्र से खिसक लिए | इस सुमैलगिरी युद्ध के नाम से प्रसिद्ध युद्ध में शेरशाह की फौज से मालदेव के सेनापति जैता और कुंपा ने भयंकर युद्ध कर भारी नुकसान पहुँचाया, विजय के बाद अपनी सेना के भारी नुकसान को देखकर शेरशाह ने कहा " मुट्ठी भर बाजरे की खातिर मै दिल्ली की सल्तनत खो बैठता | " इस युद्ध विजय के बाद शेरशाह ने विरमदेव व कल्याणमल के साथ सेना भेजकर जोधपुर पर अधिकार करने के बाद मेड़ता पर विरमदेव का पुनः अधिकार कराया | इस प्रकार छह वर्ष तक कष्ट सहन करने के बाद विरमदेव मेड़ता पर अधिकार करने में कामयाब हुए लेकिन इसके बाद वे ज्यादा दिन जीवित नहीं रह सके और फरवरी 1544 में 66 वर्ष की अवस्था में उनका स्वर्गवास हो गया |

Dec 11, 2008

फ्लैश वेबसाइट बनाने के सोफ्टवेयर

पिछले दिनों जालतंत्र पर वेब साईट बनाने के सोफ्टवेयर खोजते हुए गूगल बाबा ने फ्लैश वेबसाइट बनाने के कुछ बड़े मजेदार सोफ्टवेयर खोज दिए जिनमे a4Desk सोफ्टवेयर फ्लैश वेब साईट बनाने में बड़ा आसान निकला इस सोफ्टवेयर को डाउनलोड कर इंस्टाल करने के बाद रन करते ही एक विण्डो खुलती है जिसमे नई साईट बनाने, पुराने प्रोजेक्ट को एडिट करने के आप्शन मिलते है | नई साईट बनाने का आप्शन सलेक्ट कर क्रेअट बटन दबाते ही ढेर सारे टेम्पलेट के साथ एक विंडो खुलती है मनचाहा टेम्पलेट चुनते ही साईट का प्रीव्यू तैयार है | प्रीव्यू के निचे ही आप्शन में अपनी साईट का नाम,स्लोगन, ई-मेल पता भरने के लिए कॉलम दे रखे है जिनमे नाम व पते टाइप करने साथ ही उपर प्रीव्यू में तुरंत दिखाई देने लगते है | ये सब भरने के बाद साथ ही सभी पेजों के नाम दिए मिलेंगे आप चाहे तो उनका नाम बदल सकते है | और जिस पेज में आपको कुछ लिखना है उस पर क्लिक करते ही निचे बॉक्स खुलता है जिसमे मनचाहे टेक्स्ट लिख सकते है फोटो आदि भी लगा सकतें है फोटो को री-साइज़ करने का आप्शन भी इस सोफ्टवेयर में है जो फोटो फाइल अपलोड करते ही अपने आप री-साइज़ करने के लिए पूछता है |मजे की बात तो इस वेब बिल्डर सोफ्टवेयर में यह है कि जो भी सामग्री हम वेब पेज पर जोड़ते है उसका तुंरत प्रीव्यू दिखता जाता है और साईट प्रोजेक्ट सेव करने बाद इस सोफ्टवेयर अंदर ही बना FTP आप्शन भी है जो इसके द्वारा बनी वेब साईट को वेब-सर्वर पर अपलोड भी कर देता है | इस सोफ्टवेयर का प्रयोग एकदम आसान है इतना आसान कि ज्यादा से ज्यादा एक घंटे में आप अपनी व्यक्तिगत या अपनी कम्पनी की वेब साईट बना कर जालतंत्र पर पुब्लिश भी कर सकतें है
इस सोफ्टवेयर को डाउनलोड करने के लिए यहाँ चटका लगायें

Dec 7, 2008

हिंदी पर बंदिश लगाने वाले आज सीख रहे हैं हिंदी

कुछ दिन पहले ये लेख एक मित्र द्वारा ई-मेल से प्राप्त हुआ साथ ही ज्यादा से ज्यादा लोगों तक इसे पहुँचाने का अनुरोध भी | इसी अनुरोध के मध्यनजर ये लेख हुबहू पोस्ट कर रहा हूँ |
आप भी हिन्दी के बारे में जानकारी रखते है | एक और जानकारी इस लेख के माद्यम से प्राप्त करें और दुसरो को भी देने की कृपया कराएँ |
:-गुवाहाटी से विनोद रिंगानिया-:
राजनीतिक नारेबाजी को छोड़ दें तो व्यावहारिक धरातल पर भारतीय उपमहादेश में हिंदी की उपयोगिता से कोई भी इनकार नहीं कर सकता। वे चरमपंथी अलगाववादी भी नहीं जो हिंदी विरोध को अपने राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा मानते हैं। असम के अलगाववादी संगठन उल्फा के बारे में भी यह बात सच है। प्रबाल नेओग उल्फा के वरिष्ठ नेताओं में से हैं। 17 सालों तक चरमपंथियों की एक पूरी बटालियन के संचालन का भार इन पर हुआ करता था। पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए सिरदर्द
बने अपने मुख्य सेनाध्यक्ष परेश बरुवा के निर्देश पर प्रबाल नेओग ने असम में कई हिंदीभाषियों के सामूहिक कत्लेआम को संचालित किया था। लेकिन वही नेओग आज इस बात को स्वीकार करने से नहीं हिचकते कि वे जल्दी से जल्दी अच्छी हिंदी सीख लेना चाहते हैं। प्रबाल के हिंदी प्रेम के पीछे है हिंदी का उपयोगिता। उनका कहना है कि भारत सरकार के अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व के साथ हिंदी के बिना बातचीत की आप कल्पना ही नहीं कर सकते। पुलिस के हत्थे चढ़ चुके प्रबाल को हाल ही में कारावास से रिहा किया गया था। वे उल्फा के उस गुट का नेतृत्व कर रहे हैं जो अब भारत सरकार के साथ बातचीत के द्वारा समस्या को हल कर लेने का हिमायती है। ये लोग चाहते हैं कि उनका शीर्ष नेतृत्व सरकार के साथ बातचीत के लिए बैठे। हालांकि अब तक परेश बरुवा तथा उल्फा के अध्यक्ष अरविंद राजखोवा की ओर से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई है। बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने के क्रम में प्रबाल तथा उसके साथियों का सेना तथा सुरक्षा बलों के अधिकारियों से साबका पड़ा। अमूमन राज्य के बाहर से आने वाले इन अधिकारियों के साथ विचार-विनिमय के लिए दो ही विकल्प हैं। हिंदी या अंग्रेजी। इसीलिए प्रबाल नेओग ने अपने साथियों को यह हिदायत दी है कि अभ्यास के लिए रोजाना आपस में हिंदी में बातचीत की जाए। भाषा सीखने का आखिर यह अनुभवसिद्ध तरीका तो है ही। प्रबाल का कहना है कि राष्ट्रीय मीडिया वाले अपनी सारी बातें हिंदी या अंग्रेजी में ही पूछते हैं। ऐसे में यदि उनके सवालों का जवाब असमिया में दिया जाए तो राज्य के बाहर वाले उसका मतलब नहीं समझ पाएंगे। इन्हीं कारणों से 'हमारे लिए धाराप्रवाह हिंदी और अंग्रेजी बोल पाना जरूरी हो गया है'। प्रबाल का कहना है कि वे हिंदी अच्छी तरह समझ लेते हैं लेकिन बोल पाने में थोड़ी दिक्कत होती है। हिंदीभाषियों के कत्लेआम के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि सभी मुझ पर उंगली उठाते हैं लेकिन जो भी किया गया वह हाईकमान के निर्देश पर ही किया गया था। उनका कहना है कि वे कभी भी प्रत्यक्ष रूप से किसी भी हत्याकांड से नहीं जुड़े रहे। चरमपंथी नेओग स्वीकार करते हैं कि हत्या उल्फा की गोली से हो या सेना की गोली से, लेकिन जान किसी निर्दोष की ही जाती है। उल्फा के असमिया मुखपत्र स्वाधीनता तथा अंग्रेजी मुखपत्र फ्रीडम में अक्सर 'हिंदी विस्तारवाद' शब्दों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इन दो शब्दों के इस्तेमाल के द्वारा उल्फा असम में हिंदी की बढ़ती उपयोगिता का विरोध करता रहा है। किसी समय उल्फा ने असम में हिंदी फिल्मों के प्रदर्शन पर भी बंदिश लगाई थी। उन दिनों सिनेमाघर मालिकों को हिंदी फिल्में दिखाने के लिए पुलिस सुरक्षा पर
निर्भर रहना पड़ता था। उल्फा के अलावा असम के पड़ोसी मणिपुर राज्य के चरमपंथी भी हिंदी का प्रबल विरोध करते रहे हैं। असम में चरमपंथियों के हिंदी विरोधी फतवे नाकामयाब हो गए, लेकिन मणिपुर की राजधानी इंफाल में आपको किसी भी सिनेमाघर में हिंदी फिल्में आज भी देखने को नहीं मिलेगी। यही नहीं केबल आपरेटर भी चरमपंथियों के डर से हिंदी चैनलों से परहेज करते हैं। नगालैंड के अलगाववादी संगठनों द्वारा हिंदी का विरोध किए जाने की बात सामने नहीं आई। एनएससीएन (आईएम गुट) के चरमपंथी सरकार के साथ बातचीत के दौरान इस बात की दुहाई भी दे चुके हैं कि उन्होंने कभी भी भारत की राष्ट्रभाषा का विरोध नहीं किया। पूवोत्तर के नगालैंड, मणिपुर और मिजोरम में संपर्क भाषा के रूप में हालांकि अंग्रेजी का अच्छा-खासा इस्तेमाल होता है। लेकिन अरुणाचल प्रदेश में हिंदी को ही संपर्क भाषा का स्थान प्राप्त है। इसी तरह मेघालय में भी भले ही पढ़े-लिखे लोग संपर्क भाषा के रूप में अंग्रेजी का इस्तेमाल करते हों लेकिन औपचारिक शिक्षा से वंचित आम लोगों के लिए अपने कबीले से बाहर के लोगों से बातचीत करने का एकमात्र साधन हिंदी ही है। पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी प्रदेशों में बोलचाल की हिंदी का अपना ही अलग रूप है जो कई बार मनमोहक छवियां पेश करता है। जैसे, बस यात्रा करते समय अचानक आपके कानों में ये शब्द पड़ सकते हैं - 'गाड़ी रोको हम यहां गिरेगा'।

भारत की सुरक्षा के सूत्र

आज HI5.com खाते में एक मेसेज मिला जो यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ

भारत की सुरक्षा के सूत्र
1. भारत में कोई भी व्यक्ति या समुदाय किसी भी स्थिति में जाति, धर्म,भाषा,क्षेत्र के आधार पर बात करे उसका बहिष्कार कीजिए ।
2. लच्छेदार बातों से गुमराह न हों ।
3.कानूनों को जेबी घड़ी बनाके चलने वालों को सबक सिखाएं ख़ुद भी भारत के संविधान का सम्मान करें ।
4. थोथे आत्म प्रचारकों से बचिए ।
5. जो आदर्श नहीं हैं उनका महिमा मंडन तुंरत बंद हो जो भी समुदाय व्यक्ति ऐसा करे उसे सम्मान न दीजिए चाहे वो पिता ही क्यों न हो।
6. ईमानदार लोक सेवकों का सम्मान करें ।
7. भारतीयता को भारतीय नज़रिए से समझें न की विदेशी विचार धाराओं के नज़रिए से ।
8. अंधाधुंध बेलगाम वाकविलास बंद करें ।
9. नकारात्मक ऊर्जा उत्पादन न होनें दें ।
10. देश का खाएं तो देश के वफादार बनें ।
11. किसी भी दशा में हुई एक मौत को सब पर हमला मानें ।
12. देश की आतंरिक बाह्य सुरक्षा को अनावश्यक बहस का मसला न बनाएं प्रेस मीडिया आत्म नियंत्रण रखें ।
13. केन्द्र/राज्य सरकारें आतंक वाद पे लगाम कसने देश में व् देश के बाहर सख्ती बरतें ।
14: वंदे मातरम कहिये

Dec 6, 2008

वेब साईट बनाने के सोफ्टवेयर

आपको वेबसाइट बनाना बिल्कुल नही आता फ़िर भी आप अपनी वेबसाइट सोफ्टवेयर की मदद से आसानी से बना सकतें है,मुझे भी HTML की एक लाइन भी लिखना नही आती लेकिन में सोफ्टवेयर की मदद से किसी की भी केसी ही वेब साईट बना सकता हूँ | इस तरह के वेब मेकर सोफ्टवेयर जालतंत्र पर फ्री में उपलब्द है जिनमे से एक है "नामो वेब एडिटर" जिसने मुझे खासा प्रभावित किया हालाँकि "ड्रीम व्यूवर" नामक सोफ्टवेयर से भी वेब साईट बनाई जा सकती है लेकिन इसके इस्तेमाल के लिए ट्रेनिंग की जरुरत होती है जबकि नामो वेब एडिटर काम लेने में बहुत आसान है साथ ही वेब साईट बनाने के लिए इसमे कई तरह के साईट मेप और ढेर सारे टेम्पलेट उपलब्द है इस सोफ्टवेयर से वेब साईट बनाते समय मन चाही जगह फोटो, मीडिया फाइल का इस्तेमाल किया जा सकता है साथ ही इसका पब्लिशिंग विजार्ड आपकी बनाई साईट को आपके होस्ट सर्वर पर अपलोड भी कर देता है | बस आप इसे यहाँ चटका लगाकर डाउनलोड कर अपने कंप्यूटर में इंस्टाल करले और थोडी मेहनत के बाद आप इसका इस्तेमाल आसानी से समझ जायेंगे साथ ही नीचे लगा वीडियो आपको इस नामो वेब एडिटर सोफ्टवेयर का इस्तेमाल करना थोड़ा आसान कर देगा |



नामो वेब एडिटर डाउनलोड करने के लिए यहाँ चटका लगायें
एविसोफ्ट वेब बिल्डर डाउनलोड करने के लिए यहाँ चटका लगाये
वेब पेज मेकर सोफ्टवेयर डाउनलोड करने के लिए यहाँ चटका लगायें |

Dec 4, 2008

वीर राव अमरसिंह राठौड़ और बल्लू चाम्पावत

'राजस्थान की इस धरती पर वीर तो अनेक हुये है - प्रथ्वीराज,महाराणा सांगा,महाराणा प्रताप,दुर्गादास राठौड़, जयमल मेडतिया आदि पर अमर सिंह राठौड़ की वीरता एक विशिष्ट थी,उसमे शोर्य,पराक्रम की पराकाष्ठा के साथ रोमांच के तत्व विधमान थे | उसने अपनी आन-बान के लिए ३१ वर्ष की आयु में ही अपनी इहलीला समाप्त कर ली | आत्म-सम्मान की रक्षार्थ मरने की इस घटना को जन-जन का समर्थन मिला | सभी ने अमर सिंह के शोर्य की सराहना की | साहित्यकारों को एक खजाना मिल गया | रचनाधारियों के अलावा कलाकारों ने एक ओर जहाँ कटपुतली का मंचन कर अमर सिंह की जीवन गाथा को जन-जन प्रदर्शित करने का उलेखनीय कार्य किया,वहीं दूसरी ओर ख्याल खेलने वालों ने अमर सिंह के जीवन-मूल्यों का अभिनय बड़ी खूबी से किया |रचनाधर्मियों और कलाकारों के संयुक्त प्रयासों से अमरसिंह जन-जन का हृदय सम्राट बन गया |"
- डा.हुकमसिंह भाटी, वीर शिरोमणि अमरसिंह राठौड़, पृ. १०

अमर सिंह राठौड़ की वीरता सर्वविदित है ये जोधपुर के महाराजा गज सिंह के जेष्ठ पुत्र थे जिनका जन्म रानी मनसुख दे की कोख से वि.स.१६७० , १२ दिसम्बर १९१६ को हुआ था | अमर सिंह बचपन से ही बड़े उद्दंड,चंचल,उग्रस्वभाव व अभिमानी थे जिस कारण महाराजा ने इन्हे देश निकाला की आज्ञा दे जोधपुर राज्य के उत्तराधिकार से वंचित कर दिया | उनकी शिक्षा राजसी वातावरण में होने के फलस्वरूप उनमे उच्चस्तरीय खानदान के सारे गुण विद्यमान थे और उनकी वीरता की कीर्ति चारों और फ़ैल चुकी थी | १९ वर्ष की आयु में ही वे राजस्थान के कई रजा-महाराजाओं की पुत्रियों के साथ विवाह बंधन में बाँध चुके थे |
लाहोर में रहते हुए उनके पिता महाराजा गज सिंह जी ने अमर सिंह को शाही सेना में प्रविष्ट होने के लिए अपने पास बुला लिया अतः वे अपने वीर साथियों के साथ सेना सुसज्जित कर लाहोर पहुंचे | बादशाह शाहजहाँ ने अमर सिंह को ढाई हजारी जात व डेढ़ हजार सवार का मनसब प्रदान किया | अमर सिंह ने शाजहाँ के खिलाफ कई उपद्रवों का सफलता पूर्वक दमन कर कई युधों के अलावा कंधार के सैनिक अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | बादशाह शाहजहाँ अमर सिंह की वीरता से बेहद प्रभावित था |
६ मई १९३८ को अमर सिंह के पिता महाराजा गज सिंह का निधन हो गया उनकी इच्छानुसार उनके छोटे पुत्र जसवंत सिंह को को जोधपुर राज्य की गद्दी पर बैठाया गया | वहीं अमर सिंह को शाहजहाँ ने राव का खिताब देकर नागौर परगने का राज्य प्रदान किया |
हाथी की चराई पर बादशाह की और से कर लगता था जो अमर सिंह ने देने से साफ मना कर दिया था | सलावतखां द्वारा जब इसका तकाजा किया गया और इसी सिलसिले में सलावतखां ने अमर सिंह को कुछ उपशब्द बोलने पर स्वाभिमानी अमर सिंह ने बादशाह शाहजहाँ के सामने ही सलावतखां का वध कर दिया और ख़ुद भी मुग़ल सैनिकों के हाथो लड़ता हुआ आगरे के किले में मारा गया | राव अमर सिंह राठौड़ का पार्थिव शव लाने के उद्येश्य से उनका सहयोगी बल्लू चांपावत ने बादशाह से मिलने की इच्छा प्रकट की,कूटनितिग्य बादशाह ने मिलने की अनुमति दे दी,आगरा किले के दरवाजे एक-एक कर खुले और बल्लू चांपावत के प्रवेश के बाद पुनः बंद होते गए | अन्तिम दरवाजे पर स्वयम बादशाह बल्लू के सामने आया और आदर सत्कार पूर्वक बल्लू से मिला | बल्लू चांपावत ने बादशाह से कहा " बादशाह सलामत जो होना था वो हो गया मै तो अपने स्वामी के अन्तिम दर्शन मात्र कर लेना चाहता हूँ और बादशाह में उसे अनुमति दे दी | इधर राव अमर सिंह के पार्थिव शव को खुले प्रांगण में एक लकड़ी के तख्त पर सैनिक सम्मान के साथ रखकर मुग़ल सैनिक करीब २०-२५ गज की दुरी पर शस्त्र झुकाए खड़े थे | दुर्ग की ऊँची बुर्ज पर शोक सूचक शहनाई बज रही थी | बल्लू चांपावत शोक पूर्ण मुद्रा में धीरे से झुका और पलक झपकते ही अमर सिंह के शव को उठा कर घोडे पर सवार हो ऐड लगा दी और दुर्ग के पट्ठे पर जा चढा और दुसरे क्षण वहां से निचे की और छलांग मार गया मुग़ल सैनिक ये सब देख भौचंके रह गए |दुर्ग के बाहर प्रतीक्षा में खड़ी ५०० राजपूत योद्धाओं की टुकडी को अमर सिंह का पार्थिव शव सोंप कर बल्लू दुसरे घोडे पर सवार हो दुर्ग के मुख्य द्वार की तरफ रवाना हुआ जहाँ से मुग़ल अस्वारोही अमर सिंह का शव पुनः छिनने के लिए दुर्ग से निकलने वाले थे,बल्लू मुग़ल सैनिकों को रोकने हेतु उनसे बड़ी वीरता के साथ युद्ध करता हुआ मारा गया लेकिन वो मुग़ल सैनिको को रोकने में सफल रहा |

आतंक के विरुद्ध





पा.ना. सुब्रमणियन के आव्हान और उनके ब्लॉग मल्हार और प्रवीण त्रिवेदी के ब्लॉग से प्रेरित

Dec 3, 2008

स्व.पु.श्री तनसिंहजी द्वारा लिखित पुस्तकें

स्व.पु.श्री तनसिंहजी द्वारा लिखित पुस्तकें
1-राजस्थान रा पिछोला - पिछोला को अंग्रेजी में Elegy कहते है और उर्दू में मरसिया | मर्त्यु के उपरांत मृतात्मा के प्रति उमड़ते हुए करूँ उदगारों के काव्य रूप को ही पिछोला कहतें है | पिछोले म्रत्यु की ओट में गए प्रेमी की मधुर स्मृति पर श्रद्धा व प्रेम के भाव-प्रसून है |इस पुस्तक से करुण रस का रसास्वादन करके हम राजस्थानी साहित्य की सम्पन्नता प्रमाणित करने में समर्थ हो सकतें है |
2- समाज चरित्र - समाज जागरण के निमित केवल आन्दोलन ही उचित मार्ग नही है | आन्दोलन तो संगठन शक्ति का प्रदर्शन मात्र है | वह जनमत की अभिव्यक्ति है | किंतु स्वयम जनमत का निर्माण करना एक कठिन काम है | अनेक सामाजिक संस्थाएं सामाजिक शक्ति को उभारने का कार्य करती है,किंतु निर्बल की नैसर्गिक शक्ति बार -बार उभर कर अपने विनाश का कारण ही बनती है जब तक की शक्ति को उभारने वाले स्वयम शक्ति के उत्पादक न बन जाय | संस्थाएं स्वयम अपने और अपने उदेश्य के प्रति स्पष्ट नही होती तब तक सामाजिक चरित्र गोण ही बना रहता है |
इसी कमी को पुरा करने के लिए एक व्यवसायिक शिक्षण और मार्ग दर्शन की आवश्यकता महसूस करके यह पुस्तक लिखी गई | जो साधना की प्रारम्भिक अवस्था में साधकों का मार्ग दर्शन करने में उपयोगी सिद्ध हो रही है |
3-बदलते द्रश्य- इतिहास के इतिव्रतात्मक सत्य के अन्दर साहित्य के भावात्मक और सूक्ष्म सत्य के प्रतिस्ठापन की चेष्ठा ही समाज में चेतना ला सकती है | समाज में आत्म-सम्मान और आत्म-गौरव की भावनाओं का सर्जन करना इस पुस्तक का लक्ष्य है |
4- होनहार के खेल -पु.तनसिंहजी के पॉँच रोचक हिन्दी निबंदों से सृजित होनहार के खेल राजस्थान की संस्कृति,योधा समाज के जीवन दर्शन,और जीवन मूल्यों से ओत-प्रोत है इसमे राजपूत इतिहास और राजपूत सस्कृति मुखरित है | क्षत्रिय समाज के सतत संघर्ष,अद्वितीय उत्सर्ग,और महान द्रष्टि का शाश्वत सत्य गुंजित है | पु.तनसिंहजी की पीडा,तड़पन,उत्सर्ग की महत्ता और उत्थान की लालसा पुस्तक के प्रत्येक शब्द में संस्पदित है | हमारे लिए एतिहासिक आधार भूमि को ग्रहण कर एक जीवन संदेश है |
5-साधक की समस्याएं- साध्य प्राप्ति के लिए साधक के पथ में क्या समस्याएं व कठिनाईयां क्या है ? और कब-कब सामने किस रूप में बाधक बन कर आती है तथा उन्हें कैसे पहचाना जाय और उनका किस प्रकार सामना किया जाय इन सब पहलुओं का विस्तार से इस पुस्तक समाधान किया गया है |
6-शिक्षक की समस्याएं- सच्ची शिक्षा का अभिप्राय अपने भीतर श्रेष्ठ को प्रकट करना है | साधना के शिक्षक को प्राय: यह भ्रम हो जाता है कि वह किसी का निर्माण कर रहा है | सही बात तो यह है कि जो हम पहले कभी नही थे,वह आज नही बन सकते | हमारा निर्माण,किसी नवीनता की सृष्टी नही है,बल्कि उन प्रच्छन शक्तियों का प्रारम्भ है जिनसे हमारे जीवन और व्यक्तित्व का ताना बना बनता है | साधना पथ में स्वयम शिक्षक एक स्थान पर शिक्षक है और उसी स्थान पर शिक्षार्थी भी है | इसलिय शिक्षण कार्य में आने वाली समस्याएं शिक्षक की समस्याएं होती है | वे समस्याएं क्या है और किस रूप में सामने आती है,उनका समाधान क्या है ? यही इस पुस्तक का विषय है |
7- जेल जीवन के संस्मरण- भू-स्वामी आन्दोलन समय श्री तनसिंह जी को गिरफ्त्तार कर टोंक जेल में रखा गया था | जेल में जेलर और सरकार का उनके साथ व्यवहार व जेल में रहकर जो घटा और जो अनुभव किए उनके उन्ही संस्मरणों का उल्लेख इस पुस्तक में है |
8- लापरवाह के संस्मरण- इस पुस्तक में पु.तनसिंह जी के अपने अनुभव है तो उनके संघ मार्ग पर चलते उनके अनुगामियों का चित्रण भी है जिसे रोचक और मनोरंजक भाषा में पिरोकर पुस्तक का रूप दिया गया है |
9-पंछी की राम कहानी- संघ कार्य की आलोचना समय-समय पर होती रही है | तन सिंह जी की आलोचना और विरोध भी कई बार विविध रूपों में होता रहा है | विरोध के दृष्टीकोण से ही देखकर संघ के बारे में जिस प्रकार की आलोचना की गई या की जा सकती है उसे ही मनोविनोद का रूप देकर पु.तनसिंह जी ने एक लेखमाला का रूप दिया,जो इस पुस्तक के रूप में प्रस्तुत है |
10-एक भिखारी की आत्मकथा- श्री तनसिंह जी द्वारा लिखित एक भिखारी की आत्मकथा बहु-आयामी संघर्षों के धनी जीवन का लेखा-जोखा है और यह लेखा-जोखा स्वयम श्री तनसिंह जी के ही जीवन का लेखा-जोखा है |वास्तव में आत्मकथा श्री तनसिंह जी की अपनी ही है |
11-गीता और समाज सेवा - गीता श्री तनसिंह जी का प्रिय और मार्गदर्शक रही है | गीता ज्ञान के आधार पर ही उन्होंने श्री क्षत्रिय युवक संघ की स्थापना की थी | धेय्य निष्ठां और अनन्यता का मन्त्र भी उन्होंने गीता से ही पाया | क्षात्रशक्ति और संघ की आवश्यकता और महत्व भी उन्होंने गीता पढ़कर ही महसूस की |गीता का व्यवहारिक ज्ञान जिसमे कर्म,ज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय है, को संघ में उतारने का बोध भी उन्हें गीता से ही हुआ-इसी से प्रेरणा मिली | एक सच्चे समाज सेवक के लिए गीता का क्या आदेश है और किस प्रकार सहज भाव से किया जा सकता है और क्या करना आवश्यक है,इन्ही महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख "गीता और समाज सेवा " पुस्तक में किया गया है |
12- साधना पथ- गीता के आध्यात्मवाद के आन्दोलन पथ पर बढ़ते योगेश्वर श्री कृष्ण ने योग का जो मार्ग सुझाया है उसी लक्ष्य को सम्यक रूप से आत्मसात करने तक हर साधना को गतिमय होना चाहिय | सर्वांगीण साधना वही है जिसमे व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को जागृत कर सके स्वधर्म पालन एक महान कार्य है |महान कार्यों की पूर्ति के लिए ईश्वर से एकता स्थापित करना परमाव्यस्क है, किसी अनुष्ठात्मक भक्ति से ईश्वर को छला नही जा सकता |
श्री तन सिंह जी ने सम्पूर्ण योग योग मार्ग के आठ सूत्र सुझाएँ है वे हैं -
1- बलिदान का सिद्धांत 2- समष्टि योग 3- श्रद्धा 4- अभिप्षा 5- शरणागति 6- आत्मोदघाटन 7- समर्पण भाव
8- योग
14- झनकार- श्री तनसिंहजी द्वारा लिखे गए 166 गीतों,कविताओं आदि के संकलन को "झनकार" नाम देकर पुस्तक का रूप दिया गया है झनकार के एक-एक गीत एक-एक पंक्ति अपने आप में एक काव्य है |
उपरोक्त पुस्तकें " श्री संघ शक्ति प्रकाशन प्रन्यास A / 8, तारा नगर झोटवाडा, जयपुर -302012 से प्राप्त की जा सकती है |
संदर्भ - श्री संघ शक्ति प्रकाशन प्रन्यास द्वारा प्रकाशित " पूज्य श्री तनसिंहजी-एक परिचय " पुस्तक से

Dec 1, 2008

स्व.पु.श्री तनसिंह जी: एक अद्भभुत व्यक्तित्व का परिचय



मैंने स्व.श्री तनसिंहजी के लिखे कई लेख इस चिट्ठे पर प्रस्तुत किए है आज मै श्री तनसिंहजी का संक्षिप्त परिचय आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ हालाँकि उनके अद्भुत व्यक्तित्व पर एक पुरी पुस्तक ही लिखी जा सकती है फ़िर भी मै अपने इस छोटे से लेख के माध्यम से स्व.पु.तनसिंहजी का परिचय कराने की कोशिश कर रहा हूँ |

वि.सं.१९८० में बाड़मेर जिले के गांव रामदेरिया के ठाकुर बलवंत सिंह जी महेचा की धर्म पत्नी मोतिकंवरजी के गर्भ से तनसिंह जी का जन्म अपने मामा के घर बैरसियाला गांव में हुआ था वे अभी शैशवावस्था में अपने घर के आँगन में चलना ही सीख रहे थे कि उनके पिता मालाणी के ठाकुर बलवंत सिंघजी का निधन हो गया और चार वर्ष से भी कम आयु का बालक तनैराज अपने सिर पर सफ़ेद पाग बाँध कर ठाकुर तनैराज हो गया | मात्र ९०रु वार्षिक आय का ठाकुर | भाग्य ने उनको पैदा करके पालन-पोषण के लिए कठिनाईयों के हाथों सौप दिया |
घर की माली हालत ठीक न होने के बावजूद भी श्री तनसिंह जी ने अपनी प्राथमिक शिक्षा बाड़मेर से पुरी कर सन १९४२ में चौपासनी स्कूल जोधपुर से अच्छे अंकों के साथ मेट्रिक परीक्षा पास कर सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी होने का गौरव प्राप्त किया,और उच्च शिक्षा के लिए पिलानी चले आए जहाँ उच्च शिक्षा ग्रहण करने बाद नागपुर से उन्होंने वकालत की परीक्षा पास कर सन १९४९ में बाड़मेर आकर वकालत का पेशा अपनाया,पर यह पेशा उन्हें रास नही आया | 25 वर्ष की आयु में बाड़मेर नगर वासियों ने उन्हें बाड़मेर नगर पालिका का अध्यक्ष चुन लिया और 1952 के विधानसभा चुनावों में वे पहली बार बाड़मेर से विधायक चुन कर राजस्थान विधानसभा पहुंचे और 1957 में दुबारा बाड़मेर से विधायक चुने गए | 1962 व 1977 में आप बाड़मेर लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए | 1962 में तन सिंघजी ने दुनिया के सबसे बड़े और विशाल बाड़मेर जैसलमेर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव मात्र एक जीप,कुछ साथी,सहयोगी स्वयम सेवक,कार्यकर्त्ता,किंतु अपार जन समूह के प्यार और समर्थन से मात्र 9000 रु. खर्च कर सांसद बने |
1979 में मध्यावधि चुनावों का फॉर्म भरने से पूर्व अपनी माताश्री से आशीर्वाद लेते समय 7 दिसम्बर 1979 को श्री तनसिंह जी ने अपनी माता की गोद में ही अन्तिम साँस ली |
पिलानी के राजपूत छात्रावास में रहते हुए ही श्री तनसिंह जी ने अपने भविष्य के ताने-बाने बुने | यहीं उनका अजीबो-गरीब अनुभूतियों से साक्षात्कार हुआ और समाज की बिखरी हुयी ईंटों से एक भव्य-भवन बनाने का सपना देखा | केवल 22 वर्ष की आयु में ही उनके हृदय में समायी समाज के प्रति व्यथा पिघली जो " श्री क्षत्रिय युवक संघ" के रूप में निश्चित आकार धारण कर एक धारा के रूप में बह निकली |
लेकिन अन्य संस्थाओं की तरह फॉर्म भरना,सदस्यता लेना,फीस जमा करना,प्रस्ताव पारित करना,भाषण,चुनाव,नारेबाजी,सभाएं आदि करना श्री तन सिंह जी को निरर्थक लगी और 22 दिसम्बर 1946 को जयपुर के मलसीसर हाउस में नवीन कार्य प्रणाली के साथ "श्री क्षत्रिय युवक संघ " की विधिवत स्थापना की और उसी दिन से संघ में वर्तमान संस्कारमयी मनोवैज्ञानिक कार्य प्रणाली का सूत्रपात हुवा | इस प्रकार क्षत्रिय समाज को श्री तनसिंह जी की अमूल्य देन "श्री क्षत्रिय युवक संघ " अपनी नई प्रणाली लेकर अस्तित्व में आया |
राजनीती में रहकर भी उन्होंने राजनीती को कभी अपने ऊपर हावी नही होने दिया | क्षत्रिय युवक संघ के कार्यों में राजनीती भी उनकी सहायक ही बनी रही | सन 1955-56 में विवश होकर राजपूत समाज को राजस्थान में दो बड़े आन्दोलन करने पड़े जो भू-स्वामी आन्दोलन के नाम से विख्यात हुए,दोनों ही आन्दोलनों की पृष्ठभूमि में क्षत्रिय युवक संघ की ही महत्वपूर्ण भूमिका थी |
स्व.श्री तनसिंह जी की ख्याति एक समाज-संघठक,कर्मठ कार्यकर्त्ता,सुलझे हुए राजनीतीज्ञ,आद्यात्म प्रेमी,गंभीर विचारक और दृढ निश्चयी व्यक्ति के रूप में अधिक रही है किंतु इस प्रशिधि के अतिरिक्त उनके जीवन का एक पक्ष और भी है जिसे विस्मृत नही किया जा सकता | यह एक तथ्य है कि एक कुशल प्रशासक,पटु विधिविज्ञ,सजग पत्रकार और राजस्थानी तथा हिन्दी भाषा के उच्चकोटि के लेखक भी थे | पत्र लेखन में तो उनका कोई जबाब ही नही था अपने मित्रों,सहयोगियों,और सहकर्मियों को उन्होंने हजारों पत्र लिखे जिनमे देश,प्रान्त,समाज और राजपूत जाति के अतीत,वर्तमान और भविष्य का चित्र प्रस्तुत किया गया है | अनेक सामाजिक,राजनैतिक और व्यापारिक कार्यों की व्यस्तता के बावजूद उन्होंने साहित्य,संस्कृति और धार्मिक विषयों पर लिखने के लिए समय निकला |
श्री क्षत्रिय युवक संघ के पथ पर चलने वालों पथिकों और आने वाली देश की नई पीढियों की प्रेरणा स्वरूप स्व.श्री तनसिंह जी एक प्रेरणादायक सबल साहित्य का सर्जन कर गए | उन्होंने अनेक पुस्तके लिखी जो जो पथ-प्रेरक के रूप में आज भी हमारा मार्ग दर्शन करने के लिए पर्याप्त है |
1-राजस्थान रा पिछोला
2-समाज चरित्र
3- बदलते द्रश्य
4- होनहार के खेल
5- साधक की समस्याएं
6- शिक्षक की समस्याएं
7- जेल जीवन के संस्मरण
8- लापरवाह के संस्मरण
9-पंछी की राम कहानी
10- एक भिखारी की आत्मकथा
11- गीता और समाज सेवा
12- साधना पथ
13- झनकार( तनसिंहजी द्वारा रचित 166 गीतों का संग्रह)
श्री तनसिंहजी द्वारा लिखित पुस्तकों पर पुरा विवरण अगले लेख में |
कैसा लगा स्व.तनसिंह जी का व्यक्तित्व अपनी राय जरुर दे |


Reblog this post [with Zemanta]

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Share

Twitter Delicious Facebook Digg Stumbleupon Favorites More