किशनगढ़ रियासत के महाराजा बहादुर सिंह जी एक ऐसे प्रतापी और बुद्धिमान शासक थे, जिनका इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है – इनका शासनकाल न केवल कूटनीति और चतुराई से भरा था, बल्कि कला, साहित्य और जनहित के कार्यों के लिए भी उन्हें याद किया जाता है। आज के लेख में उनकी चतुराई की एक एसी घटना की बाते करेंगे, जो सुनकर आप चकित रह जाएंगे ।
उनका शासन काल एक ऐसे दौर में था जब यहाँ के रजवाड़े आपस में लड़ झगड़ रहे थे, उनके राज्य की सीमाएं एक तरफ जयपुर और दूसरी तरफ जोधपुर से लगती थी, लेकिन इन्होंने बिना किसी एक का पक्ष लिए सभी से तालमेल रखा और अपनी रियासत को लड़ाई झगड़ों से दूर रखा । उनके व्यक्तित्व पर राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार इतिहासकार सौभाग्य सिंह जी शेखावत ने लिखा है -
"किसनगढ़ रा राजाजी महाराजा बादरसिंघजी बिना माथै तरवार बावै जैड़ा मिनख हा । उणा रै समै में किसनगढ़ घणौ चावौ नै ऊघड़तौ ओपतौ रजवाड़ौ गिणीजियौ । दोय सौ दस गांवां रा किसनगढ़ रा राज नै बादरसिंघजी घणौ बधायौ। आंणा-टांणा में, रीत-बैवार में, कानूनां-कायदां में। राजस्थान में मरैठां री खाधळव रजवाड़ां री अड़कसी, आपसरी री गोधम-धाड़, रोजीनां रा मारा-कूटा में बादरसिंघजी ऊभा पगां रैया अर किसनगढ़ नै नारां री दाढ़ां बीच रुखाळ राखियौ।"
उनकी सादगी पर कविराज बांकीदास आसिया ने लिखा है "कै-बादरसिंघजी गोडां तांई धोती राखता, कांधे माथै नागौरी धमाकौ अर लोह रा तैनाळ मैनाळ री लोहड़ी मूंठ री तरवार-राखता। इती सादगी सूं रैवता। राड़ में सदा फौज रै साथै रैवता। रजपूतां रौ, सिपायां रौ परगह रौ पूरौ आघमाण राखता। जैड़ा हुंता थकाँ भी अकल हुसियारी नै चात्रगता में सिरै गिणीजता।"
सौभाग्य सिंह जी लिखते हैं कि - अेक बार महादाजी पटेल किसनगढ़ रै सरवाड़ किला में दौय सौ सस्तर पाती ढलैतधारी मिनखां नै लेय राजाजी री मिजमानी में गयौ। महादाजी मरैठां में सिरै बुध, मौटौ सेनाधपत अर जोमराड़ मांटी हौ। मल्हाररावजी, जनकौजी, जयअप्पाजी सगळां सूं घणौ अकलवान, जोधार अर राजनीति में पैराक हौ।
मरैठां रा सगळां धड़ां में महादाजी धूजी ज्यूं मरैठां इत्यास में दिसै। महादाजी पटेल बाजिया। पटेल माथा पर पट्टा राखै। उण नै पटेल कैवै। दूजौ पटेलाई, राज रौ लगाण, रेख ऊगावै, उणनै भी पटेल कैवै। तीजौ राज री राजनीतरी चौधर, न्याव थपाव, भांगझड़ करै जिका नै भी पटेल नाँव सूं लोगबाग ओळखै। राजस्थान में जाट जात रा मुखिया नै पटेल कैवै है। पटेल प्रतिष्ठा रौ नै अपणात रौ सबद है।
महादाजी रौ बादरसिंघजी सांतरौ स्वागत कियौ। भांत-भांत री भुगत कर जिमाया। घणी मान मनवार कर गोठ दी। रात रा नाच-गाणा रौ सांसक्रितिक प्रोग्राम नै ख्यालां रौ उछव करायौ। जद सयन रौ बगत हुवौ महादाजी राजाजी नै कैयौ- राजाजी जे अबार म्हारै मन में औ सरवाड़ रौ किलौ खोसबा नै लूटबा री आ जावै तौ थां कांई करौ। अटै थारै कनै तौ पचास-साठ बूढा ठेरा माणस इज है।
राजा बादरसिंघजी कैयौ-‘‘औ, तौ सांच है। म्हांरौ किसनगढ़ है इज कितरौ सौ। पछै ढूंढाड़, मारवाड़, मेवाड़, अजमेरां री कांकड़ सीवाड़ी में बसा हां। कोई खोस लै तौ कांई टणकाई करां ?’’ आ, वात कैय नै राजाजी पटेलजी री निजर बचाय आंख री सैनकारी करी सौ पलक झपकतां रै साथ इज किला री बुरजां में ओलै बैठा पांची हथियारां सूं सजियोड़ा पांच सौ जोधार किला रै औळी-दौळी आय ऊभा व्हिया।
पटेलजी राजाजी रा परबन्ध अर सावचेती सूं अचंभित व्है रैया। राजा कह्यौ-महादारावजी ! कंठीर रा कंठा रौ कांठलौ, ब्याळ रै मुंहडा रा बाळ अर रजपूत रै जीवरखां नै हाथ कुंण घालै। पटेलजी हकीगत जाण मुळक पड़या।" इस घटना के बाद महाराजा और महादजी के बीच बहुत अच्छे संबंध रहे ।
महाराज बहादुर सिंह जी का जन्म पौष कृष्ण एकादश, वि.सं. 1768 को लाहौर में हुआ था। किशनगढ़ के राजवंश में उनका बहुत अहम स्थान था। वे एक बेहद कुशल प्रशासक और चतुर राजनीतिज्ञ के रूप में जाने गए।
उस समय का दौर ऐसा था जब भारत के राजा-महाराजा आपस में लड़ते रहते थे और मेल-मिलाप से नहीं रहते थे। लेकिन महाराजा बहादुर सिंह ने एकता के महत्व को समझा और व्यक्तिगत फूट से बचने की पूरी कोशिश की। उन्होंने जयपुर, जोधपुर और उदयपुर जैसी बड़ी रियासतों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने के भरपूर प्रयास किए।
वे इतने दबंग और लोकप्रिय थे कि जयपुर और उदयपुर के हर मामले में शामिल हो जाते थे, जिससे उन्होंने काफी नाम कमाया। वे अक्सर दूसरी रियासतों के बीच पंचायती करने में व्यस्त रहते थे, और अपनी रियासत के संचालन का मुख्य कार्य उन्होंने अपने बड़े पुत्र बिड़दसिंह को सौंप रखा था, जबकि छोटे पुत्र कुँवर बाघसिंह को फतेहगढ़ का जागीरदार बनाया था।
एक बार की बात है, मराठों और जयपुर राज्य के बीच युद्ध जैसी स्थिति बन गई थी। ऐसे में महाराजा बहादुर सिंह ने अपनी गजब की कूटनीति का परिचय देते हुए दोनों पक्षों के बीच शांतिपूर्ण संधि करवा दी। इस सूझबूझ भरी संधि से किशनगढ़ राज्य को लाखों रुपयों का लाभ हुआ। बहादुर सिंह जी ने प्रशासन को मजबूत करने के लिए ऐसे नियम बनाए जो लंबे समय तक असरदार रहे।
उन्होंने जागीरदारी व्यवस्था को इस तरह से दुरुस्त किया कि जागीरदारों की नौकरी और कार्यप्रणाली बेहतरीन तरीके से चलती रहे। उनके बेटों को किले में नियुक्त किया गया और उनके गुजर-बसर के लिए भत्ता तथा जन्म, मरण व विवाह के समय एक निश्चित रकम दिए जाने की पक्की व्यवस्था की गई। उनके राज्य के लोगों का व्यवहार और 'अदब-आदाब' का तरीका इतना शानदार था कि दूसरी रियासतों के लोग जब यहाँ आते थे, तो वे भी देखकर हैरान रह जाते थे।
जनहित और सुरक्षा के कार्ययुद्ध से जो धन लाभ हुआ था, उसका उपयोग उन्होंने जनता की भलाई और सुरक्षा के लिए किया: उन्होंने किशनगढ़ किले का परकोटा, किले के चारों ओर नहर, चौबुर्जा, और शहर के बाहर सुरक्षात्मक दीवार बनवाई। जनता के लिए गुंदोलालाव तालाब की प्रसिद्ध बहादुरशाही पैड़ियाँ (सीढ़ियाँ) बनवाईं। इसके अलावा, सरवाड़ और करेहड़ी के किलों को भी पूरी तरह मजबूत किया। आज भी हम कह सकते हैं कि किशनगढ़ राज्य की सामंतकालीन सुरक्षात्मक योजना महाराजा बहादुर सिंह जी की ही एक बड़ी देन है।
महाराजा बहादुर सिंह जी सिर्फ तलवार के धनी नहीं थे, बल्कि वे खुद एक उच्चकोटि के साहित्यकार भी थे। उन्होंने मुगल सम्राट औरंगजेब की शासन नीति का बहुत ही बारीकी से वर्णन अपनी ऐतिहासिक वार्ता 'प्रतापसिंह महोकमसिंह हरिसिंगोत री बात' में किया है।
अपनी रियासत और कला को ऊँचाइयों पर ले जाने वाले ऐसे महान शासक का 15 फरवरी, 1782 ई. को देहांत हो गया। उनकी याद में उनकी समाधि पर एक सुंदर छतरी बनाई गई है, जो आज भी किशनगढ़ में सुरक्षित और मौजूद है।
तो दोस्तों, महाराजा बहादुर सिंह जी की यह कहानी हमें सिखाती है कि कैसे एक समझदार और चतुर शासक कूटनीति के बल पर अपनी रियासत को सुरक्षित रख सकता है और तरक्की के रास्ते खोल सकता है।
