राजस्थान के इतिहास में कायमखानी नवाबों का नाम वीरता, शौर्य और सैन्य पराक्रम के लिए जाना जाता है। सीकर जिले के फतेहपुर नगर पर लगभग तीन शताब्दियों तक कायमखानी शासकों का अधिकार रहा। लेकिन फिर इतिहास ने ऐसी करवट ली कि जिस फतेहपुर पर कायमखानी नवाबों का राज चलता था, उसी फतेहपुर से उनका शासन समाप्त हो गया!
आखिर ऐसा क्या हुआ कि वीरता के लिए प्रसिद्ध कायमखानी नवाब अपना राज्य नहीं बचा सके? शेखावतों ने फतेहपुर पर अधिकार कैसे किया? क्या इसके पीछे कोई बड़ी राजनीतिक चाल थी, सत्ता का संघर्ष था या फिर युद्धभूमि में हुई कोई निर्णायक घटना?
आज के इस लेख में हम परत-दर-परत खोलेंगे फतेहपुर के इतिहास का वह अध्याय, जिसमें कायमखानी नवाबों के शासन का अंत हुआ और शेखावतों का आधिपत्य स्थापित हुआ। तो चलिए, चलते हैं इतिहास के उन पन्नों में, जहाँ छिपी है फतेहपुर की सत्ता परिवर्तन की रोचक कहानी!
मोटेराव चौहान वर्तमान चुरू जिले के ददरेवा के शासक थे । उनके चार पुत्र हुए- जिनमें एक को छोड़कर तीन पुत्रों ने इस्लाम अपना लिया । इनमें सबसे बड़े कर्मचन्द के वंशज कायमखानी मुसलमान कहलाये । यह घटना सं 1383 ई. की मानी जाती है, हालांकि इस तिथि को लेकर इतिहासकारों मे मतभेद है ।
कर्मचन्द के क्याम खां बनने के कुछ वर्ष बाद उसे हिसार का राज्य मिल जाता है । पर उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्रों ताज खां और मुहम्मद खां से हिसार छूट जाता है, कुछ समय वे नागौर जिले की बड़ी खाटू की जागीरदारी भोगते हैं और वह छूट जाने के बाद फिर नया राज्य खोजने के लिए निकल पड़ते हैं ।
ताज खां के निधन के बाद उनके पुत्र फतह खां अपने काका मुहम्मद खां के साथ वर्तमान फतेहपुर क्षेत्र में आते हैं और रिणाऊ गाँव में ठहरते हैं । इस क्षेत्र पर कब्जा करने के बाद सं 1448 ई में किला का निर्माण शुरू करते हैं और लगभग तीन वर्ष बाद फतेह खां अपने नाम से फतेहपुर नगर बसाते हैं, इस तरह वर्तमान सीकर जिले का फतेहपुर नगर अस्तित्व में आता है । जहां फतेह खां की ग्यारह पीढ़ियाँ शासन करती है ।
नबाब कामयाब खां फतेहपुर में इस कुल के आखिरी शासक थे, जिनका कार्यकाल सं 1729 से 1731 ई. था । सीकर के शासक शिवसिंह जी ने फतेहपुर पर आक्रमण कर कामयाब खां से फतेहपुर छिन लिया और अपने राज्य में मिला लिया । शिव सिंह जी द्वारा फतेहपुर लेने के पीछे भी झुंझुनू के शासक रहे शार्दूल सिंह जी शेखावत की रणनीति और नबाब सरदार खां से उसके स्वजातीय कायमखानी बंधुओं की नाराजगी की रोचक कहानी छिपी है ।
फतेहपुर के नबाब सरदार खां ने किसी अभियान में शार्दूल सिंह जी के 12 स्वजातीय व्यक्तियों को मार दिया था, वे उसका बदला लेने की सोच ही रहे थे कि नबाब ने फिर उनके दो दाढ़ियों को मार दिया । अब शार्दूल सिंह जी के लिए नबाब को उचित दंड देना अनिवार्य हो गया, पर शार्दूल सिंह जी के पास इतनी ताकत नहीं थी कि वे अकेले फतेहपुर नबाब पर आक्रमण कर सके ।
इसलिए उन्होंने सीकर के राव शिव सिंह जी से संपर्क किया, और उनके साथ मिलकर फतेहपुर की नबाबी खत्म करने की योजना बनाई । शिव सिंह जी की नजर पहले से ही फतेहपुर कब्जाने की थी अत: दोनों ने मिलकर नबाब की शक्ति को आँकने के लिए महज से 150 घुड़सवारों के साथ फतेहपुर पर हमला किया, नबाब की तरफ से 200 सैनिक जवाब देने आए, जिनमें काजी सहित 11 सैनिक मरते ही बाकी भाग खड़े हुए, इस तरह इस पहले आक्रमण में शेखावत बंधुओं को सफलता मिली यह घटना सं 1725 ई। की है ।
फतेहपुर के नबाब सरदार खां ने एक तेलिन को अपनी बेगम के रूप में रख लिया और उसके पुत्र को अपना उतराधिकारी बनाना चाहा । तेलिन बेगम पर नबाब के आसक्त होने के चलते उसके दरबार में भी तेलियों का दखल बढ़ गया था, और नबाब के स्वजातीय कायमखानी बंधुओं की उपेक्षा होने लागि थी, जिससे कायमखानी सरदार नाराज थे और वे भी नबाब सरदार खां को हटाकर उनके दत्तक पुत्र कामयाब खां को शासक बनाना चाहते थे । कई कायमखानी सैनिक और सरदार मजबूर होकर खेती तक करने लगे, जिस पर किसी कवि ने लिखा -
खानजादा खेती करे, तेली चढ़े तुरंग, नबाब तेरे राज में दो ही बात दुरंग ।
बस कायमखानी सरदारों की इस नाराजगी और भावना को लाभ शिव सिंह जी और शार्दूल सिंह जी ने उठाने की दीर्घकालीन योजना बनाई और नाराज कायमखानी सरदरों और आस-पास के अन्य कायमखानी शासकों से मिलकर एक समझौता किया जिसके अनुसार नबाब सरदार खां को हटाकर उनके पुत्र कामयाब खां को फतेहपुर का नबाब बनाया जाएगा, राज्य प्रबंधन शिव सिंह जी की सलाह से चलेगा और शिव सिंह जी को फतेहपुर राज्य के 25 गाँव भेंट किए जाएंगे और आगे से उनके प्रति वफादार रहेंगे ।
इस समझौते के बाद सं 1729 मे शिव सिंह जी, रामसिंघ जी और शार्दूल सिंह जी के नेतृत्व में शेखावत सेना ने फतेहपुर पर आक्रमण किया, योजनानुसार कायमखानी सरदार तटस्थ रहे और नबाब सरदार खां को पराजय देखने पड़ी । सरदार खां को हटाकर कामयाब खां को फतेहपुर का नबाब बना दिया गया और सरदार खां की सालाना नौ हजार पेंशन तय कर दी गई । शिव सिंह जी के ससुर भाव सिंह जी बीदावत को प्रधान नियुक्त किया गया । इस तरह इस दूसरे अभियान में भी शेखवातों की विजय हुई ।
लेकिन नबाब कामयाब खां समझौते पर कायम नहीं रहे, उन्होंने शिव सिंह जी को 25 गाँव भी नहीं दिए और शासन प्रबंध में भाव सिंह जी और चूड़ी बेसवा के कायमखानी सरदारों को भी नहीं रखा ।
इधर तब तक शार्दूल सिंह जी झुंझुनू के शासक बन चुके थे, शिव सिंह जी ने भी अपनी ताकत बढ़ा ली थी और समझौता तोड़ने के बाद फतेहपुर पर कब्जा करने का बहाना भी मिल चुका था । पर कायमखानी नबाब से शार्दूल सिंह जी द्वारा झुंझुनू का राज्य छिन लेने के बाद अब कायमखानियों को फतेहपुर जाता दिखाई दे रहा था अत: वे भी आपसी मतभेद भुलाकर एक हो गए थे ।
अब शिव सिंह जी और शार्दूल सिंह जी के सामने कायमखानी सदरारों के एक होने के अलावा एक और समस्या थी, इनकी सहायतार्थ दिल्ली से बादशाह की सेना आने की संभावना । बादशाह की सेना को रोकने के लिए दोनों शेखावत बंधु जयपुर गए और जय सिंह जी से योजना साझा कर बादशाह की सहायता रोकने की व्यवस्था का अनुरोध किया, जिसे जय सिंह जी ने मान लिया । इस तरह निश्चिंत होकर दोनों ने फतेहपुर पर तीसरे हमले की योजना बनाई ।
सीकर पहुंचकर दोनों ने सेना एकत्र की, लगभग आठ से नौ हजार सैनिक लेकर फतेहपुर से पाँच किलोमीटर दूर माँड़ीले गाँव में डेरा डाला। लगभग आठ सौ वीरों के साथ शिव सिंह जी के ससुर भाव सिंह जी भी वहाँ शामिल गो गए, कुछ और सैनिक आने के बाद शेखावत सेना की संख्या लगभग दस हजार हो गई । कुछ कायमखानी भी इनके साथ हो गए ।
वि सं 1788 के पौष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन प्रात:काल दोनों सेनाओं के मध्य युद्ध हुआ । फतेहपुर नबाब की तरफ से हरावल यानि अग्रिम पंक्ति में लड़ने वाले भी राजपूत ही थे, जिनका नेतृत्व चुरू के ठाकुर इन्द्र सिंह कर रहे थे । पर शेखावत सेना के भारी आक्रमण के चलते इन्द्र सिंह जी के राजपूतों ने मैदान छोड़ दिया, उनके 110 सैनिक मारे गए, बाद में क्याम खां जी ने मोर्चा संभाला, पर वे भी शेखावत सेना के आगे टिक नहीं पाये और उनकी भागती सेना के 150 सैनिकों को शेखावत सेना ने मार गिराये।
नबाब के सभी सरदार भाग कर किले में चले गए, शेखावत सेना ने किला घेर लिया, इससे पहले फतेहपुर के लगभग व्यापारी सुरक्षा के लिहाज से फतेहपुर छोड़ कर शेखावतों के राज्यों में चले गए। आखिर कायमखानी सरदार घायल नबाब को किले से बाहर ले गए, किला खाली कर दिया, शेखावतों ने फतेहपुर किले पर अपना ध्वज फहरा दिया । कायमखानी सरदार नबाब को नारनौल ले गए, जहां कुछ समय बाद उनका निधन हो गया ।
इस तरह फतेहपुर पर कायमखानी मुसलमानों का राज्य खत्म हुआ और फतेहपुर सीकर के राजा के राज्य का अभिन्न अंग बन गया जो देश की आजादी तक उनके वंशजों के अधिकार में रहा । इस युद्ध को लेकर किसी कवि ने एक व्यंग्य दोहा कहा -
"खाती की खाट गई, तेलण को गयो तेल।
इन्दर सिंह इंद्रास गयो, सरदार खां रो खेल।।"
यहाँ व्यंग्य है कि विजातीय महिलाओं के मोह में पड़ने के कारण न तो वह भोग-विलास रहा और न ही उनका वैभव बचा।
चूंकि सरदार खां ने तेलिन पर आसक्त होकर उसे रखा और उनके मित्र चुरू ठाकुर इन्द्र सिंह ने भी एक खाती महिला को रखा हुआ था । इन दोनों शासकों के इस कृत्य से उनके सामंत, सरदार और प्रजा बेहद रुष्ट थे। जब सीकर के राजा शिवसिंह जी और अन्य शक्तियों ने फतेहपुर पर चढ़ाई की, तो नवाब सरदार खां युद्ध में हार गए और उन्हें गद्दी छोड़नी पड़ी। इसी तरह चुरू के ठाकुर इन्द्र सिंह को भी पराजय का सामना करना पड़ा।
यह दोहा आज भी राजस्थान में राजपाट या गरिमा खोकर पतन की ओर जाने वाले विलासी शासकों के उदाहरण के रूप में याद किया जाता है।
