संवत् 1737 विक्रमी के भाद्रपद मास की कृष्ण सप्तमी का दोपहर ढल चुका था । बादलों की शीतल छाया के नींचे आलनियावास की नदी में कुँवर राजसिंह सिर पर मोड़ बाँधे दूल्हा के भेष में घोड़ी पर सवार होकर देवपूजन को जा रहे थे । पीछे दो रथ थे, जिनमें से एक में दुल्हन और उसकी सहेलियाँ बैठी थीं । दूसरे रथ में अन्य स्त्रियां बैठी मांगलिक गायन गा रही थीं । आगे कलावन्त सारंग राग अलाप रहा था। मांगलिक ढोल बज रहे थे । सारे आलनियावास गांव पर विवाहोत्सव श्रौर मांगलिक अनुष्ठानों की बहार- सी छाई हुई थी ।
ठीक इसी समय हाँफते हुए घोड़े पर एक सवार अजमेर की ओर से आया । उसने आगे बढ़कर कुँवर राजसिंह से कुछ कहा । थोड़ी देर तक उन दोनों में परस्पर वार्तालाप होती रही । कुछ ही क्षणों पश्चात् मांगलिक गायन बन्द हो गये | ढोलियों ने ढोल की ताल को बदल दिया । कलावन्त की राग का सुर भी बदल गया ।
ठाकुर प्रतापसिंहजी गढ़ में एक बुर्ज पर चढ़कर वर्षा की सम्भावना पर विचार कर रहे थे । सहसा उन्होंने ढोल की बदली हुई ताल और कलावन्त के बदले हुए सुर को सुना। उन्होंने मन ही मन कहा- हैं, यह क्या ?"
उन्होंने फिर सावधानी पूर्वक कान लगाया । बात सच्च थी । विवाह के मांगलिक ढोल के स्थान पर अब बारू ढोल बज रहा था । कलावन्त की सिन्धु राग उनके कानों में स्पष्ट आ रही थी ।
"यह क्या उपद्रव खड़ा हो गया ? यह क्या रहस्य है ? रंग में यह भंग कैसा ?" उन्होंने अपने आप से यह प्रश्न पूछ डाले । उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था । उन्होंने ज्योंही दरवाजे की ओर देखा - कुँवर आनन्द- सिंह घोड़े को सरपट दौड़ाते हुए आते दिखाई दिये । आनन्दसिंह घोड़े पर से उतर ही नहीं थे, कि उन्होंने आतुरतावश पूछ लिया- " आनन्द ! यह क्या बात है, विवाह के देव पूजन के शुभ अवसर पर इस बारू ढोल और सिन्धु राग का क्या प्रयोजन ?"
आनन्दसिंह ने घोड़े पर चढ़े चढ़े ही उत्तर दिया- "अजमेर का फौजदार तहव्वर खाँ मेड़ता की पराजय का बदला लेने के लिए एक बड़ी सेना के साथ पुष्कर आकर ठहरा है । कल कृष्ण जन्माष्टमी के दिन वह पुष्कर के पवित्र घाटों पर एक सौ गायों की कुर्बानी देगा । भगवान बाराहजी के मन्दिर को ध्वंस करेगा तथा ब्राह्मणों का कत्ले-आम करेगा ।
ठाकुर प्रतापसिंहजी के मुँह से इतना ही निकला - "हैं, तब तो बड़ा अन्याय होगा और दूसरे ही क्षरण वे गहरी विचार तन्द्रा में निमग्न हो गये ।
बादशाह औरंगजेब का राजपूतों के साथ यह युद्ध का समय था । जमरूद के थाने पर औरंगजेब ने विष देकर जोधपुर के महाराजा जसवन्तसिंहजी को मरवा दिया था और मारवाड़ पर अपनी सेना भेजकर उसने अधिकार कर लिया था। बालक महाराज अजीत सिंह को वीरवर दुर्गादास आदि स्वामिभक्त सरदारों की संरक्षकता में सुरक्षित करके राठौड़ सरदारों ने मुगलों के थानों पर आक्रमण शुरू कर दिये थे । जोधपुर, सोजत, डीडवाना, सिवाना आदि शाही थाने लूट लिए गए थे ।
यही सुनकर कुंवर राजसिंह ने भी अपने साथी मेड़तिया सरदारों को एकत्रित करके मेड़ता पर आक्रमण कर दिया और वहां के हाकिम सादुल्लाह खाँ को मार कर उसे लूट लिया था । इस घटना के राजसिंह का विवाह हो गया था । उस समय मेड़ता कुंवर अजमेर के सूबे में था ।
जब सूबेदार तहव्वर खां के पास मेड़ता की दुर्दशा का संवाद पहुंचा, तब वह आग-बबूला हो गया । उसी समय बादशाह औरंगजेब को हिन्दू मन्दिर को तोड़ने की नीति भी समस्त भारतवर्ष में दृढ़ता के साथ क्रियान्विति की जा रही थी । तहव्वर खाँ इस अवसर से दोहरा लाभ उठाना चाहता था ।
वह जन्माष्टमी के दिन पुष्कर के घाटों पर गायों की कुर्बानी कर तथा बाराह जी के मन्दिर को तोड़ कर पुण्य लाभ भी करना चाहता था और वहां से आगे बढ़ कर राठोड़ों को दण्ड देता हुआ मेड़ता पर भी पुनः अधिकार करना चाहता था । इसीलिये वह एक सौ गायों को साथ लेकर जन्माष्टमी से दो दिन पहले ही एक बड़ी सेना सहित पुष्कर में आकर ठहर गया ।
जन्माष्टमी के दो दिन पहले पवित्र धाम पुष्करराज पर मृत्यु की काली छाया पड़ चुकी थी। वह कालान्तर में और भी धनीभूत होकर मृत्यु के महा भयावने स्वरूप का प्रत्यक्ष सृजन करने में सफल हो रही थी। इस प्रत्यक्ष प्रलय से चारों ओर मृत्यु के पहले की निराशा, विवशता और भयंकरता दिखाई दे रही थी। लोग भयातुर हो अपने-अपने घर छोड़ कर भाग रहे थे ।
समस्त तीर्थों के गुरू पुष्कर राज ने निराशापूर्ण निःश्वास छोड़ते हुए कदाचित् सोचा होगा -
"समस्त पापों के क्षय की कामना लेकर यहाँ स्नान करने वाले करोड़ों मनुष्यों में से पवित्रता को बचाने वाला क्या एक भी नहीं है ? गौभक्त भगवान कृष्ण के जन्म-दिवस पर कुर्बानी की प्रतिक्षा में गायों के भर्राये हुए, असहाय कण्ठों से क्या यह मूक आर्तनाद नहीं निकला होगा "दिलीप और कृष्ण की सन्तानों में से कोई शेष रहा हो तो आओ और इस समय रक्षा करो ।"
भगवान वाराहजी ने क्या इसी दिन को अपने सच्चे भक्तों की परीक्षा का दिन नहीं चुना होगा । ब्राह्मणों ने ठीक इसी समय भगवान को अपने इन वचनों का स्मरण अवश्य दिलाया होगा ।
"परित्राणायाय साधुनाम"
और ठीक ये ही सब बातें एक घुड़सवार थोड़े समय पहले मेड़तिया राजसिंह को कह चुका था । क्षरण प्रतिक्षण सिन्धु राग की ध्वनि तीव्र और घनीभूत हो रही थी। इतने में कुँवर आन्नदसिंह ने वापिस आकर कहा- "दादाभाई, पिताजी ने कहलाया है कि पहले देवता पूजन कर लीजिये और फिर इस विषय में सब मिलकर सोचेंगे ।"
"वास्तव में मैं देव पूजन को ही जा रहा हूँ आनन्द ! तुम भी साथ आ जावो । तीर्थराज पुष्कर जैसे पुण्य स्थल में जन्माष्टमी से पवित्र पर्व पर गौ-माता की प्राण रक्षा, भगवान वाराहजी के मन्दिर की प्रतिष्ठा- रक्षा, ब्राह्मणों की भय से मुक्ति और साथ के साथ स्वामी का बदला लेने का दुर्लभ । अवसर प्रति भाग्यवान क्षत्रिय के अतिरिक्त किसी को भी प्राप्त नहीं हो सकता, आनन्द !
"किन्तु एक बार गढ़ में तो चलिये ।"
"गढ़ में अवश्य चलता पर केसरिया कर लिया है, इसलिए लौटकर जाना पाप है ।"
"यह केसरिया तो विवाह के निमित्त है न कि युद्ध के निमित्त ।” "मैंने अब संकल्प द्वारा इन्हें युद्ध के निमित्त ही मान लिया है ।" आनन्दसिंह ने ये सब बातें प्राकर अपने पिता से कह दी । पिता ने सगर्व कहा - "कोई बात नहीं यदि उसकी ऐसी ही इच्छा है तो तुम, चतरसिंह श्रौर रूपसिंह भी उसके साथ ही चले जाओ ।"
थोड़ी देर में तीनों भाई और गढ़ के अन्य बचे-खुचे लोग भी पुष्कर- राज की प्रोर प्रयाण कर गये । मार्ग में उन्हें लोटते हुए जनाना- रथ मिले । अब उनमें विवाह के मांगलिक गायनों के स्थान पर समर प्रयाण के समय के मांगलिक-गायन गाये जा रहे थे । पहले दुल्हिन लज्जावश चुप थी, पर अब वह उल्लासपूर्ण ढंग से इन गायनों में स्वयं योग दे रही थी ।
जिस समय प्राची के पर्दे में से सप्तमी का चन्द्रमा मुँह निकाल कर झाँकने लगा था। ठीक उसी समय 50-60 घुड़सवार भगवान बाराह जी के मन्दिर के सामने जाकर उतर पड़े थे। थोड़ी देर विश्राम कर लेने के उपरान्त वे फिर घोड़ों पर सवार हुए और पुष्कर के पूर्वी घाटों पर विश्राम करती हुई शाही सेना पर उसी समय टूट पड़े । बातों की बात में उन्होंने सैकड़ों मुसलमानों को तलवार के घाट उतार दिया और सब गायों को बन्धन मुक्त कर दिया । इस अचानक आक्रमण से चोट खाकर अब शाही सेना भी सावधान हो चुकी थी । उसने भी चांदनी के खुले प्रकाश में प्रत्याक्रमण कर दिया। दोनों ओर से भयंकर मारकाट होने लगी । रात्रि की निस्तब्धता को चीर कर पुष्कर की सूनी गलियों से टकराती हुई - "जय बाराह, जय पुष्कर राज," "अल्लाहो अकबर" की ध्वनि, प्रतिध्वनि ने आसपास के समस्त गाँवों को सजग और सतर्क कर दिया था। सप्तमी की सारी रात और अष्टमी के सारे दिन यह युद्ध होता रहा । पुष्कर की समस्त गलियाँ रक्त के कीचड़ से सन चुकी थी । अष्टमी का सूर्य पश्चिमी क्षितिज में ज्योंही गोता लगाने की तैयारी कर रहा था, त्योंही पश्चिमी क्षितिज पर से धूलिका का एक बादल सा उठता हुआ दिखाई पड़ा। सैंकड़ों कण्ठों से एक साथ निकल रहा था।
"रण बंका राठौड़ । "
बाराहजी के मन्दिर के दरवाजे से घोड़ा लगाकर लड़ते हुए राजसिंह से एक सवार ने आकर कहा सावधान ! कुवर केशरीसिंहजी रियां, ठाकुर गोकुलसिंहजी बाजोली, ठाकुर हठीसिंहजी, जगतसिंहजी, सुजाणसिंहजी आदि अपनी- अपनी सेनाओं को लेकर आ पहुंचे हैं ।"
इतने में और भी समीप आती हुई ध्वनि सुनाई दी - "रण बंका राठोड़ ।"
राजसिंह ने खिसककर आखों पर आये हुए मोड़ को ऊपर खींचते हुए प्रत्युत्तर दिया- "रण बका राठौड़ ।”
और दूसरे ही क्षण वे घोड़ा कुदा कर शाही सेना के मध्य में जा पहुंचे ।
जब कुंवर केशरीसिंह जी रियां और अन्य सरदार युद्ध स्थल पर पहुंचे तब उन्होंने देखा कि एक बिना सिर का दूल्हा-योद्धा शाही सेना से घिरा हुआ दोनों हाथों से तलवार चला रहा था। फिर एक भयंकर उद्घोष हुआ - "रण बंका राठोड़ ।” प्रत्युत्तर आया “अल्लाहो अकबर, " और खचाखच सपासप तलवारें चलने लग गई ।
उस रात्रि को भी भयंकर मारकाट होती रही । भगवान कृष्ण के जन्म महोत्सव को तलवारों की खनखनाहट के बीच युद्ध घोषों की वीरोचित ध्वनि के द्वारा मनाया गया । नवमी के दिन भी पुष्कर की प्रत्येक गली में इसी प्रकार घर-घर के सामने युद्ध होता रहा । समस्त गलियां लाशों से भर गई । पुष्कर राज की पवित्र भूमि हिन्दू-मुसलमानों के रक्त से रंजित होकर और भी पवित्र होती गई ।
नवमी की संध्या को एक घुड़सवार असलाई हुई चाल से आलनिया- वास की ओर जा रहा था।
वह मार्ग में पूछने वालों को उत्तर दे रहा था- "आलनियावास के कुवर राजसिंह जी, आनन्दसिंह जी, चतरसिंह जी रूपसिंह जी, रियां के कुवर केशरीसिंह जी, बाजोली के ठाकुर गोकुलसिंह जी तथा ठाकुर हठीसिंह जी, जगतसिंह जी, सुजाण सिंह जी आदि मेड़तिया सरदार वीरगति को प्राप्त हो गए हैं ।
और थोड़ा-सा रुक कर वह फिर कहता था - " तहव्वर खां की सब सेना मारी गई है और वह भाग कर तारागढ़ परचढ़ गया है ।"
