खोह का चांदा राज्य
वर्तमान जयपुर से दक्षिण दिशा में लगभग पांच मील दुरी पर पहाड़ों से सटी हुई "खोह" नामक प्राचीन बस्ती है | परकोटों से घिरी हुई तथा महलों, मंदिरों, बावड़ियों और पक्के राजमार्गों से युक्त यह नगरी ही कभी मीणों के चांदा वंश की राजधानी थी | विक्रम की ग्यारहवीं सदी के प्रारंभ में आलणसिंह नामक चांदा वंश के मीणा राजा यहाँ राज्य करते थे |
चांदा वंश के इसी मीणा राजा को दुल्हेराय जी कछवाह ने युद्ध में हराया था | दुल्हेराय जी कछवाह मध्यप्रदेश के नरवर से आये थे | दुल्हेराय जी कछवाह का ससुराल इसी क्षेत्र में मोरां के चौहानों के यहाँ था, उन्होंने चौहानों की सहायता से पहले दौसा पर कब्ज़ा किया और उसके बाद खोह पर आक्रमण कर मीणा राजा आलणसिंह को हराया और क्षेत्र में कछवाह राज्य की स्थापना की |
मीणा इतिहास में दुल्हेराय जी कछवाह द्वारा खोह धोखे से लेने की कहानी प्रचलित है जिसका जिक्र हमने पहले के वीडियो में किया है |
मुनि मगनसागर ने इस कहानी में आलणसिंह की रानी द्वारा सती होने का जिक्र भी किया है |
मीणा इतिहास पुस्तक के लेखक रावत सारस्वत के अनुसार खोह के प्राचीन शहर में मीणा शासकों के समय के बने पुराने राजसी महल तथा कई इमारतें बताई जाती है | कछावों ने वहां राजधानी बनाने के बाद गत एक हजार वर्षों में पर्याप्त इमारतें बनाई होगी तथा नागरिकों द्वारा भी इतनी लम्बी अवधि में अनेक इमारतें बनाया जाना संभव है | पर पहाड़ी की ढाल पर बनी प्राचीन इमारतें अवश्य ही मीणा शासकों द्वारा निर्मित रही होगी |
शहर के बाहर एक सर्प की बड़ी मूर्ति आज भी पूजा का विषय बनी हुई है, खोह में पहाड़ी पर बने मंदिर में चांदा मीनों की देवी आज प्रतिष्ठापित है | जहाँ आज भी आस-पास के मीणा गठ्जोड़े की जात और जडूले चढाने के लिए आते हैं |
