Meena History मीणा जाति का संक्षिप्त इतिहास

Gyan Darpan
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मीणा जाति का पूर्वकालिक इतिहास उतना ही अंधकारमय है जितना अन्य आदिवासी जातियों का | रावत सारस्वत ने बड़ी मेहनत कर मीणा जाति का इतिहास लिखा है, उन्होंने लिखा है कि- मीणा जाति के अनेक सुपठित व्यक्तियों की धारणा है कि इस जाति का सम्बन्ध भगवान के मत्स्यावतार से है | इस धारणा को मानने वाले व्यक्तियों में सर्वाधिक उल्लेखनीय नाम है श्री मुनि मगनसागर जी का | उन्होंने मीन पुराण नामक स्वतंत्र पुराण की रचना की |

जिसमे उन्होंने सिद्ध करने का प्रयास किया है कि मीणा जाति   मत्स्यावतार से सम्बन्ध रखती है | मुनि श्री ने मीन क्षत्रियों की एक पौराणिक जाति की भी कल्पना की है | मीणा जाति के उदगम को लेकर लोक में प्रचलित कई कल्पनाओं का जिक्र रावत सारस्वत ने अपनी पुस्तक मीणा इतिहास में की है, जो आप उक्त पुस्तक में पढ़ सकते हैं |

लोक में प्रचलित इन कल्पनाओं पर मंथन करने के बाद  रावत सारस्वत अपनी पुस्तक में लिखते हैं - कि जब तक अन्य पुष्ट प्रमाणों से ये धारणाएँ खंडित नहीं हो जाती तब तक यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए कि- 

१. मीणा लोग सिंधु सभ्यता के प्रोटो द्रविड़ लोग हैं जिनका गणचिह्न मीन (मछली) था । 

२. ये लोग आर्यों से पहिले ही भारत में बसे हुए थे और इनकी संस्कृति-सभ्यता काफी बढ़ी चढ़ी थी । रक्षा के लिये ये दुर्गों का उपयोग करते थे ।

३. धीरे-धीरे आर्यों तथा बाद की अन्य जातियों से खदेड़े जाने पर ये सिंधु घाटी से हटकर ‘आडावळा’ यानि अरावली पर्वत-श्रृंखलाओं में जा बसे, जहां इनके थोक आज भी हैं ।

४. संस्कृत में 'मीन' शब्द की व्युत्पत्ति संदिग्ध होने के कारण इन्हें 'मीन' के संस्कृत पर्याय ‘मत्स्य’ से संबोधित किया जाने लगा, जबकि ये स्वयं अपने आपको 'मीना' ही कहते रहे । 

५. आर्यों से भी प्राचीनतर समझी जाने वाली तमिल संस्कृति में ‘मीन' शब्द मछली के लिये ही प्रयुक्त हुआ है, जिससे इन लोगों का तमिल साम्राज्य के समय में होना सिद्ध होता है । 

६. सिंधु-घाटी सभ्यता के नाश तथा वेदों के संकलन के बीच का समय निश्चित नहीं होने के कारण ऐसा संभव हो सकता है कि पर्याप्त समय बीत जाने पर 'मीनों' को वैदिक साहित्य में आर्य मान लिया गया हो, जहां आर्य राजा सुदास-के शत्रुओं में इनकी गिनती की गई है ।

७. मत्स्यों का जो प्रदेश वेदों, ब्राह्मणों तथा अन्याय भारतीय ग्रंथों में बताया गया है वहीं आज की मीणा जाति का प्रमुख स्थान होने के कारण आधुनिक मीणे ही प्राचीन मत्स्य रहे होंगे । 

८. सीथियन, शक, क्षत्रप, हूण आदि के वंशज न होकर ये लोग आदिवासी ही हैं, जो भले ही कभी बाहर से आकर बसे हों, ठीक उसी तरह जिस तरह आर्य बाहर से आकर बसे बताये जाते हैं ।

९. स्वभाव से ही युद्धप्रिय होने और दुर्गम स्थलों में निवास करने के कारण यह जाति भूमि का स्वामित्व भोगने वाले शासक वर्ग में ही रही है ।

रावत सारस्वत आगे लिखते हैं कि - इन निष्कर्षों से केवल एक कड़ी जोड़ने का प्रयास भर किया गया है । इसका यह आशय नहीं है कि यह कोई तर्कसंपुष्ट मान्यता है । पर जैसा कि पहिले बताया जा चुका है जब तक और अकाट्य प्रमाण न उपस्थित हों तब तक अद्यावधि प्राप्त जानकारी के आधार पर ऐसी धारणा बना लेने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये। इससे इस जाति का आगे का इतिवृत्त समझने-परखने में सहायता मिलेगी।

मीणा जाति के बही भाट मीणा जाति की बारह पाल, बत्तीस तड़ तथा 5200 गौत्र की बात करते हैं | इन बही भाटों ने इनकी बारह पालों क्षत्रिय जातियां ही माना है जिनके नाम है - चौहान, परमार, गहलोत, चंदेल, कछावा, यादव, तंवर, पड़िहार, निर्वाण गौड़, बडगुजर और सोलंकी |

सन्दर्भ ग्रन्थ : "मीणा इतिहास" लेखक : रावत सारस्वत 

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