पज्ज्वन राय कछवाह का इतिहास

Gyan Darpan
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 महापराक्रमी पज्जवनराय - आम्बेर के कछवाहा राजाओं में आगे चलकर महापराक्रमी पज्जवनराय (प्रद्यम्नराय) हुए। इनकाविवाह वीर शिरोमणि पृथ्वीराज चौहान के काका कान्हा की पुत्री से हुआ था । बारहवीं शताब्दी में उन जैसा पराक्रमी योद्धा एवं शूरवीर सामन्त कदाचित दूसरा कोई नहीं था । कुछ वंशावलियों से भ्रम होता है कि शायद पृथ्वीराज के समकालीन नहीं थे। परन्तु पृथ्वीराज रासो के वर्णन तथा वज्रदामा के शिलालेख से निश्चित रूप से वे पृथ्वीराज के समकालीन सिद्ध होते हैं । राजस्थान के इतिहास के अधिकारी विद्वान डॉ. दशरथ शर्मा ने भी पज्जवनराय की पृथ्वीराज के समसामयिक माना है ।

पृथ्वीराज रासो के रचयिता चन्दवरदाई ने पज्जवनराय की वीरता, रण कौशल, बुद्धिमता और चातुर्य का बहुत प्रभावशाली वर्णन किया है । जनश्रुति के अनुसार उन्होंने पृथ्वीराज की ओर से लगभग 64 युद्धों में भाग लिया तथा अप्रतिम वीरता का प्रदर्शन किया। गुजरात के सोलंकी राजा भीमदेव तथा महोबा के चन्देल राजा के विरुद्ध पज्जवनराय बहुत बहादुरी से लड़े। वे सेनाके हरावल (अग्रिम दस्ते) में जहाँ युद्ध करते हुए शत्रु सेना के छक्के छुड़ा दिये । पज्जवनराय ने उसके प्रारम्भिक आक्रमण में मुहम्मद गौरी को हराया था और एक अवसर पर उसे पकड़ भी लिया था । पज्जवनराय प्रख्यात सेनापति होने के साथ एक कुशल प्रशासक भी थे। महोबा की विजय के उपरान्त पृथ्वीराज ने उन्हें वहाँ का प्रशासन नियुक्त किया। वे नागौर के भी प्रशासक रहे थे ।

पृथ्वीराज द्वारा संयोगिता हरण के अवसर पर इन्होंने जयचन्द की सेना का जबर्दस्त संहार किया । इतिहासकार रावल नरेन्द्रसिंह, जोबनेर ने महापराक्रमी राजा पज्जवनराय की उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- 

Pajjunraiji was one of the bravest & most trusty Samants of Prithviraj and tough with dauntless courage under the banner of Chohan King. His name Shines in Prithviraj's struggle against Mohammed Ghori, whom hee is reported to have captured alive.

सुप्रसिद्ध इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने पज्जवनराय की वीरता और पराक्रम की प्रशंसा करते हुए उन्हें पृथ्वीराज चौहान का दाहिना हाथ बताया है । वे लिखते हैं कि भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना से पहले के काल में पज्जवनराय सबसे बहादुर और प्रख्यात कछवाहा राजा थे। वे लिखते हैं -

Pajvan was the most celebrated hero among the kachwa kings before the Mughal age. He was the bravest among the many brave warriors who had gathered around the last champion of Hindu Independence.

Prithviraj fought many big battles and he had many valient warriors under him, but Pajvan was the bravest among them.

भारत के देशी राज्य' नामक पुस्तक का उल्लेख है कि पज्जवनराय ने शहाबुद्दीन गौरी को खैबर के दर्रे में युद्ध में खूब हराया था और उसका गजनी तक पीछा किया था। नाथावतों के इतिहास' का उल्लेख है कि राजा पज्जवनजी बड़े धनुर्धर और महाबली थे । संयोगिता हरण के अवसर पर उन्होंने पीछा करती हुई कन्नोज के राजा जयचन्द की सेना का प्रतिरोध करते हुए उसके साथ भीषण युद्ध किया तथा असीम साहस का परिचय देते हुए शत्रु सेना का संहार किया। रणभूमि में चारों ओर से भाले ढाल, तलवार आदि की खटाखट मच गई। पराक्रमी पज्जवनराय ने दोनों हाथों से शस्र चलाये । युद्ध क्षेत्र में बहते हुए रक्त में तैरते हुए नरमुंड परस्पर टकरा रहे थे । इतना घमासान युद्ध लड़ा गया कि दिन में भी प्रलय का सा अंधकार छा गया।

सारतः पृथ्वीराज द्वारा संयोगिता हरण के अवसर पर इन्होंने जयचन्द की सेना का जबर्दस्त संहार किया। कन्नोज के इस युद्ध में पज्जवनराय अपने चार भाईयों पाल्हणदेव, जैतसी, कान्हदेव तथापिचाण तथा दो पुत्रों विश्वनाथ और भीम सहित असंख्य शत्रुओं को मौत के घाट उतारकर वीरगति को प्राप्त हुए ।

वीरता, स्वामिभक्ति और बलिदान की ऐसी मिसाल इतिहास में शायद ही कहीं अन्यत्र मिले। चंद कवि विरचित कूर्म विलास का उल्लेख है कि पराक्रमी पज्जवनराय अपने तीन बन्धु बान्धवों और पुत्रों सहित वीरगति को प्राप्त हुए । यथा'-

परिय, जुज्झि पज्जेनि पहर त्रिय रोकि पंगु दल ।

कटेबंधु संग चारि पुत्र त्रिय तत्थ महाबल ।

उक्त अवसर पर महापराक्रमी राजा पज्जवनराय द्वारा प्रदर्शित वीरता की तुलना स्पार्टा (यूनान) के वीर लियोनिडास द्वारा थर्मोप्ल्ली के युद्ध में दिखाए गए पराक्रम से की गयी है । पज्जवनराय के पराक्रम और सशक्त प्रतिरोध के फलस्वरूप पृथ्वीराज अपनी नव परिणीता राजकुमारी संयोगिता को साथ लेकर सकुशल अपनी राजधानी पहुँच सका ।

अपने विश्वस्त सामन्त और पराक्रमी सेनापति राजा पज्जवनराय की मृत्यु का समाचार सम्राट पृथ्वीराज को ज्ञात हुआ तो वह अत्यन्त व्यथित और दुःखी हुआ । स्वयं के प्राणों की आहुति देकर अपने स्वामी की प्राणरक्षा करने वाले अपने इस प्रिय सामन्त पज्जवनराय के वीरगति पाने की घटना पृथ्वीराज को झकझोर दिया, शोक में डुबो दिया । उसके उद्गार चन्दवरदाई के शब्दों में मार्मिक रूप से व्यक्त हुए-

आज विधाता कितना क्रूर हो गया है! लगता है ढूंढाड़ मानो अनाथ हो गया है। पृथ्वीराज आज बिना मस्तक के रह गया है । मानो हिन्दुओं का मुकुट (शिरस्राण) नहीं रह गया है ।

पज्जवनराय के कालखण्ड के बारे में इतिहासकार एक मत नहीं है । इतिहासकार गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने कुछ कछवाहा वंशावलियों के आधार पर कालगणना करते हुए राजा पज्जवनराय के सम्राट पृथ्वीराज चौहान के समकालीन होने में संदेह व्यक्त किया है । परन्तु डॉ. दशरथ शर्मा सहित अधिकांश इतिहासकारों डॉ. सी.वी. वैद्य, रावल नरेन्द्रसिंह, कुंवर देवीसिंह मण्डावा ने राजा पज्जवनराय को पृथ्वीराज का समसामयिक व प्रमुख सेनापति होना माना है। कूर्मविलास तथा पृथ्वीराज रासो भी दोनों का समसामयिक होना निर्विवाद रूप से सिद्ध होता है ।

सन्दर्भ : "खंगारोत कछवाहों का इतिहास" लेखक - डॉ राघवेंद्र सिंह मनोहर से साभार 

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