खंगारोत कछवाहों के साखूण ठिकाने का इतिहास

Gyan Darpan
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 राजस्थान का इतिहास शौर्य, त्याग और स्वामिभक्ति की गाथाओं से भरा पड़ा है। जयपुर (आमेर) राज्य के अंतर्गत आने वाले जागीरी ठिकानों में साखूण ठिकाना अपना एक विशिष्ट ऐतिहासिक और सामरिक महत्व रखता है। खंगारोत कछवाहा राजपूतों की 'भाखरसिंघोत' शाखा के इस प्रमुख केंद्र का इतिहास सैन्य पराक्रम, राजनीतिक दूरदर्शिता और स्वामी पर संकट आने पर सर्वस्व न्योछावर करने की परंपरा का अमर प्रतीक है

1. साखूण: भौगोलिक स्थिति एवं नामकरण का इतिहास

वर्तमान में साखूण, जयपुर-अजमेर रेलमार्ग पर नरायणा और किशनगढ़ के मध्य स्थित एक रेलवे स्टेशन है, जहाँ से मुख्य गाँव लगभग 4 किलोमीटर दूर स्थित है। अरावली पर्वतमाला की गगनचुंबी पहाड़ियों और शिखरों से आवृत्त यह गाँव प्राकृतिक दृष्टि से अत्यंत सुरक्षित और मनोरम है। यहाँ की प्रमुख पहाड़ियों के स्थानीय नाम इसके भौगोलिक एवं ऐतिहासिक स्वरूप को दर्शाते हैं, जिनमें से प्रमुख हैं:

  • तीखली: क्षेत्र की सबसे ऊँची पहाड़ी

  • दहजाल: किले के ठीक पीछे स्थित पहाड़

  • अन्य प्रमुख पहाड़ियां: बड़ा डूंगर और अलख की डूंगरी

नामकरण की ऐतिहासिक संभावना

इतिहासकारों एवं स्थानीय शोध के अनुसार, प्राचीनकाल में इस क्षेत्र पर शक और हूण जनजातियों का आधिपत्य रहा था। इन दोनों शक्तियों की संयुक्त उपस्थिति और वर्चस्व का बोध कराने के कारण यह स्थान कालान्तर में 'शक-हूण' से अपभ्रंशित होकर 'साखूण' कहलाया। यह गाँव प्राचीन बसावट और प्रचुर ऐतिहासिक शोध सामग्री का केंद्र है

2. साखूण ठिकाने की स्थापना एवं संस्थापक: राव भाखरसिंह

साखूण खंगारोत कछवाहों की भाखरसिंघोत शाखा का मुख्य ठिकाना है। खंगारोत वंश के संस्थापक राव खंगार के आठवें पुत्र भाखरसिंह को साखूण की जागीर प्राप्त हुई थी

राव भाखरसिंह अत्यंत पराक्रमी और सहृदय योद्धा थे। वे कुछ समय जोधपुर राज्य की सेवा में भी रहे, जहाँ जोधपुर महाराजा द्वारा उन्हें मेड़ता क्षेत्र का भोवाल गाँव पट्टे (जागीर) में दिया गया था

मुहणौत नैणसी री ख्यात से उद्धरण:

"भाखरसी खंगारोत भलो डील हुवौ ।"

"रावलै मेड़ता री भोवाल पट्टे ॥"

(अर्थात् भाखरसिंह खंगारोत बहुत शक्तिशाली योद्धा हुए, जिन्हें जोधपुर महाराजा की ओर से मेड़ते का भोवाल गाँव पट्टे में मिला था)

भाखरसिंह केवल युद्ध कौशल में ही निपुण नहीं थे, बल्कि वे अपनी दानवीरता के लिए भी प्रसिद्ध थे। समकालीन कवियों ने उनकी तुलना दानवीर कर्ण से की है:

समकालीन काव्य दोहा:

"भाखरसीह भलांह खगिमारग खंगारउत ।"

"जिण सै जाणीता कछवाहा जिहिं करण ॥"

विक्रम संवत 1689 में भाखरसिंह का निधन हुआ। उनके निधन पर उनकी पत्नी भटियाणी मकरमेती जी उनके साथ सती हुईं, जिनकी स्मृतिकारक छतरी आज भी साखूण में ऐतिहासिक धरोहर के रूप में विद्यमान है

3. साखूण के उत्तराधिकारी एवं आमेर का स्तम्भ: श्यामसिंह खंगारोत

भाखरसिंह के पश्चात् उनके पुत्र बदरीदास साखूण के स्वामी बने, जिनकी जागीर में साखूण के साथ आकोदा गाँव भी शामिल था। बदरीदास मिर्जा राजा जयसिंह की सेवा में रहे और कई युद्धों में भाग लिया। नैणसी री ख्यात में उन्हें "बद्रीदास राजा जैसिंघ रो चाकर" कहा गया है

बदरीदास के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र मनरूपसिंह साखूण के अधिपति बने। मनरूपसिंह के ज्येष्ठ पुत्र श्यामसिंह खंगारोत साखूण के इतिहास के सबसे प्रभावशाली, वीर और प्रतापी शासक सिद्ध हुए, जिन्हें आमेर (जयपुर) राज्य का एक मजबूत स्तम्भ माना जाता है

आमेर की पुनर्विजय में ऐतिहासिक योगदान (1707 ई.)

विक्रम संवत 1763 (21 फरवरी 1707 ई.) में मुगल बादशाह औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों (आजम और मुअज्जम) के बीच उत्तराधिकार का जाजऊ युद्ध हुआ। विजयी होकर मुअज्जम 'बहादुरशाह' के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा। सवाई जयसिंह से अप्रसन्न होकर बहादुरशाह ने आमेर को शाही नियंत्रण में लेकर खालसा घोषित कर दिया

इस कठिन समय में श्यामसिंह खंगारोत ने आमेर को पुनः मुक्त कराने में केंद्रीय भूमिका निभाई:

  • डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा (उदयपुर राज्य का इतिहास): डॉ. ओझा लिखते हैं कि जयपुर और जोधपुर की सम्मिलित सेना के आमेर पहुँचने से पूर्व ही श्यामसिंह कछवाहा (खंगारोत) और दीवान रामचंद्र ने अपने विश्वस्त योद्धाओं के साथ शाही फौजदार हुसैन खां को आमेर से खदेड़ दिया और सवाई जयसिंह को उनके पैतृक सिंहासन पर बैठाया

  • पं. हनुमान शर्मा (नाथावतों का इतिहास): इनके अनुसार इस अभियान हेतु दो सैन्य टुकड़ियाँ बनाई गई थीं—एक दीवान रामचंद्र और दूसरी श्यामसिंह खंगारोत के अधीन। श्यामसिंह ने सैयदों पर धावा बोलकर सर्वप्रथम काणोता पर अधिकार किया और संपूर्ण क्षेत्र खाली करवाया

मुगल दरबार में कूटनीतिक प्रभाव

श्यामसिंह खंगारोत के मुगल दरबार के शक्तिशाली सैयद बंधुओं (वजीर सैयद अब्दुल्ला खां एवं मीर बख्शी हुसैन अली खां) से घनिष्ठ और मित्रवत संबंध थे

डॉ. वी.एस. भटनागर अपनी पुस्तक 'सवाई जयसिंह' में उल्लेख करते हैं कि हुसैन अली ने शासक बनने के बाद आमेर के श्यामसिंह खंगारोत को विशेष रूप से विचार-विमर्श के लिए बुलाया था। सवाई जयसिंह ने अपने मनसब (5000 का मनसब) और कूटनीतिक वार्ताओं के लिए श्यामसिंह को ही दिल्ली भेजा था। जब सवाई जयसिंह के संबंध सैयदों से बिगड़े, तब भी सैयद हसन खां ने मध्यस्थता के लिए श्यामसिंह पर ही भरोसा जताया था

4. ऐतिहासिक भ्रांतियों का निवारण एवं जोधपुर प्रवास

कुछ इतिहासकार, जैसे डॉ. वी.एस. भटनागर और कुंवर देवीसिंह मंडावा, यह संदेह व्यक्त करते हैं कि सवाई जयसिंह द्वारा अपने भाई विजयसिंह को कैद करने और ज्येष्ठ पुत्र शिवसिंह को जहर देने के षड्यंत्र में श्यामसिंह का हाथ था

परंतु लेखक डॉ. राघवेंद्र सिंह मनोहर तथा पंडित गोपालनारायण बहुरा इस मान्यता को निराधार खारिज करते हैं। डॉ. मनोहर के अनुसार, श्यामसिंह की स्वामिभक्ति असंदिग्ध थी और केवल संदेह के आधार पर ऐसी ऐतिहासिक स्थापनाएँ नहीं की जा सकतीं

अजीत विलास (सं. डॉ. शिवदत्त दान बारहठ) का साक्ष्य:

"सं. 1778 रा में खंगारोत स्यामसिंघ मनरुपोत आंबेर सुं छाड़ ने श्री म्हाराज करे आया। तिण ने पेहलां तो रुपिया एक हजार रोजीनो दिया, पछै पांच सौ दिया। पछै तोड़ा में पटो दियो..."

विक्रम संवत 1778 (1721 ई.) में सवाई जयसिंह और सैयद बंधुओं के मध्य संबंध बिगड़ने लगे थे। श्यामसिंह सैयद बंधुओं से संबंध बिगाड़ने के पक्ष में नहीं थे। इसी नीतिगत मतभेद के कारण वे रुष्ट होकर जोधपुर महाराजा अजीतसिंह के पास चले गए, जहाँ उन्हें तोड़ा की जागीर दी गई। जोधपुर में आंतरिक अशान्ति के बाद वे पुनः जयपुर लौट आए और वि.सं. 1785 में आमेर व आगरा के बीच हुए युद्ध में अद्भुत शौर्य दिखाया

5. उत्तरकालीन इतिहास एवं प्रमुख घटनाएँ

श्यामसिंह खंगारोत का जीवन निरंतर संघर्षरत रहा। महाराजा ईश्वरीसिंह के काल में वि.सं. 1802 (1745 ई.) में उन्हें मनोहरपुर का सूबेदार बनाया गया और उन्होंने राजमहल के युद्ध में भाग लिया। महाराजा माधोसिंह प्रथम के समय 20 अक्टूबर 1761 ई. को मराठों व कोटा की संयुक्त सेना के विरुद्ध लड़े गए प्रसिद्ध भटवाड़ा के युद्ध में वृद्धावस्था के बावजूद श्यामसिंह ने अदम्य साहस दिखाया

परवर्ती शासक एवं महत्वपूर्ण घटनाएँ:

  1. कुंवर सुरताणसिंह: श्यामसिंह के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र सुरताणसिंह उत्तराधिकारी हुए। इन्होंने कनिष्ठ अवस्था में ही मराठों के विरुद्ध युद्धों में अदम्य वीरता प्रदर्शित की

  2. ठाकुर रामसिंह: साखूण के परवर्ती पराक्रमी शासक रामसिंह ने बूंदी के हाड़ा राजपूतों के विरुद्ध युद्ध में असाधारण वीरता का परिचय दिया

  3. ठि. साखूण जब्ती एवं स्वतंत्रता संग्राम: प्रसिद्ध लोकनायक स्वतंत्रता सेनानियों डूंगजी-जवाहरजी को नसीराबाद अंग्रेज छावनी लूटने में सहायता देने के कारण अंग्रेजों/रियासत द्वारा साखूण ठिकाना जब्त कर लिया गया था, जिसे बाद में बहाल किया गया

  4. ठाकुर सोभागसिंह: विक्रम संवत 1867 में सोभागसिंह साखूण के ठाकुर थे, जिनका उल्लेख भिनाय के राजा उदयभान के निधन पर भेजी गई शोक-चिट्ठी में मिलता है

निष्कर्ष

साखूण ठिकाना केवल अपनी भौगोलिक और पुरातात्विक प्रचुरता के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यह भाखरसिंघोत खंगारोत राजपूतों के शौर्य, कूटनीतिक चातुर्य, स्वामिभक्ति और राष्ट्रीय चेतना की गौरवशाली विरासत का एक अमर प्रतीक है

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