राजस्थान का इतिहास शौर्य, त्याग और स्वामिभक्ति की गाथाओं से भरा पड़ा है। जयपुर (आमेर) राज्य के अंतर्गत आने वाले जागीरी ठिकानों में साखूण ठिकाना अपना एक विशिष्ट ऐतिहासिक और सामरिक महत्व रखता है
1. साखूण: भौगोलिक स्थिति एवं नामकरण का इतिहास
वर्तमान में साखूण, जयपुर-अजमेर रेलमार्ग पर नरायणा और किशनगढ़ के मध्य स्थित एक रेलवे स्टेशन है, जहाँ से मुख्य गाँव लगभग 4 किलोमीटर दूर स्थित है
तीखली: क्षेत्र की सबसे ऊँची पहाड़ी
दहजाल: किले के ठीक पीछे स्थित पहाड़
अन्य प्रमुख पहाड़ियां: बड़ा डूंगर और अलख की डूंगरी
नामकरण की ऐतिहासिक संभावना
इतिहासकारों एवं स्थानीय शोध के अनुसार, प्राचीनकाल में इस क्षेत्र पर शक और हूण जनजातियों का आधिपत्य रहा था
2. साखूण ठिकाने की स्थापना एवं संस्थापक: राव भाखरसिंह
साखूण खंगारोत कछवाहों की भाखरसिंघोत शाखा का मुख्य ठिकाना है
राव भाखरसिंह अत्यंत पराक्रमी और सहृदय योद्धा थे
मुहणौत नैणसी री ख्यात से उद्धरण
: "भाखरसी खंगारोत भलो डील हुवौ ।"
"रावलै मेड़ता री भोवाल पट्टे ॥"
(अर्थात् भाखरसिंह खंगारोत बहुत शक्तिशाली योद्धा हुए, जिन्हें जोधपुर महाराजा की ओर से मेड़ते का भोवाल गाँव पट्टे में मिला था)
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भाखरसिंह केवल युद्ध कौशल में ही निपुण नहीं थे, बल्कि वे अपनी दानवीरता के लिए भी प्रसिद्ध थे
समकालीन काव्य दोहा
: "भाखरसीह भलांह खगिमारग खंगारउत ।"
"जिण सै जाणीता कछवाहा जिहिं करण ॥"
विक्रम संवत 1689 में भाखरसिंह का निधन हुआ
3. साखूण के उत्तराधिकारी एवं आमेर का स्तम्भ: श्यामसिंह खंगारोत
भाखरसिंह के पश्चात् उनके पुत्र बदरीदास साखूण के स्वामी बने, जिनकी जागीर में साखूण के साथ आकोदा गाँव भी शामिल था
बदरीदास के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र मनरूपसिंह साखूण के अधिपति बने
आमेर की पुनर्विजय में ऐतिहासिक योगदान (1707 ई.)
विक्रम संवत 1763 (21 फरवरी 1707 ई.) में मुगल बादशाह औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों (आजम और मुअज्जम) के बीच उत्तराधिकार का जाजऊ युद्ध हुआ
इस कठिन समय में श्यामसिंह खंगारोत ने आमेर को पुनः मुक्त कराने में केंद्रीय भूमिका निभाई
डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा (उदयपुर राज्य का इतिहास)
: डॉ. ओझा लिखते हैं कि जयपुर और जोधपुर की सम्मिलित सेना के आमेर पहुँचने से पूर्व ही श्यामसिंह कछवाहा (खंगारोत) और दीवान रामचंद्र ने अपने विश्वस्त योद्धाओं के साथ शाही फौजदार हुसैन खां को आमेर से खदेड़ दिया और सवाई जयसिंह को उनके पैतृक सिंहासन पर बैठाया । पं. हनुमान शर्मा (नाथावतों का इतिहास)
: इनके अनुसार इस अभियान हेतु दो सैन्य टुकड़ियाँ बनाई गई थीं—एक दीवान रामचंद्र और दूसरी श्यामसिंह खंगारोत के अधीन । श्यामसिंह ने सैयदों पर धावा बोलकर सर्वप्रथम काणोता पर अधिकार किया और संपूर्ण क्षेत्र खाली करवाया ।
मुगल दरबार में कूटनीतिक प्रभाव
श्यामसिंह खंगारोत के मुगल दरबार के शक्तिशाली सैयद बंधुओं (वजीर सैयद अब्दुल्ला खां एवं मीर बख्शी हुसैन अली खां) से घनिष्ठ और मित्रवत संबंध थे
डॉ. वी.एस. भटनागर अपनी पुस्तक 'सवाई जयसिंह' में उल्लेख करते हैं कि हुसैन अली ने शासक बनने के बाद आमेर के श्यामसिंह खंगारोत को विशेष रूप से विचार-विमर्श के लिए बुलाया था
4. ऐतिहासिक भ्रांतियों का निवारण एवं जोधपुर प्रवास
कुछ इतिहासकार, जैसे डॉ. वी.एस. भटनागर और कुंवर देवीसिंह मंडावा, यह संदेह व्यक्त करते हैं कि सवाई जयसिंह द्वारा अपने भाई विजयसिंह को कैद करने और ज्येष्ठ पुत्र शिवसिंह को जहर देने के षड्यंत्र में श्यामसिंह का हाथ था
परंतु लेखक डॉ. राघवेंद्र सिंह मनोहर तथा पंडित गोपालनारायण बहुरा इस मान्यता को निराधार खारिज करते हैं
अजीत विलास (सं. डॉ. शिवदत्त दान बारहठ) का साक्ष्य
: "सं. 1778 रा में खंगारोत स्यामसिंघ मनरुपोत आंबेर सुं छाड़ ने श्री म्हाराज करे आया। तिण ने पेहलां तो रुपिया एक हजार रोजीनो दिया, पछै पांच सौ दिया। पछै तोड़ा में पटो दियो..."
विक्रम संवत 1778 (1721 ई.) में सवाई जयसिंह और सैयद बंधुओं के मध्य संबंध बिगड़ने लगे थे
5. उत्तरकालीन इतिहास एवं प्रमुख घटनाएँ
श्यामसिंह खंगारोत का जीवन निरंतर संघर्षरत रहा
परवर्ती शासक एवं महत्वपूर्ण घटनाएँ:
कुंवर सुरताणसिंह: श्यामसिंह के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र सुरताणसिंह उत्तराधिकारी हुए
। इन्होंने कनिष्ठ अवस्था में ही मराठों के विरुद्ध युद्धों में अदम्य वीरता प्रदर्शित की । ठाकुर रामसिंह: साखूण के परवर्ती पराक्रमी शासक रामसिंह ने बूंदी के हाड़ा राजपूतों के विरुद्ध युद्ध में असाधारण वीरता का परिचय दिया
। ठि. साखूण जब्ती एवं स्वतंत्रता संग्राम: प्रसिद्ध लोकनायक स्वतंत्रता सेनानियों डूंगजी-जवाहरजी को नसीराबाद अंग्रेज छावनी लूटने में सहायता देने के कारण अंग्रेजों/रियासत द्वारा साखूण ठिकाना जब्त कर लिया गया था, जिसे बाद में बहाल किया गया
। ठाकुर सोभागसिंह: विक्रम संवत 1867 में सोभागसिंह साखूण के ठाकुर थे, जिनका उल्लेख भिनाय के राजा उदयभान के निधन पर भेजी गई शोक-चिट्ठी में मिलता है
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निष्कर्ष
साखूण ठिकाना केवल अपनी भौगोलिक और पुरातात्विक प्रचुरता के लिए ही नहीं जाना जाता, बल्कि यह भाखरसिंघोत खंगारोत राजपूतों के शौर्य, कूटनीतिक चातुर्य, स्वामिभक्ति और राष्ट्रीय चेतना की गौरवशाली विरासत का एक अमर प्रतीक है
