मेवाड़ के महाराणा रायमल जी के 14 पुत्रों में ज्येष्ठ थे राजकुमार पृथ्वीराज, जो संग्राम सिंह यानी राणा सांगा के बड़े भाई थे | राजकुमार पृथ्वीराज ने 14 वर्ष की आयु में ही अपनी वीरता प्रदर्शित कर देशभर में ख्याति अर्जित कर ली थी | दुश्मन पर त्वरित और तीव्रता से आक्रमण करने के कारण उन्हें उड़ना राजकुमार कहा जाता था |
हमने कुछ दिन पहले एक वीडियो बनाया था कि यदि खानवा युद्ध में राणा सांगा की जगह पृथ्वीराज होते तो आज भारत का इतिहास कुछ और होता, पर अफ़सोस बाबर के आने से पहले ही राजकुमार पृथ्वीराज का एक षड्यंत्र के तहत निधन हो गया था |
उनकी वीरता के एक किस्सा लिखा है इतिहासकार हर विलास शारडा ने अपनी पुस्तक "हिन्दुपति महाराणा सांगा" में | शारडा ने जो घटना लिखी है उसके बारे में उन्होंने लिखा है कि इतिहास की यह घटना मुसलमान लेखकों द्वारा भी अनुमोदित है | घटना के अनुसार ...
एक अवसर पर पृथ्वीराज ने राणाजी को मालवा के सुलतान के एक अहदी (सैनिक अधिकारी) से घनिष्ठता से बातें करते देखा ।
एक अहदी से मेवाड़ जैसी रियासत के महाराणा का इस तरह घनिष्ठता से बातें करना पृथ्वीराज को बहुत अखरा और उन्होंने इसके लिए अपने पिता को ऐसा करने से टोका |
जिस पर उनके राणाजी ने व्यंग से कहा- तुम तो राजाओं को पकड़ने में शक्तिमान हो परन्तु स्थिति तो यह है कि मैं अपनी धरती की रक्षा करना चाहता हूँ ।"
यह सुन पृथ्वीराज रुष्ट होकर चले गये, अपना दल एकत्रित किया, नीमच में जा पहुंचे और वहाँ 5000 संवार एकत्रित कर देपालपुर पहुंच उसे लूट लिया और वहां के हाकिम को मार डाला। इस आक्रमण के समाचार सुन कर मालवे का सुलतान भी, जो सेना एकत्रित कर सका उसे ले, मांडू से चल पड़ा।
इधर पृथ्वीराज पीछे लौटने के बदले आगे ही बढ़े और मालवा की सेना पर, जो ताज़ा होने के लिये अपने डेरों में विश्राम कर रही थी, आक्रमण कर दिया। खोजों और स्त्रियों से भरे हुए बादशाही डेरे को पहिचान कर पृथ्वीराज ने महमूद को कैद कर लिया और उसे अपने साथ एक शीघ्रगामी ऊंट पर बिठाकर पीछा करने वालों से चुपचाप पीछे-पीछे चले आने को कहा और चेतावनी दी कि यदि ऐसा न करोगे तो तुम्हारे सुलतान मार डाले जावेंगे हां यह आश्वासन भी दिया कि सुलतान को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचाई जावेगी, परन्तु उससे मेरे पिताजी के चरण स्पर्श कराकर पुनः स्वतंत्र कर देंगे ।
वे उसे सीधा चित्तौड़ ले गये और राणाजी के सन्मुख उपस्थित कर उनसे कहा कि अपने मित्र अहदी को बुलाइये और पूछिये कि यह कौन है। मालवा के बादशाह महमूद को एक मास पर्यन्त चित्तौड़ में रखा गया और स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिये कतिपय घोड़े नज़र करने पर उसे मान मर्यादा सहित छोड़ दिया पृथ्वीराज अपने निवासस्थान कुम्भलगढ़ को चले गये और उसी तरह के वीर कार्य करते रहे जैसे कि उन्होंने 14 वर्ष की अवस्था से लगाकर अपने जीवन पर्यन्त किये और जिनकी प्रशंसा देशभर में और चारण भाटों की कविता में हुई ।
एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने में आश्चर्यजनक त्वरा और शत्रु पर विद्युत-वेग से टूट पड़ने के कारण पृथ्वीराज को “ऊडणा पृथ्वीराज" भी कहते हैं ।
