खंगारोतों का यह संस्थान जयपुर अजमेर राजमार्ग पर बगरू महलां व दूदू के बीच मुख्य सड़क से लगभग 2 कि.मी. पर अवस्थित है। श्यामसिंह के छोटे पुत्र बुधसिंह को भाई बंट में बिचूण की जागीर मिली थी। विक्रम संवत् 1765 (1708 ई.) में महाराजा सवाई जयसिंह ने चूड़ामन जाट के खिलाफ जो अभियान किया उसमें बुधसिंह ने बहुत वीरता दिखाई । बुधसिंह के पुत्र बनेसिंह भी अपने पिता और पितामह के समान अप्रतिम वीर थे ठाकुर बनेसिंह ने बिचूण के किले का निर्माण करवाया। जवाहरसिंह जाट ने जब कामा पर अधिकार कर लिया तो महाराजा सवाई माधोसिंह प्रथम ने एक सेना जवाहरसिंह को सबक सिखाने के लिये भेजी। इसकी अग्रिम टुकड़ी का नेतृत्व बनेसिंह बिचूण को सौंपा गया। जिन्होंने भरतपुर की विशाल सेना का गगवाने में मुकाबला किया तथा भीषण युद्ध के पश्चात् 500 सवारों के साथ लड़ते हुए काम आये । इस संघर्ष में जवाहरसिंह को बहुत नुकसान उठाना पड़ा तथा उसने जयपुर की ओर आने का विचार छोड़कर अपना रास्ता बदल लिया ।'
मांवडा-मांढोली युद्ध की पूर्व संध्या पर बनेसिंह बिचूण ने जाट शक्ति को जो आघात पहुंचाया वह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण था तथा उसने आगे आने वाले घटनाक्रम को दिशा प्रदान कर दी ।
बिचूण के परवर्ती शासकों में ठाकुर बैरीसाल बहुत प्रसिद्ध हुए । महाराजा सवाई जयसिंह तृतीय (1819 से 1835 ई.) की नाबालिगी के समय शासन सूत्र राजमाता भटियाणी जी के हाथों में था । राजमाता ने विक्रम संवत 1882 में झुंथाराम सिंघवी को प्रधानमंत्री और बिचूण के ठाकुर बैरीसाल को फौजबक्सी (प्रधान सेनापति) बनाया । जयपुर की एक सेना खिरोड़ के सलेदीकों के उपद्रव को शान्त करने और सीकर के रावराजा लछमणसिंह का खण्डेले पर से अनधिकृत कब्जा छुड़ाने के लिये शेखावाटी में भेजी गयी। इस सेना का नेतृत्व ठाकुर बैरीसाल को सौंपा गया। इस सेना ने सीसु के गढ़ (राणोली शिशु) को घेर लिया तथा वहां भीषण युद्ध हुआ । इसके बाद तेजी से प्रस्थान करती हुई यह सेना जब उदयपुरवाटी पहुंची तो खेतड़ी कुंवर बख्तावरसिंह, बिसाऊ के श्यामसिंह और नवलगढ़ के उदय सिंह अपनी अपनी सेना के साथ इस अभियान में शामिल हुए। इस विशाल सेना ने सीकर के रावराजा द्वारा निर्मित शहर लिछमणगढ़ (लक्ष्मणगढ़) को जा घेरा । पहाड़ी पर बने गढ़ की बुरजों पर तोपों से गोले बरसाये गये । इस पर रावराजा ने तत्काल जयपुर पहुंचकर एक बहुत बड़ी राशि नजर के रूप में राजमाता को भेंट की और अपने किलों की चाबियां तथा तलवार उनके चरणों में रख दी। इस पर रावराजा से खण्डेला छोड़ने का आश्वासन लेकर सेना वहां से हटाई गई ।'
विक्रम संवत् 1883 में जब गवर्नर जनरल कलकत्ते से आगरा आया तो महाराजा जयपुर की ओर से जो प्रतिनिधि मण्डल उससे मिलने गया उसमें अन्य प्रमुख सरदारों के साथ बैरीसाल खंगारोत भी शामिल थे । यथा-
"संवत् 1883 माह बुदी 4 सिंधी हुकमचन्द, राव चांदसिंह गोगावत, श्यामसिंह शेखावत, बैरीसाल खंगारोत व राय कुन्दन लाल ने गवर्नर फिरंगी कलकत्ता सूं आगरे आयो सो मिलबा ने भेज्या ।"
महाराज सवाई जयसिंह तृतीय के शासनकाल में ठाकुर बैरीसाल बिचूण का कितना प्रभाव और वर्चस्व था इसका पता कुछ अन्य उल्लेखों से भी चलता है । यथा - "संवत् 1885 श्री जी की सवारी श्री जी की सवारी में दाहिणी तरफ एक हाथी पर मेघसिंह खंगारोत (डिग्गी) चंवर करै तथा दूसरी तरफ बैरीसाल खंगारोत बिचूण मोरछल करै ।"
वि. संवत् 1885 (1828 ई.) में गणगौर की सवारी के प्रसंग में भी बैरीसाल खंगारोत का अन्य प्रमुख सरदारों के साथ सम्मिलित होने का उल्लेख मिलता है।
बिचूण के परवर्ती शासकों में ठाकुर बलवन्तसिंह काफी प्रभावशाली हुए वे जयपुर राज्य में रेवेन्यू मेम्बर रहे थे । बिचूण के अन्तिम जागीरदार ठाकुर मानसिंह भी बहुत योग्य थे । बिचूण के वर्तमान ठाकुर रणधीर सिंह जी I. P. S. भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं ।
सन्दर्भ : "खंगारोत कछवाहों का इतिहास" लेखक - डॉ राघवेंद्र सिंह मनोहर
