आज के इस लेख में हम बात करेंगे जाटू तोमरों की यानी जाटू तंवरों की - तो सबसे पहले हम बात करते हैं कि आखिर तोमर या तंवर है कौन ? इतिहासकार इनकी उत्पत्ति को लेकर क्या लिखते हैं ? तंवर राजवंश का राजनैतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास नामक पुस्तक में डॉ महेंद्र सिंह तंवर लिखते हैं -
"तोमरों की उत्पत्ति के संदर्भ में अनेक स्त्रोत प्राप्त होते हैं, मध्यकालीन इतिहासकार तोमरों की उत्पत्ति उस सोमवंश से मानते हैं जिसमें हस्तिनापुर के शान्तनु उत्पन्न हुए थे । उनके पुत्र विचित्रवीर्य हुए जिनके दो पुत्र धृतराष्ट्र और पाण्डु हुए जिनके वंशज क्रमशः धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव और पाण्डु के पुत्र पाण्डव कहलाए। इन्हीं कौरव और पाण्डवों के मध्य वैदिक कालीन भारतीय इतिहास का महासंग्राम महाभारत कुरुक्षेत्र में लड़ा गया । पाण्डु पुत्र अर्जुन के वंशज हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ के उत्तराधिकारी हुए । अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु के परीक्षित और परीक्षित के वंश में आगे अर्जुनायन व तोमर हुए। जब राजपूतों के छत्तीस कुलों की कल्पना साकार हुई तब तोमरों को भी उस समय के इन्द्रप्रस्थ और अब दिल्ली के राजा के रूप में उसमें प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त हुआ ।
महाभारत के महासंग्राम के पश्चात् अनेक पीढ़ियों तक यह वंश पाण्डव वंश के नाम से हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ पर शासन करता रहा और ईसा पूर्व चौथी सदी से छठी शताब्दी तक अर्जुनायन के रूप में भारतीय इतिहास में जाना गया तथा कालान्तर में यही वंश तोमर वंश के नाम से पुन: हस्तिनापुर और इन्द्रप्रस्थ में स्थापित हुआ और दिल्ली को अपनी राजधानी के रूप में स्थापित किया । यह वंश पाण्डव से अर्जुनायन और अर्जुनायन से तोमर, तोमर से तंवर, तुंवर कैसे बना? इस विषय पर अनेक विद्ववानों ने अपने-अपने मत व्यक्त करने का प्रयास किया है साथ ही कई प्रश्न उठते हैं कि पाण्डव वंश के उत्तराधिकारी अर्जुनायन है या तोमर ?
खड़गराय अपने गोपाचल - आख्यान में तोमरों (तंवरों) की उत्पत्ति के संदर्भ में लिखते हैं- बरनौ कछु सनी इहि भाँति, रिसि अत्रेव उत्पत्ति ।
खड़गराय तोमरों को अत्रि ऋषि की सन्तान मानते हैं जो आगे चलकर पाण्डववंशी तोमर कहलाए । वि.सं. 1688 के रोहिताश्वगढ़ के मित्रसेन के शिलालेख' में तोमरों को पाण्डव वंशी तथा सोम वंशी लिखा है । मित्रसेन स्वयं तोमर था और ग्वालियर के तोमर राजवंश की शाखा का था। उसे निश्चय ही अपने पूर्वजों के कुल का ज्ञान होगा। पुराणों तथा रावों व भाटों के इतिहास ग्रंथों से ज्ञात होता है कि पाण्डव वंश में राजा तुंग हुआ जिसके उत्तराधिकारी तुंग से तुंवर कहलाए ।
जब नागवंश समाप्त होने को आया तो एक नागवंशी ऋषि आस्तिष्कजी जो जरत्काध के पुत्र थे, स्वयं महाराजा जनमेजय के दरबार में गये और उन्हें समझाया कि किसी वंश या जाति को समूल नष्ट नहीं करना चाहिए, परिणामस्वरूप एक यज्ञ का आयोजन किया गया । राजा जनमेजय के राजपुरोहित कनष के पुत्र तुर जिसकी अध्यक्षता में इस यज्ञ में जनमेजय के पुत्र-पौत्रादि सभी दीक्षित हुए क्योंकि उन्हें महर्षितुर ने दीक्षित किया था इसलिए ये तुर, तर या धीरे-धीरे तुंवर, तंवर या तोमर कहे जाने लगे। दुर्गाशप्तशती का एक श्लोक है जिसमें दुर्गा माता द्वारा धारण तलवार को तोमर कहा गया है-
'तोमरे भिन्दी पालैश्य'
अर्थात् वह तलवार जिसकी मूठ में पंजा डालकर जिसे पकड़ा जाए उसे तोमर कहा जाता है ।
संभवत: पाण्डु वंश में राजा इस शस्त्र का प्रयोग करने लगे हो जिससे कालान्तर में यह पाण्डु वंश अर्जुनायन और आगे चलकर तोमर कहलाया होगा । तोमरों की वर्तनी विभिन्न रूपों में मिलती है। शिलालेखों और तत्कालीन संस्कृत ग्रंथों में ‘तोमर' कहे जाते हैं । समकालीन हिन्दी गंथों में यह नाम 'तोवर', 'तुंवर' 'तंवर' रूप में मिलता है। कुछ फारसी इतिहासों में 'तुनूर' या 'तौंर' भी पढ़ा जाता है। पश्चिमी भारत के जैन विद्वान उन्हें 'तुंग " लिखते हैं। दिल्ली के तोमर नामक पुस्तक में हरिहर निवास द्विवेदी ने उनका शुद्ध नाम 'तोमर' ग्रहण किया, जिसे इस पुस्तक में भी ग्रहण किया गया है।
ईसा पूर्व चौथी सदी से ईसा पश्चात् चौथी सदी तक भारतीय इतिहास को प्रभावित करने वाला अर्जुनायन गण भी अपने को पाण्डव पुत्र अर्जुन की ही संतान मानते थे। इनका निवास स्थान अलवर जयपुर के उत्तरी पूर्वी भाग, भरतपुर, आगरा, मथुरा और दिल्ली था। यही वह प्रदेश है जहां पर पाण्डवों ने शासन किया"
डॉ महेंद्रसिंह तंवर खेतासर ने इसी तरह का विश्लेषण करते हुए लिखा है कि -अंत में यही कहा जा सकता है कि अर्जुन के वंशज अर्जुनायन ही आगे चलकर तोमर कहलाये होंगे । विभिन्न स्त्रोतों और प्राप्त विद्वानों के मतों के आधार पर यह माना जा सकता है। जब तक कि कोई ठोस प्रमाण, शिलालेख आदि प्राप्त नहीं हो जाते तब तक तो संभावनाएँ यही इंगित करती है कि पांडुवंशी अर्जुन के वंशज ही आगे चलकर अर्जुनायन और उसके पश्चात् तोमर कहलाये हो। जिस प्रकार यौधेयों के वंशज जोहिया कहलाए उसी प्रकार अर्जुनायनों के वंशज भी तोमर कहलाने लगे हो, ऐसा ज्यादा उचित प्रतीत होता क्योंकि इसी क्षेत्र से तोमर जाउल ने आगे बढ़कर पुन: हस्तिनापुर व इन्द्रप्रस्थ के मध्य अंनगपुर में नवीन राजधानी की स्थापना की जिसे कालान्तर में दिल्ली कहा जाने लगा ।
अब बात करते हैं जाटू तंवरों यानी जाटू तोमरों की -
जाटू तंवर राजपूतों का गौरवशाली इतिहास पुस्तक के लेखक ठाकुर महेंद्रसिंह जाटू तंवर लिखते हैं कि दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर के एक पुत्र सैलून जिन्हें शालिवाहन भी कहा जाता है, दिल्ली से राजस्थान की तरफ आये और सन 1085ई में बेवा नामक स्थान पर अपना राज्य कायम किया |
शालिवाहन के निहालदास हुए जिन्होंने नरहड़ को अपने राज्य में मिलाया, निहालदास के दोह्थाजी हुए और उनके एक पुत्र जयरथ जी हुए |
जयरथ जी ने नरहड़ से आकर तुन्दा पिपरना जिसे आजकल पपुरना कहते हैं पर अधिकार कर अपना राज कायम किया |
इन्हीं जयरथ जी के एक पुत्र हुए जटमलजी, जिनके नाम से उनके वंशज जाटू तंवर कहलाये | राजा जटमलजी को लेकर भी इतिहास में एक कहानी रोचक कहानी मिलती है |
पपुरना महल में इनका जन्म सन 1115 में हुआ था, इनकी माता का नाम भुमादे चाहिल था, जो राजा जयरथ की छोटी रानी थी | जब इस छोटी रानी के पुत्र हुआ तब पटरानी यानी बड़ी रानी ने ईर्ष्यावश अपनी नौकरानी के माध्यम से उस बालक को महल के पीछे खड़े एक वट वृक्ष की जटाओं में फिंकवा दिया, जिसे पास ही रहने वाले एक ऋषि ने देखा और उसे अपनी कुटिया में ले आया, षि का नाम वाघ्रपद था, वाघ्रपद ने बालक का लालन पालन किया,
कुछ समय पश्चात् बड़ी रानी के षड्यंत्र का राजा को पता चला तो उसने बालक को तलाश करवाया और ऋषि का आभार व्यक्त कर बालक ले आये और उसे युवराज का दर्जा दिया |
यही युवराज जटमल आगे चलकर तुन्दा पपुरना के राजा बने और उनके वंशज जाटू तंवर कहलाये |"
