आमेर नरेश कांकिलदेव कछवाह और मीणा संघर्ष

Gyan Darpan
0

दुल्हेराय कछवाह मध्यप्रदेश से आये और राजस्थान में उन्होंने   दौसा, मांच, खोह आदि जीत कर अपना राज्य स्थापित किया |  जयपुर राज्य के संक्षिप्त इतिहास पुस्तक के लेखक ठाकुर फतेहसिंह नायला ने लिखा है कि ३० वर्ष तक राज करने के बाद दुल्हेराय जी का निधन हो गया | उनके राजस्थान आगमन और निधन के समय को लेकर लेखकों में मतभेद है, इसलिए हम कोई एक तारीख बताना उचित नहीं समझते |

उनके निधन के बाद काकिल जी राजगद्दी पर बैठे | जिन्हें इतिहास में काकिलदेव भी लिखा जाता है | काकिलदेव की आयु उस वक्त किशोर अवस्था की थी | किशोर राजा के सामने उनके अपदस्थ मीणा शासक ज्यादा ताकतवर थे | सो उन्होंने मौका देख अपना खोया राज्य वापस पाने के लिए बहुत सारे गांव वापस दबा लिए |

इतिहासकार सवाईसिंह जी धमोरा के अनुसार काकिलदेव के अधिकार में राजधानी के आस-पास के महज दस बारह गांव ही रह गए थे, उनके पास दौसा और भांडारेज के दो दुर्ग ही रह सके | पर काकिलदेव ने धैर्य रखा और शक्ति संचय में लगे रहे | संकट के समय उन्होंने अजमेर के चौहानों से सम्पर्क बढाने का प्रयास किया और इन्हीं प्रयासों के तहत चौहानों ने काकिलदेव को अपना दामाद बनाने के उद्देश्य से रिश्ता तय कर दिया |

काकिलदेव जब बारात लेकर अजमेर विवाह के लिए जा रहे थे तभी मीणाओं ने उन्हें अम्बा घाटी में घेर लिया | काकिलदेव ने अपने भाई बंधुओं से सलाह कर मीणाओं को सन्देश भिजवाया कि अभी मैं विवाह के लिए जा रहा हूँ | सो बारात जाने दो, वापसी पर युद्ध करना, यदि आप जीते तो आपको दहेज़ का धन भी मिलेगा | मीणाओं ने यह बात मान ली और बारात को जाने दिया |

कांकिलदेव जब विवाह कर लौटे तो मीणों ने उन्हें अम्बा घाट पर फिर घेर लिया | युद्ध हुआ, परस्पर तीर तलवारें चली पर "घण जीते और शूरमा हारे" कहावत यहाँ भी चरितार्थ हुई |

युद्ध में बहादुर मीणों ने कछवाह सेना को हरा दिया, खुद कांकिलदेव घायल होकर अचेत हो गए | मीणा योद्धाओं ने बारात के साथ आये दहेज़ को लूटा और कूच कर गए | रानी ने पास स्थित माता के देवरे में शरण ली और अपने सुहाग की रक्षा की प्रार्थना की | तब रात्री में माँ जमवाय ने गौ-बछड़े के रूप में प्रकट होकर कांकिलदेव पर दुग्ध का छिड़काव किया और वे उठ खड़े हुए |

इतिहास में लिखा है कि देवी के आशीर्वाद से सभी घायल सैनिक स्वस्थ हो गए और विजय की ख़ुशी में मदिरा की महफ़िल जमाये बैठे मीणों पर अचानक हमला कर उन्हें मार भगाया | इस तरह देवी के आशीर्वाद से कांकिलदेव यह युद्ध भी जीत गए |

इस युद्ध के बाद कांकिलदेव ने आमेर पर हमला कर उसे जीत लिया, और उसे अपनी राजधानी बनाया | आमेर पर उस वक्त सुसावत वंश के मीणा राजा राव भत्तो का राज था | आमेर के अलावा मैड बैराठ के जादू क्षत्रियों को हराकर अपने राज्य का विस्तार किया | 

पर कांकिलदेव के सामने सबसे बड़ी चुनौती मीणाओं का विद्रोह था, जिसे शांत करने के लिए कांकिलदेव ने मीणाओं से राजीनामा कर लिया, उन्हें कुछ जागीरें दी और राज्य के खजाने की रक्षा की जिम्मेदारी दी | कई जिम्मेदार पदों पर नियुक्तियां दी और मीणाओं पर पूरा भरोसा जताया |

खजाने के चौकीदार मीणाओं ने भी बड़ी ईमानदारी के साथ अपनी ड्यूटी निभाई |

ठाकुर फ़तेह सिंह जी नायला ने लिखा है कि एक बार एक मीणा चौकीदार ने देखा कि उसके बेटे ने कर्तव्य में बेईमानी की है तो उसने तुरंत उसका सर कलम कर दिया |

इस तरह आमेर को कछवाह राजवंश की राजधानी बनाकर कांकिलदेव ने तीन वर्ष दो माह आठ दिन राज  किया और बैसाख सुदी 10 संवत 1096 को उनका निधन हो गया | उनके बाद उनके पुत्र हणूजी आमेर की गद्दी पर बैठे |

 

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)