परमार राजवंश और उसकी शाखाएँ : भाग-3

भाग-2 से आगे ....Parmar Rajvansh ka itihas
जगनेर के बिजौलिया के परमार-
मालवा पर मुस्लिम अधिकार के बाद परमारों चारों ओर फैल गये। इनकी ही एक शाखा जगनेर आगरा के पास चली गई। उनके ही वंशज अशोक मेवाड़ आये। जिनको महाराणा सांगा ने बिजौलिया की जागीर दी।

जगदीशपुर और डुमराँव का पंवार वंश- भोज के एक वंशज मालवा पर मुस्लिम अधिकार के बाद परिवार सहित गयाजी पिण्डदान को गये। वापस आते समय इन्होंने शाहाबाद जिला बिहार के एक हिस्से पर कब्जा कर लिया। बादशाह शाहजहाँ ने इनके वंशज नारायण मल्ल को भोजपुर जिला जागीर में दे दिया। इन्होंने जगदीशपुर को अपनी राजधानी बनाया। बाद में इन्होंने आरा जिला में डुमराँव को अपना केन्द्र बनाया। इसी वंश में 1857 की क्रांति के नायक वीर कुंवरसिंह का जन्म हुआ, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिये थे।

देवास और धार के परमार- मालवा पर मुस्लिम अधिकार के समय परमारों की एक शाखा जो जगनेर (आगरा के पास) चली गई जहाँ से मेवाड़ गये अशोक के छोटे भाई शम्भूसिंह ने पूना और अहमदनगर के पास के इलाकों पर कब्जा कर लिया किन्तु पड़ौसी शासक ने उसे धोखे से मार दिया। इन्हीं के वंशजों ने शिवाजी के पुत्र राजाराम को मराठा साम्राज्य के विस्तार व सुरक्षा में उल्लेखनीय योगदान दिया, जिससे प्रसन्न हो छत्रपति राजाराम ने इन्हें विश्वासराव व सेना सप्त सहस्त्रों की उच्च उपाधियाँ प्रदान की। इन्हीं के वंशज देवास व धार के स्वामी बने।

उमट परमार- इस वंश के राजगढ़ व नरसिंहगढ़ पहले एक ही संयुक्त राज्य थे। यही कारण है आजतक इन दोनों राज्यों के भाग एक दूसरे में अवस्थित है। यहाँ के शासक परमार वंश के आदि पुरुष राजा परमार के मुंगराव के वंशज है।

संखाला पंवार (परमार)- सांखला परमारों की एक शाखा है। वि.सं. 1318 के शिलालेख में शब्द शंखकुल का प्रयोग किया गया है। किराडू के परमार शासक बाहड़ का पुत्र बाघ जयचंद पड़िहार के हाथों मारा गया। बाघ के पुत्र वैरसी ने ओसियां की सचियाय माता से वर प्राप्त कर पिता की मौत का बदला लिया। नैणसी लिखते है कि माता ने उसे दर्शन दिए और शंख प्रदान किया, तभी से वैरसी के वंशज सांखला कहलाने लगे। इसने जयचंद पड़िहार के मून्धियाड़ के किले को तुड़वा कर रुण में किला बनवाया तब से ये राणा कहलाने लगे।

सोढा परमार- किराडू के शासक बाहड़ के पुत्र सोढा से परमारों की सोढा शाखा चली। सोढाजी सिंध में सूमरों के पास गये जिन्होंने सोढाजी को ऊमरकोट (पाकिस्तान) से 14 कोस दूर राताकोर दिया। सोढा के सातवें वंशधर धारवरीस के दो पुत्र आसराव और दुर्जनशाल थे। आसराव ने जोधपुर में पारकर पर अधिकार किया। दुर्जनशाल ऊमरकोट की तरफ गया। उसकी चौथी पीढ़ी के हमीर को जाम तमायची ने ऊमरकोट दिया। अंग्रेजों के समय राणा रतनसिंह सोढा ने अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया पर उन्हें पकड़कर फांसी पर चढ़ा दिया गया।

वराह परमार- ये मारवाड़ के प्रसिद्ध परमार शासक धरणी वराह के वंशज थे जिनका राज्य पूरे मारवाड़ और उससे भी बाहर तक फैला हुआ था। उसके नौकोट किले थे। इसीलिए मारवाड़ नौ कुटी कहलाई। मारवाड़ के बाहर उसका राज्य संभार प्रदेश, जैसलमेर तथा बीकानेर के बहुत से भूभाग पर था। वर्तमान जैसलमेर प्रदेश पर उनके वंशज वराह परमारों चुन्ना परमारों व लोदा परमारों के राज्य थे। मंगलराव भाटी ने पंजाब से आकर विक्रम 700 के करीब इनसे यह भूभाग छीन कर अपने अधीन कर लिया। वराह शाखा के परमार वर्तमान पटियाला जिले में है।
लेखक : Kunwar Devisingh, Mandawa


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Ratan Singh Shekhawat, Bhagatpura, Rajasthan.
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