एलोवेरा शारीरिक स्वास्थ्य के साथ साथ ब्लॉग के लिए भी एक बढ़िया टॉनिक है , एक बढ़िया की-वर्ड जो गूगल से आसानी से पाठक झटक कर आपके ब्लॉग पर ट्रैफिक बढ़ा सकता है |.
उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.
आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.
सन १९५० के दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में स्व. श्री तन सिंह जी एक शिक्षण शिविर के सिलसिले में अपने जीवन में पहली बार चितौड़ गए और वहां उन्होंने चितौड़ दुर्ग देखा | लेकिन चितौड़ दुर्ग देखने के दो महीने बाद तक स्व. श्री तन सिंह जी उस कसक और वेदना से मुक्त नहीं हो सके जो दुर्ग के प्रत्येक पत्थर और स्मारक में कसमसा कर मूक हो गयी | कलम का सहारा लेकर उन्होंने उन भावनाओं को वैरागी चितौड़ शीर्षक देकर भाषा के बन्धनों में जकड कर मुक्ति की सांस ली | खुद स्व. श्री तन सिंह जी के शब्दों में -" जब पहली बार चितौड़ को देखा तो लगा , मैं स्वयं कितनी ही बार लड़ चूका हूँ ,मर-मर कर अमर हो चूका हूँ | पर नहीं ,वह तो केवल एक छलना थी ; उस पर मरने की एक इच्छा थी ; मेरे रक्त की एक मांग थी , जिसे न कभी पूरी की और न कभी पूरी की जा सकती | सोचा , इच्छा तो व्यक्त कर दूँ और वैरागी चितौड़ उसका अभिव्यक्त रूप है |
इसी तरह फरवरी सन १९५८ में जब वे उज्जैन गए और वहां उन्होंने क्षिप्रा के तीर पर प्रात: स्मरणीय इतिहास प्रसिद्ध वीर दुर्गादास का स्मारक देखकर उनकी सोई हुई वेदना ने फिर विद्रोह कर दिया और इस वेदना के भुलावे के प्रयास विफल हो गए तो उन्होंने उन्हें भी "क्षिप्रा के तीर " शीर्षक देकर एक गद्य लिख डाला | जिसमे उन्हें स्मारक देखते समय लगा -कि उस दिन उस स्मारक ने उनसे बहुत कुछ कहा है ; वही सब लिख डाला |
फिर मई १९५९ में जब स्व.श्री तन सिंह जी ने हल्दी घाटी देखी तो उन्होंने वही महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक की समाधि पर दो आंसू बहाने के बहाने " चेतक की समाधि से " नामक एक गद्य लिख डाला | इसी वर्ष फिर अक्तूबर के महीने में जब उन्होंने जैसलमेर दुर्ग देखा तो उन्हें लगा जैसे दुर्ग उनसे कह रहा है - मेरी भी कुछ सुनो ; उपेक्षा तो सभी करते है ,पर तुम भी ...| और उन्होंने जैसलमेर दुर्ग देखते समय जो इतिहास के दृश्य उनके मन मष्तिस्क में आये ' होनहार के खेल " शीर्षक देकर लिख दिए | इसी वर्ष स्व. श्री तन सिंह जी ने इतिहास का अध्ययन किया , उन्ही के शब्दों में - यह वर्ष मेरे लिए अविस्मरणिय रहेगा क्योंकि इसी वर्ष मैंने इतिहास पढने की चेष्टा की, उसके तोल-जोख ने वर्तमान की परीक्षा की और परिणाम स्वरूप भविष्य की कल्पना में " कौम की कुटिया " शीर्षक लेख भी लिखा | स्व. श्री तन सिंह जी के इन्ही पांचो गद्यों को एक साथ संकलित कर श्री क्षत्रिय युवक संघ द्वारा होनहार के खेल नामक पुस्तक प्रकाशित की गयी |स्व. श्री आयुवान सिंह जी शेखावत के अनुसार -" इतिहास के इतिवृत्तात्मक सत्य के अन्दर साहित्य के भावनात्मक और सूक्ष्म सत्य के प्रतिष्ठापन की चेष्टा ही समाज में चेतना ला सकती है " और समाज में आत्म-सम्मान और आत्म-गौरव की भावनाओं का सृजन करना ही इस पुस्तक का मुख्य उद्देश्य है |फिर भी स्व. श्री तन सिंह जी ने यह पुस्तक केवल इसी उद्देश्य के लिए नहीं लिखी | कभी कभी हमारी भावनाएं सीमाएं तोड़ने लगती है और हृदय की अपार वेदना जब जीवन के सभी सुखों पर छा जाती है तब लेखक अपनी कलम चला कर ही जी हल्का करता है | और इसी तरह स्व.श्री तन सिंह जी ने भी वीर दुर्गादास के स्मारक, चेतक की समाधि पर, जैसलमेर व चितौड़ दुर्ग देखने के बाद जो वेदना महसूस की उसी वेदना से मुक्त होने के लिए उन्होंने कलम का सहारा लेकर यह पुस्तक लिख डाली |
अभी अभी दरबार ब्लॉग पर धीरू सिंह जी की पोस्ट पढ़ी कि आडवानी जी के ब्लॉग पर उनके द्वारा की गयी टिप्पणी कांट-छांट कर प्रकाशित की गयी है इस सम्बन्ध में ज्यादा जानकारी उनकी पोस्ट पढ़कर ली जा सकती है | इस तरह किसी भी टिप्पणी में कांट-छांट करना प्रसिद्ध ब्लोगर और वरिष्ट अधिवक्ता श्री दिनेश जी के शब्दों में " टिप्पणी टिप्पणीकार की संपत्ति है उस पर उस का कॉपीराइट भी है। ब्लागर/प्रकाशक उसे अप्रकाशित रख सकता है लेकिन बिना टिप्पणीकार की अनुमति के उस में कांट छांट नहीं कर सकता।" टिप्पणी पर की गयी कांट-छांट के सम्बन्ध में आडवानी जी को भी जबाब जरुर देना चाहिए और वे जब ही देंगे जब हम उनके ब्लॉग पर जाकर उनके इस कृत्य की निन्दात्मक टिप्पणियाँ करेंगे |
अत : सभी ब्लोगर साथियों से अनुरोध है कि धीरू सिंह की टिप्पणी में की गयी कांट-छांट के खिलाफ आडवानी जी के ब्लॉग पर इस कृत्य की निंदा के लिए एक निंदा टिप्पणी जरुर करें |
(अभागे भारतीय की फरियाद पर सिक-यू-लायर(Sick you Liar, बीमार मानसिकता वाले झुट्ठे) नेता द्वारा सांत्वना भरे कुटिल उपदेश की तरह पढ़ें) ----------------------------------------------------- अच्छा!!! वो दुश्मन है? बम फोड़ता है? गोली मारता है? मगर सुन - दोस्ती में - इतना तो सहना ही पड़ता है तय है - जरुर खोलेंगे एक और खिड़की - उसकी ख़ातिर मगर - हम नाराज़ हैं - तेरे लिए इतना तो कहना ही पड़ता है
तुम भी तो बड़े जिद्दी हो - दुश्मन भी बेचारा क्या करे इतने बम फोड़े - शर्म करो - तुम लोग सिर्फ दो सौ ही मरे ? (कितने बेशर्म हो तुम लोग) चलो ठीक है - इतने कम से भी - उसका हौंसला तो बढ़ता है और फिर - तुम भी तो आखिर १०० करोड़ हो(*) - क्या फर्क पड़ता है? [(*) ११५ करोड़ में १५ करोड़ तो विदेशी घुसपैठिये हमने ही तो अन्दर घुसाएँ हैं वोटों के लिए]
अच्छा! समझौते की गाड़ियों में दुश्मन भी आ जाते हैं??? क्या हुआ जो दिल लग गया यहाँ - और यहीं बस जाते हैं बेचारे - ये तो वहां का गुस्सा है - जो यहाँ पर उतारते हैं वहां पैदा होने के पश्चाताप में - यहाँ पर तुम्हें मारते हैं (क्यों न मारें?)
क्या सोचता है तू ? मरना था जिनको - वो तो गए मर तू तो जिन्दा है ना - तो चल - अब मरने तक हमारे लिए काम कर और क्या औकात थी उन मरने वालों की ? सिर्फ २०० रुपये मासिक कर (*१) हम क्या शोक करें - क्यों शोक करें अब - ऐसे वैसों की मौत पर ?
अच्छा! आतंकवादी तुम्हें लूटता है? मारता है? मजहब के नाम पर ? पर आतंकवादी का तो कोई मजहब ही नहीं होता - कुछ तो समझा कर (बेवकूफ कहीं के) तू सहिष्णु है - भारत सहिष्णु है - यह भूल मत - निरंतर याद कर क्या कहा? आत्मरक्षार्थ प्रतिरोध का अधिकार? - बंद यह बकवास कर (अबे,वोट बैंक लुटवायेगा क्या)
इन बेकार की बातों में - न अपना कीमती वक्त बरबाद कर भूल जा - कुछ नहीं हुआ - जा काम पर जा - काम कर
तेरे गुस्से की तलवार को - हमारी शांति की म्यान में रख हमने दे दिया है ना कड़ा बयान - ध्यान में रख जानते हैं हम - इस बयान पर - वो ना देगा कान चिंता ना कर - तैयार है - एक इस से भी कड़ा बयान
दे रक्खा है उसे - सबसे प्यारे देश का दरजा (*२) चुकाना तो पड़ेगा ना - इस प्यार का करजा दुनिया भर से - कर दी है शिकायत - कि वो मारता है दुनिया को फुरसत मिले - तब तक तू यूँ ही मर जा
किस को पड़ी है कि - कौन मरा - और मार गया कौन आराम से मर - तेरे लिए भी रख लेंगे - २ मिनट का मौन
रचयिता : धर्मेश शर्मा संशोधन, संपादन : आनंद जी. शर्मा
भारतीय की जान की कीमत (बाल-बुद्धि भारतियों पर कवि का कटाक्ष)
अरे - समझौता गाड़ी की मौतों पर - क्या आंसू बहाना था उनको तो - पाकिस्तान नाम के जहन्नुम में ही - जाना था मरने ही जा रहे थे - लाहौर, करांची - या पेशावर में मरते और उनके मरने पर - ये नेता - हमारा पैसा तो ना खर्च करते
और तुम - भारतियों, टट्पुंजियों - कहते हो हैं हम हिंदुस्थानी जब हिसाब किया - तो निकला तुम्हारा ख़ून - बिलकुल पानी औकात की ना बात करो - दुनिया में तुम्हारी औकात है क्या - खाक वो समझौता में मरे तो १० लाख - तुम मुंबई में मरो तो सिर्फ ५ लाख
तुम से तो वो अनपढ़, जाहिल, इंसानियत के दुश्मन, ही अच्छे देखो कैसे बन बैठे हैं - बिके हुए सिक यू लायर मीडिया के प्यारे बच्चे उनके वहां मिलिटरी है - इसलिए - यहाँ आ के वोट दे जाते हैं डेमोक्रेसी के झूठे खेल में - तुम पर ऐसे भारी पड़ जाते हैं
जाग जा - अब तो जाग जा ऐ भारत - अब ऐसे क्यूँ सोता है वो मार दें - और तू मर जाये - लगता ऐसा ये "समझौता" है प्रियजनों की मौत पर - फूट फूट रोवोगे - वोट नहीं क्या अब भी दोगे लानत है - ख़ून ना खौले जिस समाज का - वो सज़ा सदा ऐसी ही भोगे
पांच साल में - आधा घंटा तो - वोट के लिए निकाला कर विदेशियों के वोटों से जीतने वालों का तो मुंह काला कर सब चोर लगें - तो उसमे से - तू अपने चोर का साथ दे दे अपना तो अपना ही होता है - परायों को तू मात दे दे
बुद्धिमान है तू - अब अपनी बुद्धि से काम लिया कर वोट दे कर अपनों को - वन्दे मातरम का उद्घोष कर आक्रमणकारियों के दलालों का राज - समूल समाप्त कर ऐ भारत - तू उठ खड़ा हो - निद्रा, तन्द्रा को त्याग कर
अपने भारतीय होने पर - दृढ़ता से अभिमान कर कुछ तो कर - कुछ तो कर - अरे अब तो कुछ कर
रचयिता : धर्मेश शर्मा संशोधन, संपादन : आनंद जी. शर्मा ------------------------------------------------- बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी
चाहे हम हों कितने तगड़े , मुंह वो हमारा धूल में रगड़े, पटक पटक के हमको मारे , फाड़ दिए हैं कपड़े सारे , माना की वो नीच बहुत है , माना वो है अत्याचारी , लेकिन - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .
जब भी उसके मन में आये , जबरन वो घर में घुस जाए , बहू बेटियों की इज्ज़त लूटे, बच्चों को भी मार के जाए , कोई न मौका उसने छोड़ा , चांस मिला तब लाज उतारी , लेकिन - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .
हम में से ही हैं कुछ पापी , जिनका लगता है वो बाप , आग लगाते हुए वे जल मरें , तो भी उसपर हमें ही पश्चाताप ? दुश्मन का बुरा सोचा कैसे ??? हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी ??? अब तो - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .
बम यहाँ पे फोड़ा , वहां पे फोड़ा , किसी जगह को नहीं है छोड़ा , मरे हजारों, अनाथ लाखों में , लेकिन गौरमेंट को लगता थोडा , मर मरा गए तो फर्क पड़ा क्या ? आखिर है ही क्या औकात तुम्हारी ??? इसलिए - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .
लानत है ऐसे सालों पर , जूते खाते रहते हैं दोनों गालों पर , कुछ देर बाद , कुछ देर बाद , रहे टालते बासठ सालों भर , गौरमेंट करती रहती है नाटक , जग में कोई नहीं हिमायत , पर कौन सुने ऐसे हाथी की , जो कोकरोच की करे शिकायत ??? इलाज पता बच्चे बच्चे को , पर बहुत बड़ी मजबूरी है सरकारी , इसीलिये - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .
वैसे हैं बहुत होशियार हम , कर भी रक्खी सेना तैयार है , सेना गयी मोर्चे पर तो - इन भ्रष्ट नेताओं का कौन चौकीदार है ??? बंदूकों की बना के सब्जी , बमों का डालना अचार है , मातम तो पब्लिक के घर है , पर गौरमेंट का डेली त्योंहार है ऐसे में वो युद्ध छेड़ कर , क्यों उजाड़े खुद की दुकानदारी ??? इसीलिये - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .
सपूत हिंद के बहुत जियाले , जो घूरे उसकी आँख निकालें , राम कृष्ण के हम वंशज हैं , जिससे चाहें पानी भरवालें , जब तक धर्म के साथ रहे हम , राज किया विश्व पर हमने , कुछ पापी की बातों में आ कर , भूले स्वधर्म तो सब से हारे , जाग गए अब, हुए सावधान हम , ना चलने देंगे इनकी मक्कारी , पर तब तक - बात चीत रहेगी जारी , बात चीत रहेगी जारी .
रचयिता : धर्मेश शर्मा मुंबई / दिनांक २०.०९.२००९ संशोधन, संपादन : आनंद जी. शर्मा ------------------------------------------------- रचनाकार अथवा संपादक नियमित लेखक, कवि अथवा ब्लागर नहीं हैं l एक आम आदमी की तरह, आम आदमियों के बीच घूमते हुए, आतंकवादी हमलों के बाद अपने प्रियजनों को खो कर ह्रदय विदारक क्रंदन करते हुए, लुटे हुए आम भारतीय की जो पीड़ा, विवशता, हताशा और छटपटाहट देखी है - वह महसूस तो की जा सकती - परन्तु शब्द - वाणी अथवा लेखनी द्वारा - उस दर्द का १/४ % या १/२ % भी आप तक संप्रेषित करने में असमर्थ हैं l कहा गया है की "एक चित्र १००० शब्दों से अधिक कहता है" - परन्तु एक अनुभूति को तो सम्पूर्ण शब्दकोष भी संप्रेषित करने में असमर्थ हैं l हर बार के आतंकी आक्रमण के बाद जिस तरह बिके हुए निर्लज्ज देशद्रोही पत्रकार और नेता मिल कर भारत की आक्रांत और पीड़ित जनता को बहलाने फुसलाने का काम करते हैं और कहते हैं कि कुछ नहीं हुआ देखो कैसे भारत की जनता आक्रमण को भुला कर दूसरे ही दिन अपने अपने काम में व्यस्त हो गई है l खून तो तब खौलता है जब ये बिके हुए निर्लज्ज देशद्रोही पत्रकार और नेता लोग आक्रमणकारियों की पैरवी करने लगते है और देश के लिए प्राणों की आहुति देने वाले वीर सैनिकों पर आरोप लगाने का जघन्य और अक्षम्य अपराध करते हैं l
एक आम भारतीय की पीड़ा अपनी संवेदना में मिला कर आप तक पँहुचाने का प्रयास है l जब तक हम सब लोग आपसी क्षुद्र भेदभाव भुला कर अपनी मातृभूमि भारत की रक्षा के प्रति एकमत नहीं होंगे तब तक ऐसे ही आक्रमण होते रहेंगे और हम लोग ऐसे ही अरण्य-रोदन करते रहेंगे l
मातृभूमि भारत के प्रति देशभक्ति की भावना या रचना पर एकाधिकार अथवा नियंत्रण अवांछित है l प्रत्येक देशभक्त भारतीय अपनी अपनी भाषा में अनुवाद कर के प्रसारित करे l यद्दपि किसी भी प्रकार का "Copy Right" नहीं है - सब कुछ "Copy Left" है; तदापि पाठकगण से नम्र निवेदन है कि अपने मित्रों को प्रसारित (फारवर्ड) करते समय अथवा अपने ब्लॉग पर डालते समय रचनाकार को एक ईमेल द्वारा सूचित कर के अथवा एक लिंक दे कर प्रोत्साहन दें l हमारा मानना है कि - Criticism is Catalyst to Creativity या फिर यूँ समझ लीजिये कि - निंदक नियरे रखिये आंगन कुटी छवाय...... l आपकी सृजनात्मक आलोचना शिरोधार्य होगी - संकोच न करें l
देशभक्तिपूर्ण कविता आपको पसंद आयी तो अवश्य प्रसारित करें अथवा - क्योंकि : भारत के लोगों में देशभक्ति अक्षरशः "मरघटिया वैराग्य" जैसी है l ज्यों ही भारत पर आक्रमण होता है - जैसा की पिछले २००० वर्षों से होता आ रहा है (कोई नई बात नहीं है - आक्रमण न होना नई बात होगी), लोगों की देशभक्ति उनींदी सी आँखों से जागती हुई प्रतीत होती है - केवल प्रतीत होती है - जागती नहीं है - बस मिचमिचाई हुई आँखों से देख - थोड़ा बड़बड़ा कर फिर सो जाती है - अगले आक्रमण होने तक l मैं तो कहता हूँ कि "मरघटिया वैराग्य" भी बहुत लम्बा समय है - यूँ कहना चाहिए कि सोडा वाटर की बोतल खोलने पर बुलबुलों के जोश जितना या फिर मकई के दाने के गर्म होने पर आवाज कर के फटना और पोपकोर्न बनने की अवधि तक - बस इतना ही - इस से अधिक नहीं l पता नहीं कितने महान लोग भारत को जगाने का असफल प्रयत्न कर कर के मर गए परन्तु पूरे विश्व में केवल भारत के ही लोग हैं जो ठान रक्खें हैं कि हम नहीं जागेंगे l जो जाग जाते हैं उनके साथ ये तकलीफ़ है कि वे दूसरों को जगाने का मूर्खतापूर्ण कार्य करने लगते हैं - भूल जाते हैं कि उनके पहले भी उनसे लाख गुणा महान आत्माएं सिर पटक के थक गए - परन्तु भारत के लोग नहीं जगे l हम आप जैसे कुछ "मूर्ख" लोग भी भारत को जगाने के प्रयास में सहयोग कर रहें है - संभवतः किसी दिन भारत की अंतरात्मा जाग जाये l चर्मचक्षु खुलने से जागना नहीं होता है - ज्ञानचक्षु खुलने की नितांत आवश्यकता है - Sooner the Better.
जिस प्रकार हम प्रतिदिन शौचकर्म करते हैं, स्नानादि करते हैं, भोजन करते हैं - यह नहीं कहते कि कल तो किया था फिर आज भी क्यों करें - ठीक उसी प्रकार भारत के लोगों की मूर्छित अंतरात्मा को जगाने के लिए प्रत्येक जागरूक देशभक्त भारतीय को प्रतिदिन प्रयत्न करना है l मैं "चाहिए" शब्द के प्रयोग से बचता हूँ l हमें प्रयत्न करना "चाहिए" नहीं - हमें प्रयत्न करना है - और करते रहना है l
आनंद जी. शर्मा (anandgsharma@gmail.com) मुंबई / दिनांक : १६.०३.२०१०
यदि आप भी इन कविताओं को अपने ब्लॉग में प्रकाशित कर रहे है तो (anandgsharma@gmail.com)पर मेल से अपने ब्लॉग का लिंक देते हुए सूचित जरुर करें
ज्ञान दर्पण के पाठकों में से कई लोगों के अक्सर फ़ोन आते रहते है कि उन्होंने कहीं से वेब होस्टिंग पैकेज लिया और अब वर्डप्रेस स्क्रिप्ट या अन्य स्क्रिप्ट सर्वर पर अपलोड करनी है वह कैसे व कहाँ अपलोड करे ? बताएं | ऐसे में किसी भी व्यक्ति को जो इस फिल्ड में एकदम नया हो उसे फोन पर समझाना बहुत कठिन होता है सो मैं उन्हें यही कहता हूँ कि भाई अपने होस्टिंग कण्ट्रोल पेनल के उजर नेम व पासवर्ड भेज दो और बतादो कौनसी वेब स्क्रिप्ट अपलोड करनी है मैं खुद ही अपलोड कर देता हूँ | लेकिन वेब होस्टिंग पैकेज खरीदते समय यदि थोड़ी जानकारी लेकर वेब होस्टिंग सेवा प्रदाताओं द्वारा उपलब्ध कराये जाने वाले कण्ट्रोल पेनल का यदि सही चुनाव कर लिया जाये तो इस तरह वेब स्क्रिप्ट अपलोड करने वाली परेशानियों से बचा जा सकता है | दरअसल होस्टिंग सेवा प्रदाताओं द्वारा कई तरह के जैसे प्लेस्क , डोटनेट , सीपेनल आदि विभिन्न तरह के कंट्रोल पेनल उपलब्ध कराये जाते है जिनमे सीपेनल नए उपयोगकर्ताओं के लिए इस्तेमाल में सबसे आसान होता है लेकिन ये लिनक्स प्लेटफार्म पर होने के चलते लोग इसे छोड़कर प्लेक्स आदि विंडो होस्टिंग के पैकेज ले लेते है और बाद में दुखी होते है | मैंने भी शुरू में वेब होस्टिंग पैकेज लेते समय विंडो होस्टिंग ली यह समझ कर कि लिनक्स पता नहीं अपने समझ आये या नहीं | लेकिन वेब होस्टिंग पैकेज के कंट्रोल पेनल इसका कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप लिनक्स समझते है या नहीं | लिनक्स होस्टिंग में सबसे ज्यादा लोकप्रिय कंट्रोल पेनल के तौर पर सीपेनल ही चलता है जिसमे एक ऑटो स्क्रिप्ट इंस्टालर होता है इन ऑटो स्क्रिप्ट इंस्टालर में Fantasitico, Softaculous,Installtron मुख्य होते है इन ऑटो स्क्रिप्ट इंस्टालर सोफ्ट्वेयरस में विभिन्न श्रेणियों की ढेरों वेब स्क्रिप्ट होती है जिन्हें एक क्लिक में इन्स्टाल कर उपयोग लाया जा सकता है | Softaculous ऑटो स्क्रिप्ट इंस्टालर में तो विभिन्न श्रेणियों की 138 वेब स्क्रिप्ट होती है जिनमे से मन चाही वेब स्क्रिप्ट चुनकर एक क्लिक में इंस्टाल कर अपनी वेब साईट बनाई जा सकती है | तो आईये आज जानते है Softaculousके बारे जैसा की मैंने अभी ऊपर बताया कि इस ऑटो स्क्रिप्ट इंस्टालर में विभिन्न श्रेणियों की 138 वेब स्क्रिप्ट उपलब्ध है जिनकी श्रेणियों सहित सूचि निम्न है : Script for Blogs WordPress, b2evolution, LifeType,Dotclear,Textpattern,Nucleus,Serendipity,Open Blog, EggBlog,Pixie,WordPress MU Portals/CMS web scripts Zikula,Joomla,Geeklog,Drupal,Mambo,PHP-NukeWebsite, BakersNews,Pligg,MODx,Xoops,Dolphin,Typo3 Forums Scripts AEF,phpBB,XMB,MyBB,Phorum,PunBB,SMF,UseBBF,luxBB Image Galleries web script Coppermine,TinyWebGallery,Gallery,LinPHA,Piwigo,Pixelpost,ZenPhoto,phpAlbum,Shutter,4images Wikis Web Scripts MediaWiki,DokuWiki,PhpWiki,PmWiki,TikiWiki Ad Management Noahs Classifieds,OpenX,Kamads,PHPads Calendars Scripts WebCalendar,phpicalendar,phpScheduleIt Gaming Scripts Shadows RisingWord, Search PuzzleMultiplayer ,CheckersBlackNova Traders Mails Scripts phpListWebinsta, Maillist,poMMo,SquirrelMail,ccMail Polls and Surveys Web Scripts LimeSurvey,phpESP,EasyPoll,LittlePoll,Simple PHP Poll,CJ Dynamic Poll,Aardvark Topsites,Advanced Poll,Piwik Project Management Web Scripts dotProject,phpCollab,PHProjekt,NetOffice,ProjectPier,Mantis Bug Tracker,SugarCRM E-Commerce Web Scripts Zen Cart,Freeway,osCommerce,OpenCart,PrestaShop,phpShop,Magento,WHMCS,CubeCart,AccountLab Plus Guest Books Web Scripts Advanced Guestbook,phpBook,BellaBook,VX Guestbook,Lazarus,RicarGBooK Customer Support Web Script Crafty ,SyntaxHelp Center ,LiveHESK,osTicket,ExoPHP,DeskphpSupport,Open Web, Messengerphp,Onlinephp,MyFAQ,iQDeskPHP ,Support Tickets Music kPlaylistPodcast GeneratorImpleo Video ClipBucketVidiScript Others FAQMaster,FlexphpLDOpen,RealtyMoodleWeBidClarolinePHPfileNavigatorElggCodeIgniterPhpGedViewphpFormGeneratorOpenDocManYOURLS
तन पर धोती कुरता और सिर पर साफा (पगड़ी) राजस्थान का मुख्य व पारम्परिक पहनावा होता था , एक जमाना था जब बुजुर्ग बिना साफे (पगड़ी) के नंगे सिर किसी व्यक्ति को अपने घर में घुसने की इजाजत तक नहीं देते थे आज भी जोधपुर के पूर्व महाराजा गज सिंह जी के जन्मदिन समारोह में बिना पगड़ी बांधे लोगों को समारोह में शामिल होने की इजाजत नहीं दी जाती | लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस पहनावे को पिछड़ेपन की निशानी मान नई पीढ़ी इस पारम्परिक पहनावे से धीरे धीरे दूर होती चली गई और इस पारम्परिक पहनावे की जगह पेंट शर्ट व पायजामे आदि ने ले ली | नतीजा गांवों में कुछ ही बुजुर्ग इस पहनावे में नजर आने लगे और नई पीढ़ी धोती व साफा (पगड़ी) बांधना भी भूल गई ( मैं भी उनमे से एक हूँ ) | शादी विवाहों के अवसर भी लोग शूट पहनने लगे हाँ शूट पहने कुछ लोगों के सिर पर साफा जरुर नजर आ जाता था लेकिन वो भी पूरी बारात में महज २०% लोगों के सिर पर ही | लेकिन आज स्थितियां बदल रही है पिछले तीन चार वर्षों से शादी विवाहों जैसे समारोहों में इस पारम्परिक पहनावे के प्रति युवा पीढ़ी का झुकाव फिर दिखाई देने लगा है बेशक वे इसे फैशन के तौर पर ही ले रहें हों पर उनका इस पारम्परिक पहनावे के प्रति झुकाव शुभ संकेत है कम से कम इसी बहाने वे अपनी संस्कृति से रूबरू तो हो ही रहे है | लेकिन इस पारम्परिक पहनावे को अपनाने में नई पीढ़ी को एक ही समस्या आ रही थी कि वो धोती व साफा बांधना नहीं जानते इसलिए चाहकर भी बहुत से लोग इसे अपना नहीं पा रहे थे | नई पीढ़ी की इस रूचि को जोधपुर के कुछ वस्त्र विक्रताओं ने समझा और उन्होंने अपनी दुकानों पर बंधेज, लहरिया ,पचरंगा , गजशाही आदि विभिन्न डिजाइनों के बांधे बंधाये इस्तेमाल के लिए तैयार साफे उपलब्ध कराने लगे इन साफों में जोधपुर के ही शेर सिंह द्वारा बाँधा जाने वाला गोल साफा सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ आज शेर सिंह और उसके पारिवारिक सदस्यों की जोधपुर में बहुत सी दुकाने है जहाँ वे बांधे हुए साफे बेचते है | सूती कपडे में कल्प लगाकर बांधे इन साफों को यदि संभालकर रखा जाये तो चार पांच सालों तक आसानी से इन्हें खास समारोहों में इस्तेमाल किया जा सकता है | बाजार में बँधे हुए साफों की उपलब्धता ने नई पीढ़ी की साफों की मांग तो पूरी कर दी लेकिन उन्हें धोती अपनाने में अभी भी दिक्कत महसूस हो रही थी क्योंकि धोती बाँधने की अपनी एक अलग कला होती है जो उन्हें नहीं आती इस बात को शेर सिंह व अन्य विक्रेताओं ने भांप कर साफे के साथ ही रेडीमेड धोती और कुरता बाजार में उतार दिया , उनके द्वारा बनाई गई यह रेडीमेड धोती पायजामे की तरह पहनकर आसानी अपनाई जा सकती है इस रेडीमेड धोती की उपलब्धता को भी नई पीढ़ी ने हाथो हाथ लिया जिसके परिणाम स्वरुप अब जोधपुर के अलावा राजस्थान के अन्य शहरों में भी ये रेडीमेड धोती कुरता और साफा कई दुकानों पर विक्रय के लिए उपलब्ध है | शादी समारोहों में पहले बारातों में जहाँ साफे पहने बाराती मुश्किल से २०% नजर आते थे वहीं अब ८०% तक नजर आने लगे है | कुल मिलाकर राजस्थान का यह पारम्परिक पहनावा वापस फैशन में अपनी जगह बना रहा है |
भाग एक का शेष ........... " नहीं बेटा ! तुम्हारे पिता ने तो मेरी माता को वचन दिया था परन्तु इस धरती से तुम्हारा जन्म हुआ है और तुम्हारा जन्म ही उसकी आन रखने का वचन है | इस नीलाकाश के नीचे तुम बड़े हुए हो और तुम्हारा बड़ा होना ही इस गगन से स्वतंत्र्य और स्वच्छ वायु बहाने का वचन है | तुमने इस सिंहासन पर बैठकर राज्य सुख और वैभव का भोग भोग है और यह सिंहासन ही इस देश की आजादी का , इस देश की शान का , इस देश की स्त्रियों के सुहाग ,सम्मान और सतीत्व की सुरक्षा का जीता जागता जवलंत वचन है | क्या तुम ........................| ' क्षम करो माँ ! मैं शर्मिंदा हूँ | शत्रु समीप है | तूफानों से अड़ने के लिए मुझे स्वस्थ रहने दो | मैं भोला हूँ - भूल गया पर इस जिन्दगी को विधाता की भूल नहीं बनाना चाहता |' झन न न न ! रावल भोजदेव ने घंटा बजाकर अपने चाचा जैसल को बुलाया | ' चाचा जी ! समय कम है | रणक्षेत्र के लुए में जिन्दगी और वर्चस्व की बाजी लगानी पड़ेगी | आप बादशाह से मिल जाईये और मैं आक्रमण करता हूँ | कमजोर शत्रु पर अवसर पाकर आघात कर , हो सके तो लुद्रवा का पाट छीन लें अन्यथा बादशाह से मेरा तो बैर ले ही लेंगे | जैसल ने इंकार किया , युक्तियाँ भी दी , किन्तु भतीजे की युक्ति , साहस और प्रत्युत्पन्न मति के सामने हथियार डाल दिए | इधर जैसल ने बादशाह को भोजदेव के आक्रमण का भेद दिया और उधर कुछ ही दुरी पर लुद्रवे का नक्कारा सुनाई दिया |
मुसलमानों ने देखा १५ वर्ष का का एक छोटा सा बालक बरसात की घटा की तरह चारों और छा गया है | मदमत्त और उन्मुक्त -सा होकर वह तलवार चला रहा था और उसके आगे नर मुंड दौड़ रहे थे | सोई हुई धरती जाग उठी , काक नदी की सुखी हुई धारा सजल हो गई , गम सुम खड़े दुर्ग ने आँखे फाड़ फाड़ कर देखा - उमड़ता हुआ साकार यौवन अधखिले हुए अरमानों को मसलता हुआ जा रहा है | देवराज और विजयराज की आत्माओं ने अंगडाई लेकर उठते हुए देखा - इतिहास की धरती पर मिटते हुए उनके चरण चिन्ह एक बार फिर उभर आए है और उनके मुंह से बरबस निकल पड़ा - वाह रे भोज , वाह ! दो दिन घडी चढ़ते चढ़ते बादशाह की पन्द्रह हजार फ़ौज में त्राहि त्राहि मच गई | उस त्राहि त्राहि के बीच रणक्षेत्र में भोजदेव का बिना सिर का शरीर लड़ते लड़ते थक कर सो गया - देश का एक कर्तव्य निष्ठ सतर्क प्रहरी सदा के लिए सो गया | भोजदेव सो गया , उसकी उठती हुई जवानी के उमड़ते हुए अरमान सो गए , उसकी वह शानदार जिन्दगी सो गई किन्तु आन नहीं सोई | वह अब भी जाग रही है | जैसल ने भी कर्तव्य की शेष कृति को पूरा किया | बादशाह को धोखा हुआ | उसने दुतरफी और करारी मात खाई | आबू लुटने के उसके अरमान धूल धूसरित हो गए | सजधज कर दुबारा तैयारी के साथ आकर जैसल से बदला लेने के लिए वह अपने देश लौट पड़ा और जैसल ने भी उसके स्वागत के लिए एक नए और सुद्रढ़ दुर्ग को खड़ा कर दिया जिसका नाम दिया - जैसलमेर ! इस दुर्ग को याद है कि इस पर और कई लोग चढ़कर आये है पर वह कभी लौटकर नहीं आया जिसे जैसल और भोजदेव ने हराया | आज भी यह दुर्ग खड़ा हुआ मन ही मन " उत्तर भड़ किंवाड़ भाटी " के मन्त्र का जाप कर रहा है | आज भी यह इस बात का साक्षी है कि जिन्हें आज देशद्रोही कहा जाता है , वे ही इस देश के कभी एक मात्र रक्षक थे | जिनसे आज बिना रक्त की एक बूंद बहाए ही राज्य , जागीर , भूमि और सर्वस्व छीन लिया गया है , एक मात्र वे ही उनकी रक्षा के लिए खून ही नहीं , सर्वस्व तक को बहा देने वाले थे | जिन्हें आज शोषक , सामंत या सांपों की औलाद कहा जाता है वही एक दिन जगत के पोषक, सेवक और रक्षक थे | जिन्हें आज अध्यापकों से बढ़कर नौकरी नहीं मिलती , जिनके पास सिर छिपाने के लिए अपनी कहलाने वाली दो बीघा जमीन नसीब नहीं होती , जिनके भाग्य आज राजनीतिज्ञों की चापलूसी पर आधारित होकर कभी इधर और कभी उधर डोला करते है , वे एक दिन न केवल अपने भाग्य के स्वयं विधाता ही थे बल्कि इस देश के भी वही भाग्य विधाता थे | जिन्हें आज बेईमान , ठग और जालिम कहा जाता है वे भी एक दिन इंसान कहलाते थे | इस भूमि के स्वामित्व के लिए आज जिनके हृदय में अनुराग के समस्त स्रोत क्षुब्ध हो गए है वही एक दिन इस भूमि के लिए क्या नहीं करते थे | लुद्रवे का दुर्ग मिट गया है जैसलमेर का दुर्ग जीर्ण हो गया है , यह धरती भी जीर्ण हो जाएगी पर वे कहानियां कभी जीर्ण नहीं होगी जिन्हें बनाने के लिए कौम के कुशल कारीगरों ने अपने खून का गारा बनाकर लीपा है और वे कहानियां अब भी मुझे व्यंग्य करती हुई कहती है - एक तुम भी क्षत्रिय हो और एक वे भी क्षत्रिय थे | चित्रपट चल रहा था दृश्य बदलते जा रहे थे | स्व. श्री तन सिंह जी , बाड़मेर
काक नदी की पतली धारा किनारों से विरक्त सी होकर धीरे धीरे सरक रही थी | आसमान ऊपर चुपचाप पहरा दे रहा था और नीचे लुद्रवा देश की धरती , जिसे आजकल जैसलमेर कहा जाता है , प्रभात काल में खूंटी तानकर सो रही थी | नदी के किनारे से कुछ दूरी पर लुद्रवे का प्राचीन दुर्ग गुमसुम सा खड़ा रावल देवराज का नाम स्मरण कर रहा था | 'कैसा पराक्रमी वीर था ! अकेला होकर जिसने बाप का बैर लिया | पंवारों की धार पर आक्रमण कर आया और यहाँ युक्ति , साहस और शौर्य से मुझ पर भी अधिकार कर लिया | साहसी अकेला भी हुआ तो क्या हुआ ? हाँ ! अकेला भी अथक परिश्रम ,साहस और सत्य निष्ठा से संसार को अपने वश में कर लेता है ....| उसका विचार -प्रवाह टूट गया | वृद्ध राजमाता रावल भोजदेव को पूछ रही है - ' बेटा गजनी के बादशाह की फौजे अब कितनी दूर होंगी ?' ' यहाँ से कोस भर दूर मेढ़ों के माल में |' ' और तू चुपचाप बैठा है ?' ' तो क्या करूँ ? मैंने बादशाह को वायदा किया कि उसके आक्रमण की खबर आबू नहीं पहुंचाउंगा और बदले में बादशाह ने भी वायदा किया है कि वह लुद्रवे की धरती पर लूटमार अथवा आक्रमण नहीं करेगा |' राजमाता पंवार जी अपने १५-१६ वर्षीय इकलौते पुत्र को हतप्रद सी होकर एकटक देखने लगी , जैसे उसकी दृष्टि पूछ रही थी ' क्या तुम विजयराज लांजा के पुत्र हो ? क्या तुमने मेरा दूध पिया है ? क्या तुम्ही ने इस छोटी अवस्था में पचास लड़ाइयाँ जीती है ? ' नहीं ! या तो सत्य झुंट हो गया या फिर झुंट सत्य का अभिनय कर रहा था | परन्तु राजमाता की दृष्टि इतने प्रश्नों को टटोलने के बाद अपने पुत्र भोजदेव से लौट कर अपने वैधव्य पर आकर अटक गयी | लुद्रवे का भाग्य पलट गया है अन्यथा मुझे वैधव्य क्यों देखना पड़ता ? क्या मै सती होने से इसलिए रोकी गई कि इस पुत्र को प्रसव करूँ | काश ! आज वे होते |' सोचते-सोचते राजमाता पंवार जी के दुर्भाग्य से हरे हुए साहस ने निराश होकर एक निश्वास डाल दिया | क्यों माँ, तुम चुप क्यों हो ? क्या मेरी संधि तुम्हे पसंद नहीं आई ? मैंने लुद्रवे को लुट से बचा लिया , हजारों देश वासियों की जान बच गई |' ' आज तक तो बेटा , आन और बात के लिए जान देना पसंद करना पड़ता था | तुम्हारे पिताजी को यह पसंद था इसलिए मुझे भी पसंद करना पड़ता था और अब वचन चलें जाय पर प्राण नहीं जाय यह बात तुमने पसंद की है इसलिए तुम्हारी माँ होने के कारण मुझे भी यह पसंद करना पड़ेगा | हम स्त्रियों को तो कोई जहाँ रखे , खुश होकर रहना ही पड़ता है |' आगे राजमाता कुछ कहना ही चाहती थी किन्तु भोजराज ने बाधा देकर पूछा - " किसकी बात और किसकी आन जा रही है | मुझे कुछ भी मालूम नहीं है | कुछ बताओ तो सही माँ ! " ' बेटा ! जब तुम्हारे पिता रावलजी मेरा पाणिग्रहण करने आबू गए थे तब मेरी माँ ने उनके ललाट पर दही का तिलक लगाते हुए कहा था - " जवांई राजा , आप तो उत्तर के भड़ किंवाड़ भाटी रहना |" तब तुम्हारे पिता ने यह बात स्वीकारी थी | आज तुम्हारे पिता की चिता जलकर शांत ही नहीं हुई कि उसकी उसकी राख को कुचलता हुआ बादशाह उसी आबू पर आक्रमण करने जा रहा है और उत्तर का भड़-किंवाड़ चरमरा कर टुटा नहीं , प्राण बचाने की राजनीती में छला जाकर अपने आप खुल गया | इसी दरवाजे से निकलती हुई फौजे अब आबू पर आक्रमण करेंगी तब मेरी माँ सोचेगी कि मेरे जवांई को १०० वर्ष तो पहले ही पहुँच गए पर मेरा छोटा सा मासूम दोहिता भी इस विशाल सेना से युद्ध करता हुआ काम आया होगा वरना किसकी मजाल है जो भाटियों के रहते इस दिशा से चढ़कर आ जावे | परन्तु जब तुम्हारा विवाह होगा और आबू में निमंत्रण के पीले चावल पहुंचेंगे , तब उन्हें कितना आश्चर्य होगा कि हमारा दोहिता तो अभी जिन्दा है |" बस बंद करो माँ ! यह पहले ही कह दिया होता कि पिताजी ने ऐसा वचन दिया है | पर कोई बात नहीं , भोजदेव प्राण देकर भी अपनी भूल सुधारने की क्षमता रखता है | पिता का वचन मै हर कीमत चुका कर पूरा करूँगा |" क्रमश :...................
कुछ दिन पहले मै लाला रामजीलाल के कारखाने में उनके ऑफिस उनके पास बैठा था , लाला जी अपने कुछ देनदारों की संवेदनहीनता पर बड़े खीजे हुए और नाराज थे लाला जी की ये देनदार कम्पनियां लाला जी के कारखाने में अपना कच्चा माल भेज कर उसे जॉब वर्क पर तैयार करवाती है इसी जॉब वर्क के पैसे लाला जी को इन कंपनियों से लेने होते है लाला जी का कारखाना भी इन्ही कम्पनियों की मेहरबानी से चलता है | लाला जी का कोई अति निकट सम्बन्धी किसी घातक बीमारी के चलते अस्पताल में जीवन मृत्यु के बीच जूझ रहा था उसी के इलाज के लिए लाला जी को रुपयों की सख्त जरुरत थी , लाला जी ने अपने सभी देनदारों से अपने सम्बन्धी की बीमारी का हवाला देते हुए रुपयों का तकादा किया था पर कुछ देनदार कम्पनियां लाला जी की उम्मीद पर खरी नहीं उतरी | उन्ही को संवेदनहीन बताते हुए लाला जी उन्हें कोस रहे थे कि ऐसी मुसीबत के समय इन देनदारों ने मुझे मेरा उधार रुपया पूरा नहीं चुकाया | उन्हें उन कम्पनी मालिकों द्वारा लाला जी के साथ पूरी सहानुभूति न दिखा पाने का मन में बड़ा दर्द व अफ़सोस था | लाला जी से बातचीत पूरी कर जैसे ही में उनके दफ्तर से बाहर निकला मुझे उनका प्रोडक्शन सुपरवाईजर मिल गया वह मुझे देखते ही कहने कि भाई साहब देखिये लाला जी कितने संवेदनहीन है अभी दो घंटे पहले कारखाने के एक कामगार को अपने सम्बन्धी के इलाज के लिए अस्पताल जाना था कामगार को उसके लिए छुट्टी के साथ कुछ रुपयों की भी जरुरत थी लेकिन लाला जी ने न तो कारीगर को छुट्टी दी और ना ही रुपये दिए उल्टा बेचारे कारीगर को हड़काते हुए दफ्तर से बाहर निकाल दिया कि कोई बीमार वीमार नहीं है तम्हे तो सिर्फ पैसे व छुट्टी लेने का बहाना चाहिए चल निकल यहाँ से और अपना काम कर | सुपरवाईजर आगे कहने लगा - भाई साहब लाला जी अभी अपने रिश्तेदार की बीमारी से खुद परेशान है और चाहते है कि उनके परेशानी के चलते कारखाने का हर कर्मचारी उनके प्रति सहानुभूति दिखाते हुए उनकी अनुपस्थिति में ज्यादा जिम्मेदारी से कार्य करें पर आप ही बताईये जब लाला जी अपने कामगारों के प्रति संवेदनशील नहीं है तो कामगार से सहानुभूति की अपेक्षा क्यों रखते है ऐसी परिस्थिति में क्या कामगार मालिक के प्रति वफादार रहेंगे ? आजकल हर कोई व्यक्ति इन्ही लाला जी कि तरह दूसरों से तो सहानुभूति व संवेदनशीलता की अपेक्षा रखता है पर खुद दूसरों के प्रति कितना संवेदनशील है इस पर कभी विचार नहीं करता | लाला जी को भी अपनी परेशानियों तो नजर आई लेकिन उन्होंने अपने कामगार की परेशानी को उसका बहाना समझा और उसके प्रति संवेदनहीन हो गए | दुसरे दिन जब मैंने लाला जी को खरी खरी सुनाते हुए यह घटना याद कराकर बताया कि हो सकता है आपकी देनदार कम्पनियों ने भी आपके रिश्तेदार की बीमारी को आपका समय पूर्व या जल्दी भुगतान प्राप्त करने का बहाना माना हो तब लाला जी बगलें झाँकने लगे |