राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .

जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !

मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.

"एलोवेरा " ब्लॉग ट्रैफिक के लिए भी है खुराक

एलोवेरा शारीरिक स्वास्थ्य के साथ साथ ब्लॉग के लिए भी एक बढ़िया टॉनिक है , एक बढ़िया की-वर्ड जो गूगल से आसानी से पाठक झटक कर आपके ब्लॉग पर ट्रैफिक बढ़ा सकता है |.

"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था

उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.

क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत

आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.

ज्ञान दर्पण के लेख इन्टरनेट पर दुबारा कहीं भी प्रकाशित करना सख्त मना है| पर प्रिंट मिडिया में नाम सहित छापने की खुली छूट है|

Jul 31, 2009

डुअल बूट कंप्युटर में विण्डो में लिनक्स फाइल्स कैसे एक्सेस करे ?

डुअल बूट कंप्युटर जिसमे विण्डो व लिनक्स दोनों ऑपरेटिंग सिस्टम इंस्टाल हो उसमे लिनक्स (उबुन्टु ) इस्तेमाल करते समय विण्डो के सभी ड्राइव fat 32 व NTFS खुलते है और इन्हें लिनक्स उबुन्टु में आसानी से एक्सेस किया जा सकता है लेकिन उसी कंप्युटर में विण्डो सिस्टम इस्तेमाल करते समय लिनक्स (उबुन्टु ) के ड्राइव (Ext2 व Ext 3 फाइल सिस्टम) एक्सेस नहीं हो पाते | कई बार हमें विण्डो इस्तेमाल करते समय लिनक्स में सहेजी गई किसी फाइल की जरुरत पड़ जाती है तब हमारे पास कंप्युटर रिबूट करने के आलावा कोई रास्ता नहीं बचता |
इसी समस्या के समाधान के लिए आज गूगल बाबा की शरण में जाने के बाद कुछ औजार मिले जिनकी सहायता से लिनक्स के ड्राइव ext2 / ext3 को विण्डो में एक्सेस किया जा सकता है |
DiskInternals Linux reader:

यह औजार लिनक्स के फाइल सिस्टम को विण्डो में पढने की सुविधा प्रदान करता है





इस औजार को डाउनलोड करने के लिए यहाँ चटका लगाएं

Explore2fs:


Explore2fs: GUI एक्स्प्लोरर टूल है जो डुअल बूट कंप्युटर में विण्डो के सभी ऑपरेटिंग सिस्टम में लिनक्स ext2 / ext3 ड्राइव की फाइल्स पढने की सुविधा प्रदान करता है |



इस औजार को डाउनलोड करने के लिए यहाँ चटका लगाएं

दो और भी औजार है जो डुअल बूट कंप्युटर में विण्डो के सभी ऑपरेटिंग सिस्टम में लिनक्स ड्राइव में सहेजी फाइल्स को Read & Write Access करने की सुविधा देते है
1- Ext2 FSD (File System Driver): Ext2 FSD is an open source linux ext2/ext3 file system driver for Windows systems (NT/2K/XP/VISTA, X86/AMD64).
2- Ext2 IFS (Installable File System) (Read as well as Write Access)

Jul 27, 2009

अठै क उठै (यहाँ कि वहां )

जोधपुर के शासक राव मालदेव के साथ लम्बे संघर्ष व अनेक युद्धों में मेड़ता के शासक व उस ज़माने के अद्वितीय योद्धा राव जयमल को जान-माल का बहुत नुकसान उठाना पड़ा था और अब मेड़ता पर मुगलों के बागी सेनापति सेफुद्दीन को जयमल द्वारा शरण देने से नाराज अकबर की विशाल शाही सेना ने चढाई कर दी | जयमल के पास इसका समाचार मिलते ही जयमल ने अपने सहयोगियों के साथ गंभीर विचार कर इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इतनी विशाल शाही सेना से टकराना अब सब तरफ से हानिकारक होगा | पिछले युद्धों में अपने से दस दस गुना बड़ी सेनाओं के साथ युद्ध कर राव जयमल मेडतिया ने यश अर्जित किया किन्तु उनकी जनता के कई घर उजड़ गए और अधिक लोगों को मरवाने की तुलना में उसने मेड़ता खाली करने का विचार किया | शाही सेना के मेड़ता पहुँचने पर जयमल ने शाही सेनापति हुसैनकुलीखां से बातचीत कर उसे समझाने का प्रयास किया तथा अंत में मेड़ता उसे सोंप कर परिवार सहित वहां से निकल लिया |
मेड़ता छोड़ने के बाद वह अपने परिवार व साथी सरदारों के साथ वीरो की तीर्थ स्थली चित्तोड़ के लिए रवाना हो गया | उस ज़माने में चित्तोड़ देशभर के वीर योद्धाओं का पसंदीदा तीर्थ स्थान था मातृभूमि पर मर मिटने की तम्मना रखने वाला हर वीर चित्तोड़ जाकर बलिदान देने को तत्पर रहता था |
जयमल का काफिला मेवाड़ के पहाड़ी जंगलों से होता हुआ चित्तोड़ की तरफ बढ़ रहा था कि अचानक एक भील डाकू सरदार ने उनका रास्ता रोक लिया अपनी ताकत दिखाने के लिए भील सरदार ने एक सीटी लगाई और जयमल व उसके साथियों के देखते ही देखते एक पेड़ तीरों से बिंध गया | जयमल व साथी सरदार समझ चुके थे कि हम डाकू गिरोह से घिर चुके है और इन छुपे हुए भील धनुर्धारियों का सामना कर बचना बहुत मुश्किल है वे उस क्षेत्र के भीलों के युद्ध कौशल के बारे में भलीभांति परिचित भी थे | कुछ देर की खामोशी के बाद राव जयमल के एक साथी सरदार ने जयमल की और मुखातिब होकर पूछा - " अठै क उठै " | जयमल का जबाब था " उठै " |
जयमल के जबाब से इशारा पाते ही काफिले के साथ ले जाया जा रहा सारा धन चुपचाप भील डाकू सरदार के हवाले कर काफिला आगे बढ़ गया | डाकू सरदार को हथियारों से सुसज्जित राजपूत योद्धाओं का इस तरह समर्पण कर चुपचाप चले जाना समझ नहीं आया | और उसके दिमाग में "अठै क उठै " शब्द घूमने लगे वह इस वाक्य में छुपे सन्देश को समझ नहीं पा रहा था और बेचैन हो गया आखिर वह धन की पोटली उठा घोडे पर सवार हो जयमल के काफिले का पीछा कर फिर जयमल के सामने उपस्थित हुआ और हाथ जोड़कर जयमल से कहने लगा -- हे वीर ! आपके लश्कर में चल रहे वीरों के मुंह का तेज देख वे साधारण वीर नहीं दीखते | हथियारों व जिरह वस्त्रो से लैश इतने राजपूत योद्धा आपके साथ होने के बावजूद आपके द्वारा इतनी आसानी से बिना लड़े समर्पण करना मेरी समझ से परे है कृपया इसका कारण बता मेरी शंका का निवारण करे व साथ ही मुझे " अठै क उठै " वाक्य में छिपे सन्देश के रहस्य से भी अवगत कराएँ |
तब जयमल ने भील सरदार से कहा -- मेरे साथी ने मुझसे पूछा कि "अठै क उठै " मतलब कि( अठै )यहाँ इस थोड़े से धन को बचाने के लिए संघर्ष कर जान देनी है या यहाँ से बचकर चित्तोड़ पहुँच (उठै ) वहां अपनी मातृभूमि के लिए युद्ध करते हुए प्राणों की आहुति देनी है | तब मैंने कहा " उठै " मतलब कि इस थोड़े से धन के लिए लड़ना बेकार है हमें वही अपनी मातृभूमि के रक्षार्थ युद्ध कर अपने अपने प्राणों को देश के लिए न्योछावर करना है |
इतना सुनते ही डाकू भील सरदार सब कुछ समझ चूका था उसे अपने किये पर बहुत पश्चाताप हुआ वह जयमल के चरणों में लौट गया और अपने किये की माफ़ी मांगते हुए कहना लगा -- हे वीर पुरुष ! आज आपने मेरी आँखे खोल दी , आपने मुझे अपनी मातृभूमि के प्रति कर्तव्य से अवगत करा दिया | मैंने अनजाने में धन के लालच में अपने वीर साथियों के साथ अपने देशवासियों को लुट कर बहुत बड़ा पाप किया है आप मुझे क्षमा करने के साथ-साथ अपने दल में शामिल करले ताकि मै भी अपनी मातृभूमि की रक्षार्थ अपने प्राण न्योछावर कर सकूँ और अपने कर्तव्य पालन के साथ साथ अपने अब तक किये पापो का प्रायश्चित कर सकूँ |
और वह भील डाकू सरदार अपने गिरोह के धनुर्धारी भीलों के साथ जयमल के लश्कर में शामिल हो अपनी मातृभूमि की रक्षार्थ चित्तोड़ रवाना हो गया और जब अकबर ने १५६७ ई. में चित्तोड़ पर आक्रमण किया तब जयमल के नेत्रित्व में अपनी मातृभूमि मेवाड़ की रक्षार्थ लड़ते हुए शहीद हुआ |

Jul 19, 2009

भूतों से सामना

बचपन में लोगों से भूतों की तरह तरह की कहानियां अक्सर सुनने को मिलती थी उन कहानियों में रात को गांव की गली में भूत ने किसी पर अचानक ईंट फेंकी तो किसी व्यक्ति को रात में खेतों से लौटते रास्ते में कोई वृक्ष बिना हवा के हिलता नजर आता था तो किसी का पीपल के पेड़ के पास पहुँचते ही पीपल के पेड़ की अजीबोगरीब हरकतों से सामना होता था कई लोग बताते थे कि रात को खेत से लौटते समय कैसे भूत ने उनकी धोती का पल्लू पकड़ लिया वो कैसे उससे छुड़वा कर भागे |
लगभग १९८४-८५ के दौरान हमारे गांव के बस स्टैंड के पास ही एक वाहन दुर्घटना में एक ही परिवार के १६-१७ लोगों की मौत हो गयी थी और इन दर्दनाक अकाल मौतों की वजह से उनके भूत बनने की अफवाहे जोरों से फेल गयी थी शाम ८ बजे बाद तो कोई भी व्यक्ति अकेला बस स्टैंड पर जाने की हिम्मत तक नहीं करता था | सिर्फ गांव का पूर्व सरपंच गोरु किर्डोलिया जो उस समय रोड वेज में कंडक्टर था ही रोजाना अपनी ड्यूटी से देर रात को उधर से आता था या कभी कभार मुझे देर रात को शहर से गांव पहुँचने पर बस स्टैंड पर आना होता था | बस स्टैंड पर रात को बस उतरते ही दिल की धड़कन अपने आप तेज हो जाया करती थी शरीर के रोंगटे खड़े हो जाया करते थे और कदम घर जल्दी पहुँचने की पूरी तत्परता दिखाते थे तब यह सुन रखा था कि भूत हथियार के पास नहीं आते अतः जिस दिन देर से आना होता था उस दिन एक बटन वाला रामपुरी चाकू साथ लेकर जाता था बस ये समझ लीजिये उस चाकू के सहारे ही देर रात बस से उतरने की हिम्मत बनती थी | क्योकि बस स्टैंड पर उस दुर्घटना में मरे भूतो का डर तो आगे रास्ते में श्मशान में गांव के भूतों का डर |
उन्ही दिनों एक दिन शहर से आते आते मुझे रात के साढ़े दस बज गए अँधेरी रात थी बस स्टैंड पर बस से उतरते ही वहाँ पसरे सन्नाटे ने दिल की धड़कन तेज करदी,शरीर के रोंगटे उठ खड़े हुए डर के मारे रामपुरी चाकू अपने आप हमेशा की तरह हाथ में आ गया जिसके बूते ही हिम्मत कर में अपने घर की तरफ बढा | बस स्टैंड से गांव के बीच लगभग ४०० मीटर पुरानी ज़माने से ही गोचर भूमि छोड़ी हुई है इसी खाली भू-भाग में ही गांव की सभी जातियों के अलग अलग श्मशान भी बने हुए है जो भूतों का डर कुछ और बढा देते थे | रामपुरी चाकू हाथ में ले में हिम्मत करके गांव की तरफ थोडा ही आगे बढा ही था कि गौचर भूमि की झाडियों के पीछे से अचानक एक साथ कई पेरों की दड-बड़ दड-बड़ आवाज सुनाई दी जैसे ही में रुका वह आवाज भी रुक गयी और मेरे चलते ही वह आवाज फिर अचानक सुनाई दी में समझ चूका था कि आज ये कोई और नहीं भूत ही है जो मुझे डराने कि कोशिश कर रहे है लेकिन रामपुरी चाकू के हाथ में होते में भी हिम्मत नहीं हार रहा था साथ ही ऐसे वक्त पर हनुमान चालीसा तो अपने आप याद आ ही जाता है सो इन्ही दो सहारों के सहारे में घर पहुँच गया लेकिन घटना के बारे में मेने घर पर किसी को नहीं बताया | रात को बड़ी मुश्किल से नींद आई क्योकि घर में ऊपर बने मेरे कमरे की खिड़की उसी तरफ खुलती थी और दिन में तो खिड़की से दूर तक पूरा बस स्टैंड और पूरी गौचर भूमि नजर आती थी आखिर डर कम करने के वास्ते सिरहाने तलवार रखकर में सो ही गया | तलवार भी इसीलिए कि हथियार के पास भूत नहीं आएगा |
दुसरे दिन सुबह ८ बजे फिर मुझे बस पकडनी थी सो बस स्टैंड जाते समय जैसे ही में रात वाली उसी जगह पहुंचा झाडियों के पीछे से अचानक वही आवाज मुझे फिर सुनाई दी हालाँकि दिन होने की वजह से ये आवाज कुछ धीमी थी व डरावनी नहीं लग रही थी में रुका तो वो कदमो की आवाज भी रुक गयी मेरे उधर नजर दौड़ते ही मुझे एक मृत पशु दिखाई दिया जिसे एक कुतों का झुंड नोचने लगा था मेरे पास से गुजरते ही वो कुत्तों का पूरा झुंड एकदम से दूर भागा और रुक गया मेरे दुबारा चलने पर फिर वह झुंड पीछे हटने को एकदम थोडा फिर भागा और रुक गया ऐसा ही रात को हुआ था लेकिन रात्री घटना में अँधेरी रात होने की वजह से कुत्ते दिखाई नहीं दे रहे थे और भूतों की सुनी हुई बातों के आगे दिमाग उस हर हरकत को भूतों की हरकत ही समझ रहा था इस तरह सुबह दुबारा उसी स्थान से गुजरने पर उस गलतफहमी का निराकरण हो सका वरना में भी आजतक उस ग़लतफ़हमी को असली भूतों की घटना मान दूसरो को सुनाता रहता और लोगों के मन में भूत के अस्तित्व की धारणा और ज्यादा मजबूत होती |

शायद पुराने समय में गांवों में रोशनी की प्रयाप्त वयवस्था न होने जनसँख्या कम होने सूनापन अधिक होने की वजह से और ऐसी ग़लतफ़हमी वाली घटनाओं का निराकरण न होने के कारण लोग इन घटनाओं को भूतों से सम्बंधित ही मान बैठते थे और फिर चटखारे ले ले कर दूसरो को सुनाते थे जो भूत होने की धारणा को और मजबूत कर देते थे |

Jul 16, 2009

वीर बड़ा या जागीर , अक्ल बड़ी या धन

पिछले दिनों ताऊ.इन पर " अक्ल बड़ी या भेंस "शीर्षक से एक मजेदार रचना पढने को मिली जिसमे ताऊ ने साबित किया कि अक्ल ही हमेशा बड़ी होती है हालाँकि ताऊ की भेंस के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता पता नहीं ताऊ कब भेंस को अक्ल से बड़ी करदे |
अक्ल बड़ी के सन्दर्भ में प्रस्तुत है एक एतिहासिक घटना जिसमे भी एक ताऊ ने अपनी अक्ल के बूते एक गांव के छोटे से जागीरदार को एक राज्य का राजा बनवा दिया | हालाँकि राजा बनने वाले की वीरता भी उसके काम आई लेकिन बिना उस ताऊ की अक्ल के अकेली वीरता भी कुछ नहीं कर पाती |
बात अकबर कालीन है शेखावाटी की राजधानी अमरसर के शासक राव लुनकरण जी अपने कुछ सहयोगियों के साथ चर्चा कर रहे थे कि अक्ल बड़ी या धन और वीर बड़ा या जागीर (राज्य)| राव लुनकरण जी अक्ल से बड़ा धन को मान रहे थे कि व्यक्ति के पास धन हो तो अक्ल तो अपने आप आ जाती है बिना धन अकेली अक्ल क्या कर सकती है और जागीर (राज्य) है तो वीर तो चाहे जितने नौकरी पर रखलो | वहां उनके सहयोगियों में कई ताऊ उनकी हाँ में हाँ मिला रहे थे लेकिन उनका दीवान देविदास राव लुनकरण जी के विचारों से सहमत नहीं था उसका कहना था कि बुद्धिमान व्यक्ति चाहे जितना धन कमा सकता है लेकिन एक धनी बुद्धिहीन व्यक्ति धन को संभाल नहीं सकता व एक वीर पुरुष अपनी वीरता व पुरुषार्थ के बल पर कितना भी बड़ा राज्य खडा कर सकता है जबकि एक कायर राजा अपना राज्य कभी भी किसी वीर पुरुष के आगे खो सकता है |
दीवान देवीदास की बात राव लुनकरण जी को अच्छी नहीं लगी और उन्होंने नाराज होते हुए दीवान देवीदास से कहा- मेरे पास राज्य है धन है लेकिन मेरा छोटा भाई रायसल बहुत बड़ा वीर योद्धा है उसके पास न जागीर है न धन अतः तू उसके पास चला जा और वही अपनी अक्ल दिखाना |
दीवान देवीदास भी किसी महताऊ से कम नहीं था उसे यह बात दिल तक चुभ गयी और वह वहां से चुपचाप रायसल के पास आ गया | देवीदास ने रायसल को समझाया कि आप बहुत अच्छे योद्धा है आपको यहाँ न रहकर सम्राट अकबर के पास चले जाना चाहिए सम्राट अकबर वीर पुरुषों की बहुत कद्र करता है | देवीदास की बात रायसल जी को भी जच गयी और वे अपने कुछ योद्धा साथियों के साथ देवीदास के संग अकबर से मिलने आगरा के लिए रवाना हो लिए | रास्ते में ही शाही सेना शहजादा सलीम के नेत्रित्व में कहीं युद्ध अभियान पर जाती उन्हें मिल गयी | देवीदास की सलाह पर रायसल अपने साथियों सहित शाही सेना सम्मिलित हो गए | देवीदास ने रायसल को समझा दिया था कि युद्ध के दौरान आप शहजादा सलीम के आस पास रहना आपको अपनी वीरता सलीम को दिखाकर उसे ही आकर्षित करना है | युद्ध के दौरान एक समय एसा आया कि शहजादा दुश्मन से घिर गया और घबराहट के मारे हाथी पर बैठे होने के बजाय हथियार तक नहीं चला सका | इसी मौके पर रायसल ने दुश्मन के घेरे में अपना घोड़ा कूदा सलीम को लताड़ा कि ऐ तुर्क हाथी पर बैठे होने के बावजूद तू हथियार नहीं चला पा रहा है और देखते ही देखते रायसल ने अपनी तलवार का जौहर दिखा शहजादा सलीम कि जान बचा वह युद्ध जीत लिया |
जब शहजादा ने अकबर को इस युद्ध में एक अनजान राजपूत सरदार की वीरता के बारे सुना इस युद्ध की जीत का श्रेय उस अनजान सरदार को दिया | तब अकबर ने उस वीर की तलाश की तब वहां कई ताऊ टायप सरदार श्रेय लेने आगे आगे कि हम थे हम थे | ऐसी दशा में अकबर ने सभी राजपूत सरदारों को युद्ध पौशाक में अपने व शहजादे के सामने से बारी-बारी गुजरने को कहा | बस ताऊ देवीदास तो इसी मौके के इंतजार में था उसने रायसल को उस परेड में शामिल कर दिया , रायसल के सामने आते ही शहजादा सलीम ने उन्हें पहचान लिया कि यही वह अनजान राजपूत सरदार है जिसकी वीरता व अदम्य साहस की वजह में आज जिन्दा हूँ और यह युद्ध हम जीत पाए |
बस फिर क्या था अकबर ने तुंरत रायसल को मनसब आदि देकर सम्मानित किया और अपनी सेना में महत्वपूर्ण पद दिया | आगे चलकर वही रायसल अकबर के खास चहेतों में शामिल हुए और खंडेला के राजा बने | उनके बड़े भाई लुनकरण जी को राव की उपाधि थी लेकिन रायसल को सम्राट अकबर ने राजा की उपाधि से विभूषित किया | इतिहास में रायसल "राजा रायसल दरबारी " के नाम से प्रसिद्ध हुए |
इस तरह उस ज़माने में भी उस ताऊ देवीदास ने साबित कर दिखाया कि धन से बड़ी अक्ल ही होती है और वीर पुरुष कितना भी बड़ा राज्य बना सकते है उसने अपनी बुद्धि बल से ही समय समय पर रायसल को सलाह दे उस मुकाम पर पहुंचा दिया |

Jul 9, 2009

अनुशासनहीन होते वकील

कानून के जानकर व उच्च शिक्षित होने के बावजूद देश भर में वकील अनुशासनहीन होते जा रहे है इनकी अनुशासनहीनता व अभद्र व्यवहार के शिकार अक्सर ट्रेफिक पुलिस कर्मी होते रहते है ऐसी खबरे अक्सर अख़बारों में छपती रहती है कल भी दिल्ली में दो वकीलों द्वारा रेड लाइट जम्प करने पर उन्हें पकड़ने के लिए पीछा कर रहे पुलिसकर्मियों की वकीलों ने अपने साथियों के साथ मिलकर जमकर धुनाई कर दी वो तो शुक्र है उन कुछ महिलाओं का जिन्होंने इन पुलिस वालों को उग्र वकीलों के चुंगल से छुड़वा दिया |
चूँकि पुलिस वालों का व्यवहार भी आम जनता के साथ कोई ज्यादा अच्छा नहीं होता अतः जब भी ये कहीं वकीलों के हाथों पिटते है इन्हें जनता की कभी सहानुभूति नहीं मिलती | लेकिन कल दिल्ली के रोहिणी कोर्ट में तो कुछ वकीलों ने उदंडता की हद ही पार करदी जब कोर्ट के एक न्यायाधीश द्वारा एक केश की सुनवाई वकील साहब के अनुसार करने से मना करने पर वकील साहब ने अपने साथियों सहित न्यायाधीश महोदय के साथ मारपीट तक करदी |
एक पढ़े लिखे और सभ्य समझे जाने वाले वर्ग द्वारा इस तरह की उदंडता करना क्या सही सभ्यता कहलाती है ? वकालत के पेशे में घुस आये ऐसे तत्वों पर यदि बार एसोशियन नकेल नहीं कस सकती तो आने वाले समय में जनता की नजरों में वकीलों की साख गिर जायेगी आमजन वकीलों को भी गुंडा बदमाश ही समझेगा | वकील के भेष में ऐसे असामाजिक तत्व पूरी वकील बिरादरी को ही बदनाम कर देंगे | इस तरह के कृत्यों की जितनी भर्त्सना की जाए कम ही है |
अपने खिलाफ एक शब्द भी न सुनने व अवमानना का डंडा दिखाने वाला न्यायालय देखते है इन उदंड वकीलों को के खिलाफ क्या कदम उठाता है |

Jul 6, 2009

ताऊ और एक करोड़ की लाटरी

अनाज मण्डी में अनाज बेचकर ताऊ जैसे ही बाहर निकला एक लाटरी बेचने वाला लड़का लाटरी का टिकट बेचने को ताऊ के पीछे लग लिया | ताऊ की लाटरी खरीदने में कोई दिलचस्पी नहीं थी लेकिन लड़का कहाँ मानने वाला था |
लाटरी वाला :- ताऊ ये सिर्फ दस रूपये की टिकट सै , खरीद ले इनाम निकल गया तो पुरे एक करोड़ मिलेंगे |
ताऊ :- मनै ना खरीदनी है | ऐसे ही कोई दस रूपये की टिकट के बदले एक करोड़ कैसे दे देगा |
लाटरी वाला :- ताऊ दस रूपये में तेरा क्या ज्यारा सै , तू म्हनै घणा शरीफ आदमी लाग रह्या सै म्हनै तो लागरया सै के या लाटरी तो थारै ही निकलेगी | अब देर न कर और राम जी व बजरंग बलि का नाम ले खरीद ले |
लाटरी वाले लड़के द्वारा इस तरह आग्रह करने के बाद आखिर ताऊ ने लाटरी का टिकट खरीद लिया और अपने गांव की बस पकड़ गांव चला आया |
कुछ दिन बाद नियत समय पर लाटरी का ड्रा निकला और और पहला इनाम एक करोड़ ताऊ के नाम था | लाटरी विभाग के अफसरों ने ताऊ के बारे जानकारी जुटाने के बाद सोचा कि ये ताऊ गांव का रहने वाला भोला भाला बुजुर्ग किसान है जिसने अपनी पूरी जिन्दगी में कभी इतने घणे रूपये देखे तो होंगे नहीं सो इतनी बड़ी रकम एकदम मिलने पर या मिलने की सुनकर ही कहीं ताऊ को दिल आदि का दौरा ना पड़ जाए अतः ताऊ को एक करोड़ का इनाम जीतने की सुचना देने से पहले एक मनोचिकित्सक को ताऊ के पास भेजा जाए जो ताऊ से मिल उसकी पूरी जाँच करके आश्वस्त होने पर ताऊ को लाटरी विजेता बनने की खबर सुनाए | अतः इसी निमित लाटरी विभाग के अफसरों ने सरकारी अस्पताल के एक मनोचिकित्सक डाक्टर को यह जिम्मा दे ताऊ के गांव भेज दिया |
डाक्टर गांव पहुँच ताऊ से मिला चाय नाश्ता करते हुए काफी देर तक डाक्टर ताऊ से इधर उधर की बात करने के बाद पूछा :
डाक्टर :- ताऊ यदि किसी लाटरी वाटरी में तेरे ५ लाख का इनाम निकल जाए तो ?
ताऊ : - डाकदर जी पिछली बार शहर गया था तब एक करोड़ की लाटरी वाली एक टिकट खरीदी थी वो लड़का भी पक्का कह रहा था कि ताऊ इनाम तेरा ही निकलेगा | तो डाकदर साहब निकलना तो पूरा एक करोड़ चाहिए पर चलो आप ५ लाख बता रहे हो तो वो भी ठीक है इन रुपयों से यह जो झोपडा आप देख रहे हो इसकी जगह पक्का घर बनवा लूँगा |
डाक्टर :- और ताऊ इनाम १० लाख निकले तो उसका क्या करोगे ?
ताऊ :- डाकदर जी दुसरे बेटे के लिए भी एक घर बनवा दूंगा |
डाक्टर :- और ताऊ इनाम यदि १५ लाख निकले तब ?
ताऊ :- तब तीसरे बेटे के लिए भी एक अलग घर बनवा दूंगा |
डाक्टर :- और इनाम ३० लाख निकले तब क्या करोगे ?
ताऊ :- तीनो बेटों को टेक्टर दिलवा दूंगा |
डाक्टर :- और इनाम में चालीस लाख निकले तब ?
ताऊ :- तीनो बेटों को घर और टेक्टर दिलवाने के बाद बाकी वाले १० लाख अपने व ताई के बुढापे के लिए रख लूँगा |
डाक्टर :- और ताऊ जै लाटरी के इनाम में ५० लाख निकल जाए तब इतने रुपयों का क्या करेगा |
ताऊ :- ऐसा डाकदर जी ४० लाख में अपने सारे काम हो गए बाकि बचे १० लाख लेकर ताई के साथ तीर्थाटन पर निकल जाऊंगा | जब तक दस लाख रूपये खर्च नहीं होंगे ताई के साथ तीर्थाटन पर ही रहूँगा |
डाक्टर :- लेकिन ताऊ जैसे वो लड़का तुझे बता रहा कि इनाम में पुरे एक करोड़ तुम्हारे नाम निकलेगा यदि ऐसा हुआ तो फिर बाकी ५० लाख का क्या करोगे ?
ताऊ :- देखो जी डाकदर साहब बेटों के लिए घर ,टेक्टर अपने बुढापे के लिए जमा पूंजी और सारे तीर्थों का तीर्थाटन करने का खर्चा मिलने से अपना तो सारा काम हो गया | अब मुझे तो कोई जरुरत है नहीं सो बाकी के ५० लाख आपको दे दूंगा |
डाक्टर चूँकि सरकारी डाक्टर था उसकी भी कोई ज्यादा कमाई तो थी नहीं सो डाक्टर ने भी कभी सपने में भी ५० लाख रूपये मिलने की नहीं सोची थी | अतः जब ताऊ द्वारा ५० लाख देने की घोषणा सुनी तो डाक्टर अवाक् रह गया और इसी दौरान ज्यादा ख़ुशी ना झेल पाने की वजह से डाक्टर को दिल का दौरा पड़ गया |

Jul 1, 2009

हाई टेक होते भिखारी

देश के लगभग सभी शहरों के चौराहों पर भिखारियां से हमेशा सामना होता है | हर रोज ये भिखारी अलग-अलग भूमिका (भेष में ) में भीख मांगते मिलते है मसलन मंगलवार को हनुमान जी की फोटो लिए होंगे तो ब्रहस्पतिवार को साईं बाबा का चित्र लिए भीख मांगते नजर आयेंगे तो शनिवार को शनिदेव का प्रतीक व तेल का डिब्बा ये चौराहे पर हर आने जाने वाले के आगे कर देंगे |बाकी दिन गरीबी और लाचारी का ढोंग तो फिक्स है ही |
कई लोग साईकिल रिक्शा पर लाउड स्पीकर में संगीत बजाते उसके आगे चादर फैला गली-गली भीख मांगते मिल जायेंगे तो कई बैल गाडी पर चलता फिरता मंदिर बना गली मोहल्लों में लोगो की आस्था का दोहन करते मिल जाते है | आज सुबह ऑफिस जाने के लिए घर से निकलते ही गली में एक ऑटो में बना चलता फिरता साईं बाबा का मंदिर नजर आया | लगता है ये भी बैल गाडी में चलता फिरता मंदिर बनाने के बजाय ज़माने के साथ कदम ताल मिलाते हुए ऑटो पर मंदिर बना तकनीकी का इस्तेमाल करते हुए हाई टेक हो रहे है| इस हाई टेक मंदिर के साथ दो लोग पंडित का भेष बना साईं बाबा के प्रति लोगों की श्रद्धा का पूरा फायदा पैसे इकट्ठे करने में उठा रहे थे | ये लोग हर आते जाते को रोक कर व हर घर का दरवाजा खटखटा कर पैसे मांग रहे थे इसलिए मै तो इन लोगों को भिखारी की संज्ञा ही दूंगा | बेशक इन्हें भीख देने वाले लोग इन्हें साईं बाबा का पुजारी या भक्त समझ दान दक्षिणा दे रहे थे |
जब तक हम ऐसे हट्टे कट्टे मुस्टंडे लोगो को धर्म के नाम पर या दया करके भीख देते रहेंगे देश में भिखारियों की संख्या बढती ही रहेगी | और हमारी दया करने की प्रवर्ती व धार्मिक आस्था का ये लोग दोहन करते रहेंगे |

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