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Feb 12, 2009

हाड़ी रानी और उसकी सैनाणी ( निशानी )

अपने पिछले लेख " बीच युद्ध से लौटे राजा को रानी की फटकार " के आख़िर में मैंने एक ऐसी रानी का जिक्र किया था जिसने युद्ध में जाते अपने पति को निशानी मांगने पर अपना सिर काट कर भिजवा दिया था | यह रानी बूंदी के हाडा शासक की बेटी थी और उदयपुर (मेवाड़) के सलुम्बर ठिकाने के रावत चुण्डावत की रानी थी | जिनकी शादी का गठ्जोडा खुलने से पहले ही उसके पति रावत चुण्डावत को मेवाड़ के महाराणा राज सिंह (1653-1681) का औरंगजेब के खिलाफ मेवाड़ की रक्षार्थ युद्ध का फरमान मिला | नई-नई शादी होने और अपनी रूपवती पत्नी को छोड़ कर रावत चुण्डावत का तुंरत युद्ध में जाने का मन नही हो रहा था यह बात रानी को पता लगते ही उसने तुंरत रावत जी को मेवाड़ की रक्षार्थ जाने व वीरता पूर्वक युद्ध करने का आग्रह किया | युद्ध में जाते रावत चुण्डावत पत्नी मोह नही त्याग पा रहे थे सो युद्ध में जाते समय उन्होंने अपने सेवक को रानी के रणवास में भेज रानी की कोई निशानी लाने को कहा | सेवक के निशानी मांगने पर रानी ने यह सोच कर कि कहीं उसके पति पत्नीमोह में युद्ध से विमुख न हो जाए या वीरता नही प्रदर्शित कर पाए इसी आशंका के चलते इस वीर रानी ने अपना शीश काट कर ही निशानी के तौर पर भेज दिया ताकि उसका पति अब उसका मोह त्याग निर्भय होकर अपनी मातृभूमि के लिए युद्ध कर सके | और रावत चुण्डावत ने अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया और वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृभूमि के लिए शहीद हो गया |
इस घटना पर कवि मेघराज "मुकुल" की एक रचना मुझे मिली जो मै यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ |

सैनांण पड्यो हथलेवे रो,हिन्लू माथै में दमकै ही |
रखडी फैरा री आण लियां गमगमाट करती गमकै ही |
कांगण-डोरों पूंछे माही, चुडलो सुहाग ले सुघडाई |
चुन्दडी रो रंग न छुट्यो हो, था बंध्या रह्या बिछिया थांई |

अरमान सुहाग-रात रा ले, छत्राणी महलां में आई |
ठमकै सूं ठुमक-ठुमक छम-छम चढ़गी महलां में सरमाई |
पोढ़ण री अमर लियां आसां,प्यासा नैणा में लियां हेत |
चुण्डावत गठजोड़ो खोल्यो, तन-मन री सुध-बुध अमित मेट |

पण बाज रही थी सहनाई ,महलां में गुंज्यो शंखनाद |
अधरां पर अधर झुक्या रह गया , सरदार भूल गयो आलिंगन |
राजपूती मुख पीलो पड्ग्यो, बोल्यो , रण में नही जवुलां |
राणी ! थारी पलकां सहला , हूँ गीत हेत रा गाऊंला |
आ बात उचित है कीं हद तक , ब्या" में भी चैन न ले पाऊ ?
मेवाड़ भलां क्यों न दास, हूं रण में लड़ण नही ञाऊ |
बोली छात्रणी, "नाथ ! आज थे मती पधारो रण माहीं |
तलवार बताधो , हूं जासूं , थे चुडो पैर रैवो घर माहीं |

कह, कूद पड़ी झट सेज त्याग, नैणा मै अग्नि झमक उठी |
चंडी रूप बण्यो छिण में , बिकराल भवानी भभक उठी |
बोली आ बात जचे कोनी,पति नै चाहूँ मै मरवाणो |
पति म्हारो कोमल कुम्पल सो, फुलां सो छिण में मुरझाणो |
पैल्याँ कीं समझ नही आई, पागल सो बैठ्यो रह्यो मुर्ख |
पण बात समझ में जद आई , हो गया नैन इक्दम्म सुर्ख |
बिजली सी चाली रग-रग में, वो धार कवच उतरयो पोडी |
हुँकार "बम-बम महादेव" , " ठक-ठक-ठक ठपक" बढ़ी घोड़ी |

पैल्याँ राणी ने हरख हुयो,पण फेर ज्यान सी निकल गई |
कालजो मुंह कानी आयो, डब-डब आँखङियां पथर गई |
उन्मत सी भाजी महलां में, फ़िर बीच झरोखा टिका नैण |
बारे दरवाजे चुण्डावत, उच्चार रह्यो थो वीर बैण |
आँख्या सूं आँख मिली छिण में , सरदार वीरता बरसाई |
सेवक ने भेज रावले में, अन्तिम सैनाणी मंगवाई |
सेवक पहुँच्यो अन्तःपुर में, राणी सूं मांगी सैनाणी |
राणी सहमी फ़िर गरज उठी, बोली कह दे मरगी राणी |

फ़िर कह्यो, ठहर ! लै सैनाणी, कह झपट खडग खिंच्यो भारी |
सिर काट्यो हाथ में उछल पड्यो, सेवक ले भाग्यो सैनाणी |
सरदार उछ्ल्यो घोड़ी पर, बोल्यो, " ल्या-ल्या-ल्या सैनाणी |
फ़िर देख्यो कटयो सीस हंसतो, बोल्यो, राणी ! राणी ! मेरी राणी !

तूं भली सैनाणी दी है राणी ! है धन्य- धन्य तू छत्राणी |
हूं भूल चुक्यो हो रण पथ ने, तू भलो पाठ दीन्यो राणी |
कह ऐड लगायी घोड़ी कै, रण बीच भयंकर हुयो नाद |
के हरी करी गर्जन भारी, अरि-गण रै ऊपर पड़ी गाज |

फ़िर कटयो सीस गळ में धारयो, बेणी री दो लाट बाँट बळी |
उन्मत बण्यो फ़िर करद धार, असपत फौज नै खूब दळी |
सरदार विजय पाई रण में , सारी जगती बोली, जय हो |
रण-देवी हाड़ी राणी री, माँ भारत री जय हो ! जय हो !
हाड़ी रानी पर अंग्रेजी में जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

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20 comments

  1. राजस्थानी कविता पढ़कर आनन्द आया!


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    गुलाबी कोंपलें

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  2. बहुत धन्यवाद इस ऐतिहासिक घटना का जिक्र करने के लिये. ऐसा लग रहा है कि राजपूताना का इतिहास ही आपने खोल कर दिया है.

    रामराम.

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  3. आपके द्वारा प्रस्तुत किए गए कहानियो में यह पहली है जिसे हम जानते हैं. सालों के बाद पुनः पढने का मौका मिला. आभार.

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  4. aisi virangana ko slam,bahut achhi kahani.

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  5. हाड़ी रानी जैसी महान वीर रानी को इतिहास मे जो सम्मान मिलना चाहिए था शायद नही मिला या कहे बिल्कुल नही मिला

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  6. धीरू सिंह जी ने सही कहा.. हाड़ी रानी के बारे में ्बहुत ्कम लोग जानते है.. आपका ये प्रयास कुछ तो मदद करेगा..

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  7. बहुत बढिया.....आपके माध्यम से हाडी रानी जैसी वीरांगना के बारे में विस्तार से जानने का अवसर प्राप्त हुआ. आभार

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  8. आपकी पोस्‍ट पढ कर खुद पर मान हो आया। मुझे यह कविता मुकुमलजी के श्रीमुख से सुनने का सुख-सौभाग्‍य मिला है। उस सबका वर्णन मेरे बस में नहीं। उसे तो बस अनुभव ही किया जा सकता है।

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  9. हाड़ी रानी जेसी नारिया ही देश का नाम रोशन करती है, बहुत अच्छी लगी यह कहानी, आप का धन्यवाद

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  10. thank you very much Mr Shekhawat. i was actually in its search for a long time. it's such a wonderful writing......
    did anyone hear the song from a 1965 movie "nai umar ki nai fasal" by manna dey...
    it resembles this poem unexpectedly, but a really good singing by this legendry singer.

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  11. in janari ke liy aap ne ghno r ghno abhare....hu raj shekhawat

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  12. रतन सा.
    राजस्थान के मेवाड़ प्रांत में "निशानी " को सैदाणी कहा जाता है पर पता नहीं क्यों फिल्म के गीत के अलावा मेघराजजी "मुकुल" की कविता में भी "सेनाणी" शब्द का उल्लेख किया गया है, और फिल्म के गीत में तो चुण्डावत को भी चूड़ावत बोला गया है।

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  13. mhara kane b tharo ghano e abhiwadan iso gyan den ki khaatr

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  14. Aisa example world me kahi bhi nahi mil sakta. Jai Rajputana

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  15. आज हमारे देश के टी बी चेनलो पर कहा दीखते ए़शी महानता के नाटक अब छिरोरा पण हाबी हे इक छोड़ा दूसरा किया हद ही गयी नीचता की इस रानी बूंदी के चरणों में मेरा कोटि -२ प्रणाम
    पंडित के.के.शंखधार

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  16. thanks a lot bhut dino se jis kavy ko dhund rhi thi yo aaj mila

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  17. Thank you very much Mr Shekhawat. I was actually in search of Sainani for a long time. It is such a wonderful poem. From where can I get Sainani sung by Shri Meghraji " Mukul"? [ CD / DVD ] Can any body help me ?

    Regards

    Col K Randheer Singh
    Read more: http://www.gyandarpan.com/2009/02/hadi-rani-chundawat.html#ixzz2tD76B5Bg

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    1. आप अपनी ईमेल आईडी लिख दें तो मैं आपको ईमेल कर सकता हूँ.

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    2. In 1950's Mukulji came to our college in a Kavi Sammelan and was thriled to listen to this veer-ras sanchit poem. Then I moved to USA in 1959. I came back India few yeaars back. Now watching anti national activities and self above nation, religion above Nation my heart cries. I had been searching for this poem and finally my niece Vasundhara found it on internet. I have the same emotion that I had the first time upon listening it from Mukulji. Hopefully, after listening or reading this poem the blood of Indian National will start churning.

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  18. Respected Sir

    Many thanks for sharing this. My Grandfather is very fond of this poem.

    Is this the complete poem or there are more parts of it?

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