काका भतीजा के बीच युद्ध : इतिहास की एक अनसुनी रोचक गाथा

Gyan Darpan
0

 महाराणा रायमल ने 50000 रुपये वार्षिक आय का भेंसरोड़ का परगना राणा मोकल के पोते सूरजमल को जागीर में दिया। राजकुमार पृथ्वीराज किसी पुराने विवाद को लेकर सूरजमल जी से नाराज था अत: उन्होंने सूरजमल जी को जागीर के दिये जाने के समाचार सुने तो उन्हें चारणी देवी की भविष्यद्वाणी और सूरजमल के साथ अपने द्वन्द्व युद्ध की याद आई। 

उन्होंने महाराणा की सेवा में इस जागीर के विरुद्ध पत्र भेजा। महाराणा ने उत्तर दिया कि वे तो अपनी ओर से दे चुके, अब तुम से ले जाई जा सके तो पीछा ले लो, हम नहीं रोकेंगे । पृथ्वीराज के पास ज्यों ही यह उत्तर पहुँचा तो वे 2000 सवार लेकर भेंसरोड़ पर आक्रमण करने को चल पड़े । वहाँ पहुंच, सूरजमल को वहां से भगा दिया और गढ़ पर अधिकार कर परिवार को भी बाहर कर दिया ।

सूरजमल मालवे के सुलतान नासिरूद्दीन खिलजी के यहाँ गये । सुलतान ने मेवाड़ की घरू फूट से चित्तौड़ को गहरा आघात पहुँचाने के लिये मिले हुए इस अवसर पर प्रसन्नता प्रकट की और उससे लाभ उठाकर अपने पूर्वजों के उन पराजयों का, जो निरन्तर उन्हें मेवाड़ के महाराणाओं द्वारा सहने पड़े थे, बदला लेना चाहा । 

उसने मेवाड़ पर एक बड़ी सेना भेजी। इस प्रकार की सहायता पा सूरजमल जी ने मेवाड़ के दक्षिण- सीमाप्रान्त पर आक्रमण किया और सादड़ी, बारड़ा और नाई से नीमच तक अपना अधिकार जमा लिया तथा चित्तौड़ के लिये भी यत्न किया । 

महाराणा चित्तौड़ के किले की थोड़ी सी सेना के साथ विद्रोहियों को दण्ड देने के लिये चले । सामना गम्भीरी नदी पर हुआ और साधारण सैनिक के समान लड़ते हुए महाराणा के 22 घाव आये । वे थक कर गिरने ही को थे इतने में पृथ्वीराज, जिन्होंने इस आक्रमण के समाचार कुम्भलगढ़ में सुने थे, अपने 1000 सवारों सहित विद्युतवेग से आ पहुँचे और इस दुर्घटना का निवारण किया । पितृव्य सूरजमल की खोज में उत्सुक कुंवर पृथ्वीराज की दृष्टि उस पर पड़ी। मार्ग काट कर वे उसके समीप जा पहुंचे और उसे घायल कर दिया । दोनों पक्षों के अनेक वीर काम आये, परन्तु कोई भी शरण न हुआ । रात्रि होने पर उन्होंने युद्ध को बन्द किया और एक दूसरे के सन्मुख खुले मैदान में डेरा डाला ।

पृथ्वीराज रात को अपने पितृव्य सूरजमल से मिलने गये। कर्नल टाड ने इन प्रतिस्पर्धी चाचा भतीजों की इस भेट का वर्णन करते हुए लिखा है- “सम्भवतया मनुष्य की उत्पत्ति से वर्तमान कालपर्यन्त के युद्ध समाचारों में यही विचित्र है ।” पृथ्वीराज ने अपने काका को एक छोटे से डेरे में पट्टे पर विश्राम करते हुए पाया । जर्राह घाव सींकर अभी अभी गया ही था, तो भी सूरजमल उठ खड़े हुए और मेवाड़ के युवराज अर्थात् अपने भतीजे से ऐसी मर्यादा के साथ मिले कि मानों कुछ भी असाधारण घटना नहीं हुई हो, यद्यपि इस परिश्रम के कारण उनके कुछ घाव भी खुल गये थे । वार्तालाप इस प्रकार होने लगा-

पृथ्वीराज- काका! तुम्हारे घाव कैसे हैं ?

सूरजमल—बेटा ! जब से तुम्हें देखा, बिलकुल आराम है

पृथ्वीराज - काका! मैंने अभी दिवान 10 जी के दर्शन नहीं किये हैं, मैं पहले तुम से मिलने को दौड़ा, मुझे भूख लगी है। क्या कुछ भोजन है ?

झटपट कांसा परोसा गया और यह अदभुत जोड़ी एक ही थाल में भोजन करने बैठी । बिदा होते समय पृथ्वीराज पान" लेने में भी नहीं हिंचका ।

पृथ्वीराज- - काका ! प्रात:काल ही अपना युद्ध समाप्त कर देंगे ।

सूरजमल - बहुत अच्छा बेटा, जल्दी आना ।

वे रणखेत में मिले परन्तु युद्ध का भार सारंगदेव ने सहा । उसके 35 घाव आये, चार घड़ी तक तलवार और बरछे खूब चलें, और प्रत्येक वंश के अनेक राजपूत उस दिन परलोक प्रयाण कर गये । अन्त में विद्रोहियों का पराभव हुआ और वे सादड़ी की ओर भाग गये । विजयी पृथ्वीराज, यद्यपि उनके भी 7 घाव लगे थे, चित्तौड़ आये । सूरजमल सादड़ी में रहने लगे। महाराणा की इच्छा उनसे छेड़छाड़ करने की न थी, परन्तु पृथ्वीराज उन्हें मेवाड़ से निकाल बाहर करने के उद्योग में थे। 

चाचा भतीजों में अनेक मुठभेड़ हुई। भतीजे का आग्रह था कि वह काका को मेवाड़ की धरती में से सुई की नोक बराबर भी जमीन नहीं रखने देगा और सूरजमल का उत्तर यह था कि वह अपने भतीजे के लिये उतनी ही धरती छोड़ेगा जितनी में वह सो सके ।

जगह जगह से खदेड़े जाकर सूरजमल बारड़ा के वन में घुस गये और धौक की लकड़ी का (जो यहां बहुत होती है) घेरा डालकर बचाव का स्थान बनाया । एक दिन जब वे दोनों तपने के लिये अग्नि के पास बैठे हुए अपनी अवस्था पर विचार कर रहे थे, ऐसे में घोड़ों की हिनहिनाहट और अकस्मात् आक्रमण ने उनके विचारों में विघ्न डाल दिया। सूरजमल कठिनता से यह कह चुका था “यह अवश्य मेरा भतीजा है” कि पृथ्वीराज सवारों सहित अपने घोड़े को घेरे के भीतर ले आये । भारी गड़बड़ मच गई और तलवारें खटाखट और अन्धाधुन्ध चलीं। युवक युवराज ने अपने काका के समीप पहुंच उस पर वार किया, और यदि सारंगदेव उसकी सहायता न करता तो वह गिर गया होता। 

सारंगदेव तिरस्कार और व्यंग-पूर्ण शब्दों में कहने लगा कि इस समय का एक घूंसा ही पहले के 20 आघातों से अधिक है। इस पर सूरजमल ने कहा कि केवल इसीलिये कि ये घाव मेरे ही भतीजे के हाथ से लगे हैं। सूरजमल ने वार्तालाप करना चाहा और युद्ध स्थगित करने को कहते समय वह बोला – “यदि मैं मारा जाऊं तो कोई चिन्ता नहीं, मेरी सन्तान राजपूत हैं, वे सहायता के लिये देश खूंद डालेंगे, परन्तु यदि तुम मारे जाते तो चितौड़ का क्या होता ? मेरा मुंह काला हो जाता और मेरे नाम पर सदा के लिये कलंक लगता ।”

तलवारों का चलना रुक गया और ज्योंही काका भतीजा छाती से छाती मिला कर मिले तो भतीजे ने काका से कहा "काका ! जब मैं आया उस समय आप क्या बातें कर रहे थे ?” काका ने उत्तर दिया – “बेटा भोजनोपरान्त का केवल वार्तालाप " । पृथ्वीराज ने कहा- “परन्तु मेरे जैसा शत्रु सिर पर रहते तुम इतने निश्चिन्त कैसे रह सके? सूरजमल - मैं क्या कर सकता ? तुमने मेरे लिये कुछ बाकी नहीं छोड़ा और मुझे भी तो कहीं सिर टेकने को जगह चाहिये ।”

सूरजमल सादड़ी में पहुँच कर केवल अपने इसी कथन को सिद्ध करने को वहाँ ठहरा “वे अपनी जागीर राजा से भी बलवानों को दे देंगे”। उन्होंने अन्य ग्रामों के साथ देवारी के 12 गांव, जिनमें बिलाना और बांसला भी थे, ब्राह्मणों और भाटों को दे दिये । वे मेवाड़ को सदा के लिये परित्याग करने को थे कि पृथ्वीराज आ पहुंचे।

उनका स्वागत भली प्रकार किया गया। सूरजमल की स्त्री ने विष भरा भोजन पृथ्वीराज के सन्मुख रक्खा । सूरजमल को इसका पता लग गया परन्तु किस थाली में विष है यह न जानने के कारण वे उसे हटा न सके इसलिये वे स्वयं भी पृथ्वीराज के साथ भोजन करने बैठ गये । उनकी स्त्री ने तत्काल ही विषभरी थाली उठा ली। इस घटना ने बिजली के वेग के समान सारा भेद पृथ्वीराज पर प्रकट कर दिया। चाचा की इस प्रकार प्राण-रक्षा करने की ममता से प्रभावित हो वे उठ खड़े हुए और बोले— “काका ! अब मेवाड़ का राज्य आपका है ।” सूरजमल ने उत्तर दिया कि राज्य तो एक ओर रहा वे जलपान के निमित्त भी मेवाड़ में नहीं ठहरेंगे। यह कह कर चल दिये ।

कांठल के वन में से निकलते हुए उन्हें शकुन हुआ जिससे चारणी की एक भविष्यवाणी जिसका तात्पर्य यह था कि मातृमोह से रक्षित बकरी के बच्चे को भेड़िया सब प्रकार से उद्योग करने पर भी नहीं ले जा सकता, स्मरण आ गई। इसका तात्पर्य उन्होंने यह निकाला कि निवास के लिये यह वन सुरक्षित और दृढ़ स्थान है । इस पर वे वहीं ठहर गये और वहां की निवासिनी वन्य जातियों को आधीन कर उस स्थान पर, जहां कि बकरी ने भेड़िये को रोक रक्खा था, देवलिया 12 का गढ़ बनवाया । वे एक हजार गांवों के राजा हो गये और उन्होंने एक राज्य स्थापित किया जो वर्तमान में देवलिया परतापगढ़ के नाम से राजपूतानें के 18 रजवाड़ों में गिना जाता है ।

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)