दांगी कछावा राजवंश का इतिहास। डांगी कछवाहों का इतिहास

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 आज के इस लेख में हम आपको जानकारी देंगे कछावा राजवंश की दांगी शाखा के गौरवशाली इतिहास की। आपको बता दें दांगी या डांगी सरनेम आपको कई जातियों में मिल जायेंगे पर हम जो जानकारी देने का रहें हैं वह कछावा राजवंश की दांगी शाखा से संबंधित है। 

राजस्थान में कछवाह राज्य की नींव रखने वाले दुल्हराय जी के पुत्र हुए काकिल देव जी,  काकिल देव जी ने  सूसावत गौत्र के मीणा राजा से आमेर छीनकर अपनी राजधानी बनाया।  इन्हीं काकिल देव जी के एक पुत्र हुए देलण जी, कछवाहों की वंशावली के आधार पर देलण जी आमेर ना रहकर ग्वालियर चले गए, आपको बता दें दुल्हराय जी भी ग्वालियर क्षेत्र से ही राजस्थान आये थे, उनके परिवार के लोग अभी भी उस क्षेत्र में बहुतायत से थे अत : देलण जी वापस उसी क्षेत्र में चले गए ,  उनके वंशज देलण पोता एवं डांगी कछवाह कहलाये ,  जिन्हें दांगी कछवाह भी कहा जाता है।   

चूँकि दांगी कछवाहों का शृंखलाबद्ध इतिहास नहीं लिखा गया पर बुंदेलखंड में आज भी दांगी कछवाहों की आबादी काफी है,  उस क्षेत्र का इतिहास पढ़ने पर दांगी कछवाहों के राज्य,  जागीरें आदि का विवरण मिल जाता है।  केशव प्रसाद गुरु द्वारा लिखित "बुंदेलखंड के प्राचीन दुर्ग और गढ़ी" में दुर्ग गढ़-पहरा की जानकारी देते हुए लिखा गया है कि - यह दुर्ग सागर जिला मुख्यालय से लगभग नौ किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 26  पर उत्तर दिशा में एक पहाड़ी पर बना है।   यह दुर्ग लगभग 1027 ई .  में दांगी राजा निहाल सिंह ने बनवाया था, जो उत्तर प्रदेश के जालौन हमीरपुर क्षेत्र से आकर यहाँ बसे थे, वे अपने आपको राजपूत मानते थे तथा नरवर के कछावा राजाओं का वंशज मानते थे (यह जानकारी बुंदेलखंड इतिहास पुस्तक के पृष्ठ 52 पर भी लिखी है )   

उस समय350 गांव इनके अधीन थे, इस क्षेत्र पर दांगियो ने 1023 ई .  में ही कब्ज़ा कर लिया था।  बाद में गौंड राजा संग्राम सिंह ने यह दुर्ग और राज्य डांगियों से छीन लिया।  गौंड सत्ता के पतन के बाद यह भूभाग मुगलों के अधिकार में रहा।  पन्ना के महाराजा छत्रसाल ने वर्ष 1689 ई में इस दुर्ग पर हमला किया तब भी उस समय यह दांगी राजा के अधीन था,  डॉ काशीप्रसाद त्रिपाठी ने अपने ग्रन्थ "दी फोर्ट ऑफ़ बुंदेलखंड" में लिखा है कि औरंगजेब के शासनकाल में जयपुर के राजा सवाई  जयसिंह जी के प्रयासों से यह दुर्ग  वर्ष 1727 ई में दांगीराजा पृथ्वीपात को पुन : प्राप्त हो गया था।  

केशव प्रसाद गुरु ने अपनी पुस्तक में दांगी वंश के कुछ राजाओं के नाम भी लिखे है जो इस प्रकार है - महाराजा जयसिंह , पृथ्वीपत, ऊदन शाह, दलपत शाह इत्यादि।  

केशव प्रसाद गुरु के अनुसार सागर के दुर्ग का निर्माण भी वर्ष 1660 ई में गढ़ पहरा के दांगी राजाओं ने करवाया था किन्तु वर्ष 17 34 -35 ई में यह सम्पूर्ण क्षेत्र सागर दमोह सहित छत्रसाल के पुत्रों द्वारा पेशवा बाजीराव को सौंप दिया।  

गढ़ पहरा दुर्ग के निर्माण करने वाले दांगी राजा निहालसिंह ने ऐरण में भी एक किले का निर्माण कराया था जो वर्तमान में खंडहर में तब्दील हो चूका है।  आपको बता दें  ऐरण अतिप्राचीन नगर रहा है यहाँ दांगी राजा द्वारा निर्मित किले से भी पहले बने प्राचीन किले के खंडहर मौजूद है।  

सागर जिला मुख्यालय से 31 -32 किलोमीटर दूर स्थित है जैसीनगर।  इस नगर को गढ़ पहरा के दांगी राजा जयसिंघ ने वर्ष 1670 ई में बसाया था | यहाँ एक दुर्ग का निर्माण कराकर अपने नाम से इसका नाम जयसिंह नगर रखा था जो स्थानीय भाषा में अपभ्रंश होकर जैसीनगर हो गया।  उस वक्त यहाँ का दुर्ग चारों और परकोटे से घिरा था और इसके अधीन 51 गांव थे।  बाद में यह दुर्ग भी पेशवाओं के पास चला गया और बाद में अंग्रेजों के पास।  

सागर जिले के ही एक तहसील मुख्यालय खुरई में भी एक दुर्ग है जो 15 वीं सदी में खटौला के गौड़ शासकों द्वारा बनवाया गया था, जिस पर बाद में गढ़ पहरा के दांगी राजा खेमचंद ने  हमला कर अपने अधीन कर लिया था।  इस तरह इस दुर्ग पर भी दांगी राजाओं का शासन था, जो दांगी राजाओं के पतन के बाद मराठों के पास चला गया।  

सागर जिला मुख्यालय से 15  किलोमीटर दूर बेवस नदी के तट पर स्थित है सानोधा दुर्ग, जिसे खगराज सिंह दांगी कछावा के पुत्र अचल सिंह ने सन 1752 ई में बनवाया था।  यह एक छोटा दुर्ग है जिसे गढ़ी भी कहा जा सकता है।  मराठों के बाद यह दुर्ग अंग्रेजों के पास था जिस पर 1857 विद्रोह के समय विद्रोही जवाहर सिंह चंद्रपुरा ने अपने साथियों के साथ 15 जुलाई 1857 को कब्ज़ा कर लिया था और विद्रोहियों की शरण स्थली बना दिया ।  तब कप्तान हारे में 8 फरवरी 1858 को इस पर तोपों से हमला कर विद्रोहियों को भगाया और किले को तोड़ दिया अब किले की कुछ दीवारें शेष है।   

यदि बुंदेलखंड के इतिहास की अन्य किताबों में दांगी कछावों का इतिहास तलाश जाए तो इनके गौरवशाली  इतिहास की बहुत सारी  जानकारी मिलेगी। साथ आवश्यकता है इस जानकारी को बड़वाओं की पोथियों में लिखी वंशावली से मिलान कर दांगी कछवाहों का क्रमबद्ध इतिहास लेखन की।  


  

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