आमेर के राजा सवाई जयसिंह का मुग़लों के साथ संघर्ष

Gyan Darpan
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21 फरवरी 1707 को मुग़ल बादशाह औरंगजेब की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद मुगलिया परम्परा के अनुरूप उसके पुत्रों में उत्तराधिकार के लिए खुनी संघर्ष शुरू हो गया। इस संघर्ष में किसी एक को जीतकर मुगलिया तख़्त पर बैठना था तो बाकियों को एक दूसरे के हाथों मर जाना था। उस वक्त औरंगजेब का एक पुत्र कामबख्स दक्षिण में था सो उसने विचार किया कि दिल्ली आगरा के बजाय दक्षिण में ही अपने लिए एक राज्य बना लिया जाए इसलिए वह चुप बैठा रहा।  लेकिन उसके दो भाइयों मुअज्जम और आजम के मध्य युद्ध हुआ। 

उस समय राजा सवाई जयसिंह आजम के पुत्र बेदारबख्त के साथ गुजरात में तैनात थे अत : उन्हें मजबूर होकर आजम का साथ देना पड़ा।  "युग निर्माता सवाई जयसिंह" पुस्तक के लेखक मोहनलाल गुप्ता लिखते हैं कि जाजऊ में हुए इस युद्ध में आजम की हालत कमजोर देखते हुए जयसिंह ने पाला बदल लिया और इस युद्ध में आजम और उसका बेटा बेदारबख्त मारे गए। इस तरह जून 1707 में 65 वर्षीय मुअज्जम बहादुर शाह के नाम से मुगलिया तख़्त पर बैठा। जो बहुत ही ईर्ष्यालु था।  राजा जयसिंह द्वारा शुरू में आजम का साथ देने के चलते उसने मन में उनके प्रति शत्रुता पाल ली। 

बादशाह बनते ही उसने राजा सवाई जयसिंह को दण्डित करने का मन बनाया और आमेर आया। उसने आमेर का राज्य सवाई जयसिंह से छीनकर उनके भाई विजय सिंह को दे दिया और विजय सिंह को मिर्जा राजा की उपाधि दी, साथ ही आमेर का नाम मोमिनाबाद रख दिया। मोहनलाल गुप्ता के अनुसार जयसिंह के पास केवल दौसा की जागीर छोड़ी।

आमेर से बहादुर शाह अपने भाई कामबख्स से निपटने के लिए दक्षिण के लिए रवाना हुआ। कामबख्स ने अपने आपको हैदराबाद का बादशाह घोषित कर लिया था।  इस अभियान पर उसने सवाई जयसिंह और जोधपुर के राजा अजीतसिंह को भी साथ ले लिया।  रास्ते में जयसिंह और अजीतसिंह ने आपसी सलाह कर बादशाह का साथ छोड़ दिया और अपने अपने राज्य वापस पाने के लिए संघर्ष शुरू कर दिया। इस अभियान में उन्होंने मेवाड़ के महाराणा को भी साथ मिला लिया। तीनों राजाओं की संयुक्त सेनाओं ने जुलाई 1708 में अजीतसिंह को जोधपुर दिलवाया और फिर आमेर में विजयसिंह और मुग़ल फौजदार को हराकर आमेर के सिंहासन पर सवाई जयसिंह को बिठा दिया। 

इतिहासकार जदुनाथ सरकार अपनी पुस्तक "A History of Jaipur" में लिखते हैं कि Bahadur Shah was absent from the scene from Wednesday, 24th March, 1708 (when he left Ajmer) to 12th June, 1710 (when he returned to that holy city after the death of Kam Bakhsh). During this interval the flames of war spread over all of Rajputana. Mewar, Amber and Marwar were united in opposing the Turks', and Jai Singh and Durgadas Rathor were the national leaders. Asad Khan, the Regent of the Empire, who had been left behind in Agra, wisely tried to patch up some kind of peace by coming to terms with the Rajput chiefs. Ajit and Jai Singh recovered their respective capitals from their Mughal garrisons in July, 1708. Sayyid Hussain Barha, faujdar of Mewat, at the head of a large force of imperialists and Churaman with his Jat troops, advanced from Narnol to attempt the reconquest of Amber (early in October), but near the town of Sambhar he was shot dead with his two brothers (the faujdars of Bairat-Singhana and Narnol) and his army routed.

बहादुर शाह बुधवार, 24 मार्च 1708 (जब उन्होंने अजमेर छोड़ा) से 12 जून 1710 (जब काम बख्श की मौत के बाद लौटे) तक उस इलाके से दूर रहे। इस दौरान पूरे राजपूताना में युद्ध की आग फैल गई। मेवाड़, आमेर और मारवाड़ तुर्कों का विरोध करने के लिए एकजुट हो गए, और जय सिंह तथा दुर्गादास राठौर राष्ट्रीय नेता बने। साम्राज्य के रीजेंट असद खान, जिन्हें आगरा में पीछे छोड़ दिया गया था, ने समझदारी दिखाते हुए राजपूत सरदारों के साथ समझौता करके किसी तरह शांति स्थापित करने की कोशिश की। अजीत और जय सिंह ने जुलाई 1708 में मुगल सेना की टुकड़ियों से अपनी-अपनी राजधानियाँ वापस ले लीं। मेवात के फौजदार सैयद हुसैन बरहा, शाही सेना की एक बड़ी टुकड़ी और चूरामन अपनी जाट सेना के साथ, आमेर को फिर से जीतने की कोशिश में नारनौल से आगे बढ़े (अक्टूबर की शुरुआत में), लेकिन सांभर शहर के पास उन्हें उनके दो भाइयों (बैराठ-सिंघाना और नारनौल के फौजदार) के साथ गोली मारकर मार डाला गया और उनकी सेना को खदेड़ दिया गया।

डॉ मोहनलाल गुप्ता ने भी अपनी पुस्तक में लिखा है कि - अक्टूबर में सैयदा बारहा तथा चूड़ामन जाट अपनी सेनाएं लेकर आमेर पर चढ़ आये।  पर उन दोनों की सेनाओं को पीटकर खदेड़ दिया गया। जदुनाथ सरकार ने लिखा है कि - to conciliate the Rajputs by restoring Jai Singh and Ajit to their mansabs. But there could be no real peace unless all of Marwar and Amber were evacuated by the Mughals and the state of things before Aurangzib's usurpation of 1679 restored. The Emperor and his advisers had not the wisdom to see this. So the fighting continued; Mughal faujdars went marching through the unhappy land pillaging the crops and sacking the helpless villages; but every fort and fortalice defied them. Mir Khan, the new faujdar of Narnol, who had come with his own 7000 troops and Churaman's 6000 Jat horses, was effectively checked by Gaj Singh Naruka, who held Javli on behalf of Jai Singh (January, 1710). Muhammad Khan, the qiladar of Tonk, was driven out on 24th March, 1710.

जय सिंह और अजीत को उनके मनसब वापस देकर राजपूतों को मनाने का फैसला किया। लेकिन असली शांति तब तक नहीं हो सकती थी जब तक मुगल मारवाड़ और आमेर से पूरी तरह हट न जाएं और 1679 में औरंगजेब के कब्ज़े से पहले जैसी स्थिति बहाल न हो जाए। बादशाह और उनके सलाहकारों में इतनी समझ नहीं थी कि वे यह बात समझ सकें। इसलिए लड़ाई जारी रही; मुगल फौजदार उस दुखी इलाके में घूमते रहे, फसलें लूटते रहे और बेबस गांवों को बर्बाद करते रहे; लेकिन हर किले और छोटी चौकी ने उनका डटकर मुकाबला किया। नारनौल के नए फौजदार मीर खान, जो अपने 7000 सैनिकों और चूड़ामन के 6000 जाट घुड़सवारों के साथ आए थे, को गज सिंह नरुका ने सफलतापूर्वक रोक दिया; गज सिंह जय सिंह की ओर से जावली संभाले हुए थे (जनवरी, 1710)। टोंक के किलेदार मुहम्मद खान को 24 मार्च, 1710 को वहां से खदेड़ दिया गया।

आपको बता दें गजसिंह नरुका जावली के जागीरदार थे और जब नारनौल के फौजदार मीर खान अपने 7000 सैनिकों और चूड़ामन जाट अपने 6000 जाट घुड़सवारों के साथ आमेर पर आक्रमण करने आये तो रास्ते में जावली के जागीरदार गजसिंह नरुका ने ही अपनी छोटी सी फ़ौज से निपटा दिया। यदि आमेर की सेना से इनका मुकाबला होता तो समझ सकते हैं इनकी क्या हालत होती। जिस दिल्ली की सल्तनत ने वीरता के लिए बहुत प्रसिद्ध जाट योद्धा चूड़ामन के 6000 घुड़सवारो के पूर्ण सहयोग से भी जावली जैसे छोटे से ठिकाने की छोटी सी सेना के सहारे गज सिँह नरुका से ही पराजित हो जाते है तो दिल्ली की सल्तनत बिना जयपुर के क्या सल्तनत रही होगी

इसके कुछ ही समय बाद बहादुर शाह राजपूताना की ओर लौट आए। उन्होंने हालात को देखते हुए समझौता करने का फैसला किया और दोनों बागी राजाओं को सुलह के लिए पत्र और तोहफे भेजे। 

 


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