पीपल्या ठिकाना : शक्तावतों का अनसुना इतिहास

Gyan Darpan
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पीपल्या के सरदार महाराणा उदयसिंह (द्वितीय) के पुत्र महाराज शक्तिसिंह के १३ वें पुत्र राजसिंह के दूसरे बेटे कल्याणसिंह के वंशज हैं और 'रावत' उनकी उपाधि है ।

महाराणा अमरसिंह ( प्रथम ) के समय इस ठिकाने पर हाथीराम चंद्रावत का अधिकार था । वि० सं० १६५६ ( ई० स० १६०२ ) में हाथीराम ने महाराणा के एक ऊंट को, जिसपर उस ( महाराणा ) के कपड़े लदे हुए थे और जो पाटन से पीपल्या होता हुआ उदयपुर जा रहा था, पकड़ लिया। इसपर महाराणा की आज्ञा से कल्याणसिंह' ने पीपल्या जाकर हाथीराम को गिरफ्तार कर लिया और उसे अपने साथ उदयपुर ले गया । इस सेवा के उपलक्ष्य में कल्याणसिंह को महाराणा की ओर से यह ठिकाना मिला। इसके पहले वह सतखंधे का स्वामी था ।

महाराणा अमरसिंह (द्वितीय) के राजत्व-काल में रामपुरे के राव गोपालसिंह के पुत्र रत्नसिंह ने रामपुरे पर अधिकार कर लिया । इसपर गोपालसिंह ने बादशाह औरंगज़ेब से उसकी शिकायत की, परन्तु उस ( रत्न- सिंह) ने अनिष्ट से बचने तथा बादशाह को प्रसन्न करने के लिये इस्लाम धर्म स्वीकार कर अपना नाम इस्लामखां और रामपुरे का इस्लामाबाद रखा, जिससे बादशाह ने उसी को रामपुरे का ठिकाना दे दिया । तब गोपाल सिंह महाराणा के पास जाकर शाही इलाक़ों में लूटमार करने लगा । उसे इस काम में महाराणा का इशारा पाकर कल्याणसिंह के भाई कीता के पुत्र उदयभान ने पूरी मदद दी ।

कल्याण सिंह के पीछे हरिसिंह, हठीसिंह तथा बाघसिंह क्रमशः ठिकाने के मालिक हुए। महाराणा संग्रामसिंह (द्वितीय) के समय सतारे के कितने अधिकारी छत्रपति महाराज शाहू के विरोधी हो गये । तब छत्रपति की इच्छानुसार महाराणा ने रावत बाघसिंह को सतारे भेजा, जिसने उनके बीच मेल करा दिया। उसकी इस सेवा से प्रसन्न होकर राज्याभिषेक शक' ५२ ( वि० सं० १७८३= ई० स० १७२६ ) में छत्रपति शाहू ने अपने सब हिन्दू तथा मुसलमान अधिकारियों के नाम आज्ञापत्र जारी कर बाघसिंह और उसके वंशजों की प्रतिष्ठा एवं मान-मर्य्यादा को बनाये रखने का आदेश करते हुए उसके सम्बन्ध में लिखा 'ये बड़े सत्पुरुष तथा मेरे कुल के हैं । इन्होंने मेरा बड़ा उपकार किया है । इन्हीं के प्रताप से भारत में हिन्दू-राज्य अब तक स्थिर है । मेरा आदेश न मानकर कोई हिन्दू इनकी मर्यादा को तोड़ने की दुश्चेष्टा करेगा तो उसके सात पूर्वज नरकगामी होंगे और यदि मुसलमान इनकी इज्ज़त बिगाड़ने की कोशिश करेगा तो उसे सूअर का मांस खाने का पाप लगेगा' ।,

बाघसिंह का उत्तराधिकारी उसका पुत्र जयसिंह हुआ, जिसको उक्त महाराणा ने अपना प्रतिनिधि बनाकर छत्रपति शाहू के पास भेजा । वह (शाहू.) जयसिंह का भी उसके पिता की भांति बड़ा सम्मान करता और उसे 'काका' कहकर पुकारता था । वि० सं० १८१३ ( ई० स० १७५६) में जयसिंह का देहान्त हो जाने पर उसका पुत्र केसरीसिंह पीपल्ये का स्वामी हुआ । वि० सं० १८२४ ( ई० स० १७६७) में केसरीसिंह ने अपने गढ़ की मरम्मत कराई और इन्दौर के महाराज मल्हारराव के साथ भाई-चारे का सम्बन्ध स्थापित किया ।

महाराणा अरिसिंह के समय माधवराव सिंधिया ने उदयपुर पर घेराः डाला और अन्त में सन्धि हुई उस समय जो रुपये उसको देने ठहरे उनमें से कई लाख रुपये सरदारों से वसूल करने की व्यवस्था हुई; तदनुसार पीपल्ये- ले ३५०००) रु० लेने की महाराणा ने आज्ञा दी, जिसका पालन न करने के कारण महाराणा ने उसकी जागीर ज़ब्त कर ली तो वह उदयपुर चला गया और वहीं उसका देहान्त हुआ, जिसपर महाराणा ने उसके पुत्र भीमसिंह को पीपल्ये की जागीर पीछी देदी।

भीमसिंह के पौत्र गोकुलदास के समय मरहटों की सेना मेवाड़ में लूटमार करती हुई पीपल्या जा निकली और उस (गोकुलदास) से कहलाया कि या तो फ़ौजखर्च दो या गढ़ खाली कर दो, परन्तु उसने इन दो बातों में से एक भी नहीं मानी । तब उक्त सेना ने उसके गढ़ पर घेरा डाल दिया और लड़ाई छिड़ गई, जो एक महीने तक जारी रही। अन्त में मरहटों को गढ़ से घेरा उठाना पड़ा। इस युद्ध में उसके २० या २५ रिश्तेदार काम आये। महाराण सरूपसिंह और उसके सरदारों के बीच अनबन हो गई उस समय गोकुलदास का पुत्र हिम्मतसिंह उस (महाराणा ) का सहायक रहा। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर महाराणा ने उसे 'रावत' की उपाधि से सम्मानित किया। महाराणा का शरीरान्त हो जाने पर हिम्मतसिंह अपने पुत्र लक्ष्मणसिंह को ठिकाने का अधिकार सौंपकर वृन्दावन में जा रहा और वहीं उसकी मृत्यु हुई।

वि० सं० १९२५ ( ई० स० १८६८ ) में लक्ष्मणसिंह अपने भाइयों के हाथ से मारा गया और शेरसिंह का पुत्र किशनसिंह उसका उत्तराधिकारी हुआ । किशनसिंह का तीसरा वंशधर सज्जनसिंह पीपल्या का वर्तमान स्वामी है।

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