जोधपुर के महाराजा विजय सिंह जी के निधन के बाद उत्तराधिकार को लेकर काफी घमासान हुआ, परिवार के सदस्य एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए, दरबारी राज में अपनी अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए षड्यंत्र रचने लगे, गद्दी पर महाराजा विजय सिंह जी के पौत्र भीमसिंह जी आसीन हो चुके थे | ऐसे में अपनी जान बचाने के लिए राजपरिवार के एक महत्त्वपूर्ण सदस्य मानसिंह जी जालौर के किले में चले गए ताकि सुरक्षित रह सके |
लेकिन महाराजा भीमसिंह जी ने सेना भेज कर जालौर के किले को घेर लिया, यह घेरा महाराजा भीम सिंह जी के निधन तक चला | वर्षों तक चले घेरे में मानसिंह जी को बड़े बुरे दिन देखने पड़े, अक्सर खाद्य सामग्री और धन की कमी होती रहती थी, इस विपत्ति काल में कुछ लोग उनके साथ थे, जिनमें सत्रह चारण कवि थे |
इन चारण कवियों में एक जुगतीदान जी बणसूरी थे जो मानसिंह जी के खास थे, क्योंकि वे इस तरह की मुसीबत में सबसे ज्यादा काम आते थे | चाहे खाद्य सामग्री की व्यवस्था करनी हो या धन की व्यवस्था करने के लिए सोना चांदी बेचने जाना हो, जुगतीदान जी ही करते थे, जुगतीदान जी देखने में काले रंग के कुरूप, बोलने भोले पर थे बहुत बुद्धिमान और चतुर व्यक्ति | पद्मश्री डॉ लक्ष्मीकुमारी जी चुण्डावत अपनी पुस्तक "गिर ऊँचा ऊँचा गढ़ा" में लिखती है कि- दीखत रा काला कुरूप बोलण में भोला पण स्याम धर्मी पक्का | खरचा रो टोटो पडतो, सोनो बेचण रो मौका आतो, खरचो मांग लाणे रो सवाल आतो, जुगतीदान जी भेख बदल झट जोधपुर री फोजां बीचे सूं निकल जाता |
मतलब वे भेष बदल कर किले के घेरा डाली जोधपुर की सेना के बीच से निकल जाते | उनके भोलेपन और शक्ल सूरत को देखकर कोई भी उन पर शक नहीं करता कि ऐसा व्यक्ति खर्चे का प्रबंध कर सकता है |
एक बार मानसिंह जी को रुपयों की पूरी जरुरत, उन्होंने जुगतीदान जी को कहा - जुगता खरचा रो कोई उपाय कर | जगतीदान जी गए, कहीं कोई उपाय नहीं हुआ तो अपनी पुत्रवधू के गहने बेचने चले | पुत्रवधू को दिलासा दिलाया कि तुझे इनसे ज्यादा बनवा दूंगा | गहने बेच रूपये मानसिंह जी को दिए | पर यह नहीं बताये कि पुत्रवधू के गहने बेचे हैं |
रुपयों की फिर जरुरत पड़ी, इस बार जुगतीदान जी ने अपने पुत्र भैरजी को गिरवी रखकर रूपये लाये | मानसिंह जी को पता चला तो वे अभिभूत हो गए और अहसान माना |
पर कहते हैं ना कि व्यक्ति के दिन फिरते देर नहीं लगती | जोधपुर महाराजा भीमसिंह जी का निधन हो गया | अब जोधपुर की गद्दी के एकमात्र वारिश बचे मानसिंह जी | जिस सेना ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिए घेरा डाल रखा था, उसी के सेनापति ने महाराजा के निधन का समाचार भेजते हुए मानसिंह जी से गद्दी पर बैठने का आग्रह किया | मानसिंह जी जोधपुर की राजगद्दी पर बैठे | अब धन की उन्हें कोई कमी नहीं, एक तरह से धन की देवी लक्ष्मी अब उनके आगे हाथ जोड़े खड़ी थी |
पर अब जुगतीदान जी किस को याद ?
राज करते हुए छ: महीने बीत गए तब जाकर राजा मानसिंह जी को जुगतीदान जी की याद आई, पर जुगतीदान जी वहां नहीं थे, आदमी भेजकर उन्हें बुलाया गया | उनका मान सम्मान किया गया, लाख पसाव का इनाम दिया गया, जागीर दी गई और हाथी पर बैठकर उनकी हवेली तक छोड़ने के लिए राजा मानसिंह जी पैदल साथ चले |
जयपोल से बाहर निकलते समय जुगतीदान जी ने राजा से आग्रह किया कि अब वे लौट जाएँ, क्या पता आपके पीछे किले में कोई षड्यंत्रकारी फिर षड्यंत्र रह दे और आपको फिर संघर्ष करना पड़े |
घर पहुँच कर जुगतीदान जी ने बेटे को गिरवी से छुड़ाया, पुत्रवधू के गहने वापस बनवाये |
राजा मानसिंह जी खुद एक बुत बड़े कवी थे उन्होंने विपत्ति के दिनों में जिन चारण कवियों ने उनका साथ दिया उसे यादगार बनाने के लिए उन्होंने एक कवित्त रचा -
सुध जुगतो बण सूर, पीथळ हरियंद सादूं |
बारहठ भैरूंदान उमो वन वांदू ||
एक पन्नो आसियो, नवळ लालस कवियां रंग |
ईदौ कुसलो मेघ माय रामो रतनू रंग ||
गाडनो भोम खड़िया, ऊभै केहर साहिब चारणा |
जालौर किलो पायो सुयस, चवडे ऐता चारणा ||
तो चारण कवि सिर्फ कविता ही नहीं रचते थे, मौका पड़ने पर वे तलवार भी उठाते थे और राजाओं के लिए वे काम कर देते जो कोई नहीं कर सकता | इसलिए रियासती काल में राजदरबार में सबसे ज्यादा सम्मान चारणों का होता था |
यही राजा मानसिंह जी दरबार में अंग्रेज अधिकारीयों को अभिवादन के लिए नहीं उठते थे, पर कोई चारण आता तो उठकर, झुककर अभिवादन करते, जिसे देख अंग्रेज अधिकारीयों को बड़ी जलन होती |
