1/31/2010 02:53:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
पिछले कई दिनों से एलोवेरा प्रोडक्ट ब्लॉग पर रामबाबू सिंह एलोवेरा (ग्वार पाठे )के स्वास्थ्य वर्धक गुणों पर प्रकाश डाल रहे है वे बता रहे है कि एलोवेरा (ग्वार पाठे )मानव शरीर से बिमारियों निकालकर उसे चुस्त दुरुत बनाने के साथ ही लम्बे समय तक जवान बनाए रखता है | लेकिन एलोवेरा में मैंने एक गुण और का पता लगाया है कि एलोवेरा सिर्फ मानव शरीर के लिए ही फायदेमंद नहीं है बल्कि यह हमारे ब्लॉग पर ट्राफिक बढाकर ब्लॉग के लिए भी टॉनिक का कार्य कर सकता है |
आईये आज हम चर्चा करते है एलोवेरा के इसी गुण पर -
रामबाबू सिंह ने ये एलोवेरा प्रोडक्ट के नाम से अभी कुछ दिन पहले ही ब्लॉग मेरे से ही बनवाया था और लगभग दो महीने पहले इस ब्लॉग को कस्टम डोमेन पर ले जाया गया इन दो महीनो में इस नए नवेले ब्लॉग पर आने पाठकों में गूगल से सबसे ज्यादा पाठक आये और इस ब्लॉग की इतने कम समय में अलेक्सा रेंक 5,89,745 हो गयी जो अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है क्योकि अभी तक बहुत से पुराने हिंदी ब्लोग्स है जिन पर नियमित लिखने के बाद भी उनकी अलेक्सा रेंक यहाँ तक नहीं पहुँच पाई | एक नए ब्लॉग पर इतने बढ़िया ट्राफिक आने कारणों का पता लगाने की जिज्ञासा के चलते सोचा कि देखते है इस ब्लॉग पर गूगल सर्च से आने वाले पाठकों की सर्च का रुझान क्या है ?
रामबाबू के ब्लॉग पर गूगल से आने वाले पाठकों द्वारा किये गए सर्च के विश्लेषण से मुझे पता लगा कि वहां आने वाले पाठकों में से ९०% पाठक एलोवेरा के बारे में सर्च करके आये थे | बस उसी वक्त मुझे लगा क्यों न एलोवेरा पर एक पोस्ट लिखकर ज्ञान दर्पण पर भी गूगल से कुछ और पाठक हासिल किए जाए | और इसी बात को ध्यान में रखते हुए कि एलोवेरा ब्लॉग पर ट्राफिक बढ़ाने के लिए एक बढ़िया की-वर्ड है पिछले दिनों २३ जनवरी २०१० को हमने भी ज्ञान दर्पण पर एलोवेरा के नाम से एक पोस्ट ठेल दी और इन आठ दिनों में देखा कि वाकई इस एलोवेरा नाम के की-वर्ड ने ब्लॉग ट्राफिक बढ़ाकर ब्लॉग के लिए भी टॉनिक का कार्य किया है | पिछले आठ दिनों में ज्ञान दर्पण पर गूगल सर्च से आने वाले पाठकों द्वारा सर्च किये मुख्य दस की-वर्ड्स में से एलोवेरा भी शामिल है |
तो जाहिर है एलोवेरा शारीरिक स्वास्थ्य के साथ साथ ब्लॉग के लिए भी एक बढ़िया टॉनिक है , एक बढ़िया की-वर्ड जो गूगल से आसानी से पाठक झटक कर आपके ब्लॉग पर ट्रैफिक बढ़ा सकता है |
एलो वेरा के बारे में महापुरुषों के विचार |ताऊ पहेली-59
1/29/2010 04:04:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
भाग -१ का शेष ........
चित्रगुप्त बिना सिर उठाये कहे जा रहा था -
' काणुजा में जाकर कर्मयोगी की भांति इसने सैन्य संग्रह किया | देश द्रोही और मुग़ल भक्त रतन सिंह इसके आगे नहीं झुका तो इसने उसके गांव आसरलाई की ईंट ईंट बिखेर दी | एक देशद्रोही की संघर्ष हीनता का पाप इसी चंद्रसेन के घोड़ों की टापों से कुचला जाकर हमेशा के लिए समाप्त हो गया | आसरलाई के अवशेष उसकी एक मात्र आत्मा है जो आज भी इस चंद्रसेन जैसे देश भक्तों की खोज में भटक रही है | '
यमराज ने एक 'वाह ' भरी और चित्रगुप्त ने उसकी और उडती निगाहों से देखकर पुन: कहना शुरू किया -
' ऐसे कठिन समय में जब इसके समक्ष भिनाय की जनता ने आकर पुकार कि वे उसके शासक मादलिया के अत्याचारों से त्राहि त्राहि कर रहे है तब ' क्षतात त्रायते ' के मन्त्र को चरितार्थ करता हुआ यह शक्ति व्यय की बिना चिंता किये भिनाय में आ धमका | मादलिया के यहाँ महफ़िल चल रही थी , शराब के दौर में मानवता निगली जा रही थी और अचानक इस चन्द्रसेन की तलवार चमक उठी | प्याले टूट गए , पैमाने लुढ़क गए , सूरा के साथ मादलिया के जुल्मों की कहानी भी सदा के लिए भूमि पर छितरा गयी |'
चित्रगुप्त बिना विश्राम लिए कहे जा रहा था -
किन्तु अकबर की निगाहों में स्वतंत्रता का हर प्रेमी खटकता रहता था | मातृभूमि से प्रेम करना करना उसकी नज़रों में हिन्दुस्तान की बगावत थी और ऐसे ही इस बागी चंद्रसेन को झुकाने के लिए उसने शाहकुली खां को प्रबल सेना के साथ सोजत की और भेजा | इसके भतीजे कल्ला ने बीच में ही फ़ौज को रोक लिया और चंद्रसेन भी आ धमका , कल्ला रायमलोत को शाबासी देने | दोनों सिरियारी के किले की और मुड़े | '
चित्रगुप्त ने गला साफ़ किया -
' बनजारे कोरणे के किले उतरे और वहां भी घमासान मचा | तलवारों से तलवारें इस प्रकार टकरा रही थी जैसे प्रलय की बिजलियाँ परस्पर टकराकर संहार के लिए उतावली हो रही हो | चंद्रसेन और कल्ला लड़ते रहे -लड़ते रहे परन्तु भाग्य सदैव वीरता से डाह किया करता है | विजय युग -निर्माताओं से सदा आँख मिचौनी खेला करती है उस आँख मिचौनी में चंद्रसेन के भतीजे केशवदास पृथ्वीराज और महेशदास शत्रु के हाथ लगे परन्तु वीरता भी ममता के कदमो पर कब सिर झुकाया करती है | '
यमराज मनोयोग से सुन रहा था -
' उसी सिर को झुकाने के लिए शाही फ़ौज सिवाणे की और गई क्योंकि चंद्रसेन अब सिवाणे आ गया था | एक वर्ष तक घेरा रहा | कभी कभी रसद के लिए दो दो हाथ हो जाये करते थे पर अनमी का सिर नहीं झुका |'
चित्रगुप्त कहे जा रहा था -
क्रमश:........
नदी में उगा एक शहर- वेनिस!! : उडनतश्तरी
1/28/2010 07:07:00 AM
Ratan Singh Shekhawat
यमराज बड़े ध्यान से सुन रहा था और चित्रगुप्त बही खाते उलटता हुआ विवरण दे रहा था -
महाराज !
' मारवाड़ के सुप्रसिद्ध योद्धा राव मालदेव का यह छटा पुत्र था | इक्कीस वर्ष की अवस्था में ११ नवम्बर १६६२ को यह जोधपुर की राजगद्दी पर बैठा | आपने इसे केवल उन्नीस वर्ष दिए थे और उन उन्नीस वर्षों में इसने उन्नीस लड़ाइयाँ लड़ी | '
यमराज ने कहा - ' कहे जाओ , मै ध्यान से सुन रहा हूँ |'
'धर्मराज !'
सोजत में इसका भाई राम शासन कर रहा था किन्तु उसकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा जोधपुर पर राज्य करने की थी | स्वतंत्रता को गिरवी रखकर आत्मसम्मान को कुचलता हुआ आने वाली पीढ़ियों के नाम कालिख लगाकर वह अपने अरमानो के चिराग जलाना चाहता था | अपनी मातृभूमि के सम्मान के साथ बलात्कार करने के लिए उसने अकबर के सैन्य बल से नापाक सांठ-गाँठ की परन्तु चंद्रसेन की तलवारों ने उस गठबंधन को तोड़कर सोजत के पतन की कहानी नाडोल तक रंग दी | सोजत दुर्ग का सिर इस महापुरुष के चरणों में भक्तिभाव से झुक गया |'
यमराज ने एक हुनकर भरा और चित्रगुप्त बही खातों पर झुका हुआ सुनाए जा रहा था -
' घायल राम ने फुफकारना शुरू किया | नागौर के शाही हाकिम हुसैन्कुली बेग से मिलकर उसने जोधपुर के किले को घेर लिया | उस दिन संसार भर की निर्लज्जता राम के कंधो पर चढ़कर अट्टहास करने लगी | सोजत का परगना लेकर निर्लज्जता चुप हुई परन्तु राजा राम फिर भी चुप नहीं हुआ |
चित्रगुप्त कहे जा रहा था |
' राम अकबर के दरबार में गया | पीढ़ियों की पाग उसने मुग़ल सल्नत के आगे झुका कर बदले में अपनी ही मातृभूमि को विधवा बनाने की मांग की | शाही फौजों ने फिर जोधपुर को घेर लिया | महाराज ! यह व्यक्ति जो आपके सामने खड़ा है न तो मौत के लिए मरना जानता था और न जिन्दगी के लिए जीना | यह तो चाहता था मौत के लिए जीना और जिन्दगी के लिए मरना | जोधपुर मुगलों का हो गया और चंद्रसेन के घोड़े भाद्राजून की ओर मुड़े |
चित्रगुप्त ने अपने बहीखातों का एक और पृष्ठ पलटा और कहना शुरू किया -
'नागौर में अकबर ने इसे संधि के लिए बुलाया लेकिन घोड़ों को दगवाने की संधि चाहे नाम मात्र की हो किन्तु थी तो अपमान जनक ही | इसने सम्मान पूर्वक जीवन के लिए जोधपुर के राजमहलों की मादक यादगारों , राजकीय ठाठ -बाट के सुनहले स्वप्नों , उमड़ते हुए यौवन के लिए भोग की आग्रह भरी मनुहारों को उसी क्षण लात मार अपनी संतान का सिर ऊँचा किया | अकबर की सेना ने भाद्राजून के किले को घेर लिया किन्तु त्यागी चंद्रसेन ने चमकती तलवारों के बीच पुरुषार्थी की भांति मार्ग बनाकर सिवाणे में अपनी पताका गाड़ दी | '
चित्रगुप्त बिना सिर उठाये कहे जा रहा था -..............
क्रमश :..........
नदी में उगा एक शहर- वेनिस!! : उडनतश्तरीएलोवेरा के संग, लायें जीवन में नया उमंग |
1/27/2010 07:07:00 AM
Ratan Singh Shekhawat
भाग एक का शेष ............
जीती हुई बाजी हारते देख असंख्य शत्रु किले में घुस आये और अंधाधुंध वार चलाने लगे | और खच्च !
कल्ला का सिर धड से अलग हो गया |
सिर चला गया हवा में चक्कर कटता हुआ हाड़ी के पास जो पहले से ही हाथ में नारियल लिए इसी की प्रतीक्षा कर रही था |
चिता जल उठी और नारद जी ने मन मन ही मंत्रार्ध गुन गुनगुनाया -
अजो नित्य : शाश्वतोय्म पुराणों,
न हन्यते हन्यमाने शरीरे |
सिर चला गया और धड दोनों हाथों से तलवारें चला रहा है | एक और कल्ला की तलवारें शत्रुओं के शोणित से अपनी प्यास बुझा रही है और दूसरी और चिता में जलकर राजपूती अपनी प्यास आग में बुझा रही है | एक और व्योम मार्ग पर दो पथिक अनंत पथ की यात्रा पर बढ़ते आ रहे है हाथ में हाथ लिए , मुस्कराते हुए कभी कभी मुड़कर देखते है अपने ही बहे हुए रक्त को और अपनी ही जलती हुई चिता को | दूसरी और मृत्यु लोक में एक अमर कहानी ख़त्म हो रही है -सदा के लिए ,सदा सर्वदा के लिए |
स्वर्ग में गन्धर्वो के तानपुरे सहसा झनझना उठे | अप्सराओं के घुंघरू तबलों की थप्पी के साथ एक साथ छनछना उठे | सोमरस के प्याले में प्रेम भरी मनुहारें चलने लगी | शंख और दिव्य शहनाईयों में परस्पर वार्तालाप होने लगे | देवताओं की स्वागत भरी निगाहें परस्पर ले दे रही थी | नारद जी ने मुंह मोड़कर देखा तो कल्ला खड़ा है , मरा नहीं और हाड़ी भी जली नहीं , सामने खड़ी है |
नारद जी ने अपनी शंका का स्वयं ही समाधान किया - ' ऐसी जिन्दगी भी क्या कभी जल मर सकती है ? मरती तो केवल छाया है -छाया |' आँखों को अर्ध्मुन्दी कर मग्न होकर नारद ने वीणा बजाना शुरू किया | अप्सराओं को ऐसे ओजपूर्ण ,शूरवीर और तेजस्वी वर के गले में वरमाला डालने का साहस नहीं हो रहा था | फिर भी स्वर्ग सनाथ हो गया और धरती अनाथ क्योंकि धरा का पति कल्ला आज धरा को छोड़ कर स्वर्ग में चला आया था |
अकबर के दरबार तो बाद में भी लगे है , कई शहंशाहों के ठाठ बने और उजाड़ गए पर भरे दरबारों में मूंछ पर हाथ देने का साहस किसी को नहीं हुआ क्योंकि एसा तो केवल कल्ला ही था जो कभी लौटकर नहीं आया |
मूंछो वाले तो आज भी बहुत है , लेकिन वह पानी कहाँ मुछ का , वह अलबेला बांकापन कहाँ जो सल्तनतों तक को चुनौती दे सके | मूंछों की तो मरोड़ ही कल्ला रायमलोत के साथ चली गई |
रूप की प्यास बुझाने के लिए अल्लाउद्दीन चितौड़ पर और औरंगजेब रूपनगर पर चढ़ आया था पर मौत की मजाक उड़ाकर अकबर की प्यास को अंगूठा दिखाने वाला कल्ला रायमलोत ही था | मौत की अब कौन मसखरी करे , कल्ला जो चला गया |
पृथ्वीराज ने तो बाद में भी कविताएँ की है , कई रसिक महाकवि भी बन गए , नै भाषाओँ ने जन्म लिए और नई कल्पनाओं ने उड़ाने भरी है पर वह शमा ही कहाँ ,वह प्रवाह ही कहाँ , और वह सौष्ठव भी कहाँ ? उन्हें तो पात्र ही नहीं मिलता क्योंकि कविताएँ धरती पर रह गई और उनका पात्र कल्ला स्वर्ग जो चला गया |
युद्ध भी होंगे , वीर भी जन्मेंगे , धरती कभी निर्बीज नहीं हुई है | सिर भी कटेंगे और कटने के बाद भी लड़े है , बोटी बोटी कटने पर झुझते हुए दिखाई देंगे परन्तु हाथियों के चक्कर करने वाला और घोड़ों की टाँगे पकड़कर फेंकने का दृश्य कभी नहीं देखा , कल्ला रायमलोत जो चला गया |
मरुधरा की सूखी और भूखी धरा वर्षों से प्रतीक्षा कर रही है , सिवाणे का उपेक्षित और उजड़ा हुआ किला अब भी दहाड़ मार रहा है , कोई हमारी भी प्यास बुझाओ , कोई हमें भी सनाथ करो , तब वर्षा की कंजूस फुहारें उदारता का स्वांग रचकर फुसलाने की चेष्ठा करती है लेकिन इन पत्थरों पर लिखी हुई अमिट कविताओं की आग न कभी शांत हुई है और न कभी शांत होगी | कल्ला रायमलोत लौट के आने का नहीं और धरा और धर्म की मांग पूरी होने की नहीं |
कल्ला रायमलोत के वियोग में यहाँ की वनस्पति सुख गई है , फिर भी उसकी आँखों में कातरता के जलप्रपात ढुलक रहे है | जिसकी तलवार से आसमान के सितारे टूट गए थे ,मरने के बाद भी जिसकी भुजाएँ अपना कर्तव्य निभा रही थी , जिसकी यादगार आज भी कर्तव्य की याद दिला रही है ,याद दिला रही है कि वह भी एक क्षत्रिय था |
चित्रपट चल रहा था और दृश्य बदलते जा रहे थे |
स्व. श्री तनसिंह ,बाड़मेर की कलम से
भूत प्रेत और अलोकिक शक्तियांताऊ डॉट इन: ताऊ पहेली - 58 : विजेता श्री प्रकाश गोविंदएलोवेरा के संग, लायें जीवन में नया उमंग
1/25/2010 05:55:00 AM
Ratan Singh Shekhawat
चित्रपट चल रहा था दृश्य बदलते जा रहे थे उन्ही दृश्यों में .......
आज स्वर्ग में बड़ी हलचल थी . इतर का छिडकाव हो रहा था , मंडपों को अलंकृत किया जा रहा था ,गन्धर्व अपने अपने तान्पुरों के तार कास रहे थे ,अप्सराएँ सोलह श्रृंगार में व्यस्त थी | मेनका सबसे प्रोढ़ थी किन्तु उसने तो आज ऐसी सज्जा बना ली थी जैसे उसी विश्वामित्र ऋषि को दुबारा छलने जा रही हो | उर्वशी को अपने सुकुमार सोंदर्य का भरोसा था फिर भी उसका प्रतिबिम्ब दर्पण से बार बार पूछ रहा था - 'कौन प्रतिस्पर्धा में विजयी होगा ?' जब दर्पण मूक ही रहा तो उर्वशी भी मनोयोग से अम्लान पुष्पों की माला गूंथने में सलंगन हो गई | तिलोत्तमा को अपने नृत्य पर भरोसा था इसलिए वह घुन्घुरुओं को ठीक कर रही थी | चारों और झमक झमक और ता-तुन हो रही थी | इंद्र देव अपने सोमरस के घड़ों को सुव्यवस्थित कर रहे थे | जीन कसा हुआ उच्चेश्र्वा (घोडा) शायद किसी की सवारी के लिए उतावला हो कर हिन् हिना रहा था | एरावत हाथी पर शहनाईयां और नगारे बजाने के हौदे कसे जा रहे थे | इतने में ही ब्रह्मऋषि नारद खडाऊ पहने खट्ट-खट्ट करते हुए ' नारायण -नारायण ' बोलते आ धमके | उनका किसी ने अभिवादन तक नहीं किया | थोड़े अप्रतिभ होकर फिर स्वस्थ होकर इंद्र से पूछने लगे -
' सुरराज ! आज तो बड़ी तैयारियां हो रही है | वह कौन भाग्यशाली है जिसके लिए इतनी व्यस्तता है ,समूचे के समूचे स्वर्ग में ?'
बिना नारद को देखे देवराज इंद्र ने अपने सोमघटों पर नजर दौड़ते हुए कहा -
' तो क्या ऋषिराज ! आपको कुछ भी मालूम नहीं ?
' नहीं तो !'
' आज यहाँ कल्ला रायमलोत आ रहा है | '
इतना कहकर इंद्र ने नारद की और एक उडती हुई निगाह फेंकी |
' यह कल्ला रायमलोत कौन है ? '
' उसका परिचय तो सरस्वती ही दे सकती है ,पर हाँ ! इस समय मृत्यु लोक में उसके हाथ उसका परिचय दे रहे है | स्वयं ही देख लीजिए न |'
नारद जी खटाक-खटाक कर चलते हुए स्वर्ग के एक-एक वातायन को खोल कर नीचे मृत्यु लोक को झांक कर देखने लगे |
कल्ला रायमलोत लड़ रहा है जिसकी मूंछे भोंहों से भिड़ी हुई है | केसरियां वस्त्र धारण किये यंत्र वत तलवार चला रहा है |
खच्च !
हाथी का झटका हो गया -
खच्च !
एक शत्रु के कंधे में तलवार घुसी और उसके घोड़े को पार कर करती हुई निकाल गई -
खच्च !
एक मुगाक की दाड़ी को काटती हुई ,रक्त पीते , पीठ फाड़ कर बाहर निकाल गई -
नारद की अंगुली वीणा के एक तार से अनजाने ही उलझ गई -
तुन -तुनन ......तुन .........|
खच्च ! खच्च !!
मुगलों के दो सिर इस प्रकार गुड़क गए जैसे किसी सन्यासी की फटी झोली से दो तुम्बे धरती पर गिर गएँ हो |
किले का भेदिया नाई मुग़ल सेनापति के साथ किले में घुस आया | और खच्च -
तलवार के एक ही वार से नाई को अमर लोक मिल गया और सेनापति -' ला हौल विला कुव्वत ' कहता हुआ भाग गया |
धडाधड मुग़ल सैनिकों ने किले में प्रवेश किया और कल्ला रायमलोत को घेर कर लड़ने लगे |
खचा -खच , खचा -खच | खच्च !!
शत्रुओं के सिर ऐसे बिखर गए जैसे तूफान में खेजड़ी के खोखे |
नारद जी के चहरे पर मुस्कराहट फ़ैल गई |
क्रमश :
ब्लाग हिट कराऊ एवम टिप्पणी खींचू तेलमत पूछै के ठाठ भायला - कविताएलो वेरा जैली ( Aloe Vera Gelly ) खुबसूरत त्वचा के लिए |
1/23/2010 06:28:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
पिछले दशक से स्वस्थ और स्वास्थ्य सम्बन्धी जीवन शैली सबसे ज्यादा चर्चा और ज्यादा गौर किये गए विषयों में से एक है | स्वस्थ रहने और फिट जीवन जीने के लिए होलिस्टिक तरीका अपनाना एकदम नया मन्त्र है स्वस्थ वसा -मांसपेशियों के अनुपात को बनाए रखने वाले सुरक्षित ,पोष्टिक और प्रभावशाली विकल्पों की लगातार बढती मांग ने स्वास्थ्य देखभाल और पोष्टिक आहारीय पूरको के उत्पादन में लगी कम्पनियों , इनका विपणन करने वाले व्यक्तियों व इन्ही पोष्टिक आहारों के कृषि उत्पादों में लगे किसानो के लिए अवसरों के नए द्वार खोल दिए है |
इन्ही पोष्टिक आहारीय पूरकों में एलेवेरा (गवार पाठा ) का नाम आजकल सबसे ज्यादा चर्चित है | बाजार में एलोवेरा के उत्पादों के कई निर्माता लगे है जिनमे बाबा रामदेव व फॉरएवर लिविंग प्रोडक्ट मुख्य है | इनके उत्पादों में स्वास्थ्य को तंदुरुस्त बनाये रखने वाले उत्पादों के साथ साथ एलोवेरा जेल से बने सोंदर्य प्रसाधन के उत्पाद भी शामिल है | शहरों के अनियमित दिनचर्या जीने वालों के लिए एलोवेरा का रस किसी अमृत से कम नहीं है आईये आज चर्चा करते है इसी चर्चित स्वास्थ्य वर्धक एलोवेरा के बारे में -
एलोवेरा लिलेक परिवार का पौधा है जिसका उपयोग मनुष्य हजारों वर्षों से करता आ रहा है | दुनिया में २०० से अधिक प्रकार की किस्मो का एलोवेरा पाया जाता है | इसमें एलो बाबिड़ेंसिस को मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए सबसे ज्यादा लाभदायक मन जाता है | इस पौधे का रस बुढ़ापा प्रतिरोधी तत्व है | इसके प्रयोग से इंसान लम्बे समय तक अंदरूनी और बाहरी तौर पर जवान बना रह सकता है | पौधे का सबसे ज्यादा महत्वपूरण है इसका रस जिसे बाजार में एलो जेल के नाम से जाना जाता है | एलोवेरा का रस इसके पत्तों से तब निकला जाता है जब पत्ते तीन साल के हो जाते है | तभी उस रस में अधिकतम पोष्टिक तत्व मौजूद होते है | गवार पाठे का पौधा गरम और खुश्क जलवायु में पनपता है इसे ज्यादा खाद या सिंचाई की जरुरत नहीं होती | किसान अपनी खेतों के मेड़ों पर व बंजर पड़ी भूमि में भी इसकी खेती कर सकते है |
एलो के पौधे को संस्कृत में कुमारी कहते है इसके अलावा इसे भारत के विभिन्न भागों में इसे कई नामों से जाना जाता है जैसे - ग्वार पाठा , कलामांडा , चित्र कुमारी ,धृत कुमारी , कार गंधक , लालेसरा ,कट्टर वाजा ,कुमार पट्टू , सिरु , कान्तिकुदोर ,कोरफेड आदि आदि | अपने बहुत से फायदों की वजह से एलोवेरा को चमत्कारी पौधा कहा जाता है | ग्रामीण लोग इसके चमत्कारों से वाकिफ होने के चलते इसका आसानी से बहुत से रोगों में प्रयोग करते है |
इसके रस में १८ अमीनो एसिड ,१२ विटामिन और २० खनिज पाए जाते है इसके अलावा कई अन्य अनजाने यौगिग तत्व भी इसमें पाए जाते है | इसके पत्तो से रस निकाल कर या इसका रस जिसे एलो जेल कहा जाता है बाजार से खरीदकर पिया जा सकता है | इसके रस को उबलब्ध तमाम स्वास्थ्य वर्धक पोष्टिक पूरकों में से सर्वश्रेष्ठ पूरक माना जाता है | प्राकृतिक उत्पाद होने के कारण न तो इसका कोई साइड इफेक्ट होता है और न ही इसके प्रयोग से कोई व्यक्ति इसका आदि होता है बल्कि यह जैविक रूप से शरीर के लिए एकदम उपयुक्त होता है | इसके रस के सेवन से जहाँ बीमार व्यक्ति अपना स्वास्थ्य ठीक कर सकता है वहीँ स्वस्थ व्यक्ति इसके सेवन से अपने स्वास्थ्य को बनाए रखकर अधिक समय तक जवान बना रह सकता है |
स्वास्थ्यवर्धक और गुणों से भरपूर एलोवेरा व उसके उत्पादों व विभिन्न बिमारियों में इसके उत्पादों के इस्तेमाल व ज्यादा जानकारी के लिए आप स्वास्थ्य सलाहकार रामबाबू सिंह से admin@aloe-veragel.com पर संपर्क कर सकते है या उनके ब्लॉग पर जाकर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते है |
ब्लाग हिट कराऊ एवम टिप्पणी खींचू तेलगांव का लाल छाया इटली के अख़बारों मेंशकीरा को नाचते हुए देखिये गुजराती गाने पर
1/22/2010 08:53:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
1/22/2010 05:25:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
भाग -१ ,भाग-२ , भाग-३ का शेष ...............
वैध ने गिडगिडाकर कहा - ' महाराणा ! यह बातें सब बातें छोड़ दीजिए , ईश्वर का नाम लेने का समय आ गया है | '
'अच्छी बात है | हे प्रभु ! हे ईश्वर एकलिंग नाथ ! मुझे मोक्ष मत देना | वापस इसी संसार में इसी देश में भेजना | बाबर द्वारा दी गई पराजय मेरे हृदय को कचोट रही है , मैंने प्रतिज्ञा की है कि जब तक बाबर को नहीं जीतूँगा चितौड़ नहीं जाऊंगा | मैंने वेदना के सागर में निराशा की पतवारें लेकर इस जीवन के कुछ दिन रणथम्भोर में बिताये , केवल इस उम्मीद में कि जब तुम मेरी पुकार सुनोगे | आज मुझे मेरा चितौड़ बुला रहा है , रणभूमि बुला रही है , बाबर से बदला लेने की बात याद आ रही है और मै जीवन में पहली बार कृपाकांक्षी बनकर तेरी देहली पर पड़ा हूँ | काश , तुम एक बार मुझे लौटा सकते | परन्तु मै जनता हूँ तुम होनहार का बहाना करोगे , मेरे प्रारब्द को दोष दोगे , काल और मर्यादा की बात कहोगे परन्तु यह कभी नहीं कहोगे - उठो सांगा ! तुम्हे तुम्हारा कर्तव्य बुला रहा है | खानवा के युद्ध क्षेत्र में घोड़ों की टापें तुम्हे याद कर रही है |'
' यह क्या ? ओह ! आपने तो मेरे लिए स्वर्ग से विमान भेजा है - नहीं नहीं , मै जीवन भर घोड़े की पीठ पर चढ़ा हूँ | हाथ पैर टूटने के बाद भी पालकी में नहीं बैठा | मेरे लिए घोड़े भेजो , मै स्वर्ग की गली और घाटियों में घोड़े दौड़ाउंगा -
बङगङां बङगङां बङगङां |
और
बङगङां बङगङां बङगङां |
महाराणा रह गए और सांगा की आत्मा पवन के घोड़ों पर चढ़कर चली गई | आकाश मार्ग में अब भी टापें सुनाई दे रही है | चितौड़ दुर्ग अब भी महाराणा सांगा की प्रतीक्षा कर रहा है - ' कब आयेंगे सांगा ? बाबर को हराने की प्रतिज्ञा पूरी करने | ' दूसरी और मेवाड़ से कोसों दूर सांगा की देह मातृभूमि के लिए तरसती तरसती चिता में जल-जल कर राख हो गई | तीस जनवरी , १५२८ को इस बांके वीर की दर्दनाक कहानी लिखते लिखते विधाता की कलम का कलेजा चूर-चूर हो गया | उससे साढ़े सात माह पहले फतह पुर सीकरी से दक्षिण पश्चिम में १० मील दूर सन १५२७ की मार्च की १६ तारीख के दिन खानवा के युद्ध क्षेत्र में दौड़ते-दौड़ते घोड़े थक गए परन्तु अब भी हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप चढ़े हुए है और उनके घोड़े दौड़ रहे है |
बङगङां बङगङां बङगङां | बङगङां बङगङां बङगङां |
हल्दीघाटी के घोड़े भी दौड़ते दौड़ते थक गए पर महाराणा राज सिंह अब भी चढ़े हुए है और औरंगजेब से युद्ध करने के लिए उनके घोड़े दौड़ रहे है |
बङगङां बङगङां बङगङां |
महाराणा राज सिंह के घोड़े भी थक गए पर महाराणा फतह सिंह के अब भी चढ़े हुए है और दिल्ली से लौटते हुए उनके घोड़े दौड़ रहे है |
बङगङां बङगङां बङगङां
महाराणा फतह सिंह के घोड़े भी थक गए पर कई कर्मवीर अब भी चढ़े हुए है कर्मक्षेत्र में उनके भी घोड़े दौड़ रहे है -
बङगङां बङगङां बङगङां |
और यह बङगङांट अब भी याद दिला रही है कि किसी दिन खानवा के युद्ध क्ष्तेत्र में भी घोड़े दौड़े थे -
बङगङां बङगङां बङगङां |
और यह भी याद दिला रही है कि उन घोड़ों को दौड़ाने वाले मेवाड़ के महाराणा संग्राम सिंह भी एक क्षत्रिय थे |
चित्रपट चल रहा था उअर दृश्य बदलते जा रहे थे |
समाप्त |पूज्य स्व.श्री तनसिंह जी की कलम से ...
ब्लाग हिट कराऊ एवम टिप्पणी खींचू तेलशकीरा को नाचते हुए देखिये गुजराती गाने परएलो वेरा जैली ( Aloe Vera Gelly ) खुबसूरत त्वचा के लिए |
1/21/2010 05:38:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
भाग १ व
भाग २ से आगे .........
' किसका इलाज करोगे वैद्यजी ? विष का प्रभाव संभवत: आप हटा सकते है | शरीर पर लगे अस्सी घाव भी आपने ठीक किये है परन्तु मेरे दिल के घावों का उपचार करोगे ? उनमे तो अब मवाद पड़ गई है | वैद्यजी अब तो मेरे उपचार के लिए स्वयम यमराज को ही आना होगा | कृपा कर उन्हें शांति के साथ आने दो | मै उनकी प्रतीक्षा में हूँ परन्तु जब तक वह न आये तब तक दो क्षण उन घोड़ों की आवाज सुनने दो जो खानवा के रणक्षेत्र में दौड़ रहे है '-
बङगङां बङगङां बङगङां |
'राणा जी ! आपके कान आपको धोखा दे रहे है |'
' क्यों नहीं देंगे ? मेरे सगे सम्बन्धियों ने धोखा दिया , मेरे साथी ने धोखा दिया , राजपूत सिपाही ने धोखा दिया | और मेरे सरदारों ने भी ऐसे कठिन समय में मुझे धोखा दिया , फिर यह कान मुझे धोखा क्यों नहीं देंगे ? परन्तु मैंने आज तक किसी को धोखा नहीं दिया | मैंने न इतिहास को धोखा दिया और न कर्तव्य को | मैंने उन असंख्य साथियों को भी धोखा नहीं दिया जिन्होंने मेरे कंधे से अपना कन्धा मिलकर मरने और जीने के भयानक जुए में अपने जीवन और सर्वस्व की बजी लगा दी थी |'
'महाराणा ईश्वर का नाम लीजिए |'
ईश्वर का नाम ! ह ह ! विजयी और महाराणा कुम्भा का उत्तराधिकारी पराजय का मुंह देखकर ईश्वर का नाम लेगा ? मै हार कर ईश्वर का नाम नहीं लिया करता , जीत कर उसके चरणों में सिर झुकाता हूँ | हार कर ईश्वर के सामने जाने में मुझे लज्जा आती है | हार कर मै स्वर्गस्थ विजयी पूर्वज महाराणा कुम्भा के समक्ष कैसे जाऊंगा ? मै लज्जित हूँ | जाने से पहले विजय स्तम्भ को तोड़ दो , मेवाड़ का इतिहास फाड़ दो , चितौड़गढ़ की एक एक ईंट को बिखेर दो , राजपूतों का सारा वंश मिटा दो , तब मुझे मरने में कोई लज्जा नहीं आएगी | फिर खानवा के रणक्षेत्र के घोड़े बड़ी शान से स्वर्ग की और मुड़ेंगे '-
बङगङां बङगङां बङगङां |
क्रमश :....................
मदिरा समाज और संस्कार दोनों के लिए अभिशाप है | "कवि चोर करेलवी कैसे कहलायेंगे"?लगाइए सर्च को धार - रिफाइन सर्च के चंद फॉर्मूले
1/19/2010 08:36:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
भाग १ से आगे ....
' महाराणा ! मेवाड़ के सरदार आए है , आपके चरणों का कुशल पूछने |'
'उन्हें कह दो लौट कर चितौड़ चले जाएँ और कुशल पूछें अपनी आयु और परिवार का | मुझपर सारंगदेव का अहसान था | पृथ्वीराज और जयमाल ने मुझ पर आक्रमण किया था तब उस स्वामिभक्त साथी ने उसके वार को अपने ही सिर पर ले लिया | अपने पुत्र लिम्बा को उसने मेरे लिए खोया | शरीर पर ३५ घाव लगे और अंत में बाठरडे देवी मंदिर में कपट से पृथ्वीराज के हाथों मारा गया | मेरी स्वामिभक्ति उसे कितनी महंगी पड़ी , पर मै अभागा तो अपने हित चिंतकों के अहसान भी नहीं उतार सका | इन कायर सदारों ने मेरी आयु पर डाका डाल दिया | काश ! मै स्वामिभक्त सारंगदेव की समाधी पर दो आंसू ही बहा सकता ! जाओ सरदारों ! मेवाड़ के मगरों पर खरगोशों की शिकार खेलो ! देखो , बचो , बचो ! किसी घोड़े की फेंट में आ गए तो यही रह जावोगे | यहाँ घोड़े दौड़ रहे है -घोड़े ! खानवा के युद्ध क्षेत्र में दौड़ते जा रहे है '-
बङगङां बङगङां बङगङां |
'मेवाड़ जैसी पवित्र भूमि पर तुम्हारे जैसे कायर सरदारों के पाप को मैंने अपने शरीर पर लगे अस्सी घावों के रक्त से धोने की चेष्टा की है | परिस्थितियां चाहे किसी प्रकार की हों मुझे निराश नहीं कर सकती | मेरी एक आँख गई , एक हाथ कटा , एक पैर कटा , एक पैर टूटा परन्तु मेरा दिल नहीं टूटा | मैंने असम्भव को संभव कर दिया , सिंहों को साथ कर दिया ,बिछुड़े हुओं को मिलाकर अनेकों को एक कर दिया | परन्तु अफ़सोस .............!
इतना कहकर महाराणा सहसा कराहने लगे | बड़ा मार्मिक था उनका कराहना | आँखों में एक आंसू छलक कर बहने की तैयारी करने लगा |
' क्यों अन्नदाता ! किसी घाव में पीड़ा हो रही है क्या ? आपकी आँख का यह आंसू कहीं आपकी महानता ..............|'
मेरे शरीर पर तो ऐसी कोई जगह नहीं बची है जहाँ घाव नहीं हो | पर आज एक नया घाव उभर आया है | उस घाव में खून नहीं नहीं निकल रहा है . पानी निकल रहा है पानी ,और उस पानी से मेरे अरमानों की तस्वीर गल गल कर आँखों में आ रही है | वह देखो , विभीषण जा रहा है | तीस हजार घुड सवारों के साथ बड़ी बेशर्मी से बाबर की और जा रहा है और खानवा के युद्ध क्षेत्र में उसके देशद्रोही घोड़े दौड़ रहे है '-
बङगङां बङगङां बङगङां |
महाराणा की आँख का उमड़ा हुआ आंसू हिम्मत कर आखिर ढुलक ही पड़ा |
'अन्नदाता ! हिम्मत मत हारिये |
महाराणा ने झट से विवशता को पोंछ डाला | बोले - ' हाँ ,ठीक कह रहे हो ! मै हिम्मत कैसे हारूँ | यह कठिन समय मेरी हिम्मत की परीक्षा का समय है | अब मुझे खुद को लड़ना है | लाओ मेरा घोडा | इस पर तो जीन भी नहीं है | परवाह नहीं | यह लो सवार हो गया | अब खानवा के युद्ध क्षेत्र में महाराणा संग्राम सिंह का घोडा दौड़ेगा | '
राणा सांगा शय्या त्याग कर एक घुड़सवार से झूमते दौड़ने लगे | लोगों ने दौड़कर बड़ी कठिनाई से उन्हें पकड़ लिया
क्रमश:..........
"कवि चोर करेलवी कैसे कहलायेंगे"?संतुलित आहार बेहतर कल के लिए |इंटरनेट की स्पीड बढ़ाने का जुगाड़
1/18/2010 09:25:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
साम्राज्य और स्वतंत्रता के बीच निर्णायक संग्राम चल रहा है और खानवा के युद्ध क्षेत्र में घोड़े दौड़ रहे है |
बङगङां बङगङां बङगङां |
' परन्तु मै कैसे सो रहा हूँ , कहाँ हूँ मै ? '
' महाराणा आप कालपी ग्राम के शिविर में है |'
'नहीं , गलत है | यह कैसे हो सकता है ? मेरे बिना खानवा के युद्ध क्षेत्र में फिर किसके घोड़े दौड़ रहे है |'
विष का प्रभाव अपनी सीमाएं लांघ चूका था | महाराणा सांगा के अधूरे अरमान पश्चातापों की बेबसी पीकर बावले हो उठे थे | खानवा का युद्ध उनके भाग्य की अभागी भूल के रूप में उनकी अंतिम स्मृति पर छा रहा था | परन्तु किसी को यह कहने का साहस नहीं हुआ कि खानवा के युद्ध क्षेत्र में दौड़ते हुए घोड़े शाश्वत थकान से हार कर उसी क्षेत्र में चिर विश्राम कर रहे है |
'बेचारी चारणी ने सच ही कहा था कि मेवाड़ का राज मुकुट इसे ही मिलेगा पर मेरे बड़े भाइयों को यह सहन नहीं हुआ | वे मुझ पर अकारण ही टूट पड़े | वे बड़े थे , मै उन पर वार कैसे कर सकता था ? मेरी एक आँख फूट गयी परन्तु उस फूटी हुई आँख से मुझे देश के होनहार का कुटिल व्यंग्य दिखाई दे रहा था , इसलिए मै उस भ्रातृप्रेम को काटना नहीं चाहता था | मै एक्य और संगठन चाहता था | भारत को आजाद देखना चाहता था | मैंने भाग कर वह लड़ाई बंद की | लोग मुझे कायर कहेंगे पर मुझे तनिक भी चिंता नहीं , क्योंकि मैंने उस संगठन को क्रियात्मक रूप से कर दिखाया जिसका कि मै हिमायती था | इसलिए तो खानवा के युद्धक्षेत्र में आज इतनी अधिक संख्या में घोड़े दौड़ रहे है |'
बङगङां बङगङां बङगङां |
' महाराणा .........................!"
'मेरी यह विजय कितनी महान होगी क्योंकि इसे महान बनाने में स्त्रियों ने अपने गहने बेचकर द्रव्य दान दिया | सभी रजवाड़ों के राजा ही नहीं , नगर-नगर , गांव-गांव और झोंपड़ी-झोंपड़ी से चल फिर सकने वाले प्रत्येक राजपूत ने इसे महान बनाने के लिए सहयोग दिया | आज यह फ़ौज मेवाड़ की फ़ौज नहीं ,समस्त राजपूतों है , समूचे भारतवर्ष की फ़ौज है , विदेशी शासकों को भगाने के लिए स्वतंत्रता-प्रेमी देश भक्तों की फ़ौज है | देखो खानवा के युद्ध क्षेत्र में इन देशभक्तों के घोड़े कितने उत्साह से दौड़ रहे है |
बङगङां बङगङां बङगङां |
' महाराणा ! जरा शांत रहिए !'
हं हं ! शांत रहिए ! क्या यह शांति का समय है ? यह मेरी मातृभूमि , मेरी कौम और मेरी परम्परा के जीवन और मृत्यु का समय है | मेरे समस्त जीवन के प्रयासों के फलीभूत होने का तो समय ही अभी आया है | यह शांति की वेला नहीं क्रांति की बेला है | देख नहीं रहे हो ,क्रांति के हरकारों की तरह खानवा के युद्ध ख्सेत्र में घोड़े दौड़ रहे है |
बङगङां बङगङां बङगङां |
' इन बातों को बीते हुए तो सात माह हो गए , महाराणा !'
' हाँ, हाँ , सात दिन ही तो हुए है ! बाबर की घिग्घी बंध गई | उसके संधि प्रस्ताओं को मैंने ठुकरा दिया | स्वतंत्रता की संधियाँ नहीं हुआ करती | गुलाम लोग अपनी संघर्ष हीनता और कायरता के कारण सिद्धांतों का समझौता करते है | सात ही दिन हुए - निराश होकर बाबर ने प्याले तौड़ डाले | उसने कुरान को हाथ में लेकर शपथ खाई है कि मै कभी शराब नहीं पिऊंगा , पांच वक्त नमाज पढूंगा और ईमान रखूँगा | वह शराब नहीं पिएगा ,पांच वक्त नमाज भी पढ़ेगा और इमानदार भी बना रहेगा पर तब तक , जब तक खानवा के युद्ध क्षेत्र में हमारे घोड़े दौड़ते रहेंगे |'
बङगङां बङगङां बङगङां |
' महाराणा ! पानी पियेंगे ?'
'पानी नहीं , खून पीना चाहता हूँ खून ! बाबर की छाती का खून पीना चाहता हूँ | ला सकते हो क्या ? मेरी प्यास न पानी से बुझने वाली है और न आंसुओं से | पृथ्वीराज की फोड़ी गई आँख से बहता हुआ खून , तैमूर के अत्याचारों से बहता हुआ आर्य रक्त मूलधन सहित ब्याज चाहता है और मैंने इसी ब्याज को चुकाने के लिए बाबर पर उस वक्त आक्रमण किया था जब वह इब्राहीम लोदी से लड़कर थक गया था | मैंने ठीक समय पर वार किया था | मेरे घोड़ों की टापें समय की पहचान जानती है | यदि भाग्य को वीरों की पहचान नहीं है तो इसमें मेरा क्या दोष ? मेरे घोड़े तो भाग्य से जूझने के लिए खानवा के युद्ध क्षेत्र में दौड़ रहे है '-
बङगङां बङगङां बङगङां |
क्रमश:...................
ताऊ पहेली - 57 विजेता श्री उडनतश्तरीआँखों की रौशनी को रखें हमेशा जवान दरद दिसावर
1/14/2010 05:58:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
दुर्भाग्य का सहोदर भाग १ का शेष
एक ओर सात और दूसरी ओर ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बीच जीने और मरने की बाजी लग रही है | महाभारत का युद्ध चल रहा है | शस्त्र झनझना रहे है और शंख व रणभेरियाँ बज रही है |
यह कर्ण महारथी भी है |
' जब वह रणभूमि में उतरता है तो ऐसा लगता है जैसे कोई कुशल कथावाचक वीर रस के किसी किसी सरस छंद का मनोयोग से पाठ कर रहा हो ; जैसे कोई उलझी हुई समस्या वर्षों से प्रयास के बाद अपना ही हल निकलने जा रही हो ; जैसे ईश्वर का अचूक अभिशाप अपने दुर्दिनों के दुर्भाग्य को पीस डालने के लिए बाहें चढ़ा रहा हो | जब उसके तरकश के बाण निकलते थे तो एसा प्रतीत होता था जैसे मोहमाया से हरे भरे संसार पर क्रुद्ध होने के कारण प्रलय की आँखों में चिंगारियां निकल रही है , जैसे संकट के समय जल्दी में आये भगवान् विष्णु के बुलाने पर गरुड़ परिवार पंख लगे हुए पर्वत की तरह उड़ रहा हो |
' कलिंगराज चित्रांगद की राजकन्या के स्वयंबर में राजकन्या के अपहरण पर दुर्योधन की इसी अकेले वीर ने सैकड़ों राजाओं से रक्षा की , जिसके आगे त्रिलोकीनाथ ने भाग कर अपना नाम रणछोड़ दास करवाया था , उसी मगधराज जरासंघ को इसी कर्ण ने बाहुकंटक युद्ध से व्याकुल कर वश में कर लिया था |
' उसकी बाण वर्षा में इतना बल होता था कि तीनो लोकों का भार लिए सारथी रूप कृष्ण और गरुड़ध्वज सव्यसाची अपने रथ सहित कई कदम पीछे हट जाते थे |
' परन्तु दुर्भाग्य उसका सहोदर था | ऐसे कठिन और महत्त्वपूर्ण अवसर पर उसके रथ के पहियों को धरती ने निगल डाला और इसी प्रयास में उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा | '
एक ओर सात और दूसरी ओर ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बीच जीने और मरने की बाजी लग रही है | महाभारत का युद्ध चल रहा है | शस्त्र झनझना रहे है और शंख व रणभेरियाँ बज रही है |
यह कर्ण दानवीर भी है |
' प्रात:काल इसी का नाम आज तक लिया जाता है |
इसके द्वार से न कोई निराश एयर न कोई खाली हाथ लौटा | नित्यप्रति अपने समस्त स्वर्ण का दान तो इसका नित्त्यकर्म था किन्तु आई हुई विजय ,कमाई हुई शक्ति और अमर जिन्दगी तक का भी बिना शिकन दान कर दिया |
' देवराज इंद्र जब स्वार्थी होकर अपने पुत्र अर्जुन की रक्षा के लिए दिव्य कुंडल और कवच प्राप्त करने आये तो अपने पिता सूर्य भगवान की चेतावनी के बावजूद भी वह ना नहीं कहा सका |
अपने ही प्रबल शत्रु के लिए उसकी उपेक्षा करने वाली माँ अभयदान लेने आई तब वह ना नहीं कर सका , और .................|
जीवन की संध्या के समय परीक्षा के लिए कृष्ण और अर्जुन ब्राह्मण वेष धारण कर युद्ध की घायलावस्था में स्वर्ण मांगने आये तब उसने अपने दांत तोड़ कर उसमे लगी स्वर्ण मेखों का दान किया |
' परन्तु दुर्भाग्य उसका सहोदर था | ऐसा श्रेष्ठ पुरुष होकर भी दुर्योधन के पक्ष की ओर चला गया इसलिए वेद व्यास ही नहीं , आज भी उसकी सभी उपेक्षा करते है | '
' परन्तु कौन नहीं जनता कि कर्ण भी एक क्षत्रिय था | '
एक ओर सात और दूसरी ओर ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बीच जीने और मरने की बाजी लग रही है | महाभारत का युद्ध चल रहा है | शस्त्र झनझना रहे है और शंख व रणभेरियाँ बज रही है |
चित्रपट चल रहा है और दृश्य बदलते जा रहे थे |
पूज्य स्व. श्री तन सिंह जी द्वारा लिखित
ताऊ....वो जो हम मे तुम मे करार था.....?दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे..Food Supplement आपके स्वस्थ्य जीवन का प्रतीक |
1/13/2010 08:33:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
एक ओर सात और दूसरी ओर ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बीच जीने और मरने की बाजी लग रही है | महाभारत का युद्ध चल रहा है | शस्त्र झनझना रहे है और शंख व रणभेरियाँ बज रही है |
यह कष्ट सहिष्णु कर्ण है |
' परशुराम से ब्रह्मास्त्र की विधि सिखने ब्राह्मण का वेश धारण कर गुरु का कृपा-भाजन बना | एक दिन गुरु इसकी जांघ पर सिर देकर सो रहे थे कि एक कीड़े अलर्क ने इसे काटना शुरू किया | कीड़ा काटते काटते मांस में घुस कर हड्डी तक को कुरेदने लगा | रक्त की धारा बह चली किन्तु गुरु की निंद्रा में विध्न न हो इसलिए बैठा रहा - अविचल पर्वत की भांति , विधाता के विधान की भांति और उत्तर दिशा के दिग्पाल की भांति डटा रहा |
' परन्तु दुर्भाग्य उसका सहोदर था इसलिए गुरु ने ऐसी गुरु भक्ति के लिए प्रसन्न होकर वरदान के स्थान पर क्रुद्ध होकर श्राप दे दिया | '
एक ओर सात और दूसरी ओर ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बीच जीने और मरने की बाजी लग रही है | महाभारत का युद्ध चल रहा है | शस्त्र झनझना रहे है और शंख व रणभेरियाँ बज रही है |
यह कर्ण म़ातृ-भक्त भी है |
' यधपि इसकी माता कुंती ने इसके जन्म से ही इसे त्याग दिया -पेटी में बंद कर नदी में बहा दिया था - मौत के मुंह में , मौत और भाग्य से संघर्ष करने के लिए |
' यधपि लक्ष्यवेध होने पर द्रोपदी का अधिकारी हो गया था | किन्तु इसकी माँ ने इसके जन्म के भेद को गुप्त रखा इसलिए स्थान-स्थान पर सूतपुत्र और अज्ञातकुलीन का बताया जाकर वह अपमानित होता रहा |
'यधपि वह माँ की गोद के लिए जिन्दगी भर ललचाता रहा , कुल के रहस्य की जिज्ञासा की वेदना में अनवरत जलता रहा और माँ ने उसको सम्पूर्ण आयु में एक बार भी बेटा कहकर स्नेह से नहीं पुचकारा |
'यधपि उसी की कोख में जन्म लेकर और पाँचों का सहोदर होकर भी कुंती ने उसे सदा उपेक्षित ही रखा | वह उन पांचो की हितकामना में ही सदा लगी रहती थी |
' तथापि जब वह अपनी गोद में अभय के लिए भीख मांगने आई तब वह ना नहीं कर सका | उसने उसके चारों बेटों पर आघात न करने का वचन दिया और उस वचन को निभाया |
'परन्तु दुर्भाग्य उसका सहोदर था | ऐसी म़ातृ-भक्ति के बाद भी माता ने अपने पाँचों पुत्रों को यह भेद नहीं बताया और जब वह रथ का पहिया ठीक कर रहा था तब अर्जुन उसके बंधू ने ही रण-नियमों का उलंघन कर कपट से उसे मार डाला | '
एक ओर सात और दूसरी ओर ग्यारह अक्षौहिणी सेना के बीच जीने और मरने की बाजी लग रही है | महाभारत का युद्ध चल रहा है | शस्त्र झनझना रहे है और शंख व रणभेरियाँ बज रही है |
यह कर्ण सत्यवादी भी है |
' जब उसे मालूम हो गया कि वह कुंती पुत्र है , अर्जुन भीम आदि उसके भाई है |
' जब उसकी माता ने आकर उसे पांडव पक्ष की ओर से युद्ध करने का आग्रह किया |
' जब उसके रुंधे हुए भ्रातृप्रेम का प्रवाह रोम-रोम में प्रवाहित हो उठा |
तब उसने भावनाओं से भरी मातृदृष्टि से मुंह फेर कर उत्तर दिया था - कर्ण मझधार में घोड़े नहीं बदलता | जिसका साथ देने का एक बार वचन दे दिया है फिर किसी भी भयानक परिणाम से डरकर कायर की भांति परिस्थितियों का मूल्याङ्कन करना कर्ण को शोभा नहीं देता | अपनी माँ , जिसके लिए मेरा हृदय जिन्दगी भर तडफता रहा है , भाई जिन पर मुझे गर्व होना चाहिए अथवा और किसी सम्बन्धी के लिए मै दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ सकता | मृत्यु पर्यंत जिसका साथ देने का निश्चय मैंने कर लिया है उस निश्चय की चाहे जितनी कीमत चुकानी पड़े , कर्ण उसके लिए सदैव तैयार रहेगा |
' परन्तु दुर्भाग्य उसका सहोदर था | ग्यारह अक्षौहिणी सेना होकर भी द्रोण , भीष्म आदि जैसे महारथियों के सेनापति होते हुए भी दुर्योधन की पराजय हुई | सूर्य और कुंती का सत्यवादी पुत्र , सूतपुत्र के असत्य नाम सम्बन्ध का अपने आप नाम से विच्छेद नहीं कर सका | '
क्रमश:
अरे ताऊ "गंभीर देवी तुमको जीने नही देगी और मुस्कान देवी तुमको मरने नही देगी."Food Supplement आपके स्वस्थ्य जीवन का प्रतीक
1/12/2010 07:32:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
शनिवार , ८ जनवरी सन १०२६ की उषा काल के अंतिम प्रहर में जब सूर्य अंगडाई लेकर अपने अपने बिस्तर पर करवट बदल रहा था , तब मंदिरों में घन घन कर टंकारे और हिन् -हिनाती तुर्र्हियाँ चीख रही थी - "जय सोमदेव ! "
सूर्य ने कसूमल रंग की चादर उठाकर अपना मुंह बहार निकाला तो उन्हें शत शत कंठो की गगन-भेदी ध्वनी सुनाई दी - " जय सोमदेव ! "
शत्रु के रक्त की प्यासी होकर तलवारें प्रभात काल में सहस्त्रों बिजलियाँ -सी कड़क रही थी और प्रत्येक कड़क के साथ लोमहर्षक रणघोष हो रहा था - " जय सोमदेव !"
तीरों के बादल छा गए और मानवता के निकलते हुए जनाजे को देखकर आकाश के बादल कलप-कलप कर आंसू बहा रहे थे | हवाएं विलाप कर रही थी - "जय सोमदेव !"
प्रेम और शांति रूपी पुत्रों के अवसान पर धरती माता के गालों पर लाल रंग के आंसुओं की कल कल कर धाराएं बह रही थी और हिचकियाँ सुबक रही थी - "जय सोमनाथ ! "
गरम गरम रक्त के समुद्र में जीवन नौका की पतवारें छप-छप कर चल रही थी और गिद्ध मांस नोचते हुए कह रहे थे - ' जय सोमनाथ ! "
पताकाएँ टेढ़ी मेढ़ी होकर फरफरा रही थी और उनसे व्याकुल होकर व्योम धरती का चुम्बन लेता हुआ बोला -" जय सोमनाथ ! "
इतिहास के पन्नो पर अंकित होने वाले ऐसे असामन्य दृश्य को देखने के लिए सूर्यदेव अपने रथ पर हडबडा कर सवार होते हुए अपनी प्रशंसा प्रगट करने लगे - धन्य है धरती के पुत्रो को - " जय सोमनाथ ! "
लम्बे काल की प्रतीक्षा के बाद कालिका का खप्पर आज भरा जा रहा था और वह तृप्त होकर डकारें ले रही थी - " जय सोमनाथ ! "
प्रलय के तांडव नृत्य की मुद्रा में स्वयं भगवान सोमनाथ भीमदेव के रूप में गरज रहे थे | उनके गंभीर कंठश्रोत से सृष्टि को थरथराने वाली ध्वनि निकल रही थी - " जय सोमनाथ ! "
भीमदेव की रक्त रंजित तलवार के प्रत्येक वार के साथ धरा धसक रही थी और धसकते हुए कराह रही थी - ' जय सोमनाथ ! '
श्मशान घाटों पर सोये हुए कई राख झड़का कर समाधियों से बाहर निकलते हुए नारा लगाने लगे - ' जय सोमनाथ ! '
क्रोधित तूफ़ान में समुद्र की लहरों सी सरसराती हुई शत्रु सेना अपने भाग्य के किनारों से टकरा रही थी और उसकी प्रत्येक पछाड़ के साथ ध्वनि आ रही थी - 'जय सोमनाथ !'
पुजारी के भेद और क्षत्रिय के दुर्भाग्य ने मंदिर के लोह कपाटों पर बल लगाया और वे टूटते हुए चरमराये -' जय सोमनाथ !'
विजय और भाग्य अपनी गठरियाँ संभाल कर भीमदेव से विदा लेने लगे - ' जय सोमनाथ ! '
नियति ने क्रूर व्यंग्य पर मुस्कराकर होनहार से टक्कर लेने की सोचकर भीमदेव ने भी विदा का हाथ उठाया - ' जय सोमनाथ ! '
मृत्यु और पराजय ने काले वस्त्र धारण कर मंदिर में प्रवेश किया और भीमदेव से अभिवादन करने लगे - ' जय सोमनाथ ! '
असंख्य नरमुंड ओलों के समान बरस रहे थे और स्वर्ग से विमान उड़ने की तैयारी में शीघ्रता का संकेत कर रहे थे - ' जय सोमनाथ ! '
लेकिन भीमदेव तन्मय और एकाग्र होकर नरसंहार का योगाभ्यास कर रहा था | हठात जीवन संध्या मृत्यु से अंतिम विदा लेने लगी - ' जय सोमनाथ ! '
और
' जय सोमनाथ ! '
भीमदेव का कटा हुआ मस्तक भगवान सोमनाथ के चरणों में गिर पड़ा | रक्त की धारा अभिषेक करने लगी - ' जय सोमनाथ ! '
इस नश्वर शरीर का यह तुच्छ मस्तक और मेरे रक्त के साथ मेरा आखिरी अरमान भी है , हे कुल देवता ! तुम्हे भेंट है |
' जय सोमनाथ ! '
मंदिर की ईंट-ईंट बिखर गई | उसके सोने चाँदी के अलंकार व रत्न लादे जा रहे थे | लदे हुए ऊँटो ने अरडाट की - ' जय सोमनाथ ! '
धर्म के नाम पर धर्म कचोटा गया , धर्म के नाम पर धरती की कोख सूनी हो गई , धर्म के नाम पर बलिदान को बलि चढ़ा दिया गया , यज्ञ की अंतिम स्वाहा में पूर्णाहुति का मन्त्र गूंजा - ' जय सोमनाथ ! '
गुर्जर देश के सूर्य ने फिर बिस्तर में घुस कर लाल चादर ओढ़ ली | मंदिर शमशान बन चूका था और सियार चिल्ला रहे थे - ' जय सोमनाथ ! '
रात का सन्नाटा दबे पांव घूम घूम कर देख रहा था - संहार के वीर्य से उत्पन्न चिर शांति के एकछत्र साम्राज्य को - ' कौन है सम्राट ? कहाँ गया वह ? अँधेरे ने पहचान कर कहा - ' जय सोमनाथ ! '
अर्ध रात्री को गगन के परदे हटा कर स्वयं सोमनाथ ने अपनी रजत आँखों से आश्चर्यवत देखा अपने नाथ और उसके सेवको को स्वर्ग में हिलमिलकर नृत्य करते हुए | भूत प्रेत गण जय जय की ध्वनि से ताल दे रहे थे - ' जय सोमनाथ ! '
पार्वती ने पूछा - ' भगवन ! वह कौन था ? आपके ही क्रोध की भ्रकुटी के समान न मौत से डरता था , न तीर और तलवार से | न खून और संहार से डरता था , न प्रलय और पराजय से | रक्त की अंतिम बूंद , जीवन के अंतिम श्वास , यहाँ तक कि मृत्यु के बाद भी लड़ता हुआ बोल रहा था -' जय सोमनाथ ! '
गणेश जी बीच में ही बोल उठे - ' वह एक क्षत्रिय था | '- ' जय सोमनाथ ! 'बाड़मेर के पूर्व सांसद
स्व. श्री तन सिंह जी द्वारा लिखित
ताऊ डॉट इन: ताऊ पहेली - 56 : विजेता श्री मुरारी पारीकमत पूछै के ठाठ भायला - कविता Diabetes ( मधुमेह) पर अब आपका नियंत्रण
1/10/2010 08:00:00 AM
Ratan Singh Shekhawat
चिट्ठाजगत की सक्रियता सूची देख आज कोतुहल जगा कि देखा जाये चिट्ठाजगत के शीर्ष २० सक्रीय ब्लोग्स की अलेक्सा रेंक क्या है | अलेक्सा.कॉम किसी भी वेब साईट पर आने वाले पाठकों (ट्राफिक) के आधार पर रेंक तय करती है | अलेक्सा रेंक में १००००० अंकों से नीचे की संख्या अच्छी मानी जाती है | तो आईये देखते है चिट्ठाजगत के २० शीर्ष सक्रीय ब्लोग्स पर ट्राफिक का आंकड़ा अलेक्सा.कॉम की नजर से
1-उड्डन तश्तरी :- 5,36,790
2- मानसिक हलचल :- 3,02,774
3- ताऊ .इन :- 4,33,521
4- फुरसतिया :- 4,96,788
5- हिंदी युग्म :- 1,49,330
6- मोहल्ला :- 8,43,914
7- छींटे और बौछारें :- 6,90,245
8- दीपक भारतीय की शब्द पत्रिका :-37,47,346
9-दीपक भारतीय की शब्दलेख पत्रिका :-51,17,599
10- चिटठा चर्चा :- 1,82,339
11- मेरा पन्ना :- 5,44,698
12- दीपक भारतीय का चिंतन :- 49,21,065
13- लोक संघर्ष :- 22,84,754
14- भड़ास :- 4,20,490
15- शब्दों का सफ़र :- 7,94,762
16- अजदक :- 11,08,257
17- रचनाकार :- 9,87,164
18- कबाड़खाना :- 7,99,042
19- ज्ञान दर्पण :- 2,89,139
20- क़स्बा :-5,95,507
उपरोक्त रेंक ०९जन २०१० रात १० बजे से ११ बजे के बीच जांची गयी है |
आज के युग का अमृत है एलो वेरा जेल
1/09/2010 06:43:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
पिछले लेख में हमने चर्चा की थी वेब होस्टिंग का ऑनलाइन व्यवसाय शुरू करने पर | इस ऑनलाइन व्यवसाय को शुरू करने के लिए जो वेब साईट बनायीं जाती है उसका सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है उस वेब साईट का ग्राहक क्षेत्र ( client area ) | आइये आज इसी पर चर्चा करते है यह बिना जानकारी के कैसे बनाया जाय -
दरअसल इन्टरनेट पर इस काम के लिए ढेरों सोफ्टवेयर भुगतान पर व मुफ्त उपलब्ध है जिन्हें सम्बंधित वेब साईट से खरीदकर अपनी वेब साईट में जोड़कर इस्तेमाल किया जा सकता है सबसे पहले चर्चा करते है इन सोफ्टवेयर के कार्य पर जिससे इनकी महत्ता इस कार्य में सबसे ज्यादा है |
१- ये सोफ्टवेयर आपके ग्राहकों को आपके होस्टिंग प्लान चुनने , डोमेन नेम चुनने आदि की सुविधा देते है |
२- जो ग्राहक आपके होस्टिंग प्लान खरीदता है उसका खाता बनाकर पूरा रिकार्ड रखते है जिसका आप सहित आपका ग्राहक अपने खाते को प्रबंधित कर सकता है |
३- आपके द्वारा ग्राहक का आदेश स्वीकार करने का इ मेल भेजना , बिल बनाने व ई मेल से ग्राहक को भेजना , यदि भुगतान बाकि है तो उसका तकादा मेल भेजना , डोमेन के नवीनीकरण की अग्रिम सूचना मेल भेजना आदि सभी काम ये सोफ्टवेयर स्वचालित तरीके से कर देते |
४- इन सोफ्टवेयर में लगभग सभी भुगतान प्राप्त करने वाले गेटवे से जुड़ने के मोड्यूल उपलब्ध होते है जिनके द्वारा आप अपने ग्राहकों से अपनी सेवाओं का भुगतान प्राप्त कर सकते है |
५- इनमे सभी डोमेन रजिस्ट्रार से जुड़ने वाले मोड्यूल उपलब्ध होते है आपके द्वारा चुने हुए डोमेन रजिस्ट्रार से ये सोफ्टवेयर आपके ग्राहकों के लिए उनके द्वारा चयनित डोमेन स्वचालित तरीके से रजिस्टर कर देते है |
६- आपके ग्राहकों को आपसे किसी भी तरह की सहायता के लिए सहायता टिकट बनाने की सुविधा से लेस होते है |
७- इन सोफ्टवेयर में आप अपने होस्टिंग प्लान , डोमेन रजिस्टर शुल्क आदि सभी अपने हिसाब से तय कर सकते है |
८- यही नहीं ये सोफ्टवेयर आपकी होस्टिंग कम्पनी का पूरा हिसाब किताब भी रखते है |
इन्टरनेट पर उपलब्ध होस्टिंग बिलिंग सोफ्टवेयर
* ClientExec (website)
* iHost (website)
* iPanel (website)
* iScripts AutoHoster (website)
* LPanel (website)
* NixBill Automation (website)
* phpCoin (website)
* Ubersmith (website)
* WHMAP - WHM AutoPilot (website)
* Whois.Cart (website)
* BILLmanager (website)
* AccountLab Plus (website)
* AWBS (website)
* Blesta (website)
* DHCart (website)
* MachPanel - (website)
* PawBill -(website)
* Freelancer Panel (website)
* ModernBill (website)
* WHMCS (website)
इनके अलावा भी अंतरजाल पर ऐसे ढेरों सोफ्टवेयर मौजूद है whmcs इनमे सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला सोफ्टवेयर है जो http://licensepal.com/ से $200/-में ख़रीदा जा सकता है इसके अलावा ओपन सोर्स के फ्री में मिलने वाले phpcoin , AccountLab Plus , HostingTool आदि भी लोगों द्वारा बहुत पसंद किये जाते है |अन्तरजाल पर उपलब्ध होस्टिंग बिलिंग टूल के ढेरों सोफ्टवेयर यहाँ से डाउनलोड किये जा सकते है या जानकारी ली जा सकती है |
इन सोफ्टवेयर में निम्न लिखित पेमेंट गेटवे से भी जुड़ने के मोड्यूल भी उपलब्ध है
* 2Checkout
* AlertPay
* Authorize.net
* BluePay
* E-Gold
* GoogleCheckout
* LinkPoint
* MoneyBookers
* NoChex
* Payflow Pro
* PayPal
* PayPal Website Payments Pro
* Protx
* PSIGate
* WorldPay
इन सोफ्टवेयर में निम्न लिखित सर्वर्स से जुड़ने के मोड्यूल भी उपलब्ध है
* cPanel / WHM (website)
* DirectAdmin (website)
* Helm (website)
* Interworx (website)
* Plesk (website)
* ISPmanager (website)
इस सम्बन्ध में ज्यादा जानकारी व व्यक्तिगत सलाह के लिए shekhawatrs@ymail.com पर संपर्क किया जा सकता है

आज के युग का अमृत है एलो वेरा जेल
ताऊ डॉट इन: ताऊ पहेली - 56
1/06/2010 08:26:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
इन्टरनेट की दुनिया में वेब साइट्स की बढती संख्या को देखते हुए वेब होस्टिंग व्यवसाय का भविष्य बहुत सुनहरा दिखाई देता है | साथ ही इस व्यवसाय को शुरू करने में लागत भी बहुत कम आती है लेकिन इसे शुरू कैसे किया जाय ?आईये आज इसी पर चरणबद्ध चर्चा करते है -
१- सबसे पहले अपनी वेब होस्टिंग वेब साईट के लिए एक बढ़िया सा डोमेन चुने |
२- ऐसी रीसेलर वेब साईट खोजे जो सस्ते दामों में रीसेलर होस्टिंग पैकेज उपलब्ध कराती हो | इसके लिए आप way4host या dewlance जैसी वेब साइट्स से भी सस्ते में रीसेलर वेब होस्टिंग प्लान खरीद सकते है या फिर अपनी पसंद की अन्य रीसेलर वेब होस्टिंग प्रदाता वेब साईट से |
३- यदि आपकी अंग्रेजी भाषा पर पकड़ कमजोर है तो रीसेलर प्रदाता कोई भारतीय ही चुने ताकि कभी किसी तरह का संवाद करने में कोई दिक्कत ना हो |
४- Paypal में अपना एक खाता खोलें ताकि आप अपने ग्राहकों से ऑनलाइन भुगतान प्राप्त कर सके पेपल में खाता बिना किसी तरह का कोई शुल्क दिए खोला जा सकता है | इसके लिए आपके पास एक अदद क्रेडिट कार्ड का होना जरुरी है |
५- अपनी चुनी हुई रीसेलर सेवा प्रदाता वेब साईट से रीसेलर होस्टिंग प्लान खरीदने के बाद आपका रीसेलर आपको एक कंट्रोल पेनल देगा ये कंट्रोल पेनल whm , Plesk , Dotnet या अन्य जो भी आपने प्लान चुनते हुए लिया था हो सकता है जिसके माध्यम से आप अपने ग्राहकों को जो आपसे वेब होस्टिंग खरीदेंगे के खाते बना सकते है |
* ऐसे ही रीसेलर कंट्रोल WHM का डेमो आप यहाँ क्लिक कर देख सकते है :- यूजर नेम- demo पासवर्ड -demo
६- आपका रीसेलर आपको एक और कंट्रोल पेनल देगा जहाँ आपको अपनी वेब साईट रखनी है यह कंट्रोल पेनल भी cpanel , plesk .dotnet या जो भी आपने चुना हो हो सकता है | way4host व dewlance द्वारा उपलब्ध कराये जाने वाले cpanel का डेमो आप यहाँ क्लिक कर देख सकते है | यूजर नेम -demo पासवर्ड-demo से लोगिनकरें |
७- अब आपको अपनी वेब होस्टिंग वेब साईट बनानी है जिसमे आपको अपने बारे में ,अपनी साईट के बारे में , अपने विभिन्न होस्टिंग प्लान , आपके द्वारा दी जाने वाली अन्य सेवाओं व अपने नियम व शर्ते आदि का ब्यौरा देना होता है |
* अपनी वेब साईट बनाने के लिए आप ड्रीम विवर , पेज मेकर , पब्लिशर , नामो वेब एडिटर आदि सोफ्टवेयरस का इस्तेमाल कर सकते है |
* यदि आप अपनी वेब साईट का बढ़िया टेम्पलेट बना पाने में असमर्थ है तो इन्टरनेट पर उपलब्ध टेम्पलेट फ्री या खरीदकर डाउनलोड कर इस्तेमाल कर सकते है |
* आप अपनी वेब साईट किसी अन्य वेब डिजाईनियर से भी बनवा सकते है |
८- अपनी वेब साईट बनाते समय ही इसका सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है आपकी वेब साईट का client area जहाँ आपके ग्राहकों के खातों का पूरा ब्यौरा रहेगा इसके लिए इन्टरनेट पर ढेरों सोफ्टवेयर उपलब्ध है जिन्हें खरीदकर या ओपन सोर्स के फ्री में मिलने वाले सोफ्टवेयर डाउनलोड कर अपनी वेब साईट पर इस्तेमाल किये जा सकते है | ये सोफ्टवेयर आपके ग्राहकों का पूरा ब्यौरा ऑनलाइन रखते है साथ ही बिल बनाना , बिल ई मेल से ग्राहकों को भेजना , भुगतान प्राप्त करना , भुगतान के लिए तकादा करना , ग्राहक को उसके डोमेन की मियाद ख़त्म होने से पहले सूचना भेजना आदि ढेरों कार्य स्वचालित तरीके से करते है | इनमे whmcs , phpcoin , accountleb plus , hosting tool आदि प्रमुख है जिनके बारे विस्तार से जानकारी अगले लेख में दी जाएगी |
९- अपनी वेब साईट बनने के बाद किसी भी डोमेन रजिस्ट्रार वेब साईट में अपना खाता बना लें जहाँ से आपको अपने ग्राहकों के लिए डोमेन रजिस्टर करने है | डोमेन रजिस्ट्रार के यहाँ खाता खोलने के बाद आप अपने ग्राहकों के लिए मेनुवल ही डोमेन रजिस्टर कर सकते है या स्वचालित रजिस्टर करने के लिए अपने चुनिन्दा डोमेन रजिस्ट्रार को अपने होस्टिंग बिलिंग सोफ्टवेयर में भी जोड़ सकते है |
उपरोक्त सभी चरण पुरे करने के बाद आप बिना अपने वेब सर्वर लगाये ,बिना ज्यादा तकनीकी ज्ञान हासिल किये वेब होस्टिंग का व्यवसाय शुरू कर सकते है |
इस लेख को पढ़कर यदि आप वेब साईट होस्टिंग का व्यवसाय शुरू कर रहे है तो ज्ञान दर्पण के विशेष आग्रह पर रीसेलर वेब होस्टिंग सेवा प्रदाता वेब साइट्स way4host व dewlance ने विशेष डिस्काउंट कूपन जारी किये है जिनके माध्यम से आपको इन दोनों वेब साइट्स के किसी भी सालाना रीसेलर होस्टिंग प्लान को खरीदते समय १३.००$ का डिस्काउंट मिलेगा |
डिस्काउंट कूपन के कोड निम्न है -
Wayhost.com - coupon code : gyandarpan-v1
dewlance.com - coupon code:vReseller
way4host के रीसेलर होस्टिंग प्लान आप यहाँ क्लिक कर देख व खरीद सकते है
Dewlance के रीसेलर होस्टिंग प्लान आप यहाँ क्लिक कर देख व खरीद सकते है
वेब होस्टिंग बिलिंग सोफ्टवेयर्स की विस्तृत जानकारी अगले लेख में
"राज ब्लागर के पिछले जन्म के : “ताऊ ने रिकार्डींग से मना किया”मत पूछै के ठाठ भायला Update your templates - इस संदेश का क्या मतलब है?अच्छी सेहत हम कैसे पाऎं ?
1/05/2010 08:50:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
संचार के बढ़ते साधनों के साथ साथ इन्टरनेट का भी तेजी से प्रसार हो रहा है आज गांवों तक में इंटरनेट दस्तक दे चुकी है | इन्टरनेट के बढ़ते प्रसार को देख हर व्यवसायिक प्रतिष्ठान अपनी वेब साईट बनाकर इन्टरनेट पर अपनी उपस्थिति चाहता है | किसी भी उत्पाद के प्रचार प्रसार के लिए आजकल ज्यादातर उत्पादक इन्टरनेट पर विज्ञापनों का सहारा ले रहे है | व्यासायिक प्रतिष्ठानों के साथ साथ लोगों में अपनी अपनी वेब साईट बनाने का रुझान भी बढ़ता जा रहा | इन्टरनेट पर उपलब्ध फ्री ओपन सोर्स वेब स्क्रिप्ट , फोरम स्क्रिप्ट , ब्लोगिंग स्क्रिप्ट , ई कामर्स वेब स्क्रिप्ट व वेब साईट बनाने वाले ऑनलाइन व ऑफलाइन सोफ्टवेयर्स ने वेब साईट बनाना आसान व सस्ता कर दिया है जिससे वेब साईट्स बनाने के कार्य को और गति मिली है |
जिस तरह से इन्टरनेट पर अपनी अपनी वेब साईट बनाने का रुझान बढ़ा है उसी अनुरूप वेब होस्टिंग सेवा प्रदाताओं का व्यवसाय भी बढ़ा है और आगे भी इसके बढ़ते रहने के भरपूर अवसर है | आज इन्टरनेट पर हजारों वेब साइट्स है जो वेब होस्टिंग का अच्छा व्यवसाय कर रही है |
यह वेब होस्टिंग का व्यवसाय करना कम लागत वाला बहुत आसान है आईये आज इसे कैसे शुरू किया जा सकता है उसके तरीकों पर चर्चा करते है |
१- अपने वेब सर्वर लगाकर - यह तरीका बहुत महंगा है साथ ही इसके लिए पूरी तकनीकी जानकारी की आवश्यकता होती है |
२- वेब सर्वर किराये पर लेकर - ज्यादातर वेब होस्टिंग सेवा प्रदाता इसी तरीके को इस्तेमाल करते है पर इसमें में भी सर्वर का प्रबंधन करने जितनी तकनीकी दक्षता हो होनी ही चाहिए |
३- रीसेलर वेब होस्ट बनकर - यह तरीका सबसे आसान व कम लागत वाला है | इन्टरनेट पर ऐसी बहुत सी वेब साइट्स है जो नया वेब होस्टिंग व्यवसाय शुरू करने वालों को सालाना या मासिक कुछ धन लेकर रीसेलर वेब होस्टिंग की सुविधा देती है |
ऐसी वेब साइट्स से अपनी जरुरत के हिसाब से रीसेलर प्लान खरीदकर आसानी से अपना वेब होस्टिंग व्यवसाय शुरू किया जा सकता है जिसमे तकनीकी ज्ञान की भी ज्यादा आवश्कता नहीं है | way4host व dewlance ऐसी ही रीसेलर सेवा प्रदाता वेब साइट्स है जो नया वेब होस्टिंग व्यवसाय शुरू करने वालों को बहुत सस्ते में रीसेलर पैकज उपलब्ध कराती है | जिनसे सस्ते रीसेलर प्लान लेकर कोई भी बड़ी आसानी व कम लागत (सिर्फ १६००रु. सालाना खर्च ) में वेब होस्टिंग व्यवसाय शुरू कर सकता है |
वेब होस्टिंग व्यवसाय शुरू कैसे किया जाय इसकी चरणबद्ध जानकारी अगली लेख में ...
ताऊ उवाच
1/04/2010 09:44:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
Linux Shared Web Hosting Plan :
Cpanel Demo- user : x3demob password: x3demob
| Plans | Personal | Small Business | Silver | Gold | Ultimate |
| Disk Space | 2000Mb | 5000MB | 20000MB | 40000MB | Unmetered |
| Bandwidth | Unmetered | Unmetered | Unmetered | Unmetered | Unmetered |
| Free Domain | W/Annual Purchase | W/Annual Purchase | W/Annual Purchase | W/ Annual Purchase | W/Annual Purchase |
| Annual Price | $ 22.99 | $ 28.00 | $ 41.00 | $ 50.00 | $ 70.00 |
| Monthly Price | $ 1.95 | $ 2.45 | $ 3.45 | $ 4.25 | $ 5.95 |
| | Order Now | Order Now | Order Now | Order Now | Order Now |
Reseller Web Hosting :
WHM Control Panel Demo Username: demo Password: demo
| Plans | Starter | Basic | Business |
| Disk Space | 25000MB | 50000MB | Unmetered |
| Bandwidth | Unmetered | Unmetered | Unmetered |
| Free Domain | W/Annual Purchase | W/Annual Purchase | W/Annual Purchase |
| Annual Price | $ 35.00 | $ 40.00 | $ 60.00 |
| Monthly Price | $ 3.05 | $ 3.45 | $ 5.45 |
| | Order Now | Order Now | Order Now |
PhpMyAdmin , Php , Cgi bin , Webmail , Installatron Script Installer , Sofatculous Script installer, Pearl Modul , Cron job , Awstate , Appche , Mysql ,Sub Domain , Park Domain ,with all hosting plans.
1/04/2010 07:07:00 AM
Ratan Singh Shekhawat
क्रोधित होकर आवा धधक रहा था | जिन्दगी दुबक कर घड़ों में छिपी हुई बैठी थी और बाहर मौत लपलपाकर अपना नाक चाट रही थी | तीन दिनों तक वह गुर्राती रही और प्रभु के राज्य की नींव अंतरतम की गहराइयों में लगती जा रही थी | शिलान्यास हो चूका था | पार्थिव और लौकिक धारणाओं की छाती पर अपार्थिव और अलौकिक विश्वास की प्राण प्रतिष्ठा हो चुकी थी | बिल्ली के नन्हे नन्हे बच्चे म्याऊँ म्याऊँ करते पूंछ हिलाते और दांत निपोरते हुए बाहर आ गए | एक सच्ची लग्न का जन्म हुआ | मंगल महोत्सव सशरीर प्रगट हो गया था | उसी लग्न को फुफकारते विषधरों के सन्मुख डाला गया , गहरे समुद्रों में फैंका गया , ऊँचे पहाड़ों की चोटियों से गुडाया गया , मतवाले हाथियों के पैरों तले कुचलवाया गया , वर प्राप्त होलिका के साथ दहकती अग्नि में तपाया गया परन्तु उसे न सांप खा सके , न सागर डुबो सके , न पहाड़ तोड़ सके , न हाथी कुचल सके और न आग ही जला सकी |
लग्न की अंतिम परीक्षा की घडी उपस्थित हुई | आज उसके समक्ष पिता की श्रद्धा पुत्र की निष्ठा को पराजित करने पर तुली हुई थी | व्यष्टि और परमेष्टि की दूरी के बीच भावनाओं की तराजू के पलड़े कभी इधर कभी उधर झूल रहे थे | कर्तव्य उलझन में पड़ा हुआ बाल नोंच रहा था | निष्ठा ने भावनाओं को रोंद कर कर्तव्य से आलिंगन कर लिया | थम्भा चूर चूर हो गया | उसमे प्रगट हुआ वह जो सर्वत्र होकर भी अप्रगट है | जुल्मों की कहानियां का उपसंहार हो गया | पाशविक बल ने अपने जीवन में एक बार और निर्बल दिखाई देने वाले आत्मबल के आगे घुटने टेक दिए | आज भी लोग उसी प्रह्लाद का नाम लेकर पुलकित हो रहे है , परन्तु वह प्रहलाद भी एक क्षत्रिय था |
चित्रपट चल रहा था दृश्य बदलते जा रहे थे |स्व. श्री तन सिंह जी
प्रविष्ठियां ब्लॉग जगत से ओम पराया माल गटक जा भैरु..गटक गटक भैरु..प्रकृति की अनमोल भेंटइंटरनेट की स्पीड बढ़ाने का जुगाड़ क्या आप अपनी सारी टिप्पणियां पढ़ना चाहेंगे?
1/02/2010 11:38:00 PM
Ratan Singh Shekhawat
'इन देवदारु वृक्षों की रक्षा के लिए मै यहाँ स्वयं भगवान् पशुपतिनाथ द्वारा नियुक्त हूँ | आज सात दिनों की प्रबल भूख के पश्चात् मुझे यह गाय स्वयं प्राप्त-भजन के रूप में मिली है | तुम्हारे लिए गाय कुछ भी हो किन्तु मेरे लिए तो मेरा केवल भोज्य पदार्थ ही है | तुम्हारे शत्रुओं का मानमर्दन करने वाला यह अद्वितीय धनुष , भाग्य पर पुरुषार्थ का सिक्का जमाने वाले ये प्रचंड बलशाली बाहू और अनेक बार तुम्हे विजय श्री से विभूषित करने वाले तुम्हारे यह अचूक बाण मुझ पर काम नहीं देंगे , क्योंकि मै अपना धर्म पालन कर रहा हूँ | '
' पर मेरा भी तो कोई धर्म होगा ? '
'है क्यों नहीं |
' तो बताओ क्षत्रिय धर्म क्या है ? '
'रक्षा करना |'
' और जब किसी का स्वधर्म दुसरे के धर्म से टकरा रहा हो तब ? '
' तब मुर्ख आपस में लड़ने की चेष्ठा करते है और बुद्धिमान ऐसा मार्ग निकालते है जिससे दोनों का श्रेय साधन हो सके |
' तब मै भी एक मार्ग निकालता हूँ | वनराज ! तुम भूखे हो ,इस गाय को छोड़ दो और मेरे शरीर को खाकर भूख मिटाओ |'
सिंह अवाक रह गया | उसकी युक्ति में उसका ही गला फंस जाएगा ऐसी उसे कभी कल्पना ही नहीं थी | निरुत्तर होते हुए भी उत्तर दिया - ' तब तो तुम्हे मै बुद्धिमान मानकर ही मुर्ख मानता हूँ | तुम्हारे पास एक छत्र साम्राज्य , उमड़ता हुआ यौवन , ऋषि को संतुष्ट करने के विपुल साधन और अपरिमित तेज है | इस तुच्छ प्राणी के लिए इतना त्याग मैंने आज तक नहीं सुना | नरेश ! तुम लौट जाओ | तुम्हारा दोष नहीं है | न तुम्हारे शस्त्रों का दोष है | मुझे तो भगवान् का ऐसा ही वरदान है कि मुझपर कोई शस्त्र काम नहीं देता | तुम विवश हो इसलिए संतुष्ट होकर लौट जाओ |'
' इसका अर्थ हुआ मैंने प्रकृति के वश होकर क्षत्रिय के घर जन्म लिया और अब परिस्थितियों से परवश हो क्षत्रिय धर्म त्याग दूँ | विवशता से उचित कार्य का त्याग संघर्ष हीनता और कायरता है | ऐसे साम्राज्य के विवश सम्राट को धिक्कार है | ऐसे यौवन , साधन और तेज को भी धिक्कार है ! मै ऐसी विवश जिन्दगी की अपेक्षा वश प्राप्त मृत्यु को अच्छी समझता हूँ | भीख मांग कर जो सम्राट बनते है वे अत्यंत दीन है | साम्राज्य तो मौत का सिर तोड़ कर बनाये जाते है | तुमने ऐसा त्याग नहीं सुना किन्तु राजा शिवी तो केवल कबूतर के लिए अपने आप को समाप्त करने पर उतारू हो गए थे | मृगराज ! मेरे वंश में इक्ष्वाकु हुए है , पृथु , मान्धाता और स्त्यवृति हरीश चन्द्र हुए है | यह रघुकुल है | इसमें भागीरथ होगा , राम होगा , लव-कुश होंगे और भी न जाने कितने ही महापुरुष एवं हुतात्मा होंगे | मेरे ही पूर्वज और मेरी ही संतति मुझे दास कहे ऐसे जीवन से मौत कहीं अच्छी है |'
और उस नरेंद्र में मृगेंद्र के समक्ष अपने ही शरीर को समर्पित कर दिया | भय उसी से भय खाता है जो भय से भय नहीं खाता | परीक्षा पूर्ण हुई | परीक्षार्थी उत्तीर्ण हो गया और परीक्षक हार गया | स्वधर्म पालन की प्रेरणा के इतिहास में एक और पृष्ठ जुड़ गया , जिस पर आज भी लिखा हुआ है ' दिलीप नि:संदेह एक क्षत्रिय था | 'स्व.श्री तन सिंह जी द्वारा 'बदलते दृश्य' पुस्तक में
काम की व मजेदार प्रविष्ठियां ओम पराया माल गटक जा भैरु..गटक गटक भैरु..इंटरनेट की स्पीड बढ़ाने का जुगाड़ एलो जोजोबा शेम्पू Aloe-Jojoba Shampoo