राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू
राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .
जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !
मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.
"एलोवेरा " ब्लॉग ट्रैफिक के लिए भी है खुराक
एलोवेरा शारीरिक स्वास्थ्य के साथ साथ ब्लॉग के लिए भी एक बढ़िया टॉनिक है , एक बढ़िया की-वर्ड जो गूगल से आसानी से पाठक झटक कर आपके ब्लॉग पर ट्रैफिक बढ़ा सकता है |.
"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था
उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.
क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत
आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.
Jun 27, 2009
आशीष जी की पोस्ट ने चोर पकड़वाया
Jun 19, 2009
उबुन्टू लिनक्स कैसे इंस्टाल करें

उबुन्टू लिनक्स कैसे इंस्टाल करें
लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के बारे में जानकारी न होने के कारण इसका इस्तेमाल बहुत ही कम हो पा रहा है | वायरस फ्री व मूल्य फ्री होने के बावजूद जानकारी के अभाव में लोग लिनक्स का इस्तेमाल करने से वंचित है | और महंगा विण्डो ऑपरेटिंग सिस्टम इस्तेमाल करने को मजबूर है | मैंने Red Hat, Fedora, ubuntu आदि linux के ऑपरेटिंग सिस्टम इस्तेमाल करके देखे जिनमे नए लोगो के लिए ubuntu linux ऑपरेटिंग सिस्टम मुझे इस्तेमाल करने में बहुत आसान लगा | कम्पूटर में कोई भी ऑपरेटिंग सिस्टम इस्तेमाल करने हेतु सबसे पहले चुना गया ऑपरेटिंग सिस्टम इंस्टाल करना होता है जो सबसे मुश्किल कार्य लगता है और इसके लिए ज्यादातर लोग हार्डवेयर इंजिनियर से यह काम करवाते है पर इन इंजीनियर्स में भी बहुत कम लोग है जो लिनक्स इंस्टाल करना जानते हो | जबकि ubuntu linux इंस्टाल करने में विण्डो एक्स पी. से भी ज्यादा आसान है | आइए आज जानते है ubuntu linux installation के बारे में | उबुन्टू को दो तरीके से इंस्टाल किया जा सकता है एक विण्डो एक्स.पी के अंदर और दूसरा सेपरेट यहाँ दुसरे तरीके पर चर्चा करते है | विण्डो एक्स.पी में इंस्टाल करने का तरीका यहाँ लिखा है |
१- सबसे पहले ubuntu की सी डी. सी डी रोम में डालकर कंप्यूटर को रिस्टार्ट कर सी डी रोम से रिबूट करावें |
२- सी डी रोम से रिबूट होते ही कंप्यूटर की स्क्रीन पर भाषा चुनने का आप्शन आएगा | जिसमे हिंदी सहित कोई भी मन पसंद भाषा चुनी जा सकती है \
३- भाषा चुनकर आगे बढ़ते ही कुछ आप्शन मिलते है जिनमे से Install Ubuntu पर चटका लगाकर थोडा इंतजार करें |
४- कुछ इंतजार के बाद स्क्रीन पर Ubuntu Desktop दिखाई देगा व दुबारा भाषा चुनने का आप्शन मिलेगा यहाँ भाषा का चुनाव करने के बाद (Forward ) आगे बढे \
५- अब टाइम जोन कोलकत्ता चुनने के बाद आगे बढे |
६- Key Bord layout चुने व आगे बढे |( forward पर चटका लगा कर )
७- अब Prepare Disk Space का पर्चा खुलेगा | विण्डो एक्स पी. को यथावत रखने के लिए Manual पर चेक का निशान लगते हुए आगे बढे |
८- अब कंप्यूटर के सभी Disk partition की सूची दिखाई देगी जिस डिस्क पार्टीशन में उबुन्टू लिनक्स इंस्टाल करना है उसे सलेक्ट कर Edit Partition पर चटका लगाएँ |
९- Edit Partition पर चटका लगाते ही एक पर्चा खुलता है जिसमे :
अ - Partition use as -- में ext2 file system चुने |
ब- format the partition के आगे चेक बॉक्स में चेक का निशान लगाएँ |
स- choose mount point में / चुने |
और (forward) बढे |
१०- अब swap partition के बारे में पूछा जायेगा इसे continue पर चटका लगा आगे बढे |
११- आगे बढ़ते ही एक विण्डो खुलेगा जिसमे यूजर नाम व पासवर्ड आदि भरें | यदि auto log in चाहते है तो autometically log in पर चेक का निशान लगाते हुए आगे बढे |
१२- एक पर्चा Migrate Document & Settings के नाम खुलेगा जिसमे विण्डो एक्स.पी. के किस यूजर का document & setting का फोल्डर ubuntu में मिग्राते करना है पूछा जायेगा | सम्बंधित फोल्डर को सलेक्ट कर आगे बढे |
१३- Ready to install का पर्चा खुलेगा जिसमे Install पर चटका लगादे | थोडा इंतजार करें |
अब इंस्टालेशन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है फाइल्स आदि कॉपी होते समय ८२% पर आकर एक बार इंस्टालेशन गति कुछ रुक सी जाती है लेकिन कृपया धेर्य रखे व लगभग २० मिनट तक इंतजार करे | इंतजार का समय कम ज्यादा आपके कंप्यूटर की गति से हिसाब से हो सकता है इस वक्त scanning the mirror की प्रक्रिया चल रही होती है जो कुछ समय लेती है | इस प्रक्रिया के बाद आगे इंस्टालेशन की प्रक्रिया स्वत: ही पूरी हो जाती है और कंप्यूटर को रिस्टार्ट करने को कहा जाता है |
कंप्यूटर रिस्टार्ट होते ही उबुन्टू की सी डी स्वत: ही बाहर निकल आती है | अब आगे उबुन्टू चलाने हेतु विण्डो एक्स.पी व उबुन्टू में से उबुन्टू सलेक्ट कर Enter दबा दे बस कुछ ही क्षणों में उबुन्टू लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम आपके कंप्यूटर के डेस्कटॉप हाजिर है | मजे के साथ नेट चलायें,गाने सुने या ओपन ऑफिस .ओआरजी में अपने ऑफिस का काम करें बिना किसी दिक्कत के ,बिना किसी वाइरस के डर के व बिना कोई ऑडियो वीडियो व अन्य ड्राईवर्स के इंस्टालेशन के |
उबुन्टू लिनक्स आप यहाँ से फ्री मंगवा सकते है
Jun 17, 2009
बिरखा बिंनणी ( वर्षा वधू )
जटक जांट क बटक बांट क लागन दे हब्बिडो रै,
बेरी धीडो रै , हब्बिडो |
इस गीत की मुझे भी बस यही एक लाइन याद रही है | जिन गांवों के निवासी पेयजल के लिए तालाबों,पोखरों व कुंडों पर निर्भर है वहां सार्वजानिक श्रमदान के जरिए ग्रामीण गांव के तालाब व पोखर आदि के जल संग्रहण क्षेत्र (केचमेंट एरिया ) की वर्षा पूर्व सफाई करने में जुट जाते है व जिन लोगों ने अपने घरों व खेतो में व्यक्तिगत पक्के कुण्ड बना रखे है वे भी वर्षा पूर्व साफ कर दिए जाते है ताकि संग्रहित वर्षा जल का पेयजल के रूप में साल भर इस्तेमाल किया जा सके |
शहरों में भी नगर निगमे मानसून पूर्व वर्षा जल की समुचित निकासी की व्यवस्था के लिए जुट जाने की घोषणाए व दावे करती है | ताकि शहर में वर्षा जल सडको पर इक्कठा होकर लोगों की समस्या ना बने हालाँकि इनके दावों की पहली वर्षा ही धो कर पोल खोल देती है |
कुल मिलाकर चाहे किसान हो या पेयजल के लिए वर्षा जल पर निर्भर ग्रामीण या शहरों की नगर पलिकाए या गर्मी से तड़पते लोग जो राहत पाने के लिए वर्षा के इंतजार में होते है , सभी वर्षा ऋतु के शुरू होने से पहले ठीक उसी तरह वर्षा के स्वागत की तैयारी में जुट जाते है जैसे किसी घर में नई नवेली दुल्हन के स्वागत में जुटे हो | शायद इसीलिए राजस्थान के एक विद्वान कवि रेवतदान ने वर्षा की तुलना एक नई नवेली दुल्हन से करते हुए वर्षा को बरखा बिन्दणी ( वर्षा वधू ) की संज्ञा देते हुए ये शानदार कविता लिखी है :
लूम झूम मदमाती, मन बिलमाती, सौ बळ खाती ,
गीत प्रीत रा गाती, हंसती आवै बिरखा बिंनणी |
चौमासै में चंवरी चढनै, सांवण पूगी सासरै,
भरै भादवै ढळी जवांनी, आधी रैगी आसरै
मन रौ भेद लुकाती , नैणा आंसूडा ढळकाती
रिमझिम आवै बिरखा बिंनणी |
ठुमक-ठुमक पग धरती , नखरौ करती
हिवड़ौ हरती, बींद पगलिया भरती
छम-छम आवै बिरखा बिंनणी |
तीतर बरणी चूंदड़ी नै काजळिया री कोर
प्रेम डोर मे बांधती आवै रुपाळी गिणगोर
झूंटी प्रीत जताती , झीणै घूंघट में सरमाती
ठगती आवै बिरखा बिंनणी |
घिर-घिर घूमर रमती , रुकती थमती
बीज चमकती, झब-झब पळका करती
भंवती आवै बिरखा बिंनणी |
आ परदेसण पांवणी जी, पुळ देखै नीं बेळा
आलीजा रै आंगणै मे करै मनां रा मेळा
झिरमिर गीत सुणाती, भोळै मनड़ै नै भरमाती
छळती आवै बिरखा बिंनणी |
Jun 11, 2009
सुधर जा वरना अठन्नी कर दूंगा
अब बनिया अपने पुत्र द्वारा कहा नहीं मानने पर पुत्र को धमकाने लगा कि " बेटे सुधर जा वरना अठन्नी कर दूंगा " | इस अपनी प्रकार की नई धमकी का मतलब बनिए पुत्र को समझ नहीं आ रहा था | अतः परेशान बनिए पुत्र ने इस धमकी का अर्थ अपने कई पडौसी दूकानदारों से भी पूछा लेकिन कोई नहीं बता सका कि नहीं सुधरने पर बनिया अठन्नी कैसे कर देगा और इसका पुत्र पर क्या असर पड़ेगा | और यही बात सोच लड़का भी परेशान कि बापू मेरे न सुधारने पर अठन्नी कैसे कर देगा और इसका मुझे क्या व कैसे नुकसान पहुंचेगा |
अगले हफ्ते ताऊ को दुकान की तरफ आते देख बनिया पुत्र दौड़ कर ताऊ के पास पहुंचा और पैर छूने के बाद बाप द्वारा दी गई धमकी " सुधर जा वरना अठन्नी कर दूंगा ' बता इसका मतलब समझाने का आग्रह किया |
ताऊ तो इसी बात के इंतजार में ही था और आज तो शहर आया भी इसी मकसद से था सो ताऊ ने बनिए पुत्र को अठन्नी करने का मतलब इस तरह समझाया |
ताऊ - अरे छोरे अभी तो तू अपने बाप का इकलौता पुत्र है और उसकी संपत्ति का इकलौता वारिश | यदि तू अपने बाप का कहा नहीं मानेगा व उसके कामो में हाथ नहीं बटाएगा तो वो एक और पुत्र पैदा कर लेगा जो तेरे बाप की उस सम्पत्ति का आधा हकदार होगा जिसका अभी तक तू अकेला वारिश है | यानि तुझे रुपए में से सिर्फ अठन्नी मिलेगी |
ताऊ की बताई परिभाषा अब बनिया पुत्र समझ चूका था और चुपचाप दुकान पर बाप की इच्छानुसार मन लगा कर काम करने लगा |
Jun 8, 2009
जन-आस्था का केंद्र :जीण माता मंदिर धाम
जीण माता का मंदिर राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में अरावली पर्वतमाला के निम्न भाग में सीकर से लगभग ३० कि.मी. दूर दक्षिण में सीकर जयपुर राजमार्ग पर गोरियां रेलवे स्टेशन से १५ कि.मी. पश्चिम व दक्षिण के मध्य स्थित है | यह मंदिर तीन पहाडों के संगम में २०-२५ फुट की ऊंचाई पर स्थित है | माता का निज मंदिर दक्षिण मुखी है परन्तु मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व में है | मंदिर से एक फर्लांग दूर ही सड़क के एक छोर पर जीणमाता बस स्टैंड है | सड़क के दोनों और मंदिर से लेकर बस स्टैंड तक श्रद्धालुओं के रुकने व आराम करने के लिए भारी तादात में तिबारे (बरामदे) व धर्मशालाएं बनी हुई है ,जिनमे ठहरने का कोई शुल्क नहीं लिया जाता | कुछ और भी पूर्ण सुविधाओं युक्त धर्मशालाएं है जिनमे उचित शुल्क देकर ठहरा जा सकता है | बस स्टैंड के आगे ओरण (अरण्य ) शुरू हो जाता है इसी अरण्य के मध्य से ही आवागमन होता है | जीण माँ भगवती की यह बहुत प्राचीन शक्ति पीठ है ,जिसका निर्माणकार्य बड़ा सुंदर और सुद्रढ़ है | मंदिर की दीवारों पर तांत्रिको व वाममार्गियों की मूर्तियाँ लगी है जिससे यह भी सिद्ध होता है कि उक्त सिद्धांत के मतावलंबियों का इस मंदिर पर कभी अधिकार रहा है या उनकी यह साधना स्थली रही है | मंदिर के देवायतन का द्वार सभा मंडप में पश्चिम की और है और यहाँ जीण माँ भगवती की अष्ट भुजा आदमकद मूर्ति प्रतिष्ठापित है | सभा मंडप पहाड़ के नीचे मंदिर में ही एक और मंदिर है जिसे गुफा कहा जाता है जहाँ जगदेव पंवार का पीतल का सिर और कंकाली माता की मूर्ति है | मंदिर के पश्चिम में महात्मा का तप स्थान है जो धुणा के नाम से प्रसिद्ध है | जीण माता मंदिर के पहाड़ की श्रंखला में ही रेवासा व प्रसिद्ध हर्षनाथ पर्वत है | हर्षनाथ पर्वत पर आजकल हवा से बिजली उत्पन्न करने वाले बड़े-बड़े पंखे लगे है | जीण माता मंदिर से कुछ ही दूर रलावता ग्राम के नजदीक ठिकाना खूड के गांव मोहनपुरा की सीमा में शेखावत वंश और शेखावाटी के प्रवर्तक महाराव शेखा जी का स्मारक स्वरुप छतरी बनी हुई है | महाराव शेखा जी ने गौड़ क्षत्रियों के साथ युद्ध करते हुए यही शरीर त्याग वीरगति प्राप्त की थी | मंदिर के पश्चिम में जीण वास नामक गांव है जहाँ इस मंदिर के पुजारी व बुनकर रहते है |
जीण माता मंदिर में चेत्र सुदी एकम् से नवमी (नवरात्रा में ) व आसोज सुदी एकम् से नवमी में दो विशाल मेले लगते है जिनमे देश भर से लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते है | मंदिर में देवी शराब चढाई जा सकती है लेकिन पशु बलि वर्जित है |
मंदिर की प्राचीनता :
मंदिर का निर्माण काल कई इतिहासकार आठवीं सदी में मानते है | मंदिर में अलग-अलग आठ शिलालेख लगे है जो मंदिर की प्राचीनता के सबल प्रमाण है |
१- संवत १०२९ यह महाराजा खेमराज की मृत्यु का सूचक है |
२- संवत ११३२ जिसमे मोहिल के पुत्र हन्ड द्वारा मंदिर निर्माण का उल्लेख है |
३- ४. - संवत ११९६ महाराजा आर्णोराज के समय के दो शिलालेख |
५- संवत १२३० इसमें उदयराज के पुत्र अल्हण द्वारा सभा मंडप बनाने का उल्लेख है |
६- संवत १३८२ जिसमे ठाकुर देयती के पुत्र श्री विच्छा द्वारा मंदिर के जीर्णोद्दार का उल्लेख है |
७- संवत १५२० में ठाकुर ईसर दास का उल्लेख है |
८- संवत १५३५ को मंदिर के जीर्णोद्दार का उल्लेख है |
उपरोक्त शिलालेखों में सबसे पुराना शिलालेख १०२९ का है पर उसमे मंदिर के निर्माण का समय नहीं लिखा गया अतः यह मंदिर उससे भी अधिक प्राचीन है | चौहान चन्द्रिका नामक पुस्तक में इस मंदिर का ९ वीं शताब्दी से पूर्व के आधार मिलते है |
जीण का परिचय :
लोक काव्यों व गीतों व कथाओं में जीण का परिचय मिलता है जो इस प्रकार है |
राजस्थान के चुरू जिले के घांघू गांव में एक चौहान वंश के राजपूत के घर जीण का जन्म हुआ | उसके एक बड़े भाई का नाम हर्ष था | और दोनों के बीच बहुत अधिक स्नेह था | एक दिन जीण और उसकी भाभी सरोवर पर पानी लेने गई जहाँ दोनों के मध्य किसी बात को लेकर तकरार हो गई | उनके साथ गांव की अन्य सखी सहेलियां भी थी | अन्ततः दोनों के मध्य यह शर्त रही कि दोनों पानी के मटके घर ले चलते है जिसका मटका हर्ष पहले उतरेगा उसके प्रति ही हर्ष का अधिक स्नेह समझा जायेगा | हर्ष इस विवाद से अनभिग्य था | पानी लेकर जब घर आई तो हर्ष ने पहले मटका अपनी पत्नी का उतार दिया | इससे जीण को आत्मग्लानि व हार्दिक ठेस लगी | भाई के प्रेम में अभाव जान कर जीण के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह घर से निकल पड़ी | जब भाई हर्ष को कर्तव्य बोध हुआ तो वो जीण को मनाकर वापस लाने उसके पीछे निकल पड़ा | जीण ने घर से निकलने के बाद पीछे मुड़कर ही नहीं देखा और अरावली पर्वतमाला के इस पहाड़ के एक शिखर जिसे "काजल शिखर" के नाम से जाना जाता है पहुँच गई | हर्ष भी जीण के पास पहुँच अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा चाही और वापस साथ चलने का आग्रह किया जिसे जीण ने स्वीकार नहीं किया | जीण के दृढ निश्चय से प्रेरित हो हर्ष भी घर नहीं लौटा और दुसरे पहाड़ की चोटी पर भैरव की साधना में तल्लीन हो गया पहाड़ की यह चोटी बाद में हर्ष नाथ पहाड़ के नाम से प्रसिद्ध हुई | वहीँ जीण ने नव-दुर्गाओं की कठोर तपस्या करके सिद्धि के बल पर दुर्गा बन गई | हर्ष भी भैरव की साधना कर हर्षनाथ भैरव बन गया | इस प्रकार जीण और हर्ष अपनी कठोर साधना व तप के बल पर देवत्व प्राप्त कर लोगो की आस्था का केंद्र बन पूजनीय बन गए | इनकी ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल गई और आज लाखों श्रद्धालु इनकी पूजा अर्चना करने देश के कोने कोने से पहुँचते है |
औरंगजेब को पर्चा :
एक जनश्रुति के अनुसार देवी जीण माता ने सबसे बड़ा चमत्कार मुग़ल बादशाह औरंगजेब को दिखाया था | औरंगजेब ने शेखावाटी के मंदिरों को तोड़ने के लिए एक विशाल सेना भेजी थी | यह सेना हर्ष पर्वत पर शिव व हर्षनाथ भैरव का मंदिर खंडित कर जीण मंदिर को खंडित करने आगे बढ़ी कहते है पुजारियों के आर्त स्वर में माँ से विनय करने पर माँ जीण ने भँवरे (बड़ी मधुमखियाँ ) छोड़ दिए जिनके आक्रमण से औरंगजेब की शाही सेना लहूलुहान हो भाग खड़ी हुई | कहते है स्वयं बादशाह की हालत बहुत गंभीर हो गई तब बादशाह ने हाथ जोड़ कर माँ जीण से क्षमा याचना कर माँ के मंदिर में अखंड दीप के लिए सवामण तेल प्रतिमाह दिल्ली से भेजने का वचन दिया | वह तेल कई वर्षो तक दिल्ली से आता रहा फिर दिल्ली के बजाय जयपुर से आने लगा | बाद में जयपुर महाराजा ने इस तेल को मासिक के बजाय वर्ष में दो बार नवरात्रों के समय भिजवाना आरम्भ कर दिया | और महाराजा मान सिंह जी के समय उनके गृह मंत्री राजा हरी सिंह अचरोल ने बाद में तेल के स्थान पर नगद २० रु. ३ आने प्रतिमाह कर दिए | जो निरंतर प्राप्त होते रहे | औरंगजेब को चमत्कार दिखाने के बाद जीण माता " भौरों की देवी " भी कही जाने लगी | एक अन्य जनश्रुति के अनुसार औरंगजेब को कुष्ठ रोग हो गया था अतः उसने कुष्ठ निवारण हो जाने पर माँ जीण के मंदिर में एक स्वर्ण छत्र चढाना बोला था | जो आज भी मंदिर में विद्यमान है |
शेखावाटी के मंदिरों को खंडित करने के लिए मुग़ल सेनाएं कई बार आई जिसने खाटू श्याम ,हर्षनाथ ,खंडेला के मंदिर आदि खंडित किए | एक कवि ने इस पर यह दोहा रचा -
देवी सजगी डूंगरा , भैरव भाखर माय |
खाटू हालो श्यामजी , पड्यो दडा-दड खाय ||
खंडेला के मंदिरों पर भी जब मुग़ल सेना ने आक्रमण किया तब खंडेला का राजा पहाडो में जा छिपा लेकिन मंदिरों की रक्षार्थ सुजाण सिंह शेखावत जो उस समय अपनी शादी में व्यस्त था समाचार मिलते ही बीच फेरों से अपनी नव वधु को लेकर अपने साथियों सहित खंडेला पहुँच शाही सेना से भीड़ गया और शौर्यपूर्वक लड़ता हुआ वीर गति को प्राप्त हुआ | इस सम्बन्ध में एक दोहा इस प्रकार है :-
झिर मिर- झिर मिर मेवा बरसे ,मौरां छतरी छाई जी |
जग में है आव सुजाणा , फौज देवरे आई जी ||
हर्षनाथ पहाड़ पर हर्षनाथ भैरव व सीकर के राव राजा शिव सिंह द्वारा बनाया गया शिव मंदिर की मुग़ल सेना द्वारा खंडित मुर्तिया आज भी वहां पड़ी है जो पुरातत्व विभाग के अधीन है जिसे मैंने भी कई बार देखा है इनमे से कुछ खंडित मुर्तिया मैंने सीकर के जानना महल में भी सीकर अपनी पढाई के दौरान देखि है |
Jun 7, 2009
स्व.कन्हैयालाल सेठिया की कालजयी रचना " जलम भोम " (जन्म भूमि)
जलम भोम
आ धरती गोरा धोरां री, आ धरती मीठा मोरां री
ईं धरती रो रुतबो ऊंचो, आ बात कवै कूंचो-कूंचो,
आं फ़ोगां मे निपज्या हीरा, आं बांठा में नाची मीरा,
पन्ना री जामण आ सागण , आ ही प्रताप री मा भागण,
दादू रैदास कथी वाणी ,पीथळ रै पाण रयो पाणी,
जौहर री जागी आग अठै, रळ मिलग्या राग विराग अठै,
तलवार उगी रण खेतां में, इतिहास मंड्योड़ा रेतां में,
बो सत रो सीरी आडावळ, बा पत री साख भरै चंबळ,
चूंडावत मांगी सैनाणी, सिर काट दे दियो क्षत्राणी,
ईं कूख जलमियो भामासा , राणा री पूरी मन आसा,
बो जोधो दुर्गादास जबर, भिड़ लिन्ही दिल्ली स्यूं टक्कर,
जुग- जुग मे आगीवाण हुया, घर गळी गांव घमसांण हुया,
पग-पग पर जागी जोत अठै, मरणै स्यूं मधरी मौत अठै,
रुं-रुं मै छतरयां देवळ है, आ अमर जुझारां री थळ है,
हर एक खेजडै खेडां में , रोहीडा खींप कंकेडा मे
मारु री गूंजी राग अठै, बलिदान हुया बेथाग अठै,
आ मायड संता शूरां री, आ भोम बांकुरा वीरां री,
आ माटी मोठ मतीरां री, आ धूणी ध्यानी धीरां री,
आ साथण काचर बोरां री, आ मरवण लूआं लोरां री,
आ धरती गोरा धोरां री, आ धरती मीठा मोरां री |
Jun 5, 2009
क्रांतिकारी कवि केसरी सिंह बारहट

मानव जीवन में जिन लोगों ने समाज और राष्ट्र की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित किया ऐसे बिरले पुरुषों का नाम ही इतिहास या लोगो के मन में अमर रहता है | सूरमाओं,सतियों,और संतो की भूमि राजस्थान में एक ऐसे ही क्रांतिकारी,त्यागी और विलक्षण पुरुष हुए कवि केसरी सिंह बारहट | जिनका जन्म २१ नवम्बर १८७२ में चारण जाति के श्री कृष्ण सिंह बारहट के घर उनकी जागीर के गांव देवपुरा रियासत शाहपुरा में हुआ | केसरी सिंह की एक माह की आयु में ही उनकी माता का निधन हो गया अतः उनका लालन-पालन उनकी दादी माँ ने किया | उनकी शिक्षा उदयपुर में हुई | उन्होंने बंगला,मराठी,गुजराती आदि भाषाओँ के साथ इतिहास,दर्शन (भारतीय और यूरोपीय) मनोविज्ञान,खगोल शास्त्र,ज्योतिष का अध्ययन कर प्रमाणिक विद्वता हासिल की | डिंगल- पिंगल भाषा की काव्य सृजना तो उनके जन्म जात संस्कारों में शामिल थी ही साथ ही बनारस से श्री गोपीनाथ जी नाम के पंडित को बुलाकर इन्हें संस्कृत भाषा की शिक्षा दिलवाई गई | केसरी सिंह के स्वध्याय के लिए उनके पिता कृष्ण सिंह का प्रसिद्ध पुस्तकालय " कृष्ण वाणी विलास " तो उपलब्ध था ही |
राजनीती में वे इटली के राष्ट्रपिता मैजिनी को अपना गुरु मानते थे | मैजिनी की जीवनी वीर सावरकर ने लन्दन में पढ़ते समय मराठी में लिखकर गुप्त रूप से लोकमान्य तिलक को भेजी थी क्योंकि उस समय मैजिनी की जीवनी पुस्तक पर ब्रिटिश साम्राज्य ने पाबन्दी लगा रखी थी | केसरी सिंह जी ने इस मराठी पुस्तक का हिंदी अनुवाद किया था |
शिक्षा प्रसार हेतु योजनाएं :-
केसरी सिंह जी ने समाज खास कर क्षत्रिय जाति को अशिक्षा के अंधकार से निकालने हेतु कई नई-नई योजनाएं बनाई ताकि राजस्थान भी शिक्षा के क्षेत्र में दुसरे प्रान्तों की बराबरी कर सके | उस समय राजस्थान के अजमेर में मेयो कालेज में राजाओं और राजकुमारों के लिए अंग्रेजों ने ऐसी शिक्षा प्रणाली लागु कर रखी थी जिसमे ढल कर वे अपनी प्रजा और देश से कट कर अलग-थलग पड़ जाए | इसीलिय सन १९०४ में नेशनल कालेज कलकत्ता की तरह जिसके प्रिंसिपल अरविन्द घोष थे अजमेर में क्षत्रिय कालेज स्थापित करने की योजना बनाई जिसमे जिसमे राष्ट्रिय भावना की शिक्षा दी जा सके | इस योजना में उनके साथ राजस्थान के कई प्रमुख बुद्धिजीवी साथ थे | इससे भी महत्वपूर्ण योजना राजस्थान के होनहार विद्यार्थियों को सस्ती तकनीकी शिक्षा के लिए सन १९०७-०८ में जापान भेजने की बनाई क्योकि उस सदी में जापान ही एक मात्र एसा देश था जो रूस और यूरोपीय शक्ति को टक्कर दे सकता था |अपनी योजना के प्रारूप के अंत में उन्होंने बड़े ही मार्मिक शब्दों में जापान का सहयोग करने के लिए आव्हान किया -
"जापान ही वर्तमान संसार के सुधरे हुए उन्नत देशों में हमारे लिए शिक्षार्थ आश्रणीय है ; हमारे साथ वह देश में देश मिलाकर (एशियाटिक बनकर) ,रंग में रंग मिलाकर, (यहाँ रंग से मतलब Racial Colours से है जैसे व्हाइट,रेड ब्लैक) दिल में दिल मिलाकर , अभेद रूप से , उदार भाव से, हमारे बुद्ध भगवान के धर्मदान की प्रत्युपकार बुद्धि से- मानव मात्र की हित-कामना-जन्य निस्वार्थ प्रेमवृति से सब प्रकार की उच्चतर महत्वपूर्ण शिक्षा सस्ती से सस्ती देने के लिए सम्मान पूर्वक आव्हान करता है |"
इस स्कीम में उन्होंने ऐसे नवीन विचार पेश किये जो उस समय सोच से बहुत आगे थे कि अब जमाना " यथा राजा तथा प्रजा " का न होकर "यथा प्रजा तथा राजा" का है |
शिक्षा के माध्यम से केसरी सिंह जी ने सुप्त क्षात्रधर्म को जागृत करने हेतु क्षत्रिय और चारण जाति को सुशिक्षित और सुसंगठित कर उनके वंशानुगत गुणों को सुसंस्कृत कर देश को स्वत्तन्त्रता दिलाने का एक भगीरथ प्रयत्न प्रारंभ किया था | इनकी इस योजना में सामाजिक और राजनैतिक क्रांति के बीज थे | केसरी सिंह ने इस विस्तृत योजना में क्षात्र शिक्षा परिषद् और छात्रावास आदि कायम कर मौलिक शिक्षा देने की योजना बनाई और सन १९११-१२ में "क्षत्रिय जाति की सेवा में अपील " निकाली | यह अपील इतनी मार्मिक थी कि बंगाल के देशभक्त विद्वानों ने कहा कि यह अपील सिर्फ क्षत्रिय जाति के लिए ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतीय जाति के नाम निकालनी चाहिए थी |
अक्षर के स्वरूप पर शोध कार्य
शिक्षा के प्रसार के साथ ही वैज्ञानिक खोज का एक बिलकुल नया विषय केसरी सिंह जी ने सन १९०३ में ही " अक्षर स्वरुप री शोध " का कार्य आरम्भ किया | कुछ वर्ष पहले इस प्रारम्भिक शोध के विषय पर केसरी सिंह जी के एक निकट सम्बन्धी फतह सिंह मानव ने राजस्थान विश्वविद्यालय के फिजिक्स के विभागाध्यक्ष से बात करी तो उन्होंने बताया कि अमेरिका की एक कंपनी Bell Company ने लाखों डालर अक्षर के स्वरूप की शोध में खर्च कर दिए लेकिन सफलता नहीं मिली | उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि राजस्थान जैसे पिछडे प्रदेश में और उसमे भी शाहपुरा जैसी छोटी रियासत में रहने वाले व्यक्ति के दिमाग में अक्षर के स्वरूप की शोध की बात कैसे आई |
शस्त्र क्रांति के माध्यम से देश की स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रयास :
उन्नीसवी शताब्दी के प्रथम दशक में ही युवा केसरी सिंह का पक्का विश्वास इसी सिद्धांत पर था कि आजादी सशस्त्र क्रांति के माध्यम से ही संभव है | अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के ज्ञापनों से आजादी नहीं मिल सकती | सन १९०३ में वायसराय लार्ड कर्जन द्वारा आहूत दिल्ली दरबार में शामिल होने से रोकने के लिए उन्होंने उदयपुर के महाराणा फतह सिंह को संबोधित करते हुए " चेतावनी रा चुंगटिया " नामक सौरठे लिखे जो उनकी अंग्रेजो के विरूद्व भावना की स्पष्ट अभिव्यक्ति थी | सशस्त्र क्रांति की तैयारी के लिए प्रथम विश्व युद्ध (१९१४) के प्रारम्भ में ही वे इस कार्य में जुट गए और अपने दो रिवाल्वर क्रांतिकारियों को दिए और कारतूसों का एक पार्सल बनारस के क्रांतिकारियों को भेजा व रियासती और ब्रिटिश सेना के सैनिको से संपर्क किया | एक गुप्त रिपोर्ट में अंग्रेज सरकार ने कहा कि केसरी सिंह राजपूत रेजिमेंट से संपर्क करना चाह रहा था |
उनका संपर्क बंगाल के विप्लव दल से भी था और वे श्री अरविन्द से बहुत पहले १९०३ में ही मिल चुके थे तथा महान क्रान्तिकारी रास बिहारी बोस व शचीन्द्र नाथ शान्याल,ग़दर पार्टी के लाला हरदयाल और दिल्ली के क्रान्तिकारी मास्टर अमीरचंद व अवध बिहारी से घनिष्ठ सम्बन्ध थे | ब्रिटिश सरकार की गुप्त रिपोर्टों में राजपुताना में विप्लव फैलाने के लिए केसरी सिंह बारहट व अर्जुन लाल सेठी को खास जिम्मेदार माना गया |
राजद्रोह का मुकदमा :
केसरी सिंह पर ब्रिटिश सरकार ने प्यारे लाल नाम के एक साधू की हत्या और अंग्रेज हकुमत के खिलाफ बगावत व केन्द्रीय सरकार का तख्ता पलट व ब्रिटिश सैनिकों की स्वामिभक्ति खंडित करने के षड़यंत्र रचने का संगीन आरोप लगाकर मुकदमा चलाया गया | इसकी जाँच के लिए मि. आर्मस्ट्रांग आई.पी.आई. जी. इंदौर को सौंपी गई जिसने २ मार्च १९१४ को शाहपुरा पहुँच शाहपुरा के राजा नाहर सिंह के सहयोग से केसरी सिंह को गिरफ्तार कर लिया | इस मुकदमे में स्पेशल जज ने केसरी सिंह को २० वर्ष की सख्त आजन्म सजा सुनाई और राजस्थान से दूर हजारी बाग़ केन्द्रीय जेल बिहार भेज दिया गया | जेल में उन्हें पहले चक्की पिसने का कार्य सौपा गया जहाँ वे दाल व अनाज के दानो से क ख ग आदि अक्षर बना कर अनपढ़ कैदियों को अक्षर ज्ञान देते और अनाज के दानो से ही जमीन पर भारत का नक्शा बना कर कैदियों को देश के प्रान्तों का ज्ञान कराते थे | केसरी सिंह का नाम उस समय कितना प्रसिद्ध था उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उस समय श्रेष्ठ नेता लोकमान्य तिलक ने अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन में केसरी सिंह को जेल से छुडाने का प्रस्ताव पेश किया था |
जेल से छूटने के बाद :
हजारी बाग़ जेल से छूटने के बाद अप्रेल १९२० में केसरी सिंह ने राजपुताना के एजेंट गवर्नर जनरल (आबू ) को एक बहुत सारगर्भित पत्र लिखा जिसमे राजस्थान और भारत की रियासतों में उतरदायी शासन पद्धति कायम करने के लिए सूत्र रूप से योजना पेश की | इसमें "राजस्थान महासभा" के गठन का सुझाव था जिसमे दो सदन (प्रथम) भूस्वामी प्रतिनिधि मंडल (जिसमे छोटे बड़े उमराव,जागीरदार) और "द्वितीय सदन" सार्वजनिक प्रतिनिधि परिषद् (जिसमे श्रमजीवी,कृषक,व्यापारी ) का प्रस्ताव था | महासभा के अन्य उद्देश्यों के साथ एक उद्देश्य यह भी था :-
"राज्य में धार्मिक,सामाजिक,नैतिक,आर्थिक,मानसिक,शारीरिक और लोक हितकारी शक्तियों के विकास के लिए सर्वांगीण चेष्ठा करना |" इस पत्र में उनके विचार कितने मौलिक थे उसका अंदाज उनके कुछ वाक्यांशों को पढने से लगता है , " प्रजा केवल पैसा ढालने की प्यारी मशीन है और शासन उन पैसों को उठा लेने का यंत्र " ....... शासन शैली ना पुरानी ही रही ना नवीन बनी , न वैसी एकाधिपथ्य सत्ता ही रही न पूरी ब्यूरोक्रेसी ही बनी | ........ अग्नि को चादर से ढकना भ्रम है -खेल है- या छल है मेरी यही शाक्षी देती है | जिस ज़माने में ब्रिटिश सत्ता को कोई खास चुनौती नहीं थी और रियासतों में नरेशों का एक छत्र शासन था उस समय सन १९२०-२१ में उनके विचारों में प्रजा की शक्ति का कितना महत्व था कि उन्होंने रियासतों के राजाओं के लिए लिखा - " भारतीय जन शक्ति के अतिरिक्त भारत में और कोई समर्थ नहीं,अतः उससे सम्बन्ध तोड़ना आवश्यक नहीं" |
उत्तर जीवन :
सन १९२०-२१ में सेठ जमनालाल बजाज द्वारा आमंत्रित करने पर केसरी सिंह जी सपरिवार वर्धा चले गए | जहाँ विजय सिंह पथिक जैसे जन सेवक पहले से ही मौजूद थे | वर्धा में उनके नाम से " राजस्थान केसरी " साप्ताहिक शुरू किया गया जिसके संपादक विजय सिंह पथिक थे | वर्धा में ही केसरी सिंह का महात्मा गाँधी से घनिष्ठ संपर्क हुआ | उनके मित्रो में डा.भगवानदास (पहले भारत रत्न) ,राजर्षि बाबू पुरुषोतम दास टंडन,गणेश शंकर विद्यार्थी , चंद्रधर शर्मा , माखनलाल चतुर्वेदी राव गोपाल सिंह खरवा ,अर्जुनलाल सेठी जैसे स्वतंत्रता के पुजारी शामिल थे |
देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ होम कर देने वाले क्रान्तिकारी कवि केसरी सिंह ने १४ अगस्त १९४१ को " हरी ॐ तत् सत् " के उच्चारण के साथ अंतिम साँस ली |
महाराणा फतह सिंह को दिल्ली दरबार में जाने से रोकने के लिए रचे सौरठे "चेतावनी रा चुंगटिया " और लार्ड कर्जन की कोटा यात्रा के समय कोटा के राजकीय कवि की हैसियत से कर्जन को भेंट (द्विअर्थी )लघु काव्य "कुसुमांजलि" के बारे में चर्चा अगले लेख में |
पिछली गांव यात्रा के दौरान केसरी सिंह जी के बारे में जानकारी मांगने पर आदरणीय श्री सोभाग्य सिंह जी ने अपनी वर्द्धावस्था के बावजूद जागती जोत मासिक पत्रिका का नवम्बर १९९६ का अंक ढूंढ़ कर मुझे दिया | इस अंक में केसरी सिंह जी के जीवन पर फतह सिंह मानव जो केसरी सिंह जी निकट रिश्तेदार है (शायद दामाद ) के द्वारा राजस्थानी भाषा में काफी लम्बा आलेख छपा था जिसे मैंने हिंदी में अनुवाद कर संक्षिप्त रूप से यहाँ पेश किया है |
Jun 3, 2009
एक अदभूत उपहार

२८ अप्रैल २००९ को पुत्र की शादी में नए ब्लोगर मित्र नरेश जी के अलावा पुराने व अभिन्न मित्र रविन्द्र जी जाजू भीलवाडा से, भवानी सिंह जी (डूकिया),लक्ष्मण सिंह जी (कुकन्वाली),भंवर सिंह जी ( थाणु ) ,सतेन्द्र जी राठी (बिजनोर,उ.प्र.),महिपाल जी (बलोदा),जीतेन्द्र जी (घनाऊ) ,भाजपा नेता सुरेन्द्र सिंह जी (सरवडी),मनोहर सिंह जी (झुनकाबास) आदि शरीक हुए | मेरे घर पर आयोजित होने वाले लगभग सभी शादी समारोह में भाग लेने वाले भाजपा नेता श्री रिछपाल सिंह जी कविया इस बार दार्जिलिंग में श्री जसवंत सिंह के चुनाव प्रचार कार्य में व्यस्त होने के कारण नहीं पहुँच पाए | अब सभी दोस्त व रिश्तेदार शादी समारोह में पहुंचे तो जाहिर है दुल्हे को तो ढेर उपहार सारे मिले | इन उपहारों में एक उपहार बहुत ही अद्भुत था जो लेकर आए थे मेरे अभिन्न मित्र श्री रविन्द्र जी जाजू |

रविन्द्र जी से मेरी मित्रता सीकर के जैन स्कूल में ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ते हुए हुई थी जो आज तक उसी रूप में बरकरार है | हाल में रविन्द्र जी जाजू भीलवाडा में कपडे का बहुत बड़ा कारोबार करते है | अपने बचपन से ही संघ से जुड़े रविन्द्र जी बहुत ही सामाजिक , मिलनसार और लगभग हर विषय से सम्बंधित सुलझे व्यक्ति है | यही वजह है कि रविन्द्र जी का कारोबारी व सामाजिक दायरा देश के लगभग सभी क्षेत्रो में है |
बात चल रही थी अदभूत उपहार कि तो यह उपहार था एक पुस्तक " स्वदेशी चिकित्सा सार" | डा. अजीत मेहता द्वारा लिखित इस पुस्तक में सिर से पांव तक के चुने हुए रोगों के अचूक घरेलु इलाज के नुस्खे है | इस पुस्तक को मै अदभूत इसलिए कह रहा हूँ क्योकि रेल्वे स्टेशनों की स्टाल पर आसानी से उपलब्ध इस साधारण सी पुस्तक में लिखे नुस्खों का चमत्कार मै पिछले नौ साल से देखता आ रहा हूँ |मेरा इस पुस्तक से परिचय आज से नौ वर्ष पूर्व सूरत प्रवास के दौरान मेरे एक अभिन्न मित्र रामपाल जी गाडोदिया ने इस पुस्तक की एक प्रति दिखाते हुए दिल्ली रेल्वे स्टेशन से एक पुस्तक खरीद कर भिजवाने के आग्रह के साथ कराया था | सूरत से दिल्ली पहुंचते ही मैंने दो पुस्तके खरीदी एक रामपाल जी को भेज दी व दूसरी प्रति पर मेरे एक अन्य मित्र अरुण खुराना की नजर पड़ गयी | जिन्होंने पढने के बाद यह पुस्तक अपने पास ही रखली और वे पिछले नौ सालो से बीमार पड़ने पर इस पुस्तक में लिखे घरेलु नुस्खो से ही अपना व अपने परिवार का इलाज करते है और आज तक इन नौ सालों में उनके परिवार का कोई सदस्य कभी डाक्टर के पास नहीं गया | इसी चमत्कार को देखकर ही मै इस पुस्तक को अदभूत कहता हूँ |
रविन्द्र जी जाजू ने भी इस पुस्तक के कई नुस्खो व उपायों को आजमाया है और अब बकौल रविन्द्र जी कि " इस पुस्तक की मै २०० से २५० के लगभग प्रतियां हर वर्ष खरीदता हूँ और जहाँ भी उपहार देना होता है स्वस्थ जीवन की कामना के साथ यह पुस्तक उपहार स्वरूप भेंट करता हूँ | साथ ही मजाक में कहते है कि " कई लोग तो मुझे समारोह में आने का निमंत्रण भी इसीलिए देते है कि आएगा तो उपहार में "स्वदेशी चिकित्सा सार " पुस्तक तो भेंट मिल ही जायेगी |

नरेश जी व अन्य मित्रों के साथ
ज्ञान दर्पण पर ५ जून २००९ को प्रात: ५.५५ बजे क्रांतिकारी कवि केसरी सिंह बारहट का परिचय प्रकाशित होगा |
Jun 1, 2009
पैसे का ग्रुप चेक किया क्या ?
ढाई किलो होता हे
ओ़र मरने के बाद अग्नि संस्कार के बाद उसकी राख का वजन भी
ढाई किलो होता हे |
जिन्दगी का पहला कपडा जिसका नाम हे ,ज़बला,
जिसमे जेब नहीं होती हे |
जिन्दगी का आखरी कपडा कफन ,
जिसमे भी जेब नहीं होती हे |
तो बिचके समय में जेब के लिए इतनी जंजाल क्यू ?
इतने छल और कपट क्यू ?
खून की बोतल लेने के पहले ब्लड ग्रुप चेक करते हे ,
पेसे लेते वक़्त जरा चेक करोगे की ,
पैसा कौनसे ग्रुप का हे ?
न्याय का हे ? हाय का हे ? या हराम का हे ?
और गलत ग्रुप का पैसा घरमें आ जाने से ही
आज घर में अशांति ,लडाई और झगड़ा है |
हराम और हाय का पैसा
दवाखाने , क्लब ,कोठा और बार में
ख़तम हो जायेगा
और आपको भी ख़तम कर देगा
बैंक बेलेन्स तो बढेगा ,पर परिवार का बेलेन्स कम होगा
तो समझना की पैसा हमें सूट नहीं हो रहा हे |
जनहित के कल्याण के लिए
'' जय श्री राम
उपरोक्त तुकबंदी लाडनू से जयपाल सिंह ने मुझे ऑरकुट पर स्क्रप की |
ब्लॉग जगत में जिस तरह ब्लोगर टिप्पणियों के लालायित रहते है ठीक उसी तरह ऑरकुट पर भी लोग स्क्रप के लिए लालायित रहते है और स्क्रप पाने के लिए कई बार अनुरोध करते है अब देखिय योगेन्द्र को किसी के द्वारा स्क्रब न करना कितना सता रहा है |
ऑरकुट वालो ...खमा घनी ..... ,
ओरकुट री गल्या मे थारी ही याद आवे हे सा ...
Scrap नहीं करन री वजह बार बार सतावे हे ....
सोच रिहया का शायद थाने कोई गम हे जी ........
या पछे थारे दील्डा मे म्हारे लीये जगह कोण्या हे सा ...........,
कदे कदे महोब्बत मे जुदाई भी आवे हे सा ...
पर जुदाई प्यार ने और गह्रो बना जावे हे सा....
दो पल री जुदाई मे आंसू मन बहा भायला.....
जुदाई री तड़प प्यार ने और प्यारो बना जावे हे सा
५ जून २००९ को सुबह ५.५५ बजे पढ़े, एक ऐसे क्रान्तिकारी कवि के बारे में जिसने देश की स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ (जागीर तक) होम कर दिया | और उनके रचे चुटीले दोहे पढ़कर हिंदुआ सूर्य उदयपुर के महाराणा फतह सिंह ने वायसराय लार्ड कर्जन द्वारा आहूत दिल्ली दरबार में भाग नहीं लिया |





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