राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .

जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !

मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.

"एलोवेरा " ब्लॉग ट्रैफिक के लिए भी है खुराक

एलोवेरा शारीरिक स्वास्थ्य के साथ साथ ब्लॉग के लिए भी एक बढ़िया टॉनिक है , एक बढ़िया की-वर्ड जो गूगल से आसानी से पाठक झटक कर आपके ब्लॉग पर ट्रैफिक बढ़ा सकता है |.

"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था

उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.

क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत

आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.

ज्ञान दर्पण के लेख इन्टरनेट पर दुबारा कहीं भी प्रकाशित करना सख्त मना है| पर प्रिंट मिडिया में नाम सहित छापने की खुली छूट है|

May 28, 2009

खूड का संक्षिप्त इतिहास

शेखावाटी क्षेत्र का खूड ठिकाना सीकर जिले में जिला मुख्यालय से २७ किलोमीटर दूर सीकर डीडवाना (नागौर ) रोड पर स्थित है |
आजादी से पूर्व यह क़स्बा जहाँ आस-पास के गांवों का प्रशासनिक केंद्र था वही आज यह क़स्बा आप-पास के गांवों के विद्यार्थियों का प्रमुख शिक्षा केंद्र होने के अलावा आस-पास के गांवों के लोगो के आम जरुरत के सामान की खरीददारी करने का मुख्य बाजार है | प्रस्तुत है शेखावाटी के इस पूर्व ठिकाने व यहाँ शासन करने वाले शेखावत वंश के जागीरदारों का संक्षिप्त इतिहास राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार व इतिहासकार श्री सोभाग्य सिंह जी की कलम से ....
शेखावाटी का ठिकाना खूड खंडेला के राजा गिरधरदास रायसलोत की परम्परा में था | राजा गिरधरदास के पोत्र राजा वरसिंहदेव के छोटे पुत्र श्याम सिंह जी को यह ठिकाना प्राप्त हुआ | यह बारह गांवों का ताजिमी ठिकाना था | ठाकुर श्याम सिंह जी ने शेखावाटी के प्रसिद्ध युद्ध हरिपुरा के रणक्षेत्र में अपने भतीजे खंडेला के राजा केसरी सिंह और डूकिया के ठाकुर व अपने भाई मोहकम सिंह आदि के साथ शाही सेना से संवत.... में युद्ध लड़ा था | इस युद्ध में राजा केसरी सिंह लाडखानियों व मनोहरपुर शाहपुरा के शेखावत समूह द्वारा छलाघात के कारण युद्ध में पराजित होकर वीरगति को प्राप्त हुए और ठाकुर श्याम सिंह और ठाकुर मोहकम सिंह घावों से परिपूर्ण होकर जीवित बच गए थे | ठाकुर श्याम सिंह जी की मृत्यु उपरांत समृति में खूड स्थित ठिकाने के शमशान में चार खम्बों की एक छतरी निर्मित है | ठाकुर श्याम सिंह के उतराधिकारी क्रमश: ठाकुर किशोर सिंह,ठाकुर मोहन सिंह और ठाकुर रूप सिंह हुए | ठाकुर रूप सिंह ने अपने नाम पर पहाड़ पर एक सुद्रढ़ किला बनवाया और रुपगढ़ नामक ग्राम बसाया | रुपगढ़ खूड ठिकाने की युद्ध कालीन राजधानी थी | वहां पहाड़ी की तलहटी में जनाने तथा मर्दाने महल और रघुनाथ जी का मंदिर भी उन्होंने ही बनवाया था | ठाकुर रूप सिंह झुंझुनू के अधिपति ठाकुर शार्दुल सिंह, सीकर के राव शिव सिंह और रामगढ के ठाकुर गुमान सिंह के समकालीन थे | राव शिव सिंह के फतेहपुर विजय में अपने अन्य शेखावत भ्राताओं के साथ ठाकुर रूप सिंह भी सम्मिलित थे | उनके बड़े भाई कुंवर अजित सिंह मल्हारराव होलकर की सेना से लड़ते हुए अपने अनेक भाई बंधुओं तथा सैनिको के साथ मारे गए थे | उनके वीरगति प्राप्त करने पर उनकी कुंवरानी ने चिता में प्रवेश कर सहगमन किया था | उन दोनों पर रुपगढ़ ग्राम में निर्मित कुआँ पर दो छतरियां बनी हुई है | ठाकुर रूप सिंह के निधन के बाद ठाकुर भगत सिंह ठिकाना खूड के स्वामी बने | ठाकुर भगत सिंह शेखावाटी के खाटूश्याम जी के प्रसिद्ध युद्ध में वि.स.१८३६ में मूर्तज्जाअली भडेच शाही सेनानायक से लोमहर्षक युद्ध लड़कर वीर गति को प्राप्त हुए राजस्थान के अनेक कवियों ने उनकी वीरता का अपने काव्यों व स्फुट छंदों में ओजस्वी वर्णन किया है |
इस युद्ध में शाहीसेना के मुहम्मद अहम्मद, दावदी के समान चौदह प्रमुख योद्धा तथा एक हजार आठ सौ सैनिक काम आये | और जयपुर तथा शेखावाटी के पक्ष के दो हजार दौ सौ सैनिक व योद्धा काम आये |
ठाकुर भगत सिंह की वीरगति की सूचक खाटू में चार खम्बों की एक बड़ी छतरी विद्यमान है | उनके पास ही ठाकुर चुहड़ सिंह नाथावत डूंगरी के स्वामी पर बनी छतरी भी खाटू से पश्चिम में एक टिबे पर विद्यमान है |
ठाकुर भगत सिंह के क्रमानुयायी ठाकुर मोती सिंह थे | ठाकुर मोती सिंह को अवयस्क अवस्था में ही जयपुर के महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने जयपुर में आमंत्रित कर चीनी की बुर्ज के निकट तम्बू खडा करवा कर उनकी मातमी का दस्तूर किया था | उसी अवसर पर शेखावाटी के अन्य सरदारों के समान उनको कुर्ब तथा दरबार में बैठक आदि का सम्मान प्रदान किया था | ठाकुर भगत सिंह की वीरता और स्वामिभक्ति पर प्रसन्न होकर रुपगढ़ के पास स्थित ठेठ ग्राम की बावन हजार बीघा भूमि और रुपगढ़ के नाका के पास लाये -लेजाये जाने वाले माल की राहदारी लेने का अधिकार भी खूड ठिकाने को प्रदान किया था | ठाकुर मोती सिंह की अवयस्क आयु में ठिकाने का शासनाधिकार,विशेष दरबार का आयोजन स्पष्टत: जयपुर महाराज की ठाकुर भगत सिंह की रण मृत्यु के प्रति श्रद्धा सम्मान और ठाकुर मोती सिंह के प्रति अनुग्रह-आत्मीयता प्रकट करने का बोधक है | ऐसे ही आदर और गौरव प्राप्त करने की भावनाओं के कारण राजपूत योद्धा रण में अपना बलिदान करते थे | अमूल्य जीवन के बदले सम्मान और कुछ भूमि खंड प्राप्त कर उनके उतराधिकारी अपने आपको धन्य मानते थे | मृतक के परिवार की यही भविष्य-निधि और जीवनवृति थी |
ठाकुर मोती सिंह की मृत्यु भी यौवन काल में ही हो गयी थी | कथन है कि खंडेला से खूड आते समय मार्ग में ही विष-प्रयोग के कारण उनका निधन हो गया था | उनकी यादगार में खंडेलावाटी के नांगल-भरडा नामक ग्राम में छतरी बनी हुई है | ठाकुर मोती सिंह पुत्र ठाकुर कर्ण सिंह और ठाकुर कर्ण सिंह के पुत्र ठाकुर राज सिंह थे | ठाकुर राज सिंह ने खूड दुर्ग में रणवास के महल और कई मर्दाने भवन बनवाये थे | खूड के राजकीय शमशान स्थल पर अपने पिता कर्ण सिंह व माजी साहिबा जोधी जी पर वि.स. १९२५ में छ: खम्भों की दो जुड़वां छतरी का निर्माण करवाया था | ठाकुर राज सिंह ने कवियों आदि को भूमि,घोडे और ऊंट आदि का दान देकर अपनी उदार छवि का परिचय दिया था उनकी उदार वृति पर सर्जित कई डिंगल गीत,सौरठे, दोहे और कवित मिलते है | ठाकुर राज सिंह के पुत्र ठाकुर रामप्रताप सिंह हुए और उनके पुत्र ठाकुर उदय सिंह हुए | ठाकुर उदय सिंह जयपुर राज्य के खबरनवीस के दरोगा के पद पर रहे | ठाकुर उदय सिंह के बारे में ठाकुर अमर सिंह चाम्पावत ने अनेकश: अपनी दैनिकी में उल्लेख किया है | वे मेयो कालेज के डिप्लोमाधारी थे | खूड में उद्यान "उदय निवास" भवन और जयपुर में खूड हॉउस का आधुनिकरण उन्होंने ही करवाया | राजा हम्मीर सिंह खंडेला, राजा सज्जन सिंह खंडेला, महाराजा सर प्रताप सिंह ईडर , ठाकुर गोपाल सिंह चौकडी, ठाकुर भुर सिंह मलसीसर,ठाकुर रूप सिंह नवलगढ़, राव रामप्रताप सिंह मनोहरपुर-शाहपुरा और राणा राजेंदर सिंह झालावाड से उनके बड़े आत्मीयता तथा मित्रता के मधुर सम्बन्ध थे |
ठाकुर उदय सिंह के निधन के बाद ठाकुर मंगल सिंह खूड जागीर के आखिरी अधिपति बने |

May 19, 2009

पासवान की हार :सबसे ज्यादा ख़ुशी हुई

इन चुनावों में रामविलास पासवान के हारने पर मुझे सबसे ज्यादा ख़ुशी हुई | पिछले साल इस व्यक्ति ने वोटों के लालच में बंगालादेशी घुसपेटियों को नागरिकता की मांग कर सबसे गलत काम किया था जिन लोगों को देशहित से ज्यादा वोट बैंक अच्छा लगता है उनके साथ ऐसा ही सलूक होना चाहिय |

May 13, 2009

ठाकुर मंगल सिंह जी ,खुड

ठाकुर उदय सिंह जी के स्वर्गवास पर उनके एक मात्र पुत्र मंगल सिंह खुड जागीर के अधिपति बने | ठाकुर मंगल सिंह जी का जन्म सन १९१२ में हुआ था और उनकी शिक्षा अजमेर के मेयो कालेज में हुई | ठाकुर मंगल सिंह जी राजस्थान में अपने प्रकार के अपने युग के एक मात्र व्यक्ति थे | स्वतंत्रता प्रेमी, समाज सुधारक, राष्ट्र भक्त, गाँधी जी के खादी ग्रामोद्योग कार्यक्रम के समर्थक, गो-सेवक, शिक्षा प्रेमी और उच्च विचारों के तपस्वी पुरुष थे | रियासत काल में उन्होंने अपने ठिकाने में कई पाठशालायें और रुपगढ़ ग्राम में श्री रामप्रताप ग्राम सुधार आवासीय हाई स्कूल की स्थापना की जिसमे खुड ठिकाने के ग्रामो के अलावा उदयपुरवाटी, सीकर वाटी , नागौर व दांता-रामगढ ठिकाने के गांवों के विद्यार्थी विद्यार्जन करते थे | ठाकुर मंगल सिंह जी महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय जयपुर के सह्पाटी, ऐ.डी.सी. और सवाई मानगार्ड में केप्टन रहे | राजकीय सेवा से त्याग पत्र देकर उन्होंने ग्राम सुधार और क्षत्रिय-संगठन के लिए अपना जीवन समर्पित किया और जीवन पर्यन्त खादी के वस्त्रों का उपयोग किया | राजस्थान स्वयं सैनिक-समाज,रामराज्य सभा आदि संस्थाओं के वे प्रमुख संस्थापकों में थे | प्रसिद्ध देश भक्त जमनालाल बजाज , प. हीरालाल शास्त्री,रावल नरेन्द्र सिंह जोबनेर, महाराव उम्मेद सिंह कोटा, महाराजा उम्मेद सिंह जोधपुर,योगिराज अरविन्द, स्वामी करपात्री जी, सदाशिव माधव राव गोलवलकर,महाराजा राम सिंह सीतामऊ,महाराजा राणा भवानी सिंह दांताभावानगढ़, भारत के प्रथम राष्ट्रपति बाबू राजेंद्रप्रसाद आदि से आपका अति-स्नेह सम्बन्ध था | सीकर और जयपुर के मध्य १९३८ के संघर्ष और १९४२ की उदयपुर वाटी पर जयपुर की सेन्य चढाई का उन्होंने सामना कर अपने भाइयों के सम्मान और अधिकारों के लिए नेतृत्त्व ग्रहण कर जयपुर राज्य के कोपभाजन बनने का खतरा मोल लिया था |जागीर उन्मूलन के पश्चात उन्होंने अपने ठिकाने के घोडे और गायें भी सदाकत आश्रम पटना, वनस्थली विद्यापीठ जयपुर, चौपासनी विधालय जोधपुर और अपने ठिकाने के ग्रामवासियों और कवियों को प्रदान कर अपनी उदारता और समाज हितैषिता का परिचय दिया था | हिंसकजीवों की आखेट,घोडे और गो-पालन की और उनकी आजीवन रूचि बनी रही | वे सादा रहन-सहन और उच्च विचार कथनोक्ति के साक्षात् प्रतिरूप थे | उनकी देश भक्ति ,समाज प्रेम और शीलता आदि गुणों का कवि कवियों ने अपनी रचनाओं में जिक्र किया है | ४ फरवरी १९७६ को को आपका निधन हो गया |
ठा.सोभाग्य सिंह जी की कलम से



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