राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .

जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !

मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.

"एलोवेरा " ब्लॉग ट्रैफिक के लिए भी है खुराक

एलोवेरा शारीरिक स्वास्थ्य के साथ साथ ब्लॉग के लिए भी एक बढ़िया टॉनिक है , एक बढ़िया की-वर्ड जो गूगल से आसानी से पाठक झटक कर आपके ब्लॉग पर ट्रैफिक बढ़ा सकता है |.

"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था

उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.

क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत

आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.

ज्ञान दर्पण के लेख इन्टरनेट पर दुबारा कहीं भी प्रकाशित करना सख्त मना है| पर प्रिंट मिडिया में नाम सहित छापने की खुली छूट है|

Apr 25, 2009

एक बेवफा की याद में :कमलेश चौहान

ए दोस्तो जिंदगी के हादसे कुछ इस तरह् से गुजरे
हर बार दर्द के दरिया मै तिनके की तरह बह गये

वो क्यों बिछड़ गया ईसकी हमें कोई सोच नाही
गिला तो जिंदगी से है जो हज़ारो लम्हो मै बॅट गयी

होगी कोई उसकी मजबूरी जो वो हुमसे बिछड़ गया
होगा शायद मुझी मै कोई दोष जो इस कदर रूठ गया

पहले पहल यू उसने अपनी नजरों मै छुपा लिया
बिठाकर हमें आसमां पे फिर ज़मीन पे गिरा दिया

गिरते है लोग हज़ारो मंज़िलो से हर रोज
कटते है दिल और जिगर खंज़रो से हर रोज

तो क्या हुआ वक्त की तलवार से कटा हमारा सम्मान
लो सुन लो हारी हुई जिंदगी का पैग़ाम

हम तो आसमान से गिरकर खाक ही मै मिल गये
अजीब दास्तान यह हुई तुम हमारी ऩज़रो से ही गिर गये


यह पेगाम उनके लिए है जो नज़रे चुरा कर बदल जाते है और सोचते है कि वो दुनिया भर मै सबसे होशयार है !
यह कविता Los Angeles, CA से कमलेश चौहान ने ज्ञान दर्पण पर प्रकाशित करने हेतु भेजी |


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Apr 23, 2009

चुनाव : जातिवाद ,सम्प्रदायवाद और आम आदमी का दर्द !

चुनाव का मौसम चल रहा है सभी पार्टियों ने जिताऊ उम्मीदारों को टिकट देकर चुनावी दंगल में उतार दिया है टिकट देने से पहले हर पार्टी ने ज्यादातर सम्बंधित निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं की जातीय और धार्मिक मतों की गणित के आधार पर ही टिकट वितरण किये है ताकि जातीय व धार्मिक वोट बैंकों की सहायता से चुनावी वैतरणी पर कर ली जाय | सभी नेता चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे है कोई भड़काऊ भाषण दे रहा तो दूसरा उसे नसीहत | अचानक सभी नेताओ को अपनी जाति और धर्म याद आ गए है और उनके मतों का पूरा दोहन करने का जुगाड़ करने में लगे है | कोई हेलिकोप्टर से मतदाताओं को प्रभावित करने में लगा तो कहीं नोटंकी में लड़कियों के नाच से मतदाताओं को प्रभावित करने में लगा | बाहुबली चुनाव बाद मतदातों को देखने की धमकी देकर मत अपनी और खींचने में लगे है | सबका एक ही मकसद किसी भी तरीके से चुनाव जीतकर अपनी सीट पक्की करना | मतदाता भी इसी तरह मत देने के लिए तैयार चुनावी तारीख का इंतजार कर रहा है वह कही जाति के आधार पर वोट देगा तो कहीं धार्मिक आधार पर | कुछ मतदाता इन दोनों बुराईयों से ऊपर उठकर पार्टीलाइन के आधार पर वोट देंगे चाहे उनकी पसंद की पार्टी ने कोई बदमाश, भ्रष्ट या बलात्कारी को ही क्यों न उम्मीदवार बना रखा हो वो पार्टी प्रत्याशी को आँख मूंद कर वोट देंगे | कई मतदाताओं के पास भ्रष्ट व बाहुबलियों को वोट देने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं होगा क्योंकि उनके निर्वाचन क्षेत्र में हो सकता सभी उम्मीदवार इसी श्रेणी के हों अतः या तो वे उसे आँख मूंद कर वोट दे या पप्पू बन जाये | हाँ कुछ मतदाता जरुर खुशकिस्मत होंगे जिनके निर्वाचन क्षेत्र में बहुत अच्छे उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे होंगे |
अब जरा सोचिए जिस देश में पार्टियाँ अपने उम्मीदवार जाति व सम्प्रदाय आदि के आधार पर प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारेगी | मतदाता भी अपना मत जाति ,सम्प्रदाय या पसंद की पार्टी के नाकाबिल उम्मीदवार को मत देकर संसद व विधान सभा में भेजेंगे | उनसे बनने वाली सरकार में मंत्रिपद भी जातीय व साम्प्रदायिक संतुलन बना कर दिए जायेंगे | इस तरह बनने वाली सरकारों से हम देश के चहुंमुखी विकास के साथ जातिवाद सम्प्रदायवाद के खात्मे की उम्मीद कैसे कर सकते है ?




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Apr 22, 2009

सत्य मेव जयते

न्यायालय में न्याय अपनी कुर्सी पर बैठकर निर्णय करने जा रहा था | दर्शकों से अदालत खचाखच भरी हुई थी | आज एक अनूठे मुकदमे की सुनवाई होने वाली थी |
वादी के कटघरे में विश्वासपूर्ण मुद्रा लिए सत्य प्रविष्ट होकर बोला -- " न्यायमूर्ते ! मैंने प्रतिवादी को अपना समस्त राज्य दान में दे दिया है , परन्तु वह स्वीकार नहीं करना चाहता | मेरे राज्य का उपयोग करने के लिए उसे बाध्य किया जाय | "
लोगो की निगाहे प्रतिवादी के कटघरे की और घूम गई | भगवे वस्त्रों में ब्रहस्पति की भांति सुशोभित होते हुए त्याग ने प्रतिवाद किया -- " परन्तु महाराज ! वादी ने वह दान अपनी स्वप्नावस्था में किया है , जिसे कैसे स्वीकार किया जा सकता है ?"
सत्य- - "भगवन ! मै सदैव देता आया हूँ, लेता कुछ नहीं | यह मेरी सांस्कृतिक परम्परा है | प्रतिवादी स्वप्न के बहाने दान करना चाहता है | ऐसी फिसलनो और बहनों में मै बह सकता हूँ ऐसी मान्यता प्रतिवादी के मन में है | यह मेरा मूल्यांकन किया जा रहा है | इसे मै अपना अपमान मानता हूँ | मैंने वचन दे दिया है,फिर वह चाहे स्वप्न में ही क्यों न हो | मेरी परम्परा ने अपने ही नहीं , सृष्टि और ईश्वर के स्वप्न सच्चे किये है | मेरी निगाहों में स्वप्न सत्य है किन्तु सत्य स्वप्न नहीं | त्याग ने मेरे यहाँ बड़े सोभाग्य से अतिथि बनना स्वीकार किया है फिर चाहे उसने बेहोशी में ही मेरा द्वार क्यों न खटखटाया हो | मेरे द्वार पर त्याग अभ्यागत बनकर आया है , उसे निराश लौटने पर इतिहास मुझ पर लज्जित होगा | त्याग के आतिथ्य-सत्कार का सर्वप्रथम मेरा और एक मात्र मेरा अधिकार है |
बीच में ही सरकारी वकील बोल उठा - " यह अहंकार है , वादी से उसकी कीमत मांगी जाय |
प्रतिवादी ने हाँ में हाँ मिलाते कहा -- " हाँ महाराज ! यदि वादी को इतना अहंकार है तो अपने दान की मै दक्षिणा चाहता हूँ |"
विजयभरी मुस्कान में सत्य ने नम्रतापूर्वक कहा- " स्वीकार है | दक्षिणा में आपको दस लक्ष स्वर्ण मुद्राए ....|"
प्रतिवादी -- " परन्तु मुद्राएँ तो राज्य की जिसे वादी ने पहले ही मुझे दे दिया है |"
वादी -- " तो यह लो ! मै डोम के घर बिकता हूँ ,मेरी महारानी ब्रह्मण के यहाँ सेवावृति करेगी , मेरा राजकुमार पंचतत्व को प्राप्त हो गया है | यह देखो , मै कफ़न का आधा हिस्सा और श्मशान शुल्क का एक टका मांग रहा हूँ | मै अपना हिस्सा लेकर ही रहूँगा अन्यथा रोहताश का दाह संस्कार नहीं होने दूंगा ! हाँ! हाँ ! हाँ ! मै उसकी साडी का भी आधा हिस्सा ले रहा हूँ क्योकि यही तो उसका कफ़न है | कर्तव्य के समक्ष स्त्री का स्नेह और पुत्र की ममता मुझे नहीं डिगा सकती | अभी तो क्या हुआ, श्मशान का टका बाकी है - क्या अब भी तुम्हारी दक्षिणा नहीं चुकी |"
प्रतिवादी चुप हो गया | उसने आँखे नीचे की और झुका ली | सरकारी वकील बगलें झाँकने लगा और न्याय ने उठते हुए फैसला दिया - " सत्यवादी राजा हरीशचंद्र की जय हो |"
अदालत उठ गयी | दर्शक कानाफूसी करते हुए जा रहे कि वह एक क्षत्रिय था |
चित्रपट चल रहा था और द्रश्य बदलते जा रहे थे |
बाड़मेर के पूर्व सांसद स्व.श्री तन सिंह जी द्वारा लिखित !




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Apr 20, 2009

टका वाळी रौ ई खुणखुणियौ बाजसी


टका वाळी रौ ई खुणखुणियौ बाजसी = टका देने वाली का ही झुनझुना बजेगा |

सन्दर्भ कथा --- एक बार ताऊ मेले में जा रहा था | गांव में ताऊ का सभी से बहुत अच्छा परिचय था सो गांव की कुछ औरतों ने अपने अपने बच्चो के लिए ताऊ को मेले से झुनझुने व अन्य खिलौने लाने को कहा और ताऊ सबके लिए खिलोने लाने की हामी भरता गया | इनमे से एक गरीब औरत ने ताऊ को हाथों हाथ ४ आने देकर अपने बच्चे के लिए एक झुनझुना लाने का आग्रह किया | सभी औरते ताऊ का मेले से लौटने का इंतजार करती रही और अपने बच्चो को बहलाती रही कि ताऊ मेले गया है तुम्हारे लिए खिलौने मंगवाए है | आखिर शाम को ताऊ मेले से लौट कर आया तो सभी औरतों और उनके बच्चो ने ताऊ को घेर लिया पर उन्हें आश्चर्य के साथ बड़ा दुःख हुआ कि ताऊ तो सिर्फ एक झुनझुना लाया था उस बच्चे के लिए जिसकी माँ ने पैसे दिए थे | ताऊ ने सभी से मुस्कराकर कहा "मैंने मेले में दुकानदार से सभी के लिए खिलौने मांगे थे पर बिना पैसे खिलौने देना तो दूर कोई बात तक नहीं करता | जिसने पैसे दिए ,उसी का बच्चा झुनझुना बजायेगा |

मानवीय संसार में सर्वत्र धन का बोलबाला है धन के अभाव में तो बच्चो के लिए झुनझुना आता है और ही जवान और बुजुर्गों के लिए सुख-सुविधा के साधन उपलब्ध हो सकते है | धन नहीं तो कुछ भी नहीं |

Apr 17, 2009

एक आदर्श शहरी सार्वजनिक परिवहन प्रणाली |


शहरी सार्वजनिक यातायात प्रणाली सम्बंधित शहर की जीवन रेखा होती है | हर व्यक्ति के पास अपना स्वयम का आवागमन का साधन होना संभव नहीं होता | और सभी अपने साधन का ही प्रयोग करने लगे तो सडको की क्या हालत हो जायेगी इसका उदहारण आप दिल्ली जैसे शहर में अवश्य देखते होंगे | भीड़ के साथ प्रदूषण की समस्या भी विकराल रूप ले लेगी | इसीलिय हर शहर में एक आदर्श सार्वजनिक परिवहन प्रणाली होनी चाहिए | ताकि सडको पर भीड़ व प्रदूषण कम रहे | बोम्बे ,कलकत्ता. दिल्ली की मेट्रो ट्रेन व सभी शहरों में चलने वाली बसों द्वारा इस सेवा को सुचारू रूप से चलाने की जद्दोजेहत करते आप अक्सर देखते होंगे व इनमे मिलने वाली खामिया और बसों के स्टाफ का ख़राब व्यवहार भी भुगतते रहते होंगे | मेरा भी अक्सर कई शहरों में जाना होत्ता है और कई तरह की अच्छी और बुरी परिवहन प्रणाली से वास्ता पड़ता है हालाँकि मै सार्वजनिक प्रणाली का इस्तेमाल करने को बाध्य नहीं हूँ फिर भी किसी शहर व शहर वासियों को नजदीक से समझने का मौका इसमें जरुर मिलता है
यहाँ कुछ शहरों की सार्वजनिक प्रणालीके बारे में जानकारी प्रस्तुत कर रहा हूँ |
फरीदाबाद- सबसे पहले में फरीदाबाद की सार्वजनिक प्रणाली का जिक्र करना चाहूँगा क्योकि मै इसी शहर में ही रहता हूँ और मज़बूरी में ही कभी-कभी यहाँ की इस सेवा का इस्तेमाल करता हूँ क्योकि मुझे यहाँ की ये सुविधा दुनिया की सबसे ख़राब सुविधा लगती है , कुछ मुख्य-मुख्य मार्गो पर डीजल के ऑटो चलते है और एक ऑटो में जिसमे दो आदमियों के बैठने की जगह होती है उसमे आप आराम से १२ से १३ आदमी सवारी करते देख सकते है | खचाखच सवारियों से भरे काले धुंए का गुब्बार छोड़ते ये ऑटो अक्सर दुर्घटनाओ को न्योता बाँट रहे होते है | इनके साथ ही कुछ मिनी बसे भी चलती है लेकिन उनकी मर्जी का तो जबाब भी नहीं एक ही जगह चार पञ्च बसे थोड़ी-थोड़ी सवरियां लेकर खड़ी हो जयेगी,धू-धूं कर तेल फ़ूँकती रहेगी लेकिन चलेगी कब उनकी मर्जी |
सुरत - यहां मुझे बस का उपयोग करने की तो जरुरत नही पड़ी, लेकिन यहां चलने वाले औटो जिन्हे शट्ल कहते है की सुविधा भी बहुत अच्छी है कभी यहां कोई दिक्कत महसूस नही हुयी |ये ज्यादा सवारिया भी नही ढोते और किफ़ायती भी है|
अमरतसर-- यहां भी औटो,साईकिल रिक्शा व बसो की भी अच्छी सुविधा है
जोधपुर-- जोधपुर तो मेरा अक्सर जाना लगा रहता है और यहां मेरे लिये साधनो की कोई कमी नही है फ़िर भी मै यहां सिटी बस का ही ज्यादा इस्तेमाल करता हुं | मै ही नही अब तो कई विदेसी प्रर्यट्क भी इन्ही सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का इस्तेमाल करते है | जोधपुर मे दो तरह की परिवहन व्यवस्था है एक प्राईवेट बसे है जिन्की अपनी एशोसियन है जो बसो को चलाने मे पुरा अनुशासन का ध्यान रखती है हर बस स्टेन्ड पर एशोसियन का एक कारिन्दा मौजुद रहता है जो किसी भी बस के एक मिनट तो क्या कुछ सैकेन्ड देरी से आने पर दन्ड की पर्ची काट्कर बस चालक को पकड़ा देता है | यही कारण है कि जोधपुर की सिटी बस वाले समय के पुरे पाबन्द होते है ,और हर दस या पांच मिनट बाद बस सेवा उबलब्ध रहती है और यह बस सेवा इतनी अच्छी है कि जोधपुर के किसी कोने मे जाना हो यह सुविधा तैयार मिलती है |
दुसरी और सरकार के साथ एक को-ओपरेटिव सन्सथा ने भी शहर मे सिटी बसे चलाई है ये बसे बड़ी और आरामदयाक तो है ही इसमे पब्लिक फ़ोन की सुविधा भी है |लेकिन ये बसे बड़ी होने और प्राईवेट सिटी बस चालको के विरोध के चलते शहर मे न चल कर जोधपुर की बाहरी सड़को पर बड़ी दुरी के लिये चलती है जो शहर वासियों के लिये एक सौगात से कम नही है |
फ़रीदाबाद की सड़को पर चलते ओटो और बसो को देखता हुं तो बरबस ही जोधपुर की परिवहन प्रणाली याद आ जाती है काश ये यहां के बस आपरेटर भी इनसे प्ररेरणा लेकर सेवा मे सुधार करे और अनुशासन से चलते रहे यात्रियों का भला होने के साथ बस मालिको की कमाई के साथ ड्राईवरो आदि को भी रोजगार मिलता रहेगा | अच्छी परिवहन प्रणाली होने से
लोग अपने खुद के साधनो का प्रयोग कम कर सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का ज्यादा इस्तेमाल करेंगे जिससे सड्को पर भी भीड़ कुछ कम होगी | एक आदर्श परिवहन प्रणाली शहर में वाहनों की भीड़ तो कम करती है साथ ही सडको पर कम वाहन होने से प्रदूषण पर भी नियंत्रण बना रह कर पर्यावरण को शुद्ध रखने में सहायता मिलती है |

Apr 15, 2009

गुलाल : एक गैरजिम्मेदार फिल्म

पिछले कई दिनों से विदेशो से कई राजपूत युवाओं के इस फिल्म से सम्बंधित मेल आये व इसे देखकर इसके बारे में लिखने का अनुरोध भी किया | उसके बाद समीर जी की पोस्ट "जैसे दूर देश के टावर में गुलाल " में इस फिल्म की समीक्षा पढने के बाद मुझे इस इस फिल्म को देखना जरुरी सा लगा वैसे में फिल्म कभी कभार ही देखता हूँ | फिल्म देखने के बाद मुझे तो यह एक घटिया और गैरजिम्मेदार फिल्म लगी | घटिया फिल्म बनाना निर्माता निर्देशक का विशेषाधिकार हो सकता है लेकिन मुझे इस फिल्म में अलग राजपुताना प्रदेश की मांग उठाते दिखाने पर सख्त ऐतराज है इस तरह की अलगाववादी अवधारणा फैलाने वाला यह कृत्य गैरजिम्मेदार है | मुझे समझ नहीं आ रहा कि इस फिल्म में स्वतंत्र राजपुताना की मांग उठाते दिखा कर फिल्म निर्माता निर्देशक समाज को क्या बताना चाहते है ? जब आज तक अलग राजपुताना की अवधारणा पर किसी ने सोचा तक नहीं | देश की आजादी के बाद राजस्थान की सभी देशी रियासतों ने अपना भारतीय संघ में विलय कर राष्ट्र की मुख्य धारा में जुड़ गए | आजादी के बाद राजस्थान के सभी पूर्व राजा और राजपूत हर वक्त देश हित में बलिदान होने को तत्पर है जिसका प्रमाण आजादी के बाद हुए तमाम युद्धों में शहीद हुए भारतीय सेना में शामिल राजपूत जाति के सैनिको की लम्बी सूची देखकर देखा जा सकता है | कितने ही राजपूत सैनिकों ने युद्धों में अद्वितीय वीरता का प्रदर्शन कर परमवीर चक्र,महावीर चक्र और अनेक शोर्य चक्र प्राप्त किये है | देशी रियासतों में सबसे धनी मानी जाने वाली रियासत जयपुर के पूर्व महाराजा भवानी सिंह जी ने भारतीय सेना में नौकरी की जिन्हें युद्ध में अद्वितीय वीरता प्रदर्शित करने पर भारतीय सेना ने महावीर चक्र देकर सम्मानित किया | राजपूतों द्वारा हर क्षेत्र में देशहित में कदम ताल मिलाते चलने के बावजूद इस फिल्म में राजपूतों को अलग राजपुताना की मांग करते दिखाया गया है जो एक गैर-जिम्मेदाराना कृत्य है | इस फिल्म के निर्माता निर्देशक ने यह कृत्य कर तमाम राजपूत जाति के लोगों की भावनाएं आहत की है जो भारत भूमि से बेहद प्यार करते है | इस फिल्म ने उन तमाम शहीद राजपूत सैनिकों की शहादत का अपमान किया है जिन्होंने भारत माता की रक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान किया है |
फिल्म के निर्माता निर्देशक धन कमाने के चक्कर में कैसी भी काल्पनिक कहानी बना फिल्म बनाले लेकिन ये समझ से परे है कि " सेंसर बोर्ड " इस तरह अलगाववाद की अवधारणा फैलाने वाली फिल्मो को कैसे पास कर देता है ?
समीर जी ने इस फिल्म की समीक्षा करते कितना सटीक लिखा है कि
ऐसे देश में, जो खुद ही अभी विखंडित होने की मांग से आये दिन जूझता हो, कभी खालिस्तान, तो कभी गोरखालैण्ड तो कभी आजाद कश्मीर, इस तरह का एक और बीज बोना, आजाद राजपूताना, जिसकी अब तक सुगबुगाहट भी न हो, क्या संदेश देता है? क्या वजह आन पड़ी यह उकसाने की-समझ से परे ही रहा.





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Apr 13, 2009

कुम्भलगढ़ दुर्ग


कुम्भलगढ़ राजस्थान ही नहीं भारत के सभी दुर्गों में विशिष्ठ स्थान रखता है उदयपुर से ७० कम दूर समुद्र तल से 1087 मीटर ऊँचा और 30 km व्यास में फैला यह दुर्ग मेवाड़ के यश्वी महाराणा कुम्भा की सुझबुझ व प्रतिभा का अनुपम स्मारक है | इस दुर्ग का निर्माण सम्राट अशोक के दुसरे पुत्र संप्रति के बनाये दुर्ग के अवशेषों पर १४४३ से शुरू होकर १५ वर्षों बाद १४५८ में पूरा हुआ था | दुर्ग का निर्माण कार्य पूर्ण होने पर महाराणा कुम्भा ने सिक्के ढलवाये जिन पर दुर्ग और उसका नाम अंकित था | वास्तु शास्त्र के नियमानुसार बने इस दुर्ग में प्रवेश द्वार, प्राचीर,जलाशय, बहार जाने के लिए संकटकालीन द्वार, महल,मंदिर,आवासीय इमारते ,यज्ञ वेदी,स्तम्भ, छत्रियां आदि बने है |
दुर्ग कई घाटियों व पहाडियों को मिला कर बनाया गया है जिससे यह प्राकृतिक सुरक्षात्मक आधार पाकर अजेय रहा | इस दुर्ग में ऊँचे स्थानों पर महल,मंदिर व आवासीय इमारते बनायीं गई और समतल भूमि का उपयोग कृषि कार्य के लिए किया गया वही ढलान वाले भागो का उपयोग जलाशयों के लिए कर इस दुर्ग को यथासंभव स्वाबलंबी बनाया गया | इस दुर्ग के भीतर एक और गढ़ है जिसे कटारगढ़ के नाम से जाना जाता है यह गढ़ सात विशाल द्वारों व सुद्रढ़ प्राचीरों से सुरक्षित है | इस गढ़ के शीर्ष भाग में बादल महल है व कुम्भा महल सबसे ऊपर है |
महाराणा प्रताप की जन्म स्थली कुम्भलगढ़ एक तरह से मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी रहा है | महाराणा कुम्भा से लेकर महाराणा राज सिंह के समय तक मेवाड़ पर हुए आक्रमणों के समय राजपरिवार इसी दुर्ग में रहा | यहीं पर प्रथ्विराज और महाराणा सांगा का बचपन बीता था | महाराणा उदय सिंह को भी पन्ना धाय ने इसी दुर्ग में छिपा कर पालन पोषण किया था | हल्दी घाटी के युद्ध में हार के बाद महाराणा प्रताप भी काफी समय तक इसी दुर्ग में रहे | इस दुर्ग के बनने के बाद ही इस पर आक्रमण शुरू हो गए लेकिन एक बार को छोड़ कर ये दुर्ग प्राय: अजेय ही रहा है लेकिन इस दुर्ग की कई दुखांत घटनाये भी है जिस महाराणा कुम्भा को कोई नहीं हरा सका वही परमवीर महाराणा कुम्भा इसी दुर्ग में अपने पुत्र उदय कर्ण द्वारा राज्य लिप्सा में मारे गए | कुल मिलाकर दुर्ग एतिहासिक विरासत की शान और शूरवीरों की तीर्थ स्थली रहा है माड गायक इस दुर्ग की प्रशंसा में अक्सर गीत गाते है :
कुम्भलगढ़ कटारगढ़ पाजिज अवलन फेर
संवली मत दे साजना,बसुंज,कुम्भल्मेर |
कुम्भलगढ़ दुर्ग का विडियो देखने के लिए यहाँ चटका लगायें |



सन्दर्भ ग्रन्थ- भारत के दुर्ग, दीनानाथ दुबे |









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Apr 10, 2009

शेखावाटी का अंग्रेज विरोधी आक्रोश

मराठो और पिंडरियों की लुट खसोट से तंग आकर सन १८१८ में राजस्थान के महाराजों ने अंग्रेजों के साथ संधियाँ कर ली थी जिससे इन संधियों के माध्यम से राजस्थान में अंग्रेजों के प्रवेश के साथ ही उनकी आंतरिक दखलंदाजी भी शुरू हो गई जो हमेशा स्वंतत्र रहने के आदि शेखावाटी के कतिपय शेखावत शासकों व जागीरदारों को पसंद नहीं आई |और उन्होंने अपनी अपनी क्षमतानुसार अंग्रेजों का विरोध शुरू कर दिया | इनमे श्याम सिंह बिसाऊ व ज्ञान सिंह मंडावा ने वि.स.१८६८ में अंग्रेजो के खिलाफ रणजीत सिंह (पंजाब) की सहायतार्थ अपनी सेनाये भेजी | बहल पर अंग्रेज शासन होने के बाद कान सिंह, ददरेवा के सूरजमल राठौड़ और श्याम सिंह बिसाऊ ने अंग्रेजो पर हमले कर संघर्ष जारी रखा | शेखावाटी के छोटे सामंत जिन्हें राजस्थान में अंग्रेजो का प्रवेश रास नहीं आ रहा था ने अपने आस पड़ोस अंग्रेज समर्थकों में लुट-पाट व हमले कर आतंकित कर दिया जिन्हें अंग्रेजो ने लुटेरे कह दबाने कर लिए मेजर फोरेस्टर के नेतृत्व में शेखावाटी ब्रिगेड की स्थापना की | इस ब्रिगेड ने शेखावाटी के कई सामंत क्रांतिकारियों के किले तोड़ दिए इससे पहले अंग्रेजो ने जयपुर महाराजा को इन शेखावाटी के सामन्तो की शिकायत कर उन्हें समझाने का आग्रह किया किन्तु ये सामंत जयपुर महाराजा के वश में भी नहीं थे | किले तोड़ने के बाद गुडा के क्रांतिकारी दुल्हे सिंह शेखावत का सिर काट कर मेजर फोरेस्टर ने क्रांतिकारियों को भयभीत करने लिए झुंझुनू में लटका दिया जिसे एक मीणा समुदाय का साहसी क्रांतिकारी रात्रि के समय उतार लाया | मेजर फोरेस्टर शेखावाटी के भोडकी गढ़ को तोड़ने भी सेना सहित पहुंचा लेकिन वहां मुकाबले के लिए राजपूत नारियों को हाथों में नंगी तलवारे लिए देख लौट आया |
शेखावाटी ही नहीं पुरे राजस्थान में अंग्रेजो के खिलाफ क्रांति का बीज बोने वालों में अग्रणी डुंगजी जवाहरजी (डूंगर सिंह शेखावत और जवाहर सिंह शेखावत) ने एक सशत्र क्रांति दल बनाया जिसमे सावंता मीणा व लोटिया जाट उनके प्रमुख सहयोगी थे | इस दल ने शेखावाटी ब्रिगेड पर हमला कर ऊंट,घोडे और हथियार लुट लिए साथ ही रामगढ शेखावाटी के अंग्रेज समर्थक सेठो को क्रांति के लिए धन नहीं देने की वजह से लुट लिया | शेखावाटी ब्रिगेड पर हमला और सेठो की शिकायत पर २४ फरवरी १८४६ को ससुराल में उनके साले द्वारा ही धोखे से डूंगर सिंह को अंग्रेजो ने पकड़ लिया और आगरा किले की कैद में डाल दिया | उन्हें छुडाने के लिए १ जून १८४७ को शेखावाटी के एक क्रांति दल जिसमे कुछ बीकानेर राज्य के भी कुछ क्रांतिकारी राजपूत शामिल थे ने आगरा किले में घुस कर डूंगर सिंह को जेल से छुडा लिया | इस घटना मे बख्तावर सिंह श्यामगढ,ऊजिण सिंह मींगणा,हणुवन्त सिंह मेह्डु आदि क्रान्तिकारी काम आये | इनके अलावा इस दल मे ठा,खुमाण सिंह लोढ्सर,ठा,कान सिंह मलसीसर,ठा,जोर सिह,रघुनाथ सिह भिमसर,हरि सिह बडा खारिया,लोटिया जाट,सांव्ता मीणा आदि सैकड़ौ लोग शामिल थे | डूंगर सिह को छुड़ाने के बाद इस दल ने अंग्रेजो को शिकायत करने वाले सेठो को फ़िर लुटा और शेखावाटी ब्रिगेड पर हमले तेज कर दिये | 18 जून 1848 को इस दल ने अजमेर के पास नसिराबाद स्थित अंग्रेज सेना की छावनी पर आक्र्मण कर शस्त्रो के साथ खजाना भी लूट लिया | लोक गीतो के अनुसार ये सारा धन यह दल गरीबो मे बांटता आगे बढता रहा | आखिर इस क्रान्ति दल के पिछे अंग्रेजो के साथ जयपुर,जोधपुर,बीकानेर राज्यो की सेनाए लग गई | और कई खुनी झड़पो के बाद 17 मार्च 1848 को डूंगर सिह और जवाहर सिह के पकड़े जाने के बाद यह सघंर्ष खत्म हो गया | 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम मे भी मंडावा के ठाकुर आनन्द सिह ने अपनी सेना अंग्रेजो के खिलाफ़ आलणियावास भेजी थी | तांत्या टोपे को भी सीकर आने का निमंत्रण भी आनन्द सिह जी ने ही दिया था | 1903 मे लार्ड कर्जन द्वारा आयोजित दिल्ली दरबार मे सभी राजाओ के साथ हिन्दू कुल सूर्य मेवाड़ के महाराणा का जाना भी इन क्रान्तिकारियो को अच्छा नही लग रहा था इसलिय उन्हे रोकने के लिये शेखावाटी के मलसीसर के ठाकुर भूर सिह ने ठाकुर करण सिह जोबनेर व राव गोपाल सिह खरवा के साथ मिल कर महाराणा फ़तह सिह को दिल्ली जाने से रोकने की जिम्मेदारी केशरी सिह बारहट को दी | केसरी सिह बारहट ने "चेतावनी रा चुंग्ट्या " नामक सौरठे रचे जिन्हे पढकर महाराणा अत्यधिक प्रभावित हुये और दिल्ली दरबार मे न जाने का निश्चय किया | गांधी जी की दांडी यात्रा मे भी शेखावाटी के आजादी के दीवाने सुल्तान सिह शेखावत खिरोड ने भाग लिया था | इस तरह राजस्थान मे अंग्रेजी हकूमत के खिलाफ़ लड़ने और विरोधी वातावरण तैयार करने मे शेखावाटी के सामन्तो व जागीरदारो ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | हालांकि शेखावाटी पर सीधे तौर पर अंग्रेजो का शासन कभी नही रहा |

Apr 8, 2009

शेखावाटी


आपने नरेश सिंह जी का ब्लॉग मेरी शेखावाटी जरुर देखा होगा, मेरे भी कई लेखों में शेखावाटी नाम का जिक्र भी कभी पढ़ा होगा | और राजस्थान के संपर्क नहीं आये लोगों में इस नाम के प्रति जिज्ञसा जरुर हुई होगी कि आखिर ये शेखावाटी है क्या ?
तो आइए आज शेखावाटी के परिचय और इसके इतिहास पर कुछ चर्चा करली जाये |
राजस्थान के वर्तमान सीकर और झुंझुनू जिले शेखावाटी के नाम से जाने जाते है इस क्षेत्र पर आजादी से पहले शेखावत क्षत्रियों का शासन होने के कारण इस क्षेत्र का नाम शेखावाटी प्रचलन में आया |
देशी राज्यों के भारतीय संघ में विलय से पूर्व मनोहरपुर-शाहपुरा,खंडेला,सीकर,खेतडी,बिसाऊ,सुरजगढ,नवलगढ़,मंडावा, मुकन्दगढ़,दांता,खुड,खाचरियाबास,अलसीसर,मलसीसर,लछमनगढ़ आदि बड़े-बड़े प्रभावशाली संस्थान शेखा जी के वंशधरों के अधिकार में थे | आज शेखावाटी क्षेत्र पर्यटन और शिक्षा के क्षेत्र में विश्व मानचित्र में तेजी से उभर रहा है यहाँ पिलानी और लछमन गढ़ के भारत प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र है वही नवलगढ़,फतेहपुर,अलसीसर,मलसीसर,लछमनगढ़ , मंडावा आदि जगहों पर बनी प्राचीन बड़ी-बड़ी हवेलियाँ अपनी विशालता और भित्ति चित्रकारी के लिए विश्व प्रसिद्ध है जिन्हें देखने देशी-विदेशी पर्यटकों का ताँता लगा रहता है | पहाडों में सुरम्य जगहों बने जीणमाता मंदिर,शाकम्बरीदेवी का मन्दिर,लोहार्ल्गल के अलावा खाटू में बाबा श्याम का (बर्बरीक) का मन्दिर,सालासर में हनुमान जी का मन्दिरआदि स्थान धार्मिक आस्था के ऐसे केंद्र है जहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शनार्थ आते है | इस शेखावाटी प्रदेश ने जहाँ देश के लिए अपने प्राणों को बलिदान करने वाले देशप्रेमी दिए वहीँ उद्योगों व व्यापार को बढ़ाने वाले सैकडो उद्योगपति व व्यापारी दिए जिन्होंने अपने उद्योगों से लाखों लोगों को रोजगार देकर देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दिया | भारतीय सेना को सबसे ज्यादा सैनिक देने वाला झुंझुनू जिला शेखावाटी का ही भाग है | शेखावाटी क्षेत्र व उसके इतिहास के बारे में प्रस्तुत है कुछ देसी-विदेशी विद्वानों व इतिहासकारों द्वारा दी गई जानकारी --

राजस्थान का मरुभूमि वाला पुर्वोतरी एवं पश्चिमोतरी विशाल भूभाग वैदिक सभ्यता के उदय का उषा काल माना जाता है | हजारों वर्ष पूर्व भू-गर्भ में विलुप्त वैदिक नदी सरस्वती यहीं पर प्रवाह मान थी ,जिसके तटों पर तपस्यालीन आर्य ऋषियों ने वेदों के सूत्रों की सरंचना की थी | सिन्धुघाटी सभ्यता के अवशेषों एवं विभिन्न संस्कृतियों के परस्पर मिलन,विकास उत्थान और पतन की रोचक एवं गौरव गाथाओं को अपने विशाल आँचल में छिपाए यह मरुभूमि भारतीय इतिहास के गौरवपूर्ण अध्याय की श्र्ष्ठा और द्रष्टा रही है | जनपदीय गणराज्यों की जन्म स्थली और क्रीडा स्थली बने रहने का श्रेय इसी मरुभूमि को रहा है | इस मरुभूमि ने ऐसे विशिष्ठ पुरुषों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने कार्यकलापों से भारतीय इतिहास को प्रभावित किया है |
इसी मरुभूमि का एक भाग प्रमुख भाग शेखावाटी प्रदेश है जो विशालकाय मरुस्थल के पुर्वोतरी अंचल में फैला हुआ है | इसका शेखावाटी नाम विगतकालीन पॉँच शताब्दियों में इस भू-भाग पर शासन करने वाले शेखावत क्षत्रियों के नाम पर प्रसिद्ध हुआ है | उससे से पूर्व अनेक प्रांतीय नामो से इस प्रदेश की प्रसिद्दि रही है | इसी भांति अनेक शासक कुलों ने समय-समय पर यहाँ राज्य किया है |
सुरजन सिंह शेखावत
(प्रसिद्ध इतिहासकार )


वीर भूमि शेखावाटी प्रदेश की स्थापना महाराव शेखा जी एवं उनके वंशजों के बल,विक्रम,शोर्य और राज्याधिकार प्राप्त करने की अद्वितीय प्रतिभा का प्रतिफल है यहाँ के दानी-मानी लक्ष्मी पुत्रों,सरस्वती के अमर साधकों तथा शक्ति के त्यागी-बलिदानी सिंह सपूतों की अनोखी गौरवमयी गाथाओं ने इसकी अलग पहचान बनाई और स्थाई रूप देने में अपनी त्याग व तपस्या की भावना को गतिशील बनाये रखा | यहाँ के प्रबल पराक्रमी,सबल साहसी,आन-बान और मर्यादा के सजग प्रहरी शूरवीरों के रक्त-बीज से शेखावाटी के रूप में यह वट वृक्ष अपनी अनेक शाखाओं प्रशाखाओं में लहराता,झूमता और प्रस्फुटित होता आज भी अपनी अमर गाथाओं को कह रहा है | शेखावाटी नाम लेने मात्र से ही आज भी शोर्य का संचार होता है,दान की दुन्दुभी कानों में गूंजती है और शिक्षा,साहित्य,संस्कृति तथा कला का भाव उर्मियाँ उद्वेलित होने लगती है | यहाँ भित्तिचित्रों ने तो शेखावाटी के नाम को सारे संसार में दूर-दूर तक उजागर किया है | यह धरा धन्य है | ऋषियों की तपोभूमि रही है तो कृषकों की कर्मभूमि | यह धर्मधरा राजस्थान की एक पुण्य स्थली है |
ऐतिहासिक द्रष्टि से इसमें अमरसरवाटी,झुंझुनू वाटी,उदयपुर वाटी, खंडेला वाटी, नरहड़ वाटी,सिंघाना वाटी,सीकर वाटी,फतेहपुर वाटी, आदि कई भाग परिणित होते रहे है | इनका सामूहिक नाम ही शेखावाटी प्रसिद्ध हुआ | जब शेखावाटी का अपना अलग राजनैतिक अस्तित्व था तब उसकी सीमाए इस प्रकार थी -- उत्तर पश्चिम में भूतपूर्व बीकानेर राज्य,उत्तरपूर्व में लोहारू और झज्जर,दक्षिण पूर्व में तंवरावाटी और भूतपूर्व जयपुर राज्य तथा दक्षिण पश्चिम में भूतपूर्व जोधपुर राज्य | परन्तु इसकी भौगोलिक सीमाएं सीकर और झुंझुनू दो जिलों तक ही सिमित मानी जाती रही है | वर्तमान शासन व्यवस्था में भी इन दो जिलो को ही शेखावाटी माना गया है | देशी राज्यों के भारतीय संघ में विलय से पूर्व मनोहरपुर-शाहपुरा,खंडेला,सीकर,खेतडी,बिसाऊ,सुरजगढ,नवलगढ़,मंडावा, मुकन्दगढ़, दांता, खुड, खाचरियाबास,अलसीसर,मलसीसर,लछमनगढ़ आदि बड़े-बड़े प्रभावशाली संस्थान शेखा जी के वंशधरों के अधिकार में थे |
डा.उदयवीर शर्मा
शेखावत संघ ने,जो आमेर राजवंश से उदभूत है ,काल और परिस्थितियों के प्रभाव से अपने पैत्रिक राज्य आमेर के बराबर सम्मान और शक्ति संचय कर ली है |
यधपि इस संघ का न कोई लिखित कानून है और न इसका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कोई प्रधानाध्यक्ष है | किन्तु समान हित की भावना से प्रेरित यह संघ अपना अस्तित्व बनाये रखने में सदैव समर्थ रहा है | फिर भी यह नहीं मान लेना चाहिय कि इस संघ में कोई नीति-कर्म नहीं है | जब कभी एक छोटे से छोटे सामंत के स्वत्वधिकारों के हनन का प्रश्न उपस्थित हुआ तो छोटे-बड़े सभी शेखावत सामंत सरदारों ने उदयपुर नामक अपने प्रसिद्ध स्थान पर इक्कठे होकर स्वत्व-रक्षा का समाधान निकाला है |
( कर्नल जेम्स टोड )
जिस काल का हम वर्णन कर रहे है,शेखावाटी प्रदेश ठिकानों (छोटे उप राज्यों ) का एक समूह था,जिसके उत्तर पश्चिम में बीकानेर,उत्तर पूर्व में लोहारू और झज्जर ,दक्षिण पूर्व में जयपुर और पाटन तथा दक्षिण पश्चिम में जोधपुर राज्य था | थार्टन के अनुसार शेखावाटी का क्षेत्रफल ३८९० वर्ग मील है जो भारतीय जनगणना रिपोर्ट १९४१ के आंकडों के लगभग बराबर है भारतीय जनगणना रिपोर्ट १९४१ के अनुसार शेखावाटी का क्षेत्रफल ३५८० वर्ग मील है | कर्नल टोड ने शेखावाटी का क्षेत्रफल ५४०० वर्ग मील होने का अनुमान लगाया है जो अतिशयोक्तिपूर्ण एवं अविश्वसनीय है |
अपनी अन-उपजाऊ प्राकृतिक स्थिति के कारण शेखावाटी सदैव से योद्धाओं,साहसिकों और दुर्दांत डाकुओं की भूमि रही है | शेखावाटी जयपुर राज्य में सदैव तूफान का केंद्र बनी रही और समय-समय पर जयपुर के आंतरिक शासन में ब्रिटिश हस्तेक्षेप के लिए अवसर जुटाती रही |
(एच.सी.बत्रा, M.A. इतिहास )
जयपुर,मारवाड़ और मेवाड़ की भांति शेखावाटी राजनैतिक और भौगोलिक द्रष्टि से एक प्रथक प्रदेश है | शेखावाटी के चीफ लोग जयपुर राज्य की सहायक सैनिक जाति के है और वे नाम मात्र को जयपुर राज्य के अधीन है |
(हेमिल्टन का हिन्दुस्थान भाग -१ )
रसाले (घुड़सवार सेना ) की भर्ती के हेतु शेखावाटी के मुकाबले समस्त भारत में कोई दूसरा क्षेत्र नहीं है |
(कर्नल जे.सी.ब्रुक )


शेखावाटी के बारे में बाड़मेर के पूर्व सांसद स्व.श्री तन सिंह जी अपने बदलते द्रश्य नामक पुस्तक में लिखते है |
मैंने मोकल के पुत्र राव शेखा को देखा जिसके बल विक्रम से नए राज्य की नीव लग रही थी | साथ ही मैंने बीस सवारों के साथ रायसल दरबारी को देखा जिसने अकथनीय पराक्रम से शत्रु सेनापति का सर काट डाला और मंत्री देवीदास के इस कथन की सिद्दि प्राप्त की कि " पिता की सम्पति पर अधिकार करने की अपेक्षा अपने ही बल पराक्रम से सौभाग्य का उपार्जन मनुष्य का कर्तव्य है -यही जगदीश्वर का अनुग्रह है " उसी जगदीश्वर का अनुग्रह मैंने रायसल के पुत्र द्वारकादास पर देखा जिसके सिंह से युद्ध के लिए उद्दत होने पर लड़ने की अपेक्षा वही शेर उनके तलवे चाटने लगा | मैंने भोजराज के वंशज नव-विवाहित सुजान सिंह को खंडेला के मंदिर की रक्षा करते देखा | उसे पुरे यौवन के अधूरे अरमानो के साथ अकेले ही सैकडो यवनों को मसलते देखा | धरा धर्म की मांग पर प्राणोत्सर्ग के कर्तव्य का इतिहास में अमूल्य प्रष्ठ जुड़ते देखा | वे माताएं होगी जिन्होंने इस प्रकार के नव-रत्नों को जन्म दिया है | मैंने केसरी सिंह को देखा जिसने सैयद अब्दुल्ला द्वारा भेजी गई शाही सेना का मुकाबला करने के लिए समस्त शेखावाटी को एक सूत्र में बांध दिया और जब वह सूत्र टूटने लगा तो युद्ध से भागने की सलाह को अस्वीकार करते कहा था कि ऐसा कलंक मै अपने ऊपर कभी नहीं लगाना चाहता जिसे मेरी आने वाली पीढियां भी नहीं धो सकती | उसी केसरी सिंह को अंत में मेदिनी माता को अपने ही रक्त मांस व मिटटी से पिंडदान करते देखा | मैंने अनेक बार खंडेला को उठते गिरते लडखडाते और लड़ते देखा | शार्दुल सिंह शेखावत जैसे जीवट के खिलाडियों को देखा,खेल के मैदानों को देखा,खेलों को देखा और छोटी-छोटी बातों में जीवन की महानताओं को गोते लगाते देखा और मेरे मुंह से बरबस निकल पड़ा वाह शेखावाटी ! वाह !!






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Apr 6, 2009

आज पनीर नहीं है , दाल में ही खुश रहो

ऑरकुट पर स्क्रब में तरह तरह की कविताए आदि मिलते रहती है पेश है उन्ही में से मिली कुछ दोस्तों की स्क्रब कविताए
जोधपुर से राज शेखावत
ज़िन्दगी है छोटी, हर पल में खुश रहो ...
ऑफिस में खुश रहो, घर में खुश रहो ...

ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ

आज पनीर नहीं है , दाल में ही खुश रहो ...
आज जिम जाने का समय नहीं , दो कदम चल के ही खुश रहो ...

ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ

आज दोस्तों का साथ नहीं, टीवी देख के ही खुश रहो ...
घर जा नहीं सकते तो फ़ोन कर के ही खुश रहो ...

ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ


आज कोई नाराज़ है, उसके इस अंदाज़ में भी खुश रहो ...
जिसे देख नहीं सकते उसकी आवाज़ में ही खुश रहो ...

ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ

जिसे पा नहीं सकते उसकी याद में ही खुश रहो
Laptop न मिला तो क्या , Desktop में ही खुश रहो ...

ჯહઔહჯ═══■■═══ჯહઔહჯ


बिता हुआ कल जा चूका है , उसकी मीठी यादों में ही खुश रहो ...
आने वाले पल का पता नहीं ... सपनो में ही खुश रहो ...

Zindagi hai to Khwaab Hai
_Khwaab Hai To Manzilein Hai
____Manzilein Hai To Fasaley Hai
__________Fasaley Hai To Rastey Hai
_________Rastay Hai To Mushkilein Hai
_____________Mushkilein Hai To Hausla Hai
_________________Hausla Hai To Vishawas Hai
______________________Vishvas hai to Paisa hai
________________________Paisa hai to Shohrat hai
__________________________Shohrat hai to Izzat Hai
______________________________Izzat hai to Ladki hai
__________________________Ladki hai to Tension hai
______________________Tension hai to Concern hai
__________________Concern hai to a Khayaal hai
_________________Khayaal hai to Khwaab hai
______________Khawab hai to Growth hai
__________Growth hai to Zindagi hai
______Zindagi hai to khwaab hai
_Matlab duniya Gol Gol hai
Bas ghumnewala chahiye

अमरकोट पाकिस्तान से कँवल सोढा ने यह कविता भेजी

ज़िंदगी हमेशा पाने के लिए नही होती,
हर बात समझाने के लिए नही होती,
याद तो अक्सर आती है आप की,
लकिन हर याद जताने के लिए नही होती

महफिल न सही तन्हाई तो मिलती है,
मिलन न सही जुदाई तो मिलती है,
कौन कहता है मोहब्बत में कुछ नही मिलता,
वफ़ा न सही बेवफाई तो मिलती है

कितनी जल्दी ये मुलाक़ात गुज़र जाती है
प्यास भुजती नही बरसात गुज़र जाती है
अपनी यादों से कह दो कि यहाँ न आया करे
नींद आती नही और रात गुज़र जाती है

उमर की राह मे रस्ते बदल जाते हैं,
वक्त की आंधी में इन्सान बदल जाते हैं,
सोचते हैं तुम्हें इतना याद न करें,
लेकिन आंखें बंद करते ही इरादे बदल जाते हैं

कभी कभी दिल उदास होता है
हल्का हल्का सा आँखों को एहसास होता है
छलकती है मेरी भी आँखों से नमी
जब तुम्हारे दूर होने का एहसास होता है...





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Apr 3, 2009

इन्टरनेट का दुरूपयोग कैसे रोके


घर हो या ऑफिस इन्टरनेट के उपयोग के साथ साथ दुरूपयोग की संभावनाएं बनी रहती है | ऑफिस में काम के समय भी अक्सर लोग तरह तरह की वेबसाइट खोल कर बैठे रहते है जिनका ऑफिस कार्यों से कोई सम्बन्ध नहीं होता या चेटिंग करते रहते है | कई दोस्त इन्टरनेट की चर्चा चलते ही बोल पड़ते है कि घर में बच्चे नेट का दुरूपयोग कर सकते है इसलिए वे चाहते हुए भी नेट कनेक्शन नहीं लेते | इन्टरनेट पर उपलब्ध अश्लील सामग्री के चलते ऐसे अभिभावकों की चिंता भी जायज लगती है लेकिन इस दुरूपयोग की संभावना के डर से इन्टरनेट को घर में ही नहीं घुसने दिया जाये यह भी तो गलत है | ऐसा करके हम बच्चों को इन्टरनेट पर उपलब्ध अथाह ज्ञान भंडार से वंचित भी तो कर रहे है | कई दोस्तों द्वारा इन्टरनेट के दुरूपयोग की सम्भावना जताने पर इसके समाधान के लिए आज मैंने गूगल बाबा से पूछताछ की ताकि दुरूपयोग के डर से इन्टरनेट कनेक्शन नहीं लेने वाले निश्चिंत होकर नेट कनेक्शन ले सके | पूछताछ करने पर गूगल बाबा ने Blue Coat K9 Web Protection सोफ्टवेयर नामक एक हथियार नेट का दुरूपयोग रोकने हेतु थमा दिया | इसे डाउनलोड कर अपने कंप्युटर में इंस्टाल कर देखा तो ये सोफ्टवेयर रूपी हथियार वाकई काम का निकला | इस सोफ्टवेयर में अलग-अलग तरह की वेब साइट्स की अलग-अलग श्रेणियां बनी है हम अपने घर या ऑफिस में जरुरत की श्रेणियां छोड़कर बाकि श्रेणियों पर सही का निशान लगा कर सेव कर दे तो यह सोफ्टवेयर जरुरत की वेबसाइट्स के अलावा अन्य सभी अवांछित वेबसाइट्स आपके कंप्युटर पर खुलने ही नहीं देगा और इस तरह से यह आपके नेट का दुरुपयोग रोक आपको निश्चिंत कर देगा |
इस सोफ्टवेयर को आप यहाँ चटका लगा कर से डाउनलोड कर सकते है और हाँ इंस्टाल करते समय इसके लाइसेंस नंबर की भी जरुरत पड़ती है जिसे आप K9 web protection की ओफिसिअल वेबसाइट पर अपना नाम रजिस्टर कर फ्री में प्राप्त कर सकते है |







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Apr 1, 2009

ताऊ ने पीना छोड़ा

उल्टे सीधे धंधो और राजनीती में कुछ कमाने के बाद ताऊ ने कई अन्य शौक पालने के अलावा शराब भी पीना शुरू कर दिया | अब ताऊ अपने दोस्त हरखू के साथ रोज अपने मकान की छत पर बने बगीचे में बैठ कर दारू पीने लगा | हरखू के साथ ताऊ की बड़ी अच्छी दोस्ती थी और हरखू राजनीती में ताऊ की काफी मदद भी करता था इसी दोस्ती के चलते ताऊ कभी भी अपने दोस्त हरखू के बिना अकेले शराब नहीं पीता था | कुछ समय बाद हरखू तिकड़म लगाकर विदेश चला गया और ताऊ रह गया अकेला | वह अपने दोस्त के बिना शराब कैसे पी सकता था सो ताऊ ने हमेशा की तरह छत पर टेबल पर बोतल के साथ दो गिलास रखे और उनमे शराब डाल वैसे ही पीने लगा जैसे हरखू के साथ पीया करता था अब जब भी ताऊ शराब पीता टेबल पर हरखू के लिए भी गिलास रखता और उसमे भी शराब डाल पैग बनाता अपना पैग पीने के बाद ताऊ हरखू के लिए बना पैग भी खुद ही पी लिया करता | आस पड़ोस के लोग अक्सर ताऊ को ऐसा करते देखा करते थे उन्हें ताऊ और हरखू की गहरी दोस्ती का पता था | और ताऊ का यह कार्यक्रम निर्बाद कई महीनो तक चलता रहा | एक दिन एक पडौसी ने देखा कि आज ताऊ छत पर टेबल लगा कर बैठा है और शराब की बोतल के साथ गिलास एक ही रखा है | पडोसी को दो की जगह एक गिलास देखकर बड़ी हैरानी हुई उसने सोचा लगता है ताऊ की हरखू के साथ दोस्ती टूट गई लगती है सो हिम्मत करके पडोसी ने ताऊ से पूछ ही लिया कि ताऊ क्या बात है ? आजकल अकेले ही पी रहे हो क्या दोस्त से फोन पर कोई मनमुटाव हो गया क्या ?
ताऊ -- नहीं जी , ऐसा कुछ भी नहीं है , हरखू के साथ दोस्ती तो इस शरीर छोड़ने तक बनी रहेगी | दरअसल बात यह है कि मुझे डाकदर साहब ने दारू पीने के लिए मना कर दिया है इसलिय मैंने अब दारू पीना छोड़ दिया है अब ये जो आपको पैग दिखाई दे रहा है मेरा नहीं हरखू का है और अब दारू मै नहीं सिर्फ हरखू ही पी रहा है |

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