राजस्थान के गौरवमयी अतीत में चौहान वंश ने एक से बढ़कर एक सूरमा दिये हैं। क्या अर्णोराज, क्या विग्रहराज, क्या सोमेश्वर, क्या पृथ्वीराज तो क्या हमीर, एक से बढ़कर एक थे। ईसा की बारहवीं शताब्दी में जब उत्तर-पश्चिमी भारत पर मुस्लिम शक्तियों का भीषण आतंक छाया हुआ था । लगता यह था कि मानो मातृभूति के रक्षार्थ मर-मिटने वाले राजपूत शासकों का वीरत्व दम तोड़ रहा हो । प्रत्येक शासक को केवल अपने ही राज्य की सुरक्षा की चिंता थी । ऐसी स्थिति में आक्रांताओं का हौंसला दिन-प्रतिदिन बढ़ना स्वाभाविक था । सच कहा जाए तो राजस्थान के अपराजित शौर्यपूर्ण ज्वलन्त इतिहास में वह घोर निराशा का युग था ।
किंतु एक सत्य यह भी है कि विश्व इतिहास में राजस्थान की अपनी एक अलग ही पहचान है। यह वीर प्रसविनी वसुन्धरा है, यह कभी निर्वीर्य नहीं हुई है । इसने अपनी गोदी में सदैव शूरवीरों को खिलाया है, तो फिर भला चाहे जैसा निराशा का अंधकार क्यों न हो, यह तो हर स्थिति में वीर प्रसविनी है और ऐसा ही हुआ । बारहवीं शताब्दी में भी राजस्थान का इस माटी ने एक ऐसे ही तेजस्वी वीर को जन्म दिया, जो इतिहास में विग्रहराज चतुर्थ, विशालदेव अथवा बीसलदेव के नाम से विख्यात है ।
इस पराक्रमी वीर विसालदेव के पिता अर्णोराज या आनाजी अपने युग के महान् प्रतापी एवं कुशल राजा थे। उन्होंने अजमेर के युद्ध में एक विशाल मुसलमान सेना को पराजित किया और इस उपलक्ष्य में आक्रांताओं के खून से अपवित्र भूमि पर शुद्धि यज्ञ करवाया । विद्वानों की सलाह से एक विशाल जलाशय (आनासाग) का निर्माण करवाया जो आज भी उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाये हुए है।
अर्णोराज ने तीन विवाह किये थे । विग्रहराज उनकी ज्येष्ठ पत्नी सुघवादे की द्वितीय संतान थी। उनके बड़े भाई का नाम जगदेव था। यूं जगदेव ही पाटवी राजकुमार था, लेकिन अपने पिता की हत्या के षड़यन्त्र में जगदेव का हाथ होने की बात सिद्ध होने पर उसे देश निकाला दे दिया गया और 1152 ई. में विग्रहराज ने सपादलक्ष ( अजमेर) का सिंहासन ग्रहण किया ।
सिंहासनारूढ़ होते ही विग्रहराज ने समस्त राजपूत राजाओं को एक सूत्र में बांधने का प्रयास शुरू कर दिया । उसका यह स्वप्न था कि भारत आर्यवृत है और आगे भी बना रहे। उन्हें आशंका थी कि किंचित् भी अगर चूक हो गई अथवा राजा अपनी झूठी शान के पीछे पड़े रहे तो पश्चिम के आक्रांता सफल हो जायेंगे । इस निमित्त उन्होंने छोटे-बड़े सभी राजाओं के पास अपने विशेष दूत भेजे किंतु उन्हें खास सफलता नहीं मिली। जब उन्होंने देखा कि कई छोटे-छोटे राजा भी अहं पाले हुए हैं, तब उन्हें शक्ति के बल पर एक करने के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं बचा तथा अपना नया प्रयास शुरू किया। पाली, जालौर, नागोर आदि बिखरे राज्यों को जीत लिया। दिल्ली के तोमरवंशी राजा गंगपालदेव तक को सैन्य शक्ति के आगे झुकने को मजबूर कर अपने अधीन कर दिखाया। उनकी यह अभूतपूर्व सफलता उनके असाधारण पराक्रम एवं दूरदृष्टि का परिणाम था ।
विग्रहराज के उक्त कदम ने उस समय राजस्थान के अनेक छोटे-छोटे राज्यों को न केवल संरक्षण दिया बल्कि उत्तर-पश्चिम से नित्य प्रति होने वाले आतंककारियों के हमलों से भी निजात दिला दी। गुर्जरराज कुमारपाल और हमीर जैसे तुरुष्कों को प्रभावहीन कर दिया जो इन छोटे राज्यों से आये दिन धन बटोरता तथा परेशान किया करता था ।
अगर यह कहा जाए कि विग्रहराज भारत की एकता का सूत्रपात करने वाला इस युग का प्रथम राजा था तो कोई गलत नहीं है । प्रबन्ध - कोष में विग्रहराज विशालदेव को 'तुरुष्कों का निष्क्रामक' उपाधि से विभूषित करना बताया है, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। ये अपने असाधारण कार्य के कारण इस उपाधि के सर्वथा योग्य था । इसने तात्कालिक लाहौर के म्लेच्छ राजा खुसरो और उसके पुत्र खुसरो मलिक को पराजित कर यह उपाधि प्राप्त की थी । पराजित खुसरो मलिक बन्दी बनाकर राजदरबार में लाया गया, किन्तु विग्रहराज ने उसे उदारतापूर्वक क्षमा करके प्राणदान दे दिया। इस प्रकार उसने विग्रहराज का 'करदाता' बनकर मुक्ति पाई। इस घटना से जहाँ विग्रहराज की असीम बलशालिता सिद्ध होती है, वहाँ यह भी ज्ञात होता है कि वे अपने शत्रु के प्रति भी समय पड़ने पर कितने उदार हो सकते थे। सम्भवतः इस प्रकार की प्राण- भिक्षा देना अन्य क्षत्रिय राजाओं की तरह चौहान वंशीय राजाओं की भी गौरवमयी परम्परा थी जिसका आगे चलकर विग्रहराज के ही वंशधर पृथ्वीराज चौहान ने भी मोहम्मद गौरी के साथ निर्वाह किया था, भले ही यह क्षमादान भारतीय स्वतंत्रता एवं अस्मिता को लील गया था लेकिन है तो यह हमारी श्रेष्ठ भारतीय परम्परा ही । सुविख्यात श्रीमती कांता मारवा के शब्दों मे यदि यूं कहें तो उचित ही प्रतीत होता है कि हमारे शासक " मान के भूखे थे, किसी के प्राणों के नहीं ।"
यह सच है कि विग्रहराज का अधिकांश समय युद्धों में ही व्यस्त रहा, तो भी कला, संस्कृति और साहित्य के अनन्य उपासक रहा । वह स्वयं एक विद्वान था और कला के महत्त्व को समझने वाला था । इनके आश्रय में रहने वाले राजकवि सोमदेव ने 'ललित विग्रहराज' नाटक की रचना की थी जिसमें विग्रहराज और उनकी वीरता का सटीक वर्णन है । सबसे बड़ी बात तो यह है कि महाराज स्वयं भी एक अच्छा नाटककार था और 'हारिकेल' नाटक की रचना की थी जिससे इसकी साहित्यिक अभिरुचि का पता लगता है। जब राजा ही साहित्य का अनुरागी हो तो फिर क्या ? राज्य एवं राज्य के बाहर के कवियों व लेखको को पूरा आश्रय व प्रोत्साहन मिला और उस काल में भरपूर साहित्य सृजन हुआ।
देश एवं विदेश के असंख्य पर्यटकों ने 'ढाई दिन का झोंपड़ा' देखकर अब तक उसकी प्रशंसा में बहुत कुछ कहा है, लेकिन उनमें से बहुत कम ही लोगों को पता है कि यह किसी मुस्लिम शासक द्वारा निर्मित न होकर अजमेर के शासक विग्रहराज द्वारा बनवाया हुआ एक सरस्वती मंदिर था । अंग्रेज जनरल बंकिघम ने तो इसे वास्तुकला का उत्तम प्रतीक माना है। आज भी इस तथाकथित झोंपड़े के स्तम्भ एवं अन्य अवशेषों पर दृष्टिपात करें तो लगता है कि शिल्पियों ने इसके निर्माण में अपने प्राण फूंके थे । जहाँ तक 'ढाई दिन का झोंपड़ा' नाम का अर्थ यह है कि इसे गिराने में ढाई दिन लगे थे। कहते हैं कि एक फकीर को इसे अपने निवास के लिए तोड़-फोड़ सामग्री को इधर-उधर करने में ढाई दिन लगे थे, इसलिए तबसे इसे 'ढाई दिन का झोंपड़ा' कहा जाने लगा। इतिहासकारों का मानना है कि विग्रहराज ने अजमेर में अनेक और देव मन्दिरों का भी निर्माण कराया था, जिनके मौन खंडहर आज भी काल की धूल में इधर-उधर दबे हुए इनकी संस्कृति - प्रियता का बखान कर रहे हैं।
विग्रहराज ने जिनका दूसरा नाम बीसलदेव भी था, अपनी जनता-जनार्दन की सुख-सुविधाओं के लिए आज के अजमेर की उपत्यका में एक 'बीसलपाल' नाम का सरोवर भी बनाया था जो उस समय के वैभाव की कहानी तो कहता ही साथ ही शासक के जनकल्याणी - मन का प्रदर्शन कराता है। दुर्भाग्य है कि आज ऐसे मनोरम जलाशय की ओर किसी का ध्यान नहीं है । पृथ्वीराज रासो में इसके सन्दर्भ में लिखा है कि मृगया से लौटते हुए विग्रहराज को निर्झरों की सुललित कल-कल ध्वनि से प्रतिध्वनित और प्रकृति के अपार हरीतिमापूर्ण वैभव से युक्त यह प्रदेश इतना आकर्षक प्रतीत हुआ कि उसने तत्काल अपने साथ चल रहे मंत्री को सरोवर बनाने का आदेश दे डाला।
उक्त प्रकृति-प्रेम विग्रहराज के बहुमुखी व्यक्तित्व को दर्शता है । जो अगर विग्रहराज के समकालीन इतिहास के पृष्ठ आज बाहर आये तो कोई भी व्यक्ति चकित हुए बिना नहीं रहेगा कि उसने उस समय एक सफल शासक के दायित्वों का निर्वाह किया जब देश पर चारों ओर से आक्रांता यहाँ की अस्मिता को लूटने आँखें लगाये बैठे थे, देशी शासकों के दिल की धड़कने तेज थी, राष्ट्रीयता और एकता क्षीण हो रही थी।
वस्तुतः विग्रहराज अपने युग का महान् विजेता ही नहीं महान् शासक भी था। उसने राजपूत गौरव को अक्षुण्ण ही नहीं रखा बल्कि एकता का संदेश देकर उसमें श्रीवृद्धि भी की । इसलिए विग्रहराज ने न केवल चौहान राजवंश को अपने बहुमुखी प्रतिभावान व्यक्तित्व से प्रकाशित किया बल्कि भारतीय इतिहास स्वयं अपने इस लाल से सदैव गौरवान्वित हुआ ।