राजस्थानी प्रेम कहानी : ढोला मारू

राजस्थान की लोक कथाओं में बहुत सी प्रेम कथाएँ प्रचलित है पर इन सबमे ढोला मारू प्रेम गाथा विशेष लोकप्रिय रही है .

जहाँ मन्नत मांगी जाती है मोटरसाईकिल से !

मै यहाँ एक ऐसे स्थान की चर्चा करने जा रहा हूँ जहाँ इन्सान की मौत के बाद उसकी पूजा के साथ ही साथ उसकी बुलेट मोटर साईकिल की भी पूजा होती है.

"एलोवेरा " ब्लॉग ट्रैफिक के लिए भी है खुराक

एलोवेरा शारीरिक स्वास्थ्य के साथ साथ ब्लॉग के लिए भी एक बढ़िया टॉनिक है , एक बढ़िया की-वर्ड जो गूगल से आसानी से पाठक झटक कर आपके ब्लॉग पर ट्रैफिक बढ़ा सकता है |.

"उबुन्टू लिनक्स" इसका नाम तो बाली होना चाहिए था

उबुन्टू की इस तेज गति से नेट चलाने का कारण पूछने पर हमारे मित्र भी मौज लेते हुए बताते है कि जिस तरह से रामायण के पात्र बाली के सामने किसी भी योद्धा के आने के बाद उसकी आधी शक्ति बाली में आ जाती थी.

क्रांतिवीर : बलजी-भूरजी शेखावत

आज भी बलजी को नींद नहीं आ रही थी वे आधी रात तक इन्ही फिरंगियों व राजस्थान के सेठ साहूकारों द्वारा गरीबों से सूद वसूली पर सोचते हुए चिंतित थे तभी उन्हें अपने छोटे भाई भूरजी की आवाज सुनाई दी |.

Dec 27, 2010

चार लाख रु.लालच भी नहीं भुला सका मित्र की यादें

ज्ञान दर्पण पर आपने " मित्र के विरह में कवि और विरह के दोहे" में पढ़ा कि अपने मित्र बाघजी राठौड़ की मौत का दुःख कविराज आसाजी बारहट सहन नहीं कर सके और वे उनके विरह में एक पागल की से हो गए वे जिधर भी देखते उन्हें बाघजी की सूरत ही नजर आती और वे बाघा बाघा चिल्लाते हुए उनके विरह में हो दोहे व कविताएँ बोलते रहे |
एक दिन कविराज आसाजी के बारे में अमरकोट के राणा जी ने सुना तो उन्होंने कहा कि कविराज को मैं अपने पास रखूँगा और उनका इतना ख्याल रखूँगा कि वे बाघजी को भूल जायेंगे | और आसाजी को राणा ने अमरकोट बुलवा लिया |
एक दिन राणा जी ने कविराज आसाजी की परीक्षा लेने के लिए सोचा कि क्यों न कविराज को लालच दिया जाय फिर देखते है वे अपने मित्र को भुला पते है या नहीं | यही सोचकर एक दिन राणा जी ने कहा कि आपके दोस्त बाघजी से मेरा पुराना बैर है और मैं चाहता हूँ कि आप कम से कम एक रात्री उनका नाम नहीं लें , राणा जी ने कविराज से कहा कि वे सिर्फ एक रात्री बाघजी का नाम न लें तो मैं आपको रात्रि के चारों प्रहरों के हिसाब से चार लाख रूपये इनाम दूंगा कह कर राणा वहां उपस्थित सिपाहियों को इशारा करके चले गए |
राणा की बात सुनकर कविराज के पुत्र ने उन्हें खूब समझाया कि हे पिता श्री ! कम से कम एक रात तो आप मेरे ही लिए अपने मित्र बाघजी को भूल जाये और एक रात्रि उनका नाम लिए बिना काट दें | ताकि मैं इन मिलने वाले चार लाख रुपयों से अपना जीवन ढंग से काट लूँ आखिर एक ही रात की बात है फिर भले आप रोजाना अपने मित्र बाघा को याद करते रहना | कवि आसाजी ने अपने पुत्र की विशेष इच्छा पर हृदय पर पत्थर रखकर कुछ रात्री निकाली | पर सच्चे प्रेमी जब बिछुड़ते है तो उन्हें नींद आना भी तो कठिन है | एक प्रहर रात के बीतते ही अपने मित्र बाघजी की यादें शूल की भांति कवि आसाजी के हृदय को भेदने लगी | और इतनी देर से दबा हुआ भावों का प्रवाह पुन: तीव्र हो गया और वे आखिर बोल पड़े -
बाघा आव वलेह, धर कोटडै तूं धणी |
जासी फूल झड़ेह, वास न जासी बाघरी ||

हे कोटडे के स्वामी बाघजी ! एक बार फिर आ जावो फूल झड़ जाते है लेकिन उनकी सुगंध नहीं जाती (तुम्हारी कीर्ति भुलाई नहीं जा सकती)|

'बाघा आव वलेह' कितना मीठा निमंत्रण है | 'वास न जासी बाघरी' वास्तव में ठीक है कि प्रेमी की स्मृति प्रेमी की मृत्यु होने पर मिट थोड़े ही सकती है | वह तो उल्टी और तीव्र होगी | कवि ने अनुभूति का पुट देकर जीवन के इस महान सत्य को कितने थोड़े शब्दों में किस कौशल से व्यक्त कर किया है |

इस दोहे को सुनकर सिपाही ने पूछा कि आसाजी जाग रहे हो या नींद में कह रहे हो | कवि ने कहा - मित्र बाघजी बिना नींद ही नहीं आती और एक नि:श्वास खींचते हुए कहा-
ठोड़ ठोड़ पग दौड़ करस्यां पेटज कारणे |
रात दिवस राठौड़ वीसरसूं नह बाघ नै ||

पेट के लिए जगह जगह भटकता फिरूंगा लेकिन मित्र बाघजी को कभी भी न फूल सकूँगा |

सिपाही ने कहा - अपनी मस्ती में अपने पुत्र पर हृदय-हीनता क्यों करते है ? दो लाख रूपये तो आपने बाघजी के लिए दो दोहे बोलकर खो दिए अब भी समय है दो लाख तो बचाइये | सिपाही की बात सुनकर कविराज आसाजी गंभीर हो चुप हो गए |

लेकिन दबी हुई प्रेमी की विकल हूक दबी कैसे रह सकती थी | तीसरे प्रहर का प्रभात होते मुर्गा बोला | प्रभात के शांत वातावरण में हृदय के समस्त वेग से मुर्गे के उस दुखी क्रन्दन में क्या भाव होते है यह एक विरही ही बता सकता है | कविराज के हृदय का प्रसुप्त प्रवाह विकल हुआ और बह उठा -
कूकड़ला क्यों कूकियो, ढळती मांझल रात |
(कै) तनै बिल्ली संतायियो, (कै) बाघा तणों विराग ||

हे मुर्गे ! तू इस बीतती हुई निस्तब्ध रात्री में क्योंकर क्रन्दन कर उठा ? क्या तुझे बिल्ली ने सताया है अथवा तुझे भी मेरी ही भांति बाघजी का विरह सता रहा है ?

कवि आसाजी मुर्गे के चिल्लाने में अपने दर्द की हुक पाते है '(कै) तनै बिल्ली संतायियो, (कै) बाघा तणों विराग ' कितना भोला प्रश्न है | इस प्रश्न में एक कसक है | कहते है कसक का स्पष्टीकरण ही काव्य है | इस दोहे के समान कसक का इतना अच्छा स्पष्टीकरण और कहाँ पाया जा सकता है |

सिपाही ने सोचा,इस समय याद दिला दिया तो कविराज का बचा हुआ एक लाख रुपया भी चला जायेगा | अत: प्रात:काल से कुछ पहले सिपाही ने कविराज से कहा - अब तो केवल आध घड़ी ही बची है सो धीरज रखिये इतने महाराणा भी आ जायेंगे और बचा हुआ एक लाख रुपया तो मिल जायेगा | कविराज आसाजी का प्रेम इसी समय माया पर विजय स्थापना कर गर्व से खड़ा हुआ | मन ही मन अपनी कमजोरी पर रोष करते हुए सिपाही से कहा -
थडै मसांण थयांह , आतम पद पूगां अलख |
(म्हारा) गंगा हाड़ गयांह ,(हूँ) वीसरसूं जद बाघ नै ||

मैं मित्र बाघजी को तभी भूल सकूँगा जब मेरा श्मशान भी बाघजी के स्मारक के पास ही बना दिया जावेगा,मेरी आत्मा परम पद को प्राप्त हो जाएगी और मेरी हड्डियाँ गंगा में प्रवाहित कर दी जाएगी |

सिपाही ने कहा - गजब कर दिया | आपने चारों लाख रूपये खो दिए | इतने में महाराणा भी आ गए और पूछा कि क्या बारहट जी चारों लाख रूपये खो चुके ? ऐसे प्रश्न का भावुक कवि ने उतर दिया -
मड़ा मसांण गयांह, अलल ले पोंछ्या अलख |
(म्मारा) गंगा हाड़ गयांह (हूँ) तोय न भूलूं बाघ नै ||

मेरा शव श्मशान भूमि को पहुँच जावेगा ,मेरी आत्मा स्वर्ग दूत ले जावेंगे और मेरी हड्डियाँ गंगा में बहा दी जावेगी; तब भी मैं बाघजी को नहीं भूल सकता |

कवि ने इस दोहे में अपनी प्रतिभा और अपने व्यक्तित्व की पराकाष्ठा कर दी | भावुकता को चरम सीमा तक पहुंचा दिया "(हूँ) तोय न भूलूं बाघ नै" एक तीर सा प्रभाव करता है | यह वह काव्य है जिसे सुनकर 'तन मन धुनत शरीर' की उक्ति ठीक बैठती है | उस धनुर्धर के तीर से क्या और कवि की उक्ति से क्या,जो लगकर हृदय को तिलमिला न दे |
चींघण चालवियांह, खीरां बाळ खखेरियां |
राणा राख यथांह , वीसरसूं न बाघ नै ||

चींघण से (मुर्दा जलाते समय खोपड़ी तोड़ने वाली लकड़ी से) जब कपाल क्रिया कर दी जावेगी और अंगारों में मुझे जलाकर उथलाया जावेगा तब भी मैं बाघे को नहीं भूल सकूँगा | इसलिए हे राणा ! अपनी थैलियों को अपने पास रखो |

प्रेमी की प्रेम स्मृति के आगे रुपयों का लोभ नहीं टिक सका | इसीलिए तो कहा है "राणा राख यथांह" | यहाँ राणा को भी उपेक्षा भरी दृष्टि से देखा गया है | अपनी थैलियाँ अपने पास रखो, मुझे नहीं चाहिए - मैं बाघे को नहीं भूल सकता | कितनी आहें भरी हुई है इस कथन में |
और उस ज़माने में (हुमायूं के समकालीन) चार लाख रूपये का लालच भी उन कविराज आसाजी बारहट को अपने मित्र बाघजी की स्मृति को भुला न सका |

उपरोक्त सभी दोहों का हिंदी भावार्थ व उनकी व्याख्या पूज्य स्व.श्री तनसिंह जी,बाड़मेर द्वारा की गयी है |

Dec 24, 2010

एक मुलाकात शेरसिंह 'साफा' के साथ

पिछले जोधपुर प्रवास के दौरान पहले ही निश्चित कर लिया था कि इस बार शेरसिंह जी राठौड़ 'साफा' से जरुर मिलकर आना है | शेरसिंह राठौड़ जोधपुर व देश विदेश में शेरसिंह साफा के नाम से मशहूर है देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में शेरसिंह जी की साफा (पगड़ी) बाँधने की कला का जिक्र हो चूका है ,राजस्थान के हर कोने में आपको शादी समारोह हो,चुनाव हो या कोई अन्य समारोह आपको शेरसिंह द्वारा बाँधा साफा किसी न किसी के मस्तक पर जरुर दिख जायेगा | राजस्थान में चुनाव प्रचार के दौरान एक दुसरे को सम्मानित करने हेतु साफों की इतनी अधिक मांग होती है कि शेरसिंहजी व अन्य साफा व्यवसायी उस मांग की पूर्ति तक नहीं कर पाते |
एक तरफ शेरसिंह राठौड़ ने साफा बांधने से परहेज कर राजस्थान की इस पारम्परिक पहचान से दूर होती पीढ़ी को न केवल इस परम्परा से वापस जोड़कर सांस्कृतिक विरासत को बचाने का काम किया है वहीँ साफा बांधने की इस कला को एक ऐसा व्यवसायिक रूप दिया है कि आज पुरे प्रदेश में सैंकड़ों युवक इस कला को व्यवसाय के रूप में अपनाकर अपनी रोजी रोटी कमा रहे है | मैंने अपनी इस छोटीसी मुलाकात में शेरसिंह जी से यही जानने की कोशिश की कि कैसे उन्होंने इस कला को व्यवसायिक रूप दिया | पेश है उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश -
आपने साफा बांधने की ये कला कब और किससे सीखी ?

शेरसिंहजी - मेरी माताजी बहुत बढ़िया साफा बांधना जानती थी सो आस पास के गांवों के लोग शादियों के समय दुल्हे के लिए उनसे साफा बंधवाने आते थे , मैंने भी बचपन में ही अपनी माता जी से ये कला सीखी और उसके बाद मैं भी जोधपुर आने के बाद हर रोज लोगों के लिए दस बीस साफा बांध दिया करता था पर ये सारा कार्य सिर्फ समाज सेवा तक ही सिमित था |

लेकिन आपने साफा बांधने की इस कला को समाज सेवा के रूप में करते हुए इसे व्यवसायिक रूप कैसे दिया ? और ये आपके दिमाग में कैसे उपजा कि इस आम कला को जो गांवों में बहुतसे लोग जानते को व्यवसाय में बदला जा सकता है |
शेरसिंह जी - हाँ जिस समय मैंने इस व्यवसाय के रूप में लिया उस वक्त दूसरा तो क्या मैं भी नहीं सोच सकता था कि साफा बांधने के भी रूपये मिल सकते है पर ये सब अनायास ही हो गया
कैसे ?
शेरसिंहजी- बात १९८६ की है मैं अपने एक वणिक दोस्त के साथ भोपाल गया था जहाँ हमारी जेब कट गई और हमारे पास जोधपुर वापस आने के लिए किराये के पैसे तक नहीं थे , हम इसी चिंता में कि पैसे का इंतजाम कैसे किया जाये सोच ही रहे थे हमें एक विवाह पांडाल दिखाई दिया और हमने देखा कि लोग अपने व दुल्हे के लिए साफा बंधवाने के लिए परेशान हो घूम रहे थे | मेरा साथी चूँकि वणिक पुत्र था सो तुरंत उसके व्यवसायिक दिमाग ने उन बारातियों की जरुरत समझ ली वह मुझे बाहर छोड़कर विवाह पांडाल में गया और उन्हें कहा कि जोधपुर से एक साफा बांधने वाले यहाँ आये हुए है कुछ फीस लगेगी और मैं उन्हें आपके लिए उपलब्ध करा सकता हूँ , बारातियों से वह सौदा कर मेरे पास आया और यह कहकर अन्दर ले गया कि आप सिर्फ साफा बांधना , फीस की बात मैं करूँगा |
खैर मैंने उनके कुछ साफे बांधे और मेरे मित्र ने उनसे पांच रुपये लेकर जैसे ही मेरे हाथ में दिए तो मैं तो भौचंका रह गया और मित्र से कहने लगा कि ये साफा बांधने की फीस है या कहीं तुमने मुझे ही तो गिरवी नहीं रख दिया ? पांच हजार रूपये मिलने के बाद मेरे वणिक मित्र की वणिक बुद्धि दौड़ने लगी और उसने वहां दो चार दिन और रुकने के कार्यक्रम बना डाला और एक होटल में रुक कर एक अख़बार में विज्ञापन दे डाला कि जोधपुर के प्रसिद्ध साफा बांधने वाले यहाँ आये हुए जिन्हें जरुरत हो इस होटल में आकर मिलें | चूँकि उस समय सदियों का सीजन था और उस विज्ञापन से तीन दिन में ही हमने ३९०००/रु.कमा लिए , उन्ही में से मैंने ३००००/रु. के साफे खरीदकर उन्हें बांध कर नेशनल हेंडलूम को सप्लाई करने का काम शुरू कर इस कला को व्यसायिक रूप देना शुरू किया जो उतरोतर बढ़ता ही गया और इस कला और इस व्यवसाय ने मुझे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिला दी |
इसका सारा श्रेय मेरे उस वणिक मित्र को जाता है |
सुना है जोधपुर में हुई लीज हर्ले व अरुण नायर की चर्चित शादी में भी अरुण नायर के लिए साफा आपने ही बाँधा था |
शेरसिंहजी - जी हाँ ! मैंने उस दिन जयपुर में था और वहीँ रतन टाटा जी के एक रिश्तेदार उद्योगपति व इंडिया टुडे वालों का फोन आया कि आपको अरुण नायर के लिए साफा बांधने आना है पर मैंने जयपुर में होने की वजह बता आने में असमर्थता जताई कि इतने कम समय में मेरा जयपुर से जोधपुर पहुंचना नामुमकिन है पर उन्होंने कहा कि ये आप उन पर छोड़ दें आप तो बस हाँ कीजिए और सांगानेर हवाई अड्डा पहुँचिये , मेरे सांगानेर हवाई अड्डा पहुँचते ही वहां एक चार्टड प्लेन इंतजार कर रहा था जो मुझे लेकर तुरंत जोधपुर के लिए उड़ चला और मैंने अरुण नायर के लिए साफा बांधा जिसे पहनते ही नायर ने मुझे ३१०००/रु. दिए |

शादियों व चुनावों की सीजन में जब साफों की मांग बेतहासा बढ़ जाती है तब आप इतने साफे कैसे बाँध पाते है ?
शेरसिंहजी - मेरी दुकान व गोदाम के पास ही राजपूत छात्रावास है जहाँ चौपासनी स्कूल से आये छात्रों को थोड़ा बहुत साफा बांधना आता है क्योंकि चौपासनी स्कूल के छात्रों को स्कूल में साफा बांधना सिखाया जाता है और उन छात्रों व अन्य उत्सुक छात्रों को मैं साफा बांधने की ट्रेनिंग देता रहता हूँ सो सीजन में जब मांग ज्यादा बढ़ जाती है तब मैं उन छात्रों की सेवाएँ लेता हूँ | मैं एक छात्र को एक साफा बांधने के दस रूपये देता हूँ और एक छात्र एक दिन में १५०-२०० साफा बांधकर १५०० से २००० रु. तक कमा लेता है इससे उसके महीने भर का जेब खर्च आ जाता है और मैं बाजार में साफों की मांग पूरी कर पाता हूँ |



चुनावों में धूम मचाता है साफा

शाम का वक्त था मुझे भी सोजती गेट पर स्थित राजस्थानी ग्रंथागार जाना था और शेरसिंहजी को अपनी दुकान बढ़ाकर घर | सो हमने एक दुसरे से दुबारा जल्द मिलने का वादा कर विदा ली | और थोड़ी ही देर में हम राजस्थानी ग्रंथागार पहुँच गए जहाँ हमेशा की तरह इस बार इतिहासकार व साहित्यकार डा.विक्रम सिंह जी राठौड़ से भी मुलाकात हो गई जब उन्हें पता चला कि १९ दिसम्बर को मुझे महामहिम राष्ट्रपति के जन्म दिन समारोह में भाग लेना तो उन्होंने अपनी लिखी एक पुस्तक "राजपूत नारियां" और एक और पुस्तक "भारत के राष्ट्रपति " की प्रतियाँ महामहिम को उपहार स्वरुप देने के लिए दी |

मेरी शेखावाटी हरियाणवी ताऊनामा, हठीलो राजस्थान

Dec 22, 2010

महामहिम राष्ट्रपति जी के जन्म दिन समारोह में

लगभग एक सप्ताह पूर्व ही श्री श्रवणसिंहजी शेखावत का सन्देश आ गया था कि 19 दिसम्बर को महामहिम राष्ट्रपति जी का जन्म दिन है और आपको उन्हें जन्म दिन की शुभकामनाएँ देने हेतु राष्ट्रपति भवन पहुंचना है | श्री श्रवणसिंहजी शेखावत दिल्ली राजपूत समाज के सक्रीय कार्यकर्ता है उनका दिल्ली में रहने वाले राजस्थान के लगभग 1500 राजपूत परिवारों से सीधा संपर्क है | और वे राजपूतवर्ल्ड ब्लॉग के नियमित पाठक भी है |

19 दिसम्बर सुबह 9.30 बजे मैं अपनी पुत्री ,पुत्रवधू और मित्र जीतेन्द्रसिंह राठौड़ और उनकी धर्म पत्नी के साथ राष्ट्रपति भवन के गेट न. 37 पर पहुंचे जहाँ सुरक्षा ने लगे सुरक्षा कर्मियों ने तुरंत हमारी गाड़ी रोककर पूछताछ करनी शुरू करदी,मैं उन्हें कोई जबाब देता तब तक कुछ दूर खड़े एक सुरक्षा अधिकारी ने मेरे सिर पर राजस्थानी साफा (पगड़ी) देखकर सुरक्षा कर्मियों से कहा कि ये राजस्थान के राजपूत लोग है इन्हें अन्दर जाने दीजिए | और हमारी गाड़ी राष्ट्रपति भवन की पार्किंग में पहुँच गई तभी अविनाश वाचस्पति जी का फ़ोन आ गया,उनसे संक्षिप्त बातचीत कर हम आगे बढ़ गए जहाँ अधिकारी लोग समारोह में शामिल होने वाले लोगों के नामों की सूचियाँ लेकर खड़े थे हमें भी नाम पूछकर अपनी सूचि से मिलान कर आगे जाने को कहा गया,समारोह स्थल पर बैठने हेतु काफी लम्बी लाइन लगी थी हम भी अनुशासन की पालना करते हुए लाइन में खड़े हो गए पर कुछ ही देर में वहां तैनात एक अधिकारी की जैसे ही हमारे ऊपर नजर पड़ी वे तुरंत हमारे पास दौड़े चले आये और हमें लाइन से निकालकर सीधे समारोह स्थल पर पहुंचा कर एक तरफ इशारा किया कि सर आपके लिए बैठने की वहां व्यवस्था है | राष्ट्रपति भवन के गेट व फिर समारोह स्थल के अधिकारी द्वारा दिए सम्मान के बाद मुझे अपनी परम्परागत राजस्थानी वेशभूषा के महत्व व उसके प्रति लोगों के सम्मान का आभास हुआ |

समरोह स्थल पर उद्घोषणानुसार कुछ ही देर में महामहिम राष्ट्रपति जी अपने पति श्री देवीसिंह शेखावत के साथ घोड़ो की बग्गी में बैठकर पधारी | उनके आते ही राष्ट्रगान की धुन बजी व उसके बाद महामहिम ने अपने सुरक्षा दल की परेड का सलामी लेते हुए निरिक्षण किया ,तत्पश्चात राष्ट्रपति सुरक्षा दल के अधिकारीयों व कर्मियों ने एक बढ़कर एक करतब दिखा अपने शौर्य व कार्यकुशलता का प्रदर्शन किया | इस प्रदर्शन में घोड़ों के करतब व परेड देखना शानदार यादगार रही | ये प्रदर्शन पुरे होने के बाद उद्घोषिका ने सभी को मुग़ल गार्डन में जाने का अनुरोध किया | मुग़ल गार्डन में महामहिम के साथ फोटो खिंचवाने के बाद नाश्ते का कार्यक्रम था |

ठीक राष्ट्रपति भवन के पीछे एक मुग़ल गार्डन के एक बड़े लान में सभी को अपने अपने दलों के साथ खड़ा कर दिया गया जिनमे राजपूत समाज का दल सबसे बड़ा था | कुछ ही देर में वहां राष्ट्रपति जी अपने पति के साथ पहुंची और सभी दलों के साथ बारी बारी से फोटो खिंचवाए | हमारा दल काफी बड़ा था सो दल के लोगों ने राष्ट्रपति भवन के अधिकारीयों से अनुरोध किया कि हमारे दो ग्रुप फोटो का कार्यक्रम बनाए एक पुरे ग्रुप का साथ व दूसरा महिलाओं के साथ ,लेकिन अधिकारी समय का बहाना बना आनाकानी कर रहे थे | हमारा ग्रुप की फोटोग्राफी होने के बाद ग्रुप के सदस्यों ने महामहिम को शुभकामनाओं सहित गुलदस्ते भेंट किये | मेरी पुत्रवधु ने महामहिम को डा.विक्रमसिंह राठौड़ ,गुन्दोज द्वारा लिखित एक पुस्तक "राजपूत नारियां" भेंट की जिसे राष्ट्रपति जी ने बड़े गौर देखा व पुत्रवधू से उसके लेखक व उसमे लिखी सामग्री के बारे पूछा ,पुत्रवधू द्वारा पुस्तक के बारे में दी गयी जानकारी को उन्होंने पुरे ध्यान से सुना और वादा भी किया कि वे उस पुस्तक को जरुर पढ़ेंगी |और उन्होंने फोटोग्राफर को राजपूत महिलाओं के साथ एक और फोटो खेंचने के निर्देश दिए |

फोटोग्राफी के बाद राष्ट्रपति जी के साथ ही सबका नाश्ते का कार्यक्रम था पर उनकी व्यस्तता के चलते उनके आने में देरी हो रही थी और हमें भी कुछ और जरुरी कार्य थे सो हम बिना नाश्ता किये ही समयाभाव के चलते बाकि कार्यक्रम छोड़कर बीच में ही चले आये |


महामहिम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी के साथ राजपूत महिलाऐं |

महामहिम के जन्म दिन समारोह में उनके साथ राजपूत समाज के गणमान्य लोग |

Dec 21, 2010

मित्र के विरह में कवि और विरह दोहे

ज्ञान दर्पण पर "इतिहास की एक चर्चित दासी भारमली" के बारे पढ़ते हुए आपने पढ़ा कि जैसलमेर के रावत लूणकरणजी की रानी राठौड़ीजी ने भारमली को जैसलमेर से ले जाने के लिए अपने भाई कोटड़ा के स्वामी बाघ जी को बुलवा भेजा था | बहन के कहने पर बाघजी भारमली को चुपके से उठाकर अपने गांव कोटड़ा ले आये |

भारमली के बिना जोधपुर के मालदेव को भी चैन नहीं था पर बाघ जी से भारमली को छिनना भी कोई आसान नहीं था क्योंकि राव मालदेव मालदेव जानता था कि ऐसी हालत में बाघजी पहले भारमली को मरेगा फिर खुद युद्ध करते मर जायेगा | एक दिन राव मालदेव ने कवि आसाजी चारण को बुलाकर कहा " मेरी छाती में एक तीर अटका हुआ है उस तीर को आप ही निकाल सकते है " और राव मालदेव ने आसाजी चारण को पूरी कहानी बताई और कहा कि - आपकी कविता की शक्ति ही मेरी छाती से ये तीर निकाल सकती है आप कोटड़ा बाघजी के पास जाइए वह कविता का बहुत बड़ा रसिया है और आपकी कविताएँ सुनकर वह खुश होकर जब आपको कुछ मांगने के लिए कहे तो आप उसे वचन बद्ध कर मेरे लिए उससे भारमली मांग लायें |

और कवि आसाजी बारहट (चारण) ऊंट लेकर कोटड़ा बाघजी के पास पहुँच गए पर बाघजी द्वारा दिए आदर सत्कार व मेहमानबाजी के चलते कवि महाराज अपने आने का मूल उद्देश्य ही भूल गए उनकी बाघजी से गहरी मित्रता भी हो गई |
कुछ वर्षों बाद बाघजी की मृत्यु हो गई , भारमली उनके साथ सती हो गयी | कवि आसाजी बारहट का जीवन अब अपने मित्र बाघजी के बिना शून्य हो चूका था ,बाघजी की स्मृति ने उन्हें बैचेन बना दिया | कवि तो थे सो अपने उद्गार पीछोलों के माध्यम से व्यक्त किये |
बाघे बिन कोटड़ो, लागै यों अहडोह |
जानी घरे सिधावियाँ , जाणे मांढवड़ोह ||

बाघजी के बिना यह कोटड़ा एसा लगता है जैसा बारातियों के चले जाने पर विवाह मंडप |

जिसके घर कभी बारात आई हो और विवाह मंडप को बारातियों के चले जाने पर देखा हो वाही अनुमान लगा सकते है या बाघजी जैसे मित्र के बिछुड़ने पर आसाजी बारहट जैसे कवि ही अनुमान लगा सकते है कि शुन्यता क्या होती है ? सच पूछो तो इस विवाह मंडप को शुन्यता का साकार रूप कह सकते है | दोहे की थाह ली जाये तो इसमें उपमा मात्र का ही लालित्य नहीं है बल्कि इसमें ह्रदय की सच्ची उथल-पुथल अन्तर्निहित है |
मारग मंडी चणाय , पंथ जोऊं सैणा तणों |
कोई बटाऊ आय, (म्हनै)वातां कहो नी बाघरी ||

राह पर मठ बनाकर अपने मित्र की राह देख रहा हूँ | कोई मुझे बाघजी की बातें कहो न |

निर्दोष और स्वच्छ हृदय की यह जिज्ञासापूर्ण आहें राजस्थानी साहित्य की अमर संपत्ति है | कल्पना को कितना मृदु रूप प्रदान किया है | "मारग मंडी चणाय , पंथ जोऊं सैणा तणों " में कवि हृदय का भावुक प्रेम किस विशेषण से चित्रित है और 'म्हनै वातां कहो नी ' कितनी मर्मस्पर्शी अभिलाषा है |अपने प्रिय की बातें सुनकर कभी मन तृप्त नहीं होता |
लाखों बाळद लाय, कीरत रो सोदो करे |
एकरस्यां घिर आव ,विणजारो व्है बाघजी ||

लाखों बैलों को लाकर कीर्ति का सौदा करना | हे बाघजी बंजारा होकर भी एक बार फिर आना |

प्रेमी के लिए 'एकरस्यां घिर आव' में कितना ललित आव्हान चित्रित है | एक बार फिर ,प्रत्येक असफल और प्रत्येक अनुरक्त की अभिलाषा बनी रहती है | एकरस्यां के भविष्य में एक नए लोक की सृष्टि है और एक निश्चित आनंद की प्राप्ति की आशा है | बाह्यावरणों की कोई चिंता नहीं,चाहे वह "बिणजारो" होकर अथवा अन्य रूप में | उसे तो पुराना हृदय चाहिए | कितना आदर्श भाव सोरठे में व्यक्त किया गया है |
हाटे पड़ी हठताल, चतरंगिया चाले रह्या |
करसण करै कलाळ, विकरो भागो बाघजी ||

रसिक बाघजी के चले जाने से हाटों में हड़ताल हो गई | कलाल (दारू बेचने वाला) की तो बिक्री ही टूट गई ,वह अब खेती करने लग गया है |

आसाजी बारहट अपनी प्रतिभा से विश्व व प्रकृति के समस्त व्यापारों में बाघा के बिछुड़ने का परिणाम देखते है | कलाळ के खेती करने का पेशा भी उन्हें इसी बात का सूचक प्रतीत होता है कि बाघाजी के न होने से उनका पेशा टूट गया है |
कूकै कोयलियांह, मीठा बोलै मोरिया |
राचै रंग रलियांह, बागां विच्चे बाघजी ||

हे बाघजी ! आज कोयल कुक रही है और मोर मृदु ध्वनि से बोल रहे है | बाग़ में सुन्दर बहार है (फिर तो आ जावो) अपने प्रेमी को बुलाने के कितने बहाने ढूंढ़ लाते है |
बाघा आव वलेह ,दुःख भंजण दूदा हरा |
आठुं पहर उदेह ,जातां देगो जेतरा ||

हे बाघ जी !(जैतसिंह के पुत्र) तेरे विरह से उत्पन्न दुःख आठों पहर बना रहता है | अब हे दादू के वंशज ! एक बार फिर आकर उसे मिटाजा |
कसतुरी झंकी भई, केसर घटियो आघ |
सब वस्तु सूंघी थई, गयो वटाऊ बाघ ||

कस्तूरी सस्ती हो गई है और केसर का भाव भी गिर गया है | सब वस्तुएं सस्ती हो गई लेकिन पथिक बाघजी चले गए |
इस तरह आसाजी बाघजी के चले जाने का दुःख सहन नहीं कर सके ,वे बाघजी के विरह में पागल से हो गए वे जिधर भी देखते उन्हें बाघजी की सूरत ही नजर आती और वे बाघा बाघा चिल्लाते हुए उनके विरह में हो दोहे व कविताएँ बोलते रहे |

एक दिन कविराज आसाजी के बारे में अमरकोट के राणा जी ने सुना तो उन्होंने कहा कि कविराज को मैं अपने पास रखूँगा और उनका इतना ख्याल रखूँगा कि वे बाघजी को भूल जायेंगे | और आसाजी को राणा ने अमरकोट बुलवा लिया | एक दिन राणा जी ने कविराज आसाजी को कहा कि वे सिर्फ एक बाघजी का नाम न लें तो मैं आपको रात्रि के चारों प्रहरों के हिसाब से चार लाख रूपये इनाम दूंगा |

पर राणा जी का लालच भी कविराज को अपने मित्र की याद से दूर नहीं रख सका |
राणा जी व कविराज आसाजी के बीच इस प्रसंग पर विस्तार से चर्चा अगले किसी लेख में जल्द ही होगी|

Dec 19, 2010

स्वास्थ्य-वर्धक हल्दी की सब्जी : बनाने की विधि

हल्दी के गुणों के बारे में भारत में कौन नहीं जानता , इसलिए हल्दी के गुणों पर बखान करने के बजाय सीधे कच्ची हल्दी की सब्जी पर आते है | १९९१ में जब जोधपुर में रहने का मौका मिला तो सर्दियाँ आते ही वहां होने वाली पार्टियों में खाने में बनने वाली सब्जियों की जगह ने हल्दी की सब्जी ने ले ली | सबसे पहले छगनलाल टेक्सटाइल में हुई एक पार्टी में हल्दी की सब्जी का स्वाद चखने को मिला और पहली बार पता चला कि कच्ची हल्दी की सब्जी भी बनाई जाती है उसके बाद महेशजी खत्री के डिजाइन स्टूडियो में महेश जी खत्री के स्वयं द्वारा बनाई लजीज हल्दी की सब्जी का स्वाद चखा | अब सर्दियों का मौसम शुरू हो चुका का और बाजार में कच्ची हल्दी की उपलब्धता भी आम हो चुकी है तो सोचा क्यों न आपको भी जोधपुर के महेश जी खत्री द्वारा बताई कच्ची हल्दी की स्वास्थ्यवर्धक और लजीज सब्जी बनाने की विधि बता दी
जाये |
(महेश जी खत्री जोधपुर में एक कपड़ा छपाई कारखाने के मालिक है और उच्च कोटि के टेक्सटाइल डिजाइनर होने के साथ ही पाक कला में भी निपुण है )
हल्दी की सब्जी में प्रयुक्त होने वाली सामग्री -
1-कच्ची (गीली) हल्दी की गांठे 500 gm
2-अदरक 200 gm
3-प्याज 250 gm
4-लहसुन 30 gm
5-टमाटर 500 gm
6-हरी मिर्च
7-दही 750 gm
8-देशी घी 500 gm
मिर्ची पाउडर,नमक,धनिया,जीरा,सौंफ,साबुत गर्म मसाला

हल्दी की सब्जी बनाने के लिए तैयारी-
1-सबसे पहले कच्ची हल्दी की गांठों को छीलकर कस लें (जैसे गाजर का हलवा बनाने के लिए गाजर को कस्तें है) |
2-अदरक को भी छीलकर कस लें और एक बर्तन में रख दें |
3-प्याज को छीलकर गोल कटिंग करें जैसे सलाद के लिए करते है |
4-लहसुन को छीलकर बारीक पीस कर एक कटोरी में रखलें |
5-टमाटर काटें (एक टमाटर के दो या तीन टुकडें ही करें) टमाटर ताजे होने चाहिए पिचके हुए नहीं |
6-हरी मिर्च को चीरा लगाकर उसके अन्दर से बीज निकाल दें व उसके चार टुकड़े कर लें |

उपरोक्त तैयारी करने के बाद अब सब्जी बनाना शुरू करतें है -
1-कड़ाही में घी गर्म करें व उसमे कसी हुई हल्दी को तब तक तलें जब तक हल्दी का रंग में हल्का भूरापन आ जाए | आंच को मंदा रखें | तलने के बाद तली हल्दी को घी से बाहर निकालकर एक बर्तन में रख दें |
2-अब उसी घी में प्याज भुनें तब तक जब तक प्याज का रंग गुलाबीपन पर आ जाएँ | भूनने के बाद प्याज को निकालकर एक अलग बर्तन में निकाल लें |
3-अब 3/4 किलो दही को एक बर्तन में लें व उसमे अपने स्वाद के हिसाब से मिर्ची पाउडर,धनिया,नमक आदि मसाले डालकर अच्छी तरह फैंट कर मिला लें |(बर्तन सिल्वर या कांसे का प्रयोग करें )|
4-अब एक दुसरे बर्तन (कड़ाही)में जो कांसे या सिल्वर का हो में उपरोक्त तलने के बाद बचे घी को छानकर गर्म करें और गर्म होते ही उसमे सौंफ,अदरक ,गर्म मसाला ,थोडा जीरा ,पीसा हुआ लहसुन,मिर्ची के कटे टुकड़े डालकर फ्राई करें | हल्का फ्राई होने के बाद दही में तैयार किया हुआ मसाला डाले दें | और इसमें उबाल आने के बाद आंच धीमी करके उसे तब तक पकाएं जब तक दही का पानी पूरी तरह से सुख ना जाएँ | पानी सुखते ही इसमें हिलाए जाने वाले चम्मच पर घी की मात्रा दिखाई देने लग जाएगी व दही की जाली बन जाएगी |
5-अब इस मसाले में उपरोक्त तली हुई सामग्री (हल्दी व प्याज) डाल दें व एक उबाल आने दें |
6-पहले उबाल के बाद कटे हुए टमाटर व हरा धनिया डालकर एक बार हिला दें व बर्तन का ढक्कन बंद कर चूल्हे से उतार लें , उतारने के बाद लगभग बीस मिनट तक ढक्कन ना हटायें |
अब आपकी स्वास्थ्यवर्धक स्वादिष्ट हल्दी की सब्जी तैयार है |
हल्दी की सब्जी खाने का देशी नुस्खा -आमतौर पर हमारे घरों में पतली रोटी बनती है पर हल्दी की सब्जी के साथ खाने के लिए रोटी मोटी बनवाएँ , एक या दो रोटी को थाली में रखकर उसके ऊपर सब्जी डालें व दूसरी रोटी से सब्जी खाएं , थाली में सब्जी के नीचे रखी रोटियां अंत में खाएं |

उम्रदराज लोग सर्दियों में कच्ची हल्दी की सब्जी का सेवन जरुर करें

चेतावनी - हल्दी की सब्जी में घी की मात्रा अधिक होती है साथ ही ये सर्दियों में बनती है इसलिए सब्जी खाने के तुरंत बाद पानी ना पीयें, वरना गला ख़राब हो सकता है |बहुत ज्यादा प्यास लगने पर गुनगुना पानी पीयें और पानी पीने से पहले एक पापड़ जरुर खाएं |










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Dec 17, 2010

उजळी और जेठवै की प्रेम कहानी और उजळी द्वारा बनाये विरह के दोहे-3

उजळी द्वारा अपने प्रेमी जेठवा के विरह में लिखे दोहे -
जळ पीधो जाडेह, पाबसर रै पावटे |
नैनकिये नाडेह, जीव न धापै जेठवा ||


मानसरोवर के कगारों पर रहकर निर्मल जल पिया था तो हे जेठवा अब छोटे छोटे जलाशयों के जल से तृप्ति नहीं होती |

उपर्युक्त दोहे का समानार्थी यह भी है | "पीधो" में बीते हुए सुखों की एक छाया है और "न धापै" में वर्तमान की करुणा उत्पादक अवस्था का चित्रण है | एक दोहे में भूतकाल की रंगरेलियां एवं वर्तमान की चीत्कारों का कैसा अपूर्व मिश्रण है ?

ईण्डा अनल तणाह, वन मालै मूकी गयो |
उर अर पांख विनाह, पाकै किण विध जेठवा ||

पक्षी अपने अंडे वन के किसी घोसले में छोड़कर चला गया है | ह्रदय और आँखों की गर्मी बिना वे अंडे किस प्रकार पाक सकते है ?

जेठवा प्रेम का अंकुर बोकर चला गया, वे अंकुर वांछित खाद्य व पानी बिना किस प्रकार फूल सकते है ? 'वन मालै मूकी गयो' में छिपी तड़फ पाठकों के हृदय को बेध डालती है |

जंजर जड़िया जाय, आधे जाये उर महें |
कूंची कौण कराँह, जड़िया जाते जेठवै ||

हृदय के अन्दर आगे जाकर जो जंजीरे कास दी गई है उनके जेठवा जाते समय ताले भी लगा गया अत: और किससे चाबी ला सकती हूँ ?

यह है उजळी के हृदय का हृदयविदारक हाहाकार ! सहृदय पाठक इसे पढ़कर उजळी के हृदय की थाह पा सकते है और साथ ही यह भी ज्ञात कर सकते है कि राजस्थानी लोक साहित्य भी कितना संपन्न है | संसार के श्रेष्ठ साहित्यों में ही एसा वर्णन प्राप्त हो सकता है अन्य जगह नहीं |

ताला सजड़ जड़ेह, कूंची ले कीनै गयो |
खुलसी तो आयेह (कै) जड़िया रहसी जेठवा ||

मजबूत ताले जड़कर उसकी चाबी लेकर तू कहाँ गया ? हे जेठवा ! यह ताले यदि खुलेंगे तो तेरे आने पर ही, नहीं तो यों ही बंद रहेंगे |

'कीनै गयो' में भावुक राजस्थानी हृदय की कितनी जिज्ञासापूर्ण तड़फ है | जानते हुए भी पूछ उठती है 'किधर गया' | 'कै जड़िया रहसी जेठवा' में दुखी हृदय का कितना दयनीय निश्चय है |

आवै और अनेक, जाँ पर मन जावै नहीं |
दीसै तों बिन जागां सूनी जेठवा ||

अन्य कई आते है लेकिन उन पर मन नहीं जाता | हे जेठवा ! तुझे न देखकर तेरी जगह शून्य लगती है |

राजस्थानी में एक कहावत है ' भाई री भीड़ भुआ सूं नी भागै" अर्थात भाई की कमी भुआ (फूफी) से पूरी नहीं होती | यही हल है जेठवे के चले जाने पर उजळी का | यों तो संसार में आवागमन का तंत्र बना रहेगा लेकिन उससे क्या ? जेठवे के सहृदय उजळी को कोई नहीं मिल सकेगा | प्रिय वास्तु बीते हुए क्षण की भांति जब हाथ से निकल जाती है तो पुनः प्राप्त नहीं होती | उजळी का हृदय भी कह उठता है - "दीसै तों बिन जागां सूनी जेठवा" | हृदय की शुन्यता का इस सोरठे में कितना यथार्थ शाब्दिक प्रतिबिम्ब प्रकट किया गया है |

समाप्त

Dec 15, 2010

उजळी और जेठवै की प्रेम कहानी और उजळी द्वारा बनाये विरह के दोहे-2


उजळी द्वारा अपने प्रेमी जेठवा की मृत्यु उपरांत बनाये पिछोले -
पाबासर पैसेह हंसा भेला नी हुआ |
बुगलां संग बैसेह , जूण गमाई जेठवा ||


संसार रूपी मान सरोवर में रहकर जेठवा रूपी हंसों का संसर्ग प्राप्त न हुआ और बगुलों (निकृष्ट प्रेमियों) के संग रहकर अपना जीवन नष्ट कर दिया |

जेठवै के बिना उजळी का संसार शून्य है | वहां के लोग उजळी को बगुले लगते है | सत्य भी तो है कि गरीब का आश्रय कुटिया है | उसके लिए गमनस्पर्शी राजप्रशाद और रम्य आश्रम पशुओं के निवास स्थान है | उसका उनसे कोई प्रयोजन भी तो नहीं |

वै दीसै असवार घुड़लां री घूमर कियां |
अबला रो आधार, जको न दीसै जेठवो ||


घोड़ों को घुमाते हुए कई अश्व सवार दिखते है लेकिन मुझ अबला का आधार जेठवा नहीं दिखाई देता |

जिनका हृदय टूट जाता है उनके लिए संसार आबाद होते हुए भी शून्य है | यों तो घोड़ों के सवार बहुत मिलेंगे लेकिन अबला उजळी का आधार अब नहीं आने का | किसी प्रिय की मृत्यु पर हमारे हृदय में जो वैराग्यपपूर्ण निराशा आती है उसे उजळी ने ' जको न दीसै' जैसे मृदुल लेकिन तीक्षण शब्दों में प्रकट किया है |

अंगूठे री आग लोभी लगवाड़े गयो |
सूनी सारी रात, जंप न पड़ी रे जेठवा ||


हे लोभी तूं अंगूठे की आग लगाकर चला गया | मैं रात भर रोई ,और हे जेठवा ! मुझे लेश मात्र भी नींद नहीं आई |

उजळी का संबोधन "लोभी" बहुत मौके का है | विशेषतः राजस्थानी तो लोभीड़े शब्द को बहुत मानते है | फिर ' लगवाड़े गयो में कितनी वेदना है | एक बेबस हृदय बिछुड़ते हुए के प्रति रोने के सिवाय और क्या कर सकता है ?

बहता जळ छोडेह, पुसली भर पियो नहीं |
नैनकड़े नाड़ेह, जीव न धापै जेठवा ||


चलते जळ को छोड़कर उससे चुल्लू भर भी पानी नहीं पिया ,अब इन छोटे-छोटे तालाबों से पिपासा नहीं बुझती |

उजळी अपने प्रियतम की महानता किस विशेषता से अभिव्यंजित करती है - जेठवा बहता हुआ पवित्र जल था और संसार के अन्य जन छोटे गड्ढे है - उजळी की इच्छा थी कि जेठवा रूपी बहते जल को प्राप्त करूँ,लेकिन बहने वाला जल जब बह गया तो अब गंदे जलाशयों का पानी किस भांति पी सकती थी | पाठक देखेंगे कि इस सोरठे में वाही भाव है जो सती सावित्री द्वारा नारद व उसके पिता के सत्यवान से दूसरा वर चुनों कहने पर प्रदर्शित किया गया था |

क्रमशः



यहाँ भी जाएँ -
हठीलो राजस्थान , मेरी शेखावाटी , हरियाणवी ताऊनामा








Dec 13, 2010

उजळी और जेठवै की प्रेम कहानी और उजळी द्वारा बनाये विरह के दोहे

करीब ११ वीं-१२ वीं शताब्दी में हालामण रियासत की धूमली नामक नगरी का राजा भाण जेठवा था | उसके राज्य में एक अमरा नाम का गरीब चारण निवास करता था | अमरा के एक २० वर्षीय उजळी नाम की अविवाहित कन्या थी | उस ज़माने में लड़कियों की कम उम्र में ही शादी करदी जाती थी पर किसी कारण वश उजळी २० वर्ष की आयु तक कुंवारी ही थी |

अकस्मात एक दिन उसका राजा भाण जेठवा के पुत्र मेहा जेठवा से सामना हुआ और पहली मुलाकात में ही दोनों के बीच प्रेम सम्बन्ध स्थापित हो गए जो दिनों दिन दृढ होते गए | दोनों के विवाह की वार्ता चलने पर मेहा जेठवा ने उजळी से शादी करने के लिए यह कह कर मना कर दिया कि चारण व राजपूत जाति में भाई- भाई का सम्बन्ध होता है इसलिए वह उजळी से विवाह कर उस मर्यादा को नहीं तोड़ सकता | हालाँकि उजळी के पिता आदि सभी ने शादी के सहमती दे दी थी | पर जेठवा के हृदय में मर्यादा प्रेम से बढ़ी हुई थी इसलिए उसे कोई नहीं डिगा सका , पर जेठवा के इस निर्णय से उजळी का जीवन तो शून्य हो गया था |

कुछ दिनों के बाद मेहा जेठवा की किसी कारण वश मृत्यु हो गई तो उजळी की रही सही आशा का भी अंत हो गया | उजळी ने अपने हृदय में प्रेम की उस विकल अग्नि को दबा तो लिया पर वह दबी हुई अग्नि उसकी जबान से सोरठो (दोहों) के रूप में प्रस्फुटित हुई | उजळी ने अपने पुरे जीवन में जेठवा के प्रति प्रेम व उसके विरह को सोरठे बनाकर अभिव्यक्त किया | इस सोरठों में उजळी के विकल प्रेम, विरह और करुणोत्पादक जीवन की हृदय स्पर्शी आहें छिपी है |
मेहा जेठवै की मृत्य के बाद अकेली विरह की अग्नि में तप्ति उजळी ने उसकी याद में जो सोरठे बनाये उन्हें हम मरसिया यानी पीछोले भी कह सकते है |

उदहारण व आपके रसास्वाद हेतु कुछ उजळी के बनाये कुछ पीछोले (दोहे) यहाँ प्रस्तुत है | इन दोहों का हिंदी अनुवाद व उन पर टिका टिप्पणी स्व.तनसिंहजी द्वारा किया गया है -

जेठ घड़ी न जाय, (म्हारो) जमारो कोंकर जावसी |
(मों) बिलखतड़ी वीहाय, (तूं) जोगण करग्यो जेठवा ||


जिसके बिना एक प्रहर भी नहीं बीतता उसी के बिना मेरा जीवन कैसे बीतेगा | मुझ बिलखती हुई अबला को छोड़कर हे जेठवा तू मुझे योगिन बना गया |

"जोगण करग्यो" में एक उलाहना भरी हृदय की मौन चीत्कार छिपी है | अब मेरा जीवन कैसे चलेगा | यह प्रश्न क्या दुखी हृदय में नहीं उठता ? अपनी अमूल्य निधि को खोकर "बिलखतड़ी वीहाय " कहकर इस बेबसी भरे हाहाकार को "जोगण करग्यो" कहकर धीरे से निकाल देती है |

टोळी सूं टळतांह हिरणां मन माठा हुवै |
बालम बीछ्ड़तांह , जीवै किण विध जेठवा ||

टोली के बिछुड़े हुए हिरणों के मन भी उन्मत हो जाते है फिर प्रियतम के बिछुड़ने पर प्रियतमा किस प्रकार जीवित रह सकती है |

प्रिय वस्तु का नाश संसार से विरक्ति का उत्पादन करता है | उस वस्तु बिना जीवन के सब सुख फीखे लगते है | विशेषतः हिन्दू नारी के लिए पति से बढ़कर जीवन में कोई भी प्रिय वस्तु नहीं , और जब पति की मृत्यु हो जाति है तो नारी भी "जीवै किण विध जेठवा" कहने के अलावा और कह ही क्या सकती है ? जब हिरन जैसे पशु भी विरह की घड़ी आते देख उन्मत हो जाते है फिर कोमल भावनाओं वाली नारी पति बिना किस प्रकार जीवित रह सकती है ?

जेठा थारै लार ,(म्हे) धोला वस्तर पैरिया |
(ली) माला चनणरी हाथ, जपती फिरूं रे जेठवा ||


हे जेठवा तेरे पीछे (मृत्यु के बाद) मैंने श्वेत वस्त्र धारण कर लिए है और चन्दन की माला हाथ में लेकर मैं जप करती फिरती हूँ |

पति के मरने पर रंग बिरंगे और श्रंगार की अपेक्षा हिन्दू नारी को "(ली) माला चनणरी हाथ,जपती फिरूं रे जेठवा " ही कहना इष्ट है | पति से त्यक्त अभागिनी उजळी के हृदय के करुण रुदन की दुखद हूक इस सोरठे में अदभुत रूप से व्यक्त है |
जग में जोड़ी दोय, चकवै नै सारस तणी |
तीजी मिळी न कोय, जोती हारी जेठवा ||

संसार में दो ही जोड़ी है - चकवे व सारस की | लेकिन हे जेठवा ! मैं खोज खोज कर हारी तो भी तीसरी जोड़ी न मिली |

उजळी को विश्वास था कि चकवे व सारस के बाद जेठवा व मेरी जोड़ी तीसरी जोड़ी है लेकिन उस जोड़ी के टूटने पर और जोड़ी कहाँ प्राप्त हो सकती है |

चकवा सारस वाण, नारी नेह तीनूं निरख |
जीणों मुसकल जाण, जोड़ो बिछड़ यां जेठवा ||

चकवे को, सारस के क्रन्दन को और नारी के नेह को, इन तीनों को देखकर यही प्रमाणित होता है कि जोड़ी के बिछुड़ने पर जीना कठिन है |

मृत्यु को प्राप्त हुए प्रेमी के लिए जीवित प्रेमी का सबसे बड़ा बल अपनी ही मृत्यु है | यहाँ तक कि साधारण दुःख की अवस्था में भी मनुष्य आत्महत्या के लिए प्रस्तुत हो जाते है | विशेषतः एक हिन्दू नारी का विधवा होना उसके जीवन का सबसे बड़ा दुखप्रद क्षण है | उस क्षण में यदि उजळी जैसी भावुक प्रेमिका जेठवा जैसे प्रेमी के लिए "जीणों मुसकल जाण" कह दे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं अपितु यथार्थता की चरम सीमा है | जीवन की अनुभूति पर करुणा का आवरण चढ़ाकर उजळी ने अपने दुखी जीवन का कितना मर्मस्पर्शी चित्र खिंचा है |

क्रमशः


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Dec 11, 2010

यूएसबी मोडेम : नेटवर्क प्रोफाइल बनाना

ज्ञान दर्पण पर पिछली पोस्ट में बताया गया था कि कैसे आईडिया नेट सेटर यूएसबी मोडेम में आईडिया सेलुलर द्वारा लगाया ताला तोड़कर दूसरी सिम का प्रयोग किया जा सकता है | पर मोडेम को अनलोक कर सीधे नहीं चलाया जा सकता उसके लिए प्रत्येक मोबाइल सेवा प्रदाता क.की सिम से नेट चलाने के लिए कुछ सेटिंग करनी पड़ती है तो आईये आज चर्चा करते है इसी सेटिंग पर -
1-“Mobile Partner” या “Idea netsetter” को शुरू करें ,और टूल (Tool) में ऑप्शन(option) पर जाएँ |



2-अब प्रोफाइल मेनेजमेंट पर क्लिक करें,प्रोफाइल मेनेजमेंट खुलने पर न्यू (New) पर क्लिक करें



3-प्रोफाइल नेम में अपने सेवा प्रदाता क. का नाम लिखे APN में Static चुने व अपने नेट सेवा प्रदाता क. का APN लिखे (सभी मोबाइल सेवा क.का अ पोस्ट में सबसे नीचे लिखा है )
4-ACCESS NUMBER में *98# लिखे यूजर नेम व पासवर्ड की जगह खाली छोड़ दें | और सेव पर चटका लगा दें यदि आप किसी क. विशेष की सेवा डिफाल्ट तौर पर सेट करना चाह रहें है तो सेव बटन पर चटका लगाने के बाद डिफाल्ट पर भी चटका लगा दें और ओके पर चटका लगा दें |
5-दुसरे सेवा प्रदाता की सेवा सुविधा जोड़ने के लिए भी यही तरीका दुहरायें |
6-Tool - Option -में प्रोफाइल के साथ ही Network भी लिखा मिलेगा , इस नेटवर्क पर चटका लगायें , नेटवर्क में रजिस्टर नेट वर्क में जाये , यहाँ ऑटो या मेनुवल नेटवर्क सर्च करें , उपलब्ध सभी नेटवर्क की सूचि दिखाई देगी जिसमे अपने सेवा प्रदाता का नाम चुनकर रजिस्टर पर चटका लगादें व रजिस्टर पूरा होने की सुचना का इंतजार करें |
अब आपका यूएसबी मोडेम नेट चलाने के लिए तैयार है |
APN List

APN’s

BSNL: BSNLNET(For 3g), gprssouth.cellone.in(for 2g)

AIRTEL: airtelgprs.com

AIRCEL: aircelgprs

RELIANCE: rcomnet

TATA: TATA.DOCOMO.INTERNET

IDEA: internet

VODAFONE: portalnmms(change proxy to ip address: 10.10.1.100 port:9401)

VIDEOCON: VINTERNET

ACCESS NUMBER: *98#,*99#,*99***1#

(Normaly Use *99#)

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Dec 9, 2010

आईडिया नेटसेटर यूएसबी मोडेम को अनलोक कैसे करें ?

अपने एलोवेरा प्रोडक्ट वाले रामबाबू सिंह अपने मोबाइल से इन्टरनेट का इस्तेमाल करते थे | उन्हें मोबाइल से नेट चलाते समय सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि बीच बीच में किसी का फोन आते ही नेट कट जाती थी या कभी मोबाइल की तार हिल जाती और नेट कट जाती इस तरह बीच में नेट कटने के चलते रामबाबू जी बड़े दुखी हो जाते |
एक दिन उनका यही दुःख दूर करने के लिए हमने नेट चलाने के लिए यूएसबी डाटा कार्ड की तलाश की शुरू की पर और इसी क्रम में हम एयरटेल की दूकान पर पहुंचे जहाँ 3G यूएसबी मोडेम की कीमत 3200/ रु. थी जो हमें बहुत ज्यादा लग रही थी क्योंकि 3G यूएसबी डाटा कार्ड मोडेम आईडिया सेलुलर वाले सिर्फ 1600/ रु. में बेच रहे थे और उसमे सिर्फ आईडिया की सिम ही इस्तेमाल हो सकती थी पर हमारे सामने दिक्कत ये थी कि रामबाबू जी के पास एयरटेल वालों का सिर्फ 100/- रु. में अनलिमिटेड इन्टरनेट इस्तेमाल का प्लान था जबकि आईडिया सेलुलर का नेट प्लान 200/- रु. मासिक में सिर्फ १ जीबी ही मिल रहा था |
अब आप कहेंगे कि इसमें दिक्कत कैसी ? आईडिया का डाटा कार्ड खरीदो और उसमे एयरटेल की सिम डाल दो , पर यहाँ एक और बड़ी भारी दिक्कत थी दूसरी सिम डालते ही डाटा कार्ड के लोक होने की चेतावनी आईडिया वालों ने पहले ही दे दी थी|

आखिर हमने गूगल बाबा को पूछा कि हे गूगल बाबा ! हम यदि आईडिया वालों से डाटा कार्ड खरीद कर क्या उसे अनलोक कर सकते है ? ताकि इस मोडेम में बाद में किसी भी मोबाइल सेवा प्रदाता की सेवा का लुफ्त उठा सकें | गूगल बाबा भी कहाँ किसी को मना करता है उसने हमें कुछ तरीके बताये और हम रामबाबू जी को साथ लेकर आईडिया सेलुलर वालों का नेटसेटर Huawei E1550 नाम का एक यूएसबी डाटा कार्ड मोडेम ले आये |
पर गूगल बाबा द्वारा बताये तरीके हमारे कोई खास काम नहीं आये पर और तरीके खोजते हुए हमें नेट पर ही एक व्यक्ति के संपर्क सूत्र मिले जिन्होंने कुछ रूपये लेकर हमें एक सोफ्टवेयर भेजा और उस औजार की मदद से हमने आईडिया नेटसेटर यूएसबी मोडेम का आईडिया वालों द्वारा लगाया ताला तोड़ अब मजे से रामबाबू जी उसमे एयरटेल की सिम डाल कर नेट सेवा का लुफ्त उठा रहे है |
अब हमने ये जुगाड़ कैसे किया जरा आप भी समझ लीजिए कभी जरुरत पड़ जाए -

सबसे पहले अपने मोडेम को पीसी से जोड़ें , जोड़ते ही मोडेम का एक सोफ्टवेयर इंस्टाल होने के लिए स्वत: ही खुलेगा जिसे इन्स्टाल कर लें |

1-यहाँ से एक ये औजार डाउनलोड कीजिए | ये औजार आपको आपके यूएसबी मोडेम का अनलोक कोड व फ्लेश कोड बताएगा |

2-अपने यूएसबी मोडेम को पीसी में लगाकर इस औजार को खोले व चित्र में बताई जगह अपने यूएसबी मोडेम का IMEI न. भरे और केल्कुलेट बटन पर चटका लगा दें | कुछ क्षण बाद ये औजार आपको आपके मोडेम का अनलोक कोड व फ्लेश कोड बता देगा इन्हें लिख कर सुरक्षित कर लें |
3-अब आपको एक औजार और चाहिए जिसे आप यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करें -

A-इस औजार को रन करे , सबसे पहले यह आपके पीसी में लगे यूएसबी मोडेम को खोजेगा | जब इसकी खोज पूरी हो जाएगी तब यह पासवर्ड मांगेगा जहाँ आपको पहले औजार से मिले फ्लेश कोड लिखने है |
B-फ्लेश कोड लिखकर आगे बढे , यह औजार कुछ देर में अपने आप आपके यूएसबी मोडेम का फर्मवेयर अपडेट कर देगा | और अपडेट होते ही अपडेट होने की सूचना मिल जाएगी |
C- फर्मवेयर अपडेट की सूचना मिलने के बाद आईडिया का जो चिन्ह आपके डेशबोर्ड पर बना है उसे रन करे | रन करते ही आपसे अनलोक कोड माँगा जायेगा जो आपने पहले औजार से प्राप्त कर सुरक्षित रखा है वह लिखकर आगे बढ़ें |
आपका यूएसबी मोडेम तैयार है किसी भी मोबाइल सेवा प्रदाता की सिम से नेट चलाने को |


Idea net setter huawei E1732 Unlock करने का तरीका व औजार यहाँ उपलब्ध है |


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मेरी शेखावाटी
ताऊ पहेली
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Dec 7, 2010

एलोवेरा (गवार पाठा) की सब्जी

आजकल एलोवेरा के प्रयोग से बिमारियों को भगाकर स्वस्थ रहने के चर्चे पूरे देश भर में फैले हुए है एक तरफ बाबा रामदेव की दिव्य फार्मेसी के अलावा बड़ी संख्या में देशी कम्पनियाँ एलोवेरा का रस बाज़ार में बेच रही है वहीँ फॉरएवर लिविंग प्रोडक्ट नाम की विदेशी क. ने एलोवेरा के स्वास्थ्य वर्धक पोषक तत्वों से भरपूर विभिन्न उत्पादों के साथ सोंदर्य प्रसाधन के उत्पाद व विभिन्न बिमारियों के उपचार हेतु एक विस्तृत उत्पाद श्रृंखला बाज़ार में उतार रखी है जिनकी जानकारी समय-समय पर रामबाबू सिंह अपने ब्लॉग पर देते रहते है |

हमारे देश में एलोवेरा की उपज आम है यह आसानी से कहीं भी मिल जाता है साथ ही इसे उगाने के लिए ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ती | पर सवाल यह है कि इस तरह आसानी से उपलब्ध एलोवेरा का प्रयोग कैसे किया जाय | तो आईये इसके आसान उपयोग के दो तरीकों पर चर्चा करते है -

1- सुबह उठते ही एलोवेरा का एक पत्ता तोड़े व उसे छीलकर अन्दर का गुदा निकल लें आप इस गुदे को कच्चा खा सकते है या थोड़े पानी के साथ मिलाकर मिक्सचर में इसे पीस कर पी सकते है |
2- इसका दूसरा सबसे बढ़िया उपयोग का तरीका है इसकी सब्जी बनाकर खाना | एलोवेरा की सब्जी बनाने का तरीका निम्न है -
A- सबसे पहले एलोवेरा के पत्ते तोड़कर उन्हें साफ़ पानी से धो लें |
B- उसके बाद इन पत्तों को छीलकर इनका गुदा निकल लें व गुदे के टुकड़े काट लें | ध्यान रहें गुदा के टुकड़े काटने के बाद धोयें नहीं |
C- अब कड़ाही में इतना तेल डालकर गर्म करें जितने तेल में आपका एलोवेरा गुदा के टुकड़े तले जा सकें , तेल गर्म होते ही उसमे थोडा जीरा डालकर भुन लें |
D- उसके बाद एलोवेरा का कटा गुदा गर्म तेल में डाल दें व इसे फ्राई करना शुरू कर दें ,आप चाहें तो प्याज भी इसी के साथ फ्राई कर सकते है |
E-एलोवेरा को फ्राई करते समय ही उसमे आवश्यकतानुसार व एलोवेरा की मात्रानुसार मसाले यथा-मिर्च,धनिया,हल्दी,नमक आदि भी डाल दें व पकाते रहे , ध्यान रहे इस सब्जी में पानी बिल्कुल ना डालें | हाँ मसाले डालने से पहले देख लें कि एलोवेरा की जैली पानी की तरह हो गयी हों | जैली के पानी की तरह होने के समय उसका चिपचिपापन ख़त्म हो जाता है |
F - सब्जी पकने से कुछ पहले लहसुन पीस कर डाल ले और थोडा पकाकर उतार ले | आपकी स्वास्थ्य वर्धक व स्वादिष्ट सब्जी तैयार है |
3- राजस्थान में एलोवेरा का उपयोग लड्डू बनाकर भी किया जाता है | लड्डू बनाने का तरीका कभी बाद में |

एलोवेरा से सम्बंधित पूरी जानकारी रामबाबू सिंह के ब्लॉग एलोवेरा प्रोडक्ट पर उपलब्ध है जो आप यहाँ चटका लगाकर पढ़ सकते है साथ ही एलोवेरा के विभिन्न उत्पाद आप रामबाबू जी खरीद भी सकते है यही नहीं यदि आप खुद ये प्रोडक्ट बेचकर धन कमाना चाहते है तब भी रामबाबू सिंह जी मिलकर आप ये व्यवसाय शुरू कर सकते है |

अपडेट :-
एलोवेरा की सब्जी बनाने का एक और तरीका वाणी शर्मा जी ने भेजा -
गंवारपाठा के काँटों वाले किनारों की हलकी सी परत काट लें ...पूरे गंवारपाठे को छिलके सहित छोटे -छोटे टुकड़ों में काट कर नरम हो जाने तक उबालें ...पानी निकल दें ...
तेल गर्म करके सौंफ , राई ,मेथी ,जीरा , कलौंजी (पंचफोरन ) का छौंक लगा कर गंवारपाठे के टुकड़े डाल दें ...हल्दी , नमक , लाल मिर्च डाल कर हल्का सा भूनने के बाद अमचूर डाल कर उतार लें ...

मेथी के साथ बनाने के लिए मेथी को कुछ घंटों के लिए भिगो दें ...फिर गंवारपाठे के साथ ही उबाल लें ...फिर इसी विधि से छौंक लें ...

Dec 5, 2010

इतिहास की एक चर्चित दासी "भारमली"

ज्ञान दर्पण पर आपने जोधपुर की रूठी रानी के बारे में पढ़ते हुए उसकी दासी भारमली का नाम भी पढ़ा होगा | जैसलमेर की राजकुमारी उमादे जो इतिहास में रूठी रानी के नाम से प्रसिद्ध है अपनी इसी रूपवती दासी भारमली के चलते ही अपने पति जोधपुर के शक्तिशाली शासक राव मालदेव से रूठ गई थी और मालदेव के लाख कोशिश करने के बाद भी वह आजीवन अपने पति से रूठी ही रही |

जोधपुर के राव मालदेव का विवाह जैसलमेर के रावल लूणकरणजी की राजकुमारी उमादे के साथ हुआ था | सुहागरात्रि के समय उमादे को श्रृंगार करते देर हो गई तो उसने अपनी दासी भारमली को कुछ देर के लिए मालदेव जी का जी बहलाने के लिए भेजा | भारमली इतनी सुन्दर थी कि उसके रूप लावण्य को देख नशे में धुत मालदेव जी अपने आप को न बचा सके |

श्रृंगार करने के बाद जब उमादे आई और उसने मालदेव जी भारमली के साथ देखकर यह कहकर वापस चली गयी कि ये पति मेरे लायक नहीं है | और वो जीवन भर रूठी ही रही | राव मालदेव ने जोधपुर आने के बाद अपने एक कवि आशानन्द जी बारहट को रानी को मनाने भेजा पर वे भी रानी मनाने में असमर्थ रहे | इस पर कवि आशानन्द जी बारहट ने जैसलमेर के रावत लूणकरणजी से कहा कि अपनी पुत्री का भला चाहते है तो दासी भारमली को जोधपुर से वापस बुलवा लीजिए |

रावत लूणकरण जी ने एसा ही किया और भारमली को उन्होंने जोधपुर से जैसलमेर बुलवा भेजा पर स्वयम लूणकरण जी भारमली के रूप और लावण्य पर मुग्ध हो गए जिससे लूणकरण जी की दोनों रानियाँ ने परेशान होकर भारमली को जैसलमेर से हटाने की सोची | लूणकरण जी की पहली रानी सोढ़ी जी ने उमरकोट अपने भाइयों से भारमली को ले जाने के लिए कहा लेकिन उमरकोट के सोढों ने लूणकरण जी से इस बात पर शत्रुता लेना उचित नहीं समझा |तब लूणकरण जी की दूसरी रानी जो जोधपुर के मालानी परगने के कोटडे के शासक बाघ जी राठौड़ की बहन थी ने अपने भाई बाघ जी को बुलाया |
बहन का दुःख मिटाने हेतु बाघजी शीघ्र आये और रानियों के कथनानुसार भारमली को ऊंट पर बैठकर जैसलमेर से छिपकर भाग आये | लूणकरण जी कोटडे पर हमला तो कर नहीं सकते थे क्योंकि पहली बात तो ससुराल पर हमला करने में उनकी प्रतिष्ठा घटती और दूसरी बात राव मालदेव जैसा शक्तिशाली शासक मालानी का संरक्षकथा | अत: रावत लूणकरण जी ने जोधपुर के ही कवि आशानन्द जी बारहट को कोटडा भेजा कि बाघजी को समझाकर भारमली को वापस ले आये |

दोनों रानियों ने बाघ जी को पहले ही सन्देश भेजकर सूचित कर दिया कि वे बारहट जी की बातों में न आना | जब बारहट जी कोटडा पहुंचे तो बाघजी ने उनका बड़ा स्वागत सत्कार किया और बारहट जी की इतनी खातिरदारी की कि वे अपने आने का उद्देश्य ही भल गए | एक दिन बाघजी शिकार पर गए ,बारहट जी व भारमली भी साथ थे | भारमली व बाघजी में असीम प्रेम हो गया था अत: वह भी किसी भी हालत में बाघजी को छोड़कर जैसलमेर नहीं जाना चाहती थी | शिकार के बाद भारमली ने सूलें सेंक कर खुद विश्राम स्थल पर बारहट जी दी व शराब आदि भी पिलाई | इससे खुश होकर व बाघजी व भारमली के बीच प्रेम देखकर बारहट जी का भावुक-कवि- हृदय बोल उठा -
जंह गिरवर तंह मोरिया, जंह सरवर तंह हंस |
जंह बाघा तंह भारमली ,जंह दारु तंह मंस |

अर्थात जहाँ पहाड़ होते है वहां मोर होते है ,जहाँ सरवर होता है वहां हंस होते है इसी प्रकार जहाँ बाघ जी है वहीँ भारमली होगी ठीक उसी तरह जिस तरह जहाँ दारू होती है वहां मांस भी होता है |

बारहट की यह बात सुन बाघजी ने झट से कह दिया ,बारहट जी आप बड़े है और बड़े आदमी दी हुई वास्तु को वापिस नहीं लेते अत: अब भारमली को मुझसे न मांगना | आशानन्द जी बारहट पर वज्रपात सा हो गया लेकिन बाघजी ने बात सँभालते हुए कहा - कि आपसे एक प्रार्थना और है आप भी मेरे यहीं रहिये |
और इस तरह से बाघजी ने कवि आशानन्द जी बारहट को मनाकर भारमली को जैसलमेर ले जाने से रोक लिया | आशानन्द जी भी कोटडा रहे और उनकी व बाघजी जी की भी इतनी घनिष्ट दोस्ती हुई कि वे जिन्दगी भर बाघजी को भुला ना पाए | एक दिन अकस्मात बाघजी का निधन हो गया , भारमली बाघजी के शव के साथ चिता में बैठकर सती हो गई और आशानन्द जी अपने मित्र बाघजी की याद में जिन्दगी भर बैचेन रहे और उन्होंने बाघजी की स्मृति में अपने उदगारों के पीछोले बनाये |
बाघजी और कवि आशानंद जी के बीच इतनी घनिष्ट मित्रता हुई कि आशानन्द जी सोते उठते बाघजी का नाम ही लेते थे एक बार उदयपुर के महाराणा ने कवि आशानन्द जी की परीक्षा लेने के लिए कहा कि वे सिर्फ एक रात बाघजी का नाम लिए बिना निकाल दे तो मैं आपको चार लाख रूपये दूंगा | कवि पुत्र ने भरपूर कोशिश की कि कवि पिता अपने मित्र बाघजी का नाम कम से कम एक रात्री तो न ले पर कवि मन कहाँ चुप रहने वाला था |
पूरी कहानी व बारहट जी के बनाये पीछोले अगले किसी लेख में |



हटीलो राजस्थान (ओजस्वी दोहे )

Dec 3, 2010

आभास



आभास ही सही क्षितीज पर धरा और अम्बर का मिलन तो दिखता है .....

पर तुम को क्या हुआ तुम तो मेरे अपने थे ना,

फिर तुमने अपना रुख क्यों मोड़ लिया

हर आहट पर लगता है तुम आये हो ,

पर क्यों रखु मैं अपने ह्रदय द्वार खुले अगर वो तुम ना हुए तो ?

वो हलकी सी चपत लगा दी थी तुमने ,

जब मैंने कहा था एक दिन दूर चली जाउंगी

अब खुद क्यों अपने वादे से फिर गए हो

तकते तकते अब तो पलके भी ना भीगती है

पर हाँ आज भी हर बार जाने से पहले एक बार मुड के देख लेती हूँ


केसर क्यारी ....उषा राठौड़

Dec 1, 2010

कवि की दो पंक्तियाँ और जोधपुर की रूठी रानी

ज्ञान दर्पण पर जनवरी 2009 में जोधपुर की रूठी रानी के बारे में आपने पढ़ा होगा | इस रानी के बारे में मुझे भी संक्षिप्त जानकारी मिली थी जो मैंने उस लेख में आप सभी के साथ साझा की थी | पर रूठी रानी की उस संक्षिप्त जानकारी के बाद मुझे भी उसके बारे में ज्यादा जानने की बड़ी जिज्ञासा थी मन में कई विचार उठे कि इतिहास में रूठी रानी के नाम से प्रसिद्ध जैसलमेर की उस राजकुमारी उमादे जो उस समय अपनी सुन्दरता व चतुरता के लिए प्रसिद्ध थी को उसका पति जो जोधपुर के इतिहास में सबसे शक्तिशाली शासक रहा ने क्या कभी उसे मनाने की कोशिश भी की या नहीं और यदि उसने कोई कोशिश की भी तो वे कारण थे कि वह अपनी उस सुन्दर और चतुर रानी को मनाने में कामयाब क्यों नहीं हुआ |

आज उसी रानी की दासी भारमली उसके प्रेमी बाघ जी के बारे में पढ़ते हुए मेरी इस जिज्ञासा का उत्तर भी मिला कि राव मालदेव अपनी रानी को क्यों नहीं मना पाए | ज्ञात हो इसी दासी भारमली के चलते ही रानी अपने पति राव मालदेव से रूठ गई थी | शादी में रानी द्वारा रूठने के बाद राव मालदेव जोधपुर आ गए और उन्होंने अपने एक चतुर कवि आशानन्द जी चारण को रूठी रानी उमादे को मना कर लाने के लिए जैसलमेर भेजा | स्मरण रहे चारण जाति के लोग बुद्धि से चतुर व अपनी वाणी से वाक् पटुता व उत्कृष्ट कवि के तौर पर जाने जाते है राजस्थान का डिंगल पिंगल काव्य साहित्य रचने में चारण कवियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है | राव मालदेव के दरबार के कवि आशानन्द चारण बड़े भावुक व निर्भीक प्रकृति व वाक् पटु व्यक्ति थे |

जैसलमेर जाकर उन्होंने किसी तरह अपनी वाक् पटुता के जरिए उस रूठी रानी उमादे को राजा मालदेव के पास जोधपुर चलने हेतु मना भी लिया और उन्हें ले कर जोधपुर के लिए रवाना हो गए | रास्ते में एक जगह रानी ने मालदेव व दासी भारमली के बारे में कवि आशानन्द जी से एक बात पूछी | मस्त कवि कहते है समय व परिणाम की चिंता नहीं करता और उस निर्भीक व मस्त कवि ने भी बिना परिणाम की चिंता किये रानी को दो पंक्तियों का एक दोहे बोलकर उत्तर दिया -
माण रखै तो पीव तज, पीव रखै तज माण |
दो दो गयंद न बंधही , हेको खम्भु ठाण ||

अर्थात मान रखना है तो पति को त्याग दे और पति रखना है तो मान को त्याग दे लेकिन दो-दो हाथियों का एक ही स्थान पर बाँधा जाना असंभव है |

अल्हड मस्त कवि के इस दोहे की दो पंक्तियों ने रानी उमादे की प्रसुप्त रोषाग्नि को वापस प्रज्वल्लित करने के लिए धृत का काम किया और कहा मुझे ऐसे पति की आवश्यकता नहीं | और रानी ने रथ को वापस जैसलमेर ले जाने का आदेश दे दिया |
बारहट जी (कवि आशानन्द जी) ने अपने मन में अपने कहे गए शब्दों पर विचार किया और बहुत पछताए भी लेकिन वे शब्द वापस कैसे लिए जा सकते थे |
रूठी रानी के बारे में पिछली पोस्ट पर संजय व्यास ने दासी भारमली व बाड़मेर के कोटड़ा के स्वामी बाघाजी राठौड़ के बीच प्रेम कहानी की विस्तृत जानकारी देने हेतु अपनी टिप्पणी में अनुरोध किया था सो अगली पोस्ट में उस इतिहास प्रसिद्ध खुबसूरत व चर्चित दासी भारमली व बाघजी राठौड़ की प्रेम कहानी पर चर्चा की जाएगी |



ये भी पढ़ें -

हठीलो राजस्थान-54 |
ताऊ पत्रिका
मेरी शेखावाटी

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