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राम प्यारी रो रसालो

पिछले भाग से आगे.............
सोमचंद गाँधी होशियार था उसने सभी कार्यों पर काबू पा लिया| सोमचंद गाँधी और मोहकमसिंहजी शक्तावत ने विचार किया|
कि-" मेवाड़ के बहुत सारे परगनों को मराठों ने दबा रखा है जो अपनी इज्जत और धन दोनों के लिए घातक है| इन परगनों को वापस लेना चाहिये|"
बाईजीराज और राणा जी को भी यह बात पसंद आई| उन्होंने मराठों को राजस्थान से बाहर निकालने की तरकीब सोची| दुसरे रजवाड़ों से भी इस सम्बन्ध में विचार विमर्श किया| कोटा और जोधपुर के राजा इस हेतु सहमत हो गए| कोटा से फ़ौज लाने हेतु जालिमसिंहजी तैयार थे ही, जोधपुर के प्रधान ज्ञानमाल ने भी यह कार्य जल्द करने के लिए पत्र व्यवहार किया|

सब कार्य पुरे थे पर सोमचंद गाँधी एक विचार पर आकर अटक गया| चुण्डावत नाराज होकर अपने अपने ठिकानों में बैठे थे जब तक चुण्डावत साथ में नहीं मिले तब तक एक कदम भी आगे बढ़ना संभव नहीं,इस हेतु सोमचंद गाँधी ने चुण्डावतों को मनाने का भरसक प्रयास किया पर वे नहीं माने|
रामप्यारी बोली - "ये कार्य मुझे सौंपो| मैं जाती हूँ चुण्डावतों को मनाने| मेरा मन कहता है मैं उन्हें मनाकर उदयपुर के झंडे तले ले आवुंगी|"

रामप्यारी अपना रसाला ले चुण्डावतों के पाटवी ठिकाने सलुम्बर पहुंची और वहां उसने अपनी अक्ल का पूरा परिचय दिया| वह सलुम्बर के रावत भीमसिंहजी से मिली| चुण्डावतों की पीढ़ियों द्वारा मेवाड़ की की गयी सेवा की उन्हें याद दिलाई| चुण्डावतों की वीरता और मेवाड़ के लिए दिए उनके बलिदानों के पुरे इतिहास के पन्ने पलटे| वर्तमान में मेवाड़ की हो रही दुर्दशा का खाका खिंच कर उन्हें बताया| मराठों को राजस्थान से बाहर निकालने के बाद राजस्थान में होने वाली शांति व खुशहाली का पूरा चित्र उतार कर उनके सामने रखा| रामप्यारी ने रावत भीमसिंहजी को समझाया -
" इस वक्त आप मेवाड़ की जो सेवा करेंगे वह मेवाड़ की तवारीख में अमर रहेगी| आपके पूर्वज चुंडाजी ने ही इस राज्य (मेवाड़) को अपने हाथों सौंपा था| आप चुण्डावतों की पूरी पीढ़ियों ने अपने खून से इस मेवाड़ रूपी क्यारी को सींचा है| उस क्यारी को आज बाहर वाले रोंद रहे है तो चुंडाजी की औलाद उसे उजड़ते हुए अपनी आँखों से कैसे देख सकती है?"

रामप्यारी ने आपस की सभी गलतफहमियां दूर की| बाईजीराज की और से वादे किये और किसी तरह रामप्यारी रावत भीमसिंहजी को मनाकर उदयपुर ले आई| उनके आते ही बाकि आमेट,हमीरगढ़,भदेसर,कुराबड़ आदि के चुण्डावत सरदार भी पीछे पीछे अपने आप अपनी अपनी सैनिक टुकडियां लेकर आ गए| चुण्डावतों ने आकर किसन विलास में डेरा लगाया| उधर मोहकमसिंहजी कोटा जाकर वहां से पांच सैनिको की फ़ौज ले आये जिसने चंपा बाग़ में डेरा डाला|
कुछ नालायक लोग ऐसे भी थे जो सबका मेल देखना नहीं चाहते थे उन्होंने वापस फूट डालने हेतु चुण्डावतों को जाकर बहका दिया|
"अरे ! आप किसकी बातों में आ गए ? ये तो आपको फ़साने का चक्कर चल रहा है| शक्तावत कोटा से फ़ौज क्यों लाये है जानते हो ? धोखे से आपको मारेंगे|" साथ ही उन नालायकों ने अपनी बात सच साबित करने के लिए कितने ही सबूत व उदहारण दिए| बस फिर क्या था चुण्डावत आपे से बाहर हो गए और वापस जाने के लिए नंगारे पर चोट लगा दी| जांगड़ भी जोश में दोहे गाने लगे-

धन जा रे चूंडा धणी, भूपत भूजां मेवाड़,
करतां आटो जो करै, बड़कां हंदी वाड़ |

चुण्डावत तो उदयपुर से चल पड़े| सोमचंद को खबर लगी तो वह रामप्यारी को ले बाईजीराज की ड्योढ़ी पर गया| और अरज कराई -
"सारे किये पर पानी फिर गया है| चुण्डावतों को मनाने को अब आप खुद पधारो| माँ यदि अपने बेटों को मनाने जाए तो उसमे कोई बुरी बात नहीं |
बाईजीराज झालीजी ने उसी वक्त पीछे पीछे जाकर चुण्डावतों को रुकवाया|
रामप्यारी ने जाकर चुण्डावतों से कहा-" आपकी माँ आपके पीछे पीछे आई है| कभी माँ नाराज होवे तो बेटा माफ़ी मांग लेता है और बेटा नाराज होता है तो माँ माफ़ी मांग कर बेटे को मना लेती है| आप लोगों की माँ आई है आप उनके पास चलें| माँ बेटा मिलकर आपस में विश्वास की बाते करले| इसमें माँ की भी शोभा है और बेटों की भी|
ये सुन चुण्डावत सरदार बाईजीराज के पास आ गए| रामप्यारी बीच में थी ही बोली-" आप दूसरों की बातों में क्यों आते हो? यह गंगाजली ले एक दुसरे के मन का वहम दूर करलो|"

बाईजीराज ने गंगाजली हाथ में ले एकलिंगनाथ जी की कसम खायी कि -"आपके साथ कोई धोखा नहीं होगा|"
चुण्डावतों ने भी गंगाजली हाथ में उठा अपना धर्म निभाने की कसम खायी|
घर की फूट ख़त्म होते ही मेवाड़ी सेना ने जावर और निंबाड़े के इलाकों से मराठों को खदेड़ कर बाहर कर दिया|
ये समाचार पहुचंते ही मराठों ने भी लड़ने की तैयारी की| अहिल्याबाई ने अपनी फौजे भेजीं जो सिंधिया की सेना में आकर शामिल हुई| मंदसोर से सिवा नाना भी आकर उनके साथ मिला|
मराठों और मेवाड़ी फ़ौज के बीच जबरदस्त बरछों और तलवारों की जंग हुई| मेवाड़ ले काफी योद्धाओं ने वीरगति प्राप्त की| देलवाड़ा के राणा कल्याणसिंहजी बड़ी वीरता से लड़े| उनका पूरा शरीर घावों से भर गया| उनकी वीरता में कवियों ने बहुत दोहे लिखे जिनमे प्रसिद्ध एक दोहा है-
कल्ला हमल्ला थां किया,पोह उगंते सूर,
चढ़त हडक्या खाळ पै,नरां चढायो नूर|

प्रतिभा और गुण किसी के बाप के नहीं होते| किसी जात पर उनका कोई ठेका नहीं होता| रामप्यारी एक मामूली दासी थी पर मेवाड़ के बिगड़े हालातों में उसने अपनी समझदारी,होशियारी से बड़े बिगड़े काम बनाये| राज से रूठे कई लोगों को मनाकर रोका | मेवाड़ के इतिहास में रामप्यारी व रामप्यारी के रसाला का नाम हमेशा अमर रहेगा|



पद्म श्री डा.रानी लक्ष्मीकुमारी चुण्डावत द्वारा राजस्थानी भाषा में लिखी कहानी का हिंदी अनुवाद|

3 comments:

  1. बहुत सुंदर ऐतिहासिक जानकारी दी आपने, आभार.
    रामराम
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

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  2. राजपूताने का इतिहास ही वीरता का है.

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