मैं बोल रही हूँ .........सुन पा रही हो ना मुझे ...
आह सुन लिया तुमने मुझे ........
ओह माँ कितना खुबसूरत है तुम्हारा स्पर्श
बिल्कुल तुम जैसा माँ .........
मेरी तो अभी आँखे भी नहीं खुली ... पर ..
तुम्हारी खूबसूरती का अंदाज़ा लगा लिया मैंने
तुम्हारी दिल की धडकनों से ....
हाँ माँ तुम्हारा दिल
यही तो रहता है .. मेरे पास
उपरी मंजिल पर ....
धक् धक् धक् धक् ........ना जाने दिन भर कौनसी सीढिया चढ़ता रहता है
नाता है मेरा तुम्हारे दिल की इन धडकनों से ...
क्योंकि उसका ही एक टुकड़ा मेरे अन्दर धड़क रहा है
समझ सकती हूँ तुम्हारी बैचनी माँ
आखिर तुम्हारे दिल का टुकड़ा हूँ मैं
..................अच्छा अब सुनो जो मैं कहने जा रही हूँ तुमसे
तुम सुन के रोना मत माँ
अभी मेरी नन्हीं हथेलियाँ बनी नहीं है
कि मैं तुम्हारे आंसू पोछ पाऊं
तुम्हे नींद नहीं आ रही है ना माँ ?
हाँ मैंने भी सुनी थी वो आवाज
जो घर की बैठक से आ रही थी
कि कल तुन्हें ले जाया जा रहा है
कुछ मशीनी हाथो के पास
तुम घबरा रही हो ना कि अगर मैं कन्या निकली तो ?
तुम तो सिर्फ उधेड़बुन में हो माँ ..... पर मुझे तो पता है मैं हूँ
कल मैं कितना भी छुप लूँ तुम्हारी कोख के कोने मे
वो मशीनी हाथ पहुँच ही जायेंगे मुझ तक
और जैसे ही उन्हें पता चला की मैं हूँ
फिर कुछ नहीं बचेगा तुम्हारे पास
सिवाय रोने के और मुझे खोने के
पर तुम रोना नहीं माँ ..............
तुम्हें तो पता है ना मे तुम्हारे आंसू नहीं पोछ पाऊँगी ......
तुम मत रोना ,..........मै लडूंगी इनसे .........
तुम भी तो लड़ती हो ना सुबह से शाम तक जीने के लिए
मै भी लडूंगी ... काटने दो इनको टुकडो में मुझे
ये जिस नाली में मुझे फेकेंगे ना
वहां पर कुछ तो टुकड़े बच जायेंगे मेरे
कुत्तो के खाने के बाद भी
देखना वो एक नन्हा टुकड़ा ही बनेगा
इस मशीनी दुनिया में क्रांति की आवाज
तुम देखना माँ कितनी बड़ी होगी वो क्रांति
तुम घबराना नहीं ..... तुम डरना नहीं ....
मेरा बलिदान है ये उस क्रांति के लिए
जो चली आ रही है आंधी बन के ...
तुम देखना व्यर्थ नहीं जायेगा मेरा टुकडो में कटना..
मै आउंगी माँ मै लौट के आउंगी ....तुम्हारे आँगन में मुस्काने को
बस तुम रोना नहीं माँ
तुम तो जानती हो ना ,अभी मेरी हथेलियाँ नहीं बनी है
कि मै तुम्हारे आंसू पोछ पाऊं







उफ़.....
ReplyDeletebehad maarmik..
ReplyDeleteबहुत सुंदर प्रस्तुति,अच्छी मार्मिक बेहतरीन रचना .....
ReplyDeleteMY RESENT POST...काव्यान्जलि ...: तब मधुशाला हम जाते है,...
बहुत ही भावुक व् मार्मिक लिखा है आपने, वास्तव में यथार्थ के करीब ,भावपूर्ण, हृदय को उद्देलित एवं आँखें नम कर देने वाली रचना निःसंदेह ही सराहनीय है।
ReplyDeleteबहुत मार्मिक रचना ... ऐसा लग रहा है कि बेटी की पुकार एक गूंज बन गयी हो ...
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteबस एक आह! निकल गई ...
ReplyDeleteरूला दिया आपने ..
ReplyDeleteबहुत सुंदर प्रसतुति !!
हृदयद्रावक! इंसानियत का नाम भी नहीं बचा!
ReplyDeleteरोना तो हमें आने वाला है, गर दोबारा पढ लें तो
ReplyDeleteचित्र और चित्रण बहुत तकलीफदेह है
तुम तो जानती हो ना ,अभी मेरी हथेलिया नहीं बनी है
ReplyDeleteकी मै तुम्हारे आंसू पोछ पाऊं
बहुत ही मार्मिक भाव लिए उत्कृष्ट अभिव्यक्ति ...
चित्र और चित्रण जितना कारूणिक है, उतनी ही कारूणिक है, वर्तनी की अशुध्दियॉं। यदि उचित समझें तो कृपया इस दिशा में भी ध्यान देने का प्रयास करें।
ReplyDeleteसच रुला दिया आपने तो आज अति संवेदनशील रचना...काश आपका लिखा वाकई सावह हो जाये और यह क्रांति आँधी की तरह जल्द से जल्द आए...
ReplyDeleteReally Very Much Heart Touching Poem.
ReplyDeleteउषा,
ReplyDeleteआप बहुत अच्छी कवयित्री हैं....आपकी कविता मुझे बहुत पसंद आई, क्राफ्ट में मुझे थोड़ा परिवर्तन चाहिए और फिर थोड़े बहुत बदलाव के साथ मैं इसे 'कथा' अगले अंक में प्रकाशित करूँगा.....आपको मेरी ढेर सारी बधाई एक अच्छी कविता के लिए..... --अनुज
This comment has been removed by the author.
ReplyDeleteओह माँ कितना खुबसूरत है तुम्हारा स्पर्श
ReplyDeleteबिलकुल तुम जैसा माँ .........
हकीकत के करीब और मन को उद्वेलित करती शानदार रचना|
ReplyDeleteबहुत सुन्दर प्रस्तुति...
ReplyDeleteआपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 19-03-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ
बहुत ही भावुक व् मार्मिक रचना.
ReplyDeleteज्वलंत विषय पर लिखी सार्थक रचना बहुत सुन्दर |
ReplyDeleteमार्मिक ...
ReplyDeleteबहुत ही मार्मिक भाव,रूला दिया आपने........
ReplyDeleteबिलकुल तुम जैसा माँ .........
ReplyDeleteOnly dowry and greed is the responsible for such crime.
ReplyDelete...मार्मिक और सशक्त रचना....माँ...मातृभूमि...और मातृभाषा का कोई विकल्प नहीं है....
ReplyDelete