Jan 6, 2012

विधा एवं अविधा

"कुँवरानी निशा कँवर"
विधा एवं अविधा में भेद बहुत ही हल्का होता है ,बल्कि वास्तव में तो लोग अविधा की गठरी को ही, विधा समझ कर उसे उपने सिर पर लादे फिरते है |भारतीय मनीषियों ,ऋषि ,मुनियों ने हमेशा ही विधा के धोखे में अविधा से सचेत रहने के लिए लगभग सभी शास्त्रों में अवगत कराया है| किन्तु मनुष्य ने अपने मन को स्वतन्त्र न रख कर, माया के हाथो गिरवी रखा हुआ है |परिणाम सामने है कि वह विधा के भ्रम में अविधा की गठरी को ढो रहा है |उसके बोझ तले दबा जा रहा है, किन्तु विधा समझकर अपने मन को तुष्टि प्रदान करता रहता है |श्री गुलाब कोठारी जी ने अपनी पुस्तक "मानस" में लिखा है कि "मनुष्य ही एक मात्र ऐसा प्राणी है जो, ज्ञानी कहलाने पर भी अज्ञानी है |दुनिया के सारे शास्त्र केवल मनुष्य के लिए ही बने है और इसके बाद भी ज्ञान की धारा का प्रवाह अवरुद्ध दिखाई पड़ता है |"इसका अर्थ हुआ कि जिसे हम विधा समझ रहे है वास्तव में वह तो केवल मात्र सूचना एकत्र करने का जरिया मात्र है |इससे विधा का सीधा कोई सम्बन्ध साबित नहीं होता है |

सभी शास्त्रों में एक बात ऊभर कर सामने आती है कि "शारीर स्थूल है और पाँच तत्वों से मिलकर बना हुआ है |इन्द्रियाँ शारीर से शूक्ष्म है और शक्तिवान है ,मन इन्द्रियों से शूक्ष्म एवं बलवान है |प्राण (परा-शक्ति,चेतना) मन से शूक्ष्म और बलवान है |प्राण से शूक्ष्म एवं बलवान स्वयं आत्मा(परब्रह्म, परमेश्वर का प्रतिनिधि) है |शारीर की चेतना शक्ति प्राण है और यही इस शारीर का संचालक भी है |श्री कृष्ण गीता में स्पष्ट करते है कि" शारीर रथ है ,इन्द्रियाँ अश्व ,मन सारथि और प्राण रथी है ,कर्ता है ,मालिक है |आत्मा लक्ष्य है प्राण का |प्राण का स्वभाव है अध्यात्म यानि आत्मा की अधीनता ,आत्मा के साथ मेल |जिसने अपना प्राण आत्मा की और उन्मुख कर लिया है वही "युक्त "अर्थात जुड़ा हुआ है |आत्म संयुक्त प्राणवान व्यक्ति को ही "योगी" कहा जाता है |और श्री कृष्ण अर्जुन को बार बार "तू योगी बन अर्जुन योगी !"कहते है |इसका अर्थ हुआ कि यदि किसी जीव को अपने लक्ष्य "आत्म-मिलन"तक पहुंचना है, तो उसे आत्मोन्मुख होना पड़ेगा |किन्तु शारीर रूपी रथ के अश्व (इन्द्रियाँ) सारथि (मन) को अपनी और उन्मुख कर लेते है तथा सारथि(मन) जिसे अपने रथी(प्राण) के अनुसार रथ को हाँकना चाहिए, वह उल्टा अश्वों एवं स्वयं अपनी मर्जी से रथ को लक्ष्य ("अध्यात्म") की और लेजाने के बजाय, प्रकृति(माया) की ओर मोड़ देता है |

अब यह रथी( प्राण) की क्षमता ,सामर्थ्य पर निर्भर है कि, वह अपने सारथि(मन) को कितना नियंत्रित कर पाता है |प्राण जिसकी शक्ति कम होने पर, प्राण मन पर नियंत्रण खो देता है|यानि प्राण को मन एवं इन्द्रियों के अधीन कर दे यानि प्रकृति(माया) में लगा दे ऐसी सभी कर्म,उपकर्म,जानकारीयाँ,सूचनाये केवल "अविधा" है |और प्राण को मन एवं इन्द्रियों पर नियंत्रण की शक्ति देकर क्षमता वान बना कर मंजिल(अध्यात्म) की ओर उन्मुख कर सकें केवल वही "विधा" है |
अब यह विचारनीय प्रश्न है कि, प्राण को शक्ति ,सामर्थ्य और क्षमता किस उपकर्म से मिल सकती है |मन किस उपकर्म से इतना बलवान बन सकता है कि वह आसानी से अपने मन रूपी सारथि पर अपना शासन कायम रख सके |और वह केवल मात्र एक ही खुराक , एक ही दवा,एक ही उपाय ,एक ही कर्म या उपकर्म है और वह है "नाम-जप" प्रभु का स्मरण |केवल मात्र "नाम-जप" ही प्राण को इतना शक्तिवान बना सकता है कि वह प्राण(चेतना) को मन सहित इन्द्रियों के पाश जिसे माया कहा जाता है से आसानी से मुक्ति पाकर अपनी मंजिल(आत्म-मिलन) की ओर अपने शारीर रूपी रथ पर चढ़कर पहुँच सकता है |

अतः अब स्वयं आकलन कर ले की हम किसे विधा रूपी अमृत का घडा समझ कर सिर पर लादे फिर रहे है, दरअसल वह अविधा रूपी "ज्ञान की आभास युक्त सूचनाओं " की गठरी के बोझ के अतिरिक्त कुछ नहीं है और इसका व्यवहारिक पक्ष भी अति गौण है |

"कुँवरानी निशा कँवर"

8 comments:

  1. क्या रखना है, क्या तजना है, जानना बहुत आवश्यक है।

    ReplyDelete
  2. बहुत बढ़िया प्रस्तुति,जानकारी बढाता सुंदर पोस्ट ......
    welcome to new post--जिन्दगीं--

    ReplyDelete
  3. आत्‍म चिन्‍तन, आत्‍म मनन, आत्‍म विश्‍लेषण, आत्‍म परीक्षण। स्‍वयम् से सम्‍वाद ही श्रेष्‍ठ है।

    ReplyDelete
  4. जान लेने और मान लेने मे मूल भूत भिन्नता है... ज्ञान हो जाने पर क्या तजना है क्या स्वीकारना है इसके लिए विचार नहीं करना होता... जो हितकारी है वह स्वतः घटता है, जो त्याज्य है उसके लिए बलात प्रयास नहीं करना होता।
    सुंदर प्रस्तुति !

    ReplyDelete
  5. रतन जी मेरे ब्लांग में आने के लिए आभार..आप के यहाँ पहली बार आई अच्छा लगा.. सुंदर प्रस्तुति के लिए बधाई.....धन्यवाद..

    ReplyDelete

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Share

Twitter Delicious Facebook Digg Stumbleupon Favorites More