सामंतवाद : आलोचना का असर कहाँ ?

देश की आजादी समय देशी रियासतों का भारत में विलय के बाद देश भर से सामंती राज्य का खात्मा हो गया और राजा, महाराजाओं, नबाबों, जागीरदारों सहित सभी सामंत ख़ास से आम आदमी हो गये, देश के संविधान ने उन्हें भी आम आदमी के बराबर अधिकार दिए और इसी अधिकार का उपयोग करते हुए कई राजा-महाराजा, सामंत चुनाव मैदान में उतरे और अपने शासन में जनता के साथ रखे अच्छे व्यवहार के चलते भारी मतों से जीत कर संसद व विधानसभाओं में भी पहुंचे और आज भी पहुँच रहे है|

उनकी जनता में लोकप्रियता को देख तत्कालीन राजनैतिक पार्टियों ने सामंतवाद पर तीखा हमला बोला, सामंती शासन में जनता के शोषण की कुछ सच्ची पर ज्यादातर झूंठी कहानियां बना उनके खिलाफ दुष्प्रचार कर उन्हें चुनावों में हराने की कोशिशे की गयी और इसमें राजनेता काफी सफल भी रहे| हाँ जो पूर्व सामंत जिस किसी राजनैतिक दल में घुस गया वो उस दल को कभी सामंती नहीं लगा| जो पूर्व सामंत अपने क्षेत्र में चुनाव जीत सकता था उसे हर राजनैतिक दल चाव से अपने दल में शामिल करने के लिये तैयार रहते थे और अब भी रहते है| मतलब चुनाव जीतने वाले पूर्व सामंत परिवार से किसी दल को कोई परहेज नहीं पर हाँ सामंतवाद को कोसना उनकी फैशन है जो मौका मिलते ही हर राजनेता गला फाड़ गरियाता रहता है|

मीडिया में भी कई एंकर टीवी स्टूडियो में बैठ सामंतवाद को गरियाकर अपना गला अक्सर साफ़ करते देखे जा सकते है, दो चार किताबें पढ़ अपने आपको बुद्धिजीवी समझने वाले लोग भी सोशियल साइट्स पर सामंतवाद को गरियाकर अपनी बुद्धिमता सिद्ध करने हेतु अक्सर तड़फते देखे जा सकते है|

पर जब इन्हीं मीडिया, राजनेताओं व बुद्धिजीवियों को जब कभी उन्हीं किसी पूर्व सामंत परिवार के सदस्यों से मिलने का मौका मिलता है तो ये बड़े शौक से उनके साथ फोटो खिंचवाकर अपने आपको धन्य समझते है और अपने ड्राइंगरूम में उस फोटो को सजा, घर आने वाले मेहमानों पर रुतबा जमाते है कि देखा- उनके फलां पूर्व नरेश से संबंध है| हर राजनैतिक दल भी पूर्व सामंत परिवार को अपने दल में शामिल करने के लिए लालायित रहता है तो वहीँ मीडिया वाले भी उनके पारिवारिक कार्यक्रमों तक को कवर करने के लिए आगे पीछे घूमते रहते है|

मतलब कुल मिलाकर किसी को किसी पूर्व सामंत परिवार से कोई गिला-शिकवा नहीं और न ही सामंतवाद को कोसने या गरियाने पर किसी पूर्व सामंत को किसी तरह की शिकायत रहती है|

किसी के द्वारा सामंतवाद को गरियाने पर कोई भी पूर्व सामंत उसकी खिलाफत नहीं करता पर आम राजपूत आलोचना करने वाले के सामने सामंतवाद का पक्ष लेकर तुरंत खड़ा हो जाता है और अपने ऊपर सामंतवादी का ठप्पा लगवा लेता है, मेरे साथ भी अक्सर होता है जब सामंतवाद के खिलाफ दुष्प्रचार का मैं जबाब देता हूँ तो लोग मुझे तुरंत सामंतवादी घोषित कर देते है, पर कभी किसी ने सोचा है कि मेरे जैसा साधारण किसान राजपूत परिवार में जन्मा व्यक्ति व आम राजपूत सामंतवाद के नाम पर किये जाने वाले दुष्प्रचार के खिलाफ क्यों उठ खड़े होते है ?

१७ जून २०१३ को जोधा-अकबर सीरियल विवाद पर बहस करते हुए जब मैंने फिल्मों में पूर्व सामंतों द्वारा शोषण की मनगढ़ंत कहानियां दिखाने, राजनीतिज्ञों, मीडिया आदि द्वारा सामंतवाद के नाम पर गरियाने व दुष्प्रचार करने के साइड इफेक्ट का आम राजपूत पर पड़ने वाले असर पर प्रकाश डाला तो सुनकर जी टीवी टीम सहित अभिनेता जीतेन्द्र भी अचम्भित हो गए, हकीकत सुनकर उन्हें भी एक झटका सा लगा और उन्होंने भी माना कि यदि ऐसा है तो यह दुष्प्रचार रुकना चाहिये|

दरअसल जब भी सामंती शोषण की बात चलती है तो आम जनता के बीच या जिस वर्ग को शोषित बताया जाता है उसके सामने सामंत परिवार ना होकर आम राजपूत होता है चूँकि पूर्व सामंतों से आम राजपूत का एक ही व्यक्ति के वंशज होने के नाते खून का रिश्ता है अत: वह आम वर्ग जिसे पढाया जाता कि आपका सामंतों ने शोषण किया तो वह आम राजपूत को ही सामंत मानकर अपना शोषणकर्ता समझ बैठता है और उसका विरोधी बन जाता है, इस विरोध का सीधा असर आम राजपूत पर तब होता है जब उसे किसी सरकारी दफ्तर में कोई काम होता है तो वहां आरक्षण प्राप्त बैठा अधिकारी, कर्मचारी इसी पूर्वाग्रह के चलते उस आम राजपूत की फाइल को दबा देता है, उसका काम नहीं करता, उसे बदले की भावना से परेशान करता है, उस कार्य का वह बदला लेने की कोशिश करता है जिसका वह जिम्मेदार ही नहीं|

राजस्थान के एक क्षेत्र विशेष में तो आम राजपूत के खिलाफ यह बदले की कार्यवाही कुछ ज्यादा ही चलती है पिछले कुछ वर्षों में ऐसी घटनाएँ भी सामने आई कि किसी राजपूत युवक को गाड़ी से रौंदकर मार डालना थाने में एक्सीडेंट दर्ज होता है तो किसी राजपूत युवक की गाड़ी के असली एक्सीडेंट में किसी मौत पर हत्या का मुकदमा दर्ज होता है|

ऐसे कई मामले सामने आये कि किसी पीड़ित राजपूत की थाने में बैठा विरोधी जातिवादी थानेदार रिपोर्ट तक दर्ज, तब तक नहीं करता जब तक राजपूत समाज के सामाजिक संगठन थाने का घेराव आदि नहीं करते|

और यही सबसे बड़ा कारण है कि जब भी कोई नेता, मीडिया एंकर या कथित बुद्धिजीवी सामंतवाद को कोसता है, गरियाता है तो एक आम राजपूत जो खुद कभी सामंती काल में आर्थिक, भावनात्मक रूप से शोषित होता था उसी सामंतवाद के पक्ष में सीना तानकर खड़ा हो जाता है क्योंकि उसे पता है इस दुष्प्रचार का सीधा असर उसी पर पड़ने वाला है|

सामंतों के साथ खून का रिश्ता होने के बावजूद लगान आदि आम राजपूत को भी आम नागरिकों की तरह ही देना होता था साथ ही जब राज्य पर संकट आता तब सामंत आम राजपूत को अपने खून के रिश्ते का वास्ता देकर युद्ध के लिए बुला लेते थे जिसका न तो उन्हें कोई वेतन मिलता था न कोई और लाभ, हाँ ! कभी कोई शहीद हो जाता तो सिर कटाई के बदले उसके वंशज को कुछ जमीन जरुर हासिल हो जाती थी, वह भी आजादी के बाद सरकार ने कानून पास करके उनसे छीनकर भूमिहीनों को बाँट दी| मतलब साफ है सामंतीकाल में आम राजपूत का आर्थिक शोषण के साथ जातिय भावनात्मक शोषण भी होता था जबकि अन्य लोगों का यदि कहीं शोषण हुआ भी है तो वो सिर्फ आर्थिक वो भी सिर्फ लगान के नाम पर, जिस लगान पर हर शासक का हक़ होता है, आज भी सरकारें विभिन्न नामों से जनता से कर वसूलती है तो उसे शोषण का नाम तो नहीं दिया जा सकता|
आजादी के बाद अन्य जातियां तो सामंतवाद से निजात पा गयी पर राजपूत जाति सामंतवाद के खिलाफ प्रचार का दुष्परिणाम आज भी भुगत रही है|

7 Responses to "सामंतवाद : आलोचना का असर कहाँ ?"

  1. राजपूत की बहुसंख्या सामन्त नहीं थी। लेकिन वे सामंतों की ताकत थे। दूसरे आम राजपूत अब तक भी भूतपूर्व सामंतों के साथ जुड़े रहे हैं और सामन्तवाद को डिफेंड करते हैं। आज भी भूतपूर्व सामंत राजपूतों में जातिवाद का उपयोग कर राजपूतों का ही शोषण कर रहे हैं और शोषण के शिकार राजपूत उन के साथ खड़े होने में गर्व महसूस करते हैं। राजपूत भले ही आर्थिक स्थिति में आम हो गए हों। पर गाँव की पूरी आबादी के साथ सामन्ती व्यवहार करते हैं। पर यह भी है कि बहुत से राजपूत इस स्थिति से बाहर निकल कर आए हैं। जो आ गए हैं उन्हें कोई सामन्त नहीं समझता। यदि आम राजपूत अपनी आज की स्थिति को स्वीकार करे। सामन्तवाद की बुराई को राजपूत अपनी बुराई क्यों समझता है? वह सामंतवाद से अपना नाता तोड़ ले तो वह भी अपमानित नहीं होगा। सामन्तवाद को आज किसी तरह भी डिफेंड नहीं किया जा सकता। लेकिन आप भी उसे डिफेंड करते हुए ही दिखाई देते हैं। हम तो आप के संपर्क में हैं तो आप को व्यक्तिशः जानते हैं लेकिन जो संपर्क में नहीं हैं वे तो आप के बारे में आप के लेखन से ही समझ बनाएंगे। राजपूतों में बहुत लोग हैं जो सामन्ती जमाने में सामन्तवाद के विरुद्ध लड़े हैं। उन्हें तो कोई सामन्ती नहीं कहता। कुछ लोगों को तो मैं खुद व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ जिन से हमारे पारिवारिक संबंध हैं।

    Reply
    • Ratan Singh Shekhawat   June 21, 2013 at 2:15 pm

      आम राजपूत सामंतवाद का पक्ष क्यों लेता है ? उसका कारण ही इस लेख में बताने की कोशिश की है !

      राजपूत भले ही आर्थिक स्थिति में आम हो गए हों। पर गाँव की पूरी आबादी के साथ सामन्ती व्यवहार करते हैं।
      @ यह भी एक तरह का दुष्प्रचार ही है हालाँकि आपकी बात कुछ हद तक सही हो सकती है हो सकता है कुछ क्षेत्रों में हो, पर हमनें तो आजतक यह नहीं देखा !!

      Reply
    • Ratan Singh Shekhawat   June 21, 2013 at 2:18 pm

      लेकिन आप भी उसे डिफेंड करते हुए ही दिखाई देते हैं
      @ मेरा विरोध सिर्फ सामंतवाद के नाम पर दुष्प्रचार के खिलाफ होता है और वो भी इसलिए क्योंकि इसका प्रत्यक्ष खामियाजा हमें ही भुगतना पड़ता है!!

      Reply
  2. ब्लॉग बुलेटिन   June 21, 2013 at 5:11 pm

    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन इस दुर्दशा के जिम्मेदार हम खुद है – ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है … सादर आभार !

    Reply
  3. Rajput   June 22, 2013 at 1:35 am

    वक्त के साथ लोगों के दिमाग मे राजपूतों की इमेज "तानाशाह" वाली बन गई और इसको और पुट दिया आज के दुष्प्रचार मे माहिर मीडिया और फिल्मों ने

    Reply
  4. प्रवीण पाण्डेय   June 22, 2013 at 3:41 am

    इतिहास का सबने शोषण किया, उसे तोड़ा मरोड़ा, अपने हित।

    Reply
  5. ताऊ रामपुरिया   June 22, 2013 at 10:29 am

    सबने अपनी अपनी सुविधानुसार जमावट जमाली जबकि आम आदमी चाहे वो राजपूत हो या दूसरा, वह छला ही गया है.

    रामराम.

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published.