क्या होता यदि पृथ्वीराज चौहान गौरी का वध कर देता ?

क्या होता यदि  पृथ्वीराज चौहान गौरी का वध कर देता ?

लेखक : सचिन सिंह गौड़, संपादक, “सिंह गर्जना”
पृथ्वीराज चौहान को समर्पित इस विशेष श्रंखला के प्रथम भाग को हमनें इस प्रश्न के साथ समाप्त किया था कि- क्या होता यदि तराइन के दूसरे युद्ध में (1192) पृथ्वीराज की हार नहीं होती, बल्कि जीत होती और मोहम्मद गौरी को मार दिया जाता? यधपि ये एक काल्पनिक प्रश्न है तथापि ये अत्यंत महत्वपूर्ण तथा विचारणीय है। तराइन का दूसरा युद्ध अत्यंत महत्वपूर्ण था। यदि पृथ्वीराज चौहान उस युद्ध को जीत लेता तो शायद आज वर्तमान भारत का इतिहास एवं भूगोल एकदम भिन्न होता। सर्वप्रथम तो पृथ्वीराज की इस विजय के साथ भारतवर्ष की पश्चिमी सीमायें बहुत हद तक मुस्लिम आक्रांताओं से सुरक्षित हो जाती। पृथ्वीराज निर्विवाद रूप से भारत वर्ष का सबसे शक्तिशाली राजा बन जाता। यहाँ तक कि पंजाब और सिंध को जीतने के बाद गजनी तक तथा ईरान तक वह अपनी विजय पताका फहरा सकता था। अगले अनेक वर्षो तक कोई भी मुस्लिम आक्रांता भारत की तरफ आँख नहीं उठाता बल्कि पृथ्वीराज सम्पूर्ण भारत को जीतने के बाद अफगानिस्तान, ईरान तथा अरब की तरफ भी बढ़ सकता था।

पृथ्वीराज चौहान इतना युवा, ऊर्जावान, साहसी, महत्वकांक्षी तथा विस्तारवादी था कि वो निश्चित ही पूर्व और दक्षिण भारत की तरफ बढ़ता भी और ये कहने में मुझे कोई हिचक और संदेह नहीं कि यदि पृथ्वीराज चैहान 10 वर्ष और जीवित रहता तो, वो सम्पूर्ण भारत को विजय कर लेता। शायद अशोक महान के नक्शे कदम पर चलते हुये अफगानिस्तान से म्यांमार तक अपना साम्राज्य स्थापित कर लेता। ऐसा प्रतीत होता है कि मोहम्मद गौरी को हराने के तुरंत बाद यदि पृथ्वीराज कुछ करता तो वो होता कन्नौज पर आक्रमण। निश्चित ही पृथ्वीराज जयचंद को ललकारता। पृथ्वीराज चौहान का अगला निशाना गहड़वाल होते और वो उन्हें आसानी से हरा भी देता। उसके बाद मगध बंगाल तथा कलिंग तक पृथ्वीराज जा सकता था। उल्लेखनीय बात यह है कि तत्कालीन भारत में पृथ्वीराज से शक्तिशाली महत्वाकांक्षी तथा तीक्ष्ण सेनापति नहीं था। सम्पूर्ण भारत उससे विजित होने को प्रतीक्षारत था। पूरा भारत पृथ्वीराज के लिए एक खुले मैदान के समान साबित हो सकता था। वो चन्देलों को, चालुक्यों को, परमारों को हरा चूका था। एक बार मोहम्मद गौरी जैसे मलेच्छ को पराजित कर चूका था। दूसरी बार गौरी को हराकर यदि पृथ्वीराज उसका वध कर देता, तो निश्चित ही भारत में उसके समान ताकतवर तथा प्रचंड सेनानायक एवं सम्राट ना होता। यह भी हो सकता है पृथ्वीराज भारत वर्ष की सीमाओं को फारस की खाड़ी से लेकर सुमात्रा तक ले जा सकता था। आह लेकिन ये सब हो ना सका।
प्रख्यात इतिहासकार तथा संघ विचारक डॉ. सतीशचंद्र मित्तल अपनी पुस्तक ‘‘मुस्लिम शासक तथा भारतीय जन समाज (सातवीं शताब्दी से 1857 तक)’’ में लिखते हैं कि ‘‘कुछ भी हो, तराइन का दूसरा युद्ध भारतीय इतिहास में दुर्भाग्यशाली साबित हुआ। यह भारतीय इतिहास की एक युगान्तकारी घटना थी। यह युद्ध निर्णायक सिद्ध हुआ और इससे मोहम्मद गौरी की भारत विजय निश्चित हो गई। सबसे बड़ी बात यह रही कि इस संघर्ष ने राजपूतांे को एककर उनमें उत्साह जगाने वाला कोई योद्धा न रहा।’’

डॉ. सतीशचंद्र मित्तल के अनुसार, ‘‘मोहम्मद गौरी का उल्लेखनीय संघर्ष अजमेर तथा दिल्ली के शासक राजा पृथ्वीराज चैहान के साथ हुआ। इसका विस्तृत वर्णन चन्दरबरदाई ने अपने लोकप्रिय ग्रन्थ पृथ्वीराज रासो में किया है। पृथ्वीराज अपनी वीरता तथा शौर्य के लिए प्रसिद्ध था। संघर्ष के समय उसकी आयु केवल 27 वर्ष की थी। उसकी शूरवीरता की धाक सम्पूर्ण भारत में फैली थी। भारत की विशाल जनता उसे ‘राम’ की उपाधि से विभूषित करती थी। सभी राजपूत शासक उसका लोहा मानते थे। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वीराज ने अपने जीवन काल में छोटी-बड़ी लगभग इक्कीस लड़ाइया लड़ी थी। निःसन्देह पृथ्वीराज अपने समय के महानतम सेनापतियों व सैनिको में था।’’

प्रख्यात हिन्दू लेखक डॉ. शरद हेबालकर अपनी पुस्तक ‘‘मुस्लिम आक्रमण का हिन्दू प्रतिरोध (एक सहस्त्र वर्षों के संघर्ष की विजय गाथा)’’ में पृष्ठ 36 -37 पर पृथ्वीराज और गौरी का विस्तृत उल्लेख करते हैं। हेबालकर लिखते हैं ‘मुहम्मद गोरी के लिए यह हार (तराइन के प्रथम युद्ध 1191 की) गहरी चोट थी। उसने फिर से तैयारी शुरू की। विशेष रूप से प्रशिक्षित एक लाख बीस हजार कवचधारी घुड़सवारों की सशस्त्र सेना का निर्माण किया। पृथ्वीराज भी सतर्क था। उसकी सेना में भी लाखांे अश्वरोही थे। लगभग डेढ़ सौ हिंदू नरेश भी अपनी सेना के साथ इनमंे सम्मिलित थे। एक वर्ष पूर्व के उसी रणक्षेत्र में दोनों सेनायें आमने सामने आकर खड़ी थी। खुले मैदान में हिन्दू सेना का सामना करना गौरी की सेना के लिये संभव नहीं था। गौरी अब हिन्दू नरेश के स्वभाव से अच्छी तरह से परिचित था। उसे विश्वास था कि कुटिल नीति से इनसे निपटना आसान है।’

हेबालकर लिखते हैं ‘‘पृथ्वीराज चैहान निःसंशय उस युग का सब से बलशाली हिन्दू नरेश था। पृथ्वीराज विजय में उसे श्रीराम का अवतार कहा है। उसका शौर्य अनुपम था परंतु दुर्भाग्य से दूरदृष्टि एव कालानुरूप नीति की कुशलता का अभाव था। जेजाक भुक्ति (मालवा) के चन्देल, कन्नौज के गहड़वाल और गुजरात के चालुक्यों को वह अपने साथ इस विदेशी आक्रमण के विरोध में खड़ा कर सकता तो सिंध और पंजाब मुक्त करके राष्ट्रीय नायक बन जाता। आपसी संघर्ष, जातिगत अभिनिवेश और अहंमन्यता के कारण यह संभव नहीं हुआ। चैहान और चन्देलों में शत्रुता थी। कनौज के नरेश जयचन्द्र ने चैहान के विरुद्ध चन्देलों का साथ दिया था। तराइन के युद्ध में जयचन्द्र सम्मिलित नहीं हुआ। पृथ्वीराज की मृत्यु का और हिन्दू सेना के हारने का अर्थ भी वह (जयचन्द्र) नही समझ रहा था।’’

हेबालकर के अनुसार ‘‘तराइन के दूसरे युद्ध में (1192) मुहम्मद गौरी ने हिन्दू सेना से घबराने का नाटक किया। संधि की याचना की और युद्ध के बिना वापस जाने का आश्वासन दिया। पृथ्वीराज और उनके सलाहकारों ने इन आक्रमणकारियों के अनुभव से कुछ भी नहीं सीखा था। हिन्दू सेना में आत्मविश्वास था पर अनुशासन का अभाव था। गौरी की याचना से हिन्दू सेना में एकदम शिथिलता आ गयी। इसी का लाभ उठाते हुए रात्रि के अंतिम प्रहर में गौरी की सेना चारों ओर से हिन्दू सेना पर टूट पड़ी। विश्राम और आमोद-प्रमोद में सारी हिन्दू सेना मग्न थी। हिन्दू नरेशों की सम्मिलित सेनाओं का कोई सर्वमान्य नेतृत्व नहीं था। जो बिखरती सेना को प्रेरणा देकर एकत्रित कर सके। स्वंय पृथ्वीराज उसमें असफल रहा। गोविन्दराय जिसने तरायन के प्रथम युद्ध में गौरी पर प्राणघातक वार किया था इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ।’’

श्रंखला के अगले लेख में पृथ्वीराज चैहान और मोहम्मद गौरी के बीच हुये युद्धों एवं मुठभेड़ों पर प्रकाश डाला जायेगा।

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