जाने कैसे ली कर्नल नरुका ने पौन बीघा कृषि भूमि में 13 लाख रूपये की उपज

जाने कैसे ली कर्नल नरुका ने पौन बीघा कृषि भूमि में 13 लाख रूपये की उपज
यदि कोई व्यक्ति दावा करे कि उसने मात्र पौन बीघा कृषि भूमि में तेरह लाख रूपये मूल्य की उपज ली. इस बात को कोई भी किसान कोरी गप्प मानेगा. लेकिन अलवर में कोठीराव के रहने वाले पूर्व कर्नल राजेन्द्र सिंह नरुका ने अपने खेत में अपनी बुद्धि, समझ और मेहनत से मात्र पौन बीघा भूमि में तेरह लाख से ज्यादा की उपज बेची. यही नहीं जब कर्नल ने अपनी यह कृषि आय आयकर रिटर्न में दर्शायी तो आयकर विभाग के भी कान खड़े हो गए. आयकर अधिका

रीयों को लगा कि कर्नल दो नंबर का रुपया कृषि आय में दिखाकर किसी काली कमाई को सफ़ेद करना चाहते है और आयकर विभाग ने इस बात की जाँच की. चूँकि इस उपज की ज्यादातर रकम सरकारी चैक के माध्यम से कर्नल को मिली थी अत: आयकर विभाग को इसमें कुछ भी गलत नहीं मिला.

वर्ष 2006 में कृषि अधिकारीयों ने 5 रूपये प्रति नग के हिसाब से किसानों को बेशुमार आंवले के पौधे बेचे जो सरकार ने फतेहपुर उतरप्रदेश से 24 रूपये प्रति पौधा ख़रीदा था. इस तरह लाखों पौधों पर तगड़ी सब्सिडी की रकम खर्च की गई. फिर भी धरातल पर आंवले के दस-बीस प्रतिशत पेड़ ही नहीं पनप पाये. क्योंकि जहाँ से आंवले के पौधे लाये जा रहे थे वहां का व राजस्थान के जलवायु में काफी फर्क था. साथ ही किसानों के पास पौधों को पानी देने के लिए बूंद बूंद पानी देने जैसी तकनीक नहीं थी. जिसके चलते ज्यादातर पौधे पनपे ही नहीं. आखिर कृषि अधिकारीयों ने राजस्थान की पौधशालाओं से ही आंवले के पौधे खरीदकर वितरण करने की योजना बनाई.

कर्नल नरुका ने भी इस योजना का लाभ लेने व किसानों तक अच्छी गुणवत्ता व किस्म वाले आंवले के पौधे पहुंचाने के उद्देश्य से पौन बीघा भूमि में लगभग सवा लाख आंवले के पौधों की पौध तैयार की. जब सरकारी निविदाएं खुली तो पौधशालाओं से 8-9 रूपये प्रति पौधा ख़रीदा गया. लेकिन कर्नल ने पौधों की मांग और आपूर्ति पर शोध कर अनुमान लगा लिया था कि सभी पौधशालाओं से पौधे लेने के बाद भी पौधों की कमी रहेगी और तब मैं सरकार को 12 रूपये प्रति पौधा बेचूंगा. हुआ भी यही, जब मांग के अनुसार आपूर्ति नहीं हुई तब सरकारी अधिकारीयों ने कर्नल से 12 रूपये प्रति पौधा ख़रीदा. इस तरह कर्नल ने सिर्फ पौन बीघा खेत में आंवले की पौध तैयार करके 13 लाख रूपये से ज्यादा विक्रय किया.

कर्नल नरुका ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व आप पार्टी नेता संजय सिंह से विशेष बातचीत में बताया कि जब तक किसान सिर्फ पारंपरिक कृषि तकनीक पर निर्भर रहकर जौ, बाजरा, गेंहू आदि की ही फसल का उत्पादन करता रहेगा तब तक वह कभी भी अपनी उन्नति नहीं कर सकता और हमेशा कर्ज में डूबा रहेगा. आज आवश्यकता है पारम्परिक कृषि तकनीक के साथ आधुनिक कृषि तकनीक का मिश्रण कर अभिनव कृषि तकनीक अपनाई जाय और वेल्यू एडेड कृषि उत्पाद की अभिनव तरीके से उपज कर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जाय. कर्नल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को बताया कि अब कृषि में सिर्फ फावड़े से हाड़तोड़ मेहनत करने मात्र से काम नहीं चलने वाला, अब जरुरत है अभिनव तकनीक से, समझदारी पूर्वक कृषि उत्पाद पैदा किये जाये. इसी चर्चा में कर्नल ने किसानों के लिये सुझाव रखा कि किसान को उसकी उपज का सही मूल्य तभी मिल सकता है जब किसान बिचौलियों को समाप्त कर अपनी उपज सीधे संबंधित औद्योगिक ईकाई को बेचे. इसके लिए एक ही तरह के उत्पाद की कृषि करने वाले किसान मिलकर अपनी उपज एक साथ सीधे संबंधित औद्योगिक ईकाई तक पहुंचा सकते है. आज पारम्परिक कृषि के बजाय आंवले, नींबू, अनार, संतरा, किनू, पपीता, सब्जियां, विभन्न तरह के फूल आदि की खेती कर गेंहू, जौ, सरसों आदि की खेती से ज्यादा कमाया जा सकता है.

कर्नल बताते है कि कृषक को चाहिये कि वह अपनी कृषि भूमि के हर एक वर्ग इंच भूमि से कितनी उपज मिली का हिसाब रखें, किस उपज से एक वर्ग इंच भूमि से कितनी आय हुई की तुलना करें, वही खेती करे जिसमें ज्यादा आय हो और एक वर्ग इंच भूमि का इस्तेमाल करते हुए कृषि को उद्योग समझकर कृषि कार्य करें तभी भारत का किसान समृद्ध हो सकता है यहाँ की कृषि उन्नत हो सकती है.

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2 Responses to "जाने कैसे ली कर्नल नरुका ने पौन बीघा कृषि भूमि में 13 लाख रूपये की उपज"

  1. ashok bhanwal   May 9, 2015 at 4:06 pm

    prernadayak hukum

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  2. Rajput   May 10, 2015 at 2:30 am

    कर्नल साहब का कहना सही है , मगर उसके लिए गाँव के अनपढ़ किसानों को जागरूक करना जरूरी है। किसानों को नई तकनीक की शिक्षा पंचायत स्तर पर मिलनी चाहिए मगर सरकार इस तरफ बिलकुल ध्यान नहीं दे रही है। मेरा भी इरादा कुछ ऐसा ही करने का है 🙂 अभी 2,4 महीनों मे बोरवेल का कनैक्शन मिल जाएगा उसके बाद कुछ नया करेंगे। अभी तो हमारी तरफ किसानों का एक ही टार्गेट रहता है सरसों या गेहूं की खेती, सरसों को पचास तरह के खतरे होते हैं गेहूं को पानी ज्यादा चाहिए। मगर रोना ये है की हमारे इधर सरकारी कृषि संस्थाएं भी बस फ़ोर्मेल्टी के लिए होती है ,वहाँ पे आरक्षण वाले जमकर बैठे हैं जिनहे कुछ आता जाता नहीं।

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