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Saturday, October 1, 2022

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मुगल-राजपूत वैवाहिक सम्बन्धों का सच

आदि-काल से क्षत्रियों के राजनीतिक शत्रु उनके प्रभुत्व को चुनौती देते आये है। किन्तु क्षत्रिय अपने क्षात्र-धर्म के पालन से उन सभी षड्यंत्रों का मुकाबला सफलतापूर्वक करते रहे है। कभी कश्यप ऋषि और दिति के वंशजो जिन्हें कालांतर के दैत्य या राक्षस नाम दिया गया था, क्षत्रियों से सत्ता हथियाने के लिए भिन्न भिन्न प्रकार से आडम्बर और कुचक्रों को रचते रहे। कुरुक्षेत्र के महाभारत में जब अधिकांश ज्ञानवान क्षत्रियों ने एक साथ वीरगति प्राप्त कर ली, उसके बाद से ही क्षत्रिय इतिहास को केवल कलम के बल पर दूषित कर दिया गया। इतिहास में क्षत्रिय शत्रुओं को महिमामंडित करने का भरसक प्रयास किया गया ताकि क्षत्रिय गौरव को नष्ट किया जा सके। किन्तु जिस प्रकार हीरे के ऊपर लाख धूल डालने पर भी उसकी चमक फीकी नहीं पड़ती, ठीक वैसे ही क्षत्रिय गौरव उस दूषित किये गए इतिहास से भी अपनी चमक बिखेरता रहा। फिर धार्मिक आडम्बरों के जरिये क्षत्रियों को प्रथम स्थान से दुसरे स्थान पर धकेलने का कुचक्र प्रारम्भ हुआ, जिसमंे शत्रओं को आंशिक सफलता भी मिली। क्षत्रियों की राज्य शक्ति को कमजोर करने के लिए क्षत्रिय इतिहास को कलंकित कर क्षत्रियों के गौरव पर चोट करने की दिशा में आमेर नरेशों के मुगलों से विवादित वैवाहिक सम्बन्धों (Amer-Mughal marital relationship) के बारे में इतिहास में भ्रामक बातें लिखकर क्षत्रियों को नीचा दिखाने की कोशिश की गई। इतिहास में असत्य तथ्यों पर आधारित यह प्रकरण आमजन में काफी चर्चित रहा है।

इन कथित वैवाहिक संबंधों पर आज अकबर और आमेर नरेश भारमल की तथाकथित बेटी हरखा बाई (जिसे फ़िल्मी भांडों ने जोधा बाई नाम दे रखा है) के विवाह की कई स्वयंभू विद्वान आलोचना करते हुए इस कार्य को धर्म-विरुद्ध और निंदनीय बताते नही थकते। उनकी नजर में इस तरह के विवाह हिन्दू जाति के आदर्शों की अवहेलना थी। वहीं कुछ विद्वानों सहित राजपूत समाज के लोगों का मानना है कि भारमल में अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए अकबर से अपनी किसी पासवान-पुत्री के साथ विवाह किया था। चूँकि मुसलमान वैवाहिक मान्यता के लिए महिला की जाति नहीं देखते और राजपूत समाज किसी राजपूत द्वारा विजातीय महिला के साथ विवाह को मान्यता नहीं देता। इस दृष्टि से मुसलमान, राजा की विजातीय महिला से उत्पन्न संतान को उसकी संतान मानते है। जबकि राजपूत समाज विजातीय महिला द्वारा उत्पन्न संतान को राजपूत नहीं मानते, ना ही ऐसी संतानों के साथ राजपूत समाज वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करते है। अतः ऐसे में विजातीय महिला से उत्पन्न संतान को पिता द्वारा किसी विजातीय के साथ ब्याहना और उसका कन्यादान करना धर्म सम्मत बाध्यता भी बन जाता है। क्योंकि यदि ऐसा नही किया गया जाता तो उस कन्या का जीवन चौपट हो जाता था। वह मात्र दासी या किसी राजपूत राजा की रखैल से ज्यादा अच्छा जीवन नहीं जी सकती थी।

भारमल द्वारा अकबर को ब्याही हरखा बाई का भी जन्म राजपूत समाज व लगभग सभी इतिहासकार इसी तरह किसी पासवान की कोख से मानते है। यही कारण है कि भारमल द्वारा जब अकबर से हरखा का विवाह करवा दिया तो तत्कालीन सभी धर्मगुरुओं द्वारा भारमल के इस कार्य की प्रसंशा की गयी। इसी तरह का एक और उदाहरण आमेर के इतिहास में मिलता है।
राजा मानसिंह द्वारा अपनी पोत्री (राजकुमार जगत सिंह की पुत्री) का जहाँगीर के साथ विवाह किया गया। जहाँगीर के साथ मानसिंह ने अपनी जिस कथित पोत्री का विवाह किया, उससे संबंधित कई चौंकाने वाली जानकारियां इतिहास में दर्ज है। जिस पर ज्यादातर इतिहासकारों ने ध्यान ही नहीं दिया कि वह लड़की एक मुस्लिम महिला बेगम मरियम की कोख से जन्मी थी। जिसका विवाह राजपूत समाज में होना असंभव था।

  • कौन थी मरियम बेगम

इतिहासकार छाजू सिंह के अनुसार ‘‘मरियम बेगम उड़ीसा के अफगान नबाब कुतलू खां की पुत्री थी। सन 1590 में राजा मानसिंह ने उड़ीसा में अफगान सरदारों के विद्रोहों को कुचलने के लिए अभियान चलाया था। मानसिंह ने कुंवर जगत सिंह के नेतृत्व में एक सेना भेजी। जगतसिंह का मुकाबला कुतलू खां की सेना से हुआ। इस युद्ध में कुंवर जगतसिंह अत्यधिक घायल होकर बेहोश हो गए थे। उनकी सेना परास्त हो गई थी। उस लड़की ने जगतसिंह को अपने पिता को न सौंपकर उसे अपने पास गुप्त रूप से रखा और घायल जगतसिंह की सेवा की। कुछ दिन ठीक होने पर उसने जगतसिंह को विष्णुपुर के राजा हमीर को सौंप दिया। कुछ समय बाद कुतलू खां की मृत्यु हो गई। कुतलू खां के पुत्र ने मानसिंह की अधीनता स्वीकार कर ली। उसकी सेवा से प्रभावित होकर कुंवर जगतसिंह ने उसे अपनी पासवान बना लिया था। प्रसिद्ध उपन्यासकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास ‘‘दुर्गेशनंदिनी’’ में कुंवर जगतसिंह के युद्ध में घायल होने व मुस्लिम लड़की द्वारा उसकी सेवा करने का विवरण दिया है। लेकिन उसने उस लड़की को रखैल रखने का उल्लेख नहीं किया। कुंवर जगतसिंह द्वारा उस मुस्लिम लड़की बेगम मरियम को रखैल (पासवान) रखने पर मानसिंह कुंवर जगतसिंह से अत्यधिक नाराज हुए और उन्होंने उस मुस्लिम लड़की को महलों में ना प्रवेश करने दिया, ना ही रहने की अनुमति दी। उसके रहने के लिए अलग से महल बनाया। यह महल आमेर के पहाड़ में चरण मंदिर के पीछे हाथियों के ठानों के पास था, जो बेगम मरियम के महल से जाना जाता था। कुंवर जगतसिंह अपने पिता के इस व्यवहार से काफी क्षुब्ध हुये, जिसकी वजह से वह शराब का अधिक सेवन करने लगे। मरियम बेगम ने एक लड़की को जन्म दिया। कुछ समय बाद कुंवर सिंह की बंगाल के किसी युद्ध में मृत्य हो गई। इस शादी पर अपनी पुस्तक ‘‘पांच युवराज’’ में लेखक छाजू सिंह लिखते है ‘‘मरियम बेगम से एक लड़की हुई जिसकी शादी राजा मानसिंह ने जहाँगीर के साथ की। क्योंकि जहाँगीर राजा का कट्टर शत्रु था, इसलिए उसको शक न हो कि वह बेगम मरियम की लड़की है, उसने केसर कँवर (जगतसिंह की पत्नी) के पीहर के हाडाओं से इस विवाह का विरोध करवाया। किसी इतिहासकार ने इस बात का जबाब नहीं दिया कि मानसिंह ने अपने कट्टर शत्रु के साथ अपनी पोती का विवाह क्यों कर दिया? जबकि मानिसंह ने चतुराई से एक तीर से दो शिकार किये- 1. मरियम बेगम की लड़की को एक बड़े मुसलमान घर में भी भेज दिया। 2. जहाँगीर को भी यह सन्देश दे दिया कि अब उसके मन में उसके प्रति कोई शत्रुता नहीं है।

जहाँगीर के साथ जगतसिंह की मुस्लिम रखैल की पुत्री के साथ मानसिंह द्वारा शादी करवाने का यह प्रसंग यह समझने के लिए पर्याप्त है कि इतिहास में मुगल-राजपूत वैवाहिक संबंध में इसी तरह की वर्णशंकर संताने होती थी, जिनका राजपूत समाज में वैवाहिक संबंध नहीं किया जा सकता था। इन वर्णशंकर संतानों के विवाहों से राजा राजनैतिक लाभ उठाते थे। जैसा कि छाजू सिंह द्वारा एक तीर से दो शिकार करना लिखा गया है। एक अपनी इन संतानों को जिन्हें राजपूत समाज मान्यता नहीं देता, और उनका जीवन चौपट होना तय था, उनका शासक घरानों में शादी कर भविष्य सुधार दिया जाता, साथ ही अपने राज्य का राजनैतिक हित साधन भी हो जाता था। इस तरह की उच्च स्तर की कूटनीति तत्कालीन क्षत्रिय समाज ने, न केवल समझी बल्कि इसे मान्यता भी दी। यही कारण है कि हल्दीघाटी के प्रसिद्द युद्ध के बाद भी आमेर एवं मेवाड़ के बीच वैवाहिक सम्बन्ध लगातार जारी रहे।

The truth of Mughal-Rajput marital relationship

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17 COMMENTS

  1. यह लेख पढ़कर ऐसा लगता है जैसे सम्पूर्ण राजपूत बिरादरी के साथ खूब छल किया गया है इतिहासकारों ने सम्पूर्ण ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर अपना उल्लू सीधा किया है आपने जिस प्रकार से अपने लेख में यह चौंकाने वाली महत्वपूर्ण जानकारी दी है इससे अनेकों भ्रम दूर हुए हैं यह लेख पढ़कर ऐसा लगता है जैसे सम्पूर्ण राजपूत बिरादरी के साथ खूब छल किया गया है इतिहासकारों ने सम्पूर्ण ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर अपना उल्लू सीधा किया है आपने जिस प्रकार से अपने लेख में यह चौंकाने वाली महत्वपूर्ण जानकारी दी है इससे अनेकों भ्रम दूर हुए हैं राजपूत समाज अपने कुल की पवित्रता को बनाये रखने के लिये सदा ही अत्यंत आदर्शवादी रहा है केवल कुछ मूर्ख लोगों के कारण अनायास ही सम्पूर्ण समाज को नीचा देखना पड़ा यह अत्यंत सोचनीय है इतिहास पर आपका यह लेख पढ़कर अच्छा लगा भारतीय राजाओं के ऊपर इसी तरह का एक शानदार लेख मैंने इस साईट पर भी पढ़ा है जिसका लिंक आपकी अनुमति से मै यहाँ दे रही हूँ भारत के अनोखे राजा-महाराजा और उनका विचित्र जीवन

  2. श्री छाजू सिंह जी द्वारा लिखित पुस्तकें कहाँ मिलेगी ?

  3. मेरा राजपूत समाज की भावनाओ को आहत करने की कोई मंशा नही है। राजपूत राजाओं द्वारा अपनी अपनी मातृभूमि दिये गए बलिदान के लिए सदैव आभारी हूं परंतु मुगलो के दरबार मे हज़ारो रानिया ओर बांदिया थी जो छोटे छोटे राजघरानों, ठिकानेदारों या जमीदारों के परिवार से थी वे सभी किसी की संकर संतान हो संभव नही। में मानता हूं कि इतिहास को सदैव तोड़ मरोड़कर हिन्दू धर्म के विरुद्ध उपयोग किया जाता रहा है परंतु कही कुछ तो सत्य है इस बात में भी की अपना हित साधने हेतु राजपूत राजकुमारियां हमारे पूर्वजों द्वारा मुग़ल दरबार मे ब्याह दी गई।

  4. इतिहासकार अपनी लेखनी मे सामयिक जानकारी अवश्य शामिल करते हैं किन्तु कालांतर मे, भाँडो द्वारा स्वहित के वशीभूत उसमे परिवर्तन कर अपने राजाओं को महिमंडित किया है…. ऐसी कई ऐतिहासिक घटनाओं का स्वरूप आज एकदम विपरीत स्थिति मे उपलब्ध है…

  5. Sarkar ko ye sach btao or unko kaho ki sahi itihas pdhaya jaye. Agar sarkar nhi manti toh sabhi hindu sangthan ek lamba andolan kre

  6. क्षत्रियों के शौर्यपूर्ण इतिहास को इन लिबरलो ने कलंकित करने का प्रयास किया है झूटी अफवाहें लिखकर ओर गलत ऐतिहासिक जानकारी देकर….जब की राजपूतों ने कई मुगलों ओर सुल्तान को धूल चटा दी थी इसके एक नहीं कई उदाहरण है…राणा कुम्भा कभी युद्ध नहीं हारे मुगलों को कैद तक कर k रखा…राणा सांगा दिल्ली के इब्राहिम लोदी को हराया…गौरी को पृथ्वीराज जी ने हराया… बाड़ी के युद्ध मै बाबर को राणा सांगा ने हराया… जैत्र सिंह मेवाड़ ने दिल्ली सुल्तान इल्तुतमिश को हराया..राणा हम्मीर ने मुहम्मद बिन तुगलक को हराया…राव जैत सी बीकानेर ने हुमायूं के भाई अफगान शासक कामरान को हराया…विग्रहराज 4 ने गजनी के शासक खुसरुसह को हराया…अमर सिंह राठौड़ ने शाहजहा कि भरी सभा में उसके सेनापति सलावत खा का सिर काट दिया था..जिस से डर कर शाहजहा सिंहासन के पीछे छिप गया था..ओर बहलोल खान के महाराणा प्रताप ने एक ही वार मै घोड़े समेत दो टुकड़े कर दिए थे…ऐसे कई अनगिनत उदाहरणों से भरा पड़ा है राजपूत इतिहास…मुगल राजपूतों से सिर्फ छल ओर कपट से ही जीत पाते थे…. इन कुबुद्धी वाले नेताओं के गुलाम वामपंथी इतिहासकारों ने क्षत्रियों के शोर्यो को बदनाम करने के लिए कई झुटे किस्से कहानियां अपनी मर्ज़ी से जोड़ कर इतिहास को कलंकित किया है परन्तु सच्चाई कितनी ही दबा लो सामने आ ही जाती है…राजपूतों की मताओ का जौहर ओर योद्धाओं का केसरिया व्यर्थ नहीं गया..#जय भवानी

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